गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

प्यासे कंठ सबक सिख रहे हंै नौनिहाल


राज्य के गडचिरौली जैसे पिछड़े इलाके में विकास के लिए बिजली सड़क की सुविधा तो दूर यदि स्कूलों में पढऩे वाले नौनिहालों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं कराया जाए तो वे भला क्या करेंगे? प्यासे कंठ स्कूलों में मास्टर जी के बताये सबक भला वे कैसे आत्मसात करेंगे? ऐसे में यदि ये बच्चे बड़े होकर हाथ में बंदूक लेकर लोकतंत्र के खिलाफ लड़े तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुछ ऐसी ही स्थिति बनी हुई के नागपुर डिविजन के छह जिलों मेंं संचालित जिला परिषद के स्कूलों की। जहां 45 डिगी के भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए तरह रहे हैं नन्हे-मुन्ने। यह हम नहीं कह रहे हैं, यह राज्य सरकार के शिक्षा विभाग का सर्वे कह रहा है।
नागपुर से संजय स्वदेश की रिपोर्ट
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पानी के लिए तरस रहे हैं जिला परिषद के स्कूल
नागपुर।
नगर में चारों ओर पेयजल के लिए हाहाकार मचा हुआ है। कच्ची कॉलोनियों और ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर है। इन्हीं सबके बीच राज्य शिक्षा विभाग का एक चौकाने वाला सर्वे आया है। शिक्षा का मंदिर माने जाने वाले जिला परिषद के 170 स्कूलों में पेयजल की उपलब्ध नहीं है। लिहाजा, अनुमान लगाया जा सकता है कि इन स्कूलों में पढऩे आने वाली नई पीढ़ी प्यासे रहकर मास्टर जी के बतायी हुई सबक सीख रही है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है कि जब सरकार ने बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया हो। प्यासे बच्चे भला क्या करें। घर से पानी-लाते-लाते उनका शैक्षणिक सत्र समाप्त होने का आया और अब छुट्टियां लगने की है।
आश्चर्य की बात यह है कि राज्य शिक्षा बोर्ड ने जिला परिषद के स्कूलों में यह सर्वे इस वर्ष के शुरूआत में नागपुर डिवीजन के छह जिलों में कराई थी, जब मौसम इतना गर्म नहीं था और पानी के लिए हाहाकार नहीं था। रिपोर्ट अब आई है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब जनवरी-फरवरी के मौसम में पेजयल की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, तब स्थिति इतनी गंभीर थी, तो अप्रैल माह में जब चारों ओर पानी कि किल्लत रही है, तब तो निश्चय ही इन स्कूलों में पढऩे आने वाले बच्चे बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे होंगे। सर्वे में शामिल जिलों में नागपुर के अलावा चंद्रपुर, गोंदिया, वर्धा, भंडारा और गडचिरौली के स्कूलों को शामिल किया गया था। सर्वे में सबसे ज्यादा स्कूल गड़चिरौली जिले के 83 स्कूल, गोंदिया के 56 स्कूलों को शामिल किया गया था। इस सर्वे में नागपुर के 17 और चंद्रपुर के 10 और सबसे कम भंडारा जिले के 4 स्कूलों को शामिल किया गया था। लेकिन कहीं पानी की उपलब्धता को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं मिली।
शिक्षा विभाग के अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह स्थिति और भी गंभीर है। गडचिरौली जैसे पिछड़े जिलों के बारे मे क्या कहना? सबसे ज्यादा गंभीर संकट इसी पिछड़े जिले में हैं। सर्वे में उन स्कूलों को जोड़ा गया, जहां पाइप लाइन की सुविधा नहीं है। उन स्कूलों को बच्चे दूर-दूर से पानी लेकर स्कूल आते हैं, जिससे कि पढ़ाई के दौरान उनका कंठ सूखे तो उसे तर कर सके। ज्ञात हो कि यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार स्कूलों में बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लाखों रुपये की निधि देती है। इसके बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों को स्कूलों पेयजल, शौचाय, कक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। यहां शिक्षा ग्रहण करने आने वाली पीढ़ी के इन सुविधाओं से महरूम रहने से यह स्पष्ट है कि लाखों की निधि यहां पहुंचती ही नहीं है। इन स्कूलों में मिड डे मील योजना के तहत अनाज भी दिया जाता है। अनुमान लगया जा सकता है कि जब यहां पानी जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो फिर इन अनाजों से भोजन कैसे तैयार किया जा सकता है। इस संबंध में बातचीत के लिए शिक्षा विभाग के उप निदेशक मुरलीधर पवार से संपर्क किया गया तो उनका फोन बंद मिला।
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सोमवार, अप्रैल 26, 2010

कुछ मित्रों को पत्र लिखा

डीयर ...
हाईटेक जमाने के कई लाभ हैं। पर इस क्रांति से कई चीजे पीछे छुट गई।
पत्र लिखने का सिलसिला थम गया है। मोबाइल और ई-मेल से झटपट दो-चार शब्द टाईप कर दिये और संदेश चंद लम्हों पर पहुंच जाता है। इस हाईटेक चिट्ठी से जज्बात की कशिश गायब रहती है। कितना अच्छा अच्छा होता कि हाईटेक क्रांति का असर पत्र लिखने की संस्कृति पर नहीं पड़ती। तो आज भी लोग पत्र लिखते। बचपन से ही पत्र लिखने की आदत थी। इस लिए हाईटेक तकनीक का इस्तेमाल करने के बाद भी बार-बार दिल में यह पत्र लिखने की कशिश उफान मारती है। क्योंकि पत्रों के शब्दों में पिरोये गए शब्दों में जज्बातों के अहसास आज की भागमभाग भरी जिंदगी में कितना महत्व रखती है। कभी पत्र लिख कर देखो या किसी का आया पत्र पढ़ कर देखो। आज भी दिल में यह कशीश उठी। सहज ही अंगुलियां टापइ के लिए थिरकने लगी। एक ही सांस में इतना लिख दिया। इसलिए पंरपरागत पत्र की शुरूआती औपचारिकताओं को भूल गया। चलिए परंपरा पर आते हैं।
उम्मीद है आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा। जिंदगी भी अच्छी चल रही होगी। मुस्कुराते हुए इस पत्र को पढ़ रहे होगे। मुझे विश्वास है कि जरूर पत्रों की संस्कृति को मिस करेंगे। दो मिनट सोचेंगे और खुद को पत्र लिखने में बेवश पाएंगे।
फिलहाल अब तक निश्चय ही इस पत्र की मीठास आपके दिल में घुल गई होगी। क्योंकि कभी-कभार रोमन में ही दो-चार शब्दों में ई-मेल और एसएमएस भेजने वाले ने आज इतना बड़ा पत्र लिख डाला।
सोच रहा हूं कि काश, आज ईटरनेट से पत्र भेजन की सुविधा नहीं होती तो हाथों से शब्दों की बतकही रचता। कुछ मीठी यादों को शब्दों में पिरोता।
खैर- फिर मौके आएंगे। सफर है। जारी रहेगा। हमने तो कभी सोचा नहीं की पत्र लिखने की संस्कृति समाप्त हो जाएगी। मैंने यह व्रत लिया है कि जब भी मौके मिलेंगे मित्रों को हिंदी में पत्र ई-मेल से भेंजूंगा।
फिलहाल इस बार इतना ही।

शुभकामनाएं
संजय
नागपुर

लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी

लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर।
विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।

मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

1500 करोड़ खर्च, फिर भी कंठ सूखा

नागपुर। भीषण गर्मी में अघोषित बिजली कटौती के साथ ही पेयजल की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। गत दिनों नागपुर आए केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी से बताया कि नागपुर के आधारभूत ढांचा के विकास के लिए महानर पालिका को जवार लाल नेहरू नेशनाल अर्बन रिनीवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत 1500 करोड़ रूपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। रविवार को प्रकाशित इस खबर से संतरानगरी के लोग हैरत में हैं। उन्हें आश्चर्य इस बात की है किआधारभूत ढांचे के विकास में इतना खर्च होने के बाद भी पानी के लिए हाहाकार क्यों मचा हुआ है। जबकि जलापूर्ति से जुड़ी चार परियोजना समय से पहले ही पूरी हो चुकी है। जयपाल रेड्डी ने नागपुर जब कहा कि नागपुर में खर्च 1500 करोड़ रूपये के कार्यों का वे ब्यौरा लेंगे। इससे मनपा का जल प्रदाय विभाग में खलबली मची हुई है। क्योंकि जेएनएनयूआरएम का पूर्ण रूपये से क्रियान्वयन 2012 तक होना है, योजना को शुरू हुए चार साल हो चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि इस राशि के खर्च में भारी धांधली और अनियमितता बरती गई है। वहीं केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की सरकार और मनपा में भाजपा का शासन होने से समीक्षा को लेकर रेड्डी खासे गंभीर दिखे। पानी के बढ़े हुए बिलों को लेकर उन्होंने राज्य मुख्यमंत्री तक से बातचीत करने को भी कहा।
मनपा आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार से मिली इस राशि को पाइल लाईन से नष्ट होने वाले जल को रोकने और इसकी आपूर्ति व्यवस्था को और उन्नत करने के अलावा के अलावा फूटी हुई पाइप लाइन के मरम्मत आदि पर खर्च किया गया। पूर्व महापौर विकास ठाकरे इस फंड के दुरुपयोग और योजना में कत्थित भ्रष्टाचार का पहले ही आरोप लगा चुके हैं। मनपा कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार पाइप लाइनों से होने वाले रिसाव को दुरुस्ती किया जा चुका है। इस पर करीब 323 करोड़ का रूपये का खर्च आया। इसी तरह से जलापूर्ति के लिए पाइलाइनों का विस्तार और उनके नवीनीकरण का कार्य भी समाप्त हो चुका है। इसमें करीब 4349 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। महानगर पालिका की मानें तो जेएनएनयूआरएम के तहत मनपा ने आधारभूत ढांचे के विकास के लिए कुल 17 योजनाएं चलाई थी। महज चार योजनाएं ही अभी पूरी हुईं है। अधिकतर योजनाएं अभी चालू है या फिर वह शुरू होने की प्रक्रिया में है।
गैर-सरकारी संगठन जनआक्रोश के अध्यक्ष डा. अनिल लद्धड ने बताया कि जेएनएनयूआरएम के तहत पेयजल की आपूर्ति के लिए बेहतर कार्य किया गया होता, तो नगर में कोई इलाका प्यास नहीं रहता। इस फंड की भारी भरकम राशि खर्च कर मनपा ने 22*7 की तर्ज पर जनगर में पेयजल आपूर्ति के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट सितंबर,2009 में बनी थी। इसकी शुरूआत मनपा के धरमपेठ जोन से हुई। तब यह कहा गया था कि इसके लिए नये मीटर लगेंगे। पर आज हकीकत यह है कि इस जोन के आधे से भी ज्यादा घरों में 22*7 तर्ज पर जलापूर्ति तो दूर की बात है, अभी तक पानी के मीटर तक नहीं बदले। यह स्थिति नगर के रिहायसी इलाके की है। इसलिए नगर के दूसरे विकसित इलाकों की हालत कैसी होगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अब इस योजना को असफल होते देख मनपा ने पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का शिगूफा छेड़ दिया। लेकिन इस योजना के लागू होते ही बार-बार पानी की दरों में बढ़ोतरी के बाद भी पेयजल की सुचारु आपूर्ति नहीं होने से जनता का आक्रोश बढ़ा हुआ है। जबकि जयपाल रेड्डी को भी इस योजना के बारे में जानकारी नहीं थी।
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लाल बत्ती पर हाथ पसरता बचपन/ दैनिक १८५७ में २०/४/२०१० को प्रकाशित

लाल बत्ती पर हाथ पसारते ये नन्हें हाथ



संजय स्वदेश
नागपुर।
नन्हीं आभा (बदला हुआ नाम) सीताबर्डी के मुख्य चौराहे पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पुतले के पास रूकने वाले वाहन चालको से भीख मांगती है। उसे नहीं पता भीख मांगना कितनी बुरी बात है? पूछने पर एक टूक में कहती है- स्कूल नहीं जाती। पंचशील चौक पर भी रिंकी (बदला हुआ नाम) भी यही काम करती है। इस तरह का एक और नजारा हर दिन एलआईसी चौक पर भी नजर आता है। यहां तो एक जोड़े भाई-बहन यह काम करते हैं। इस चौक पर नेहा (बदला हुआ नाम) भी रूकने वाले वाहनों के पीछे भागती है। तीनों की हालत कमोबेश एक-सी है। कोई उन्हें दुत्कार के आगे जाने के लिए कहता है तो कोई उन्हें एक-दो रुपये का सिक्का देते हुए स्कूल जाने की नसीहत देता है। पर इन्हें स्कूल जाने का रास्ता नहीं पता। इन सड़कों से कभी रिक्से में इन्हीं की उम्र के बच्चे स्कूल डे्रस में गुजरते हैं, तो उनकी आंखे उत्सुकता से जरूर ताकती है। शायद इनके मन में भी स्कूल जाने की कसक है। इनसे बातचीत करने पर ये दो-चार शब्दों के अलावा कुछ नहीं बोलती। आश्चर्य से कुछ पूछने वालों को चेहरा देखती हैं? इधर-उधर चली जाती हैं। जैसे उससे क्या पूछ लिया? नागपुर में बस ये तीन लाड़ली ही नहीं हैं, जो स्कूल जाने के रास्तों से अनजान व्यस्त राहों के चौक पर भीख मांगती हैं। नगर के अनेक चौक-चौराहे ऐसे हैं, जहां कोई न कोई नन्हीं बच्ची किसी वाहन चालक के आगे हाथ पसारते एक सिक्के की आस लगाए दिख जाएगी।
दुर्भाय की बात है कि नन्हीं हथेलियों से भीख मांगने वाली इन लाड़लियों पर अपने ही माता-पिता का कहर है। मां कहती है, भीख मांगकर लाने के लिए उन्हें प्रताडि़त करते हैं। दूसरे को देने जैसी धममियां देते हैं। यह बात उसे जरूर समझ में आती है। तभी तो मां से यह बात सुन कर वह मासूम सहम जाती है। कई चौक-चौराहों पर इनकी मां भी आसपास ही भीख मांगती रहती हैं। अधिकतर लड़कियों के पिता का पता नहीं। लेकिन नागपुर के 45 डिगी तापमान में आग बरसाते आसामन के नीचे हर लाल बत्ती पर रूकने वाले वाहनों के पीछे हांफते हुए भागती इन मासूमों के चेहरे मुरझाएं ही दिखते हैं। भीषण गर्मी की तपिस में इनके सूखे चेहरे से सूखते अरमानों को साफ पढ़ा जा सकता है। शाम 7 बजे जब गर्मी से राहत पाने के लिए कई लोग रिहाइसी धरमपेठ इलाके में हल्दीराम में आईसक्रीम का आनंद आते हैं। तो यहां भी एक लाड़की आईसक्रीम खाने वालों के सामने अपनी नन्हीं हाथ इस उम्मीद से पसार देती है कि शायद कोई कुछ दे दे। पर हर बार उम्मीद कहां पूरी होती है। कोई उन्हें दुत्कार देता है, तो कोई थोड़ी-सी आईसक्रीम बचाकर उनके हाथ में पकड़ा देता है। कई सज्जन इस मैली-कुचैली लिबाश वाली गुडिय़ों को अपने सामने आते देख मुंह फेर कर दूसरी ओर खड़े हो जाते हैं। दोपहर के समय यहीं अपने छह माह की बेटी को गोद में लेकर खड़ी लाली आईस्क्रीम खाने वाले एक टुकड़ा अपनी बेटी के लिए मांगता है। भीख मांगने की बजाय काम करने की सलाह देने पर कुछ नहीं कहती है बस, एक दो-दो रूपये देने की जिद करती है। काफी पूछने पर बताया कि उसका पति लंगड़ा है।
ऐसी महिलाओं और नन्हें-मुन्नों का चौक-चौराहो पर भीख मांगना इनकी आदत में शुमार हो गया है। दुकान के सामने खड़े होकर भीख मांगने पर वहां खड़े गार्ड की झिड़की भी सहनी पड़ती है। शासन प्रशासन इन सब बातों से बेखबर है। यदि उन्हें खबर होती तो इन नन्हें हाथों में कलम होती। ये हाथ नगर के चौक-चौराहों पर आने जाने वालों के आगे नहीं पसरते।
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सोमवार, अप्रैल 19, 2010

भाजपा का दामन थाम सकते हैं प्रकाश आंबेडकर



दलित वोटों के लिए छोटे आंबेडकर को अपने पक्ष में मिलाने के लिए भाजपा पहले से ही है तैयार

