मंगलवार, सितंबर 22, 2015
विकास तो सब करेंगे, पर कैसे? किसी पास नहीं रोड़मैप
संजय स्वदेश
राजग हो या समाजवादियों के महागठबंधन का कुनबा, हर कोई हर हाल में बिहार की सत्ता पर आसीन होना चाहता है। लेकिन नीति की बात कोई नहीं कर रहा है। एक आदर्श राजनीति का दिया कहीं जलता नहीं दिख रहा है। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली की राजनीति में अमूलचूल परिवर्तन हुए। अरविंद केजरीवाल ने विकास के हर मुद्दे पर चुनाव से पहले अपनी नीति प्रस्तुत की। जनता ने भरोसा जताया और उसे सत्ता सौंपी। कार्यशौली को लेकर भले ही आज दिल्ली में केजरीवाल सरकार की कितनी भी आलोचना हो, लेकिन सच तो यही है कि एक बेहतरीन राजनीति और जनता के बीच अपनी भावी नीतियों के संवाद से आम आदमी पाठी की पैठ बनी। क्या ऐसा ही कुछ बिहार में आपको होता दिख रहा है।
चाहे कोई भी दल हो, हर दल की छोटी से बड़ी जनसभाओं में बस एक दूसरे पर शब्दों के तीर बरसाये जाते हैं। आरोप प्रत्यारोप लगाए जाते हैं। सत्ता में आने के बाद विकास के दावे किये जाते हैं, लेकिन विकास की रूपरेखा क्या होगी, उसे कैसे पूरा करेंगे, इसपर कोई बात करता नहीं दिख रहा है। अभी बिहार की जमीनी हकीकत तो यह है कि जनता दुविधा में है, वह देखों और इंतजार करों की नीति अपना रही है। सबको सुन रही है, समझ रही है, लेकिन अभी अपना मूड नहीं बता रही है। रैली, होर्डिग्स, जनसभाओं से जनता का पूरा मूड नहीं भांपा जा सकता है। यह तो एक कृत्रिम माहौल का माध्यम है। जानने वाले जानते हैं कि होर्डिग्स का फंडा क्या है, जनसभाओं में भीड़ कैसे जुटती है। जो चेहरे भाजपा की रैली की भीड़ में दिखते हैं, वह उसमें से अधिकतर लालू की रैली में भी होते हैं। हवा बना कर, अफवाह उड़ाकर जनता को एक पार्टी विशेष के पक्ष में मतदान का फंडा बिहार में कोई नया नहीं है। बार-बार कोरे आश्वासनों से जनता अजीज आ चुकी है। अब जनता चाहती है कि उसके पास आने वाले नेता, उनकी समस्याओं को सुलझाने का कोरा आश्वासन लेकर आने के बजाय, कोई ठोस कार्य नीति के साथ आए। पर बिहार के चुनाव में ऐसा होता कहां है। जनता यह समझती है कि यह नेताओं के वादों की बरसात है। वादों के साथ जो भी प्रलोभन मिले, उसे स्वीकार करो, क्योंकि फिर ये पांच साल मुंह नहीं दिखाएंगे। इस दौरान अपना चुनावी खर्च और मुनाफा निकालने में व्यस्त रहेंगे।
वर्तमान में बिहार में 18-25 आयु-वर्ग के मतदाताओं की संख्या 28 प्रतिशत है, जबकि 25-35 की उम्र वाले मतदाता 24 प्रतिशत हैं। 18 से 35 साल के इन मतदाताओं की संख्या दो करोड़ के करीब है। युवा मतदाताओं की इस बड़ी जमात को देखकर और इसकी ताकत को भांप कर हर दल यह पहले ही कह चुका है कि टिकट में युवा उम्मीदवारों को तरजीह दी जाएगी। फिलहाल अभी टिकट तो नहीं बंटा है, लेकिन हर दल युवाओं की जमात को अपनी ओर जोड़ने की हर संभव रणनीति में हैं। बिहार में करीब साठ प्रतिशत युवा मतदाताओं को बेहतर रोजगार के अलावा और क्या चाहिए। क्या बिहार में बनने वाली कोई भी सरकार पांच बरस में इतने रोजगार के अवसर पैदा कर देगी कि पलायन नहीं होगा? केवल दावा करने से कुछ नहीं होगा, उन्हें बताना होगा कि इसके लिए राजनीतिक दलों के पास कौन की कार्य योजना है। यही राजनीति का बेहतर मार्ग है। वोटों की खरीद फरोख्त के परिणाम से भविष्य में हर कोई प्रभावित होता है। लेकिन अभी जो राजनीतिक हालात बन रहे हैं, उसके अनुसार जंगलराज पार्ट-2 बनाम कमंडल की स्थिति है। एक ओर जहां एनडीए की जमात लोगों में इस बात का खौफ फैला रहे हैं कि समाजवादियों के महागठबंधन यानी नीतीश लालू के गठजोड़ की सत्ता आई तो बिहार में फिर जंगलराज के हालात होंगे। जिस नीतीश के साथ भाजपा ने कदम से कदम मिलाकर बिहार में विकास की गंगा बहाने का डंका देश दुनिया में बजाया गया, आज उसी नीतीश का पूरा शासनकाल कलंकित हो चुका है। दिगर की बात यह है कि की जदयू-भाजपा गठबंधन में भाजपा के विधायक भी मंत्री थे। सुशील मोदी उप मुख्यमंत्री के पद पर सुशोभित थे। फिर तो नीतीश के जंगलराज की आधी जिम्मेदारी उनकी भी बनती है। लिहाजा, जनता को बरगलाने या भरमाकर सत्ता पाने की हर जुगत जारी है, लेकिन विकास का रोड़मैप किसी के पास नहीं है। -संजय स्वदेश, कार्यकारी संपादक, साप्ताहिक बिहार कथा
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गुरुवार, अगस्त 13, 2015
दंगा कराने वाले, बचाने वाले और दंड दिलाने वाले सब एक
संजय स्वदेश
चुनाव नजदीक है, हर दल अपना वोट बैंक बढ़ाने में लगे हैं। चुनाव की तारीख घोषणा होने के पहले ही नीतीश सरकार द्वारा गठित एक सदस्यीय भागलपुर सांप्रदायिक दंगा न्यायायिक जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट दे दी। रिपोर्ट जारी भी हो गई। रिपोर्ट के अनुसार सारा दोष कांग्रेस पर मढ़ा गया है। 25 साल पहले 1989-90 में हुए भागलपुर दंगे के लिए तब के कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। शीलवर्द्धन सिंह अब अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रशिक्षण) हैं। खुफिया ब्यूरों में वरिष्ठ पद पर आसीन हैं इसके साथ ही। रिपोर्ट में कहा गया है कि उस समय सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार और मुख्य रूप से एसपी (ग्रामीण) शीलवर्द्धन सिंह को दोषी दंगे के लिए दोषी है। रिपोर्ट में तत्कालीन एसपी पर कार्रवाई के लिए अनुशंसा भी की गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भागलपुर शहर और तत्कालीन भागलपुर जिÞले के 18 प्रखंडों के 194 गांवों में दंगों में 1100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। लोग बताते हैं कि यह सांप्रदायिक दंगा करीब छह महीने तक चला। मजेदार बात यह है कि नीतीश सरकार की गठित इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट इसी साल फरवरी में सरकार को सौंप दी थी। लेकिन तब सरकार ने इस रिपोर्ट को जारी नहीं किया। इसे अभी जारी करना इस बात का संकेत है कि सरकार इस जांच रिपोर्ट को चुनाव में भुनाना चाहती है।
जानकार बातते हैं कि बिहार में ग्रमाीण एसपी के लिए कोई पद बिहार में नहीं है। लेकिन जब दंगा भड़का तो उसे कथित नियंत्रण के नाम पर यह पद सृजित किया गया। लेकिन जिस अफसर को दंगे रोकने की जिम्मेदारी दी गई, रिपोर्ट के अनुसार सैकड़ों कत्ल ए आम का वहीं हत्यारा निकला।
इस देश में दंगे की आग पर राजनीति की रोटी खूब सेंकी जाती रही है, लेकिन अब वक्त बदल चुका है। सांप्रदायिक भीड़ यदि आक्रोशित होती है, तो उसी भीड़ में आज एक ऐसा वर्ग भी है तो सही हालात को जानता है और उसे संयम करने की कवायद करता है। चुनाव घोषणा से कुछ ही सप्ताह पहले भले ही नीतीश सरकार ने राजनीतिक लाभ लेने के लिए रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी हो, लेकिन इस बात की संभावना बहुत कम है कि इसका फायदा वोट बैंक बढ़ाने में मिलेगा। इतने कम समय में सरकार रिपोर्ट में दोषियों पर त्वरित कार्रवाई करें, इसकी संभावना बहुत कम है। इस रिपोर्ट में जिस कामेश्वर यादव नाम के एक व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था, उसी कामेश्वर को जब लालू यादव की जनता दल सरकार सत्ता में आई थी तो बरी कर दिया गया था। लेकिन नीतीश कुमार की सरकार आई तो फाइलें दोबारा खुलीं और फिर से मामला दर्ज हुआ और उन्हें सजा हुई। वह आज भी जेल में है। आज लालू, नीतीश और कांग्रेस एक खेमे हैं। दंगा कराने वाले, दंगाई को बचाने वाले और और सजा की बात करने वाले एकजुट है, फिर जनता न्याय की क्या उम्मीद करेगी।
रविवार, जुलाई 26, 2015
रेल क्रांसिंग पर हादसे का जिम्मेदार कौन?
