----------------------------- हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती है। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब .आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है। --------------------संजय स्वदेश बीते दिनों केरल पुलिस के 16 अधिकारियों ने झारखंड के 123 बच्चों को केरल से जसीडीह स्टेशन पहुंचाया गया। ये बच्चे मानव तस्करी के जरिए केरल के अनाथालय में पहुंचाया गया था। पिछले वर्ष भी इसी तरह थोक में बच्चों की मानव तस्करी की एक और मामले का पर्दाफाश हुआ था। राजस्थान के भरतपुर रेलवे स्टेशन से 184 बाल मजदूरों को मुक्त करा कर पटना पहुंचाया गया। आए दिन देश के हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती हंै। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है। मां-बाप का जिगर का जो टुकड़ा दु:खों की हर छांव से बचता रहता है, वह इस गैंग में चंगुल में आने के बाद एक ऐसी दुनिया में गुम हो जाता है, जहां से न बाप का लाड़ रहता है और मां के ममता का आंचल। किसी के अंग को निकाल कर दूसरे में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है, तो किसी को देह के धंधे में झोंक दिया जाता है, तो हजारों मजदूरी की भेंट चढ़ जाते हैं। गुमशुदा होने के समान्य आंकड़ों के अनुसार देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है। मतलब देशभर में चौबीस घंटे में कुल 24 लोगों के जिगर के टुकड़ों को छिन कर जिंदगी के अंधेरे में ढकेल दिया जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब 11,000 का ही पता लग पाता है। भारत में मानव तस्करी को लेकर यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है और देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है, जहां देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है। वर्ष 2009 से 2011 के बीच लगभग 1,77,660 बच्चे लापता हुए जिनमें से 1,22,190 बच्चों को पता चल सका, जबकि अभी भी 55 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हैं जिसमें से 64 फीसदी यानी लगभग 35,615 नाबालिग लड़कियां हैं। वहीं इस बीच करीब 1 लाख 60 हजार महिलाएं लापता हुईं जिनमें से सिर्फ 1 लाख 3 हजार महिलाओं का ही पता चल सका। वहीं लगभग 56 हजार महिलाएं अब तक लापता हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011-12 में एनजीओ की मदद से 1532 बच्चों को बचाया जा सका। वर्ष 2009-2011 के बीच लापता हुए लगभग 3,094 बच्चों का अबतक कोई सुराग नहीं लग पाया है जिनमें से 1,636 लड़कियां हैं तो वहीं इस दौरान गायब हुईं लगभग 3,786 महिलाएं भी अबतक लापता हैं। गायब बच्चों के माता-पिता के आंखों के आंसू सूख चुके हैं। पर उनकी यादें हर दिन टिस मारती है। ऐसी बात नहीं है कि इन तरह के अपराधों के रोकथाम के लिए कानून नहीं है। कानून तो है, पर इसका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पा रहा है। यदि क्रियान्वयन भी होता है तो इसमें इतनी खामियां हैं कि मानव तस्करों के गिरोह पर मजबूती से नकेल नहीं कसा जा पता है। कई मामलों में तो देखा गया है कि ऐसे कानूनों की जानकारी थाने में तैनात पुलिसवालों को भी नहीं होती है। हालांकि गृहमंत्रालय की विभिन्न इकायों के माध्यम से करीब 225 मानव तस्कर विरोधी इकाइयां सक्रिय हैं। गृह मंत्रालय की मानव तस्करी विरोधी इकाइयों 2011 से अब तक देश भर में 4000 से अधिक बचाव अभियान चलाये और 13742 पीड़ितों को बचाया। साथ ही 7087 मानव तस्करों को गिरफ्तार कराया। जल्द ही 100 और नई ऐसी इकाइयां गठित होने वाली है। लेकिन सरकार की मानव तस्कर विरोधी गतिविधियां जिस गति से सक्रिय है, उससे कई ज्यादा तेज तस्करों का गिरोह हैं। देश और देश के बाहर दूर दराज के गरीब ग्रामीणों व आदिवासी क्षेत्र के बच्चे इसी तरह मानव तस्करी की आग में जलते जा रहे हैं। भारत ने मानव तस्करी