रविवार, जनवरी 31, 2010

हम आम आदमी दर्द समझने नाकाम : सुप्रीम कोर्ट

संजय स्वदेश
वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में ऐसा लगता है कि दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र का अंतिम न्यायालय भी न्याययिक प्रक्रिया में आम आदमी के प्रति सहानुभूति खोता जा रहा है। देश की सबसे बड़ी न्यायालय सुप्रीम कोर्ट की यह आलोचना करने वाला कोई और नहीं बल्कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट ही है। न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और ए.के गांगुली की खंडपीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश की चुनौति में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत की यह आलोचना की।
दो-तीन दिन पहले की बात है, सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश गांगुली ने रविन्द्र नाथ टैगोर के एक कथन का उदाहरण देते हुए कहा कि वैश्वीकरण और उदारीकरण से हालत ऐसे हो गए हैं जिसमें लोग पागलों की तरह पश्चिमी जीवन शैली की ओर भाग रहे हैं। न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि हमारी न्याय प्रणाली में आम आदमी धीरे-धीरे सरकते हुए हासिये पर आ गए है। अदालती प्रक्रिया आम आदमी की स्थिति और धौर्य को नहीं समझ पाती है। यह स्थिति संवैधानिक रूप से उत्पन्न हुई है। यदि कोई इस स्थिति को बदलना चाहता है तो उसे देश के नजदीक से देखना चाहिए। इसके लिए देश का भ्रमण करने की भी जरूरत है। न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि हमारे संविधान का बुनियादी आकार आम आदमी के बदल गया है। संविधान इन्हीं आम आदमी पर शासन के लिए नहीं बना है। पर वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में आम आदमी अनेक समस्याओं के बोझ से लदा हुआ है, जिससे वह विकास की मुख्यधारा से जुडऩे के बजाय हाशिये पर चला गया है।

शुक्रवार, जनवरी 29, 2010

बाबा बनकर 'गुमनाम' हुए नेताजी?

बाबा बनकर 'गुमनाम' हुए नेताजी?
29 Jan 2010, 1513 hrs
नवभारतटाइम्स.कॉम
नई दिल्ली ।।
आजाद भारत का सबसे बड़ा रहस्य एक बार फिर चर्चा में है। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक न
ेताजी सुभाष चंद्र बोस पर बनी एक डॉक्युमेंट्री ने इस मुद्दे को फिर जीवित कर दिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले नेताजी की मृत्यु की जांच पर बने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया था।
कमिशन के अध्यक्ष, जस्टिस मनोज मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि दावों के उलट नेताजी की मृत्यु 1945 में प्लेन हादसे में नहीं हुई थी। मुखर्जी ने डॉक्युमेंट्री बनाने वाले फिल्ममेकर अमलनकुसुम घोष को बताया है कि मुझे अब 'पूरा विश्वास' है कि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में रहने वाले गुमनामी बाबा के भेस में वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे।
हालांकि अपनी रिपोर्ट में मुखर्जी ने गुमनामी बाबा के बोस होने की संभावना को नकार दिया था अलबत्ता उन्होंने यह कहा था कि नेताजी की मृत्यु प्लेन क्रैश में नहीं हुई थी।
मीडिया में आई खबर के मुताबिक, जस्टिस मुखर्जी का यह बयान 'ब्लैक बॉक्स ऑफ हिस्ट्री' नाम की डॉक्युमेंट्री का हिस्सा है जो 18 फरवरी को कोलकाता में दिखाई जाएगी। पता चला है कि मुखर्जी ने दावा किया है कि उन्होंने ये बातें 'ऑफ द रेकॉर्ड' कही थीं और घोष ने उनकी आपसी बातचीत का इस्तेमाल किया है जो कानूनन और नैतिकता के नजरिए से गलत है।
बताया जा रहा है कि डॉक्युमेंट्री में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मुखर्जी 1985 में मरे गुमनामी बाबा से मिले कागजात की जांच की बात करते हुए कहते हैं, 'निजी तौर पर मैं महसूस करता हूं (मेरा नाम न लें) और मुझे 100 फीसदी विश्वास है कि वह (गुमनामी बाबा) ही नेताजी थे।'
उधर, फिल्ममेकर घोष ने मुखर्जी के इस बयान को डॉक्युमेंट्री में इस्तेमाल करने को सही ठहराया है। वह कहते हैं कि, जस्टिस मुखर्जी ने जो कुछ मुझे बताया उसका राष्ट्रीय महत्व है। इसे दो लोगों की आपसी बातचीत नहीं कह सकते। घोष नहीं मानते कि जो उन्होंने किया वह अनैतिक है। बल्कि घोष कहते हैं कि जस्टिस मुखर्जी जैसे व्यक्ति को इतनी अहम बात जनता से छिपानी नहीं चाहिए थी क्योंकि लोगों को नेताजी के बारे में सच जानने का अधिकार है। घोष ने नेताजी और गुमनामी बाबा से जु़ड़े कई लोगों से बातचीत की। घोष का दावा है कि नेपाल के रास्ते नेताजी साधु के भेस में उत्तर प्रदेश पहुंचे और 1983 से फैजाबाद के राम भवन में रहने लगे।
जिन लोगों से बातचीत की गई उनमें हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ क्रिमिनॉलजी के पूर्व अडिशनल डायरेक्टर डॉ. बी. लाल भी शामिल हैं। लाल का कहना है कि गुमनामी बाबा और नेताजी की राइटिंग 'बिल्कुल एक जैसी' थी। गुमनामी बाबा के निजी चिकित्सक डॉ. आर. के. मिश्रा और पी. बंदोपाध्याय के मुताबिक गुमनामी बाबा के पास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कागजात और बोस परिवार की तस्वीरों से भरे 40 बक्से थे। यह कागजात और तस्वीरें नेताजी के अलावा किसी और के पास नहीं हो सकते थे।

गुरुवार, जनवरी 28, 2010

बुलंदियों पर रहा विदर्भ, महाराष्ट्र ने बरबाद किया

नाग-विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स में परिचर्चा
नागपुर ।
नाग-विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स में आयोजित 'विदर्भ की बुलंदियां व पतनÓ परिचर्चा में वक्ताओं का मानना था कि विदर्भ की धरोहर और आर्थिक स्थिति प्राचीन काल में अपनी बुलंदियों पर थी। विदर्भ के पतन पर दु:ख व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सन 1956 में मुंबई राज्य तथा 1960 में महाराष्ट्र में इसका विलय हो जाने के बाद विदर्भ क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई।
गोंडकाल से आजादी तक बलवानों का राज
विदर्भ के इतिहास का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने कहा कि गोंड राजा के काल से देश की आजादी तक यहां बलवान लोगों का राज रहा। पशु पालन, खेती एवं व्यापार भरपूर था। धार्मिक ग्रंथो में बहुत सी जगह विदर्भ का उल्लेख हुआ है। रुक्मिणी की कृष्णजी से विवाह, महाभारत में कुंतिपुर का उल्लेख नल-दमयंति की कहानी, रामायण में जनपदास के रूप में विदर्भ का उल्लेख तथा कालिदास की कविता 'मेघदूतम्Ó में यक्ष गंधर्व के संदर्भ में विदर्भ का उल्लेख यह बताता है कि यह कितनी प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है तथा धार्मिक और बुद्धिजीवियों का केंद्र रहा है।
अंग्रेजों के समय भी व्यवसाय बढ़ा
अंग्रेजों के काल में भी यहां के व्यवसाय का खूब विस्तार हुआ। यहां की टीक, सागवन लकड़ी विश्वप्रसिद्ध हुई। जंगलों से लाख का, मैग्नीज आदि का बहुत बड़े रूप में निर्यात हुआ। यहां के कपड़ा मिलों ने सूती कपड़ा क्षेत्र में पूरे देश में अपना नाम कमाया। यहां का वातावरण, लोगों की मेहनत और बुद्धिमत्ता को देखते हुए अंग्रेजों ने भी इसे अपना एक बड़ा प्रशासनिक क्षेत्र बनाया। भौगोलिक रूप से विदर्भ हिंदुस्तान का मध्य क्षेत्र है। यहां के लोग मेहनती व शांत स्वभाव के हैं। यहा का वातावरण एवं ऋतुएं सभी के लिए सहयोगी हैं। यहां का स्थल, रोड, रेल व हवाईं मार्गों से सभी राज्यों से जुड़ा है। यहां पर सभी गांवों में बड़े-बड़े तालाब थे। उच्च किस्म की पशु-संपदा थी। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, वन संपदा तथा खनिज से परिपूर्ण यह क्षेत्र अपने स्थान से 800 कि.मी.क्षेत्र के दायरे में सबसे विकसित क्षेत्र था और यहां के वासियों को इस पर गर्व था। इतनी बुलंदियों पर रहने वाले विदर्भ की गाथा सभी वक्ताओं ने रखी।
महाराष्ट्र में विलय के बाद हुई उपेक्षा
विदर्भ के पतन पर दु:ख व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सन 1956 में मुंबई राज्य तथा 1960 में महाराष्ट्र में इसका विलय हो जाने के बाद विदर्भ क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई। इसका कुछ कारण राज्य सरकार की अनदेखी तथा महाराष्ट्र के अन्य राज्यों से विदर्भ की संस्कृति में फर्क भी महत्वपूर्ण है। वक्ताओं ने कहा कि समय पर विदर्भ के हित में निर्णय नही लेना यहां का बढ़ता हुआ पिछड़ापन यह दर्शाता है कि राज्य सरकार ने यहां पैसा देना तो दूर यहां का पैसा महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों के विकास के लिए किया। कोई न कोई बहाना लेकर यहा की परियोजनाओं को पूर्ण होने नहीं दिया। यहां के विकास को आकड़ों की हेराफेरी में कागजों पर रखा गया। सिंचन के अभाव में यहां का कृषि क्षेत्र खत्म हो गया और किसानों ने आत्महत्या की। मुंबई, पुणे के कारखानों को प्रोत्साहन देकर मुुंबई और उसके आसपास रखा गया। बाहर के लोग आकर वहां बसे मगर विदर्भ में बेरोजगारी हो गई। सारे प्रशासनिक अधिकार मुंबई में केंद्रित रखकर अपना काम कराने के लिए विदर्भ के लोगों की चप्पलें घिस गईं। विदर्भ के हक छीनने वाले लोग जब कभी विदर्भ राज्य की थोड़ी बहुत भी कुछ होने की उम्मीद जगती है तो ये लोग उसमेें अड़ंगा लगाते है और ऐसा जताने की कोशिश करते हैं कि विदर्भवासियों पर अहसान हो रहा है। वक्ताओं का यही निश्कर्ष था कि यदि विदर्भवासी खुशहाली चाहते हैं और आने वाली पीढ़ी को सुनहरा विदर्भ देना चाहते हैं तो उन्हें महाराष्ट्र से विदर्भ को अलग करना ही होगा। जरूरत पड़े तो इसके लिए आंदोलन को और तीव्र करना होगा।
इस अवसर पर हेमंत खुंगर, अध्यक्ष, सुनहरा स्वतंत्र विदर्भ समिति के संयोजक बी.सी. भरतिया, प्रकाश मेहाडिया, महामंत्री मयूर पंचमतिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, अजयकुमार मदान, कोषाध्यक्ष हेमंत रविंद्रकुमार गुप्ता, शब्बर शकीर, प्रकाश जैस, सतीश गायकवाड, राजेश वाधवानी, गजानंद गुप्ता, लालचंद गुप्ता आदि प्रमुखता से उपस्थित थे। ऐसी जानकारी चेंबर के मानद सचिव व समिति के महामंत्री प्रकाश मेहाडिया ने दी।

बीटी बैंगन के विरोधियों ने जयराम रमेश को घेरा

शवयात्रा निकाली, पुतला जलाया
निर्णय 15 फरवरी से पहले : जयराम रमेश
संजय स्वदेश
नागपुर।
बी.टी. बैंगन पर नागपुर में आयोजित महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की जनसुनवाई में हिस्सा लेने आए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बी.टी. बैंगन के विरोधियों ने रास्ता रोक कर नारेबाजी करते हुए देसी बैंगन की शवयात्रा निकाली और पुतला फंूका। प्रदर्शन को देखते हुए पर्यावरण मंत्री खुद विरोधियों का समझाने के लिए कार से उतरे।
उत्तर अंबाझरी रोड स्थित आई.एम.ए. सभागृह बी.टी. बैगन की जनसुनवाई के दौरान खचाखच भरा हुआ था। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आए वैज्ञानिक, किसान, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कई लोगों के तर्क सुनने के बाद पर्यावरण मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि बी.टी. बैंगन पर अपना निर्णय वे 15 फरवरी से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप देंगे। जनसुनवाई के दौरान अधिकतर लोगों ने बी.टी. बैंगन के विरोध में तर्क देते हुए इसे देसी बैंगन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया। भारत में बी.टी. बैंगन के बीज बेचने वाली कंपनी कृभको के वैज्ञानिकों ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। विदर्भ के किसान नेता शरद जोशी ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बीज पद्धति और उत्पादन में तकनीक का उपयोग आज जरूरत है। शरद जोशी के पक्ष में 5 जीप और 5 टैक्सी में लोग आए थे। शरद जोशी के भाषण के दौरान वे बी.टी. के पक्ष में नारे लगा रहे थे। कॉटन रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी बी.टी. बैंगन के पक्ष में तर्क रखा। हाईस्कूल तक के पाठ्यक्रमों में जैविक खेती के विषय में पढ़ाया जाता है। फिर यहां रासायनिक उपयोग से तैयार बीज से खेती करने की बात की जा रही है। इससे एक विरोधाभास उत्पन्न हो रहा है।
कीड़े मारने की दवा के लिए हो शोध
लेकिन जनसुनवाई के दौरान बी.टी. बैंगन विरोधियों की आवाज बुलंद रही।
कृषि विशेषज्ञ शरद निंबालकर ने कहा कि देश के किसान वर्षों से देसी बैंगन उगा रहे हैं। केवल कीड़े मारने के लिए पूरे बीज को बदल कर उसे अनुवांशिक बनाना ठीक नहीं है। अभी जो बीज तैयार हुआ है कि उस पर 10-15 साल का ही शोध हुआ है। इसका असर अगली पीढ़ी पर क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है। केवल वैज्ञानिक तरीके से कीड़े मारने के लिए बीज बदलने के बजाय देश के वैज्ञानिकों को नई दवाओं की खोज करनी चाहिए। इससे देसी बीज के उपयोग से ही उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और किसानों को लाभ हो सकता है।
मनुष्य की प्रजनन क्षमता पर असर
मध्यप्रदेश से आए सामाजिक कार्यकर्ता जयंत वर्मा ने कहा कि बी.टी. के रूप में ऐसा बीज दिया जा रहा है जो कीटनाशक होगा। लेकिन उसका मानव स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा, इसका परीक्षण नहीं किया गया है। विदर्भ में बी.टी. कॉटन उगाने वाले किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की। लेकिन इस पर जनसुनवाई नहीं हुई। फिर बी.टी. पर जनसुनवाई क्यों हो रही है? डा. स्नेहलता वर्मा ने कहा कि अनुवांशिक आधार पर तैयार बी.टी. बैंगन से मनुष्य की प्रजनन क्षमता के अलावा शरीर के अन्य भागों पर भी असर पड़ सकता है।
तीन घंटे की सुनवाई में विरोध ज्यादा
तीन घंटे की जनसुनवाई में एक घंटा किसानों के लिए, 45 मिनट वैज्ञानिकों के लिए, बाकी समय सामाजिक कार्यकर्ता व अन्य के लिए निर्धारित था। ज्ञात हो कि बीटी बैंगन यानी जेनेटिकली मोडिफाइड बैंगन को बीते साल जैसे ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने किसानों तक पहुंचाने का फैसला किया, किसानों और कार्यकर्ताओं ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। सरकार को फरवरी तक बीटी बैंगन के मामले में अंतिम निर्णय लेना है इसलिए पर्यावरण मंत्री कई राज्यों का दौरा कर रहे हैं।

अगली सुनवाई चंडीगढ़ में
देश भर में छह जगहों पर जनसुनवाई होनी है। भुवनेश्वरी, कोलकाता और अहमदाबाद के बाद नागपुर में जनसुनवाई के बाद चंडीगढ़, बंगलुरु और हैदराबाद में जनसुनवाई आयोजित होनी है। हर जनसुनवाई में पर्यावरण मंत्री का विरोध हो रहा है। विरोध में किसान बढ़-चढ़ का हिस्सा ले रहे हैं। वैज्ञानिकों का एक तबका भी इस बैंगन का विरोधी है।
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सोमवार, जनवरी 25, 2010

हैपी बर्थ डे टू टाइगर...