संजय स्वदेश
यदि आपको याद हो तो करीब एक साल पहले तेलंगाना के मेडक में मानव रहित क्रॉसिंग पर भी एक दर्दनाक हादसा हुआ था। बच्चों को स्कूल ले जा रही बस एक्सप्रेस ट्रेन से टकरा गई थी और 14 नौनिहाल अकाल काल के गाल में समा गए थे। तब देश भर में मानवरहित रेलफाटकों को लेकर काफी हो हल्ला मचा। मीडिया में भी बसह चली थी। लेकिन क्या हुआ। न सरकार ने सबक लिया और लोग। रेलवे फाटक पार करते हुए एक बार दाये बाये देखकर थोड़ा संयम रख लेने में कौन सी आपदा टूट पड़ती है।
मानवरहित रेलवे क्रांसित पर हादसों का इतिहास पुराना है। अंग्रेजों ने जब रेल पटरियां बिछाई थीं, तब न तो इतनी सड़कें थीं और न जनसंख्या का ऐसा दबाव। शायद इसीलिए उन्होंने कम यातायात वाले मार्गों पर बिना फाटक और चौकीदार के क्रांसिंग को आम लोगों के आने-जाने का रास्ता खोलने का फैसला किया होगा। तब पटरियों पर दौड़ रही ट्रेनों अथवा मालगाड़ियों की संख्या बहुत कम थी। तब के ट्रेनों में कोयले के इंजन होते थे और उनकी स्पीड कम होती थी। तब से अब तक हालात में जमीन-आसमान का परिवर्तन हो गया है। तेज गति से दौड़ने वाले इंजन आ गए हैं। सवारी और मालगाड़ियों की संख्या में कई गुना बढ़ोततरी हो गई है। रेल पटरियों के दोनों ओर की आबादी का घनत्व कई गुना बढ़Þ गया है, लेकिन जानलेवा व्यवस्था अभी भी जस का तस है। यही वजह है कि हमें आए दिन ऐसी दुर्घटनाओं की खबरें पढ़नी पड़ती हैं।
नई दिल्ली में ससंद का जब भी सत्र होता है, करीब करीब हर सत्र में मानवरहित रेलवे क्रासिंग पर होने वाले हादसों को लेकर कोई न कोई सांसद प्रश्नकाल में जरूर सवाल उठाता है। मानसून सत्र में 24 जुलाई को रेलराज्य मंत्री मनोज सिंहा ने एक सवाल के लिखित जवाब में संसद को बताया कि देश में बिना चौकीदार वाले मानवरहित रेलवे समपार (फाटक) की कुल संख्या 10440 है, जिनमें सबसे अधिक 2087 ऐसे समपार पश्चिम रेलवे में हैं। पश्चिम रेलवे में 2087 ऐसे रेलवे क्रांसिंग हैं जबकि उत्तर पश्चिम रेलवे में 1057, उत्तर रेलवे में 1050 और पूर्वोत्तर रेलवे में 1036 रेलक्रांसिंग मानवरहित हैं।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ऐसी जानलेवा घटनाएं होती हैं। यूरोप और अमेरिका के विकसित देश भी इस महामारी से ग्रस्त हैं। अमेरिका में हर साल तकरीबन 300 और यूरोप में 400 लोग रेलवे क्रॉसिंग पर मारे जाते हैं। रेलवे क्रॉसिंग पर विश्व इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा हादसा 1967 में जर्मनी में हुआ। इसमें एक साथ 97 लोगों की जान गई थी। 2005 में पश्चिमी भारत के शहर नागपुर के पास भी ऐसी ही दिल दहलाने वाली दुर्घटना हुई, जिसमें 55 लोग मारे गए थे। आंकड़े समस्यता की विकरालता को साबित कर रहे हैं। लेकिन यह समस्या स्वयं खत्म भी हो जाएगी ऐसा भी नहीं है। 2011-12 में मानव रहित क्रॉसिंग पर 131 हादसे हुए। इनमें 319 लोग मारे गए, जिसमें 17 रेलकर्मी भी थे। यदि साल का औसत देखें तो पता चलता है कि हमारे एक-तिहाई से ज्यादा दिन इस तरह की दुर्घटनाओं के नाम हो जाते हैं।
अनिल काकोदकर की अगुवाई वाली समिति ने 2012 में सरकार से सिफारिश की थी कि अगले पांच साल में सभी मानव रहित क्रॉसिंग समाप्त की जानी चाहिए। समिति का दावा था कि इससे रेल हादसों में 60 फीसदी की कमी आ सकती है। इस रिपोर्ट को आए तीन से ज्यादा समय बीत चुका है। लेकिन न तब के और न अब की सरकार में इसको लेकर गंभीरता दिखी। समिति की रिपोर्ट की कही कोई आता पता और न ही चर्चा सुनाई दे रही है। हालांकि पिछली बजट में सरकार ने रेल बजट में 5,400 मानव रहित क्रॉसिंग हटाने का संकल्प किया था। लेकिन उसके बाद एक और बजट भी आ गया हुआ क्या? अगले साल एक और बजट आ जाएगा। हादसे होते रहेंगे। सरकार की ओर से ऐसे आश्वासन मिलते हैं फिर सब कुछ वैसा के वैसा ही रहता है। एक अनुमान के तहत मानव रहित रेलवे क्रांसिंग की सुविधा समाप्त करने पर 30,646 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। इसकी भरपाई पेट्रोल और डीजल पर उपकर के प्रतिशत के रूप में केंद्रीय सड़क निधि द्वारा किया जाता है। इसके बाद भी हालत जस के तस है। सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो लेकिन इस समस्या को निपटने के लिए किसी में भी जबर्दस्त इच्छाशक्ति नहीं दिखी। ऐसे हादसे आए दिन देश के किसी ने किसी हिस्से में होते हैं। हादसे के बाद तत्कालीन जनाक्रोश तो दिखता है, लेकिन आंक्रोश की आग जल्द ही ठंड पड़ जाती है। बिना फाटक वाला रेलवे क्रांसिंग फिर से हादसे का इंतजार करता है।
गुरुवार, अप्रैल 09, 2015
जनता को जगाओ, बच्चों को बचाओ
संजय स्वदेश
कुछ दिन पहले संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि उसके प्रयासों से पिछले दो दशक में दुनिया भर के करीब नौ लाख बच्चों की जिंदगियां बचाई जा सकी हैं लेकिन 2015 तक इस मृत्यु दर में दो तिहाई की कमी का लक्ष्य फिलहाल पूरा होता नहीं दिखता। रिपोर्ट खुलासा करती है कि 1990 में जहां विभिन्न कारणों से दुनिया भर में पांच साल तक की आयु के एक करोड़ 26 लाख बच्चे असमय काल के ग्रास बन गए। वहीं 2012 में यह आंकड़ा 66 लाख पर ही रुक गया। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चों की मौत अकेले भारत, चीन, कांगो, पाकिस्तान और नाइजीरिया में होती है। बच्चों की इस असामयिक मौत के लिए निमोनिया, मलेरिया और दस्त के साथ कुपोषण को बड़ी वजह बताया गया है। इस अभियान का सबसे सुखद, सराहनीय और उल्लेखनीय पहलू यह है कि बांग्लादेश, इथोपिया, नेपाल, लाइबेरिया, मलावी और तंजानिया जैसे गरीब देश भरसक कोशिश करते हुए 1990 के बाद से अब तक अपने यहां बाल मृत्यु दर में दो तिहाई या उससे अधिक की कमी का लक्ष्य हासिल कर प्रेरक बन गए हैं। ए गरीब देश भारत जैसे विकासोन्मुख देशों के लिए बड़ी प्रेरणा कहे जा सकते हैं जहां दिन-ब-दिन बढ़ÞÞती जनसंख्या के साथ बाल मृत्यु दर सबसे भयावह समस्या बनी हुई है। यूनिसेफ की 2012 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में वैश्विक स्तर पर इस आयु वर्ग के प्रतिदिन मरने वाले 19000 बच्चों में से करीब चौथाई भारत में मृत्यु का ग्रास बने। यानी हर दिन करीब चार हजार बच्चे मौत के मुंह में समा गए। बाल विकास के नाम पर तमाम सरकारी और गैर-सरकारी योजनाओं की मौजूदगी के बावजूद अपने यहां दुनिया के बाकी देशों की तुलना में सबसे ज्यादा मौतें होना बहुत त्रासद और विचारणीय है। अपने यहां बच्चों की असामयिक मौत के पीछे गरीबी, कुपोषण और अशिक्षा सबसे बड़े कारण माने जाते हैं और इसके लिए अंतत: हमारा शासन तंत्र जिम्मेदार है। भारत में केंद्र और राज्य सरकार के ढेरों ऐसी योजनाएं हैं जिसके माध्यम से सरकारी अमला बच्चों के बेहतर भविष्य का दावा करता हैं, लेकिन हालात यह है कि ऐसी योजनाएं लाखों मासूम तक पहुंचने से पहले भ्रष्टाचार का ग्रास बन जाती है। ये भ्रष्टाचारी कभी यह नहीं सोचते हैं कि जिनके हिस्से की राशि वे भ्रष्टाचार के रूप में लेकर कर अपने घर-परिवार में बच्चों को ऐसो आराम उपलब्ध करा रहे हैं, दरअसल उसकी कीमत किसी दूसरे के गोद के मासूम के मुंह में जाने वाला निवाला है, स्वास्थ्य सुविधाओं समेत अन्य दूसरी योजनाओं के रूप में उनकी जिंदगी है। मासूम बच्चों के लालन-पालन, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार पर नहीं हैं। केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकार के कंधे पर भी यही बोझ है। आज के मासूम बच्चे ही कल के जिम्मेदार नागरिक हैंÑ, जैसा वे वातावरण पाकर बड़े होंगे वैसा ही आने वाले भारत का भविष्य होगा। आज देश में छोटे-बड़े क्षेत्रों में कई क्रूर इंसान मिल जाएंगे। वे असामाजिक तत्वों के दायरे में आएंगे। दरअसल ऐसी प्रवृत्ति उनके बचपन में मिले वातावरण के कारण ही विकसित हुए। समाज की भी ऐसी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने बीच के भूखे-नंगे और किसी बीमारी से पीड़ित बच्चों की सुध ले। भविष्य संवारने की जिम्मेदारी केवल सरकार और एक परिवार विशेष की नहीं होती है। समाज को इस दिशा के सोचना बेहद जरूरी है कि आज के नौनिहालों के मन में यदि नकारात्मक प्रवृत्ति घर करती है और वे बड़े होकर असामाजिक तत्वों हो जाते हैं। फिर वे उसी समाज को दर्द देंगे। समाजिक-सरकारी उपेक्षा से में पल कर तैयार होने वाले नागरिक इस बात की गारंटी नहीं दिलाते हैं कि वे अपने बचपन में समाजिक और सरकारी उपेक्षा के बदले समाज और देश के साथ कुछ अच्छा करेंगे। राष्टÑीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलाई जाने वाली योजनाओं की सफलता की रफ्तार बहुत धीमे हैं। क्योंकि इन योजनाओं में समाज का उचित सहयोग नहीं मिल पता है। समाज में माहौल तैयार करने की प्रक्रिया एक वाहन के दो पहिए की तरह है। एक पहिया योजनाओं के क्रियान्वयन करने वाले एजेंसियों हैं तो दूसरा समाज। यह सामूहिक जिम्मेदारी है। 09/04/2015
गुरुवार, मार्च 26, 2015
मन की माया और प्रेत का साया
संजय स्वदेश
नवरात्री के दिनों में ओझ गुनियों के दिन फिर जाते हैं। वे तांत्रिक क्रियाएं करते हैं। इसी दौरान पूजा के नाम पर कथित रूप से भूत पे्रत के साये से ग्रस्त लोगों पूजा पाठ करवाने के नाम पर धन एठते हैं, लेकिन भूत छूमंतर होने का नाम नहीं लेता है। गोपालगंज जिले के लछवार में माता के दरबार में (और भी कई जगह) यहां भूत खेलते हैं। नवरात्र में यहां आने वाले लोगों का मेला लगा रहा। लछवार मंदिर में पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल और बिहार के अन्य जिलों से लोग आते हैं। कहने के लिए तो कुछ की बीमारी ठीक होती है तो कुछ वर्षों से यहां आ जा रहे हैं, लेकिन उनकी बीमारी ठीक होने का नाम नहीं ले रही है। यहां आने वाले अधिकर लोग वे हैं जो ओझागुनी से निराश हो चुके होते हैं। वहीं चिकित्सा विज्ञान का कहना है कि भूत खेलना पूरी तरह से मानसिक बीमारी है। इसी का ओझा खुब फायदा उठा रहे हैं। यदि कोई इसका विरोध करता है तो लोग कहते हैं कि यदि भूत पिसाच का साया नहीं रहता तो इन धामों पर इतनी भीड़ क्यों होती हैं और दूर-दूर से लोग क्यों आते हैं...पर कुतर्की यह नहीं समझते हैं कि यहां आने वाले सारे अंधविश्वासी लोगों की सं या जिले की कुल सं या की एक प्रतिशत भी नहीं होती है। फिर तो यहां बिहार भर से लोग आते हैं। इस तरह देखा जाए तो यह सं या बहुत ही कम है और वहीं जब एक जगह इतनी कम सं या जमा होती है तो भीड़ बढ़ जाती है। इससे दूसरे लोगों में विश्वास बढ़ जाता है। दरअसल भूत प्रेम पूरी तरह से मानसिक बीमारी है। इसका साया उन क्षेत्रों में और उन परिवारों में ज्यादा है तो जो अशिक्षित या कम पढ़े लिखे हैं। जो तर्क की कसौटी पर कुछ नहीं देखते हैं। बिहार में भूत पे्रत की साया से ग्रस्त होने वालों में महिलाओं की सं या ज्यादा है। जब यही लोग दूसरे शहर में जाते हैं तो उनका भूत प्रेत का साया अपने आप उतर जाता है। अमूमन शहरों में तो इसका असर ही नहीं रहता है। विज्ञान यह मान चुका है कि भूत प्रेत खेलना या खेलाना यह एक तरह से मानसिक बीमारी है। बीमार में आम बीमारियों के इलाज के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है। फिर मानसिक बीमारी के इलाज की बात ही छोड़ दीजिए। देश भर में मनोचिकित्सकों की भारी कमी है। बीमार में तो लोग यह मानने को ही तैयार नहीं होते हैं कि ऐसा भी कोई डॉक्टर होते हैं जो केवल मन के रोग को दूर करते हैं। जबकि मानसिक रोगों को दूर करने की पूरी की पूरी एक वैज्ञानिक तकनीक है।