नागपुर। दलित वोटों की राजनीतिक मारामारी में भाजपा भी खम ठोंककर मैदान में उतरने की पूरी तैयारी में है। इसके लिए एक रणनीतिबद्ध तरीके से भाजपा के प्रतिनिधि बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर को अपने साथ मिलाने के प्रयास में हैं। पूछने पर भले ही प्रकाश आंबेडकर इस बात से इनकार करें। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और आंबेडकर दोनों की राजनीतिक मजबूरी है कि वे एक हो जाएं। सूत्रों का कहना है कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो जून में विदर्भ में दो जिलों में होने वाले परिषद के चुनाव में प्रकाश आंबेडकर के साथ भाजपा का गठबंधन हो सकता है। मतलब कांग्रेस को करारी शिकस्त देने के लिए भाजपा की भारिप बहुजन महासंघ साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरेंगे। जानकारों की मानें तो यह दोनों की दलों की राजनीतिक मजबूरी है। भारिप बहुजन महासंघ अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकती। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी हार से सहमी हुई है। नये अध्यक्ष कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे घटक और प्रकाश आंबेडकर का भरोसा नहीं है। हालांकि रिपाई नेता रामदास आठ्वल्ले अभी भी प्रकाश आंबेडकर से उनके साथ मिलकर मजबूत होने का आह्वान करते हैं। लेकिन प्रकाश आंबेडकर कई मौके पर खुले आम कांग्रेस की अलोचना करने के साथ यह कह चुके हैं कि रिपाई के दूसरे घटक कभी भी कांग्रेस के साथ खड़े हो सकते हैं। इसलिए रिपाई घटकों के साथ उनका गठबंधन होने का कोई सवाल ही नहीं है।
हालांकि अभी भी प्रकाश आंबेडकर अभी भी भाजपा से दूरी बनाये दिख रहे हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देशन में भाजपा के प्रतिनिधि प्रकाश आंबेडकर से संपर्क में है। नितिन गड़करी के साथ प्रकाश आंबेडकर के रिश्ते भी मधुर माने जाते हैं। यदि इस चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिलती तो राष्ट्रीय स्तर पर गडकरी की काफी किरकिरी हो सकती है। इसलिए दोनों जिला परिषद के चुनाव को जीतने के लिए भाजपा हर जोखिम लेने को तैयार है। वैसे भी भाजपा के पास अभी कोई कद्दवार दलित नेता नहीं है जिससे कि वह हिंदुत्व के वोट बैंक के साथ ही दलित वोट बैंकों पर कुछ सेंध लगा सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी की कमान संभालने के बाद यह साफ कह दिया था कि उनका लक्ष्य पार्टी के मौजूदा वोट प्रतिशत में दस प्रतिशत बढ़ाना है। इसके लिए भाजपा नए मित्रों व नए क्षेत्रों में पहुंच बनाने में परहेज नहीं करेगी। यदि प्रकाश आंबेडकर भाजपा के साथ आते हैं तो इससे भाजपा को न केवल विदर्भ में लाभ मिलेगा। बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। अनेक घटनाक्रमों में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रति दलित का विश्वास घटता जा रहा है। इस लिहाजा से भी प्रकाश आंबेडकर भाजपा के लिए काफी लाभकारी हो सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि एक सीमित क्षेत्र में केवल अपनी पार्टी के दम पर प्रकाश आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति से ओझल है। यदि वे भाजपा का दामन थामते हैं तो लोकसभा से पूर्व उनके राज्य सभा में जाने की राह भी असान हो सकती है। पिछले दिनों में प्रकाश आंबेडकर ने इस बात का संकेत दे दिया था कि कांग्रेस आलाकमान यदि पृथक विदर्भ आंदोलन को समर्थन नहीं देता है तो वे अपनी रणनीति बदलने से परहेज नहीं करेंगे। अभी तब वे भाजपा से दूर-दूर खड़े दिख रहे थे। लेकिन भविष्य में भी ऐसा होगा यह जरूरी नहीं।
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सीबीआई को छकाती एक मां

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली लगता है कि इस मां को वह कोई फैसला मंजूर नहीं जो उसे बच्चे से अलग करता हो। फिर चाहे फैसला अमेरिकी अदालत या भारत के सुप्रीम कोर्ट का ही क्यों न हो। अदालत उसके खिलाफ फैसला सुनाती है तो वह अपना बच्चा लेकर भाग जाती है। पिछले ढाई साल से यही कर रही है भारतीय मूल की अमेरिकी नागरिक विजयश्री वूरा। पिता की याचिका पर सीबीआई ने जैसे तैसे मां-बच्चे को तलाश कर सुप्रीम कोर्ट में पेश किया था। कोर्ट ने फैसला पिता के हक में सुनाया और विजयश्री को बच्चे के साथ अमेरिका जाने का आदेश दिया तो वह बच्चा लेकर फिर भाग गई। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फिर बच्चा ढूंढ कर लाने का आदेश दिया। कोर्ट ने इस काम के लिए सीबीआई को तीन सप्ताह का समय दिया था और बच्चा ढूंढ कर पिता के हवाले करने का निर्देश दिया था, ताकि पिता अपने आठ साल के बच्चे आदित्य को लेकर अमेरिका जा सके। भारतीय मूल का यह तलाकशुदा दंपती और उनका बच्चा अमरीकी नागरिक हैं। बड़े-बड़े अपराधियों को पकड़ने वाली सीबीआई मां से हारती नजर आ रही है। उसने कोर्ट से तीन की जगह आठ सप्ताह का समय दिए जाने की गुहार लगाई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा। आदित्य के पिता डाक्टर वी. रविचन्द्रन और मां विजयश्री वूरा के बीच अमेरिका में ही आपसी सहमति से तलाक हो गया था और वहां की अदालत ने दोनों की सहमति से बच्चे की साझा कस्टडी का आदेश दिया। कोई भी पक्ष बच्चा लेकर नहीं जा सकता था, लेकिन विजयश्री 2007 में बच्चा लेकर भारत आ गई। रविचन्द्रन ने कोर्ट से इसकी शिकायत की और अमेरिकी अदालत ने बच्चे की कस्टडी पूरी तरह से पिता को दे दी। यही नहीं, मां के खिलाफ वारंट भी जारी कर दिया। अमेरिकी अदालत से आदेश हासिल करने के बाद रविचन्द्रन ने भारत के सुप्रीम कोर्ट से बच्चा ढूंढे जाने की गुहार लगाई। कोर्ट के आदेश पर दो साल तक पुलिस मां और बच्चे को ढूंढती रही। अंत में सीबीआई ने उन्हें खोज निकाला। दोनों को अदालत में पेश किया गया। कोर्ट ने कहा कि बच्चा अमेरिकी नागरिक है, इसलिए उसकी कस्टडी का फैसला अमेरिका की अदालत में ही होना चाहिए। कोर्ट ने विजयश्री को रविचन्द्रन के खर्च पर बच्चा लेकर अमेरिका जाने का आदेश दिया था, लेकिन वह अमेरिका नहीं गई और फिर से बच्चा लेकर गायब हो गईं।
दैनिक जागरण न्यू डेल्ही 18/4/2010 से साभार

अब तेंदुए पर गड़ी शिकारियों की कातिल नजर

देशभर में पहली तिमाही में मारे गए 291 तेंदुए, विदर्भ में आधे दर्जन से ज्यादा
संजय स्वदेश
नागपुर।
बाघ की खालों और अन्य सामग्री के अवैध व्यापार को रोकने के लिए देशभर में कड़ी सुरक्षा होने के बाद अब शिकारियों की खतरनाक नजर तेंदुए को लग गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल और हड्डियों की अच्छी खासी मांग है। पर्यावरण प्रेमी और वन्य अधिकारियों का अनुमान है कि हर साल देशभर में करीब 500 तेंदुओं का शिकार होता है। इसमें विदर्भ के जंगलों के तेंदुए भी शामिल हैं। वन विभाग के सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र के जंगल ही नहीं देशभर के जंगलों से तेंदुए उसी तरह से गायब हो रहे हैं, जिस तेजी से बाघ गायब हो रहे थे। लेकिन सरकार का पूरा ध्यान बाघों के संरक्षण पर है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि गत तीन वर्ष में देशभर में तेंदुओं की संख्या का आठवां हिस्सा शिकारियों का शिकार बन गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल की अपेक्षा उनकी हड्डियों की मांग ज्यादा है। खासकर चीन में यह मांग अधिक है। यहां इन हड्डियों का इस्तेमाल दवाएं बनाने में होता है। स्थानीय शिकारी तेंदुए की खाल के लिए करीब 20 से 35 हजार रुपये तक कीमत पाते हैं। बड़े शहरों में सौदा तय होने पर खाल की कीमत 50 हजार रुपये तक भी हो जाती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक लाख रुपये तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में करीब 8,000 तेंदुए हैं। देश में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा तेंदुओं की हड्डियों और खाल के अवैध व्यापार का मुख्य केंद्र माना जाता है।
वन विभाग सूत्रों का कहना है कि इस साल की पहली तिमाही में देश भर में करीब 291 तेंदुए मारे गए हैं। इसमें आधे दर्जन से भी ज्यादा संख्या के तेंदुए विदर्भ के जंगलों के हैं। वर्ष 2009 में 290 और 2008 में 157 तेंदुए मारे गए थे। गत पर जहां एक साल में 290 तेंदुए मारे गए थे, वहीं यह आंकड़ा इस वर्ष की पहली तिमाही में ही पूरी हो गई। मतलब साफ है कि हर दिन कम से कम तेंदुए शिकारियों के हाथ लग रहे हैं। यदि तेंदुए की शिकार की गति इसी तेजी से बढ़ती रही तो आने वाले पांच से सात वर्षों में भारत से तेंदुए की प्रजाति ही समाप्त हो सकती है। जानकारों का कहना है कि बाघों की गणना चलने से वन विभाग के अधिकारी खासे सक्रिय है। इसलिए शिकारियों ने तेंदुओं को शिकार बनाना शुरू कर दिया है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 के अुनसार वन क्षेत्र के किसी भी जीव का शिकार अपराध है। पर यह कानून संगठित वन्य जीवन अपराध को रोकने में नकाम साबित हो रहा है।

अब तेंदुए पर गड़ी शिकारियों की कातिल नजर/ दैनिक १८५७ में प्रकाशित

...तब लोहिया ने कहा था सुकरात के देश जा रहा हूं : के विक्रमराव


राममनोहर लोहिया जन्म शताब्दी महोत्सव वर्ष में 'अहिंसा और डा.राममनोहर लोहियाÓ पर व्याख्यान आयोजित

संजय स्वदेश
नागपुर।
वरिष्ठ पत्रकार व आईएफडब्लूजे के अध्यक्ष तथा श्रमजीवी पत्रकार वेतन बोर्ड, भारत सरकार के सदस्य के.विक्रमराव ने डा. राममनोहर लोहिया को हिंसा का प्रखर विरोधी बताते हुए कहा कि उन्होंने सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी हिंसा के खिलाफ आंदोलन किया। डा.लोहिया नेपाल के अहिंसा आंदोलन के जनक थे। उनका कहना था कि हिंसा के आधार पर देश को कभी एकजुट नहीं किया जा सकता। डा. राममनोहर लोहिया जन्म शताब्दी महोत्सव समिति की ओर से 'अहिंसा और डा.राममनोहर लोहियाÓ विषय पर लोहिया अध्ययन केंद्र के मधु लिमये स्मृति सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में विक्रमराव बोल रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता समिति के कार्याध्यक्ष सुरेश अग्रवाल ने की कोषाध्यक्ष हरीश अड्यालकर तथा महासचिव डा. ओमप्रकाश मिश्रा प्रमुखता से उपस्थित थे। विक्रमराव ने कहा कि गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोनल को डा. लोहिया ने सिविल नाफरनामी का नाम दिया। 'मानेंगे नहीं, मारेंगे नहींÓ यह लोहिया के जीवन का सिद्धांत था। डा. लोहिया ने अहिंसा का प्रचार सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अहिंसा का प्रचार किया। उन्होंने यह प्रयास किया कि भारत अमेरिका और रूस के हिंसात्मक विचारों से अलग वैश्विक स्तर पर एक तीसरा पक्ष बनाएं। डा. लोहिया हिंसा के इतने प्रखर विरोधी थे कि जब वह यूनान यात्रा के लिए जाने वाले थे तो किसी ने उनसे कहा कि डा. साहब, कहां सिकंदर के देश जा रहे हो, तो उन्होंने जवाब दिया कि नहीं सुकरात के देश जा रहे हैं। विक्रमराव ने कहा कि डा. लोहिया ने 1951 में ही पूर्वोत्तर की समस्या की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया था लेकिन सरकार ने इसे नजरअंदाज किया, जिससे पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में अलगाव की भावना बढ़ी। डा. लोहिया ने सवाल किया था, आखिर मणिपुर के लोग भारत से अलग क्यों होना चाहते है। मणिपुर के लोग धनुर्धारी अर्जुन की संतान हैं। मणिपुर में जाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। इसका विरोध करते हुए डा. लोहिया तीन बार मणिपुर गए। डा. लोहिया ने राज्य सत्ता की हिंसा का विरोध किया। केरल में समाजवादी पार्टी की पहली सरकार द्वारा गोलीबारी किए जाने पर डा. लोहिया ने मुख्यमंत्री पट्टमथानू पिल्ले को इस्तीफा देने के निर्देश दिए थे। 1961 के लोकसभा चुनाव के दौरान गोवा मुक्ति के लिए डा. लोहिया ने ही अहिंसक आंदोलन की शुरूआत की। विक्रमराव ने कहा कि डा. लोहिया पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने धर्म में हिंसा का विरोध किया। विक्रमराव ने बताया कि 2008 में हरियाणा में एक भी बालिका का जन्म नहीं हुआ। यदि आज डा. लोहिया होते तो वे ओमप्रकाश चौटाला के घर जाते और कन्या भ्रूण हत्या का विरोध करते। डा. लोहिया ने नारी पर पुरूष प्रधान समाज की हिंसा का सदैव विरोध किया। आज महिलाओं को संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का विरोध लोहिया के नाम पर राजनीति करने वाले त्रिमूर्ति हैं, जबकि उन्हें 50 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की जरूरत डा. लोहिया ने पर्सनल लॉ का विरोध करते एक पत्नी की वकालत की थी। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी के सभी उम्मीदवार हार गए। डा. लोहिया भी केवल 500 वोटों से जीते थे। डा. लोहिया ने धर्म की हिंसा तथा वर्णजाति व्यवस्था का विरोध किया था। डा. लोहिया का कहना था कि आज भारत वर्ष में भ्रष्टाचार अत्याचार बढ़ गए है, लोग गूंगे-बहरे हो गए हैं। अच्छे लोगों को बहरों की आवाज बननी होगी। विक्रमराव ने कहा कि अच्छे लोग, अच्छे तरीके से लड़े तो अहिंसा प्रधान समाज सुदृढ़ होगा।
सुरेश अग्रवाल ने कहा कि हिंसा की परिभाषा मारने तक ही सीमित नहीं है। समाज में व्याप्त डर भी एक तरह की हिंसा है। इसे सुप्त हिंसा कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि समाज में ऐसा देखने में आता है कि हत्यारा हत्या तो एक ही बार करता है, लेकिन उसका खौफ हमेशा के लिए लोगों के दिलों में बस जाता है। उन्होंने कहा कि यदि हम देश के अच्छे नागरिक हैं तो कमजोरों की लड़ाई में उनके साथ आना होगा। संचालन डा. ओमप्रकाश मिश्रा ने किया जबकी प्रास्ताविक तथा आभार हरीश अड्यालकर ने किया।