रोकने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संधियों को मंजूरी दी है। इनमें संयुक्त राष्ट्र ट्रांसनेशनल संगठित अपराध संधि और महिलाओं और बच्चों की तस्करी से जुडी दक्षेस संधि जैसे समझौते शामिल हैं। इसके अलावा बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय समझौता है। इसके बावजूद बांग्लादेश और नेपाल से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मानव तस्करी जोरों पर होती है। बांग्लादेश और नेपाल से सीमा पार मानव तस्करी में संगठित गिरोह शामिल हैं, लेकिन सफल जांच और मुकदमे के शायद ही ऐसे कोई मामले हों, जो अपराधियों के मन में भय पैदा करते हों। कई बार यह देखा गया है कि मानव तस्करी से निपटने के लिए सीमा रक्षक बलों, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे आयोगों तथा राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच त्वरित समन्वय और सक्रियता की भी भारी कमी है। जब तक तस्कर पीड़ित मासूमों को अपने परिवार का सदस्य समय कर मानव तस्करों के खिलाफ कार्य करने वाली सरकारी एजेंसियां सक्रिय होकर कार्य नहीं करेंगी, देश में इस काले अमावीय धंधे का थोक बाजार फलता फूलता रहेगा।
सोमवार, जून 23, 2014
मानव तस्करी की मंडी में मासूम
शनिवार, दिसंबर 21, 2013
फाइलों के झुरमुटों में अटकी दलहन क्रांति
पीली क्रांति पर ग्रहण
संदर्भ : दलहन और तिहलन का घटता उत्पादन बढ़ता आयात
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खास बात : देश में हर साल 30 हजार करोड़ के खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 90 के दशक में तिलहन के मामले में देश आत्म निर्भरता के करीब था। देश में घरेलू जरूरत का 97 प्रतिशत तक उत्पादन हो रहा था। 2007-2008 से लेकर अब तक कृषि कैलेंडर का अवलोकन करे तो स्वष्ट होता है कि जहां धान, गेहूं, कपास सहित अन्य खाद्यान्नों के उत्पादन का ग्राफ बढ़ा है, वही दलहन तिलहन का उत्पादन घटा है।
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संजय स्वदेश
विकास की रफ्तार में खेती के दरकिनार होने का मुद्दा गाहे-बगाहे सतह पर आता है। मुद्दे में इतनी गर्मी नहीं होती है कि उस पर सरकार कुछ ठोस निर्णय ले। लिहाजा, अन्नादाता पर हमदर्दी के बादल तो खुब गरजते हैं। पर हकीकत में जो होता है, वह उनके लिए संतोषजनक नहीं होता है। इस तरह के ढेरों झंझावातों के बावजूद किसानों ने अपने पसीने से देश का पेट भरने लायक अनाज उगाया है।
धान और गेहूं के बाद दलहन और तिलहन जरूरी अनाजों में है। लेकिन करीब एक दशक से दहलन और तिलहन का उत्पादन पर भारी नकारात्मक असर पड़ा है। दशक भर पहले देश में दलहन और तिलहन उत्पादन को लेकर हम दंभ भरते थे। इसे पीली क्रांति की संज्ञा दिया था। लेकिन कब इस क्रांति पर ग्रहण लग गया किसी ने सुध ही नहीं ली। हालात तो यह हैं कि देश में दलहन और तिलहन का आयात बढ़ता जा रहा है। कृषि उत्पादों के आयात शुल्क में कमी
देश के किसानों के साथ के साथ मजाक से कम नहीं है। पटरी से उतरी दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए सुझाए गए उपायों पर अमल तो दूर उन्हें फाइलों के झुरमुटों में ही अटका दिया गया है। लिहाजा, हकीकत के उपाय खेतों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। संसद के शीत सत्र में ही एक संसदीय समिति ने इसको लेकर सरकार की आलोचना की है। समिति ने अपनी 46 की रिपोर्ट में दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए दिए सुझाव पर पहल करने की सिफारिश भी की है। कृषि विभाग ने तिलहन और पाम तेल पर राष्ट्रीय मिशन एनएमओ ओपी के संबंध में भी निर्णय नहीं लिया है, जो चिंता का विषय है। सोयाबीन, मुंगफली, मुंग, उड़द और अरहर की खेती के बढ़ावा देकर दलहन और तिलहन के को आकर्षित करने समर्थन मूल्य में वृद्धि कर उन्नत बीज के साथ आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध करने की जरूरत है। किंतु अफसोस समिति की सिफारिशों पर गौर नहीं किया जा रहा है। दलहन और तिलहन पर यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए गए तो आयात में और वृद्धि स्वाभाविक है।
