रविवार, मई 09, 2010

निर्वासन के समय गर्भवती थीं सीता

बाल मुकुंद 8 May 2010, 0000 hrs IST, नवभारत टाइम्स
महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है:

दशाचार्यानुपाध्याय उपाध्यायन् पिता दश।
दश चैव पितृन् माता सर्वां वा पृथ्वीमपि।
गौरवेणाभिभक्ति नास्ति मातृसमो गुरु:।।

इसका अर्थ है कि गौरव में उपाध्याय दस आचार्यों से बड़ा होता है, पिता दस उपाध्यायों से भी बड़ा होता है, लेकिन माता दस पिताओं से भी बड़ी होती है। अपने इस गौरव से वह पृथ्वी को भी छोटा कर देती है। माता के समान दूसरा कोई गुरु नहीं है। माता को सबसे श्रेष्ठ मानने का यह उपदेश व्यक्ति के लिए है या समाज के लिए? संभवत: यह उपदेश सिर्फ संतान के लिए ही है, क्योंकि हिंदू मिथॉलजी में इसके पक्ष में सामाजिक आचरण वाले दृष्टांत नहीं मिलते।

अपनी मां को तो हर संतान सबसे ज्यादा प्यार करती है और उसे सबसे पूजनीय मानती है, लेकिन क्या हमारा समाज भी माता का दर्जा पा चुकी स्त्री को या मां बनने जा रही स्त्री को उतनी ही गरिमा प्रदान करता है? यह विचार करने की बात है कि क्या भारतीय संस्कृति में माता, सिंगल मदर और गर्भवती स्त्री को सचमुच देवी जैसा मान दिया गया है?

वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड में उल्लेख है कि लंका विजय के बाद जब राम, सीता को वापस लेकर आते हैं, तब कहते हैं कि मैंने तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए ही छुड़ाया है। अब तुम दसों दिशाओं में जहां चाहो, जा सकती हो। कुछ लोग वाल्मीकि रामायण के इस अध्याय को बाद में जोड़ा हुआ बताते हैं, लेकिन सीता के निष्कासन का प्रसंग रामकथा के परवर्ती भारतीय लेखकों ने बरकरार रखा है।

महत्वपूर्ण यह है कि जिस समय सीता को निर्वासित किया गया, उस समय वह गर्भवती थीं। राज परिवार में पली और ब्याही गई एक स्त्री गर्भवती होकर निर्वासन के बाद कहां जाएगी और कैसे जीवित रहेगी, उसके पेट में पल रहे शिशु के प्राण की रक्षा कैसे होगी, इस पर रामकथा के मर्मज्ञों ने ज्यादा विचार नहीं किया है।

मातृत्व का दर्जा पा लेने के बावजूद स्त्री के तिरस्कृत होने का एक और उदाहरण हमारी पौराणिक कथाओं में मिलता है। ऋषि परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि के कहने पर अपनी मां रेणुका का वध कर दिया था। जिस देश में गाय का वध करने वालों को ब्रह्म हत्या का पाप लगता है, उसी देश में माता का वध करने के बावजूद परशुराम अपने ऋषि पद से च्युत नहीं किए गए। इसके समानांतर कोई और ऐसा प्रसंग नहीं मिलता, जिसमें माता के कहने पर किसी ऋषि-मुनि ने अपने पिता को प्रताड़ित किया हो या उसका वध किया हो।

लोकाचार में अपने यहां संतान को पिता के कुल का उत्तराधिकारी माना गया है। वह अपने पिता के वंश, मान-मर्यादा और संपत्ति को आगे बढ़ाती है। जिन राजाओं या ऋषियों के यहां पुत्र नहीं हुए, उनकी बेटी के शरीर से उत्पन्न पुत्रों ने अपने नाना का उत्तराधिकार पाया, नानी या माता का नहीं। माता से जन्म और पोषण पाने के बावजूद संतान उसके वंश, कुलगोत्र या संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बनती। अर्जुन को कुंती का पुत्र होने के कारण कौंतेय या सत्यकाम को जाबाल कहा गया है, लेकिन ऐसे उदाहरण विरल हैं। दक्षिण या पूर्वोत्तर के कुछ समुदायों में, पुत्र के जीवन में माता का स्थान और उसका निर्णय आज भी महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन वंश और कुल-गोत्र वहां भी पिता का ही मान्य है।