यह भूत-प्रेत का ही असर है कि आए दिन किसी न किसी को डायन के नाम पर प्रताडि़त होना पड़ता है या फिर कही किसी की हत्या होने की बात सामने आती है। जब पूरी दुनिया विज्ञान के तकनीक के सहारे ढऱों सुविधाओं का उपभोग कर रही है तो वहीं बिहार का एक समाज मन की बीमारी को भूत प्रेत के खौफ में दर दर की ठोकरे खा कर न केवल अपना धन व्यर्थ कर रहा है बल्कि अपना भविष्य भी चौपट कर रहा है। जिनके घर में कोई महिला या पुरुष कथित रूप से भूत प्रेत के साये से ग्रस्त है, यदि उनके सामने विज्ञान की बात करों तो वह सीधे कहते हैं कि जिन पर पड़ती है वही जानते हैं। उनका यह तर्क ठीक है। पर अपनी इस समस्या में पडऩे के बाद वे सच और झूठ को तर्क की कसौटी पर परखने की क्षमता खो देते हैं। जब वे अपने पूरे जीवन में विज्ञान के उत्पन्न दूसरे सुख सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं तो फिर वे मन की इस बीमारी में विज्ञान का सहारा क्यों नहीं लेते हैं। वे यह क्यों नहीं देखते हैं कि शहरों में इस तरह की बीमारी होती ही नहीं है। यदि होती भी है तो वहां डॉक्टरों से इसका समुचित इलाज करवाया जाता है न कि ओझा गुनी का चक्कर लगाया जाता है। सरकार को भी इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। बिहार में समाज के इस हालात को देख कर सरकारी अस्पतालों में मनोचिकित्सकों की तैनाती बेहद जरूरी है। जिनके परिवार के लोग भूत प्रेत की मनोविज्ञान में फंस कर ओझा गुनी के चक्कर काट रहे हैं, उन्हें समझाना व्यर्थ है। लेकिन उन्हें देखकर दूसरे लोग उसके चक्कर में पड़ रहे हैं तो यह समाज के उज्ज्वल भविष्य का संकेत भी नहीं है।
सोमवार, दिसंबर 15, 2014
फेसबुकिया फुसफुसाहट के बीच सफल रायपुर साहित्य महोत्सव
संजय स्वदेश
रायपुर साहित्य उत्सव संपन्न हुआ। इसकी शुरुआत से लेकर समापन के बाद तक फेसबुक पर तरह तरह के मुद्दे को लेकर फुसफुसाहट जारी है। कोई दमादारी से इसके पक्ष में आवाज उठा रहा है तो कई मित्र छत्तीसगढ़ के कुछ मुद्दों को पैनालिस्टों द्वारा नहीं उठाने को लेकर विधवा विलाप कर रहे हैं। इस आयोजन के पहले और समापन के बाद तक ढेरों ऐसी बातें हैं जो इस समारोह में शामिल होने वाले भी नहीं जान पाए होंगे या दिल्ली से टाइमलाइन पर पोस्ट करने वाले महसूस कर पाए होंगे। जिस दौर में अखबारों के पन्नों से साहित्यिक को लेकर जगह के आकाल पड़ने को लेकर अखबार मालिक व संपादकों को कोसा जाता है, उस दौर में एक ऐसा राज्य साहित्य का एक ऐसा भव्य उत्सव का आयोजन करता है, जिससे न केवल रचनाकार बेहतरीन सम्मान पाता है बल्कि उसे अच्छा मानेदय दिया जाता है, यह कम बड़ी बात नहीं है। हिंदी साहित्य वाले हमेशा पारिश्रमिक को लेक रोना रोते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में शायद अतिथियों को उतना मानदेय नहीं दिया जाता है जितना की छत्तीसगढ़ सरकार ने दिया।
इस पर यह तर्क देकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है कि यह पैसा गरीबों का है, नसबंदी कांड के पीड़ितों को दे दिया जाता तो उनका भला हो जाता। नसबंदी कांड निश्चय ही शर्मनाक घटना थी, लेकिन मामले के प्रकाश में आते ही जिस तरह से प्रशासन ने हरकत में आकर इस पर कार्रवाई की, उससे कई महिलाओं की जान बच गई। उन्हें सरकार ने मुआवजा दिया। उनके बच्चों को सरकार ने गोद ले लिया। 18 साल तक के उम्र तक बेहतरीन अस्पताल में इलाज का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया। इन सब सकारात्मक चीजों को स्थानीय अखबारों में जगह तो मिल गई, लेकिन बाहरी मीडिया में इसे तब्बजों नहीं मिला। सरकार हर विभाग को अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बजट देती है। तो क्या स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से जो मातमी माहौल बना, उसमें सांस्कृतिक विभाग और जनसंपर्क विभाग अपनी जिम्मेदारी और दायित्व को छोड़ दे।
रायपुर साहित्य उत्सव को लेकर सोशल मीडिया में जो बातें आ रही हैं, उसका न कोई ठोस तर्क है न ही विरोध का मजबूत आधार। चूंकि साहित्य का इतना बड़ा आयोजन पहली बार हो रहा था। थोड़ी बहुत चूक की गुजांईश स्वाभाविक है। लेकिन थोड़ी चुक से पूरी साकारात्मक पहल को नाकार देना कहां का न्याय है? दिल्ली में साहित्यिक संगोष्टि होती है तो तब उसमें विरोध करने वाले यह मुद्दा क्यों नहीं उठाते हैं कि हर दिन दिल्ली की सड़कों पर लापरवाही से वाहन चलाने वाले दो-चार लोगों को अकाल मौत की नींद सुला देते हैं। आखिर वहां भी तो आयोजन होते हैं और दिल्ली की सड़कों पर होने वाली मौतें कम बड़ा मुद्दा नहीं है। चलिए इस मौतों को छोड़िए, दुष्कर्म के तो हर दिन मामले दर्ज होते हैं, फिर ए साहित्यकार क्यों नहीं भक्तिकाल और रीतिकाल से साहित्यिक गतिविधियों बहिष्कार या विरोध करते हैं। दिल्ली में महिला सुरक्षा तो बड़ा मुद्दा है। इस मुद्दे को लेकर साहित्यक गतिविधियों में साहित्यकारों का क्या स्टैंड होता है?
दरअसल पूरी प्रवृत्ति विरोध करने को लेकर विरोध की मानसिकता की दिखती है। शहर से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने तक इस कार्यक्रम को लेकर जितने होर्डिंग या बोर्ड लेगे थे निश्चय ही उससे कहीं ज्यादा कुर्सियां यहां खाली दिखी। लेकिन जो अतिथि वक्ता आएं, उनसे बातचीत के आधार पर स्थानीय अखबारों ने जो कवरेज और बातों को प्रस्तुत किया, अलगे दो दिनों तक भीड़ बढ़Þती गई। इसके बाद भी कुछ लोगों की यह शिकायत थी कि मंडल में कुर्सियां खाली रही। इसको लेकर एक बात और सुनिए।
हर मंडल में दिन एक ही समय पर तीन से चार कार्यक्रम। भव्य आयोजन था। इतने साहित्य प्रेमी कहां से आते। जिन्हें जो विषय पंसद आया वे उसे मंडप में बैठे रहे। हमें एक ही समय में दो मंडपों के कार्यक्रम पसंद आए, लेकिन एक ही मंडप में बैठना पड़ा। यदि दिल्ली में इसी तर्ज पर साहित्य का उत्सव हो तो संभवत हर मंडल में भीड़ उमड पड़े। लेकिन वह कार्यक्रम दिल्ली से बाहर सूरजकुंड में हो तो शायद दर्शकों और श्रोताओं का टोटा पड़ जाता। यहां तो एक छोटे से राज्य के एक छोटी सी राजधानी में बाहर जहां घुमने जाने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ती है, वहां साहित्य का उत्सव होता है और सीधे सादे छत्तीसगढ़ के मुठ्ठी भर साहित्य प्रेमी इस उत्सव में पहुंचते हैं, यह कम बड़ी बात नहीं है। दिल्ली मुंबई से आए हुए वक्ताओं को तो यहां की ट्रैफिक उनके शहर की तुलना में नागण्य दिखी होगी, लेकिन वह यहां की जनता के लिए ज्यादा है? हर शहर की अपनी क्षमता होती है।
एक और चीज तो फेसबुक पर लेकर चर्चा हो रही है कि यहां आने वाले वक्ताओं ने सरकार को नहीं घेरा। मैं स्वयं एक मंडप में उपस्थित था। वहां देखा ही नहीं सुना भी। दिल्ली के एक वक्ता ने तो यहां के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के उद्घाटन में दिए गए वक्तव्यों को लेकर कटघरे में खड़ा करते हुए रियल दुनिया वर्चुअल और ओर वर्चुअल रियल है का बेहतरीन ओर सटिक उदाहरण दिया। इसी मंडल के मंच पर दो अन्य वक्ताओं से भी सत्ता को कटघरे में खड़ा करने वाली बातें सुनने को मिली। कार्यक्रम में अंतिम दिन तो हालत यह थी कि पार्किंग दो पहिया और चार पहिया वाहनों से भरी हुई थी। भीड़ गैर साहित्यकारों की ज्यादा थी। गैर साहित्य प्रेमी इस उत्सव को देखने पहुंचे थे। संभव हो इससे उनमें रुचि जगे ओर अगले बरस के आयोजन में वे सुनने के लिए मंडप में भी बैठ जाएं।
उत्सव में बाहर से आए वक्ताओं के बारे में एक और बात। यह साहित्य गैर साहित्यिक आयोजनों में हमेशा होता है। एक आयोजन में उसे विषय से जुड़े सभी साहित्यकारों को तो नहीं बुलाया जा सकता है। जिन्हें बुलाओ, उनके विरोधी गुट हमेशा मुंह फुलाते हैं और जो हवा छोड़ने हैं, वह निश्चय ही आयोजन को असफल करने के लिए होती है। मतलब उन्हें बुलाया जाता तो कार्यक्रम सफल होता। उनके नहीं जाने से ही यह अधूरा रह गया। कोई अतिथि सही है या गलत कभी कभी इसका निर्णय मेजवान पर भी छोड़ना चाहिए। मेहमान तो अपना चरित्र दिखा ही देते हैं। इसके भी उदाहरण है। एक पैनलिस्ट को आमंत्रण मिला तो उसने मेजबान अधिकारी को फोन लगा कर पूछा-कार्यक्रम में मेरी बेटी भी आने वाली है, क्या उसे भी प्लेन का टिकट मिलेगा...अधिकारी महोदय ने अपने अधिनस्त को बोला जो लड़की आना चाहती है, उसके और गेस्ट के सर नेम और उम्र का अंतर आदि सब मिलान कर देखों कि क्या सच में वह अपनी बेटी को ही ला रहा है न...।
रायपुर साहित्य उत्सव में बुलाए गए मेहमान वक्ताओं को 25 हजार का मानदेय मिला, प्लेन का किराया भी दिया गया। उस होटल, जिसमें एक रात का किराया कम से कम पांच साढ़े पांच हजार रुपए है, उसमें ठहराया गया। उन्हें खाने की सुविधा मिली। कार्यक्रम स्थल तक लाने ले जाने के लिए एसी कार भी उपलब्ध कराई गई। लेकिन इसमें भी कुछ मेहमान ऐसे थे जो इस बात को लेकर नाराज थे कि होटल में इतनी बेहतरीन सुविधा तो थी, लेकिन लेकिन दारू की व्यवस्था नहीं थी। इसके लिए होटल में थोड़ा बहुत बवाल भी किया। पर होटल वाले ने साफ कह दिया कि उन्हें बस रखने और खिलाने की ही बुकिंग हुई है, पीने के लिए अपना खर्चना पड़ेगा।
ऐसी साहित्यिक आयोजनों में विचारों को लेकर वाद प्रतिवाद हमेशा से होता रहा है और होता भी रहेगा। लेकिन यदि कोई सरकार आगे साहित्य के हित में इतना बड़ा आयोजन करती है तो उसे दूसरे मुद्दे को लेकर नाकार देना उचित नहीं लगता है। छोटे से छत्तीसगढ़ ने देश के बड़े साहित्याकरों को बुलाया, इसको लेकर छत्तीसगढ़ का साहित्यप्रेमी गदगद है। इस आयोजन ने भविष्य में एक बेहतरीन साहित्यिक आयोजन की परंपरा का बीज बो दिया। जैसे जयपुर का लिटरेचर फेस्टिवल देश दुनिया में नाम कर चुका हैं, वैसे छत्तीसगढ़ का भी होगा, इतना सपना देखने का हक तो छत्तीसगढ़ को भी बनता है।
नया रायपुर के जिस पुरखौती मुक्तांगन में यह भव्य आयोजन संपन्न हुआ, उस ओर मुख्यमार्ग से जाने वाली करीब सौ मीटर की दिवार पर छत्तीसगढ़ की लोक कला भित्ति चित्र शैली में यहां के राम वन गमन व अन्य पौराणिक लोक कथाओं के प्रसंगों के चित्र बने हैं और उसकी चार लाइन की छोटी सी व्याख्या दी गई है। उसमें दो भित्ति चित्र पर नजर पड़ी। उस की व्याख्या लिखी थी-इधर महीने बाद राजा दक्ष ने एक बड़े यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें पृथ्वी के तमाम महाराज व साधु संतों को आमंत्रित किया गया। किंतु शिव को नहीं बुलाया गया.....इस तरह से राजा दक्ष ने ना चाहते हुए भी सत्ती का विवाह बड़े ही धुमधाम से भगवान शंकर से संपन्न हुआ। आसमान से फूल बरसे...। छत्तीसगढ़ में साहित्य का यह भव्य आयोजन निश्चय ही किसी यज्ञ से कम नहीं था। दिल्ली में बैठ कर इस यज्ञ को नकारने वालों की नाकारात्मक मंशा के बाद भी सफल हुआ। हालांकि यह युग शिव और दक्ष का नहीं है, इसलिए आसमान से फूल तो नहीं बरसे, लेकिन एक संवेदनशील साहित्यकार ने भविष्य में साहित्य की बेहतर संभावनाओं के प्रोत्साहन का आंकलन जरूर कर लिया
मंगलवार, दिसंबर 02, 2014
सुस्त खुफिया और हताश नक्सली
छत्तीसगढ़ नक्सली हमले से एक दिन पहले गुवहाटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मार्ट पुलिसिंग की वकालत करते हुए मजबूत देश के लिए मजबूत खुफिया तंत्र होने की बात कही थी। मतलब पीएम यह स्वयं मानते हैं कि अपने देश की खुफिया तंत्र मजबूत नहीं है। यदि खुफिया तंत्र मजबूत हो जाए तो क्या होगा? केंद्र की रिजर्व पुलिस बल राज्य पुलिस के नेतृत्व में कार्य कर रही है। राजनीतिक नेतृत्व नक्सलियों को भटका हुआ भाई कहता है और वे हमारे चुस्त और प्रशिक्षित जवानों पर घात लगा कर हमले कर रहे हैं।संजय स्वदेश 25 मई वर्ष 2013 में ही नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के जीरम घाटी में घात लगाकर कांग्रेस के काफिले पर हमला कर दिया। प्रदेश कांग्रेस की पहली पंक्ति के अधिकतर दिग्गजों का नक्सलियों ने हत्या कर दी। नक्सलियों द्वारा राजनीतिक नेतृत्व के सफाये के इस घटना ने देश दुनिया को हिला कर रख दिया। छत्तीसगढ़ सरकार ने थोड़ी सख्ती दिखाई। चुनाव जीतने के बाद फिर बनी भाजपा सरकार ने बस्तर में आईपीएस एसआरपी कल्लूरी को आईजी बना कर पदस्त किया। कल्लूरी वही आईपीएस हैं जिनके डर के कारण नक्सलियों अपनी स्टेट कमेटी को भंग कर दिया। बस्तर में जब से कल्लूरी की पदास्थापना हुई, तब थे नक्सलियों के समर्पण की लाइन लग गई। छत्तीसगढ़ में वर्ष 2012 में 13 और 2013 में मात्र छह नक्सलियों ने सरेंडर किया था। वर्ष 2014 में गत छह महीने में ही समर्पण का आंकड़ा करीब 300 तक पहुंच गया। हर दिन नक्सलियों के सरेंडर की खबरें और सर्चिंग आॅपरेशन से यह लगने लगा था कि नक्सलियों का मनोबल टूटने लगा है। पर 2 नवंबर से नक्सली संगठन पीएलजीए की 14वीं वर्षगांठ पर हताश नक्सलियों ने ग्रामीणों को ढाल बना कर जिस तरह से 14 सीआरपीएफ जवानों की हत्या की, इससे साबित हो गया कि वे अपने लाल अभियान की लौ को मंद नहीं पड़ने देना चाहते हैं। जैसा की हर आतंकी और नक्सली घटना के बाद इस बात का खुलासा होता है कि खुफिया विभाग ने ऐसे हमले की पहले ही चेतावनी दी थी। फिर राजनीतिक गतिलयारें में एक दूसरे पर दोषारोपण कर बाल की खाल निकाले जाते हैं, इस घटना के बाद भी होने लगा है। सात नवंबर को केंद्र सरकार की खुफिया ब्यूरों से समन्वय करने वाली राज्य की खुफिया इकाई ने एक खास अलर्ट जारी किया था कि नक्सली बड़ी घटना की फिराक में हैं। नक्सली खुद को संगठित करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। बस्तर क्षेत्र में अपने कमजोर पड़ते वजूद की वजह से वह इस हमले को अंजाम दे सकते हैं। एक के बाद एक नक्सली समर्पण के कारण अपनी ताकत और आत्मवश्विास को हासिल करने के लिए नक्सलियों द्वारा ऐसी बड़ी वारदात की आशंका पहले से ही थी। हालांकि अमूमन खुफिया विभाग की चेतावनी रूटीन की होती है। जानकार कहते हैं कि ऐसे अलर्ट हर महीने भेज कर खुफिया विभाग अपनी जिम्मेदारी से बचती है। सैंकड़ों की संख्या में नक्सली मूवमेंट करते हैं और और प्रशासन को कोई खबर नहीं होती। क्या यह खुफिया तंत्र है। ऐसी नकामियां यह साबित करती है कि खुफिया विभाग में दीमक लग चुका है और इसकी के कारण नक्सली अपनी मकसद में कामयाब हो रहे हैं। खुफिया तंत्र में सच में दीमक लग गया है, इसका एक और उदाहरण देखिए। हाल ही में मीडिया में आई खबरों के अनुसार नक्सलियों के बड़े नेता दक्षिण छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में 10 से 21 सितंबर तक बैठक-दर-बैठकें करते रहे। इसमें प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के सभी बड़े नेता भी शामिल हुए। झारखंड, ओडिशा, महाराष्टÑ और आंध्रप्रदेश से सारे नक्सली नेता आए। ओरछा के पास घने जंगलों में संगठन का 10वां कांग्रेस किया। अपनी रणनीति पर मंथन कर चलते बने। ऐसा नहीं है कि सुरक्षाकर्मियों को इसकी भनक नहीं थी। छत्तीसगढ़ पुलिस के सभी आला अधिकारियों और केंद्रीय गृहमंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी पहले ही आईबी ने पहुंचा दी थी, मगर बैठक में सुरक्षा के प्रबंध पुख्ता मान लीजिए या फिर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण वहां तक नहीं पहुंच पाने के कारण सुरक्षाकर्मियों के हाथ कुछ ठोस नहीं लग सका। केंद्र को सूचना मिली तो फौरन सीआरपीएफ की नक्सल विरोधी अभियान के फाइटर माने जाने वाले वाले कोबरा कमांडो के बटालियनों को अबूझमाड़ के जंगलों में उतारा गया। दावा किया गया कि सभी संभावित ठिकानों के खाक छाने गए। मगर हाथ कुछ नहीं लगा। इस नक्सली हमले से एक दिन पहले गुवहाटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मार्ट पुलिसिंग की वकालत करते हुए मजबूत देश के लिए मजबूत खुफिया तंत्र होने की बात कही थी। मतलब पीएम यह स्वयं मानते हैं कि अपने देश की खुफिया तंत्र मजबूत नहीं है। और इसका खामियाजा उनके बयान के एक दिन बाद छत्तीसगढ़ में देखने को भी मिल गया। देश के सुरक्षा व खुफिया तंत्र से जुड़े सेवानिवृत्त अधिकारियों ने भी मौके-मौके पर इस बात को इस तंत्र की कमजोरी को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि यह इसकी मजबूती के लिए सुझाव भी दिए हैं। लेकिन उन्हीं की जुबान बताती है कि यदि खुफिया तंत्र मजबूत हो जाए तो क्या होगा? केंद्र की रिजर्व पुलिस बल राज्य पुलिस के नेतृत्व में कार्य कर रही है। राजनीतिक नेतृत्व नक्सलियों को भटका हुआ भाई कहता है और वे हमारे चुस्त और प्रशिक्षित जवानों पर घात लगा कर हमले कर रहे हैं। जब केंद्र और नक्सल प्रभावित राज्यों में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होती है तो ऐसी घटनाओं के बाद हमेशा टकराव सामने आता है। राज्य सरकार कहती है कि केंद्र से सहयोग नहीं मिल रहा है और केंद्र सरकार कहती है कि हमने भरपूर सहयोग दिया है, इसके बाद भी राज्य सरकार दृढ़ता नहीं दिखा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ और केंद्र में सरकार एक ही पार्टी की है। लिहाजा, ठोस कार्रवाई की अपेक्षा तो बनती ही है।
गुरुवार, अक्टूबर 30, 2014
मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था !