चिरी, जान, ली का धूमधाम से मना जन्मदिन
संजय स्वदेश
नागपुर के महाराजबाग प्राणी उद्यान में शनिवार की शाम तीन शावकों का जन्मदिन कुछ अनोखे अंदाज में मनाया गया। केरी, जॉन और ली नाम के तीनों बाघ एक साल पहले चंद्रपुर के जंगल से महाराजबाग में लाए गए थे। तीनों शावकों की मां को किसी शिकारी ने मार दिया था, इसलिए ये जंगल में अनाथ घूम रहे थे।
शनिवार को इन्हें देखने के लिए बड़ों के साथ-साथ बच्चों का हुजूम उमड़ पड़ा। महाराजबाग में इनका जन्मदिन मनाने के लिए विशेष व्यवस्था भी कर रखी थी। यहां आए नन्हे-मुन्ने अपनी तोतली भाषा में हैपी बर्थ डे टू टाइगर... गा रहे थे। हाथों में गुब्बारे लिये उत्साहित होकर तीनों बाघों की अठखेलियां देख रहे थे।
महाराजबाग में प्रभारी अनिल बारस्कर ने बताया कि ठीक एक साल पहले जब तीनों शावकों को यहां लाया गया था, तब वे पूरी तरह से बदहाल थे। इनकी जीने की संभावना बहुत कम थीं। महाराजबाग के कर्मचारियों ने रात-दिन इनकी सेवा कर इन्हें स्वस्थ बनाया। किसी शिकारी ने इनकी मां को मार दिया था। जंगल में ये तीनों शावक अनाथ घूम रहे थे। बारस्कर ने बताया कि जब ये यहां आए थे, तब तीन किलो के थे। इनके पास जाने वाले हर व्यक्ति की गोद में बैठ जाते थे। हर महीने आधा किलो इनका वजन बढ़ते गया। अब ये 60 किलो के हैं। पूरी तरह से स्वस्थ।
खेला फुटबॉल
तीनों का जन्मदिन मनाने के लिए महाराजबाग में विशेष व्यवस्था की गई थी। हैपी बर्थ डे थ्री इडियट्स लिखा हुआ बैनर और तीनों बाघों के पुराने फोटो लगे थे। तीनों शावक अब बाघ हो चुके हैं। महाराजबाग के कर्मचारियों ने इनके जन्मदिन के लिए विशेष भोजन के रूप में मांस की व्यवस्था की गई थी। इस बीच उनके पास किसी ने एक फुटबॉल फेंक दी। फुटबाल देखते ही केरी, जॉन और ली यह भूल गए कि उनके लिए विशेष भोजन परोसा जा चुका है और वे फुटबाल खेलने में व्यस्त हो गए। जब फुटबॉल से दिल भर गया तो मांस पर टूट पड़े।
बच्चों ने काटा थ्री इडियट्स का केट
पिंजरे से बाहर एक बड़े केक को बच्चों के हाथों कटवाया गया। बच्चों के साथ-बड़ों ने भी बाघों के जन्मदिन का केक खाया। यहां आए सभी बच्चे खासे उत्साहित थे। एक बाघ के जन्मदिन में शामिल होने की खुशी उनके चेहरे पर कुछ अलग
ही अंदाज में दिख रही थी। केक पर प्रतीक रूप में शिकारी का फोटो बना हुआ था क्योंकि इन तीनों बाघों की मां को शिकारी ने मार कर अनाथ कर दिया था। महाराजबाग के प्रभारी अनीस बारस्कर ने बताया कि जंगली जीवों के संरक्षण का संदेश देने के उद्देश्य से ही तीनों बाघों का जन्मदिन इस अंदाज में मनाया गया। शायद यह पहला मौका है जब किसी प्राणी उद्यान में तीन बाघों का जन्मदिन मनाया जा रहा हो और बच्चे उसके जन्मदिन की गीत गा रहे हों।

रविवार, जनवरी 24, 2010

विदेशी मेहमानों के साथ मराठी में बात करेंगे महारास्ट्र के मंत्री

राज्य की नयी संस्कृति नीति की घोषणा १ माय को
संजय स्वदेश
महाराष्ट्र में टैक्सी लाईसेंस के लिए मराठी भाषा के अनिवार्य होने का मुद्दा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार ने एक नई विवादास्पद नीति प्रकाश में आई है। 1 मई से लागू होनेवाली राज्य की नई सांस्कृतिक नीति के मुताबिक अब राज्य के मंत्री विभिन्न कार्यक्रमों में मराठी में ही बातचीत करेंगे। यदि कार्यक्रम में विदेशी अतिथि भी हो, तो भी मराठी भाषा में ही बातचीत करनी होगी। मेहमनों की भाषा को समझने के लिए दोभाषिये का सहयोग लिया जाएगा।
ज्ञात हो कि गत बुधवार को राज्य सरकार ने नई नीति के तहत यह घोषणा की कि टैक्सी का लाईसेंस लेने के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता के साथ-साथ राज्य में 15 साल से निवास करने का प्रमाणपत्र आवश्यक होगा। पर राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे उछलने के कारण फिलहाल फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। शुक्रवार को राज्य की सांस्कृति नीति का एक नया प्रस्ताव मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को सौंपा गया है, जिसमें मराठी भाषा और मराठी संस्कृति के प्रचार के लिए विभिन्न नीतियों का मसौदा है। इस नीति की घोषणा 1 मई को राज्य स्थापना दिवस के मौके पर होगा।
इस नीति को तैयार करने के लिए गत वर्ष अगस्त माह में डा. एक.एस. सलुंके की एक कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने राज्य की भाषा के प्रचार व प्रसार के लिए भाषा भवन बनाने के प्रस्ताव के साथ ही केंद्र व राज्य सरकार के कार्यालयों में हिंदी अधिकारियों की तर्ज पर राज्य में मराठी अधिकारियों की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा रंगमंच और ललित कला को प्रोत्साहन के लिए भी विशेष प्रस्ताव दिये गए हैं।

शनिवार, जनवरी 23, 2010

मैं जिंदा हूं, वी विल कम टू इंडिया


संजय स्वदेश

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धरती के मानचित्र पर भारत सबसे अधिक रहस्यमय देश हैं. भारत में ऐसे कई पात्र ऐसे हैं जो संसार के रंगमंच से कभी विदा ही नहीं हुए. इसमें रामायण और महाभारत काल के कुछ पात्र आज भी उपस्थित माने जाते हैं. नेताजी ऐसे ही चरित्र हो गये हैं. आजादी के रंगमंच का एक ऐसा नायक जो आता तो है लेकिन जिसके जाने का कोई प्रमाण नहीं मिल पाता है.

नेताजी सुभाषचंद्र बोस। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक। ऐसा महानायक जिसका कद महत्मा गांधी से भी ज्यादा उंचा था। पर गांधी के नेहरू प्रेम से देश की राजनीति की ऐसी धारा बही कि इस महानयक को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया गया। आजादी के छह दशक बाद भी सरकार इस महानायक के मौत के रहस्य से परदा उठाने में कभी गंभीर नहीं रही। समय-समय पर अनेक विवाद हुए। पर जांच आयोग से मामला ठंडे बस्ते में दम दोड़ चुका है। 23 जनवरी 2010 को नेताजी की 113वीं जयंती है। नेताजी की अब तक जिवीत रहने की संभावना बहुत कम बचती है। पर नेताजी के मौत या उनके गायब होने के रहस्य जानने के लिए लोगों में हमेशा उत्सुकता रही है।

एनडीए सरकार के कार्यकाल में गठित मुखर्जी आयोग ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, उसे यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल में खारिज कर दिया गया था। महानायक के मौत के रहस्य से परदा हमेशा कभी नहीं हटा। बार-बार यह बात उठी कि आखिर ताइवान में 18 अगस्त 1945 को कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ तो नेताजी अचनाक कहां गायब हो गये? कुछ वर्ष पूर्व यूपीए सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट यह कह कर खारिज कर दिया था कि उसमें कुछ भी नया नहीं है। जो बातें मुखर्जी आयोग ने कही हैं, वैसी बातें पहले भी होती रही है और उस पर काफी चर्चा हो रही है। लेकिन तब विवाद इस बात पर ज्यादा हुआ था कि मुखर्जी आयोग को अपनी जांच पूरी करने में सरकार की कई एजेसियों ने सकारात्मक रवैया नहीं अपना। यहां तक कि सरकार ने आयोग को रूस जाने तक की अनुमति नहीं दी गई थी।

सरकारी गलियारे में दबती है शोर
इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि देश की आजादी में अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले वीर योद्धा का अस्तित्व कहां खो गया यह आजाद भारत के छह दशक से भी ज्यादा समय में नहीं पता लगाया जा सका। किसी भी राष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी ऐतिहासिक धरोहर होती है। आने वाली पीढिय़ां इन्हीं के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए एक अपने देश के लिए सोचती हैं, कुछ करती हैं और किसी विशेष दिवस पर उनकी यादों को ताजा कर गौरवांवित होती है, एक ताकत पाती है। पर वर्तमान पीढ़ी बहुत प्रोफेसनल है। उस याद नेताजी के आदर्श से कुछ लेना नहीं है। उन्हें इतिहास तक सीमित रखना चाहती है। जिन्हें रुचि है, वे समय-समय पर नेताजी के मौत से परदा उठाने और उनके बिरासत को सहेजने की बात उठाते हैं। उनका शोर सरकारी गलियारे में दब जाता है।

खबर के लिए रिपोर्टर कानून तोड़ते हैं
मुखर्जी आयोग का कहना था कि उसके जांच में ताईवान के अलावा किसी देश से भी सहयोग नहीं मिला। 1946 में सुभाष चंद्र बोस जिंदा थे। उन्हें रूस में देखा गया था, लेकिन इस दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। लेकिन जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से अधिकृत जानकारी मिली थी कि १८ अगस्त १९४५ में ताईवान के ताईहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं था। लेकिन अमेरिका के एक अखबार शिकागों ट्रिब्यून के रिपोर्टर अल्फ्रेड बेक ने ताईहाकू हवाई अड्डे का पर दुर्घटना से संबंधित कुछ तस्वीर पेश कि थी। तब खोसला आयोग के सामने इस चित्र से संबंधित प्रमाणिकता साबित नहीं हो पाई थी। इस चित्र को प्रस्तुत करने वाले रिपोर्टर का खुद कहना था कि उस हवाई अड्डे पर चित्र खिंचना प्रतिबंधित था, तो फिर उसने कैसे ये फोटो ले लिये? पर यह कहकर रिपोर्टर की फोटो को खारीज नहीं किया जा सकता था। क्योंकि रिपोर्ट ऐसे की चुनौतीपूर्ण कार्यों को अंजाम देते हैं। इसके लिए चोरी-छिपे कानूनी नियमों के सामने आंख मुंद लेते हैं।
कहीं जापान का षडयंत्र तो नहीं?विमान दुर्घटना प्रकरण में एक और बात गौर करने वाली यह है कि नेताजी की विमान दुर्घटना में हुई मौत का समाचार सबसे पहले जापानी रेडियों ने प्रसारित किया था। और उसके बाद कई ऐसे दलीले मिली जिससे नेताजी के जिंदा होने पर बल मिला। इससे यह भी लगता है कि जपान ने एक सुनियोजित योजना के तहत नेताजी को मृत घोषित किया, क्योंकि ब्रिटिश सेना को नेताजी की सरगर्मी से तलाश थी। हो सकता हो कि जपान के द्वितीय विश्व युद्ध में हार जाने बाद के ब्रिटिश सेना द्वारा उन्हें जापान में खोजने की कार्यवाही से बचना चाहता हो। इसलिए उसने रेडियों से उन्हें मरने की खबर प्रसारित कर दी हो।

गुप्त मिशन से कहीं मंचुरिया तो नहीं गये
पूर्व में गठित खोसला आयोग ने यह साबित किया था कि नेताजी शुरू से ही सोवियत संघ जाना चाहते थे और सोवियत संघ से ही भारत की आजादी का संघर्ष चलाना चाहते थे। लेकिन उनका सोवियत संघ से पहले जर्मनी पहुंचना जरूरी थी। क्योंकि उनको सहायता के लिए पहले ही जर्मनी से आश्वासन मिल चुका था। इतिहास के मुताबिक उन दिनों जर्मनी में भारत के हजारों सैनिक कैद थे। जर्मनी के शासकों ने नेताजी को आश्वासन दिया था कि वे इन भारतीय सैनिकों को कैद से रिहा कर देंगे जिनका उपयो नेताजी अपनी आजाद हिंद फैज में कर सकते थे। इसी सहायता से उन्होंने अंग्रेजी सेनाओं का जमकर मुकाबला भी किया। लेकिन जब द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान हार के कगार पर पहुंचने लगे तो इसका सीधा प्रभाव आजाद हिंद फौज पर पड़ा। तब नेताजी ने एक गुप्त योजना के मुताबिक रूस की यात्रा पर जाने की तैयारी कर लिया। जिस विमान से वह सफर कर रहे थे व दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें नेताजी की मौत हो गई। लेकिन कई दस्तावेज अब भी खोसला आयोग पास है, जिसके मुताबिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने इस गुप्त मिशन के चलते मंचूरियां तक पहुंच गए थे। बाद में मंचूरिया को रूसी सेनाओं ने जापान से छीन लिया और वहां के सैनिकों को उन्होंने बंदी बना लिया जिसमें नेताजी भी थे। फिर बंदी सैनिकों को रूस ले जाया गया, जहां उन खतरनाक जेलों में डाल दिया गया, जहां से कैदियों को सिर्फ मरने की खबर आती है। इसी प्रकरण में कहा जाता है कि नेताजी को स्टॉलिन ने फांसी दे दी थी।

पत्र लिखा, तो जवाब नहीं आया
नेताजी के एक भतीजे अभियनाथ बोस ने खोसला आयोग को यह बयान दिया था कि एक बार उन्हें एक ब्रिटिश राजनयिक ने फोन पर बताया कि १९४७ में नेताजी के साथ रूसी अधिकारियों ने बहुत ही बुरा बर्ताव किया था। उनके पिता यानी नेताजी के भई शरद चंद्र बोस ने १९४९ में अपने बेटे से कहा था कि उन्हें कुछ कूटनीतिक सूत्रों के जरिए पता चला है कि सोवियत संघ में नेताजी को साइबेरिया के यातना शिविर में रख गया था और १९४७ में स्टालिन ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया था। कहा जाता है कि नेताजी के बड़े भाई शरदचंद्र बोस ने इस संबंध में तत्कालीन गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल को सूचित किया था और पेटल ने इस बात की सारी जानकारी प्राप्त करने के लिए मास्कों में तत्कालीन भारतीय राजदूत डॉ. राधाकृष्णनन को एक पत्र लिखा। डॉï राघाकृष्णन ने गृहमंत्री के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया।

निष्कर्ष पर नहीं पहुची कमेटी
मुखर्जी आयोग से पहले नेताजी की मृत्यु से रहस्य से पर्दा उठाने के लिए मुखर्जी आयोग से पहले शाहनवाज कमेटी और बाद में गठित खोसला आयोग कमेटी किसी भी निष्कर्ष में पर नहीं पहुंची। खोसला आयोग ने भी यह कह कर रहस्य को और गहरा दिया कि विमान दुर्घटना में नेताजी के मरने का भी कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। किसी भी आयोग को आज तक ऐसा कोई प्रमाण हाथ नहीं लगा जो यह साबित कर सके कि जिस विमान में नेताजी सफर कर रहे थे, उसमें उन्हें बैठते हुए देखा गया था।

नेता जी ने कहा था
आयोग का यह दावा को इससे भी पुष्ठिï होती है कि भारतीय राष्ट्रीय सेना के एक सिपाही निजामुद्दीन का यह कहना है कि जब नेताजी के मौत की खबर प्रसारित हुई, तब उसके बाद उन्होंने खुद नेताजी का वायरलेस संदेश ग्रहण किया था, जिसमें उन्होंने कहा था - मैं जिंदा हूं, वी विल कम टू इंडिया। लेकिन नेताजी की बेटी अनिता पैफ ने पिछले साल भारत यात्रा के दौरान साफ कहा था कि उन्हें यकीन है कि उनके पिता का निधन विमान हादसे में हो चुका है।

डीएनए टेस्ट का विचार बुरा नहीं विवाद इतना उलझ गया है कि हर पक्ष से विश्वसनीयता उठ चुकी है। जपान में रखी नेताजी की अस्थियों की असलियत पर संदेह उठने लगा है तो सरकार नेताजी की अस्थियों की डीएनए डेस्ट करार उसका मिलान उनकी बेटी से करने का विचार क्यों नहीं करती है? क्योंकि नेताजी की रहस्यमई मौते से पर्दा उठाने पर ही देश की आजादी के इतिहास से नेताजी और उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना के योगदान को और गौरव दिलाया जा सकता है।

... और आज के दिन यह खबर आई
हर साल 23 जनवरी पर नेताजी के विषय पर कुछ न कुछ खास समाचार प्रकाशित होता है। आज 23 जनवरी, 2010 को प्रकाशित खबर के मुताबिक थाईलैंड में रहने वाले त्रिलोक सिंह चावला आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दो पिस्तौलों को सहेजकर रखे हुए हैं। वह अपने जीते जी नेताजी की यह अमानत भारत सरकार को सौंपना चाहते हैं। नेताजी के सचिव रहे 89 वर्षीय त्रिलोक ने इस संबंध में बात करने के लिए अपने बेटे संतोष सिंह चावला को दिल्ली भेजा है। संतोष विगत दो हफ्तों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने की कोशिश में हैं, ताकि इन दोनों पिस्तौलों को सरकार को सौंपकर अपने पिता की अधूरी ख्वाहिश पूरी कर सकें। बैंकॉक से बातचीत में त्रिलोक ने कहा कि नेताजी चाहते थे कि आजादी के बाद मैं उन्हें ये दोनों पिस्तौलें लाल किले में लौटा दूं। मुझे इन हथियारों को सौंपने के आठ दिन बाद ही एक विमान हादसे में उनके निधन की खबर आई। मैं अभी भी नहीं मानता कि नेताजी हमारे बीच नहीं हैं और मैं आज तक उनकी राह देख रहा हूं। परंतु उम्र बढऩे के साथ अब चाहता हूं कि उनकी अमानत को अपने मुल्क को ही सौंप दिया जाए। भारत सरकार इन पिस्तौलों को स्वीकार करने में अनिच्छुक दिखती है और इसकी वजह भी नहीं पता। इन्हें वापस लेने के लिए भारत सरकार को थाईलैंड सरकार से सीधे संपर्क साधना चाहिए।

शुक्रवार, जनवरी 22, 2010

मत्सय और दुग्ध व्यवसाय का हब बन सकता है भारत


21वीं सदी शिक्षा के प्रबंधन का युग: डा.कलाम
संजय स्वदेश
नागपुर।
महाराष्ट्र पशु एवं मत्शय विज्ञान विश्वविद्यालय के चौथे दीक्षांत समारोह में पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने कहा कि भारत डेयरी और मत्सय क्षेत्र में दुनिया का बड़ा हब बन सकता है। नागपुर के उत्तर अंबाझरी रोड़ स्थित एलएडी कॉलेज परिसर आयोजित समारोह में पशु और मत्सय विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाले डॉक्टरों से आह्वान किया कि वे तकनीक का सहारा लेकर डेयरी क्षेत्र में एक नई क्रांति करें। डा. कलाम ने कहा कि पशु वैद्यकिय क्षेत्र में शोध का स्तर बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके शिक्षण में तकनीक का उपयोग होना चाहिए। विज्ञान को तकनीकी से जोडऩा चाहिए। क्योंकि तकनीक देश की आर्थिक स्थिति से जुड़ी है। वर्तमान सदी शिक्षा के प्रबंधन की शदी है। उन्होंने डॉक्टरों से डेयरी तकनीकी के सहारे राष्ट्रीय दुग्ध मिशन की मजबूती के लिए उन्होंने दुध के उत्पादन बढऩे का अह्वान किया।
डा. कलाम ने कहा कि देश में पशुओं की नस्ल सुधारने की जरूरत है। देश में 200 मिलियन पशु है। इस मामले में भारत दुनिया में बहुत बड़ा देश है। पर इसके बाद भी देश में दुध उत्पादन कम होता है। डा. कलाम ने बाबा बसरैया महाराज का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे बसरैया महाराज ने पशुओं के सहारे आदिवासियों की सेवा की। उन्हें नि:शुल्क दुध पिलाया। उन्होंने बताया कि ऐसी कई कहानी है जिसमें पशुओं के सहारे किसानों की जीवन सुधर गई। देश में खेती सीमित हुई है, इससे पशुओं के चारे पर असर पड़ा है। पशुओं को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पा रहा है। डा. कलाम ने कहा कि इसके लिए किसानों का आवश्यक प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। मत्सय क्षेत्र पर चर्चा करते हुए डा. कलाम ने कहा कि भारत दुनिया में मछली उत्पादन में अग्रणी देशा में एक है। ग्रामीण विकास में भी इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। फिलहाल देश में 7 विलियन टन मछली का वार्षिक उत्पादन होता है। जीडीपी में इसकी एक प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इस उत्पादन को 10 विलियन टन वार्षिक किया जाना चाहिए। विज्ञान और तकनीक के सहारे इस क्षेत्र में भी तेजी से विकास की संभावनाएं हैं। उन्होंने एमएएफएस की डिग्री लेने वाले विद्यार्थियों से मत्सय क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान सदी शिक्षा के प्रबंधन का युग है। हर शिक्षित व्यक्ति को अपने ज्ञान का प्रबंधन कर देश की उन्नति में अपनी भागीदारी दिखानी चाहिए।
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भिखारियों की आमदनी आम आदमी से ज्यादा


संजय
नागपुर।
आप माने या न माने, नगर में भीख मांगने वाले कई भिखारी ऐसे हैं जिनकी आमदनी आम आदमी की आमदनी से कई गुना ज्यादा है। इतना ही नहीं इनमें भीख से मिलने वाले धन का लालच इतना है कि यदि इन्हें भीख मांगने की शर्त पर पुनर्वास की व्यवस्था की जाए, तो भी इन्हें संतोष नहीं होगा। इन दिनों नगर में ताजबाग में ताजुद्दीन बाबा का उर्स का माहौल है। उर्स में शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आ रहे हैं। लिहाजा, ताजबाग परिसर में एकाएक भिखारियों की संख्या तेजी से बढ़ गई है।
दिल खोलकर भीख देते हैं श्रद्धालु
ताजुद्दीन बाबा के मजार पर आने वाले श्रद्धालु जी खोलकर भिखारियों को भीख दे रहे हैं। कई लोग ऐसे है जो 50 से 100 रुपये भी भीख दे रहे हैं। उर्स के दौरान यहां एक भिखारी की औसतन आय 500 रुपये से भी ज्यादा है। उर्स के दौरान ताजबाग परिसर में करीब 300 भिखारियों का जमावाड़ा है। यदि औसतन एक भिखारी को प्रतिदिन 500 रुपये भी भीख में मिलती है तो प्रतिदिन यहां 1,50,000 हजार रुपये भीख में जा रहे हैं। एक महीने के उर्स में करीब 4 से 5 लाख रुपये इन भिखारियों के जेब में गए। शारीरिक रूप से पूरी तरह से विकलांग कई भिखारियों की आमदनी प्रतिदिन हजार रुपये को भी पार कर रही है। जिन भिखारियों के हाथ-पांव नहीं हैं, उनकी आय ज्यादा है। इसके प्रति लोगों के दिल में दया की भावना उमड़ती है और वे कम विकलांग भिखारियों की अपेक्षा हाथ-पांव रहित भिखारियों को भीख देना पसंद करते हैं।
रिक्शा चालक बना भिखारी
ताजबाग परिसर में कई भिखारी ऐसे हैं जो शारीरिक रूप से सलामत हैं। बातचीत में इसमें से एक भिखारी ने बताया कि वह आम दिनों में रिक्शा चलाता है। काफी मेहनत के बाद भी दो सौ रुपये की भी जुगत नहीं हो पाती है, लेकिन जब यहां उर्स शुरू होता है, तब थोड़ी बदहाली दिखाकर हर दिन तीन से चार सौ रुपये की आमदनी हो जाती है। इन दिनों ताजुद्दीन बाबा परिसर में भीख मांगने वाले करीब 70 फीसदी भिखारी नागपुर से बाहर के हैं। यहां मिठाई बेचने वाले नुरूल हक ने बताया कि यहां हमेशा ही भिखारियों का जमवड़ा रहता है लेकिन उर्स शुरू होते ही नगर के बाहर के भिखारी यहां आ जाते हैं। उर्स खत्म होते ही रातोंरात भिखारी कहां और कैसे गायब हो जाते हैं, किसी को पता तक नहीं चलता। नुरूल ने बताया कि पूरी तरह अपंग अपाहिज भिखारी जो चल नहीं सकते, स्वयं खा नहीं सकते, वे भी उर्स शुरू होने वाले दिन ही अचानक आते हैं और उर्स खत्म होते ही एकाएक गायब हो जाते हैं।

संगठित गिरोह है सक्रिय
जानकारों को कहना है कि इस भिखारियों का एक संगठित गिरोह योजनाबद्ध तरीके से इन भिखारियों को उन जगहों पर लाता और ले जाता है, जहां समय-समय पर भीड़ उमड़ती है। विशेषकर मंदिर और पूजा-पाठ वाले स्थलों पर विभिन्न मौके पर आयोजित होने वाले धार्मिक आयोजनों पर लाने, ले जाने की पूरी व्यवस्था यह गिरोह करता है। हर दिन भिखारियों से होने वाली आय में से एक बड़ी रकम स्वयं रखते हैं। भिखारियों को रहने और उनके मनपसंद खाने की व्यवस्था के साथ ही शराब आदि की व्यवस्था करते हैं। इसके साथ ही इन भिखारियों में एक भिखारी मुखिया होता है।
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गुरुवार, जनवरी 21, 2010

हडताल से विदर्भ में जनजीवन ठप


संजय स्वदेश
नागपुर।
बुधवार को पृथक विदर्भ राज्य के गठन के लिए विदर्भस्तरीय हड़ताल को जनता का व्यापक समर्थन मिला। जिन सड़कों और फुटपाथ पर हर दिन भीड़-भार नजर आती थी, आज सूनी नजर आई। भीड़भाड़ वाले स्थलों पर इक्का-दुक्का लोग नजर आए। नागपुर से होकर गुजरने वाले लंबी दूरी की ट्रेन सेवा को साथ-साथ लोकल ट्रेन सेवा पर भी हड़ताल का काफी प्रभाव पड़ा।
पृथक विदर्भ के लिए विदर्भ राज्य संग्राम समिति के बैनर तले हड़ताल का आयोजन किया गया था। इसे जनता का स्वस्फूर्त प्रतिसाद मिला और शतप्रतिशत अभूतपूर्व बंद पूरे विदर्भ में रहा। आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर था जब शांतिपूर्ण तरीके से की गई किसी हड़ताल को इस प्रकार का स्वस्फूर्त प्रतिसाद मिला। बुलढाणा जिले के सिंदखेडराजा से गोंदिया और गड़चिरोली और अमरावती जिले के अंतिम गांव तक हड़ताल के आह्वान पर बंद सफल और शांतिपूर्ण रहा। विदर्भ के कुछ स्थानों पर बसों पर पथराव की सूचना मिली है। जरीपटका सहित विदर्भ के 9 स्थानों पर ट्रेनें रोकी गईं। कई ट्रेनें घंटों देर से चलीं। विदर्भ भर में 90 हजार आटोरिक्शा बंद रहे।व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहने से लगभग 300 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान व्यक्त किया गया है।
नागपुर में सुबह ही विदर्भवादियों ने जिलाधीश, पुलिस आयुक्त और विभागीय आयुक्त कार्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर ताला जड़ दिया। नागपुर महानगर पालिका में कामकाज पूरी तरह ठप रहा। हड़ताल आमतौर पर शांतिपूर्ण रही। हालांकि इस दौरान पुलिस ने पूर्व राज्य मंत्री सुलेखा कुंभारे सहित नागपुर में 248 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर बाद में रिहा कर दिया।
अमरावती जिले में भी बंद पूरी तरह सफल रहा। नक्सल प्रभावित गड़चिरोली जिले में हड़ताल को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिलने की खबर है। इतना ही नहीं यह आह्वान भी किया गया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे स्वयं सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पृथक विदर्भ की सिफारिश करें। नागपुर शहर के लगभग 125 संगठनों ने इस हड़ताल को समर्थन दिया। बैंक शुरू रहे। कुछ शासकीय कार्यालय भी शुरू रहे परन्तु उसमें उपस्थिति नाममात्र की रही। स्टार बस सेवा पूरी तरह ठप रही। आटोरिक्शा और स्टार बस बंद होने से शहर की अंतर्गत परिवहन व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। निजी कार्यालय पूरी तरह बंद रहे। बुधवार को हमेशा भीड़-भाड़ से भरी रहने वाली इतवारी, सदर, सीताबर्डी, महल, गांधीबाग आदि हिस्सों की गलियां और सड़कें सूनसान रहीं। प्रदर्शनकारियों ने सुरेन्द्र नगर में एक पेट्रोल पम्प पर पथराव कर पेट्रोल पम्प की एक मशीन को तोड़ दिया। रविभवन में एक दो पहिया वाहन काइनेटिक होंडा जला दी गयी। कई स्थानों पर टायर भी जलाकर विदर्भ के लिए आवाज बुलंद की गई। पृथक विदर्भ के लिए नेताओं ने विदर्भ के अलग-अलग जिलों की कमान संभाली। जिसमें सांसद विलास मुत्तेमवार ने नागपुर, सांसद दत्ता मेघे ने वर्धा, विदर्भवीर जाम्बुवंतराव धोटे ने यवतमाल, सांसद हंसराज अहीर ने चंद्रपुर, विधायक नाना पटोले ने भंडारा, गोंदिया में खुशाल बोपचे आदि के नेतृत्व में शांतिपूर्वक ढंग से आंदोलन किया गया। भारतीय जनता पार्टी ने विधायक देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में हड़ताल को समर्थन दिया।
नागपुर के शहर पुलिस ने भी किसी प्रकार की अप्रिय घटना रोकने के लिए तगड़ा बंदोबस्त लगा रखा था। शहर पुलिस आयुक्त प्रवीण दीक्षित के नेतृत्व में शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस पूरी मुस्तैदी के साथ नजर आई। शहर में एसआरपीएफ की 5 कंपनियां भी तैनात की गई थीं। प्रतापनगर थानांतर्गत सुरेन्द्र नगर में गजभिये के इंडियन ऑइल पेट्रोल पम्प पर कुछ लोगों ने पथराव किया जिससे एक मशीन क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण मीटर बंद हो गया।
रोकी गई ट्रेनें सुबह करीब 9.30 बजे विदर्भ राज्य संग्राम समिति की महिला आघाडी की रूपाताई कुलकर्णी के नेतृत्व में एक टे्रन को मंगलवारी सदर परिसर में रोकने की योजना बनाई गई लेकिन इस टे्रन को पुलिस ने पहले ही आउटर पर जरीपटका क्षेत्र में रोक दिया। प्रदर्शनकारियों ने 10.15 बजे तक प्रदर्शन कर गिरफ्तारी दी। जीआरपी के पुलिस अधीक्षक सिंघल ने बताया कि आंदोलनकारियों ने नागपुर जिले में जरीपटका सहित 9 स्थानों पर रेल रोको आंदोलन किए। जरीपटका इलाके में एक ट्रेन को पुलिस ने पहले ही रोक कर आंदोलनकारियों को टे्रन के पास पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया। प्रदर्शनकारी मंगलवारी सदर इलाके में ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार मुंबई-गोंदिया पैसेंजर (विदर्भ एक्सप्रेस) टे्रन को मालखेड़-चांदूर के पास 11 मिनट तक रोके रखा गया। बल्लारशा-काजीपेठ पैसेंजर को बल्लारशा में लगभग आधे घंटे तक रोका गया। नागपुर-नागभीड़ पैसेंजर को नागभीड़ में रोका गया। नरखेड़-दांडीमेटा में एक रेल इंजिन को रोका गया।
बसों पर पथराव कहीं-कहीं आंदोलनकारी कुछ उग्र नजर आए। नागपुर में टेलीफोन एक्सचेंज चौक, ग्रामीण क्षेत्र के कुही मंडल तथा कुछ निजी बसों पर पथराव कर उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। हालांकि इस पथराव में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई। एसटी महामंडल की 600 में से सिर्फ 200 बसें ही चल सकीं। जो चलीं वो भी कई घंटे देर से चलीं। 90 हजार आटो बंद रहे रोजमर्रा की जिन्दगी में आवागमन के लिए आटो सबसे महत्वपूर्ण साधन माने जाते हैं। लेकिन विदर्भ बंद के आंदोलन में आटो संगठनों ने भी अपना पूरा समर्थन दिया। विदर्भ में बुधवार को लगभग 90 हजार आटो बंद रहे। आटो के बंद रहने से रोजाना आटो से आवागमन करने वाले नागरिकों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
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शीतकालीन अधिवेशन नहीं होने देंगे : मुत्तेमवार
लग विदर्भ राज्य की मांग को लेकर शहर में जगह-जगह राजनीतिक दलों सहित आम जनता ने भी जमकर प्रदर्शन किया। विदर्भ राज्य की मांग की अगुआई कर रहे पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विलास मुत्तेमवार ने इस हड़ताल को शतप्रतिशत सफल बताया। नाग-विदर्भ चेंबर आफ कामर्स में व्यापारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विधान मंडल के पिछले शीतकालीन अधिवेशन के समापन अवसर पर ही मैंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को बता दिया था कि महाराष्ट्र विधान मंडल का नागपुर में यह आखिरी शीतसत्र है। सन 2010 में यहां विदर्भ राज्य की गठित सरकार और जनप्रतिनिधियों का अधिवेशन होगा। इस अवसर पर चेंबर के अध्यक्ष हेमंत खुंगर, प्रकाश वाधवानी, बी.सी. भरतिया सहित कई व्यवसायी उपस्थित थे। उन्होंने चेतावनी दी कि अब विदर्भ विरोधी नेताओं को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। हम अहिंसा के मार्ग पर चलकर अलग विदर्भ राज्य की मांग कर रहे हैं। समूचे विदर्भ मेंं सभी राजनीतिक दलों सहित जनता भी शांतिप्रिय ढंग से आंदोलन कर रही है। जो लोग हिंसा का मार्ग अपनायेंगे उनके साथ विदर्भ राज्य संग्राम समिति का कोई नाता नहीं होगा। विदर्भ के सभी 11 जिलों में अलग विदर्भ की मांग को लेकर सारे स्कूल, कॉलेज, व्यापारी प्रतिष्ठान बंद रखे गये हैं। विदर्भ की जनता का विशेष रूप से आभार मानते हुये विलास मुत्तेमवार ने कहा कि विदर्भ राज्य की मांग हेतु मैंने पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, अहमद पटेल सहित कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को ज्ञापन दिया है। उन्होंने इस मांग को जायज ठहराते हुये इसका अध्ययन करने हेतु एक समिति का गठन किया है। अब इस मामले पर जल्द निर्णय लेने का वक्त आ गया है। भारतीय जनता पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दल भी हमारा साथ दे रहे हैं। अब अलग विदर्भ राज्य जनता की आवाज बन चुकी है। इस बार के विदर्भ बंद को विशेष रूप से जनता का समर्थन प्राप्त होने से यह चिंगारी अब ज्वालामुखी का रूप धारण कर चुकी है जिसे बुझाना अब नामुमकिन हो गया है।
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जरूरत नहीं नक्सलियों के मदद की जनता हमारे साथ हैं - पुरोहित
: पृथक विदर्भ के लिए भाजपा द्वारा किया गया आंदोलन सफल होने का दावा कर भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने स्पष्ट किया कि नक्सलियों की मदद वे कभी भी नहीं लेना चाहेंगे। क्योंकि पृथक विदर्भ के लिए जनता ने विदर्भवादियों का खुलकर साथ दिया। जनता के रहते नक्सलियों की मदद की जरूरत नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ पहले से ही नीति निर्धारित है। इसलिए महाराष्ट्र स्तर पर उसे बदलने की आवश्यकता नहीं है। और हम उस नीति पर ही चलना चाहेंगे। कभी भी उनकी मदद पार्टी को गंवारा नहीं होगी। चाहे मुद्दा कोई भी हो।
पुरोहित ने बताया कि जांबुवंतराव धोटे व प्रकाश आम्बेडकर की नक्सलियों की मदद लेने की व्यक्तिगत राय है। वह विदर्भ संग्राम परिषद का यह निर्णय नहीं है। भाजपा परिषद का राष्ट्रीय स्तर का घटक दल है। और वह एकमात्र दल है। जिसके आंदोलन से राष्ट्रीय स्तर दबाव बनेगा। नितिन गडकरी विदर्भ के होने से भी राष्ट्रीय स्तर पर पृथक विदर्भ के मुद्दे को बल मिला है। इसके लिए हमें किसी प्रकार के आरक्षण मांगने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि भुवनेश्वर में भाजपा की कार्यकारिणी की एक हुई एक सभा में पृथक विदर्भ का प्रस्ताव पारित किया गया था। भाजपा का यह प्रमुख आश्वासन रहा है। जिसके मद्देनजर भाजपा पृथक विदर्भ के लिए लड़ रही है। यह आरपार की लड़ाई है। विदर्भ में सभी जगह भाजपा कार्यकर्ता नेता पदाधिकारी, सांसद- विधायकों नेता सहित जनता ने बंद को सफल कराया। जनता पुरे जोहा के साथ शामिल हुई।
कांग्रेस पर अप्रत्यक्षरूप से वार कर पुरोहित ने कहा कि विदर्भ के समर्थन में राष्ट्रीय स्तर पर केवल भाजपा ही आगे है। वर्ष 1979 मेें महाराष्ट्र विधिमंडळ में अशासकीय प्रस्ताव के तहत पृथक विदर्भ का मुद्दा चर्चा के लिए रखा था। तीन घंटे तक इसपर बहस हुई थी।
भाजपा विदर्भ राज्य का विकास प्रारुप बना रही है। चार सदस्यीय समिति अध्ययन कर विदर्भ प्राकृतिक अप्राकृतिक संसाधनों का लिखा जोखा जनता के समक्ष रखेगी। और जनजागरण के माध्यम से पृथक विदर्भ को अधिक व्यापक रुप देने का प्रयास करेगी। यह जानकारी देते दुर पुरोहित ने कांग्रेस राकांपा की ओर अंगुली निर्देश करते हुए बताया कि पश्चिम महाराष्ट्र हो या मराठवाड़ा या अन्य महाराष्ट्र के इलाके सभी जगहों से भाजपा के नेता व जनता का पृथक विदर्भ को भरपूर समर्थन है।
भाजपा के विदर्भ कार्यालय में आयोजित पत्रपरिषद में पुरोहित बोल रहे थे। उनके साथ भाजपा विधायक देवेंद्र फडणवीस, सुधाकर देशमुख, महापौर अर्चना डेहनकर अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।
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बुधवार, जनवरी 20, 2010

गो-हत्या पर महारास्त्र सरकार को नोटिस

नागपुर। गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका में नागपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार व अन्य को नोटिस जारी किया है। न्यायधिश शरद बोबडे, बासंती नाईक की संयुक्तपीठ ने प्रतिवादी पक्ष से याचिका के संबंध में दो सप्ताह में प्रतिवादियों से जवाब मांगा है।
यचिका नंदलाल मोधा ने दायर किया है। यचिका में कहा गया है कि राज्य में बड़े पैमाने पर गो-हत्या हो रही है। गाय केवल खेती के लिए उपयोगी नहीं है, बल्कि कई लोगों के लिए लाभदायी है। यचिका में कहा गया है कि मध्यप्रदेश सरकार और गुजरात सरकार ने गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बना लिया है, पर महाराष्ट्र सरकार इसके लिए उदासीन है। निगम कानून के अंदर कुछ हद तक गौ-हत्या रोकने का प्रावधाना है, पर निगम इसे रोकने में पूरी तरह से नाकाम है। इसलिए चाचिकाकर्ता ने दायर चाचिका के माध्यम से राज्य में गो-हत्या रोकने के लिए विशेष कानून बनाने की मांग की है।

सोमवार, जनवरी 18, 2010

जंगली पशुओं की हत्या पर प्रतिबंधप तो गाय पर क्यों नहीं


गौ हत्या प्रतिबंध के लिए गरजे संत
संजय स्वदेश

नागपुर। कुरुक्षेत्र (हरियाण)से निकली विश्वमंगल गो ग्राम यात्रा देशभर में 108 दिनों में करीब 25 हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर नागपुर पहुंची। नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित एक भव्य समारोह में समापन हुआ। यात्रा 30 सितंबर से स्वामी राघेश्वर भारती के नेतृत्व में निकली थी। रेशिमबाग पर हजारों लोग उपस्थित हुए। गाय के प्रति श्रद्धा दिखाई। प्रदर्शनी परिसर दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। मंच पर आए दिग्गज संतों ने एक सुर में देश में गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने उपस्थित लोगों से सकाहारी होने का आह्वान किया।
भाई चारे से रूकेगी गौ-हत्या : मोहन भागवत
समारोह में समरोह में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि पहले जब गाय की बात होती थी, तो लोग इसे पिछड़ी हुई बात मानते थे। लेकिन विश्वमंगल गो-ग्राम यात्रा से लगता है कि आज गाय पर चर्चा गौरव की बात है। समाज में गौ-हत्या आपसी भाई चारे से रूकेगी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सुख और समानता से आती है। यह बंधुता पैदा करने वाला ग्राम है। ग्राम जीवन का नेतृत्व विकेंद्रीकृत रहता है। यह जीवन प्रदूषण से मुक्त रहता है। क्योकि ग्रामीण जीवन प्रकृति का मित्र होता है। इसलिए गांव में मनुष्य मनुष्य को पहचानता है। इसलिए यहां समानता बढ़ती है। उन्होंने कहा कि गौ-हत्या से प्रकृति को हानी है। इसलिए प्रकृति का नुकसान को रोकना जरूरी है। भागवत ने कहा कि सन् 1707 से पहले भारतीय समाज धनधान्य से संपन्न था। भारत से ही दुनियाभर में धान की 5 हजार प्रजातियां गईं।
जंगली पशुओं की हत्या पर प्रतिबंधप तो गाय पर क्यों नहीं : रामदेव बाबा
योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा कि देश में विदेशी आक्रमणकारी आए। सोना-चांदी लूट कर ले गए। लेकिन गाय की हत्या नहीं की। पर आज अजाद भारत की सरकार गो हत्या को लेकर चुप है। सरकार ने कई जंगली पशुओं के हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया है। फिर गाय की हत्या पर प्रतिबंध क्यों नहीं लग रहा है। उन्होंने कहा कि गाय के मांस के व्यापार से पर्यावरण को भी भारी नुकसान हो रहा है। गाय के मांस को खुले में एक जगह से दूसरे जगह नहीं रखा जा सकता है। इसे रेफिजरेटर में रख कर कई दिनों तक उपयोग किया जाता है। रेफिजरेटर से उत्सर्जित होने वाला गैस पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायी है। उन्होंने आमजनमानस से अहिंसा परमोधरम: का अह्वान करते हुए शकाहारी होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि गो वंश का आर्थिक पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है।

समाज की सारी कहावतें भौंस पर : राघेश्वर भारती
स्वामी राघेश्वर भारती ने कहा कि पशुओं में गाय भी दूध और गोबर देती है, लेकिन उसके दूध और गोबर का उतना महत्व नहीं है जितना कि गाय का है। दिगंबर जैन साधु गाय के कंडे से बने भोजन को ही ग्रहण करते हैं। क्योंकि गाय का गोबर शुद्ध होता है। भैंस के गोबर में दूसरे जीवन जन्म ले लेते हैं। उन्होंने कहा कि समाज में जितनी भी कहावते हैं, वह सब भैंस के उपर है। गाय समाज में श्रद्धा का प्रतीक रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय की विशेष महत्व रहा है। समाज में यह विश्वास रहा है कि जिस घर में गांव रंभाती हैं, उस घर का गौरव बढ़ता है। उन्होंने कहा कि आज गाय सड़कों पर कचरा खाकर जी रही है। कचरे के साथ वह प्लास्टिक की थैलियां भी खाती है। लेकिन प्लास्टिक में यह कचरा कौन फेकता है। उन्होंने कहा कि रसोई संभालने वाली माताएं रसोई के कचरे को प्लास्टिक में जमा कर घर से बाहर फेंकती है। उसी कचरे को खाने के लिए गाय प्लास्टि की थैली खा जाती है। गोकर्ण पीठ के शकराचार्य विद्याभारती ने कहा कि में अनेक समस्याएं हैं। लोग समाधान खो चुके हैं। गोपालन से हर विषय में समाधान पाई जा सकती है। खेती के लिए जैविक खाद, गाय और बैलों का उपयोग होना चाहिए।
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फुटपाथ पर सब ठीक नहीं है

संजय स्वदेश
हमारे सभ्य शहरों की असभ्य सड़कों पर केवल मंहगी गाड़ियां ही गरीबों और बेसहारा बच्चों की जिंदगी को नहीं रौंदती है. भारतीय फुटपाथ पर जिंदगी बिताने वाले 55 प्रतिशत से अधिक बच्चे यौन प्रताड़ना का शिकार हैं. यौन शोषित इन बच्चों की उम्र 5 से 12 साल के बीच की है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के एक अध्ययन से यह पता चला है। यह अध्ययन देश के 13 राज्यों में 12 हजार 447 बच्चों पर किया गया है। जिन राज्यों में सर्वे हुआ है उनमें आंध्र प्रदेष, असम, बिहार, दिल्ली, गोवा, गुजरात, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मिजोरम, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल हैं। यह खबर शायद सभी समाचारपत्र में नहीं छपी हो, पर खबर महत्पूर्ण मुद्दे की है। फुटपाथ पर जीवन बसर करने वाले तक सरकार अजादी के छह दशक बीत जाने पर भी नहीं पहुंच पाई। फुटपाथ पर बसर करने वालों की एक अच्छी तदात है।
जरा गौर करें 5 से 12 साल की बीच की उम्र ही क्या होती है। नन्हीं उम्र। समाज की अच्छी और बुरी बातों से अनजान उम्र। फुटपाथ पर रहने वाले कॉन्वेंट स्कूलों में पढ़ने के सपने भी नहीं देखते है। पर आजकल कॉन्वेंट स्कूलों के 12 साल के बच्चों को सेक्स की अच्छी-खासी समझ विकसित हो जाती है। यह उनके संगत का असर होता है। पर फुटपाथी बच्चे क्या करते है। कहीं भीख मांगते हैं, तो कहीं मजबूर मां-बाप के साथ दुत्कार भरी जिदंगी जीते हैं। ट्रेनों में यात्रियों के कचरे साफ कर पैसा मांगते हैं। कुछ समाान बेचते है। चैराहों पर रूकने वाली गाड़ियों के शीशे साफ कर अंदर बैठै व्यक्ति से कुछ देने की याचना करते है। इनका बसेरा यत्र-तत्र, अस्थायी होता है। इनका यौन शोषण कौन करता है। घनी बस्तियों और सभ्य समाज से दूर रहने वाले इन बच्चों के बीच कोई बाहर का व्यक्ति शायद ही इनका दुःख जानने समझने आता होगा। यह वर्ग समाज के मुख्य धारा से हमेषा कटा रहा है। साधारण-सी बात है। फुटपाथ पर ही जिंदगी गुजर-बसर करने वाले वयस्क ही इनका यौन शोषण करते हैं।
यहां की बात यहीं रह जाती है। सभ्य समाज इन्हें गंदगी मानता है। गंदगी में घिनौने कृत्य के कौन-कौन से बुलबुले उग रहे हैं, इससे सभ्य समाज को मतलब नहीं है। पर इसका मतलब यह नहीं कि हम इसके प्रति आंख मूंद लें। छोटी-छोटी अपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते-देते फुटपाथ के कई बच्चे वयस्क होते-होते बडे़ अपराधी बन जाते हैं। फुटपाथ से हट कर आम आदमी को बीच पहुंच कर असमाजिक गतिविधियों को अंजाम देते है।
स्लम इलाकों के बच्चों को पढ़ा-लिखा कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं सक्रिय हंै। सरकार अनुदान भी देती है। पर फुटपाथ पर जीवन गुजर बसर करने वाले हमेषा उपेक्षित रहे हैं। कितने बच्चे फुटपाथ पर जीवन गुजारते हैं, इसका अनुमानित आंकड़ा मिल सकता है, प्रमाणिक नहीं। कभी-कभार खबरें आती हैं कि स्थनीय निकाय विशेषकर महानगर पालिका, जिला पंचायत ऐसे घुमंतु बच्चों को पढ़ा कर समाज से मुख्य धारा से जोड़ने की योजना बनाती है। फंड तय होता है। बच्चों का सर्वे होता है। योजना को कार्यरूप देने की शुरूआत से पहले ही वित्तिय वर्श समाप्त हो जाता हैं। फिर सब कुछ नये सिरे से शुरू करने की बात की जाती है। इसी बीच सर्वे और पढ़ाने की पहल तक निर्धारित फंड का काफी पैसा खर्च हो चुका रहता है। सरकार एनजीओ के माध्यम से भी ऐसे बच्चों के कल्याण पर भारी भरकम राशि लुटा रही है। सब कुछ चलता रहता है, पर सकारात्मक कुछ भी नहीं होता हैं।
ऐसे बच्चों को का भला तब तक नहीं होगा, तब सरकार इनके जिम्मेदार अभिभावकत्व के रूप में सामने न आए। समाज कल्याण विभाग देष के कई जिलों में छोटे और बड़ों बच्चों के लिए अवासीय व्यवस्था उपलब्ध कराता है। पढ़ाता है। फुटपाथी बच्चों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है, पर इसका लाभ नहीं मिल पा रहा हैं। ऐसे सरकारी आश्रय में गरीब बच्चे तो रहते हैं, पर पर फुटपाथी बच्चे नहीं। यदि इन बच्चों को कोई स्वयंसेवी सरकारी आश्रय में पहुंचाना भी चाहे तो वह सफल नहीं हो सकता है, क्योकि ऐसे आश्रय में जाति वर्ग में दायरे में आने की खास बंदिषे हैं। यदि फुटपाथी संबंधित जाति का भी हो, तो प्रमाणपत्र किस आधार पर बनेगा। इन बच्चों के अभिभावकों के पास न तो राषनकार्ड होता है और न ही मतदाता पहचान पत्र। देष के प्रखंड और तहसील कार्यालयो में आसानी से ऐसे प्रमाणपत्र बनते भीन हीं है। अब, जब मंत्रालय ने ऐसे बच्चों पर सर्वे करकार कड़वी सच्चाई को जान लिया है, तो बिना शर्त इनकी समुचित परवरिश के लिए ठोस कदम उठाये। जिससे कि इनका अब और यौन शोषण नहीं और ये बड़े होकर मन में कुंडा लिए समाज से अलग रहकर समाज और देश के लिए घातक नागरिक न बनें।
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गुरुवार, जनवरी 14, 2010

कुंभ के मेले के हाईटेक साधु


बिपेन्द्र कुमार सिंह
एक जमाना था, जब लोग अनेक उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी सादगी की मिसाल पेश करते थे। पर अब जमाना बदल चुका है। समाज का हर व्यक्ति आधुनिक तकनीकी सुविधाओं से लैस नजर आ रहा है। फिर भला इससे साधु-संत अछूते कैसे रहें? हरिद्वार के इस महाकुंभ में बाबाओंं के बाजार के सच्चे और सादगी पसंद संतों को पहचानना मुश्किल हो जाएगा। साधु-संतों के लिए प्रयोग किये जाने वाले शब्द त्याग और तपस्या काफी पीछे छूट गए हैं और उन पर आधुनिक यंत्रों और धर्म का बाजार हावी हो गया। नतीजतन बाबा अपने कार्यक्रमों के लिए विशेष रूप से कंसेप्ट, स्क्रिप्ट, शूटिंग, लैपटॉप आदि से विशेष रूप से अपनी वेशभूषा का चयन करने लगे हैं। नवोदित बाबाओं, संतों की बात करें तो उनके लिए कुछ ज्यादा ही इंतजाम करना पड़ रहा है। हरिद्वार के इस महाकुंभ में बाबाओं-संतों को जानने-मिलने, उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपने जीवन को सही दिशा देने के लिए पहले राजनीतिक लोगों से लेकर बड़े धनाढ्य जिज्ञासु अभी से ही बाबाओं का इंतजार कर आशीर्वाद पाने के लिए तत्पर हैं। सत्य तो यह है कि हरिद्वार की पावन भूमि अभी तमाम दिव्य, सिद्ध संतों से भरी रहेगी। दिखावे और बाजारवाद से दूर आप की साधना में लीन रहेंगे। ढोंगी और पाखंडी इस दौड़ में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए कोई अपने को ईश्वर का अवतार तो कोई उनका वेष धारण कर लोगों की अपनी ओर आकर्षित करने में लगे रहेंगे। कुछ तो खुद को ही ईश्वर घोषित किये हुए मिलेंगे जिसे जानने और मानने-पूजने वाली की भी संख्या कम नहीं रहेगी। हरिद्वार के इस महाकुंभ में महिला संतों ने भी दबे पांव की सही लेकिन अपना कब्जा जमाना शुरू कर दिया है। जो महिलाएं कभी पुरुष संतों के पंडाल में प्रवचन सुनने के लिए जाकर बाबा के भक्तों की संख्या बढ़ाने का कार्य करती थीं। वही आज पंडाल के व्यासपीठ पर लोगों की प्रवचन देती नजर आएंगी। कुछ अपनी महिमा का बखान करने के लिए स्वेच्छा से महिला संतों की परिपाटी को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। अन्य पीठों या मतों से जुड़ी महिला उनके सामने चुनौती बनकर सामने आए, इससे बेहतर उन्हें यही लगा कि उनके आश्रम से ही कोई महिला संत समाज में जाए और लोगों को उनकी महिमा बनाते हुए उनका बाजार बढ़ाने में मदद करे।
ये सभी साधु-संत अपने मठ में या गुरुकुल में नहीं रहते बल्कि उनके आधुनिक आश्रम होते हैं। वे महंगी गाडिय़ों में सफर करते हैं। विश्वगुरु और देवभूमि माने जाने वाले भारत के इस हरिद्वार कुंभ में उन साधु-संतों और बाबाओं का बोलबाला है जो आलिशान रिसोर्टनुमा आश्रमों में रहते हैं। इनका विश्वास साधना में कम, संसाधनों में ज्यादा रहता है। ये प्रवचन कम पाखंड ज्यादा करते हैं। जिन्हें कभी अपने प्रचार से परहेज था, वो पूरी तरह आधुनिक यंत्र-तंत्र से लैस हैं। अब देखना यह होगा कि इस महाकुंभ मेें धर्म के नाम पर फरेब करने वाले अपनी दुकान किस तरह सजाते और चलाते हैं।