लोक विचार यह है कि पुत्र की उम्र पांच साल की हो जाए तो उसे माता की गोद से निकालकर पिता के अनुशासन में डाल देना चाहिए। इसके पीछे आशय संभवत: यह है कि शैशवावस्था में माता उसके जीवन की रक्षा करती है, लेकिन बाद में पिता ही उसे गुणी बनाता है। माता निर्बल और असमर्थ होती है, वह पुत्र को जीवनयापन के लिए उचित कौशल (जिसमें युद्ध कौशल और पराक्रम भी शामिल है) की शिक्षा नहीं दे सकती। वह उसे शास्त्रास्त्रों में पारंगत नहीं कर सकती। आज भी व्यवहार में यही प्रचलित है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से हमारी मिथॉलजी में उदाहरण इससे बिल्कुल उलट हैं। जिन बच्चों को सिंगल मदर ने पाला, वे अत्यंत पराक्रमी और वीर योद्धा हुए।

कौरवों के माता-पिता जीवित थे, उनका पालन-पोषण गांधारी और धृतराष्ट्र के स्नेह की छाया में हुआ। लेकिन पांचों पांडवों को कुंती ने अकेले पाला था। नकुल-सहदेव के जन्म के तुरंत बाद ही पांडु की मृत्यु हो गई थी। महाभारत के अनुसार कौरव न सिर्फ वीरता में पांडवों से कमतर थे, बल्कि वे नैतिक रूप से भी दुर्बल थे।

शकुंतला से गांधर्व विवाह रचाने के बाद दुष्यंत उसे छोड़कर चले गए थे। दुष्यंत से उत्पन्न पुत्र भरत का पालन-पोषण शकुंतला ने अकेले किया था। बाद में दुष्यंत ने शकुंतला को अपने राज्य में ले जाने का भी कोई प्रयास नहीं किया। जब शकुंतला अंतत: दुष्यंत के दरबार में अपने पुत्र का अधिकार मांगने पहुंची तो भरत के तेज और पराक्रम से ही प्रभावित होकर दुष्यंत ने मां-बेटे को फिर से अपनाया।

इसी तरह का प्रसंग सत्यकाम का है। उनकी मां जबाला सिंगल मदर थीं। उन्हें यह भी पता नहीं था कि उनकी कोख से पैदा होने वाला सत्यकाम किसका पुत्र है। लेकिन जबाला ने अकेले उसका पालन-पोषण किया। सत्यकाम विद्वान ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित हुए और अपनी मां के नाम पर उनका एक नाम जाबाल ऋषि प्रसिद्ध हुआ।

लव-कुश को भी सीता ने अकेले ही पाला था। अयोध्या के राज सिंहासन पर फिर से प्रतिष्ठित होने के बाद राम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया और परंपरा के मुताबिक घोड़ा छोड़ा। लव-कुश ने यज्ञ के उस घोडे़ को बांध लिया और उसके साथ चलने वाले सैनिकों को मार भगाया। उनके इस पराक्रम से प्रभावित होकर राम ने उनके कुल और वंश के बारे में पूछताछ की। मध्यकाल में

ऐसा ही उदाहरण शिवाजी का है। उनकी मां जीजाबाई ने उनका लालन-पालन अकेले ही किया था। संतान के प्रशिक्षण पर पुरुष का एकाधिकार नहीं होता, अपनी संतान को मां अकेले भी वीर और पराक्रमी बना सकती है। यह दूसरी बात है कि सामाजिक रूप से उसे इस गौरव से वंचित रखा जाता है।

9 मई को इंटरनैशनल मदर्स डे है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने शिशु और मातृत्व सुरक्षा पर एक रिपोर्ट जारी की है। यूएन द्वारा कराए गए इस अध्ययन के मुताबिक मां और शिशु की सुरक्षा की दृष्टि से दुनिया के 77 मध्य आय वाले देशों में इस समय भारत का स्थान 73वां है। दुनिया भर के जिन 12 देशों में गर्भवती महिलाओं, सद्य: प्रसूताओं और नवजात बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें होती हैं, भारत उनमें से एक है। संस्कृत के कुछ ग्रंथों में माता को देवी के समान अवश्य बताया गया है, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक मां बनने के लिए यह देश सुरक्षित नहीं है।
साभार : नवभारत टाइम्स

कोई टिप्पणी नहीं: