शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2009

अतीत भूलना बुरी बात है.



को आपना अतीत नही भुलाना चाहिए। इस पर काफी लम्बी चर्चा हो सकती है। पर अव नही। फिलहाल एश फोटो के देखिये। इसे आज ही मैंने आपने ईमेल के फोल्डर में देखा। तो पाया की मै कैसा था और कैसा हो गया। फोटो शायद २००४ या २००५ की है। तब और अब तक मेरे चहरे में काफी सफर किया। मेरे एक मित्र बोले थे की आपनी स्वाभाविकता कायम राखिय। पर आज मैं सोचता हूँ की क्या मेरी स्वाभाविकता आज व् पहले की तरह कायम हैं। मुझे लगता हैं हैं और नही भी। टाइम निकल कर एश्पर चिंतन मनन करूँगा की पहले की जो स्वाभाविकता थी और आज की स्थित में क्या जरुरी हैं। पर इतना तो तय है की अतीत को भूल कर व्यक्ति खुट को धोखा ही दे सकता हैं।

सोमवार, अक्टूबर 26, 2009

पहाड़ तोड़ता बचपन


पहाड़ तोड़ता बचपन
26 December, 2008
संजय स्वदेश
समान काम के लिए समान मेहनताना, बालश्रम की मुक्ति और सर्व शिक्षा अभियान के तहत देश के कोने-कोने में शिक्षा को अलख जगाने के दावे झूठे हैं। इसे कोई हम नहीं झुठला रहे रहे रहैं। इसे झुठला रहे हैं महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों के खान क्षेत्र में पत्थर तोड़ने वाली महिला मजदूर, शिक्षक और मासूम बच्चे। इनका एक समूह दिंसबर माह में नागपुर में हो रहे विधानसभा की शीत सत्र में अपने हक को पाने के लिए नागपुर आया था। धरना एक गैर सरकारी संगठन के नेतृत्व में था। प्रतिबंध के बावजूद पत्थर क्षेत्रों में बाल मजदूरी जारी है। वहां सरकारी स्कूल हैं। पर इतनी दूर कि बच्चे नहीं जाना चाहते। स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग के पत्थर खानों के आसपास ही छोटे-छोटे स्कूल चलते हैं। मान्यता और अनुदान नहीं मिलने के कारण स्वयंसेवी शिक्षकों को आर्थिक संकट का सामान करना पड़ता है। महिला-पुरूष की मजदूरी के भुगतान राशि में भी अंतर है। असंगठित क्षेत्र की श्रेणी मे आने के कारण इन मजदूरों के पास न तो राशन कार्ड है और न ही मतदाता सूची में नाम। वोट कहां और किसलिए डालते हैं? कुछ पता नहीं है।


ये तो बस एक गैर- सरकारी संगठन के कहने पर नागपुर आए। खान क्षेत्र में खुले आसमान के नीचे यत्र-तत्र चल रहे स्कूलों की मान्यता के नारे लगाए और चले गए। पर धरना देने वाले शिक्षिकाओं, महिला मजदूर और बाल मजदूरों को जनप्रतिनिधियों के आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। शिक्षा की अलख जगाने को किसी तरह की पारिश्रमिक भी मिलेगी या नहीं पता नहीं? खान क्षेत्रों में पढ़ाने वाले शिक्षकों में अधिकतर महिलाएं हैं। धरने पर बैठी महिलाओं से मिलने लातूर जिले के अहमदपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक बब्रुवान खंदाड़े, गंगाखेड परभणी के विठुल गायकवाड, और चौसाला बीड के विधायक किशव राव आंधले, हेर लातूर के टी.पी. कांबले मिलने आए। आश्चर्य की बात है कि पूछने पर इन विधायकों ने बताया कि आज तक उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि खान क्षेत्रों में इस तरह से महिलाओं का शोषण हो रहा है। इस मामले में पहली बार ज्ञापन प्राप्त हुआ है।

2020 तक 7.5 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार की संभावना- वर्ष 1999-2000 में राज्य में प्राथमिक खनिजों के लिए 250 और गौण खनिजों के लिए 1772 लाइसेंस मिला था। इससे राज्य सरकार को 30 करोंड़ रूपये राजस्व प्राप्त हुआ था। 421041 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ था। अनुमान है कि वर्ष राज्य के खनिज क्षेत्रों से 2020 तक 112320 लाख रूपये राजस्व में प्राप्त होगा। 7.5 लाख लोग रोजगार से जुड़ेगे। खनिज क्षेत्र से जुड़े मजदूरों में करीब आधी संख्या महिलाओं की हैं।संतुलन की सचिव पल्लवी रेगे कहती हैं कि खनिज कानून 1952 के अनुसार इस 18 साल के कम उम्र के लोगों का काम करना प्रतिबंधित है। प्रतिबंध के बाद भी राज्य के विभिन्न खान क्षेत्रों में 18 साल के कम उम्र के करीब दस लाख लड़के-लडिकियां कार्यरत हैं। अधिकतर मजदूर खान क्षेत्रों में रहते हैं। बच्चे भी पत्थर तोड़ने में लग जाते हैं। सरकारी स्कूल हैं, पर बहुत दूर। वहां वे पढ़ने नहीं जाना चाहते। थोड़े से पैसे के लालच में इनका बचपन पत्थर तोड़ने में गुजर जाता हैं। श्रीमती पल्लवी का कहना है कि सरकारी योजना होने के बाद भी मजदूरों के कल्याण के लिए कोई योजना नहीं चलती हैं। चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है। पत्थर खदान के मालिक, ठेकदार सामाजिक कार्यकर्ताओं को मजदूरों से मिलने नहीं देते हैं। खान क्षेत्र में ही मजदूरों के बच्चों को इस शर्त पर पड़ाने के लिए अनुमति देते हैं कि वे दूसरे कार्यों में किसी तरह की दखल नहीं देंगे। श्रम विभाग की टीम आने की सूचना इन्हें पहले ही मिल जाती है। तुरंत कुछ मजदूरों के लिए हेल्मेट, जूते आदि की व्यवस्था कर देते हैं। बाकी को छुट्टी दे देते हैं।

सुनीता निवल की उम्र करीब 13 साल है। आठवीं कक्षा में पढ़ती है। बड़ी होकर स्कूल खोलने का सपना है। सुनीता ने बताया कि कभी-कभी मम्मी-पापा के साथ खदानों में पत्थर तोड़ती है। कुछ महीने की बात है। पत्थर तोड़ने के दौरान उसके भाई का पांव टूट गया। ठेकेदार ने पैसे भी नहीं दिए। फिर भी उसके पास यह करने के अलावा कोई चारा नहीं है. पुणे के खान क्षेत्रों में पढ़ाने वाली शिक्षिका सरोजना कुटे का कहना है मजदूरों के बच्चों में पढ़ने की रूचि नहीं है। फिर दूर के स्कूलों में जाने की बात दूर की है। स्वयंसेवी संगठन की ओर इन बच्चों को पथरीले क्षेत्रों में ही किसी पेड़ के नीचे या पत्थर पर ही इकठ्ठा करके पढ़ाने की कोशिश चलती है। इस काम के लिए एजनीओ की ओर से कुछ वेतन भी मिलता था। अब वह भी बंद हो गया।

सतारा के कराड तालुक के सुरली गांव के खान क्षेत्र में पढ़ाने वाली भारती मोरे कहती हैं कि मजदूर सुबह छह बजे घर से निकल जाते हैं औश्र शाम छह बजे वापस आते हैं। इस बीच उनके बच्चे इधर-उधर खेलते रहते हैं। कई बार हम लोग घूम-घूम कर इन बच्चों को इकठ्ठा कर पढ़ाने की कोशिश करते हैं। कोल्हापुर की सुरखा माली भी कुछ ऐसी ही कहती है। उनका कहना है कि जिन क्षेत्रों में वे पढ़ाने जाती हैं, वहां खान मजदूरों के करीब 100 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल के नाम पर कोई भवन नहीं है। इधर-उधर बच्चों को बैठा कर पढ़ाते हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत मिलने वाला पोषहणार अभी यहां तक नहीं आया है। कोल्हापुर की खान मजदूर सकू हरसुड़े का कहना है कि पत्थर तोड़ने की एक दिन की मजदूरी 40 रूपये है। पुरूषों को इसी काम के लिए 60 रूपये मिलते हैं। कभी-कभी ठेकेदार से ही एक ट्रॉली भरने का ठेका मिल जाता है। जिसमें परिवार के हर सदस्य मिल कर पूरा करते हैं। इसमें बच्चे भी शामिल होते हैं।


दोष सिद्ध करना मुश्किल
यहीं स्थित क्षेत्रिय श्रम आयुक्त (केंद्रीय) उमेश चंद कहते हैं कि इन क्षेत्रों में जब भी कोई जांच टीम जाती है। वाहन आते देख मजदूर इधर-उधर बिखर जाते हैं। कोई बच्चा मिलता है तो पूछताछ पर वे तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। कोई कहता है मिलने आए थे, तो कहता है इन्हीं पत्थरों से खेल रहे थे। यदि कोई मामला दर्ज भी कर लिया जाता है तो कठिनाई उसे कोर्ट में सिद्व करने में होती है। सारे प्रमाण उन क्षेत्रों में तत्कालीन होते हैं। महिला-पुरूष असमान मजदूरी के बारे में हमेशा जांच पड़ताल होती है। इस मामले में इस साल सौ से भी अधिक मामले दर्ज हुए।

श्रम कल्याण कार्यालय के पास जिम्मेदारी नहीं
नागपुर में श्रम कल्याण विभाग का कार्यालय है। कार्यालय के गेट पर खान मजदूरों के कल्याण के लिए ढ़ेरों योजनाओं की सूची एक बोर्ड पर लिखी है। पूछने पर यहां के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं विभाग की कल्याणकारी योजनाएं लौह मैगनीज, क्रोम अयस्क, डोलोमाइट, चूना पत्थर और बीड़ी मजदूरों के लिए ही ही है। पत्थर खदानों में कार्यरत मजदूरों के कल्याणकारी योजनाएं उनके पास नहीं है।

बुधवार, जून 10, 2009

पुण्य प्रसून बाजपयी

हिन्दुत्व के जीरो ग्राउंड जीरो से बीजेपी को परखना

बीजेपी के ग्रांउड जीरो पर मोदी का कांग्रेसीकरण

पुण्य प्रसून वाजपेयी

जिस युवा राजनीति का सवाल कांग्रेस के भीतर उफान पर है, वह उफान हिन्दुत्व की
प्रयोगशाला के राज्य गुजरात में बीजेपी के गढ राजकोट में अर्से से है । राजकोट
में कम्पयूटर साइंस से लेकर बिजनेस मैनेजमेंट और मेडिकल से लेकर बीपीओ से जुडा
युवा तबका बीजेपी का झंडा उठाने से नही चुकता लेकिन लहराते झंडे में संघ की
वैचारिक समझ देखना चाहता है । आरएसएस की इस राजनीतिक ट्रेनिंग का असर कमोवेश
समूचे सौराष्ट्र में है । जिसका केन्द्र राजकोट है और वजह भी यही है कि बीजेपी
ने कभी राजकोट सीट को नहीं गंवायी लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी
राजकोट में कांग्रेस से हार गयी । लेकिन बीजेपी के युवा कार्यकर्त्ताओ की माने
तो बीजेपी काग्रेस से नहीं बीजेपी के कांग्रेसीकरण से हार गयी । और सौराष्ट्र
में बीजेपी का मतलब है नरेन्द्र मोदी । तो पहली बार गुजरात में संघ और बीजेपी
के भीतर यह सवाल जोर-शोर से कुलबुला रहा है कि नरेन्द्र मोदी का भी
कांग्रेसीकरण तो नहीं हो रहा है । कांग्रेसीकरण का सवाल चुनाव को लेकर बनायी
गयी रणनीति और चुनाव के बाद देश की राजनीति में मोदी की अपनी भूमिका के तौर
तरीको को अपनाने से है । सौराष्ट्र में बीजेपी और आरएसएस ही नहीं किसी भी तबके
के बीच बैठते-घूमते हुये कोई भी नरेन्द्र मोदी की गैर मौजूदगी में भी मोदी का
एहसास कर सकता है । द्रारका में द्वारकादीश मंदीर के बाहर मनीष की पान की दुकान
हो या पोरबंदर में गांधी के जन्मस्थल वाले मोहल्ले में दिनेश सर्राफा की दुकान
या फिर सोमनाथ में सोमेश का एसटीडी बूथ...हर जगह नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी
तस्वीर को दुकान में चस्पा कर दुकानदार गर्व भी महसूस करता है और सामाजिक अकड
भी दिखाता है । युवा तबका मोदी के साथ तस्वीर खिंचा कर अपने घेरे में अपनी अकड
दिखाने से नही चूकता तो बच्चे और महिलाये मोदी के हस्ताक्षर लेकर मोदी की नायक
छवि को बरकरार रखते है । नायक की यह छवि मोदी की किस्सागोई से भी जुड चुकी है ।
मसलन सडक से गुजरता मोदी का काफिला आम लोगो की आवाजाही नहीं रोकता । सडक पर कोई
दुर्घटना हो तो लोगो की आवाजाही चाहे जारी रहे लेकिन मोदी का काफिला रुक जाता
है और घायलो का कुशलक्षेम पूछ कर ही आगे बढता है । मोदी की लोकप्रियता का यह
अंदाज मोदी को आरएसएस की उस राजनीतिक ट्रेनिंग से अलग खडा करता है जिसमें
वैचारिक शुद्दता के साथ आदर्श समाज की परिकल्पना हो । जिसमें संगठन और
हिन्दुत्व समाज का भाव हो । ऐसा नहीं है कि अपनी लोकप्रियता को इस तर्ज पर
देखने के लिये मोदी ने कोई खास रणनीति अपनायी । असल में आरएसएस की राजनीतिक
ट्रेनिंग और बीजेपी की राजनीति ने जहा दम तोडा वहां नयी पीढी और आर्थिक सुधार
के बाद बनते नये सामाज की जरुरतो को मोदी ने थामा । इसलिये मोदी का संकट दोहरा
हो गया । एक तरफ मोदी की प्रयोगशाला में संघ ने भी खुद को झोका और रास्ता ना
पाकर बीजेपी भी नतमस्तक हुई। वही दूसरी तरफ इस प्रयोगशाला की हर कैमिकल थ्योरी
मोदी ही रहे तो मोदी को देखने का नजरिया भी हर तबके ने अपने अपने तरीके से
अपनाया । किसी के लिये मोदी हिन्दुत्व का झंडाबरदार रहे तो किसी के लिये विकास
का प्रतिक तो किसी के लिये बालीवुड के नायक सरीखा हो गये । इस अंदाज ने मोदी को
भी बरगलाया । जिन्हे टिकट दिया गया उनका वास्ता संघ से रहा नहीं और सामाजिक
पहचान बीजेपी के बीच की है नहीं । हां, बाजार और पूंजी से पहचान बनाने वाले
बीजेपी के उन समर्थको को मोदी ने ना सिर्फ टिकट दिया बल्कि गुजरात बीजेपी में
उनकी राजनीतिक हैसियत भी बढायी । राजकोट के उम्मीदवार किरण पाटिल इस सोच के
प्रतिक है । जो पैसे के बूते बीजेपी का टिकट तो पा गये लेकिन बीजेपी के भीतर ही
वोट ना मिलने से हार गया । असल में आरएसएस ने गुजरात में जो राजनीतिक ट्रेनिगं
दी उसमें हर जिले में ऐसे पैसे वालो की भरमार है जो संघ या बीजेपी की कार्यशाला
या बैठको को सफल बनाने के लिये हर तरीके से भोतिक इंतजाम करते रहे है । मोदी ने
पूंजी और राजनीति को मिलाकर उन्हे ही राजनीतिज्ञ बना दिया जो कल तक पार्टी के
इंतजाम का खर्चा उठाते - देखते थे । बीजेपी के इन नये कर्ताधर्ता के राजकरण के
तौर तरीके कांग्रेसी सरीखे है । जिसमें आरएसएस की सामाजिक सोच नहीं बल्कि सत्ता
बनाये रखने के तौर तरीके चलते है । यह तरीके बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता के
बीच खायी लगातार चौडी भी करते जा रहे है । कार्यकर्ता की समझ या उसके सुझाव या
उसकी जरुरत लोकप्रिय मोदी स्टाइल के आगे कोई मायने नहीं रखते । क्योकि
कार्यकर्ता जहा के जो सवाल खडा करता है वहा से या तो मोदी सीधा संपर्क बनाने की
दिशा में हिरो की तरह जाते है यै अपने नये राजनीतिक करिन्दो के जरीये राजनीति