पाताल की ओर भागता पानी

धरती पर बूंद-बूंद के लिए जूझते लोग
नागपुर।
एक ओर भीषण गर्मी दूसरी और पेयजल का संकट। यह समस्या नागपुर के लोगों की दिनचर्या में शुमार होने लगी है। शहर हो या गांव, इस संकट से कोई अछूता नहीं रहा। गर्मी की शुरुआत में ही नागपुर और जिले के नदी-नाले और कुंए से लेकर हैंडपंप तक सभी सूख रहे हैं। कई जगह तो हैंडपंप से पानी तक नसीब नहीं हो रहा है। कुएं का जल स्तर नीचे सरकता जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे पानी पताल में चला गया है। ऐसे कुएं में झांकन से भी भय लगता है। इसके अलावा शहर में कई जगह अंधाधुंध मोटर से पानी के दोहन से भी भूजल स्तर नीचे जा रहा है। सरकारी पेयजल योजनाएं पहले से सुस्त चाल हैं और अब गंभीर संकट में बेकार साबित हो होने लगी हैं। पर्याप्त बजट होने के बाद भी समस्या जस-की-तस बनी हुई है। मानसून में जल संरक्षण की बात तो कागजों में ही होती है या फिर किसी कार्यशालाओं में चिंता व्यक्त करने के बाद भूला दी जाती है।
भू-जल हर साल नीचे जा रहा है। नगर के कई जगह तो ३० से ३५ मीटर तक कुएं का पानी चला गया है। सारी समस्या व्यवस्था दोष के कारण उत्पन्न हुई है। हालांकि मनपा और जिला परिषद गर्मी के पूर्व से ही जल संकट के निपटने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पर उनकी सारी योजाओं की हकीकत इस भीषण गर्मी से तार-तार हो चुकी है। मौजूदा जलाशयों की भी सफाई तक नहीं की जाती। नगर के कई क्षेत्रों में आलम यह है कि लोगों को पूरा दिन टैंकर के इंतजार में गुजर जाता है। इससे सबसे ज्यादा परेशान महिलाएं हैं। महिलाएं कहती हैं कि पानी की व्यवस्था करें या खाना पकायें।
उत्तर नागपुर में पेयजल संकट सबसे ज्यादा गंभीर दिख रही है। बीते सप्ताह तो पानी की समुचित आपूर्ति नहीं होने का गुस्सा फूट पडा। जरीपटका, कस्तूरबा नगर, सीएमपीडी क्वार्टर्स, साईबाबा नगर कॉलोनी, कपील नगर, सुगत नगर, बाबा गुरूदीप नगर, सहयोगनगर, संयाल नगर व कई उत्तरी इलाकों के कई लोगों ने त्रस्त होकर मनपा अधिकारियों के सामने रोष प्रगट किया। कस्तूरबा नगर में लोगों ने तो पानी के लिए हंगामा तक किया। कई दिनों से कई इलाकों में तो एक-आध घंटा ही पेयजल की आपूर्ति की जा रही हैं। ऐसे भी कई इलाके हैं जहां पर मनपा के नलों में १५ दिनों से एक बूंद पानी तक नहीं पहुंचा। वहीं नगर सेवक हाथ झटक कर पूरा आरोप मनपा के जलप्रदाय विभाग पर देते हैं। मनपा के जलप्रदाय विभाग के अभियंता जोन स्तर पर सटीक जवाब देते हैं कि हम क्या करें? वहीं दूसरी ओर मनपा के जल टैंकर भी नगर के कई कॉलोनियों की प्यास बूझाने में असफल हो रहे हैं। कई जगहों पर मनपा के टैंकर के पानी की भी कालाबाजारी हो रही है। नागरिक कुछ रूपये-दे कर अपने क्षेत्र में जल के टैंकर मंगवाने पर मजबूतर हो रहे हैं।

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रविवार, अप्रैल 18, 2010

जनता की अदालत में गडकरी का आरोपपत्र

महंगाई को लेकर संप्रग सरकार पर लगाए 14 आरोपमुंबई। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने महंगाई के मुद्दे पर केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार को जबर्दस्त ढंग से घरते हुए जनता का आरोपपत्र प्रस्तुत किया है। मुंबई में आयोजित एक पत्रकार परिषद में उन्होंने कहा कि केंद्र की संप्रग सरकार को एक वर्ष का समय पूर्ण हो रहा है। 100 दिन में महंगाई दूर करने का सरकार का दावा पूरी तरह फेल हो गया है। जीवनावश्यक चीजों के दाम 100 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। अनाज के गोदाम भरे होने के बाद भी गरीबों को जरूरी अनाज नहीं मिल पा रहा है। गडकरी ने केंद्र सरकार को सौंपे पत्र में कुल 14 आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि भारत में अनाज की कीमतें बढऩे से भूखे पेट रहने वालों की संख्या बढ़ रही है। गरीबों को अनाज देने में सरकार फेल हो गई है। सक्सेना कमेटी के अनुसार अभ भी 51 प्र.श. गरीबों के पास अभी भी बीपीएल अंत्योदय राशन कार्ड उपलब्ध नहीं है। जनता भूखी न रहे इसकी नैतिक जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सरकार इसमें असफल रही है। कई राज्यों की गरीबी रेखा के नीचे वाली जनता को इस हक से सरकार ने वंचित रखा और संविधान की धारा 21 का उल्लंघन किया। महंगाई केवल अक्षम्य लापरवाही के कारण बढ़ी। लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ गया। जनता को दिए गए आश्वासन जनता ने नहीं निभाकर संविधान की धारा 47 का उल्लंघन किया। सरकारी गोदाम भरे होने के बाद भी देश में महंगाई है। केंद्र ने इसे बाद भी बफर स्टाक को खुला क्यों नहीं किया? गोदामों में अनाज सड़ता रहा फिर भी जनता भूखी क्यों? संप्रग सरकार अन्न धान्य सुरक्षा कानून 2006 के अनुसार गरीबों को मूलभूत जरूरत अनाज देने में भी विफल रही। 80 लाख टन गेहूं के बोरे एफसीआई गोदामों में भरे पड़े हैं। एफसीआई भी मंडी व अन्य लोगों से गेहूं लेने में विफल रहा है। आरोप लगाया गया है कि प्रधानमंत्री के मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने जीवनावश्यक वस्तु कानून का अक्षम्य उल्लंघन किया है। इस कानून के अनुसार अनाज की कालाबाजारी करना अपराध है लेकिन केंद्र सरकार ने स्वयं ही आवश्यक अनाज की फ्यूचर फारवर्ड ट्रेडिंग करने के लिए कमोडिटी एक्सचेंज के जरिये अनुमति दी तथा अनाज को बेकार कर दिया। शक्कर तथा अन्य जरूरी चीजों को संग्रहित कर रखा तथा मूल्य वृद्धि कर व्यापारियों को भरपूर लाभ दिलाया। यह गैरजमानती अपराध है। कमोडिटी एक्सचेंज किसानों की बजाय अब व्यापारियों के हित में उपयोगी साबित हो रहा है। गडकरी ने आरोप लगाया कि संप्रग सरकार ने देश की जनता को विश्व बाजार की गलत जानकारी देकर जनता की आंखों में धूल झोंकी। वैश्विक दर भारतीय दर से आधी है। यह देश की जनता के साथ धोखाधड़ी है। भारत में 11 प्रतिशत से अधिक महंगाई का दर विश्व में सर्वाधिक है। चीन का जीडीपी दर 9.5 प्र.श. (भारत का 7.2 प्र.श.) होकर भी चीन में केवल 2 प्र.श. महंगाई है जबकि भारत में महंगाई दर 11 प्र.श. है। आरोप यह भी है कि केंद्र सरकार ने राज्य के संविधानात्मक निर्देशित तत्वों का उल्लंघन किया है। इसके अलावा आयात-निर्यात में गड़बड़ी कर देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की है। केंद्र सरकार की आयात-निर्यात नीति अपारदर्शी एवं गड़बड़ी पैदा करने वाली है। गडकरी ने का कि भारतीय संविधान के अनुसार जनता को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय मिलना जरूरी है लेकिन केंद्र सरकार इसमें पूरी तरह असफल साबित हुई है। कांग्रेस गरीबी हटाने की बजाय गरीबी को बढ़ा रही है। केंद्र सरकार पर ग्राहक संरक्षण कानून का अक्षम्य उल्लंघन करने का आरोप भी लगाया गया है। केंद्र की गलत आर्थिक नीतियों के कारण किसानों को उनकी कृषि उपज का कम मूल्य मिल रहा है तथा आम उपभोक्ता उसे दोगुने मूल्य पर खरीद रहा है। संप्रग सरकार गरीबों का नहीं बल्कि मध्यस्थों का, अमीरों का, शक्कर सम्राटों की है।
गडकरी ने कहा कि वे जनता का यह आरोपपत्र जनता के न्यायालय में ही प्रस्तुत कर रहे हैं और जनता के सामने लापरवाही केंद्र सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने का आह्ïवान कर रहे हैं।

चढ़ता परा, घटती बिजली

जर्जर ट्रॉसमिशन लाइन के फॉल्ट, चोरी और लोडशेडिंग के बीच नागपुर समेत पूरे विदर्भ में बिजली को लेकर हाहाकार मची हुई है। चढ़ते पारे के साथ कम होती बिजली की आपूर्ति आम नागरिक परेशान है। वहीं विद्युत विभाग के अधिकारी तरह-तरह का रोना रोकर जनता के दर्द से मुख मोड़ रहे हैं।

भीषण गर्मी में बिजली हब क्षेत्र में बिजली की कटौती से परेशान नागरिक
संजय
नागपुर।
संतरानगरी में चढ़ते पारे के साथ बिजली कटौती की समस्या बेहद गंभीर हो गई है। गर्मी के शबाब चढ़ते ही मांग बढ़ गई है। पर विद्युत विभाग इस मांग को पूरी करने में लाचार हो चुका है। राजनीतिक लाभ के लिए नागपुर में दो बार जीरो लोडशेडिंग की घोषणा के बाद भी खुलेआम वादा खिलाफी हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत और भी गंभीर है। आश्चर्य की बात यह है कि बिजली उत्पादन की दृष्टि से विदर्भ बिजली हब क्षेत्र है।
यहां की बिजली राज्य के दूसरे शहर के अलावा पड़ोसी राज्यों के शहर को रौशन करती है। लेकिन अपने ही उपराजधानी को अंधरे में रखती है। शहर में तो फिर भी स्थिति कुछ हद तक नियंत्रण में है, पर गांवों के तो हाल यह है कि लोग कई बार दिन में बिजली के दर्शन के लिए तरस जाते हैं।
गत दिनों में नागपुर में एक कार्यक्रम में शिरकत करने आए बिजली केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने तो विदर्भ में बिजली की और परियोजनाओं को शुरू कराने की घोषणा के साथ ही इस क्षेत्र को देश का सबसे बड़ा बिजली हब बनाने का घोषणा कर दी थी। लेकिन पहले से ही महत्वपूर्ण बिजली उत्पदन के सयंत्र नागपुर समेत बिजली में बिजली की मांग की आपूर्ति करने में अक्षम साबित हो रहे हैं। ऊपर से बिजली की दरों में बढ़ोतरी और तेज भागते मीटर से घर मालिकों को तनाव में डाल दिया है।
आंकड़ों कहते हैैं कि गत 15 वर्ष से राज की हर सरकार ने बिजली की सुचारु आपूर्ति के लिए गंभीरता दिखाई है, लेकिन यह गंभीरता केवल घोषणाओं तक ही सीमित रही।
विद्युत विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि नागपुर और आसपास के विद्युत संयंत्रों के भरोसे भरपूर बिजली की अपेक्षा की जा रही है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे उम्रदराजों से जवानी की उम्मीद की जाती है।
महाराष्ट्र राज्य विद्युत निर्मिती कंपनी के प्रदेश में 7 ताप बिजलीघर, 1 जल विद्युत संयंत्र तथा 1 गैस आधारित संयंत्र यानी कुल 9 विद्युत संयंत्र हैं। इनकी 61 इकाइयों में 35 इकाइयां अपनी पूरी आयु जी चुकीं हैं जबकि 11 इकाइयां जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं, शेष में से नई बनी परली व पारस की एक-एक इकाई का शैशवकाल मान लें तो बाकि 11 यूनिटें अपनी जवानी बिता कर प्रौढ़ अवस्था को पा चुकीं हैं। नई इकाइयां भी 'टीथिंग प्राब्लमÓ से जूझ रही हैं।
इसके अलावा विद्युत कटौती के पीछे विद्युत ह्रïास का हाथ मानने वाली वितरण कंपनी व्यवसायिक हानी को रोकने इतनी परेशान है कि वह तकनीकी हानि को भूल ही चुकी है। जानकार कहते हैं कि विद्युत ह्रïास के लिए जितनी जिम्मेदार व्यवसायिक हानि है, करीब उतनी ही तकनीकी हानि भी। आज यदि प्रदेश की कुल हानि 24 प्रतिशत है तो इसमें से करीब 10 प्रतिशत विद्युत सिस्टम के पुराने व रखरखाव में होने वाली लापरवाही के कारण है। मतलब बिजली चोरी को पकडऩे के अपेक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है, असंतुलित विद्युत वितरण को सुधारने की है। पर कंपनी के आला अधिकारी पूरा जोर बिजली की चोरी पर लगा रखा है। फिर चाहे अधीक्षक अभियंता हो या लाइनमैन, सभी विद्युत चोरी पकडऩे के लिए गली-गली घूम रहे हैं। कभी-कभी तो कंपनी के आला अधिकारी भी मैदान में उतर जाते हैं जिससे कि विद्युत चोरी पकडऩे में कर्मचारियों का हौसला बढ़े। इस कारण विभाग का पूरा ध्यान तकनीकी खराबियों से हटा हुआ है। लिहाजा, आए दिन किसी न किसी बड़ी तकनीकी खराबी के कारण घंटे बिजली गुल होने की शिकायत आती है।
सरकार व बिजली कंपनियां विद्युत की कमी का रोना रो-रो कर जनता को लोडशेडिंग में मार रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी महकमों में बगैर आवश्यकता कूलर एसी व बत्तियों का जलना, विज्ञापन होर्डिंग्स पर नियोन हाई मास्ट लाइट, स्ट्रीट लाइटों का बे-समय जलना आदि अनेक लापरवाहियों के चलते कम से कम 500 मेगावाट बिजली बर्बाद हो रही है। अनुमान है कि अकेले सरकारी कार्यालयों में ही 150 मेगावाट बिजली की फिजूलखर्ची हो रही है। यदि सरकारी दफ्तर में एक एयर कंडीशनर की जगह कूलर चले तो एक गरीब किसान अपने खेत को सूखने से बचा सकता है।
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पास नहीं पैसे आग बुझाये कैसे


दैनिक 1857 में 18 अप्रैल 2010 को प्रकाशित
आधारभूत ढांचा के लिए नागपुर को 1500 करोड़ : जयपाल रेड्डी
नागपुर। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा है कि नागपुर शहर में आधारभूत ढांचा के विकास के लिए केंद्र सरकार की ओर से 1504.18 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी गई है। इस योजना के तहत शहर में पेयजल और खराब पानी के ट्रीटमेंट पर खर्च किया जाएगा।
वर्धा रोड स्थित होटल प्राइड में पत्रकारों से बातचीत में रेड्डी ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहर नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के लिए देशभर के 63 शहरों को चुना गया है। उसमें से नागपुर का भी नाम है। इस मिशन के तहत इस योजना को मंजूरी दी गई है। उन्होंने बताया कि नागपुर में आधारभूत ढांचा विकास के लिए 1504.18 रुपये की परियोजना में 50 प्रतिशत केंद्र सरकार की हिस्सेदारी रहेगी। 20 प्रतिशत राज्य सरकार का सहयोग रहेगा और 30 प्रतिशत की राशि यानि 451.25 करोड़ रुपया शहरी क्षेत्र की स्थानीय निकाय यानी महानगर पालिका उपलब्ध कराएगी। फिलहाल इस योजना के तहत नागपुर में अभी तक 394.40 करोड़ रुपया खर्च हो चुका है, जिसमें केंद्र सरकार ने नागपुर के लिए 211.57 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध कराया है। राज्य सरकार ने 63.48 प्रतिशत और स्थानीय निकाय ने 119.34 करोड़ रुपये उपलब्ध कराया है। इस राशि से अब तक पाइल लाईन में रिसाव को रोकने, ऊर्जा लेखा परीक्षण, जलापूर्ति माध्यमों की उन्नतिकरण और नेटवर्क में विस्तार आदि कार्यों पर खर्च किया जा चुका है। नागपुर की पानी की बढ़ी हुई दरों के सवाल पर रेड्डी ने कहा कि पानी के बिल इस पर निर्भर करते हैं कि उसका मेंटेनेंस और आपूर्ति का खर्च किस तरह हो रहा है।
बस दे दिया, पर चलेगी कहां?
रेड्डी ने बताया कि जेएनएनयूआरएम के तहत नागपुर में सार्वजनिक यातायात को सुलभ कराने के लिए केंद्र सरकार ने मनपा को 300 अतिरिक्त उन्नत किश्म की स्टार बस खरीदने के लिए 15.90 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन नागपुर में न बस डिपो है, न ही पार्किंग की पर्याप्त सुविधा है। यहां तक कि इतनी बसें चलाने के लिए पर्याप्त सड़कें भी नहीं हैं। यदि यहां 300 अतिरिक्त बसें चलेंगी तो नागपुर का सार्वजनिक यातायात काफी सहज हो जाएगा। रेड्डी ने बताया कि जेएनएनयूआरएम के तहत जितनी भी योजनाएं मंजूर की गई थीं, उन सभी के कार्य चल रहे हैं। 2012 तक इन योजनाओं को पूरा कर लेने का लक्ष्य है। फिलहाल उनके पास कोई भी योजना लंबित नहीं है।
संतरानगरी में मेट्रो का प्रस्ताव नहीं
नागपुर में मेट्रो रेल चलाने के प्रस्ताव पर पूछे गए एक सवाल पर रेड्डी ने कहा कि न स्थानीय निकाय से और न ही राज्य सरकार से इस तरह का कोई भी प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास आया है। मेट्रो योजना बहुत खर्चीली है। औसतन एक किलोमीटर के मेट्रो परियोजना पर करीब 200 करोड़ रुपये की लागत आती है। यदि इस तरह का प्रस्ताव उनके पास आता भी है तो दिल्ली मेट्रो की कंसल्टिंग टीम इस पर विचार करेगी कि प्रस्तावित योजना कितनी सक्षम है।
दुनिया की आधी आबादी शहर में
रेड्डी ने बताया कि अब देश-दुनिया के शहर वैश्विक रूप से विकास कर रहे हैं। इसीलिए चार वर्ष पूर्व सात वर्ष की जेएनएनयूआरएम को शुरू किया गया। उन्होंने बताया कि आज भी दुनिया की 50 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है। भारत में शहरों में रहने वाली आबादी का प्रतिशत 30 है। भारतीय शहरों पर जनसंख्या का दवाब बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में शहरी आधारभूत ढांचा का विकास आवश्यक है। इसमें सबसे ज्यादा पेजयल, यातायात और आवास व्यवस्था पर ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नागपुर में स्लम इलाके में रहने वाले लोगों के लिए 17 हजार घर बनाने का जो प्रस्ताव था, उसके लिए निधि उपलब्ध करा दी गई है।
हर घर में शौचालय का निर्माण
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से भारत में शौचालय से ज्यादा मोबाइल होने संबंधित रिपोर्ट पर रेड्डी ने कहा कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में शौचालय की समस्या गंभीर है। इससे महिलाओं को काफी परेशानी होती है। इसका असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। केंद्र सरकार इस ओर ध्यान दे रही है। शहरी क्षेत्र में स्लम इलाके में रहने वाले लोगों के लिए बनाये जाने वाले हर मकान में शौचालय का निर्माण किया जा रहा है।
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शनिवार, अप्रैल 17, 2010