बुधवार, जनवरी 13, 2010

यूपीए की मिस मैनेजमेंट है महंगाई


संजय स्वदेश नागपुर। तेज में बेतहाशा बढ़ती महंगाई और तेलंगाना पर होने वाली राजनीति यूपीए सरकार की मिसमैनेजमेंट का नतीजा है। यह कहना है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री व भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का। प्रसाद मंगलवार को पत्रकार भवन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि महंगाई रोकने में केंद्र सरकार नकाम रही है। सबसे बड़ी शर्मनाक बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री स्वयं एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं। इसके बाद भी देश में अर्थ का अनर्थ हो रहा है। केंद्र सरकार के मंत्री शरद पवार कह रहे हैं कि वे ज्योतिष नहीं है, इसलिए यह बता नहीं सकते हैं कि चीनी के दाम कम कब होंगे। पर उनसे यह सवाल है कि वे किस आधार पर कह रहे हैं कि चीनी के दाम कम नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि देश में सब्जी और दूध आयात नहीं किए जाते हैं। फिर इन वस्तुओं में महंगाई क्यों है? जब जब सरकार ने दाल, चावल और चीनी के आद के भाव कम होने की बात कही है, तब-तब इनके दाम तेजी से बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि देश में बढऩे वाली महंगाई केंद्र सरकार की असफलता सिद्ध कर रही है।
पृथक विदर्भ के मुद्दे पर पूछे गए सवाल के जवाब में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी क्षेत्रीय महत्वकांक्षाओं के साथ ही राष्ट्रीय अखंडता का सम्मान करती है। लेकिन तेलंगाना के मामले में जो कुछ हो रहा है, वह ठीक नहीं है। एनडीए के शासन काल में भी छोटे राज्य बने थे। लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह पहले ही उसके विरोध में थे। लेकिन हमने उनसे बातचीत से मामले को सुलझा लिया है। तेलंगाना और कांग्रेस के मुद्दे पर कांग्रेस को बड़े भाई की तरह भूमिका निभानी चाहिए। भापजा पृथक विदर्भ के मुद्दे पर वे केंद्र सरकार के हर पहल का स्वागत करेंगे। महाराष्ट्र में पृथक विदर्भ के मुद्दे पर शिवसेना के विरोध के मुद्दे पर पूछे सवाल के जवाब में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हम दोनों भले ही साथ हैं, पर एक पार्टी नहीं है। जब पृथक विदर्भ के मुद्दे पर बातचीत की जरूरत पड़ेगी तो शिवसेना को बातचीत कर मामले को सुलझा लिया जाएगा।
नक्सलवाद के मुद्दे पर पूछ सवाल का जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि भाजपा का मत नक्सलकवाद पर स्पष्ट है। केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रमाणिक नीति लाई चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि नक्सली देश के संविधान में विश्वास नहीं करते हैं। ये हिंसा के दम पर भारत की सत्ता हथियाना चाहते हैं।
भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की तारीफ करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा कि नये अध्यक्ष से पार्टी के कार्यकर्ताटों में एक नया उत्साह आया है। विकास के साथ कई मुद्दों पर नितिन गडकरी ने पार्टी में राजनीति की एक नई दृष्टि दी है। पार्टी को पूरा विश्वास है कि गडकरी के नेतृत्व में देश में भाजपा के प्रति जनता कार्यकर्ता और मतदाताओं में विश्वास बढ़ेगा।

मंगलवार, जनवरी 12, 2010

विदर्भ मांगे संसद का घेराव


संजय स्वदेश विदर्भ की मांग का लेकर दिन प्रति दिन ज्वाला भड़कती जा रही है। इस आंदोलन को आज उस समय और अधिक बढ़ावा मिला, तब लोकदल ने राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं किसान नेता चौधरी अजीत सिंह नागपुर पहुंचकर इस मांग को जायज ठहराते हुए कहा कि संसद के घेराव से ही पृथक विदर्भ के गठन के लिए सरकार जागेगी।

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (एकीकृत) द्वारा विदर्भ राज्य संकल्प परिषद का आयोजन सिविल लाइन्स स्थित वसंतराव देशपांडे सभागृह में दिया गया था। सभा की अध्यक्षता रिपा नेता प्रा. जोगेंद्र कवाडे ने की। सभा का उदघाटन एवं सांसद रामदास आठवले ने किया। मंच पर नेताओं ने उपस्थितों के समक्ष सब के साथ मिल कर शपथ भी ली। और इस आंदोलन को अंतिम क्षणों तक जाने की बात कही।

मुख्य अतिथी चौधरी अजीत सिंह ने कहा कि किसानों की मांगो को लेकर उन्होंने कई धरने दिए। उत्तर प्रदेश से हरियाणा तक प्रदर्शन लिए, कोई लाभ नहीं मिला। लेकिन चक्का जाम करते हुए जब संसद का घेराव किया गया तब दो दिन में सरकार का ध्यान हमारी मांगों पर गया और किसानों की समस्याओं पर निर्णय लिया गया। अजीत सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुर्नगठन की मांग को लेकर विदर्भवादी हमारे साथ समन्वय बनाए हम और आप मिलाकर संसद घेर लेंगे, फिर देखना सरकार कैसे आप की मांग को सुनती है।

उन्होंने तेलंगाना राज्य के गठन का हवाला भी दिया। यहां छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड के गठन वि. के विभिन्न उदाहरण भी यहां पेश किए गए। अजीत सिंह ने कहा कि हम नहीं चाहते कि किसी भी प्रकार की कानून व्यवस्था को धक्का लगे। शांति के साथ हम इस आंदोलन को चलाएंगे। लेकिन यह हमारा अनुभव है कि दिल्ली में बैठी कोई भी सरकार इस प्रकार के आंदोलन पर ध्यान नहीं देती। उन्होने कहा कि बसों को झेकना, रोज रोकना तोड फोड जैसे आंदोन पर सरकार का ध्यान जाता है और आप की सुनवाई होती है। उन्होंने कहा कि 2004 में कांग्रेस की यूपीए सरकार तेलंगाना के पक्ष में भी पिछले 5 वर्षों में उत्तर प्रदेश के पक्ष में समर्थन दिया गया। झांसी में राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश समन्वय समिति की बैठक कर 2008 जनवरी में बुंदेलखंड का प्रस्ताव पास किया है। वाराणसी में पहुंच का प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन का समर्थन किया है। उन्होने कहा कि जब तक आप विदर्भवादी अपनी शक्ति का प्रदर्शन नही करोंगे तब तक सरकार कुछ करनेवाली नही है। उन्होंने कहा कि आप लोग बातचीत करें, शांति के साथ अपनी मांग करें लेकिन किसी को घेरने की ताकत भी बनाए रखे। वरना कोई आप की सुनवाई नहीं हो सकती।

अजीत सिंह ने कहा कि अब तक विदर्भ संतरा और किस कपास के लिए जाना जाता था। लेकिन आज किसान आत्महत्या विदर्भ की पहचान बन गई है। यह शर्म की बात है। उन्होंने कहा कि विदर्भ में संसाधनों की कमी नहीं है, खनीज, उर्जा उत्पादन की क्षमता है लेकिन उसका लाभ विदर्भ की जनता को नहीं मिल रहा है। यहां के लोग अपनी किस्मत खुद बना सकते है। उन्होंने इस आंदोलन को व्यापक बनाने पर जोर दिया। बलिदान और त्याग की भावना हमारे भीतर होनी चाहिए। उन्होंने इस लड़ाई को नवयुवकों के भविष्य के लिए आवश्यक बताया। हरित क्रांति हो या विदर्भ की मांग हमें आपस में तालमेल बनाकर इसे लडऩा चाहिए।

सांसद दत्ता मेघे ने कहा कि लोग हमसे त्यागपत्र नही मांगे, क्योंकि हम इस मांग को संसद में उठाएंगे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कांग्रेस बचानी हो तो हमें आशिर्वाद देना पड़ेगा। जो लोग इस आंदोलन का समर्थन नहीं करेंगे वे नेता विदर्भ में रहने का अधिकार नहीं रख सकते। मेघे ने कहा वे 35 वर्षो से सत्ता का सुख भोग रहे हैं, एक बार जेल जा चुके हैं लेकिन अब वे फिर जेल जाने के इच्छुक हैं। सांसद विलास मुत्तेमवार ने कहा कि भाजपा के सभी नेताओं तथा विशेष रुप से राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का अभिनंदन करते हैं। माया नगरी मुंबई में पहुंचने वाले विदर्भ के लोगों की दुर्दशा पर चिंता करते हुए मुत्तेमवार ने कहा कि अब और अधिक बर्दाश्त नहीं होता। हमें अब हमारा विदर्भ अलग चाहिए। उन्होंने अभी नहीं तो कभी नही के तहत आम जनता से वचन भी लिया।

पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने कहा कि भाजपा ने गत 9 जनवरी को एक महत्त्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया था। जिसमें 11 जिलाध्यक्ष, 15 विधायक, 2 एम एल सी तथा 2 सांसदो ने समर्थन के पत्र देकर विदर्भ की मांग में कूद पड़ऩे पर रजामंदी दी थी। आरपीआई एकीकृत के अध्यक्ष पूर्व सांसद रामदास आठवले ने कहा कि पृथक विदर्भ समय की मांग है। हमारे बीच किसी तरह का विवाद नहीं है। कोई ङ्क्षहदी बोले, कोई मराठी बोले, हमें इससे कोई मतलब नहीं है। पृथक विदर्भ के मुद्दे पर एकजुट हैं।
इस सभा में विदर्भवादी नेता नानाभाऊ अंबडवार, राजकुमार तिरपुडे, अनिल गोंडाने, उमाकांत रामटेके आदि ने भी संबोधित किया।

भाजपा विधायक देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि उन्हे राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी से इस विषय में अनुमति मिल गई है। पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने 20 जनवरी की हड़ताल पर कहा कि उस दिन सभी अपने अपने झंडे लेकर निकालेंगे। बंद को दिन कफ्र्यू जैसा वातावरण की बात कहते हुए वक्ताओं ने कहा कि हम सब किसी पर जबरदस्ती नहीं करेंगे। यह हमारा कर्तव्य होगा कि इस आंदोलन में निष्पक्ष के साथ भाग लें। हस्ताक्षर अभियान के तहत रामदास आठवले ने पहले हस्ताक्षर किया। दत्ता मेघे ने एक रूपया के बजाय इस अभियान में एक हजार रुपए देकर हस्ताक्षर किये। पूर्व विधायक सतीश चतुर्वेदी ने भी इस अभियान में निष्ठा की बात पर जोर दिया।
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सोमवार, जनवरी 11, 2010

सरकार और पत्रकार मित्र नहीं होते


म.गो.वैद्य को लोकमान्य तिलक पत्रकारिता पुरस्कार
संजय स्वदेश
नागपुर।
वरिष्ठ पत्रकार मा.गो.वैद्य ने पत्रकारिता के मूल्यों से पत्रकारों को अवगत कराते हुए कहा कि आज की पत्रकारिता को सरोकारों की पत्रकारिता से जोडऩे की आवश्यकता है। युवा पत्रकारों को समझना चाहिए कि सरकार और पत्रकार मित्र नहीं होते हैं, ये प्रतिस्पर्धी होते हैं। वे धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में रविवार की शाम आयोजित लोकमान्य तिलक पत्रकारिता पुरस्कार समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस समारोह में उन्हें भी सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार नागपुर श्रमिक पत्रकार संघ और विदर्भ सेवा समिति की ओर से स्थापित किया गया है। मा.गो वैद्य को यह पुरस्कार कवि कुलगुरु कालदास विश्वविद्यालय के कुलगुरु पंकज चांदे और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के हाथों से दिया गया। पुरस्कार स्वरूप शॉल-श्रीफल स्मृति चिह्न के अलावा 11 हजार रूपया प्रदान किया गया।
वैद्य ने कहा कि पत्रकारिता का दायित्व केवल सूचनाएं देना नहीं होता है। सूचना के साथ-साथ दर्शनिक भाव से जनता को जगाना चाहिए, ताकि जनता वैचारिक रूप से प्रबुद्ध हो सके। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को अपनी निष्ठा पर अडिग रहना चाहिए। जो मृत्यु से नहीं डरता उसे कोई नहीं डरा सकता है। इसलिए पत्रकारों को बिना किसी भय के, मजबूती के साथ निष्ठावान बने रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि सौम्य भाषा में भी मजबूत लेखन किया जा सकता है।
इस अवसर पर नितिन गडकरी ने कहा कि इन दिनों हर क्षेत्र में पुरस्कारों की भरमार हो गई है। अनेक संस्थान किसी न किसी के नाम पर पुरस्कार लेकर खड़ी है। जिसे चाहे पुरस्कृत कर दिया जाता है। इससे पुरस्कारों की गरिमा कम होती है। मुझे खुशी इस बात की है कि तिलक पत्रकारिता पुरस्कार से पुरस्कृत करने के लिए एक योग्य व्यक्ति का चुनाव किया गया है। गडकरी ने कहा कि जिस तरह का स्पष्ट और पारदर्शी व्यक्तित्व म.गो.वैध का है, वैसा ही इन्होंने पत्रकारिता में भी बरती। इनकी पत्रकारिता 99 प्रतिशत नहीं, बल्कि शत-प्रतिशत पारदर्शी रही है। सच से इन्होंने कभी मुख नहीं मोड़ा। सच लिखने के लिए कभी परिणाम की चिंता नहीं की।
कवि कुलगुरु कालिदास विश्वविद्यालय के कुलगुरु पंकज चांदे ने अपना भाषण संस्कृत में शुरू करते हुए सत्कारमूर्ति मा.गो. वैद्य की लंबी आयु की कामना की। उसके बाद उन्होंने मराठी में बोलना शुरू किया। पंकज चांदे ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक के नाम पर यह पहला पुरस्कार शुरू हुआ है। इस बात की खुशी है कि तिलक के नाम से शुरू हुआ यह पहला पुरस्कार ऐसे व्यक्ति को दिया जा रहा है, जिनकी कल्पना मात्र से एक पूर्ण पुरुष की मूर्ति साकार होती है। सर्वसंस्कृति से मिश्रित व्यक्तित्व वाले पुरुष की कल्पना साकार होती है। उन्होंने कहा कि पत्रकार दो तरह के होते हैं। एक, स्थितियों से समझौता कर, उसमें तटस्थ भूमिका निभाते हैं तो दूसरे, धारा के विरुद्ध अपनी लेखनी चलाते हैं। मा. गो. वैद्य इसी दूसरी धारा के पत्रकार हैं।
विदर्भ सेवा समिति के अध्यक्ष उमेश शर्मा ने कहा कि मा. गो. वैद्य के व्यक्तित्व में भारतीय संस्कृति का समावेश है। ऐसे व्यक्तित्व के स्वामी के दर्शन मात्र से मन प्रसन्न हो जाता है। विक्रम मारवाह ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस मौके पर नागपुर श्रमिक पत्रकार संघ के अध्यक्ष शिरीष बोरकर, सचिव संजय लोखंडे, विदर्भ सेवा समिति के कार्याध्यक्ष डा. संतोष मोदी, सचिव आंनद कुमार निर्बाण समेत नगर के अनेक प्रबुद्ध लोग उपस्थित थे।