टटोलते है । यह स्टाइल मोदी को घेरे समूह में भी है । यानी मोदी जैसा ही उसे
घेरे लोग भी बनना-दिखना चाहते है । तो हर का वास्ता स्टाइल से होता है ना कि
मोदी से । कल तक जो घन्नसेठ फक्कड और मुफलिस संघी स्वसंसेवक या बीजेपी नेता को
अपने घर में ठहरा कर भोजन करा कर घन्य समझता था वही सेठ नेता बनने के लिये अब
जोड-तोड भी कर रहा है और वैचारिक तौर पर खुद को ज्यादा समझदार नेता भी मान रहा
है और फक्कड-मुफलिस संघी को बाहर से ही बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चुक रहा
। चुंकि मोदी ही सर्वोसर्वा है और उन तक सीधी पहुंच उस तहके की है तो वह भी
कार्यकर्ता-नेता को कुछ नहीं समझता । चूंकि दंगो से उपजी हिन्दुत्व प्रयोगशाला
का पाठ बीजेपी की राजनीति के लिये ज्यादा देर तक फायदेमंद हो नही सकता है है
इसलिये बीजेपी से पहले मोदी ने ही नये राजधर्म के नये-नये तौर तरीके अपनाये ।
जिससे 2002 की पहचान का तमगा ही छाती पर ना टंगा रहे । इसलिये 2009 तक आते आते
मोदी ने विकास का खांचा उस नयी अर्थव्यवस्था के ही इर्द-गिर्द ही रचा जिसके
खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच काम करता रहा है । जिसमें वैक्लपिक आर्थिक खांचा खडा
कर स्वावलंबन का सवाल है । खेती और उघोगो के सामानांतर समाज के हर तबके को भी
एक साथ खडा करने का सवाल है । वही मोदी के अंदाज ने सौराष्ट्र के एनआरआई समेत
उस क्रिम तबके को पकडा जिसकी जरुरत विकास का इन्फ्रास्ट्रक्चर खडा करने की थी ।
जिसके लिये वह फंडिंग के लिये भी तैयार है । मोदी ने उघोगोपतियो को रिझाने के
लिये सौराष्ट्र की जमीन का एनओसी खुद ही बांटे । उघोगो के लिये
इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का जिम्मा भी खुद उठाया । उघोगो तक बेहतरीन सडक
बनाने की रफ्तार भी अपने हाथ में रखी । भ्रष्ट्राचार या कमीशनखोरी के बंदरबांट
को सीधे सत्ता से जोडा । और सत्ता को भी इस तबके में हिस्सेदारी दे दी । इसका
बेहतरीन उदाहरण पोरबंदर में देखा जा सकता है जहां सबसे ज्यादा एनआरई है । तो
पोरबंदर जिला भी है और औघोगिक विकास की नगरी भी । बडे किसान भी है और
किसान-व्यापारी मोदी स्टाइल के प्रतिक भी है । असल में नरेन्द्र मोदी राजनीति
एक स्टाइल है जो गुजरात में पांच करोड गुजरातियो का नाम तो लेता है लेकिन
सामाजिक तौर पर महज पचास लाख गुजरातियो के जरीये बाकियो को इस स्टाइल को अपनाने
पर ही टिका देता है । ऐसे में सत्ता की कार्यप्रणाली भी संगठन से इतर इसी
स्टाइल पर आ टिकी है जो व्यक्तिविशेष को देखती है नाकि किसी विचारधारा या
सांगठनिक तौर-तरीको को । मोदी स्टाइल सत्ता बरकरार रखने का एक ऐसा तरीका है जो
पार्टी या विचारधारा से हटकर एक तबके को मुनाफे की थ्योरी समझाता है तो दूसरे
तबके को मुनाफे में हिस्सेदारी के लिये लालायित करता है । जो बच जाते है उन्हे
संभावना और आशंका के बीच तबतक झुलाता है जबतक उसपर कोई और राजनीति अपना मुलम्मा
ना चढा ले । राजनीतिक तौर पर बीजेपी के लिये यह शार्टकट का रास्ता हो सकता है
लेकिन पांच करोड गुजरातियो और सवा सौ भारतियो के अंतर को समझना होगा, जो ना तो
बीजेपी समझ पायी ना ही लाल कृष्ण आडवाणी समझ पा रहे है । सत्ता का रास्ता
बीजेपी के लिये तभी तक मान्य है जबतक वह कांग्रेस की बनायी लीक का विकल्प दे
सके । असल में बीजेपी सत्ता के लिये अपनी उस लकीर को ही मिटाना चाह रही है जो
कांग्रेस की राजनीति से अलग बन रही थी । कांग्रेस के एनजीओ स्टाइल के सामानांतर
संघ के करीब चालिस संगठन और को-ओपरेटिव व्यवस्था का जो खांचा बीजेपी को
राजनीतिक लाभ पहुचा सकता था उसे बीजेपी ने खुद ही तोडा । हिन्दुत्व की
प्रयोगशाला या मंदिर निर्माण कांग्रेस की राजनीति का विकल्प नहीं हो सकते बल्कि
सामाजिक तौर पर भावनात्मक उभान जरुर पैदा कर सकते है । लेकिन इस उभान का
राजनीतिक लाभ तभी मिल सकता है जब सामाजिक तौर पर वैकल्पिक राजनीति की जमीन हो ।
असल में भगवा कांग्रेसीकरण ने इसी जमीन को हडपा है । जिसमें गुजरात में मोदी हो
या दिल्ली में आडवाणी दोनो ने विकल्प का सारा ताना-बाना खुद के ही हर्द-गिर्द
बुनने की जबरन कोशिश की है । इस हकीकत को कोई समझ नही पा रहा है कि आरएसएस अगर
खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कहता है तो उसका राजनीतिक पाठ समाजिक
शुद्दीकरण और सांगठनिक विचार को ही राजनीतिक सत्ता मानता है । जो कांग्रेस की
संसदीय राजनीति की थ्योरी से हटकर है । इसलिये संघ का वोट बैंक भगवा
कांग्रेसीकरण यानी बीजेपी का वोटबैंक नही हो सकता । इसलिये सवाल यह नहीं है कि
आडवाणी हार गये है और मोदी भी उसी राह पर है । बडा सवाल यह है कि एक तरफ
कांग्रेस है तो दूसरी तरफ संघ । वाजपेयी ने संघ की समझ को सूंड से पकड कर सत्ता
भोगी और आडवाणी संघ की समझ को पूंछ मान कर खुद को ही मजबूत नेता माना । राजकोट
की हार बताती है कि मोदी भी इसी राह पर है । लेकिन बीजेपी के जीरो ग्राउंड पर
खडे होकर महसूस किया जा सकता है कि भविष्य का सवाल बीजेपी की राजनीति या मोदी