नागपुर के लोगों को भी खूब लूट रही है निजी बीमा कंपनियां


सेबी के आपत्ति से यूलिप बीमा बेचना हुआ मुश्किल/ इस माह एजेंटों के लक्ष्य पूरे होने के आसार नहीं
नागपुर। निजी बीमा कंपनियों से यूनिट लिंक्ड बीमा पॉलिसी (यूलिप) के खरीदारों के मन में भय है। पता नहीं उनके पैसे का क्या होगा। गत दिनों सेबी ने निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों ने यूलिप आधारित बीमा बेचने पर सवाल खड़ा किया था। इसी कारण ग्राहकों के बीच घबड़ाहट बढ़ी है। नागपुर में यूलिप बीमा खरीदने वाले अनेक लोगों ने बताया कि पहले तो एजेंटों ने साधारण बीमा की तुलना में तीन-चार गुना ज्यादा कवरेज देने का लालच दिया। तब मन में यह ख्याल ही नहीं आया कि बीमा कंपनियों के ऐसे यूलिप पर सेबी का नियंत्रण ही नहीं है। बिरला सन लाईफ के एक एजेंट दीपक लाड ने बताया कि अभी हर सप्ताह वे दो-से तीन यूलिप बेच लेते थे। लेकिन सेबी के उठाये सवाल के कारण कोई ग्राहक अभी किसी तरह से यूलिप बीमा खरीदने के लिए राजी नहीं हो रहा है। पता नहीं इस माह का लक्ष्य कैसे पूरा होगा। कुछ ऐसा ही कहना है आईसीआईसीआई प्रॉड्यूसियल की शोभा का। शोभा ने बताया कि कुछ दिन पूर्व टेलिविजन पर भी कंपनियां यूलिप बीमा बेचने के लिए खूब प्रचार-प्रसार कर ही थी। यहां तक इंटनेट पर भी तरह-तरह के विज्ञापन आ रहा था। टी.वी. पर यह विज्ञापन मुश्किल पिछले कुछ दिनों से नजर नहीं आ रहा है। संभावना है कि जैसे ही सेबी इसे हरी झंडी दे देगा। हमार काम और बढ़ जाएगा।
जानकारों का कहना है बीमा क्षेत्र की निजी कंपनियों ने भी एलआईसी की तरह ही अपने एजेंटों को निर्धारित सीमा से ज्यादा कमीशन देने का लालच देकर अपने व्यवसाय का दायरा बढ़ाया है। वहीं यूलिप बेचने वाली बीमा कंपनियां पहले प्रीमियम का 65 फीसदी हिस्सा खर्चे के तौर पर काट लेती है। तीन साल के तक बीमा चलाने के लिए बाध्य करती है। इसी बीच बंद करने पर मूलधन से ज्यादा रकम काटने की नियम शर्तें बताती है। लेकिन तीन से पांच वर्षों में ही बीमा कंपनियों ने यूलिप कारोबार को छोटे-छोटे शहरों तक बढ़ाया है।
मोतीलाल ओसवाल के एक कर्मचारी अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि यूलिप बेचने में कई ऐसे मुद्दे हैं जो सीधे तौर पर कॉरपोरेट गवर्नेस के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। सेबी ने भी प्रतिबंध लागू करते समय 11 पन्नों का जो ऑर्डर जारी किया था उसमें परोक्ष तौर पर यूलिप बेचने के बीमा कंपनियों के तौर-तरीके के बारे में सवाल उठाए गए थे। दरअसल, कुछ दिन पहले ही इरडा ने बीमा कंपनियों से संबंधित एक आंकड़ा जारी किया है जिससे यह साबित होता है कि ग्राहकों के दावों को खारिज करने में भी निजी बीमा कंपनियां का रिकॉर्ड काफी खराब है। सरकारी क्षेत्र की भारतीय जीवन बीमा निगम ने जहां केवल 1.43 फीसदी दावों का भुगतान करने से मना किया है, वहीं निजी बीमा कंपनियां का औसत 13.98 फीसदी है। कुछ निजी जीवन बीमा कंपनियों ने तो 21 फीसदी या इससे भी ज्यादा दावों का भुगतान करने से मना किया है। बिरला सन लाइफ के एजेंट संदीप सिसोदिया ने बताया कि जब लोग बीमा खरीदते हैं तक संकोच वश कई जानकारी झूठी देते हैं। जैसे पूछा जाता है कि वे शराब कितना पीते हैं। शराब पीने वाले झूठ बोल देते हैं कि वे नहीं पीते। बाद में जब उनकी मृत्यु के बाद क्लेम आती है तो मेडिकल रिपोर्ट से पता चलता है कि वह ग्राहक शराब का आदि था।
वहीं यूलिप बीमा खरीदने वाले एक कंपनी की एचआर प्रबंधक कंचन उपाध्याय ने बताया कि बीमा कंपनियां पूरी पारदर्शिता नहीं बरत रही। जब एजेंट बीमा बेचते हैं तब तरह-तरह के सपने दिखाते है। तब लोगों को लगता है कि उनका पैसा सबसे ज्यादा उनके यहां ही बढ़ेगा। लेकिन बाद में धीरे-धीरे उनकी कमियों के बारे में पता चलता है कि पहले तीन वर्ष में तो कंपनियों ने तरह-तरह के सर्विज चार्ज के रूप में एक अच्छी खासी रकम काट लिया और धन कुछ संतोषजनक ढंग से नहीं बढ़ा।
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नागपुर प्रॉपर्टी बाजार में जबरदस्त उछाल

वर्धा रोड अजनी में एमएसएमसी ने खरीदी 17.26 करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी
मुख्य संवाददाता
नागपुर।
लंबे समय बाद नागपुर की रियलिटी क्षेत्र में फिर से जबरदस्त उछाल के संकेत मिले हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गत दिनों वर्धा रोड पर हुए एक बड़ी प्रॉपटी की डील से मिला। वर्धा रोड स्थित अजीत बेकरी के पास हुए एक प्रॉपर्टी की 17.26 करोड़ रुपये की डील शहर के प्रतिष्ठित बिल्डर प्रफुल्ल गाडग़े और राज्य सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की उपक्रम महाराष्ट्र राज्य खनन निगम (एमएसएमसी) के बीच हुई।
इस पूरे सौदे में पूरी पारदर्शिता रही। रियलिटी क्षेत्र के लिए यह एक अत्यंत ही शुभ और उत्साहवर्धक संकेत है। कहा जाता रहा है कि इस व्यवसाय में काले धन का लेन-देन होता है। किंतु प्रफुल्ल गाडगे और एमएसएमसी के बीच सौदे ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। एमएसएमसी तो सरकारी संस्थान है, परंतु प्रफुल्ल गाडगे ने रास्ता दिखा दिया कि व्यवसाय भी साफ सुथरे ढंग से किया जा सकता है। जिस भवन को एमएसएमसी ने प्रफुल्ल गाडग़े से खरीदा है, वह पहले संचिता क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी का था, जिसे आर्य इन्वेसमेंट ने गत तीन साल पहले 4.80 करोड़ रुपये में खरीदा था। बाद में इस प्रॉपर्टी का सौदा 6 करोड़ रुपये में हुआ। निश्चय ही इस सौदे ने नागपुर के प्रॉपर्टी बाजार में आई तेजी को साबित किया है। जब गाडगे ने इस खरीदा था, तब मंदी का दौर था। इस भवन में दो मंजिलें हैं। कुल क्षेत्रफल 17,000 वर्ग फीट है। फिलहाल इसमें 2000 वर्ग फीट पर ही निर्माण कार्य हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रॉपर्टी के इस बड़े सौदे से राज्य सरकार को 94.93 लाख रुपये रजिस्ट्री शुल्क के रूप में प्राप्त हुए।
एमएसएमसी के मार्केटिंग निदेशक ने इस डील की पुष्टि करते हुए बताया कि अगले महीने में एमएसएमसी का कार्यालय यहां आ जाएगा। गत तीन वर्ष से निगम खनन क्षेत्र से मुनाफा कमा रही है। इसी अतिरिक्त आय से इस प्रॉपटी को खरीदा गया है। उन्होंने बताया कि कोयला मंत्रालय ने एमएसएमसी को चार नये कोल माइन का आबंटन किया है। वरोरा स्थित कोल माइन के लिए निगम ने गुप्ता कोल फील्ड्स से साथ समझौता किया है। यहां तमिलनाडु की एक कंपनी ऊर्जा उत्पादन का कार्य करेगी, जिसे राज्य सरकार का कोल विभाग भी सहयोग कर रहा है। इसमें जेवीसी और एमएसएमसी के पास 51 प्रतिशत का शेयर है। जबकि कंपनी के पास 49 प्रतिशत शेयर की हिस्सेदारी है। वरोरा कोल ब्लॉक को कोयला, सीमेंट और स्टील यूनिट्स की आपूर्ति के लिए स्वीकृत किया जा चुका है। वहीं अदकोली ब्लॉक को व्यावसायिक उपयोग के लिए स्वीकृति मिली है।
ज्ञात हो कि फिलहाल एमएसएमसी का कार्यालय सिविल लाइन्स स्थित उद्योग भवन में है। यह कार्यालय कुल 3500 वर्ग फीट की जगह में है। हाल ही में विभाग ने अपने 70 प्रतिशत रिक्त पदों को भरा है। इससे यह कार्यालय बहुत छोटा पड़ रहा है। एमएसएमसी के प्रमुख डा. अविनाश वारजुरकर ने बताया कि जेवीसीस-एमएसएमसी वरोरा कोल फिल्ड्स लिमिटेड, एमएसएमसी-कदकोली कोल फिल्ड्स लिमिटेड और महा-तमिल जेवीसी का दफ्तर अजनी के इस नये कार्यालय परिसर में खुलेगा।
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शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010


कल कहीं मायूस भालू न मर जाए

संजय स्वदेश
कभी नागपुर का 'मिनी चिडिय़ाघरÓ महाराजबाग को देखने की ललक लिए दूर-दराज के लोग आते थे। यहां चार दशक की उम्र पार कर चुके लोग कहते हैं, नागपुर में पहली बार आने वाले हर किसी के मन में महाराजबाग जाने की ललक होती थी। जमाना बदला, तो ललक कम हो गई। किसे फुर्सत है, पिंजड़े में कैद वन्य जीवों को निहारने की। धीरे-धीरे यहां के वन्य जीव भी कम होने लगे, तो लोगों में इसके प्रति आकर्षण कम हो गया। लेकिन अभी भी इतवार और अन्य छुट्टियों के दिन लोग बच्चों को यहां लेकर आते हैं। शहर की आबादी बढऩे से प्रेमी युगलों के लिए यह जगह डेटिंग के लिए अच्छी लगी। अब महाराजबाग प्रशासन ने यहां प्रवेश लिए निजी हाथों में टिकट का ठेका दे दिया है। इससे हर वर्ष महाराजबाग को ठेके से मोटी कमाई हो जाती है। ठेकेदार प्रेमी युगलों से दोगुने दाम में टिकट बेचकर मुनाफा कमाते हैं। पर यहां आने वाले वयस्क बच्चों बच्चों को वन्य जीवों को दिखाते हुए शायद की उनकी आंखों में झांक कर उसकी पीड़ा समझने की कोशिश करते होंगे। फिलहाल, विदर्भ सूखे के साथ भीषण गर्मी की चपेट में है। दिल्ली में 40 डिग्री तापमान से बेहाली की खबर देश देखता है। ऐसी गर्मी को सहन करने वाले और अनुमान करने वाले जरा यह सोचे की 45 डिग्री के तापमान में क्या होता होगा। आग बरसाते आसमान ने गत तीन दिनों में ही महाराज बाग के तीन वन्य जीवों को मौत के मुंह में सुला दिया।
सतही स्तर पर इसकी खबरें तो यहां के समाचारपत्रों की सुर्खियां बनीं। पर हकीकत यह है एक मंत्री की गलती से यहां की पूरी व्यवस्था ठप्प हो गई। खबरिया चैनलों को देखने वालों को याद होगा कि गत वर्ष नागपुर में एक मंत्री ने जिद में आकर महाराजब बाग के बाघ के पिंजरे में अपने सुरक्षाकर्मी और प्रेस के साथ घुस गए। बाघ को पुचकार कर वाहवाही लूटी। 'बाघ बहादुर मंत्रीÓ शीर्षक से सुर्खियों में आई यह खबर मंत्री के लिए गले की हड्डी बन गई। लिहाजा मामले की लिपापोती के लिए यहां के प्रभारी डा. सुनील बावस्कर को अकोला हस्तांरण कर दिया गया। अकोला के प्रभारी को यहां भेज दिया गया। लेकिन पूर्व प्रभारी डा. सुनील बावस्कर कोर्ट की शरण में चले गए। कोर्ट ने स्थांतरण पर तत्काल रोक लगा दी। मामला लंबित है। पर असल में इससे महाराजबाग की सुचारु रूप से चल रही व्यवस्था लंबित पड़ गई। एक ही जगह दो-दो प्रभारी ड्यूटी पर। प्रभारी पद को लेकर अंदरूनी विवाद इतना गंभीर हो गया है कि यहां के प्राणी भीषण गर्मी में राम भरोसे हो गए हैं। इनकी हालत देखकर लगता है कि अब इनका कोई मां-बाप नहीं रहा। इसी सब का परिणाम यह निकला कि पिछले सप्ताह यहां इलाज के लिए लाया गया राष्ट्रीय पशु मोर ने भी दम तो दिया। मोर के मरने की गम अभी महाराज बाग भूला भी नहीं पाया था कि गुरुवार को एक और मोर और एक हिरण भीषण गर्मी को सहन नहीं कर पाये। गुरुवार की शाम छह बजे जहां एक मोर ने दम तोड़ा, वहीं रात करीब आठ बजे एक हिरण ने दम तोड़ दिया। सुबह 11 बजे मृत हिरण और मोर को पशु चिकित्सा अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। मोर करीब एक वर्ष का था। इसकी आयु 5 वर्ष की मानी जाती है। वहीं हिरण की आयु 6 से 7 वर्ष की बताई जा रही है, जिसकी औसत आयु 15 से 20 वर्ष की होती है।
मोर और हिरण की मौत होने की खबर महाराजबाग के अधिकारियों को मिलते ही वे सुबह वहां निरीक्षण के लिए पहुंचे। निरीक्षण की औपचारिक भर था। दो मृत्य वन्य जीव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। घास पर चलने वाले हिरण, सांभर और चितल यहां पत्थरिले जमीन पर कुलांचे मारते हैं। हर पिंजड़ा गंदा है। 45 डिग्री की के तापमान में जब सभी पशु बचैन होकर छाये में खड़े दिखते हैं, तो वहीं भालू पिजड़े के लोहे से सिर टिकाये दिखा। ऐसा लगता है कि वह यहां से आजाद होने के सपने में इतना मशगूल है कि आसमान से बरस रहे आग की परवाह ही नहीं है। निश्चय ही वह बीमार होगा। शायद आने वाले दिनों में ऐसी भी गर्मी पड़ी और प्रशासन लापरवाह रहा तो, वह भी भगवान को प्यारा हो जाएगा। पर इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है। दो-दशकों से गांव में मदारी कोई भालू लेकर नहीं आता है। इसलिए इन दो दशकों में बड़ी हुई पीढ़ी भालू के प्रति लागव कैसे रखेगा। आज कौन रामायण पढ़ता है जो श्रीराम की सेना में भालू की प्रजाति 'जामुवंतÓ की महत्ता समझे।
'वनराजÓ बाघ पिंजड़े में कूलर लगा है। पर दोपहर के समय वे भीषण गर्मी में वे छोटे पिंजड़े से निकल कर बड़े पिजड़े के परिसर में घुमते हैं। बेचैनी से इधर-अधर भटकते हैं। पता चला कि बाघ के पिजड़े में रखे कूलर में पानी ही नहीं डाला जाता है। फिर कूलर से ठंडी हवा कहां से आएगी। वनराज समझते होंगे कि इस कूलर निकलती लू से बाहर की गर्मी अच्छी।
सरकार को तनिक भी इस बात का ख्यान नहीं है कि पिछली बार मंत्री की एक भूल ने यहां की पूरी व्यवस्था को लचर कर दी। दो-दो प्रभारी आ जाने से यहां की कर्मचारियों की तो चांदी हो गई है। वे किसी की सुनें। कौन-असली और प्रभावी प्रभारी है, इसको लेकर दोनों प्रभारी दुविधा में है। इसलिए वे भी सुस्त पड़ गए हैं। इसका सीधा असर यहां की व्यवस्था पर पड़ है। एक तो महाराज बाग पहले से ही कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है, उपर से प्रभारी पद के झगड़े से पशुओं की देखरेख की व्यवस्था पूरी तरह से बदहाल हो चुकी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार महाराज बाग में करीब 80 वन्य जीव हैं। इनकी देखरेख के लिए 20 कर्मचारियों का पद है। फिलहाल 10 कर्मचारी ही कार्यरत हैं। प्रभारियों के झगड़े के कारण यहां के अन्य कर्मचारी भी खूब आराम फरमा रहे हैं। पशुओं के वाड़े में रखा पानी कई दिनों तक बदला नहीं जाता है। धूप के कारण वाडे का पानी भी उबल जाता है। इससे प्यासे जीव प्यासे ही रह जाते हैं। यहां के वन्य जीवों की बेचैनी का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे की कोई चीतल, सांभर और हिरण के वाडे के पास आता है, वे दौड़ के इस उत्सुकता से आते हैं कि कोई उन्हें कुछ खिला दे। पर कोई चिडिय़ा घर में इन्हें खिलाने के लिए कुछ लेकर तो नहीं आता है। संयोग से मेरी जेब में भुने हुए चन्ने का छोटा सा पॉकेट था। जैसे ही चने का पॉकेट हाथ में लिया। पांच-छह चीतल और हिरण यह समझ गए कि वह खाने की चीज है। पिजड़े के छोटे तारों से मुंह का छोटा-हिस्सा बाहर निकाल दिया। मुश्किल से ही सही मेरी हथेली को स्पर्श करते हुए उनके जीभ ने दो-चार दाने अपने मुंह में खींच लिये। यह देख चीतल, सांभर और हिरण का पूरा झुड़ मेरी ओर बड़ा। पर उन सबके पेट भरने भर के लिए चने कहा थे। पूरे चन्ने उनके वाड़े में फेंक दिया। सभी लपके। मिनट भर में चन्ने चट कर गए। फिर उत्सुकता से खड़े होकर हमें निहारने लगे। भले ही ये चीतल, सांभर और हिरण हमारी भाषा नहीं बोलते हों, पर दो-चार चने के दाने खाने वाले हिरणों ने अपने कृतज्ञता भरे आंखों की भाषा से हमें एहसास करा दिया कि यहां वे भूखे रहते हैं। भूखे पेट से शरीर जल्दी गर्मी की चपेट में आता है। यह लिखते वक्त बार-बार उन व्याकुल हिरणों की आंखे मेरी आंखों के सामने आ रहा है। मन में डर लग रहा है कहीं कल कोई दूसरा हिरण या वह मायूस भालू न मर जाए।
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गुरुवार, अप्रैल 15, 2010