मंगलवार, अक्टूबर 28, 2014
( सोशल मीडिया अपनी भूमिका में असरकारी सिद्ध हो रहा है . ' यह देश हमारा है ' नाम से संचालित फेसबुक पेज इस देश में व्याप्त स्त्री और दलित विरोधी परम्पराओं /रुढियों की तस्वीरें सामने रख रहा है. पिछले दिनों केरल की गैर सवर्ण महिलाओं के खिलाफ १९वी शताब्दी के मध्य तक व्याप्त कुप्रथा की एक तस्वीर इस पेज पर देखने को मिली. इस प्रथा पर स्त्रीवादी काम भी हुए हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए 'यह देश हमारा है' से साभार )
स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया।
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।
नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे। आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।
सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे। आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।
इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों और उनके दुकानों के सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया।
मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक भी छीन कर लिया।
शुक्रवार, सितंबर 05, 2014
जेल और जहालत में आदिवासी
अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के करीब 31 हजार विचाराधीन कैदी बिना सुनवाई के जेल में सड़ रहे हैं। वे पुलिस व कोर्ट की कार्रवाई की भाषा समझ नहीं पाते हैं। कोर्ट उन्हें अच्छा अनुवादक भी उपलब्ध नहीं करा पता है।संजय स्वदेश भारत के अगले प्रधान न्यायाधीश बनने जा रहे न्यायमूर्ति एच एल दत्तू ने भारतीय न्यायपालिका को विश्व की सर्वश्रेष्ठ न्यायपालिका बताया और इसे उच्च स्तर पर ले जाने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। भारतीय न्याय व्यवस्था व्यवस्था में यह कहा जाता है कि भले की गुनाहगार को देरी से सजा हो, लेकिन किसी बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन व्यवहारिक धरातल पर हालात उल्टे हैं। गुनाहगार पैसे और पहुंच के आधार पर कानूनी प्रक्रिया में ऐसा दांव पेंच चलते हैं कि वे जल्द ही बाहर आ जाते हैं। वही ढेरों बेगुनाह जेल में सलाखों के पीछे अपनी कोर्ट की तारीख का इंतजार करते वर्षों गुजार देते हैं। ऐसा कई बार हुआ है जब कोर्ट का निर्णय आया तब तक व्यक्ति बेगुनाही में जेल काटा या फिर जितनी सजा थी, उससे कही ज्यादा साल जेल में गुजार दिए। हाल ही में फाइट फार ह्यूमन राइट्स सोसाइटी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिना सुनवाई के अनुसूचित जाति, जनजाति समुदाय के जेल में बंद 31 हजार विचाराधीन कैदियों के मामले को गंभीर मसला बताता। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए सभी राज्यों के गृह सचिवों की छह सप्ताह के अंदर बैठक बुलाई जाए। साथ की कोर्ट ने यह भी कहा है कि मूक दर्शक बने रहने के बजाय उसे केंद्रीय एजेंसी के रूप में काम करके राज्यों से बात करनी चाहिए। संभवत गुलाम भारत में आंदोलनकारियों को छोड़ दे तो ऐसे शायद ही उदाहरण मिले जिसमें अंग्रेजों ने बिना ट्रायल के वर्षों तक विचाराधीन कैदियों से अपनी जेले भरी हो। आज भारत की आजादी के 68 साल बाद भी न्यायिक प्रक्रिया इतनी सहज नहीं बन पाई कि बिना पैसे व पहुंच के साधारण आदमी त्वरित न्याय मिल सके। स्वयं कोर्ट के जज तक यह कह चुके हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय जैसा है। छत्तीसगढ़ का जाता मामला है, राज्य सरकार ने आदिवासी प्रकरणों के लिए गठित निर्मला बुच कमेटी ने दर्जनों मामले में उन कैदियों के जमानत का विरोध नहीं करने का सुझाव दिया है जिसमें निर्धन आदिवासी आरोपी मामूली रकम नहीं हुटा पाने के कारण जेल में हैं। शर्मनाक बात यह है कि इन कैदियों में एक ऐसी गरीब आदिवासी महिला आरोपी है, जो हत्या के प्रकरण में विचाराधीन है। विचाराधीन स्थिति में ही वह दस वर्ष जेल में रह चुकी है। अब भला वह दोषमुक्त हो भी जाए तो उसके सामने कौन का भविष्य बचा? ऐसे मामले केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं है। सूचना के अधिकार के अंतर्गत छत्तीसगढ़ की जेलों के विषय में मिली जानकारी के अनुसार जगदलपुर जेल में नक्सली मामलों के 546 विचाराधीन कैदी बंद हैं जिनमे 512 कैदी आदिवासी हैं। दंतेवाड़ा जेल में नक्सली मामलों के 377 विचाराधीन कैदी बंद हैं जिनमे 372 कैदी आदिवासी हैं। कांकेर जेल में नक्सली मामलों के 144 विचाराधीन कैदी बंद हैं जिनमे 134 कैदी आदिवासी हैं। दुर्ग जेल में नक्सली मामलों के 57 विचाराधीन कैदी बंद हैं जिनमे 51 कैदी आदिवासी हैं। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के केंद्रीय जेलों में बगैर किसी सुनवाई के हजारों आदिवासी बंद हैं। सवाल है कि आखिर समाज का यह वर्ग अपने मौलिक अधिकारों से जुड़े मसले से इतना वंचित क्यों है। सरकार पर यह भी आरोप लगता है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों ने आदिवासियों को यह भी नहीं बताया जाता कि उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है। संकट भाषा के संप्रेषण का है। आदिवासी अपनी मूल भाषा में बोलते हैं। वे गिरफ्तारी के वक्त या कोर्ट में अपनी बात सही तरीके से कोर्ट को नहीं समझा पाते हैं। और कोर्ट भी उन्हें समझने का सिरदर्द नहीं उठाता है। उन्हें न उनकी भाषा समझने वाला वकील उपलब्ध कराया जाता है ओर न ही अदालतों में ऐसे अनुवादक उपलब्ध है जो आदिवासियों की भाषा को अनुवाद कर माननीय जज महोदय को उनकी बात बता सकें। जेले के नक्सली कैदियों के सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही नक्सल समर्थक सरकार को इस बात को लेकर कटघरे में खड़ा करते हैं कि सभी नक्सली आदिवासी हैं या फिर आदिवासी ही नक्सली बन गए हैं। उधर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री कहते हैं कि नक्सली लोग देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। जेल के आंकड़े कहते हैं कि आदिवासी ही नक्सली हैं। मतलब है कि देश के आदिवासियों को ही अपने लिए सबसे बड़ा खतरा है। जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासी हितों की रक्षा के लिए वर्षों से आवाज उठ रही हैं। नक्सली गैर नक्सल आदिवासियों की आड़ लेकर अपना हित साध रहे हैँ। इनके विकास के लिए लाखों करोड़ों की योजनाओं की राशि के खर्च के बाद भी हालात संतोषजनक नहीं हुए। शिक्षा के मामले में आदिवासी क्षेत्रों में अभी भी असंतोषजनक स्थिति में है। आरक्षण के बाद भी हजारों रिक्त आदिवासी पदों के आंकड़े यह साबित भी करते हैं कि शिक्षा की अलख आदिवासी क्षेत्रों से अभी दूर है। नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ एडवांस्ड स्टडीज की ओर से यूनिसेफ के लिए किए गए अध्ययन में बताया गया है कि आदिवासियों को दी जाने वाली शिक्षा का स्तर बहुत दयनीय है। आदिवासी क्षेत्रों में सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर बहुत खराब ढंग से अमल किया जा रहा है। लिहाजा, आदिवासियों की स्थिति बदलने के बजाय बदतर होती गई। उनके क्षेत्रों में बाहरी दुनिया के लोगों ने घुसपैठ कर दोहन शुरू किया है। विरोध पर राष्टÑविरोधी कार्यों के आरोप में गिरफ्तार हुए हैं। उनकी अपनी भाषा को न सरकार समझ रही है और न ही कोर्ट।