पतरकार संघ की जरुरत


मीडिया हाउस के अंदर और बाहर के खटृटे-मीठे अनुभव से कौन बचा होगा, पत्रकार, वकील, चिकित्सक के साथ हिंसात्मक सूलक करने वालों को 5 साल की सजा संबंधित विधेयक का प्रस्ताव किसके हित के लिए है। कब से पड़ा है यह विधेयक। इस के पक्ष में तो संगठनों को अभियान मंजूरी तक एक अभियान चलाना चाहिए था। पर कहां है कोई अभियान। छोटी-मोटी घटनाएं ही नहीं बडी घटनाओं पर भी पत्रकार संगठन चुप रहे हैं। कभी पीडित पत्रकार संगठन का सदस्य नहीं रहा तो कभी वह विरोधी खेमे का निकला। दूसरी ओर दफतर की राजनीति। डेटलाइन से पहले बेहतरीन चटपटी टीआरपी बढाने वाली, पाठकों को आकर्षित करने वाली खबर देने का दबाव अलग। किसी घटना में प्रबंधन की सहानुभूति तो दूर अपने सहकर्मियों का साथ मिल जाए तो बहुत बडी बात होगी । हर हाउस में मंजे हुए खिलाडी हैं। एक दूसरे को नीतिपूर्ण तरीके से पछाड़ कर आगे निकल जाने की मानसिकता हर हाउस में है। अपनी ही बिरादरी में कोई अपना नहीं तो फिर साथ कौन दे। तटस्थ रहकर मौके पर लाभ लेने बाले बहुत है। आपस में किसी न किसी तरह से आगे निकल जाने के महौल में सबके लिए एकजुट होने की बात कैसे आ सकती है। प्रिंट मीडिया के कई संस्थानों में छठा तो दूर आज पांचवे वेतन आयोग के मुताबिक सैलरी नहीं मिल रही है। न्यूज चैनलों में मिल रही है तो डयूटी के घंटे देखिए। वहां के पत्रकारों के लिए अपने लिए समय नहीं है। मंदी के दौर में जब छंटनी की गाज गिरी तब भी पत्रकार संगठनों की कहीं से कोई आवाज नहीं आई। पत्रकारों पर जब-जब किसी तरह की गाज गिरी है तो अधिकतर संगठन चुप रहे है। वे कह कर मामला नहीं टाल सकते हैं कि उनके पास शिकायत नहीं पहुंचती। ऐसे मामलों में संगठन की स्वयं पहल होनी चाहिए थी, जो नहीं दिखती। यह समय है विचार करने का। पत्रकार संगठन का कोई औचित्य भी है या महज दिखावे के लिए है। आखिर किसके लिए हो रही है पत्रकारिता। यदि जनता को जगाना है तो जनता का साथ ने इस मौके पर साथ क्यों नहीं दिया। आखिर हर खबर का अंतिम लक्ष्य पाठक और दर्शक को हकीकत बताना ही तो हैं। यदि आगे निकलने के रफ़्तार में चैनल गिरफतार नहीं हुए होते तो शायद काले कानून के विरोध में डट कर सरकार को डराने की बजाये गिडगिडाने की नौबत नहीं आई होती।



कई घटनाएं ऐसी हुई जिससे सबसे पहले दिखाने की होड में मात खानी पड़ी। जनता का भरोसा तो उठना ही था। भरोसा तोडने की राह पर जब मीडिया जाने लगी थी, तभी संगठनों को सचेत होकर रणनीति तय करनी चाहिए थी। यहां यह तर्क देकर इस बात की अनेदेखी नहीं की जा सकती है कि मीडिया का नियंता पूंजी और बाजार हो गई है। पर इस बाजार ने कभी यह नहीं कहा कि जनता का भरोसा तोडा जाए। यदि भरोसा टूटता है तो निश्चित रूप से बाजार का ही नुकसान होगा। बहरहाल सारी स्थितियों को जानते रहते हुए केवल भड़ासी होने या कुढते रहने से कुछ नहीं होने वाला है। पत्रकार संगठनों की पिछली और वर्तमानी पीढी ने जो नहीं किया, वह अब होना चाहिए।