फिलहाल देश में हर साल 30 हजार करोड़ के खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 90 के दशक में तिलहन के मामले में देश आत्म निर्भरता के करीब था। देश में घरेलू जरूरत का 97 प्रतिशत तक उत्पादन हो रहा था। किसानों को तकनीक और बीज के मामले में प्रोत्साहन नहीं मिलने से उत्पादन में गिरावट चली आई। दूसरी और आयात शुल्क में 75 प्रतिशत तक छूट दी जाने लगी, जिससे किसान पिछड़े उत्पादन गिरा और हमारी आत्म निर्भरता धराशायी हो गई है। इसके बाद भी दलहन और तिलहन के मामले अनुदार रवैया अपनाया जा रहा है। यह खतरे की घंटी है। आयात शुल्क घटाने से विदेशी विनिमय का लाभ इंडोनेशिया, मलेशिया, अमरीका और ब्राजील के किसानों को मिल रहा है। यदि दलहन-तिलहन के समर्थन मूल्य पर इजाफा किया जाता है तो आयात घटेगा और देश के किसान लाभान्वित होंगे।
राजीव गांधी के शासन काल 1985 में कमोबेश यही स्थिति बनी थी। तब संसद में बहस हुई। बहस का सार था हम पेट्रोल डीजल क्यों खरीदते हैं? तर्क आया दोनों वस्तुओं का उत्पादन देश में नहीं होता है। पर दहलन तिलहन हमारे श्रम का नतीजा है। फौरन कृषि नीति पर बदलाव किया गया। यात्र एक दो वर्ष के अंतराल में हमारी आयात निर्भरता घटने लगी। किंतु डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अनिवार्य मामले में उपेक्षा मिली। 2007-2008 से लेकर अब तक कृषि कैलेंडर का अवलोकन करे तो स्वष्ट होता है धान, गेहूं, कपास सहित अन्य खाद्यान्नों के इस उत्पादन में उतरोत्तर तरक्की कर रहे हैं। बस दलहल तिलहन पिछड़ रहा है। इस सूरत में दलहन और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए ठोस पहल किया जाना चाहिए।
आयल सीड्स टेक्नालाजी मिशन को हासिल करना आज के दौर में बेहद सरल कार्य है। इस मामले में एक और विसंगति सामने आई है। सोयाबीन के उत्पादन के लिए जेनेटिकल मोडिफाइड कृत्रिम रूप से संवर्धित यानी जीएम सोसाबीन के उत्पादन बढ़ावा दिया जा रहा है। इस प्रजाति के बीज का उत्पादन सामान्य सोयाबीन से 4 से 20 प्रतिशत कम होता है। इस बीज को बढ़ावा देने देश को क्या लाभ होगा इसका खुलासा नहीं किया गया है। आश्चर्य की बा है कि कृत्रिम रूप से संवर्धित बीजों के अन्य उत्पादों का कम विरोध कर चुके है। उसके बाद सोयाबीन को बढ़ावा देना जांच का विषय हो सकता है।
सिफारिशी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि दलहन तिलहन के उत्पादन में आवश्यकता अनुसार उत्पादन के लिए देश में 30 प्रतिशत कृषि रकबे की आवश्यकता पड़ेगी। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र की परंपरागत खेती के साथ अलसी, सोयाबीन, सरसो और तिल की फसल आसानी से उगाई जा सकता है। दलहन और तिलहन के उत्पादन रकबे में वृद्धि से धान और गेहूं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी। किंतु इससे हमारी आर्थिक व्यवस्था पर बल आने की संभावना नहीं के बराबर होगी। पाम यानी ताड़ बुनियादी तौर से मुरस्थली उपज है। इसके लिए भारत की भूमि को ज्यादा उपयुक्त नहीं माना जाता है। पाम से 10 प्रतिशत अतिरिक्त कार्बन डिस्चार्ज होता है। जो बेहद हानिकारक है। इसलिए खाद तेल के विकल्प के रूप में पाम की जगह सोयाबीन आदि को बढ़ावा देना चाहिए। रिक्त भूमि का उपयोग दलहन और लिए परंपरागत रूप में किया जाता रहा है। इस प्रचलन में लाने के लिए कठिन प्रयास के आवश्यकता ही नहीं है।
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शनिवार, दिसंबर 14, 2013
अशिक्षा, अपराध के अंधी गलियारे में मुस्लिम