मंगलवार, अगस्त 05, 2014
स्कूल से घर तक पीटे जा रहे कान्हा
संदर्भ : जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बदलाव की पहल
महाभारत काल में कान्हा रस्सी से बांधे गए हैं। बच्चों को घरों में बांध कर रखने, उन्हें मारने-पीटने की घटनाएं आज भी जारी है। एकल परिवारों में बच्चों की स्वछंदता समाप्त हो चुकी है। उनसे हर क्षेत्र में अव्वल होने अपेक्षा बढ़ गई है। थोड़ी-थोड़ी बात पर मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना घर-घर की बात हो चुकी है।संजय स्वदेश शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के बाद यहे बेहद जरूरी है कि बच्चों को हिंसा से संरक्षण का भी मौलिक अधिकार मिले। इसके अभाव में भोले मन वाला बचपन घर और स्कूल में मानसिक व शारीरिक रूप से पीड़ित है। देश दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों पर नियंत्रण के लिए हिंसा का उपयोग नहीं किया गया है। भारत के पौराणिक कथाओं में तो इसके उदाहरण है। भगवान श्रीकृष्ण अपनी नटखट कारनामों से माता यशोदा को इतना तंग करते हैं कि मां कभी कान्हा को रस्सियों से बांध देती हैं, तो कभी ओखली में बांध कर अनुशासित करने का प्रयास करती है। बच्चों को घरों में बांध कर रखने, उन्हें मारने-पीटने की घटनाएं आज भी जारी है। पर चंचल बाल मन की शरारत भला कहां छुटती है। बच्चों की सहज पृवृत्तियां जब माता-पिता या शिक्षक के लिए भारी लगने लगती है तो उनका धैर्य टूट जाता है। वे बच्चों की बाल मनोवृत्ति समझने के इतर उस पर नियंत्रण के लिए हिंसा का रुख अख्तियार कर लेते हैं। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ, एकल परिवार बढ़े। बच्चे एकल परिवार में ही सीमित रहने लगे। उनकी स्वछंदता समाप्त हो गई है। माता-पिता की अपेक्षाओं ने सब कुछ कठोर अनुशासन में बांध दिया है। हर क्षेत्र में बच्चों से परिणाम अव्वल होने अपेक्षा बढ़ गई है। अपेक्षाओं के विपरित होने पर बच्चों के साथ हिंसा आम हो चुकी है। मतलब घर-घर में कान्हा के कान मरोड़ जा रहे हैं। वे पीटे जा रहे हैं। आधुनिक भारत के स्कूलों में अनुशासन का पाठ मार से ही शुरू होती थी।हालांकि जागरूकता बढ़ने के बाद भी हाल के वर्षों में स्कूल में बच्चों को पिटने की घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन इससे प्रकरण थाने तक पहुंचने लगे हैं। लिहाजा, शिक्षकों में दंड का भय बढ़ा है। पहले ये मामले थाने तक पहुंचते ही नहीं थे। बच्चों को पीटना शिक्षकों का अघोषित अधिकार था। पीटे जाने के बाद भी बच्चे माता-पिता से इसकी शिकायत नहीं करते थे। उल्टे उनके मन में इस बात का भय होता था कि कहीं शिकायत पर घर में फिर पिटाई न हो जाए। घर की चाहरदिवारी में अपनों से हिंसा के शिकार होने वाले मामले विशेष स्थितियों में ही थाने तक पहुंचते हैं। घर के अपने बच्चों को पिटते हैं तो यह अनुशासन की सीख होती है, और स्कूल में शिक्षक यही कदम उठाता है तो यह अपराध होने लगा है। पर घर हो या स्कूल, बच्चों पर कहीं भी हिंसा है तो अपराध ही। इसी हिंसा को रोकने के लिए सरकार कड़े कानूनों का नया खाका तैयार कर रही है। यह निश्चय ही सराहनीय और स्वागत योग्य कदम है। सरकार जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 की जगह नए कानून पर काम कर रही है। पुराने कानूनों के स्थान पर सरकार जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन आॅफ चिल्ड्रन) बिल 2014 पेश करने की तैयारी है। नए कानूनों को सरकार ने बच्चों के अधिकारों और अंतरराष्टÑीय कानूनों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। माता-पिता या अभिभावकों या शिक्षकों को अब बच्चों को पीटना या उनकी गलतियों के लिए कोई सजा देना या किसी तरह से प्रताड़ित करना भारी पड़ेगा। बच्चों के खिलाफ ऐसा व्यवहार करने पर आने वाले सालों में पांच साल तक के लिए जेल की सजा हो सकती है। करीब दो वर्ष पहले आई यूनिसेफ के एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के तमाम विकासशील देशों में बच्चों को अनुशासित करने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। ऐसा उनके अपने ही घरों में होता है। यह हिंसा शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक किसी भी तरह की हो सकती है। दुनिया भर में 2 से 14 साल के आयुवर्ग के हर चार में तीन बच्चों को अनुशासित करने के लिए किसी न किसी तरह की हिंसा का सहारा लिया जाता है। इसी तरह हर चार में तीन बच्चे मनोवैज्ञानिक हिंसा या आक्रामकता के शिकार होते हैं, जबकि हर चार में से दो बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने के लिए शारीरिक सजा दी जाती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दुनिया के 33 देशों के निम्न व मध्यम आय वर्ग वाले परिवारों में 2 से 14 साल की आयुवर्ग के बच्चों पर ऐसी हिंसा हुई, जिसमें उनके माता-पिता या अभिभावक शामिल थे। भारत में यही हालात है। यहां घर से लेकर स्कूल तक बच्चे हिंसा से पीड़ित हैं। भारत के शिक्षा दर्शन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले चिंतक महर्षि अरविंद अपने एक लेख में कहते हैं कि शिक्षक राष्टÑ निर्माण के वे माली हैं जो अपनी मेहनत से इसकी नींव को सींचते हैं। दुर्भाग्य देखिए, आज 21वीं सदी में न ऐसे मेहनत व धैर्य वाले शिक्षक हैं और न गुरुकुल जैसी शिक्षा परंपरा। सब कुछ बदला-बदला। अंतराष्टÑीय स्तर के स्कूल और शिक्षा पद्धति। इसके बाद भी राष्टÑीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के आंकड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में बच्चों के साथ स्कूलों में होने वाले दुर्व्यवहार, यौन शोषण, शारीरिक प्रताड़ना के मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। करीब सात साल पहले 2007 में केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय ने अपने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया था कि स्कूल जाने वाला हर दूसरा बच्चा किसी ने किसी तरह से शारीरिक या मानसिक हिंसा का शिकार हो रहा है। करीब दो दशक पहले बच्चों को स्कूल छोड़ने का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों द्वारा पीटे जाने का भय होता था। जब स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों केआंकड़ें बढ़े तो सरकार ने मिड डे मिल के माध्यम से भीड़ बढ़ा दी। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को नई पीढ़ी आ चुकी है, उसने पुराने शिक्षकों की तरह मारपीट कर पढ़ाना छोड़ पढ़ाने से ही मुंह मोड़ लिया है। इसके बाद भी आए दिन किसी स्कूल में बच्चों के पीटे जाने की घटनाएं आ ही जाती है। ऐसी घटनाएं अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों से आती हैं। ऐसे मामलों में प्रकरण भी वहीं दर्ज हुए हैं। जब मारपीट से बच्चे की हालत ज्यादा खराब हुई और अभिभावकों ने इसकी सुध ली। निजी स्कूलों में बेहतर शिक्षा के लिए मोटी फीस देकर बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावक सचेत हैं। लिहाजा, निजी स्कूलों में काफी हद तक शारीरिक हिंसा की घटनाएं कम हुर्इं है। लेकिन सरकारी स्कूलों में हालत सरकार भरोसे ही है।
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