सोच और जीवन शैली अमेरिकी पर दिल हिंदुस्तानी : चटवाल


भव्य समारोह में हुआ पद्म भूषण संत सिंह चटवाल का सत्कार
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संजय
नागपुर।
रामदासपेठ स्थित होटल सेंटर प्वाईंट में आयोजित एक समारोह में राज्यसभा सदस्य और लोकमत समाचार समूह के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक विजय दर्डा की ओर से विलियम जे. क्लिंटन फाउंडेशन के विश्वस्त और इंडियन-अमेरिकन फॉर डेमोके्रट्स के अध्यक्ष पद्मभूषण संत सिंह चटवाल का सत्कार किया गया। दर्डा ने उन्हें कृपाल एवं सरोपा भेंट दिया। इस मौके पर केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशीलकुमार शिंदे, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री व केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री विलासराव देशमुख, केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल, राज्य के सामाजिक कल्याण मंत्री व नागपुर के पालक मंत्री शिवाजीराव मोघे, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री अनिल देशमुख, दुग्धमंत्री नितिन राऊत,पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद विलासराव मुत्तेमवार, मनपा महापौर अर्चना डेहनकर, पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित, वीडियोकॉन समूह के प्रमुख वी.एन. धूत, मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड के कार्यकारी उप प्रमुख संदीप जाजोडिया, अभिजीत गु्रप के प्रमुख मनोज जयस्वाल, इमटा गु्रप ऑफ कंपनीज के सीएमडी उज्ज्वल उपाध्याय प्रमुख रूप से उपस्थित थे।
सत्कार के उत्तर में संत सिंह चटवाल ने कहा कि उनकी जीवन-शैली भले ही अमेरिकी हो गई हो, लेकिन उनका दिल अभी भी हिंदुस्तानी है। भारत और अमेरिकी के बीच संबंधों की एक गहरी खाई थी। मोरारजी देसाई के कार्यकाल में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने भारत यात्रा की थी। उसके 23 वर्ष बाद ही विल क्लिंटन भारत यात्रा पर आए। इस लंबी खाई के बाद ही पहला मौका आया जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरिकी के ह्वाईट हाऊस में रात्रि भोज पर आमंत्रित किया गया। यह आयोजन इतना भव्य था कि इसमें करीब 700 लोगों ने हिस्सा लिया था। चटवाल ने कहा कि इस बार भारत आने पर वे गोंदिया गए। गोंदिया जाकर यह पहली बार पता चला कि यहां भी अमेरिकी स्तर के तकनीकि शिक्षण संस्थान हैं। उन्होंने कहा कि यहां आकर नागपुर के लोगों का बहुत प्यार मिला।
नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि चटवाल का नागपुर में प्यार और स्नेह भरा सम्मान देखकर काफी खुशी हो रही है। अमेरिकी और भारत के साथ जो संबंध सुधरे में हैं, उसमें चटवाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संबंधों को सुधारने में चटवाल ने अनौपचारिक चैनल के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री विलासराव देशमुख ने कहा कि विजय दर्डा की यह विशेषता रही है कि वे जब भी किसी अजीज दोस्त का सम्मान करते हैं, तो सभी दोस्तों को याद करते हैं। भारत में जिस संत सिंह चटवाल का सम्मान राष्ट्रपति ने किया उनका सम्मान यहां हो रहा है। संत चटवाल के सत्कार से देश का गौरव बढ़ा है। वर्षों पहले भले ही चटवाल अमेरिका चले गए, लेकिन वे अपने देश को नहीं भूले। अमेरिका जैसे देश में अपनी उपलब्धियों के माध्यम से चटवाल ने भारत का गौरव बढ़ाया है। देशमुख ने कहा कि महाराष्ट्र को संतों का प्रांत भी कहा जाता है। यह महाराष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यहां 'संतÓ चटवाल का सम्मान हो रहा है।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि सत्कार में विदर्भ के अलावा पश्चिम महाराष्ट्र और मराठवाडा के भी लोग उपस्थित हैं। एक तरह से चटवाल के सत्कार के लिए पूरा महाराष्ट्र विदर्भ की भूमि पर इक्ट्ठा हो गया है। शिंदे ने कहा कि कार्यक्रम में उपस्थित अनेक लोग 'जीरो क्लबÓ के सदस्य हंै। जिन्होंने जब अपने जीवन की शुरूआत की तो उनके मुठ्ठी में कुछ भी नहीं था और आज पूरी दुनिया को कुछ न कुछ दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका जाने पर हर राजदूत ने कहा कि संत सिंह चटवाल भारत और अमेरिकी संबंधों में मदद करते रहे हैं। भारत-अमेरिका परमाणु करार में अमेरिकी के कई सिनेट लॉबी विरोध में थी। लेकिन चटवाल ने कई लॉबी को पकड़ा और उनका रुख भारत के लिए सकारात्मक किया। उन्हें समझाया कि भारत एक उभरता हुआ मजबूत देश है। आईटी के क्षेत्र में भारत तेजी से आगे निकल रहा है। कहीं ऐसा न हो जाए कि भारत किसी और देश के साथ हो जाए। अमेरिका इसे अभी न छोड़े नहीं तो उन्हें बाद में पछताना पड़ेगा। सत्कार समारोह में मोनिका भागवागर ने सम्मान पत्र पढ़ा।
लोकमत समूह के कार्यकारी निदेशक देवेन्द्र दर्डा के आभार प्रदर्शन के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ।
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चि_ी की चुटकी
सत्कार समारोह में नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने अपने भाषण में कहा कि संत सिंह चटवाल को पद्म भूषण सम्मान के लिए सिफारिश की चिट्टी उन्होंने लिखी थी। उन्हें गर्व है कि उनकी चिट्टी पर चटवाल को पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया। पटेल के बाद जब केंद्रीय भारी उद्योगमंत्री विलासराव देशमुख भाषण के लिए आए तो उन्होंने पटेल की लिखी चिट्टी पर चुटकी लेते हुए कहा कि पटेलजी बहुत चिट्ठियां लिखते हैं। उनके पास जो जाता है, उसकी चिट्टी लिख देते हैं। जब तक भारत और अमेरिक के संबंध प्रगाढ़ बन रहेंगे पटेल भाई की चिट्ठी याद रखी जाएगी। शिंदे ने कहा कि चटवाल के पद्म भूषण सम्मान में कई लोगों का विरोध था। लेकिन पटेल की चिट्ठी के कारण प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह टस से मस नहीं हुए।
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घाटे से उबर रही हैं एयर इंडिया : प्रफुल्ल पटेल

नागपुर। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की उड्डान कंपनी एयर इंडिया धीरे-धीरे घाटे से उबर रही है। यह कहना है कि नागरिक व उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल का। नागपुर में विविध कार्यक्रमों में हिस्सा लेने आए प्रफल्ल पटेल ने एक बातचीत में कहा कि पहले जहां हर महीने एयर इंडिया को हर माह करीब 400 करोड़ रूपये का घाटा हो रहा था, अब यह घाटा कम होकर 100 करोड़ रूपये प्रतिमाह से भी कम हो गया है। उन्होंने कहा कि आने वाले दो-तीन साल में कंपनी इस घाटे से भी उबर जाएगी। फिलहाल घाटे की भरपाई के लिए प्रयास जारी है। अतिरिक्त खर्चों में कटौती की जाए रही है। खर्च कटौती में कर्मचारियों के वेतन से किसी तरह की कटौती नहीं की जाएगी। सेवा की गुणवत्ता और बढ़ाई जा रही है। बेहतर संचालन-परिचालन के लिए नये ब्रांड डायरेक्टर और सीईओ की नियुक्ति की गई है। उन्होंने कहा कि निकट भविष्य में नागुपर से एयर इंडिया की सेवाओं का और प्रसार होने की जाएगी। नागपुर की बहुचर्चित मिहान परियोजना में हो रही देरी के बारे में पटेल ने कहा कि इसका प्रशासन अब हमारे पास नहीं है। महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट (ऑथरिटीएमएडीसी) की ओर से मिहान का औपचारिक रूप से मिहान इंडिया लिमिटेड(एमआईएल)को हस्तांतरीत कर दिया गया है। विमानतल की सुरक्षा के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में उड्डयन मंत्री ने कहा कि सुरक्षा की हर व्यवस्था कड़ी है। फिलहाल सुरक्षा की व्यवस्था पर्याप्त है।

मनपा चुनाव में हार के लिए ठाकरे जिम्मेदार


केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख ने दागी तोप

नागपुर। लोकसभा एवं राज्य विधानसभा चुनावों में राज्यभर में कांग्रेस ने जहां अच्छी सफलता अर्जित कर केंद्र व राज्य में अपनी सरकार बनाई लेकिन इसके बावजूद हाल ही हुए मुंबई मनपा व नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। इसके लिए सीधे तौर पर प्रदेशाध्यक्ष माणिकराव ठाकरे की ही जिम्मेदारी बनती है और कांग्रेस को इस हार पर चिंतन करना चाहिए। यह विचार राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री विलासराव देशमुख ने व्यक्त किए। देशमुख ने साफ तौर पर माणिकराव को निशाना बनाते हुए उन्हें चुनाव में हार का जिम्मेदार बताया लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम नहीं लिया।
नागपुर के रविभवन में पत्रकारों के साथ चर्चा में देशमुख ने कहा कि मनपा व नगर परिषद चुनाव में कांग्रेस की हुई हार पर प्रदेश कांग्रेस को आत्मचिंतन करना चाहिए। लोकसभा व विधानसभा चुनाव में पार्टी के अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद प्रदेश कांग्रेस कोई खास लाभ नहीं उठा पाई। इसमें कहीं न कहीं प्रदेश कांग्रेस की कमजोरी झलकती है। भाजपा विधायक देवेंद्र फडणवीस द्वारा राज्य के मुख्यमंत्री आर.आर. पाटिल के खिलाफ लगाए गए आरोपों के बारे में देशमुख ने कहा कि फडणवीस जैसे युवा विधायक को इस प्रकार के बेबुनियाद आरोप नहीं लगाने चाहिए। उनके आरोपों में कोई दम नहीं है। ऐसे सनसनीखेज आरोप तमाम तथ्य जुटाने के बाद ही लगाने चाहिए। उन्होंने अहमद पटेल का नाम भी बिना वजह उछाला है। यह मामला उठाकर फडणवीस ने सभागृह का समय खराब करने का ही कार्य किया है।
विदर्भ की स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से विदर्भ को अच्छा पैसा मिला है। विदर्भ राज्य की प्रगति के लिए विदर्भ वैधानिक विकास महामंडल की समय सीमा बढ़ाई जानी चाहिए। विदर्भ को अभी और अधिक विकास की जरूरत है। विदर्भ राज्य के बारे में छेड़े जाने पर देशमुख ने कहा कि वे स्वयं संयुक्त महाराष्ट्र के समर्थक हैं। विदर्भ के अलावा मराठवाड़ा के साथ भी अन्याय हुआ है लेकिन केवल अन्याय हुआ इसलिए स्वतंत्र विदर्भ राज्य की मांग करना गलत है। स्वतंत्र विदर्भ राज्य के बारे में लोगों की भावनाएं हो सकती हैं लेकिन अलग राज्य से ही विदर्भ की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। विलासराव ने कहा कि वे विदर्भ की जनता की भावनाओं का अनादर नहीं करना चाहते और अगर कांग्रेस आलाकमान विदर्भ राज्य के पक्ष में निर्णय लेता है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है
प्रदेश कांग्रेस द्वारा चलाए गए सदस्यता अभियान को मिले कमजोर प्रतिसाद पर उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे का बचाव करते हुए कहा कि यह अकेले ठाकरे का काम नहीं है। इसके लिए अन्य कई कारण जिम्मेदारी हो सकते हैं। जिस पंजाब और तमिलनाडु में कांग्रेस की सरकार नहीं है वहां क्रमश: 35 और 75 लाख सदस्य बने हैं जबकि महाराष्ट्र में कांग्रेस की सत्ता होने के बावजूद यहां महज 18 लाख सदस्य ही बन पाए जो चिंता का विषय है।

नागपुर की गुटबाजी से मोघे निपटेंगे
यह पूछे जाने पर कि नागपुर कांग्रेस में गुटबाजी काफी वर्षों से जारी है, विलासराव देशमुख ने कहा कि इस गुटबाजी से निपटने की जिम्मेदारी पालकमंत्री शिवाजीराव मोघे को सौंपी गई है। विलासराव ने स्वीकार किया कि इस गुटबाजी को दूर करने का प्रयास उन्होंने तब किया था जब वे राज्य के मुख्यमंत्री थे लेकिन इसमें उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। अब इस गुटबाजी को मोघे ही दूर कर सकते हैं।

सोमवार, अप्रैल 12, 2010

फिजाओं में बेखौफ जहर घोल रहे हैं वाहन

जहर छोडऩे वाले वाहनों पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का नियंत्रण नहीं
ऑटो में हो रहा है धडल्ले से केरोसिन का उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र रखने में वाहन चालकों की रुचि नहीं

नागपुर।
शहर में चलने वाले पुराने वाहन संतरानगरी की फिजाओं में प्रदूषण का जहर खोल रहे हैं। आरटीओ कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार फिलहाल शहर में करीब 38 हजार से अधिक 20 साल पुराने वाहन डीजल या पेट्रोल से चलने वाले हैं। इन वाहनों के पुराने से होन से ये ज्यादा प्रदूषित धुआ छोड़ रहे हैं। इसमें सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, काब्रन मोनोऑक्साइड की जो मात्रा निकलती है, वह न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारण है बल्कि स्वास्थ्य व्यक्ति के लिए भी नुकसानदेय है। वहीं दूसरी ओर प्रदूषण नियंत्रण के लिए बनाया गया बोर्ड केवल कागजों पर ही चल रहा है। नगर में चलने वाले हजारों वाहनों कहीं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का प्रमाणपत्र का स्टीकर लगा हुआ तो दिख जाता है, पर इनकी वैधता कितनी पुरानी होती है, यह वाहन चालक ही जानते हैं। अमूमन अधिकतर वाहन चलाक प्रदूषिण नियंत्रण का प्रमाणपत्र बनवाते ही नहीं है। आरटीओ कार्यालय के सामने दो-तीन पुराने वाहन पर मशीन लगाकर प्रदूषण नियंत्रण के प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। पर ये वाहन स्वयं ही बहुत पुराने होते हैं। इनके प्रदूषण का नियंत्रण पर कोई पूछने वाला नहीं है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि ये वाहन किस तरह से दूसरे वाहनों के लिए प्रदूषण नियंत्रण का प्रमाण पत्र जारी करते होंगे।
यहां से पेट्रोल वाले चार पहिये वाहन के लिए 80 रूपये में प्रमाणपत्र जारी होते हैं। वहीं चार पहिया के लिए 100 रूपये के भुगतान पर और एक दुपहिया के लिए 30 रूपया तथा ऑटोरिक्शा के लिए 60 रूपये के भुगतान पर परीक्षण कर प्रदूषण नियंत्रण का प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। कई बार तो यहां प्रदूषण जांच के लिए खड़े वाहन भुगतान पर बिना वाहन की जांच के ही प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं। इतना ही नहीं लापरवाही का आलम यह है कि जब किसी वाहन में निर्धारित मानक से ज्यादा प्रदूषण होते हैं तो 10-20 रूपये अधिक लेकर निर्धारित मानकों के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण का प्रमाणपत्र बना देते हैं। शहर में चलने वाले अधिकतर ऑटो चालक पेट्रोल महंगा होने कारण केरोसिन का उपयोग भी करते हैं। केरोसिन पर चलने वाले ऑटो से निकलने वाला धुआ पर्यावरण हीन हीं मानव स्वस्थ्य के लिए भी बेहद जहरीला होता है। आरटीओ से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2009-10 में आरटीओ के बाहर 10,913 वाहनों की जांच की गई। इसमें प्रदूषण के निर्धारित मानकों का उल्लंघन करने पर मोटर वाहन अधिनियम की धारा 190 (2) के तहत 992 वाहनों का चालान किया गया। विभाग की कार्रवाई देखकर यह महज औपचारिकता भर लगती है।
ज्ञात हो कि शहर में 10 लाख से अधिक वाहन पंजीकृत हैं। नागपुर उत्तर एवं दक्षिण भारत का मिलन का मुख्य केंद्र होने के कारण यहां दूसरे राज्यों के हर दिन करीब 15 हजार भारी वाहनों की भी आवाजाही होती है।
प्रदूषण विभाग की मानें तो हर दिन नागपुर से औसतन 1700 ऐसे वाहन गुजरते हैं, जिन पर मानवीय स्वास्थ्य के लिए हानिकारक घातक रसायन लदे होते हैं। इस वजह से भी शहर की वायु में प्रदूषण का जहर तेजी से घुल रहा है। इसके अलावा नागपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों से भी प्रतिदिन 10 हजार से अधिक वाहन शहर में प्रवेश करते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो 15-20 साल पुराने वाहन अपनी तय उम्र पूरी कर चुके होते हैं एवं इन वाहनों के धुएं मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं।
इन वाहनों से धुएं से निकलने वाला सल्फर डाईआक्साइड के कारण आंखों में जलन एवं श्वसन संबंधी बीमारियां होने का खतरा ज्यादा होता है। जानकारों का कहना है कि इससे निकलने वाला कार्बन मोनोआक्साइड के कारण शरीर की ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है तथा सिरदर्द एवं उल्टी की शिकायत होती है। सेंट्रल मोटर व्हिकल एक्ट 1989 के अनुसार वाहनों की प्रदूषण जांच अनिवार्य है। इस जांच में अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर रोक लगाई जा सकती है।
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इलाज के लिए इंतजार ही इंतजार

नागपुर। गिट्टी खदान निवासी राकेश सिंह को पेट में दर्द की शिकायत के कारण उसके घर वालों ने मेडिकल अस्पताल में दिखाया। डाक्टर ने मरीज का इलाज शुरू करने से पहले अल्ट्रासाउंड की जांच लिख दी। परिवार वाले जब अल्ट्रासाउंड कराने पहुंचे तो जांच के लिए उसे 10 दिन बाद का समय बाद की डेट दे दिया गया है। दर्द से तड़पते राकेश का इलाज रोका नहीं जा सकता था, इसलिए उसे बाहर में दोगुने से भी ज्यादा फीस भकर अल्ट्रासाउंड कराया गया। यह स्थिति अकेले राकेश की नहीं है। बल्कि मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले हर दिन सैकड़ों मरीजों की है। हर दिन जांच के लिए आने वाले सैकड़ों मरीज लंबी कतार में इंतजार के बाद डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, तब उन्हें किसी न किसी तरह की टेस्ट कराने के लिए लिखा जाता है। जब मरीज टेस्ट की पर्ची लेकर संबंधित जांच विभाग के पास जाता है, तो वहां खड़ा मेडिकलकर्मी या सिस्टर उसका नाम और पर्ची नंबर लिखकर उसे अलग सप्ताह की तिथि देती है। उस दिन पहले से ही जांच के लिए भीड़ रहती है।
डॉक्टर व जांच उपकरण पर भारी बोझ
मेडिकल अस्पताल के एक डॉक्टर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि इसमें हम क्या कर सकते हैं? डॉक्टर और जांच रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम की और हर दिन आने वाले मरीजों के बीच का औसत में भारी अंतर है। फिर भी हमारी कोशिश होती है कि सभी का दु:ख-दर्द सुना और समझा जाए। लेकिन मरीज के परीजन हमारी बेवशी नहीं समझते हैं। उनका धौर्य टूट जाता है। डॉक्टर और अन्य मेडिकल कर्मियों की संख्या के साथ-साथ अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे मशीन समेत अन्य दूसरे कई मेडिकल जांच उपकरण की संख्या तो सीमित है, उल्टे हर दिन आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक डॉक्टर पर तीन-चार घंटे में सौ से भी ज्यादा मरीजों को देखना होता है। यही स्थिति एमआरआई विभाग की है। जांच रिपोर्ट तो दो दिन में तैयार नहीं हो सकती है। इसलिए मरीजों की जांच के लिए आगे की तिथि दी जाती है। जांच के बाद रिपोर्ट लेने के लिए भी सप्ताह भर बाद का समय दिया जाता है। दर्द से कराहते मरीज के परिजन यदि आर्थिक रूप से सक्षम हैं, तो वे बाहार से जांच रिपोर्ट ले कर आ जाते हैं। जो सक्षम नहीं हैं, वे मेडिकल में चक्कर लगाते-लगाते दूसरी किसी बीमारी के शिकार हो जाते हैं या फिर उनकी वह बीमारी और गंभीर हो जाती है।
एजेंट हैं सक्रिय
मरीजों और उनके परिजनों की बेवशी का लाभ उठाने के लिए निजी पैथलॉजी के एजेंट मेडिकल परिसर में ही सक्रिय होते हैं। कई बार वे जांच विभाग के बाहर मंडराते रहते हैं। जांच की तिथिी देरी से मिलने पर मायूस मरीज या उनके परिजनों के निराश देखकर उसके पास जाते हैं और उसे अपने पैथलॉजी में जांच तुरंत जांच रिपोर्ट दिलाने का झांसा देकर ले जाते हैं। एक निजी पैथलॉजी रिपोर्ट से खून की जांच रिपोट लेकर आए संतोष गजभिये ने बताया कि इलाज तुरंत करवाना है। यदि मेडिकल के पैथलॉजी के भरोसे बैठे तो पहले डेट ले, फिर जांच के लिए आओ उसके बाद फिर सप्ताह भर बाद रिपोर्ट मिलेगी, फिर संबंधित डॉक्टर का दिन देखकर अस्पताल आओ। इस तरह से मर्ज घटने के बजाय और बढ़ जाएगी। इसलिए बाहर भले ही थोड़ पैसे अधिक लगते हों, लेकिन रिपोर्ट तो जल्द मिल जाती है।
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प्रकाशित १८५७ में

ट्रैफिक सिग्नल दुरुस्ती में जमकर भ्रष्टाचार!

निजी कंपनी को मेंटेनेंस कार्य का एक करोड़ बकाया, फिर भी बदहाल है यातायात सिग्नल, एक दूसरे से जिम्मेदारी ढकेल रहे हैं मनपा और यातायात विभाग
नगापुर।
संतरानगरी के यातायात को सुचारु रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले विभिन्न चौक-चैराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्नल की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। शहर के सिग्नलों के मेंटेनेंस की जिम्मेदारी नागपुर महानगर पालिका को है। लेकिन मेंटेनेंस कार्य की आड़ में मनपा का इंजीनियरिंग विभाग, यातायात विभाग जमकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं।
मनपा के इंजीनियरिंग विभाग के सूत्रों का कहना है कि नगर के ट्रैफिक सिग्नलों के लगाने और मेंटेंनेंस का ठेका एक निजी कंपनी को दिया गया है। लेकिन गत कई महीनों से उसे मनपा ने भुगतान ही नहीं किया है। इसलिए कंपनी ने भी अपनी इस जिम्मेदारी से हाथ खड़े कर लिए हैं। कंपनी को उम्मीद थी कि मनपा की ओर से उसका बकाया वित्तिय वर्ष के अंतिम दिनों में मिल जाएगा। लेकिन मार्च 2010 के समाप्त होने के बाद भी कंपनी को मनपा ने भुगतान नहीं किया। मनपा के इंजीनियरिंग विभाग के नसीर खान ने बताया कि कुछ राशि कंपनी को अभी भुगतान होना बाकी है। लेकिन सभी बिल यातायात विभाग से अनुमोदित होने के बाद ही भुगतान किए जाते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कंपनी का कितना रूपया बकाया है। सूत्रों की मानें मनपा की ओर से कंपनी को करीब एक करोड़ रूपये का भुगतान करना है। पर आश्चर्य की बात यह है कि इतनी मोटी राशि खर्च होने के बाद भी ट्रैफिक सिग्नलों के मेंटेंनेंस कार्य संतोषजनक नहीं दिख रहा हैं। कंपनी, यातायात विभाग और मनपा अधिकरियों के साथ मिलजुलकर मेंटेनेंस के नाम पर मनपा को मोटी चपत लगाने की बात से सूत्र इनकार भी नहीं करते हैं। सूत्रों का कहना है कि यातायात विभाग और मनपा के इंजीनियरिंग विभाग को कंपनी ने बिल पास कराने एक एवज में उन्हें खुश नहीं किया है। वही मनपा स्थायी समिति के अध्यक्ष संदीप जोशी का कहना है कि मनपा के विभिन्न विभागों में सैकड़ों निजी कंपनियां ठेके पर कार्य कर रही हैं। हर किसी के बिलों को तुरंत भुगतान संभव नहीं है। थोड़ी-बहुत तो देरी तो होती ही है। फिलहाल मनपा मेंटेनेंस कार्यों के भुगतान में फंड नहीं होने का रोना रो रही है। वहीं मेंटेनेंस का ठेका लेने वाली कंपनी ने भुगतान नहीं होने से सिग्नलों की देखदेख से हाथ खड़े कर लिये हैं। इससे कई सिग्नलों पर गड़बड़ी की शिकायत आ रही है। नगर के कई चौक-चौराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्गनल कई घंटो बंद रहते हैं या फिर लाल, पीले और हरे रंग के उनके संकेत ठीक से नहीं दिखाई देते हैं। इससे तेज गति से आ रहे वाहन चालक दुविधा में पड़ जाते हैं। कई बार वाहन चलाकों के बीच तू-तू-मैं-मैं की स्थिति खड़ी हो जाती है। यह स्थिति आए दिन महाराजबाग चौक, इंस्टीट्यूट ऑफ साईंस चौक सिविल लाइन्स, एलआईसी चौक कामठी रोड़, छत्रपति चौक पर लगे ट्रैफिक सिग्नलों पर खराबी देखी जा सकती है। यातायात विभाग के सूत्रों का कहना है कि इन चौक पर आए दिन खराबी होने का मुख्य कारण जमीन के नीचे बिछाये गए केबल तार में गड़बड़ी है। वहीं नगर के कई चौक-चौराहे हैं, जहां लगे ट्रैफिक सिग्नल के रंग स्पष्ट नहीं दिखाई देते हैं। यह स्थिति मानेवाड़ा और सक्करदरा चौक पर देखी जा सकती है। यातायात विभाग का कहना है कि इस संबंध में फरवरी और मार्च महीने में ही मनपा को पत्र लिख कर अवगत करा दिया गया है। इसके बाद भी मनपाकर्मी सुस्त हैं। वे अपनी जिम्मेदारी यातायात विभाग पर ढकेलते हैं। ट्रैफिक सिग्नलों के मेंटेंनेंस की जिम्मेदारी मनपा के इंजीनियरिंग विभाग पर है। इस विभाग का कहना है कि जब यातायात विभाग से किसी सिग्नल के खराब होने की शिकायत आती है तो उसकी दुरुस्ती के लिए कंपनी को तुरंत कह दिया जाता है। कई बार यातायात विभाग की ओर से ही देरी से पत्र आता है। उसमें मनपा क्या कर सकती है?

भीषण गर्मी से सूख रहे हैं विदर्भ के तालाब

नागपुर। बढ़ती गर्मी के साथ विदर्भ के जलाशयों का पानी सूखने लगा है। चार बड़े जलाशय सूख गए हैं। इससे जलसंकट गहराने की आशंका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार गोंदिया जिले के पुजारीटोला, कालीसरार, गढ़चिरोली जिले के दिना, वर्धा जिले का निम्र वर्धा में अब पानी नहीं बचा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार तोतलाडोह में 2990 लाख घनमीटर पानी मौजूद है। पिछले सप्ताह यहां 3190 लाख घनमीटर पानी था। 200 लाख घनमीटर पानी कम हो गया। कामठी खैरी में अभी 650, रामटेक में 20, निम्र वना (नांद वडग़ांव) 60, इटियाडोह 730, सिरपुर 410, असोलमेंढा 20, बोर 440, धाम 180, पोथरा में 110 लाख घनमीटर पानी है। पिछले सप्ताह की तुलना में 17 प्रतिशत पानी कम हो गया है। नागपुर विभाग में मध्यम प्रकल्पों की संख्या 40 है। इसमें नागपुर जिले के 13 प्रकल्पों में 580 लाख घनमीटर पानी है। पिछले सप्ताह इन जलाशयों में 610 लाख घनमीटर पानी था। भंडारा के 4 जलाशयों में पानी नहीं लाख घनमीटर पानी है। इसी प्रकार चंद्रपुर जिले के 8 प्रकल्पों में 110, वर्धा जिले के 5 प्रकल्पों में 200 मिलाकर कुल 940 लाख घनमीटर पानी मौजूद है। पिछले सप्ताह इन जलाशयों में 990 लाख घनमीटर पानी था। नागपुर जिले के जलसंकट से निपटने के लिए 2 अप्रैल को पालकमंत्री शिवाजीराव मोघे ने समीक्षा बैठक की थी। इसमें उन्होंने जलसंकट से निपटने के उपाय करने के निर्देश दिए थे। जलाशयों की स्थिति के बारे में जिलाधिकारी प्रवीण दराड़े ने पूछने पर बताया कि जिले में जलसंकट की स्थिति नहीं है। क्योंकि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार अच्छी वर्षा हुई थी। जहां जलसंकट है, वहां कुओं को गहरा बनाना तथा बोरवेल बनाने जैसे काम शुरू किए गए है। जलसंकट से निपटने के लिए आठ करोड़ की लागत की योजना बनाई गई है।

अलग से हो ओबीसी की जनगणना


अलग से हो ओबीसी की जनगणना : छगन भुजबल

नागपुर। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने कहा है अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण की व्यवस्था मजबूत करने के लिए जनगणना में ओबीसी अलग से निष्कर्ष निकलनी चाहिए। सिविल लाइन्स स्थित रवि भवन में पत्रकारों से बातचीत में भुजबल ने कहा कि जिस तरह से जनगणना में अनुसूचिज जाति, जन जाति के लिए अलग कॉलम रख कर उनकी संख्या और अन्य निष्कर्ष निकाला जाता है, उसी तरह से ओबीसी की संख्या के साथ अन्य मामलों पर डाटा जारी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे राज्य में ओबीसी के नेता विशेषकर लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव आदि को भी अपनी पार्टी की ओर से जनगणना में ओबीसी को शामिल करने का मुद्दा उठाना चाहिए, जिससे कि केंद्र सरकार पर इस बात का दावब पड़े और वह जनगणना में ओबीसी को शामिल कर सके।

शनिवार को पृथक विदर्भ के मुद्दे पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुधीर मुनगंटीवार के भाजपा-शिवसेना गठबंधन के मुद्दे पर पूछे गए सवाल में भुजबल ने कहा कि शिवसेवा अपने कार्यों के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है। विदर्भ मुद्दे पर गठबंधन की सरकार का जो निर्णय होगा, उसका हमारा समर्थन रहेगा। किसान आत्महत्या के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि पत्रकारों को किसानों की समस्या जोरदार तरीके से उठानी चाहिए।
आईपीएल में लगाए जाने वाले टैक्स के विषय में चर्चा करते हुए भुबजल ने कहा कि आईपीलएल काफी लोकप्रिय हो रहा है। यदि दूसरे राज्य अपने यहां होने वाले वाले आईपीएल मैच पर किसी तरह का कर लगाते हैं तो महाराष्ट्र सरकार भी इस पर विचार करेगी।

रविवार, अप्रैल 11, 2010

जनभारत मेल में प्रकाशित

'गुंडाÓऔर थानेदार की भूमिका में कुलपति!