मीडिया हाउस के अंदर और बाहर के खटृटे-मीठे अनुभव से कौन बचा होगा, पत्रकार, वकील, चिकित्सक के साथ हिंसात्मक सूलक करने वालों को 5 साल की सजा संबंधित विधेयक का प्रस्ताव किसके हित के लिए है। कब से पड़ा है यह विधेयक। इस के पक्ष में तो संगठनों को अभियान मंजूरी तक एक अभियान चलाना चाहिए था। पर कहां है कोई अभियान। छोटी-मोटी घटनाएं ही नहीं बडी घटनाओं पर भी पत्रकार संगठन चुप रहे हैं। कभी पीडित पत्रकार संगठन का सदस्य नहीं रहा तो कभी वह विरोधी खेमे का निकला। दूसरी ओर दफतर की राजनीति। डेटलाइन से पहले बेहतरीन चटपटी टीआरपी बढाने वाली, पाठकों को आकर्षित करने वाली खबर देने का दबाव अलग। किसी घटना में प्रबंधन की सहानुभूति तो दूर अपने सहकर्मियों का साथ मिल जाए तो बहुत बडी बात होगी । हर हाउस में मंजे हुए खिलाडी हैं। एक दूसरे को नीतिपूर्ण तरीके से पछाड़ कर आगे निकल जाने की मानसिकता हर हाउस में है। अपनी ही बिरादरी में कोई अपना नहीं तो फिर साथ कौन दे। तटस्थ रहकर मौके पर लाभ लेने बाले बहुत है। आपस में किसी न किसी तरह से आगे निकल जाने के महौल में सबके लिए एकजुट होने की बात कैसे आ सकती है। प्रिंट मीडिया के कई संस्थानों में छठा तो दूर आज पांचवे वेतन आयोग के मुताबिक सैलरी नहीं मिल रही है। न्यूज चैनलों में मिल रही है तो डयूटी के घंटे देखिए। वहां के पत्रकारों के लिए अपने लिए समय नहीं है। मंदी के दौर में जब छंटनी की गाज गिरी तब भी पत्रकार संगठनों की कहीं से कोई आवाज नहीं आई। पत्रकारों पर जब-जब किसी तरह की गाज गिरी है तो अधिकतर संगठन चुप रहे है। वे कह कर मामला नहीं टाल सकते हैं कि उनके पास शिकायत नहीं पहुंचती। ऐसे मामलों में संगठन की स्वयं पहल होनी चाहिए थी, जो नहीं दिखती। यह समय है विचार करने का। पत्रकार संगठन का कोई औचित्य भी है या महज दिखावे के लिए है। आखिर किसके लिए हो रही है पत्रकारिता। यदि जनता को जगाना है तो जनता का साथ ने इस मौके पर साथ क्यों नहीं दिया। आखिर हर खबर का अंतिम लक्ष्य पाठक और दर्शक को हकीकत बताना ही तो हैं। यदि आगे निकलने के रफ़्तार में चैनल गिरफतार नहीं हुए होते तो शायद काले कानून के विरोध में डट कर सरकार को डराने की बजाये गिडगिडाने की नौबत नहीं आई होती।



कई घटनाएं ऐसी हुई जिससे सबसे पहले दिखाने की होड में मात खानी पड़ी। जनता का भरोसा तो उठना ही था। भरोसा तोडने की राह पर जब मीडिया जाने लगी थी, तभी संगठनों को सचेत होकर रणनीति तय करनी चाहिए थी। यहां यह तर्क देकर इस बात की अनेदेखी नहीं की जा सकती है कि मीडिया का नियंता पूंजी और बाजार हो गई है। पर इस बाजार ने कभी यह नहीं कहा कि जनता का भरोसा तोडा जाए। यदि भरोसा टूटता है तो निश्चित रूप से बाजार का ही नुकसान होगा। बहरहाल सारी स्थितियों को जानते रहते हुए केवल भड़ासी होने या कुढते रहने से कुछ नहीं होने वाला है। पत्रकार संगठनों की पिछली और वर्तमानी पीढी ने जो नहीं किया, वह अब होना चाहिए।

रविवार, मई 31, 2009

विधार्भ में खेतिकिसनो के माथे पर मौत का पसीना

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गुरुवार, अप्रैल 30, 2009

किसान आत्महत्या के लिए पुसद पैटर्न


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गटर में घुटती जिंदगी

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कारतूस उगलता तालाब

सारी व्यवस्था आग लगने के बाद की है
नागपुर को जिस तरह से एक मॉडल सिटी बनाने की बात की जा रही है, उसमें आपतकालिन स्थिति में जीवन रक्षक व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। नवनिर्मित भवनों में भी इसकी व्यवस्था नहीं की जा रही है। विभिन्न आवासीय व व्यावसायिक भवनों में जो भी कुछ व्यवस्था है, वह आग लगने के बाद उसके बुझाने के लिए है। लेकिन आग फैलने से कैसे रोके इसकी व्यवस्था मुश्किल से ही मिलेंगे। लोग पैसिव लाइफ सेफ्टी मैनर को नहीं जानते हैं। स्मोक मैनेजमेंट की व्यवस्था नहीं होती है। हालांकि ये आग से बचाव के तकनीकी भाषा है। लेकिन इसके प्रति लोगों में जागरूकता बेहद जरूरी है। भवनों में अग्निशमन के उपकरण तो होते हैं, लेकिन आग जाए और उससे निकला हुआ धुंआ कहीं और न फैले इसकी व्यवस्था कहां की जा रही है? भवन डिजायन कने वाले आर्किटेक और इंटिरियर डिजायनरों को स्वयं इस बात की पहल करनी चाहिए। अनेक लोग अपनी गाढ़ी कमाई से बहुमंजिले इमारतों पर फ्लैट्स लेते हैं। लेकिन आपतकालीन समय में उनका जीवन कितना सुरक्षित है? इस पर न ही वे विचार करते हैं और न ही भवन निर्माता? हमारे संस्थान में विभिन्न राज्यों के अनेक विभागों के अधिकारी प्रशिक्षण के लिए आते हैं, वे बताते हैं कि आम लोगों में इसके प्रति जागरूकता नहीं है। यदि स्थानीय प्रशासन नियम को सख्त करें तो आपतकालीन स्थिति में लोगों का जीवन सुरक्षित हो सकता है।
डा. शमीम,
प्रमुख,फैकल्टी ऑफ फायर इंजीनियरिंग एक टेक्नोलॉजी
राष्टï्रीय अग्निशमन महाविद्याल, नागपुर
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गुरुवार, अप्रैल 16, 2009