रविवार, जनवरी 10, 2010

93.75 प्रतिशत जनता चाहती है विदर्भ राज्य


संजय स्वदेश
नागपुर श्रमिक पत्रकार संघ तथा तिरपुडे इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एक्सन एंड रिसर्च के संयुक्त तत्वावधान में पृथक विदर्भ की मांग पर नागपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों के निवासियों का मत जानने के लिए जनमत संग्रह लिया गया। इस जनमत संग्रह में नतीजा निकला है कि 93.75 प्रतिशत लोग अलग विदर्भ चाहते हैं.
तिरपुड़े कॉलेज के राजकुमार तिरपुड़े ने प्रेस-कान्फ्रेन्स में बताया कि नागपुर शहर के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण-पश्चिम तथा मध्य क्षेत्रों से कुल 16737 नागरीकों से संपर्क किया गया।जिसमें विद्यार्थी, शिक्षक, व्यापारी, शासकीय तथा निजी कर्मचारी, गृहिणियां, रिक्साचालक, सब्जी विक्रेता, उद्योगपति आदि से पृथक विदर्भ के निर्माण पर पूछा गया। जनमत संग्रह में हर व्यक्ति से तीन सवाल किये गए। पहला सवाल यह था कि विदर्भ के साथ अन्याय हुआ, इस मत से आप सहमत है? दूसरा, पृथक विदर्भ राज्य के गठन होने पर विदर्भ आर्थिक दृष्टि से सक्षम होगा? तीसरा, क्या आपको लगता है कि पृथक विदर्भ की मांग उचित है?
इन प्रश्रों पर नागरिकों के उत्तरों के अनुसार कुल 16737 उत्तरदाताओं में से 13669 याने 81.67 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने सकारात्मक जवाब दिये। इसके विपक्ष 1797 उत्तरदाताओं के अनुसार विदर्भ पर अन्याय नहीं हुआ है। 7.59 प्रतिशत बाकी उत्तरदाता सवालों का जवाब नहीं दे सके। जन मत संग्रह के अनुसार 16737 उत्तरदाताओं में 12634 (75.48 प्रतिशत) उत्तरदाता पृथक विदर्भ राज्य होने पर उसे आर्थिक दृष्टी से सक्षम मानते हैं। 1927 (11.52) प्रतिशत उत्तरदाता इस मत से सहमत नहीं। बाकी 2176 उत्तरदाताओं ने इस बारे में कोई मत व्यक्त नहीं लिया। 1627 उत्तरदाताओं में से 14019 (93.75) प्रतिशत जनता पृथक विदर्भ राज्य के मांग को उचित मानती है। वहीं 1457 (8.7) प्रतिशत उत्तरदाता इस बात को अनुचित मानते हैं। 1262 (7.557) प्रतिशत उत्तरदाताओं ने उस बारे में अपना मत नहीं दिया।
कुल मिलाकर शहर की जनता पृथक विदर्भ राज्य की मांग को सही मानती है। पत्र परिषद में पत्रकार भवन ट्रस्ट के अध्यक्षता प्रदीप मैत्र तथा श्रमिक पत्रकार संघ के अध्यक्ष शिरीष बोरकर तथा वामनराव कोंबाडे, के एस पाटील, पराग बोंबटकर, विवेक अवसरे, वी. जे. शिंगनापुरे, एस. एस. आसरकर उपस्थित थे।

शनिवार, जनवरी 09, 2010

विदर्भ के लिए लोहा गर्म है, हर कोई मारना चाहता है हथौड़ा


20 को विदर्भ स्तर पर हड़ताल
आंदोलन का झंडा विदर्भ राज्य संग्राम समिति के हाथ में
संजय स्वदेश
नागपुर। तेलंगाना आंदोलन ने पृथक विदर्भ आंदोलन को संजीवनी दे दी है। इसका शोर गत माह नागपुर में बीत शीत्रसत्र जोर पकडऩे लगा। 6 जनवरी को नागपुर में आयोजित कांग्रेस की एक सभा में कई कांग्रेसी नेताओं ने ही पृथक विदर्भ की मांग के लिए मुख्यमंत्री पर विदर्भ में विकास के प्रति भेदभाव का अरोप लगाया। पृथक विदर्भ के पक्ष नकारात्मक बातें करने वाले मुख्यमंत्री पूरी तरह से विदर्भ समर्थकों से घीरे दिखे। इस कार्यक्रम से पूर्व इसी दिन नागपुर में उद्यागपतियों की एक सभा में विदर्भवादी नेता जामुवंतराव धोते के नेतृत्व में हंगामा हुआ। मुख्यमंत्री पहले इन नेताओं से मिले तब बैठक शुरू हुई।
विदर्भ क्रांति की भड़कती ज्वाला को भांपते हुए आखिर मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और राज्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मणिकराव ठाकरे ने मंच से यह घोषणा कर ही दी कि पार्टी इसके वे अलाकमान से बात करेंगे। विदर्भ समर्थकों ने भी तब तक आंदोलन जारी रखने की बात की।
7 जनवरी को राष्ट्रपति अमरावती में थी। यहां एक कार्यक्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा नागपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद विलास मुत्तेमवार ने मंच से राज्य के मुख्यमंत्री अशोकराव चव्हाण की भूमिका को विदर्भ विरोधी बताया। पृथक विदर्भ राज्य की स्थापना की मांग को लेकर सांसद मुत्तेमवार तथा अन्य विदर्भवादी नेताओं के प्रतिनिधी मंडल राष्ट्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटील को एक निवेदन सौपा।
7 जनवरी को ही इसके बाद दोपहर दो बजे
नागुपर के सिविल लाइन्स स्थित रानी कोठी में आयोजित बैठक में विदर्भ दिग्गज नेताओं एकजुट हुए। इस बैठक में राजनीति के आखाड़े में एक दूसरे के धूर विरोधी नेता एक स्वर में बोले। बैठक के तेवर बता रहे हैं कि पृथक विदर्भ के लिए क्रांति की ज्वाला भड़क उठी है। निवेदन और ज्ञापन तो बहुत हो गए, अब यह सब नहीं। पृथक विदर्भ के लिए अब जिला स्तर पर हड़ताल कर सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया जाएगा। बैठक में उपस्थित नेताओं ने एक सुर में कहा कि आजादी के लिए महात्मा गांधी ने जिस तरह अहिंसा के पथ पर चलकर आजादी दिलाई उसी तरह अलग विदर्भ राज्य के लिए आंदोलन किया जाएगा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणजीत बाबू देशमुख की ओर से आयोजित इस महत्वपूर्ण सर्वदलीय सभा में सीपीआई, मनसे तथा शिवसेना के अतिरिक्त सभी प्रमुख दलों के नेता शामिल हुए। सभा में 20 जनवरी को विदर्भ स्तर पर हड़ताल पर सभी ने सहमति जताई। विदर्भ के संघर्ष के लिए विदर्भ राज्य संग्राम समिति भी बनाई है। हड़ताल की रूपरेखा पर 11 जनवरी को अगली बैठक बुलाई गई है। रणजीत देशमुख ने कहा कि हमें शांतिपूर्ण तरीके से महात्मा गांधी के सिद्धांतो को अपनाते हुए विदर्भ आंदोलन को आगे बढ़ाना है। विदर्भ आंदोलन की आंच तेज करने को लेकर सभा में थोड़ा-हंगामा हुआ। पूर्व राज्य मंत्री सुलेखा कुंभारे ने कहा कि विदर्भ की मांग पर अब तक कई बार निवेदन और ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं। समय आ गया है कि अब इस आंदोलन की ज्वाला भड़काई जाए। आंदोलन को तेज करने पर कई नेताओं ने जोर दिया, तभी शहर के पूर्व पुलिस आयुक्त पी.के.वी. चक्रवर्ती ने कहा कि जोश के साथ होश में रहकर जो आंदोलन चलाए जाते हैं, उन आंदोलनों में हानि कम और लाभ अधिक मिलते हैं। उन्होंने विदर्भ के बंद पर कानूनी जानकारी देते हुए कहा कि इस शब्द का उपयोग कोई न करें। हमें करना वही है जो आप चाहते हैं केवल इस 'बंदÓ शब्द के स्थान पर 'हड़तालÓ शब्द को जोड़ दिया जाए। चक्रवर्र्ती ने कहा कि विदर्भ हड़ताल भी शांतिपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। यदि किसी ने तोडफ़ोड़ की तो हमें इस पर दु:ख होगा कि विदर्भ का ही नुकसान हो रहा है। अधिकतर वक्ताओं ने पृथक विदर्भ के मुद्दे के समर्थन में तर्क देते हुए कहा कि विदर्भ में बनने वाली बिजली को हम बाहर जाने से रोकेंगे। यहां का कोयला भी उन्हें देना बंद कर दें, ऐसा विरोध कारगर सिद्ध हो सकता है। प्रसिद्ध विदर्भवादी नेता जांबुवंतराव धोटे ने कहा कि अब तक विदर्भ के साथ अन्याय होता रहा है लेकिन अब यह अन्याय नहीं होने देंगे। धोटे ने कहा कि हमारे शोषण से पश्चिम महाराष्ट्र तथा मराठवाड़ा का पोषण होता है। विदर्भ की मांग यहां की जनता की मांग है। इसे अब दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने मुख्यमंत्री के बयान की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि उन्हें इस प्रकार की बयानबाजी से परहेज करना चाहिए। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने कहा कि निवेदन और ज्ञापन सौंपने का कार्य सभी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में हो चुका है। लेकिन अब इस से हटकर कुछ होना चाहिए। पूर्व मंत्री व कांग्रेस सांसद विलास मुत्तेमवार, विधायक देवेंद्र फडणवीस ने भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के पक्ष में सुझाव दिए। सभा में विदर्भ आंदोलन को संचालित करने के लिए विदर्भ राज्य संग्राम संघर्ष समिति का प्रस्ताव भी रखा गया तथा आगामी 20 जनवरी को विदर्भ स्तर पर हड़ताल को भी मंजूरी दी गई। 'अभी नहीं तो कभी नहींÓ का नारा लगाते हुए विदर्भवादियों ने कहा कि अभी लोहा गर्म है, इसे ठंडा होने से पूर्व विधान सभा का अधिवेशन विदर्भ राज्य के साथ नागपुर में होना चाहिए। इस का हमें निश्चय करना होगा तथा गांव-गांव में पहुंच कर तालुका स्तर पर भी इस अभियान को जनता के बीच पहुंचाना चाहिए।
इस बैठक से पूर्व कांग्रेस नेता विलासाव मुत्तेमवार 4 जनवरी को नागपुर में एक धरना भी दिया। इस धरने में भी कांग्रेस समेत विदर्भ की लड़ाई लड़ रही दूसरी कई समितियों व नेताओं ने हिस्सा लिया। इस मौके पर राज्य के दुग्ध मंत्री डा. नितिन राऊत ने तो यहां तक कह दिया कि यदि मौका पड़ा तो पृथक विदर्भ के लिए वे राज्य मंत्रीमंडल से इस्तीफा तक दे देंगे। इससे विदर्भ समर्थकों में और जोश आ गया है। 5 जनवरी तो चार युवा नागपुर के जीरो माइल स्थित बीएसएनएल के टावर पर चढ़ गए। पृथक विदर्भ के लिए मुंख्यमंत्री को बुलाने की मांग करने लगे। समझाने बुझाने के बाद जब ये चारों युवा टावर से उतरे तो लोगों ने फूलमाला पहनाकर उनका सम्मान किया।
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अजादी से पहले की है विदर्भ की मांग
आजादी से पूर्व 1888 में अंग्रेजी प्रशासकों ने ब्रिटिस आयुक्तालय में पृथक विदर्भ के लिए प्रस्ताव रखा था। इसके अलावा 1918 में संविधान समीक्षा समिति और डार कमेटी तथा जे.वी.पी. कमेटी ने पृथक विदर्भ पर अपनी सहमति दी थी। आजादी के बाद 1955 में राज्य पुर्नगठन आयोग ने सरकार से कहा था कि स्वतंत्र विदर्भ से ही यहां की जनता को लाभ मिलेगा। इसके बाद 1960 में विदर्भ के नेताओं को राष्ट्रीय नेताओं ने स्वतंत्र विदर्भ राज्य की गठन का आश्वासन दिया। 1988 में युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह महसूस किया कि विदर्भ के साथ अन्याय हो रहा है, इसके लिए उन्होंने पी. संगमा को इस पर विस्तृत जानकारी देने की जिम्मेदारी सौंपी थी। श्री संगमा ने भी पृथक विदर्भ के लिए अपनी सहमति सरकार को दी। 1996 में राष्ट्रीय नेता अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, श्रीमती मीरा कुमार, के. करूणाकरण, स्व.राजश्ेा पायलट, बलराम जाखड़, मुकुल वासनिक, वसंत साठे, एनकेपी साल्वे, स्व. सुधाकर नाईक समेत कई राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं का प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौडा से मुलाकात कर स्वतंत्र विदर्भ राज्य के गठन की मांग की। वर्ष, 2000 में जिन तीन नये राज्यों का गठन हुआ। उनका प्रस्ताव 1955 में गठीत राज्य पुर्नगठन आयोग ने नहीं दिया था। कांग्रस के कई वरिष्ठ नेता, संसद और विधायक कई मौके पर सोनिया गांधी से मुलाकात कर पृथक विदर्भ के लिए सहयोग की अपेक्षा जता चुके हैं। इसके लिए आपने पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी के नृतृत्व में स्वतंत्र विदर्भ और तेलंगाना राज्य के लिए पार्टी की एक कमेटी भी बनाई थी। लेकिन अब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने पृथक तेलंगाना राज्य की पहल करते हुए विदर्भ की अनदेखी कर दिया।
गत पचास सालों में विदर्भ की जनता ने कांग्रेस के प्रति भरोसा जताया है, लेकिन गत दस सालों में इस क्षेत्र के करीब 7 हजार किसानों ने आत्महत्या की है। क्षेत्र के पांच जिले नक्सल समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित हैं, बेरोजगारी की समस्या भी गंभीर है। लिहाजा, विदर्भ की जनता इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि विदर्भ का आर्थिक व समाजिक विकास स्वतंत्र राज्य का दर्जा प्राप्त होने के बाद ही संभव हो पाएगा।

पुस्तक मेले से हटा बुलडोजर का खौफ


नागपुर। उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय पुस्तकमेले में किसी भी प्रकार की रूकावट न डालने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने शुक्रवार को मनपा के संबंधित विभाग को ताकीद की कि वे आयोजकों को 24 घंटे का समय दे, ताकि विभागीय उचित मापदंड को वे पूरा कर सकें। सुनवाई के दौरान अदालत ने मनपा से मेले के संबंध में ना-हरकत प्रमाण-पत्र नहीं देने का कारण भी जानना चाहा। परंतु मनपा के अधिकारी अदालत को अपने जवाब से संतुष्ट नहीं कर पाए। तब न्यायालय ने इसे अहम् से जोड़ते हुए उक्त निर्देश जारी किए। न्यायालय का आदेश आते ही आयोजन स्थल कस्तुरचंद में लगे राष्ट्रीय मेले के मुख्य द्वार से मनपा का बुलडोजर तत्काल हटा लिया गया और मेला पुन:प्रारंभ कर दिया गया। शाम को मेले में पुस्तक प्रेमियों का तांता लग गया। मेला समिति के सचिव चंद्र भूषण ने कहा कि मुझे न्यायपालिका पर विश्वास था और वह कायम रहा। हमें न्याय मिल ही गया। पुस्तक मेला समिति की ओर से इस मामले की पैरवी नागपुर के वरिष्ठ अधि. रमेश दर्डा, तुषार दर्डा तथा दिल्ली से नागपुर आए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता कुमार कार्तिकेय ने की। कस्तुरचंद पार्क मैदान में 1 जनवरी से राष्ट्रीय पुस्तक मेला शुरू हुआ था, लेकिन 5 जनवरी को मनपा प्रशासन की ओर से मेले के मुख्यद्वार पर बुलडोजर लाकर खड़ा कर दिया गया और मेला बंद हो गया। यही नहीं 6 जनवरी को मेले से बिजली भी काट दी गई। मनपा ने कागज पूरा नहीं होने के कथित आरोप में मेले का जबरन बंद करवा दिया था। साहित्यकारों एवं पत्रकारों ने इस घटना को हिटलरशाही और तानाशाही करार दिया। मामला उच्च न्यायालय में गया और शुक्रवार को तत्काल घेराबंदी हटाने तथा पुस्तक प्रेमियों के लिए मेला खोलने का निर्देश जारी किया गया। मेला समिति के वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश दर्डा ने मेला परिसर में आमंत्रित संवाददाताओं को बताया कि अदालत के आदेश ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनपा का कदम अधिकारियों के व्यक्तिगत अहम् के कारण उठाया गया था। अधिवक्ता कुमार कार्तिकेय तथा लोहिया अध्ययन केंद्र के हरिश अड्यालकर, नंद किशोर व्यास तथा वरिष्ठ समाजसेवी उमेश चौबे, राजेंद्र पटोरिया ने इसे नगर के साहित्यकारों तथा पुस्तक प्रेमियों की जीत बताई।
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मेले की अवधि बढ़ाने की मांगअदालती आदेश के बाद पुस्तक विक्रेताओं में हर्ष की लहर दौड़ गई। मेला परिसर में जश्र का वातावरण दिखाई दिया। पुस्तक विक्रेताओं ने चंद्रभूषण का स्वागत किया और उन्हें फूलमाला पहनाया। मिठाईयों का वितरण किया गया। मेले की अवधि आगे बढ़ाने के प्रश्न पर चंद्रभूषण ने कहा कि वे आपस में विचार कर इस की घोषणा करेंगे। किड्स एज्युकेश्नल एड्स नई दिल्ली की सचालिका मांसी सचदेवा ने कहा कि यह जीत हमारी नहीं यहां के पुस्तक प्रेमियों की जीत है। उन्होंने मेले के आयोजक चंद्रभूषण तथा अधिवक्ताओं की टीम की भी प्रशंसा की। श्रीमती सचदेवा ने मीडिया कर्मियों का भी आभार माना, जिन्होंने निष्पक्ष रूप से जानकारी प्रदान की। धारणा, ध्यान और मन सफलता, रोगों से छुटकारा, व्यक्तित्व विकास के लिए जैसी पुस्तक के रचैता स्वामी ब्रह्मज्ञानम् डॉ. दीनानाथ राय ने बताया कि हम यहां लोगों की सेवा करने लखनऊ से आए हैं। नागपुर आप का शहर है, आप कहें तो हम यहां से चले जाएंगे। लेकिन न्यायालय ने अच्छा फैसला किया, हमें खुशी है। उन्होंने अब तक योग एवं ध्यान पर 27 पुस्तकें लिखी है। मेला आयोजक चंद्रभूषण ने कहा कि मेला परिसर की बुलडोजर से घेराबंदी के समय मुझे आपातकाल की याद आ रही थी। लेकिन हमें न्याय मिला है और इतनी खुशी है कि प्रतिवर्ष नागपुर आते रहेंगे। गणित जैसे कठिन विषय को खेल खेल में छुड़ाने वाले शिवनाथ बिहारी भी प्रफुल्लित नजर आ रहे थे।

बुधवार, जनवरी 06, 2010

कांग्रेस के गले की हड्डी बना विदर्भ

मुख्यमंत्री के साथ वीआईए की बैठक में हंगामा
संजय स्वदेश
नागपुर।
विदर्भ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (वीआईए) की ओर से सिविल लाइन्स स्थित वीआईए भवन में आयोजित बैठक विदर्भवादी नेता जामुंतराव धोटे के हंगामे के कारण नहीं हो पाई। कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही जामुंतराव अपने कार्यकर्ताओं के साथ यहां आ गए। जैसे ही मुख्यमंत्री बैठक के लिए आए, जामुंतराव धोटे और कार्यकर्ता पृथक विदर्भ के समर्थन में नारे लगाने लगे।
इसी बीच एक कार्यकर्ता अहमद कादर ने अरोप लगाते हुए कहा कि मुंख्यमंत्री मराठवाडा के हैं और वे विदर्भ के साथ पक्षपात करते हैं। विदर्भ के उद्योगों को वे दूसरे क्षेत्रों में ले जाते हैं। इससे विदर्भ का विकास रूक गया है। अचानक हुए इस तरह के हंगामें से मुख्यमंत्री को दूसरे सुरक्षित कक्ष में ले जाया गया। व्यापारियों ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया कि वे जामुंतराव धोटे की बातें सुने और नहीं तो वे हंगामा करते रहेंगे। मुख्यमंत्री ने धोटे को बुलाकर बातचीत की और कहा कि वे राज्य का समग्र विकास की दिशा में कार्य कर रहे हैं। किसी भी क्षेत्र के प्रति भेदभाव का कार्य नहीं किया जा रहा है। महाराष्ट्र का बंटवारा मेरे बस में नहीं है। इसके लिए वे कांग्रेस आलाकमान से बातचीत करेंगे। तब जाकर हंगामा कहीं शांत हुआ। इसके बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए जामुंतराव धोटे ने कहा कि मुख्यमंत्री के आश्वासन से पृथक विदर्भ का आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। मुंख्यमंत्री ने आलाकमान से बातचीत करने का आश्वासन दिया है। लेकिन जब तक पृथक विदर्भ राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता, आंदोलन जारी रहेगा।
सुबह से थी हंगामे की चर्चा
बुधवार को सुबह से ही चर्चा थी कि जामुवंतराव धोटे यशवंत स्टेडियन में हो रही कांग्रेस की सभा में कुछ न कुछ हंगाम करेंगे। कई लोगों में इस बात की चर्चा थी कि वे मुख्यमंत्री के उपर चप्पल फेंक सकते हैं या फिर वीआईए में होने वाली बैठक के जा रहे मुख्यमंत्री के काफीले को रोकर काले झंडे दिखाएंगे। लेकिन जामुवंतराव धोटे वीआईए की बैठक के निर्धारित समय से पहले ही वीआईए भवन पहुंच गए। हालांकि स्थिति को वीआईए अधिकारियों ने पहले ही भांप लिया था, लेकिन उन्होंने धोटे और कार्यकर्ताओं को यहां आने से इसलिए नहीं रोका कि कहीं कार्यकर्ता यहां तोडफ़ोड़ न कर दें।
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पृथक विदर्भ पर गरजे मुत्तेमवार
चव्हाण बोले फैसला करेगा आलाकमान
नागपुर।
स्वतंत्र विदर्भ राज्य को उचित बताते हुए तथा विदर्भ का हित और विकास के लिए विदर्भ राज्य का निर्माण आवश्यक बताते हुए आज सांसद विलास मुत्तेमवार ने बुधवार को एक बार फिर दहाड़ लगाई। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के अहिंसा के मंत्र पर कायम रहते हुए हम विदर्भ को स्वतंत्र राज्य बना कर रहेंगे। मुत्तेमवार ने कहा कि वे कांग्रेस आलाकमान तक यह मंाग पहुंचाने में प्रदेश कांग्रेस सहयोग करें। वे नागपुर के यशवंत स्टेडियम में 125 वें स्थापन दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस अवसर पर महाराष्ट्र के 50 वर्ष पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का भव्य सत्कार किया गया। इसी प्रकार प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर भी उनका स्वागत किया गया।
प्रस्तावना रखते हुए नागपुर के पालकमंत्री शिवाजीराव मोघे ने कांग्रेस पक्ष के 125 वें पदार्पण पर प्रदेश वासियों की शुभकामना दीं। उन्होंने प्रदेश के 50 वें वर्ष पर भी लोगों को बधाई दी। इस अवसर पर मोघे ने कांग्रेस पार्टी का जमकर बखान किया तथा पंचायतराज, पेंशनयोजना, रोजगार हमी योजना का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी सदैव गरीबों एवं पिछड़े वर्ग के साथ न्याय करती रही है।
मोघे के भाषण के दौरान विशाल मैदान में मौजूद जन समूह ने 'पृथक विदर्भ झालय पाहिजेÓ के गगन भेदी नारे बुलंद करना शुरु कर दिया था। इसी बीच सांसद मुत्तेमवार ने इस भारी शोरशराबे के बीच कहा कि विदर्भ की मांग बहुत पुरानी है और पुरानी मांग पर ध्यान देना अतिआवश्यक है। मुत्तेमवार ने कहा कि जब यहा के लोग अपनी ज्वलंत समस्याओं तथा मांगो को लेकर मुंबई पहुंचते है तब मंत्रालय से मंत्रीगण गायब हो जाते हैं। एक हजार किमी की यात्रा कर हमें राजधानी पहुचना पड़ता है। जबकि 400 किमी पर छत्तीस गढ के मुख्यमंत्री दिखाई देते हैं। इसी प्रकार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हमें करीब दिखाई देते हैं लेकिन हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री हम से बहुत दूर दिखाई देते हैं। मुत्तेमवार ने कहा कि माणिकराव ठाकरे पृथक विदर्भ के मुद्दे पर हमारी सहायता करें। बिजली का उत्पादन विदर्भ में होता है और विदर्भ ही इस से वंचित रहता है। किसानों की अत्महत्या का सिलसिला थम नहीं रहा है। विदर्भ में नक्सलवाद और बेरोजगारी में इजाफा हो गया है। 50 वर्षों के भीतर के काल में यदि तुलना की जाए तो विदर्भ सबसे अधिक पिछड़ा हुआ दिखाई देता है।
उन्होंने जनता का पक्ष रखते हुए कहा कि यहां की जनता अपने मुख्यमंत्री को नागपुर स्थित रामगीरी में देखना चाहती है। उन्होंने कहा कि दो राज्य बनने से दो मुख्यमंत्री कांग्रेस को मिलेंगे। इसमें पार्टी का लाभ है।
मुत्तेमवार के भाषण के दौरान कार्यक्रम स्थल के चारों ओर मुत्तेमवार जी आगे बढ़ो हम तुमहारे साथ है के नारे लगाते रहे। तब मुत्तेमवार ने कहा कि शांति बनाए रखो हमारी लड़ाई अहिंसा पर आधारित है। हम कोई जिला या कमेटी नहीं मांग रहे हैं। हमारी मांग पृथक राज्य को लेकर है।
महाराष्ट्र कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मणिकराव ठाकरे ने कहा कि आलाकमान को इस प्रश्न पर चिंता करनी चाहिए। उन्होंने पृथक विदर्भ की मांग के मुद्दे पर कहा कि हमें गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए कि ऐसे हालात आखिर क्यों बन रहे हैं।
मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने अपने सत्कार का उत्तर देते हुए कहा कि इस देश का नेतृत्व सोनिया, राहुल तथा मनमोहन सिंह के हाथों में है तथा उन्होंने एक बार फिर राज्य की जिम्मेदारी उन के हाथों में सौंपी है। विदर्भ की मांग पर सफाई से बच निकलते हुए चव्हाण ने कहा कि आलाकमान जो निर्णय लेगा हम उसे स्वीकार करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि विदर्भ के साथ हमेशा न्याय किया गया है। हाल ही में संपन्न शीतसत्र के दौरान 10 हजार करोड़ के पैकेज का उल्लेख करने में भी चव्हाण चूके नहीं। विदर्भ की मांग पर शोर मचाने वालों को दो टूक शब्दों में कहा कि यह कोई भाजपा शिवसेना की सभा नहीं है। यह कांग्रेस का कार्यक्रम है इसलिए यहां अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।

मंगलवार, जनवरी 05, 2010

पुस्तक प्रेम पर भारी पड़ गया बुलडोजर


संजय स्वदेश राष्ट्रीय पुस्तक मेला जो अब मौजूद नहीं है उधर दिल्ली छोड़कर इधर नागपुर आइये. किताबों को पड़ते पाठकों के अकाल के बीच दिल्ली और देश में भले ही पुस्तक मेलों को प्रोत्साहन दिया जाता हो लेकिन इधर नागपुर में ऐसे पुस्तक मेलों को बुलडोजर लगाकर ढहा दिया जाता है और कहा जाता है कि ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि निगम के इन नियमों का पालन नहीं किया गया. संतरानगरी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब महानगर पालिका ने साहित्य प्रेमियों के उत्साह पर पानी फेर दिया। कस्तूरचंद पार्क में गत 1 जनवरी से शुरू राष्ट्रीय पुस्तक मेले में साहित्य प्रेमियों का उत्साह महानगर पालिका से देखा नहीं गया। उसने पुस्तक मेले को उजाडऩे के लिए मंगलवार को बुलडोजर समेत मनपा का तोडू दस्ता भेज दिया गया। पुस्तक मेला न खुले इसके लिए मुख्य द्वार पर तोडू दस्ते की गाडिय़ां खड़ी कर द्वार बंद कर दिया गया। साहित्य प्रेमी पुस्तक खरीदने आए और निराश होकर लौट गए।
10 जनवरी तक चलने वाले इस पुस्तक मेले के अचानक बंद हो जाने से शहर के पुस्तक प्रेमियों में निराशा फैल गई है। हालांकि कस्तूरचंद पार्क मैदान में महानगर पालिका और नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से भी पुस्तक प्रदर्शनी लगाई गई है। लेकिन इस प्रदर्शनी में स्थानीय प्रकाशकों की भरमार होने से पाठकों का रूझान राष्ट्रीय पुस्तक मेले के प्रति ज्यादा था, जहां राष्ट्रीय स्तर के प्रकाशक विभिन्न विषयों के पुस्तकों के साथ आए थे।
पुस्तक मेला समिति नई दिल्ली एवं समय इंडिया ने गत वर्ष 2009 जून माह में नागपुर के कस्तुरचंद पार्क में विगत 10 वर्षों की तरह इस साल भी राष्ट्रीय पुस्तक मेले का आयोजन करने के लिए अनुमति मांगी थी। समिति के सचिव तथा पुस्तक मेले के आयोजक चंद्रभूषण ने बताया कि मेले का आयोजन करने के लिए 6 विभागों से अनुमति, नाहरकत प्रमाण पत्र (एनओसी) की दरकार थी। इसमें से पुलिस उपायुक्त विशेष शाखा नागपुर, पुलिस उपायुक्त (वाहतूक) नागपुर, कार्यकारी अभियंता (महाराष्ट्र राज्य विद्युत कंपनी) नागपुर, सहा. संचालक नगर रचना मनपा, नागपुर, आरोग्य अधिकारी मनपा, नागपुर ने मेले के लिए अनुमति प्रदान कर दी। लेकिन मनपा के मुख्य अग्निशामक अधिकारी ने एनओसी नहीं दिया।
मेला समिति के सचिव चंद्रभूषण ने कहा कि वे पिछले 10 वर्षों से नागपुर शहर में राष्ट्रीय पुस्तक का आयोजन कर रहे है। लेकिन इस वर्ष मनपा की ओर से कस्तूरचंद पार्क में 2 जनवरी को राष्ट्रीय पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसी कारण उन्हें मनपा के मुख्य अग्निशामक अधिकारी की ओर से अनुमति नहीं दी गई। इसके लिए उन्होंने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालन ने मेला समिति की अर्जी पर सुनवाई के लिए 6 जनवरी का समय दिया। इसी बीच मेले के पांचवें दिन उच्च न्यायालय में सुनवाई के एक दिन पूर्व मंगलवार की सुबह 11 बजे मनपा का अतिक्रमण विभाग बुलडोजर के साथ पुस्तक मेले को उखाडऩे के लिए कस्तूरचंद पार्क पहुंच गया। भारी पुलिस बंदोबस्त, मनपा कर्मचारी तथा बुलडोजर को देखकर देश के कोने-कोने से नागपुर पहुंचे पुस्तक विक्रेता सकते में पड़ गए। इस खबर को कवर करने तथा नागपुर के नाम को कलंकित कर देने वाली इस कार्रवाई को कैमरे में कैद करने के लिए प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी पहुंची। इस बीच नगर के वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी उमेश चौबे यहां पहुंच गए। अनेक पत्रकारों तथा उमेश चौबे ने मनपा के इस कार्रवाई पर खेद जताते हुए प्रशासन से अपना निर्णय बदलने की प्रार्थना की। लेकिन शासकीय अधिकारी टस से मस नहीं हुए। मेले के आयोजक चंद्रभूषण ने प्रशासनिक अधिकारियों से कहा कि यह मामला अदालत में चल रहा है, अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी, उस में जो फैसला होगा उसे स्वीकार कर लिया जाएगा, लेकिन चंद्रभूषण की बात को हवा में उड़ाते हुए राष्ट्रीय पुस्तक मेला को चलने नहीं दिया गया। वरिष्ठ समाजसेवी उमेश चौबे ने इस घटना को खेदजनक बताते हुए कहा कि मामला व्यक्तिगत हो गया है और व्यक्तिगत दुश्मनी की इस देश में कोई जगह नही है। उन्होंने कहा कि यहां प्रजातंत्र है कोई औरंगजेब का कानून यहा नहीं चल रहा है। मेले में साहित्य खरीदने आए पाठकों को यहां से निराश होकर जाना पड़ा। कई पाठकों ने कहा कि मनपा की इस तरह की कार्रवाई से नागपुर का नाम राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम होगा। मामला साहित्य जगत से जुड़ा होने के कारण मनपा की यह कार्रवाई साहित्य पर हमला करने जैसी बताई जा रही है।

बुलडोजर संस्कृति मान्य नहीं
कलाकारों, साहित्यकारों ने की तीव्र भर्त्सना
शहर के प्रबुद्ध कलाकारों, कथाकारों, रंगकर्मियों, कवि, लेखकों ने कस्तूरचंद पार्क मैदान पर आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेला को बुलडोजर चलाकर बंद करने के मनपा के प्रयासों की तीव्र भत्र्सना की है। इन बुद्धिजीवियों का कहना है कि आजाद देश में बुलडोजर संस्कृति की जितनी निंदा की जाए, कम है। नागपुर के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने अपनी अहं की तुष्टि के लिए पूरे देश में नागपुर की छवि को कलंकित कर दिया है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था। इन अधिकारियों का कृत्य आपातकाल के दौरान किए गए अत्याचार की तरह है। नागपुर में पिछले 10 वर्षों से पुस्तक मेला का आयोजन किया जा रहा है। मनपा का यह कृत्य वाचन-पठन संस्कृति को ही समाप्त करने का प्रयास है। पुस्तक मेला अपने मूल स्वरूप में कस्तूरचंद पार्क मैदान में ही लगना चाहिए। उमेश चौबे, राजेंद्र पटोरिया, मधुप पांडेय, डा. सागर खादीवाला, हरीश अड्यालकर, अनिल मालोकर, राधेश्याम महेंद्र, बाबा रॉक, सुरेश जैन, मनीष वाजपेयी, सुनील ककवानी, शंकर मिश्रा, रमेश गुप्ता, अविनाश बागड़े, डा. शशिकांत शर्मा, गोपाल गुप्ता, प्रज्ञा मेहता, सुमित कुमार 'आतिश', प्रकाश काशिव, मधु गुप्ता, नरेंद्र परिहार, प्रभा मेहता, रविशंकर दीक्षित सहित कई कलाकारों, साहित्यकारों ने मनपा की इस करतूत का कड़ा विरोध किया है।