वर्धा हिन्दी विवि में 'दैनिक 1857Ó के संवाददाताओं को राय ने दिखाया डंडा, अश्लील गालियां दीं
सेवाग्राम पुलिस थाने में कुलपति के खिलाफ शिकायत दर्ज

नागपुर से प्रकाशित समाचार पत्र 'दैनिक 1857Ó ने 11 अप्रैल के अंक के प्रथम पृष्ठ पर 'गुंडा और थानेदार की भूमिका में कुलपति!Ó के नाम से एक खबर प्रकाशित की है। प्रकाशित खबर के मुताबिक वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में विभिन्न पदों की नीलामी किए जाने के बारे में लगातार खबरें प्रकाशित कर रहे 'दैनिक 1857Ó के खिलाफ विवि के कुलपति विभूति नारायण राय का गुस्सा उस समय फूट पड़ा जब उन्होंने 'दैनिक 1857Ó के जिला प्रतिनिधि तथा संवाददाता को बुलाकर न केवल डंडा दिखाया बल्कि अश्लील गाली-गलौच करते हुए उन्हें तथा वर्धावासियों को चोर तक कह डाला। पत्रकारों को चोर निरूपित कर पुलिस के हवाले करने की शर्मनाक हरकत से भी राय बाज नहीं आए। पीडि़त पत्रकारों ने राय के खिलाफ सेवाग्राम थाने में शिकायत दर्ज कराई है। किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय में पुलिसिया व्यक्तित्व को कुलपति बनाए जाने का हश्र क्या होता है, यह शनिवार की घटना से सामने आया है। कई पत्रकारों ने राय के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर उन्हें कुलपति पद से अविलंब हटाने की मांग की है। राय के आचरण पर रोष प्रकट करते हुए अनेक स्थानीय लोगों ने आपत्ति दर्ज की है। उन लोगों का कहना है कि कुलपति राय ने एक गुंडा और थानेदार की तरह पत्रकारों के साथ व्यवहार कर महात्मा गांधी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय की पवित्रता का नाश किया है, उसे अपवित्र बनाया है।
उल्लेखनीय है कि 'दैनिक 1857Ó में पिछले कई दिनों से वर्धा के हिन्दी विश्वविद्यालय में पदों की नीलामी से संबंधित समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे इस समाचारपत्र पर खीज निकालने का मौका कुलपति विभूतिनारायण राय देख ही रहे थे। शनिवार की सुबह 'दैनिक 1857Ó के जिला प्रतिनिधि प्रफुल शुक्ला और शहर संवाददाता प्रतापसिंह कुशवाह विवि इलाके में वितरण व्यवस्था देखने गए थे कि कुलपति राय ने दोनों को अपने सुरक्षा गार्डों के जरिये बातचीत के लिए अपने पास जबरन बुलाया और उनके आते ही हवा में डंडा लहराकर अश्लील गालियों की बौछार शुरू कर दी। राय ने निचले स्तर पर उतरते हुए पत्रकारों को चोर निरूपित करते हुए कहा कि वर्धा के स्थानीय लोग चोर हैं। हमारे यहां नलों की टोटियां चोरी हो रही हैं और इन्हें स्थानीय लोग भीतर घुसकर चुरा रहे हैं। अपने हाथ में 'दैनिक 1857Ó लेकर निहायत अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हुए राय ने कहा कि 'मेरे खिलाफ ऐसे ही लिखते रहे तो चोरी के इल्जाम में फंसा दूंगा।Ó उन्होंने पत्रकारों की ओर डंडा लहराते हुए कहा- 'मारो सालों को।Ó आसपास के कई लोगों जिनमें विवि के प्रतिकुलपति नयीम हसनैन तथा विशेष कर्तव्याधिकारी राकेश श्रीवास्तव भी मौजूद थे, ने पत्रकारों को घेर लिया। विवि के एक रीडर संतोष भदोरिया जो कि इलाहाबाद केंद्र पर रहते हैं, कुलपति के घर से निकले। उल्लेखनीय है कि रीडर संतोष भदोरिया ने विवि के पदों के लिए आवेदन कर रखा है। ऐसे समय जबकि साक्षात्कार चल रहा हो, भदोरिया की कुलपति के घर में मौजूदगी भ्रष्टाचार की ओर इंगित करती है। पत्रकारों को डांट-फटकार के बाद विवि प्रशासन ने उन्हें सेवाग्राम पुलिस के हवाले कर दिया। थानेदार चंद्रशेखर ठाकरे ने पत्रकारों का बयान लेकर उन्हें रिहा कर दिया। इसके बाद पीडि़त पत्रकारों ने कुलपति राय के खिलाफ अश्लील गालीगलौच करने, डंडे से मारने और गैरकानूनी ढंग से गिरफ्त में रखने की शिकायत दर्ज कराई। इस मामले की जांच सेवाग्राम पुलिस कर रही है।
कुलपति राय ने अपनी शिकायत में बताया है कि संदेहास्पद व्यक्ति विवि परिसर में पाए जाने पर उन्होंने पुलिस को बुलाया जबकि हकीकत यह है कि दोनों पत्रकारों के आगमन संबंधी सूचना विवि के प्रवेशद्वार पर रखी पुस्तिका में दर्ज है। अत: राय का आरोप वैसे ही झूठा साबित होता है।

भ्रष्टाचार के ताजा नमूने
शनिवार को जब 'दैनिक 1857Ó के पत्रकारों को पुलिसिया कुलपति राय जब डंडा दिखा रहे थे तथा अश्लील गालियां दे रहे थे, उसी समय उनके घर से इलाहाबाद सेंटर पर रहने वाले रीडर भदोरिया बाहर निकले। भदोरिया ने विवि में एक प्रोफेसर सहित किसी एक और पद के लिए आवेदन कर रखा है। साक्षात्कार के समय भदोरिया का कुलपति के घर से बाहर निकलना संदेहास्पद है। इसके अलावा 9 अप्रैल को शांति व अहिंसा अध्ययन के लिए हुए साक्षात्कार में विशेषज्ञ के तौर पर बनवारीलाल शर्मा शामिल थे जो इलाहाबाद विवि में गणित के प्राध्यापक रहे हैं। जब देश में समाज विज्ञान, इतिहास, गांधी अध्ययन के विशेषज्ञ मौजूद हों तब इस साक्षात्कार के लिए एक गणित के प्राध्यापक को बुलाना संदेह पैदा करता है। वैसे शर्मा एक एनजीओ भी चलाते हैं।
राष्ट्रपति हस्तक्षेप करेंडा. ओमप्रकाश प्र. नीरज तथा डा. मुकेश कुमार ने वर्धा के हिन्दी विश्वविद्यालय में शिक्षकों की बहाली के लिए हो रहे साक्षात्कार को लेकर 'दैनिक 1857Ó में प्रकाशित हो रहीं खबरों को दुर्भाग्यपूर्ण व पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए कहा है कि इन खबरों से साक्षात्कार की पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ खड़ी हुई है। इस मामले में विवि प्रशासन को तुरंत अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। साथ ही इस मामले में महामहिम राष्ट्रपति महोदया को हस्तक्षेप करते हुए प्रतिभाशाली व योग्य प्रतिभागियों को इंसाफ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि खबर में 'गांधी विचारÓ विषय के बारे में भ्रम फैलाया गया है कि 'अहिंसा एवं शांति अध्ययनÓ विषय का गांधी विचार एक हिस्सा मात्र है। यह गांधी विचार विषय के व्यापक पहलू की अनदेखी करने जैसा है क्योंकि 'शांति अध्ययनÓ गांधी विचार विषय के पाठ्ïयक्रम में शामिल है और 'अहिंसाÓ तो पूरे गांधी विचार दर्शन का केंद्रीय विषय वस्तु ही है। डा. उमेश नीरज व डा. मुकेश कुमार ने साक्षात्कार से संबंधित अखबार में छपी खबर की उच्च स्तरीय जांच और दोषी पर कठोर कार्रवाई की मांग राष्ट्रपति व मानव संसाधन विकास विभाग से की है। उन्होंने कुलपति से भी खबरों का संज्ञान लेने तथा योग्य प्रतिभागियों के नाम उछालकर उन्हें षडय़ंत्र का शिकार बनाकर साक्षात्कार को प्रभावित करने वाली कार्यवाही के दोषी व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है।

खूब की कमाई, पर सुविधा कहा है भाई?

बीते वितिय वर्ष में मध्य रेल को लक्ष्य से 11 प्रतिशत अधिक की आय
नागपुर।
मध्य रेल नागपुर मंडल ने बीते वित्तिय वर्ष 2009-10 के दौरान विभिन्न मदों से अच्छी-खासी कमाई की। मंडल रेल प्रबंधक देवेन्द्र कुमार शर्मा ने बताया कि बीते वर्ष में नागपुर मंडल ने 1745.32 करोड रूपये की सकल आय प्राप्त की। यह राशि पिछले वर्ष 2008-09 की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक 1488.35 करोड़ रहा। यह आय निर्धारित लक्ष्य से 11 प्रतिशत ज्यादा है। उन्होंने बताया कि माह मार्च 2010 में मंडल को 173 करोड़ की आय हुई जो पिछले वर्ष की तुलना में 155.69 करोड़ की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक है। कमाइ के मामले में भले ही मध्य रेल के नागपुर मंडल ने दूसरे मंडलों से बाजी कर ली हो, पर स्टेशन पर होने वाली यात्रियों की असुविधा पर रेल प्रशासन कुछ भी बोलने से कतराता है। स्टेशन के प्लेटफार्म नंब एक को तो चमका-दमका कर रखा जाता है। पर प्लेटफार्म नंबर चार, पांच छह और सात पर कई जगह बदहाली का आलम दिखता है। कभी यात्रियों के लिए उपलब्ध पेयजल नल में पानी नहीं आता है तो कभी प्लेटफार्म के छत से लटके पंखे नहीं चलते हैं। रेलयात्रियों की असुरक्षा और जहर खुरानी गिरोह पर किसी तरह की नकेल नहीं है। लेकिन रेल प्रशासन मोटी कमाई का आंकड़ा दिखाकर अपनी कमजोरियों को छिपा कर रखना चाहता है।
मंडल रेल प्रबंधक ने बताया कि नागपुर मंडल ने मार्च 2010 में अभी तक की सबसे ज्यादा मालभाडा से आय अर्जित की है। मालभाडा से 145 करोड़ रूपये की कमाई हुई। यह आय पिछले वर्ष के इसी अवधि की तुलना में 9 प्रतिशत अधिक है। इस मद से मध्य रेल को अप्रैल, 2009 से मार्च 2010 तक कुल 1475.30 करोड़ रुपये की आय हुई जो पिछले वर्ष की तुलना में लक्ष्य से 19 प्रतिशत अधिक और निर्धारित लक्ष्य से 6 प्रतिशत अधिक है। माल भाडा में सबसे ज्यादा कमाई कोल से हुई। कोल ढुलाई की हिस्सेदारी 88 प्रतिशत रही, वहीं सिमेंट 5 प्रतिशत तथा अन्य माल ढुलाई की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत है। मध्य रेलवे यात्री यातायात से कमाई में भी पीछे नहीं रहा। बीते मार्च माह में अभी तक सबसे अधिक 25.85 करोड़ की कमाई हुई जो लक्ष्य 24.82 की तुलना में 4 प्रतिशत अधिक है। पार्सल से इस बीते वित्तिय वर्ष में 13.02 करोड़ की आय हुई जो पिछले वित्तिय वर्ष की तुलना में 11.35 करोड़ की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक है। इसी के साथ ही अन्य कोचिग स्रोत से भी पिछले वर्ष की तुलना में 16 प्रतिशत अधिक 27.71 करोड़ की कमाई हुई। उन्होंने बताया कि इस वर्ष टिकट चेकिंग से होने वाली कुल आय में 15 प्रतिशत अधिक की कमाई हुई। पार्किंग आय का लक्ष्य हासिल करते हुए मध्य रेल ने इस मद से 1.28 करोड आय के रूप में प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि नागपुर मंडल पर गत 30 मार्च को 36 रेक का लदान किया गया है। यह अभी तक का सबसे ज्यादा रेक लदान का रिकार्ड है।
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विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़

ठीक से जांच नहीं हो रही है विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिका
एक दिन में कम से कम 30 कॉपी जांचना अनिवार्य
पैसे की लालच में जांची जा रही है जल्दी-जल्दी कॉपी

नागपुर। राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विद्यापीठ के विभिन्न परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिका की जांच का कार्य तेजी से चल रहा है। पर उत्तर पुस्तिका जांच करने के बदले परीक्षकों की जाने वाली भुगतान राशि इतना कम है कि वे जल्दी-जल्दी में ज्यादा पुस्तिका जांच रहे हैं। सूत्रों की मानें तो लक्ष्मीनारायण इंस्टीट्यूट ऑफ टेकनोलॉजी में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन हो रहा है। यहां एक दो कमरे में रखे हर बेंच पर दो परीक्षकों को बैठाया जा रहा है। सुबह 11 से 5 की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच हो रही है।
एक दिन में हर परीक्षक को कम से कम 30 और अधिकतम 60 उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करनी है। हर पुस्तिका की जांच पर विद्यापीठ 10 रूपये का भुगता करेगा। पर यह भुगतान तुरंत होने के बजाये कुछ माह बाद होगा। यदि कोई परीक्षक एक दिन में 60 उत्तर पुस्तिका की जंाच करता है तो उसे 600 रूपये का भुगतान होगा, इसके अलावा एक दिन का भत्ता 185 रूपया मिलेगा। नवंबर-दिसंबर में हुए परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं के जांच का भुगतान पिछले सप्ताह हुआ है। सूत्रों का कहना है कि कई परीक्षक पैसे की लालच में जल्दी-जल्दी कॉपी जांच कर एक दिन में 60 का कोटा पूरा कर रहे हैं जिससे कि उन्हें हर दिन का 600 रूपये मिल सके। इस तरह से 6 घंटे में एक परीक्षक यदि 60 पुस्तिकाओं की जांच करता है, तो एक पुस्तिका पर औसतन समय करीब 16 मिनट को होता है। इसी बीच उन्हें चाय पानी आदि के लिए भी उठाता पड़ता है। इसलिए औसत समय 10 से 12 मिनट होगा। जानकारों का कहना है कि एक उत्तर पुस्तिक का ठीक से मूल्यांकन 10 से 15 मिनट में नहीं हो सकता है। इसलिए कम से कम आधे घंटे का समय चाहिए। यदि एक उत्तर पुस्तिका पर एक परीक्षक आधा घंटा का समय लगाए तो वह एक दिन में 12 कॉपी ही जांच कर पाएंगा। इस तरह वह विश्वविद्यालय के नियमानुसार एक दिन में 30 पुस्तिका ठीक से नहंी जांच पाएगा। लिहाजा, कोटा पूरा करने के साथ ही अधिक कमाइ्र के लिए परीक्षक जल्दी-जल्दी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकरन कर रहे हैं।
वहीं यहां उत्तर पुस्तिका जांच करने आने वाले शिक्षक इस विषय पर कुछ भी बताने से इनकार करते हैं। एक परीक्षक ने बताया कि यहां सभी परीक्षक खासे परेशान है। उनका कहना है कि जिस कमरे में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन किया जा रहा है, वह कक्ष इतना छोटा है कि दम फूलने लगता है। कमरे में हवा-आने जाने के लिए किसी तरह की खिड़की नहीं है। पास में जो टायलेट हैं, उसमें जल की भी आपूर्ति सुचारु रूप से नहीं हो रही है। इसलिए परीक्षकों को तरह-तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। एक परीक्षक ने नाम नहीं छापाने की शर्त पर बताया कि उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के लिए नागपुर से बाहर के परीक्षक आ रहे हैं। वर्धा, चंद्रपुर जिले से आने वाले परीक्षक अपने खर्च पर नागपुर आ रहे हैं। एक तो यहां बैठ कर उत्तर पुस्तिक मूल्यांकन करने की जगह की हालत बदतर है, उपर से अपने खर्च के बाद नागपुर आना हो रहा है। परीक्षकों की शिकायत है कि शिक्षण संस्थान के कैंटिंग में चाय, समोसा और कोल्ड-ड्रींक के अलावा कुछ नहीं मिलता है। विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रण देवेन्द्र नाथ मिश्रा ने परीक्षकों की इस शिकायत पर बताया कि अभी किसी परीक्षक ने इस संबंध में किसी तरह की शिकायत नहीं की है। पहले भी किसी तरह की शिकातय नहीं हुई है। वहीं परीक्षकों का कहना है कि शिकायत कर कौन विद्यापीठ प्रशासन का दुश्मन बनना चाहेगा।
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वैट के खिलाफ गांव-गांव सत्याग्रह