बेटियांबनेगी पशु चिकित्सक



पशु चिकित्सा में लड़कियों की रुचि बढ़ी
मानव चिकित्सा की पेशा शुरू से ही प्रतिष्ठिïत रहा है। पर मूक पशुओं की सेवा के लिए पशु चिकित्सक बनने की ललक कुछ लोगों में ही होती है। करीब एक दशक पहले तक इस क्षेत्र में महिला चिकित्सक खोजने से नहीं मिलती थी। आज स्थिति बदल चुकी है। राज्य के पशु चिकित्सक शिक्षण संस्थानों के आंकड़े बता रहे हैं कि इस क्षेत्र में कैरियर बनाने वाली लड़कियों की अच्छी-खासी भागीदारी बढ़ रही है।
संजय कुमार
नागपुर. कुछ साल पहले तक जहां पशु चिकित्सा के क्षेत्र में पुरुष चिकित्सकों का ही बोलबाला था, वहीं अब पशु चिकित्सा संस्थानों में प्रवेश लेने वालों में लड़कियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सेमिनरी हिल्स स्थित महाराष्टï्र पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय के संचालित विभिन्न पाठ्यक्रमों के पिछले पांच साल के अंाकड़े बता रहे हैं कि हर साल शुरू होने वाले विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों में लड़कियों की संख्या बढ़ी थी। लेकिन सन् 2006 -2009 के बीच थोड़ी-सी कम हुई। लेकिन जिस तरह से दूसरे व्यावसायिक शिक्षा महंगे होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि मध्यम वर्ग की और भी लड़कियां इस क्षेत्र में प्रवेश लेने के लिए उत्सुक होंगी। फिलहाल हर पाठ्यक्रम में औसतन 30 प्रतिशत लड़कियां दाखिला लेती हैं। लोगों में घर में एक पालतू रखने के शौक के कारण उनके स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के लिए भविष्य में पशु चिकित्सकों की मांग बनी रहेगी।
महिला चिकित्सक पालकों के करीब
विश्वविद्यालय के कुलगुरु डा. अरुण एस. निनावे का कहना है एक समय था, जब पशु चिकित्सा के क्षेत्र में भूली-भटकी महिलाएं ही आती थीं। अब स्थिति बदल चुकी हैं। गत पांच सालों में लड़कियों की रुचि काफी बढ़ी है। दूसरे व्यावसायिक शिक्षा के अपेक्षा पशु चिकित्सा पाठ्यक्रम काफी सस्ते होने के कारण मध्यम वर्ग की लड़कियां इसे कैरियर विकल्प के रूप में चुन रही हैं। लड़कियों में रुचि बढऩे का दूसरा कारण यह भी है कि पालतू पशुओं के साथ महिलाएं सबसे ज्यादा करीबी होती हैं। गांव हो या शहर घर में पालतू पशुओं की देखभाल की ज्यादा जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। यदि पालतू की जांच एक महिला चिकित्सक करती हैं, तो महिला पालक को काफी खुशी होती है।
तब लोगों में कौतुहल होता था
गांव के संस्मरण सुनाती हुई डा. गीतांजलि ठुगे कहती हैं कि नौ साल पहले जब इस क्षेत्र को कैरियर के रूप में चुनाव किया तब कुछ गिनी-चुनी लड़कियां ही थीं। लोग मुझे कौतुहल से देखते थे। गांव में जाने पर महिलाओं को सबसे ज्यादा खुशी होती थी। पशुओं के करीब होने के कारण वे उसकी हर गतिविधियों को बेझिझक बताती थी, जिससे पशु की समस्या को जानने-समझने में आसानी होती है।
रोजगार के अच्छे विकल्प
महाराष्टï्र पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय नागपुर के संचालक डा. प्रकाश लोमकर ने बताया कि संस्था के किसी भी पाठ्यक्रम में पढऩ वाली लड़कियों का परीक्षाफल लड़कों से हमेशा अच्छा रहा है। उनके लिए यह बेहद सुरक्षित कैरियर हैं। सरकारी क्षेत्र में जॉब के साथ, निजी डेयरी फार्म या फिर प्राईवेट प्रैक्टिस के रूप में रोजगार प्राप्त किया जा सकता है।
जागरूक हो रही हैं ग्रामीण महिलाएं
महाराष्टï्र पशु एंव मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय नागपुर के संचालक डा. प्रकाश लोमकर ने बताया कि विदर्भ के गांवों में हजारों महिलाएं पशुसंवर्धन, गौपालन एवं दुग्ध व्यवसाय से जुड़ी हैं। विश्वविद्यालय की ओर से ग्रामीण पशुपालक महिलाओं की समस्याओं के तुरंत समाधान के लिए कम्प्यूटर प्रणाली से हर जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है। पशुपालकों के पूछे गए प्रश्नों के उत्तर उचित चित्र एवं अक्षरों से उपलब्ध कराया जाता है। चुनिंदा एवं महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तरों की छोटी किताब, सी.डी. एवं वी.सी.डी बनाकर ग्रामीणों को उपलब्ध कराया जाता है। आपातस्थिति के लिए कुछ मोबाइल नंबर भी उपलब्ध कराया गया है। कम पढ़ी-लिखी अपने पालतू जानवरों के स्वास्थ्य के नुसखे जानकर काफी खुश होती हैं।

बेटियों ने थमी लगाम






रोमांच के लिए बिटिया ने थामी लगाम
संजय कुमार
हाथों में लगाम...परफेक्ट राइडिंग किट और घोड़े पर बैठने के रोमांच का अनुभव लेने में लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। नगर के बाहर स्थित रॉयल गोंडवाना पब्लिक स्कूल में पढ़ाई में अव्वल रहने वाली छात्राएं घुड़सवारी में ंभी रुचि दिखा रही हैं। कहती हैं कि जब लड़कियां हर चीज में आगे हैं तो भला घुड़सवारी में क्यों पीछे रहें। इसका अपना अलग ही रोमांच है। मजेदार बात यह है कि इन लड़कियों के माता-पिता की उन्हें घुड़सवारी के लिए प्रोत्साहन कर रहे हैं। वुमन भास्कर ने घुड़सवारी सीख रही लड़कियों से उनके अनुभव जानें-
मम्मी ने कहा सीख लो
सूर्या पानीकर कहती है कि जब स्कूल में घुड़सवारी का मौका मिला तो मम्मी को बताई। मम्मी ने कहा सीखे लोग। पहले तो लगा कि पता नहीं घोड़ा गिरा देगा। धीरे-धीरे डर खत्म हो गया। अब घोड़ा दोस्त हो गया है। इसके बारे में भी बहुत जानकारी मिली। घोड़ा बहुत समझदार जानवर है। यदि घुड़सवार के अंदर डर रहता है तो घोड़ा भी मस्ती करता है। यदि आत्मविश्वास के साथ लगाम थामा जाए तो उसे भी मजा आता है और गिराने की कोशिश नहीं करता है। रिया बिरानी और काजल घड़ई ने बताया कि जब वह ट्रेनर के सहयोग से पहली बार घोड़े को जम्प कराया, तो लगा कि गिर जाऊंगी। लेकिन जल्द ही संभाल लिया। घोड़े को जम्प कराने में भी मजा आता है।
कुशलता के लिए अभ्यास जरूरी
आयुषी पालीवार ने बताया कि पहले घोड़े को देखकर ही डर लगता था। पर दूसरी लड़कियों को इस पर बैठते देख मुझमें भी घुड़सवारी की हिम्मत आ गई। कोच के निर्देश को ध्यान में रखकर हॉर्स राइडिंग में आनंद आता है। इसमें कुशल होने के लिए अभ्यास जरूरी है। इसके साथ घोड़े के साथ दोस्ताना व्यवहार बेहद जरूरी है। प्रधन्या हेमक और धनश्री ने बताया कि पहली बार जब घोड़े पर बैठी तो हमें नहीं पता था कि उसे चलाने के लिए पैर से मारना पड़ता है। घोड़ा अपनी मर्जी से इधर-उधर जा रहा था। फिर हमारे कोच ने चलाने का तरीका बताया।
बढ़ गई घोड़े की स्पीड
गत तील साल से घुडसवारी का अभ्यास करने वाली अंशु का कहना है कि
घुड़सवारी की अलग-अलग चाल होती है। वॉक के बाद ट्राड में घोड़े की गति बढ़ जाती है। पहली बार जब मेरे घोड़े ने ट्राड किया तो मुझे लगा कि मैं गिर जाऊं गी लेकिन फिर बैलेंस बनाते हुए खुद को संभाल लिया। इसेस आत्मविश्वास बढ़ गया है। लगता है कि हम दूसरी आम लड़कियों से अलग है। घोड़े को अच्छी तरह से संभाल सकते हैं।
कैरियर है, पर नागपुर में प्लेटफार्म नहीं
प्रशिक्षण पत्राले का कहना है कि पहले लड़कियां इसमें ज्यादा रुचि नहीं लेती थी। लेकिन धीरे-धीरे उनकी रुचि बढ़ती जा रही है। उनका फारफ ॉर्मेंस लड़कों से बेहतर है। माता-पिता भी बेटी को घुड़सवारी की अनुमति देने में अनाकानी नहीं करते हैं। कुशल घुड़सवारी करके इस क्षेत्र में कैरियर भी बनाया जा सकता है। पर जिस तरह से दूसरे महानगरों में इसके बेहतर विकल्प हैं, वैसा प्लेटफार्म नागपुर में नहीं है।
घुड़सवारी का फंडा
-राइडिंग सीखते समय डरे नहीं।
-राइडिंग किट पहनकर ही राइडिंग करें। परफेक्ट राइडिंग किट में (शूज, हैलमेट, गेटिस, ब्रीचिस) होना चाहिए।
-घोड़े पर बैठने के पहले इंस्ट्रक्टर से उसकी प्रवृतियां जान लें कि वह शांत है या भड़काऊ।
-घोड़े पर बैठने (माउंट) होने के लिए कभी भी पीछे से नहीं आगे बांयी ओर से माउंट होना चाहिए।
-बैठक की पोजिशन अच्छी हो और सेंडल के बीच में बैठें।
-पैर के पंजे रकाब में सही तरीके से रखना चाहिए ताकि घोड़े को पैरों से सही मदद दी जा सके।
-हाथों में रेन (लगाम) सही तरीके से पकड़ें। तीन अंगुली बीच में, लास्ट अंगुली लगाम के नीचे हिस्से में और अंगूठे से ऊपर के हिस्से के लॉक कर -खड़ी मु_ïी गोल कलाई यह तरीका रास पकडऩे का होता है। यह रास घोड़े के मुंह में लगी बीट से जुड़ी होती है।
रोकने (हॉल्ट) करने के लिए दोनों रेन खींचकर हलका सी बॉडी पीछे करने पर वह रुक जाता है।
-पहली चाल वॉक होती है जिसे करते समय रेन को लूज किया जाता है व पैर से घोड़े को आगे बढ़ाने के लिए मदद की जाती है।
-बेसिक में सही बैठक का तरीका, चलाने के लिए सही मदद देने का तरीका सीखना जरूरी है। घुटनों की पकड़ सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।
ट्रॉड व केंटर भी शुरुआती प्रशिक्षण में आता है। इसके बाद घोड़े से उतरने समय आगे की तरफ झुककर घोड़े के अगले पैरों की तरफ उतरना चाहिए। बॉक्स में
महिलाओं लिए विशेष कैंप
स्कूल के निदेशक देवेंन्द्र दस्तुरे का कहना है कि नागपुर के लोगों में घुड़सवारी का बहुत ज्यादा क्रेज नहीं है। ओलंपिक में यह गेम शामिल है। मेरा सपना है कि यहां से सीखे हुए घुड़सवार ओलंपिक तक आए और भारत के लिए मैंडल लाए। उन्होंने बताया कि आम लोगों में इसकी रुचि बढ़ाने के लिए स्कूल में घुड़सवारी का कैंप आयोजित होता है। इसमें करीब 20 प्रतिशत महिलाएं होती है। हर दिन डेढ़ घंटे का अभ्यास कराया जाता है। इस बार महिलाओं के लिए अलग से रुचि बढ़ाने की योजना है।
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