सोमवार, जनवरी 04, 2010

पृथक विदर्भ के लिए एकजुट दिग्गज

संजय स्वदेश
नागपुर।
पृथक विदर्भ अंदोलन की गति तेज हो चली है। रविवार 3 जनवरी को नागपुर में पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद विलासराव मुत्तेमवार के नेतृत्व में आयोजित धरना प्रदर्शन में राज्य के दुग्ध व पशुपालन मंत्री ने गरजते हुए कहा कि अब विदर्भ के लिए जरूरत पड़ी तो इस्तीफा देने से भी पीछे नहीं हटेंगे। इसके बाद अलग ही दिन सोमवार को आयोजित एक बैठक में विदर्भ के कई दलों के नेता आपसी मतभेद भुलाकर साथ आए। विदर्भ के आंदोलन को और तेज करने का आह्सान करते हुए कहा कि यदि तेलंगाना के साथ-साथ पृथक विदर्भ के लिए केंद्र ने अभी सकारात्मक कदन नहीं उठाये तो आने वाले दिनें में आंदोलन हिंसक भी हो सकता है। नागपुर के उत्तर अंबाझरी रोड स्थित राष्ट्रभाषा संकुल में आयोजित बैठक में कांग्रेस, राकांपा, भाजपा, रिपाई आदि विभिन्न संगठनों के नेताओं ने सभा को संबोधित किया। सांसद दत्ता मेघे ने कहा कि पृथक विदर्भ आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर है। लिहाजा, इस आंदोलन का नेतृत्व युवाओं के हाथ में देना चाहिए और 60 साल से उपर के नेता उन्हें मार्गदर्शन करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पृथक विदर्भ राज्य का गठन होता है तो वे किसी तरह का पद नहीं लेंगे। उन्होंने बताया कि शरद पवार ने पृथक विदर्भ के समर्थन में सहमति दे दी है। सोनिया गांधी के साथ भी इस संदर्भ में बैठक हो चुकी हैा। पूर्व सांसद बनवारी लाल पुरोहित ने कहा कि विकास की तमाम संभावनाओं के बाद भी विदर्भ क्षेत्र पिछड़ा रहा। हर मामले में साधन संपन्न होने के बाद भी उपेक्षा के अलावा विदर्भ को कुछ नहीं मिला। पृथक विदर्भ के लिए इससे अच्छा कोई और समय नहीं हो सकता है। बैठक में प्रमुख दलों के नेताओं को एक साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रकाश आंबेडकर ने कहा कि तेलंगाना आंदोलन के साथ-साथ पृथक विदर्भ का आंदोलन चलते रहना चाहिए। अंतिम निर्णय लेने का यह सही समय है, इसलिए इसी दौरान पृथक विदर्भ के लिए कृति समिति का भी गठन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 11 जनवरी को रामदास आठवले और जोगेन्द्र कवाड़े भी सिविल लाईन्स स्थित डा. बसंतराव देशपांडे सभागृह में सभा कर रहे हैं। इसी सभा में विदर्भ बंद रखने की तिथि तय की जाए।
विदर्भवादी नेता जामवंतराव धोटे ने कहा कि जिस तरह तेलंगाना की आग फैल चुकी है, वैसी आग विदर्भ को भी लेकर लगना चाहिए। यदि तेलंगाना के साथ विदर्भ को पृथक राज्य का दर्जा नहीं मिला तो आगामी बीस साल में भी इसके लिए केंद्र सरकार पहल नहीं करेगी। विदर्भ राज्य के गठन का यही समय सबसे बेहतर है। हम पीछे नहीं रहेंगे। विदर्भ के लोगों ने चूडिय़ां नहीं पहन रखी है। भाजपा विधायक देवेन्द्र फडणवीस ने कहा कि पृथक विदर्भ आंदोलन के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी की भूमिका पर संदेह नहीं करना चाहिए। भाजपा कभी भी इस आंदोलन के लिए सड़क पर उतरने को तैयार है। इसका प्रस्ताव भाजपा ने पहले ही पारित कर दिया है। नवनियुक्त अध्यक्ष नितिन गडकरी भी पृथक विदर्भ के गठन के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा कि विदर्भ आंदोलन का नेतृत्व कोई भी संभाले, हम उसके साथ हैं। इसके लिए हम शिवसेना की भी परवाह नहीं करेंगे। पूर्व मंत्री रणजीत देशमुख ने भी विदर्भ आंदोलन के लिए युवा नेतृत्व की वकालत की। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा की सहमति और अच्छी बात है। कांग्रेस विधायक दीनानाथ पडोले ने कहा कि पृथक विदर्भ आंदोलन की रूपरेखा तय करने का यह माकूल समय है। सभी को मिलजुल कर एक नीति के अनुसार इसकी रूपरेखा तय करनी चाहिए, ताकि आंदोलन अबाध रूप से चलता रहे।

रविवार, जनवरी 03, 2010

महाराष्ट्र में नक्सलियों की घेराबंदी शुरू

नक्सल प्रभावित सभी राज्यों के साथ मिलकर नक्सली ठिकानों पर एक साथ हल्ला बोलने की रणनीति बदल दी गई है। अब नक्सलियों की हर तरह की सप्लाई पूरी तरह ठप कर उन्हें उनके घर में कैद करने की मुहिम चलाई गई है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में दंडकारण्य इलाके से इसकी शुरुआत कर दी गई है। गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, तय रणनीति बदलने की एक बड़ी वजह है झारखंड और पश्चिम बंगाल की सरकार में इच्छाशक्ति और अपेक्षित सहयोग में कमी। राज्यों के साथ नक्सल विरोधी अभियान का समन्वय करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अभी यह अभियान उस अंदाज में नहीं चल रहा जैसी योजना गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने बनाई थी। फिलहाल तय किया गया है कि एक साथ सभी नक्सल प्रभावित इलाकों में उन्हें घुसकर मारने के बजाये पहले उन्हें चारों ओर से घेरकर उनकी सप्लाई लाइन को पूरी तरह तोड़ दिया जाए। पहले चरण में दंडकारण्य में नक्सलियों की जड़ें काटी जाएंगी। इसके लिए छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव और कांकेर जिले के साथ ही महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की घेराबंदी की गई है। दोनों राज्यों में की जा रही इस घेरेबंदी के साथ ही यह भी तय किया जा रहा है कि यहां बढ़ते दबाव को देखते हुए नक्सली इससे सटे आंध्र प्रदेश और उड़ीसा के इलाकों में न जा सकें। इसके लिए अब बड़ी संख्या में राज्य पुलिस, महाराष्ट्र पुलिस का स्पेशल एक्शन ग्रुप और कोबरा बल के अलावा अर्धसैनिक बलों के जवान भी उपलब्ध हैं, जो एक तरह से अभियान वाले इलाके के चारों ओर सुरक्षा दीवार का काम कर रहे हैं। इस समय नक्सल विरोधी अभियान के लिए 58 हजार जवान लगे हुए हैं। इसके अलावा जल्दी ही अर्धसैनिक बलों के और 17 हजार जवान इनकी मदद के लिए उतारे जा सकते हैं। इस बार अभियान में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की मदद के लिए 10 ध्रुव एडवांस्ड लाइट हेलीकाप्टर और 80 स्पेशलिस्ट डाक्टर भी लगाए गए हैं। पिछले अभियान में सुरक्षा बलों को हुए नुकसान को देखते हुए इस बार रणनीति भी थोड़ी बदली गई है। नक्सलियों के चारों तरफ घेरा डालने के बाद खुफिया सूचना के आधार पर खास ठिकानों पर हल्ला बोला जाएगा। पूरी योजना इस तरह बनाई जानी है जिससे उन इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को कोई समस्या न हो और न ही नक्सलियों को उनकी सहानुभूति मिल सके।
गड़चरौली इलाके के नक्सल सूत्रों का कहना है कि उनकी घेराबंदी की नई सरकारी नीति के खिलाफ लडऩे के लिए उनके समूहों की देर रात बैठक शुरू हो गई।

पृथक विदर्भ के लिए त्याग सकते हैं पद


संजय स्व्देश
नागपुर।
यदि पृथक विदर्भ की के लिए जरूरत पड़ी तो पद का त्याग भी किया जा सकता है। यह कहना है कि राज्य के दुग्ध व पशुपालन विकास मंत्री डा. नितिन राऊत का। वे पृथक विदर्भ की मांग को लेकर रविवार को सांसद व पूर्व मंत्री विलासराव मुत्तेमवार के नेतृत्व में सीताबड़ी चौक स्थित गांधी पुतले पर धरना आंदोलन को संबोधित कर रहे थे। डॉ. राऊत ने कहा कि विदर्भ बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडर की कर्मभूमी है। पृथक विदर्भ की मांग आज समय की जरूरत है। यदि इसके लिए राजय मंत्रीमंडल से अपना पद त्याग करने की जरूरत पड़ी तो भी इसकी कुर्बानी देंगे।
सांसद मुत्तेमवार ने कहा कि विदर्भ की मांग वर्षो से हो रही है, जो आज तक स्वीकार नहीं की जा सकी है। स्वतंत्र तेलंगाना राज्य से कहीं अधिक पुरानी विदर्भ की मंाग है। उन्होंने कहा कि फजल अली कमिशन ने विदर्भ राज्य का प्रस्ताव दिया था। जबकि छत्तीसगढ़, उत्ताराखंड और झारखंड के प्रस्ताव को नकार दिया था। सांसद मुत्तेमवार ने कहा कि अखंड विदर्भ महाराष्ट्र में 50 वर्ष के बाद भी विदर्भवासियों को विकास से वंचित रहना पड़ा है। उन्होंने केवल आश्वासन दिए हैं और विदर्भ बदहाली का शिकार होता रहा है। विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। बिजली, पानी की समस्या के साथ अन्य बुनियादी समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। इसके अलावा अनेक समस्याओं के जाल में विदर्भ फंसा हुआ है।
पूर्व विदर्भवादी नेता जामुुंतराव धोटे ने अपने जोशीले अंदाज में कहा कि जो नेता विदर्भ का विरोध कर रहे हैं, वे लोग विदर्भ द्रोही है। उन्होंने इस आंदोलन को सबसे पुराना और सबसे बड़ा आंदोलन बताते हुए कहा कि अब यह आंदोलन और जोर पकड़ेगा। वक्ताओं ने अहिंसा पर जोर देते हुए कहा कि विदर्भ का आंदोलन हिंसात्मक नहीं होगा। इसीलिए आज धरने को महात्मागांधी के पुतले के पास किया गया। धरना पंडाल एवं सड़कों पर सैकड़ों लोग जमा थे। धरना आंदोलन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चला।
धरना आंदोलन में अनेक स्थानीय नेताओं ने हिस्सा लिया। इसमें विशेष रूप से विधायक एस.क्यू. जमा, शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जय प्रकाश गुप्ता, विधायक दीनानाथ पडोल, पूर्व नगर अध्यक्ष हाजी शेख हुसैन, विदर्भ जनांदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी, निगम पार्षद कामिल अंसारी, जनता दल के नगर अध्यक्ष रवि पैगवार आदि भी मौजूद थे।

शनिवार, जनवरी 02, 2010

प्यार, कौमार्य और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

संजय स्वदेश
दुष्कर्म के एक मामले में उच्चतम न्यायलय का एक महत्पूर्ण निर्णय आया है। दुष्कर्म के आरोप में एक दोषी को यह कह कर निर्दोष करार दे दिया कि पीड़िता ने खुद कौमार्य खोया। खबर प्रकाशित हुई। नये साल के पहले दिन। अंदर के पेज में। छोटे से कॉलम में। नये साल के जश्न में डूब कुछ ही पाठकों का ध्यान इस खबर की ओर गई होगी।
खबर पर ध्यान इसलिए गया क्योंकि शीर्षक में कौमार्य शब्द जुड़ा था। सेक्स की दुनिया से संबंधित हर खबर पर चटकारे लेकर पढ़ा जाता है। कम लोग ही संवेदनशील होते है। जिन्होंने इस खबर को पढ़ी होगी, उन्हें यह जरूर सोचा होगा कि देश के उच्चतम न्यायलय भी कभी-कभी कैसी अनाप-शनाप शब्दों का उल्लेख कोई निर्णय देकर इतिहास बना देता है। फिर चाहे भविष्य में उस निर्णय का उल्लेख कर कितना भी गलत कार्य क्यों न हो।
उच्चतम न्यायल ने एक लड़की के साथ बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए जा चुके सुनील नाम के एक शख्त को यह कहते हुए बरी किया कि पीड़िता ने खुद उससे कौमार्य भंग कराया। दूसरे, पिता बेटी के नबालिग होने का प्रमाण नहीं दे पाये। मामला प्यार का था। इसलिए शारीरिक संबंध आपसी राजामंदी से बनी थी। सुनील के वकील ने अदालत को तर्क दिया था कि कौमार्य भंग करते वक्त लड़की ने विरोध नहीं किया था, इसलिए मामला बलात्कार कहा हुआ! यह तो सेक्स हुआ, आपसी राजमंदी का। देश में हर साल सैकड़ों ऐसे मामले दर्ज होते हैं, जब कोई व्यक्ति या युवा किसी लड़की को शादी के हसीन सपने दिखाकर प्यार के खुशनुमे अहसास से बासना की नदी में उतर जाता है। जब उत्साह ठंडा पड़ता है, तो प्यार का रंग फिका दिखने लगता है। प्रेमी प्रेमिका से कतराने लगता है। प्रेम में छली गई, एक बेटी, बहन रोने-कल्पने के बाद सब कुछ भुलाकर नये सिरेसे नई जिंदगी संवारने में जुट जाती है। कुछ खुदकुशी की राह चुनती है। पर नई जिदंगी की राह पर चलने वाली लड़की के दिल में छले जाने की टीस कायम रहती है। जो टिस बर्दास्त नहीं कर पाती हैं, पुलिस तक पहुंच जाती है। ऐसे लड़कियों की जगहंसाई नहीं होनी चाहिए। सम्मान के नजरिये से देखना चहिए। आखिर उसने हिम्मत ही तो की है। प्यार में छले जाने के खिलाफ। ठीक है कि उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते वक्त जोर-जबरजस्ती नहीं की गई होगी। पर उसे खुशनुमे एहसासों के साथ आबरू लुटाने के लिए मानसिक रूप से मजबूर तो किया ही जाता है।
प्रेम प्रसंगों में अंतिम लक्ष्य विवाह ही तो होता हैं। मानसिक रूप से आश्वत करके किसी मासूम की इज्जत से खिलवाड़ किस श्रेणी में रखी जाएगी। बाप बेटी को नबालिग साबित करने में नाकाम रहा। इसमें बेटी का क्या दोष। मान भी लेते हैं, लड़की नबालिग नहीं थी, पर उसकी आबरू से खिलवाड़ तो हुआ ही था। देश में ऐसे हजारों मामले हैं, जिसमें विवाह का झांसा देकर कोई न कोई मुंह काला करता है। हवस की आग बुझाकर लड़की को उसके हाल पर छोड़ देता है। समाज में कई मर्द ऐसे हैं जो अपनी मित्र मंडली में लड़की की रजामंदी से उसके साथ बनाये गए संबंधों के बाद उसे ठुकरा देने का संस्मरण सुनाते है। उच्चतम न्यायलय के ऐसे निर्णय ऐसी प्रवृत्ति के लोगों की मानसिकता को मजबूत करेगा। किसी न किसी तरह की झांस में फंस कर मानसिक रूप से किसी न किसी लाडली की आबरू से खिलवाड़ चलता रहेगा।
दुष्कर्म के मामले में वर्षों से यह मांग हो रही थी कि इसकी सुनवाई महिला जज करें। अब जाकर इसके लिए केंद्र सरकार ने मंजूरी दी है। कानून के नये संशोधन के जरिए धारा 376 की घाराओं में सभी अपराधों की सुनवाई महिला जज ही करेगी। गिरफतार व्यक्ति की चिकित्सा जांच तुरंत होगी। पीड़िता का बयान उसके घर जाकर माता-पिता अथवा किसी गेर सरकारी सामाजिक संस्था की मौजूदगी में महिला पुलिस उसके अधिकारी घर जाकर लेगी। सरकार की यह पहल स्वागत योग्य है। अभी तक ऐसे मामलों में कानूनी पेंच ऐसे हैं कि शारीरिक रूप से दुष्कर्म पीड़िता को थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने से लेकर अदालत के कटघरे में तरह-तरह के सवाल के वाण फेंके जाते हैं। या यूं कहें कि कोर्ट में जज के सामने फिर से बलात्कार होता हैं। यदि पीड़िता ने मानसिक रूप से इसे सहन करते हुए सवालों का जवाब दे दिया तो शायद दोषी पर आरोप सिदध हो जाए। पर कोर्ट में फिर से पीड़ित होने के डर के कारण अधिकतर मामले दब ही जाते है।
भ्रष्टाचार के अनेक प्रकरण आने के बाद भी देश में न्यायापालिका का सम्मान है। इसके बाद भी विवेक के तर्क की कसौटी पर उच्च और उच्चतम न्यायाल ने कई मामले में ऐसे निर्णय दिए है, जो आसानी से हजम नहीं हुए। अमूमन उच्चतम न्यायालय में मामला निचली अदालतों से होकर जाता है। उच्चतम न्यालय के जज भी नीचली अदालतों से तरक्की पाते हुए नियुक्ति पाते हैं। अनुभव का लंबा सफर साथ रहता है। इसके बाद भी ऐसे प्रकरण में निणर्य निश्चय ही न्यायमूर्ति की मानसिकता पर अंगुली उठाते है। दुष्कर्म के मामले जब भी मीडियां के सुर्खियों में आए, काफी हो हल्ला मचा। कई मामलों में फिल्में तक बन गईं। पर थोड़े दिन बाद लोग सब कुछ भूल जाते है। सुनवाई मंद रफतार से चलती रहती है। जब तक निर्णय आता है, घटना के बारे में लोगों को याद तक नहीं रहता है। इतनी लंबी अवधि तक याद रखना स्वाभाविक भी नहीं है। अदालत सुनाई की लंबी अवधि पर किसी की लगाम नहीं है। अब मीडियां को ऐसे मामलों के लिए लामबंद होकर हो-हल्ला करना चाहिए जिससे एक कोर्ट का निर्णय दूसरे कोर्ट में पलटने का खेल न खेला जाता है और पीड़ित न्याय के लिए तरसता रहता है।