नागपुर में दो दिन तक चले कन्फेडरेषन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के सम्मेलन में वैट विरोधी गुस्सा व्यापारियों में इतना ज्यादा था कि उन्होंने नाग विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स के प्रांगण में आज एक वैट का पुतला फूंक दिया। 26 राज्यों से आए व्यापारी नेताओं ने कसम खाई कि अब वैट में हुई बढ़ौतरी के विरूद्ध आंदोलन तेज किया जाएगा और यह तब तक नहीं रूकेगा जब तक सरकार बढ़ाई हुई किमतों को वापस नहीं ले लेती। कन्फेडरेषन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.सी. भरतिया और महामंत्री प्रवीन खण्डेलवाल ने कहा कि सरकार ने वैट के मुद्दे पर देषभर के व्यापारियों के साथ विष्वासघात किया है और अब वक्त आ गया है सरकारों को यह बताने का कि व्यापारी इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेंगे।
भरतिया ने कहा कि कन्फेडरेषन देषभर में सरकार के खिलाफ एक आंदोलन चलाएगा क्योंकि अगले साल पूरे देषभर में जी.एस.टी. कानून ला रही है और उसकी तैयारियां न ही केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार ने की है। आखिरकार अब हम सरकार पर कैसे भरोसा करें, जब कि उसने वैट के मुद्दे पर पूरी तरह से यू-टर्न ले लिया है। उन्होंने कहा कि वैट के श्वेत पत्र में यह साफ था कि राज्य सरकारें मनमाने ढंग से कभी भी वैट के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगी। यही नहीं, पूरे देष में टैक्स को लेकर एक कानून होगा। लेकिन दोनों में से सरकार ने अपना कोई वायदा पूरा नहीं किया। इसलिए जब तक सरकार इस देष में आसान और एक समान कानून लागू नहीं करेगी, व्यापारी सरकार के खिलाफ लांमबंद रहेंगें।
साथ ही दो दिन तक चले इस अधिवेषन में इस बात पर भी फैसला लिया गया कि केंद्र सरकार ने जो रिटेल ट्रेड में विदेषी निवेष को इजाजत दी है उसे भी व्यापारी समाज स्वीकार नहीं करेगा। उनके मुताबिक भारत एक व्यापार प्रधान देष है और अगर बहुराश्ट्रीय कंपनियों को इसमें आने की इजाजत देंगी तो भारतीय व्यापारी बरबादी की कगार पर पहुंच जाएगा।
व्यापारियों ने यह भी फैसला लिया कि अब से 25 जून को हर साल व्यापारी दिवस के रूप में मनाया जाएगा। प्रवीन खण्डेलवाल ने यह जानकारी दी कि दानवीर व्यापारी भामाशाह का जन्म 25 जून को हुआ था और उन्होंने मेवाड को बचाने के लिए अपनी तमाम संपत्ती और धन महाराणा प्रताप को दे दिया था, ताकि महाराणा मुगलों से लड़ सकें। ऐसे महान व्यापारी पूरे देष के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत है और उन्हें एक स्तंभ के रूप में स्थापित करना जरूरी है। श्री खण्डेलवाल के मुताबिक केंद्र सरकार से 25 जून को व्यापारी दिवस के रूप में मान्यता दिये जाने के लिए वो बातचीत करेंगे। साथ ही वो केंद्र सरकार से इस बात की भी मांग करेंगे कि भामाषाह की एक बडी प्रतिमा दिल्ली में लगाने की इजाजत दी जाए।
इस अवसर पर नाग विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स के सर्वश्री हेमंत खुंगर, अध्यक्ष, मयुर पंचमतिया, वरिश्ठ उपाध्यक्ष, प्रकाष मेहाडिया, मानद सचिव, रामदास वजानी, प्रभाकर देषमुख, विजय केवलरामानी, अतिरिक्त उपाध्यक्ष, फारूकभाई अकबानी, राजू व्यास, अतिरिक्त सहसचिव, लक्ष्मीकांत अग्रवाल, मनुभाई सोनी, रविंद्रकुमार गुप्ता, सचिन पुनियानी, षंकर सुगंध, आनंद मेहाडिया, प्रकाष जैस, लालचंद गुप्ता, आसनदास बालवानी, डॉ. अजय सोनी, प्रिंस उप्पल, ज्ञानेष्वर रक्षक, बजरंगलाल अग्रवाल, हस्तीमल कटारिया, गजानंद गुप्ता, आदि प्रमुखता से उपस्थित थे।

शनिवार, अप्रैल 10, 2010

विदर्भ आंदोलन और शिवसेना का साथ, साथ-साथ


विदर्भ आंदोलन और शिवसेना का साथ, साथ-साथ : सुधीर मुनगट्टीवार

संजय स्वदेश
नागपुर।
विदर्भ राज्य संग्राम समिति की ओर से 1 मई को महाराष्ट्र दिवस पर प्रस्तावित कला दिवस में भारतीय जनता पार्टी हिस्सा नहीं लेगी। इसकी तो मुझे जानकारी भी नहीं है। यह कहना है कि भाजपा के नवनियुक्त महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष सुधीर मुनगट्टीवार का। वे धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में पत्रकारों को अनौपचारिक चर्चा कर रहे थे। ज्ञात हो कि पृथक विदर्भ के गठन के लिए विदर्भ के विदर्भवादी नेताओं ने विदर्भ राज्य संग्राम समिति का गठन किया था। समिति के प्रमुख नेता जामुवंतराव धोटे और रणजीत देशमुख समेत कई नेताओं ने एक प्रेस परिषद में कहा था कि 1 मई को राज्य की स्वर्ण जयंती महोत्सव के दिन काला दिवस दिवस मनाएंगे। इसके लिए विदर्भ की जनता से आह्वान भी किया था कि वे 1 मई को घर-घर काले झंडे लगाएं और राज्य सरकार के किसी भी समारोह में न जाएं।
मुन्नगट्टीवार ने कहा कि 1 मई, महाराष्ट्र स्थापना दिवस से पूर्व ही भाजपा की प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी जाएगी। 1 मई से पार्टी को मजबूत करने और नये कार्यकर्ताओं को जोडऩे के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। इस संपर्क अभियान से कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ेगी। जून माह में तहसील स्तर कार्यकर्ताओं का संपर्क अभियान चलेगा। इसी समय एक हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से कार्यकर्ताओं को पार्टी से जोड़ा जाएगा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने केंद्र और राज्य की सत्तारुढ़ कांग्रेसनीत सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि सरकार की नीतियां असफल हो चुकी है। हर ओर बिजली का टोटा है। गरीबी रेखा के लिए हुए सर्वेक्षण अमल नहीं हो रहे हैं। राज्य में करीब 31 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। राज्य में निवास करने वाले 1.96 करोड़ जनता की प्रति व्यक्ति आया महज 13 रूपया है, जो महाराष्ट्र की बदहाली बताती है। 20 हजार गांवों में 50 प्रतिशत फसल बर्बाद हो चुकी हैं। विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत गरीबों के कल्याण के लिए सरकार ने करीब गत 9 माह में 300 करोड़ रूपये के फंड का उपयोग नहीं कर पाई।
महिलाओं और बच्चों के लिए जो योजनाए बनी है, सरकार ने उसकी केवल घोषणा भर की है। इन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए सरकार के पास फंड ही नहीं है। सरकार केवल लोकलुभावनी घोषणाए कर जनता को भ्रम में रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता जनसंपर्क कर सरकार की जनविरोधी नीतियों को जनता तक पहुंचाएंगे। उन्होंने कहा कि 44 हजार छोटी और 853 बड़ी औद्योगिक इकाईयां सरकार के पास बेहतर नीति नहीं हेाने के कारण बंद हो चुकी है।
मुनगट्टीवार ने कहा कि 1 मई को महाराष्ट्र के स्थापना दिवस का स्वर्ण महोत्सव मनाया जाएगा। भाजपा राज्य सरकार के इस महोत्सव में शामिल होगी। यह महोत्सव केवल राज्य का नहीं बल्कि पूरो महाराष्ट्र का है। उन्होंने कहा कि पृथक विदर्भ राज्य का आंदोलन चलता रहेगा, लेकिन शिवसेना को साथ उनका गठबंधन कायम रहेगा। विदर्भ आंदोलन के कारण कुछ लोग भाजपा-शिवसेना गठबंधन तोडऩे की का भ्रम फैला रहे हैं। जबकि विदर्भ आंदोलन के साथ शिवसेना का भाजपा के साथ संबंध और मजबूत होगा। मुनगट्टीवार ने कहा कि शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे विदर्भ की जनता के विरोधी नहीं है। भाजपा और शिवसेना ने राष्ट्रहित में गठबंधन किया है, सत्त्ता के लिए नहीं। लेकिन गठबंधन तोडऩे का सवाल ही नहीं उठता है।

कटघरे में कब खड़े होंगे 'वनराज के हत्यारे


नागपुर में बाघ के पोस्टर के साथ फोटो खिंचवाता एक वन्य जीव प्रेमी

संजय स्वदेश
बाघों के गणना का कार्य जारी है। गणना कार्य के लिए जुटाये गए संकेतों के समग्र अध्ययन के आधार पर ठोस निष्कर्ष निकालने से पहले ही किसी क्षेत्र में कम तो किसी क्षेत्र में ज्यादा बाघ होने की खबर भी आ रही है। तरह-तरह के कयास हैं। कोई कह रहा है, बाघों की संख्या वर्तमान संख्या 1411 से कम होगी। कही यह संख्या बढऩे की खबर आ रही है।
अब ये आंकड़े घटे या बढ़े, एक बात तय है, बाघों की संख्या एकदम दोगुनी तो होने से रही। तमाम हो-हल्लाओं के बाद भी वन्य जीव (विशेकर बाघ) का शिकार व उनके अंगों की तस्करी नहीं रूकी। देश में कई जघन्य मानवीय अपराधों के दोषी के खिलाफ तो सजा की खबर आपने पढ़ी होगी। पर क्या आपको याद है कि आपने वन्य जीव कानून के अंतगर्त दोषी किसी अपराधी की सजा के बारे में कभी खबर पढ़ी है। इस सवाल पर शायद आप निरुत्तर हो, पर निरुत्तर होने वालों में आप अकेले होंगे। देश में लाखों लोग ऐसे होंगे जिन्होंने बाघों के बचाने की चर्चाओं को सुना होगा, लेकिन इनकी हत्या के दोषियों के सजा के बारे में शायद ही सुने हो।
आप मान या न मानें, यह हकीकत है। बाघ को हिम्मती हत्यारों में कानून का भय नहीं है। फिलहाल अभी केवल महाराष्ट्र की बात करते हैं। राज्य में वन्य जीव संरक्षण कानून-1972 के उलंघन के खिलाफ विभिन्न वन सर्कल में दर्ज मामले वर्षों से लंबित है। महाराष्ट्र में कुल 11 वन सर्कल में वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत फिलहाल 675 मामले लंबित है। लंबित मामलों में नागपुर सर्कल में सबसे ज्यादा 200 केस लंबित है। दूसरे स्थान पर मेलघाट सर्कल है, जहां फिलहाल 158 मामले लंबित है। सबसे कम लंबित मामलों में मुंबई सर्कल है, जहां केवल 4 मामले ही लंबित है। अधिकतर मामले 10 से 15 साल पुराने हैं। मामलों के लंबित होने से ही शिकारियों व वन्य जीव तस्करों के हौसले बुलंद हैं। गत तीन वर्ष के आंकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र में वन्य जीव संरक्षण कानून के उल्लंघन के 123 आरोपी बरी कर दिए गए। वहीं इस अवधि में महज 55 आरोपियों पर ही दोष सिद्ध किया जा सका। मतलब कुल आरोपियों में महज 11 प्रतिशत पर ही दोष सिद्ध हो पाता है। बाकी के 89 प्रतिशत किसी न किसी तरह के दांव-पेंच लगाकर या कानून की कमजोरी या सरकारी अमले की लापरवाही के कारण साफ बच कर निकल जाते हैं। इन आंकड़ों दर्ज ज्यादातर मामले वन्य जीव शिकार, खालो की तस्करी और वन्य जीवों के विभिन्न अंगों की अवैध व्यापार के हैं।
वन विभाग के सूत्रों की मानें तो इस कानून के तहत दर्ज मामले इसलिए प्रालंबित हैं, क्योंकि इसकी जांच प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते हैं। पहले तो केस दर्ज नहीं होता है, यदि किसी तरह से केस दर्ज हो भी जाता है तो जांच से जुड़े अधिकारी कुछ ले-देकर केस को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। वन विभाग के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि केस के लंबित होने की मुख्य वजह संबंधित विभाग के कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण न होने के अलावा, स्टॉफ की कमी, प्रोत्साहन का अभाव, आवश्यक वाहनों की कमी समेत अन्य कई जरूरतों का अभाव है। सुना है कि मध्य प्रदेश सरकार ने वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत दर्ज मामलों के जल्दी निपटारे के लिए ‘ग्रीन कोर्ट' का गठन किया है। यह कितना कारगर है, यह इसकी कोई खबर नहीं पढ़ी। पर विशेषज्ञ कहते हैं कि महाराष्ट्र में भी लंबित इन मामलों के निपटारे के लिए ऐसे कोर्ट के गठन किये जाने चाहिए। अभी तक सामान्य अदालत में ये केस होने से न्यायधिशों का ध्यान इस पर कम रहता है। इसके अलावा वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत दर्ज केस लडऩे के लिए जो सरकारी वकील होते हैं, उन पर भी पहले से ही दूसरे कई केस का भारी बोझ होता है। इसलिए भी वे इन मामलों को अपनी रुचि कम दिखाते हैं। इसके अलावा वन विभाग के पास भी न्यायाधिक अधिकारी की व्यवस्था नहीं होने से ये मामले समान्य अदालत में ही चलते हैं। इन मामलों के निपटारे के लिए न केवल ‘ग्रीन कोर्ट' की आवश्यकता है, बल्कि वन्य जीवों से जुड़ी एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के साथ ही इस कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जांच पड़ताल करने वाली एक विशेष शाखा होनी चाहिए। अभी भी वन विभाग से जुड़े अधिकारी कर्मचारियों में वन्य जीव कानून से जुड़ी जानकारियों का अभाव रहता है। स्वतंत्रण प्रशिक्षित कर्मचारियों की शाखा नहीं होने से मामले की जांच पुलिस करती है। वन क्षेत्रों में तैनात वन अधिकारी भी इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। कई बार तो उन्हें यह खुद ही नहीं पता रहता है कि मामले में अगली बार अदालत में कब पेश किया जाएगा। इस मामले में वे पूरी तरह से पुलिस पर निर्भर रहते हैं।
मामले की गंभीरता को समझते हुए इस मुद्दे को गत वर्ष लोकसभा में भी उठाया गया था। इसके बाद भी सरकार इसको लेकर दूर-दूर तक गंभीर नहीं दिख रही है। केंद्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोषण करते हैं। इसी बीच शिकारी-तश्कर अपना काम कर देते हैं। उन्हें कानून की कमजोरी मालूम है। समान्य समझ की बात है। निजी आंनद के लिए बाघों के शिकार के दिन लद गए। इनके अंगों की तस्करी से मोटी कमाई के उद्देश्य से इनका शिकार जारी है। संगठित गिरोह सक्रिय है। संगठित गिरोह के अपराधी कानून की कमजोरियों से खेलना अच्छी तरह से जानते हैं। तभी तो वन्य जीव संरक्षण के कानून भी बना तो अजादी के करीब ढाई दशक बाद 1972 में। पर कानून बनने के 38 साल बाद भी सरकार वन्य जीव का शिकार करने संगठित गिरोहों के मन में भय का वतावरण भी नहीं तैयार कर पाई।
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