------------------------------ देश और राज्यों में सरकारें बदलती रही, मुसलमानों की बेहतरी के लिए समितियां और आयोग बनते रहे। उनकी सिफारिशों पर बहस मुनासिब होती है मगर देश में मुसलमानों की हालत नहीं बदली। ------------------------------संजय स्वदेश पेड़ काट कर डाल को सींचने से वृक्ष के जीवन की आशा व्यर्थ है। देश में मुस्लिम आबादी के साथ कुछ ऐसी ही कहानी है। सियासी दांव पर लगे मुस्लिम समाज की बहुसंख्यक लोग शिक्षा और रोजगार में पिछड़ गए हैं। नाकारात्मक माहौल में पल बढ़ कर आपराधिक मामलों में भी पिस रहे हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि मुसलमानों की आबादी का जो प्रतिशत देश में है, उससे ज्यादा प्रतिशत जेल में है। कई बार शक के आधार पर पुलिस कार्रवाई और अन्याय के प्रणाली के शिकार मुसलमानों की बड़ी संख्या नाक जेल जाती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस बात को लेकर एक सार्वजनिक बयान दिया कि इस तरह शक के आधार पर मुस्लिम समाज के बेगुनाह लोगों की गिरफ्तारी नहंी की जाए। ऐसे पीड़ितों की अन्याय के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई बुलंदी से नहीं उठती है। सिस्टम और परिस्थितियों के कारण उनके मन में द्वेष के बीज अंकुरित हो जाते हैं। सियासी गलियारों में मुसलमानों के हित की वकालत बड़ी चालाकी और लुभावनी तरिके से की जाती है। लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ कार्य हुए होते तो आज हालात यह नहीं होते। जबानी जमा खर्च का लाभ बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी तक नहीं पहुंच पाया है। सियासी लाभ के लिए इन पक्ष में दिये जाने वाले बयान सर्व धर्म समभाव की भावना का पोषण भी नहीं करते हैं। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, मुस्लिम समाज में शिक्षा, न्याय व अन्य आंकड़े हकीकत बताते हैं। यह आंकड़े ही कहते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ही मुस्लिमों की उपस्थिति का प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों से कमतर है। आजादी के साथ ही मुसलमानों की बेहतरी के लिए चिंता जाहिर की गई और यह चिंता आज भी जाहिर की जा रही है, पर कौम की बड़ी आबादी हमारी सामाजिक और न्याय प्रणाली से आहत है। इसकी मूल वजह मुसलमानों के शिक्षा के प्रतिशत में कमी को कहना गलत नहीं होगा। देश में मुसलमानों के अलावा अन्य कई जातियां अल्प संख्य वर्ग शामिल हैं, जिनकी साक्षरता दर पर संतोष नहीं जताया जा सकता है किंतु उनकी माली हालत मुस्लिमों की तुलना में ज्यादा तेज गति से सुधर रही है। सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के बाद भी उन्हें थोड़ा बहुत लाभ मिल जा रहा है। मुस्लिम जमात के बच्चों की बुनियादी तालिम मदरसों से शुरू होती है। राष्टÑीय अल्पसंख्यक शिक्षा निगरानी समिति की स्थायी समिति ने मदरसों की बदहाली पर चिंता जाहिर कर चुका है। मदरसों के आधुनिकीकरण के तैयार मॉडल में शिक्षकों को बेहतर वेतन और कंप्यूटरीकरण के लिए वित्तीय वर्ष 2012-2013 में 9905 मदरसों के लिए 182.49 करोड़ की मंजूरी दी गई है। जिसे अमलीजामा पहनाना शेष है। इसलिए फिलहाल इस राहत को दूर के ढोल सुहावने से ज्यादा और कुछ नहीं कहा जा सकता है। बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल और पंजाब में मुसलमानों की आबादी करीब 45 प्रतिशत है। इन राज्यों के साक्षरता प्रतिशत में पश्चिम बंगाल और दिल्ली को छोड़कर अन्य राज्यों में मुसलमानों की साक्षरता प्रतिशत असंतोष कारक है। देश के 374 जिलों में से 67 जिले अल्पसंख्यक बहुल है। सन् 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के उल्लेखनीय पक्ष में मुसलमानों को कई योजना में लाभ नहीं मिलने की बात बताई थीं। स्वामीनाथन एस अंकलेसरीया की अध्यक्ष रिपोर्ट में भी मुसलमनों की तरक्की को लेकर चर्चा की गई। मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि को लेकर हुई बहस में मुसलमानों का मूल्यांकन कमतर किया जा रहा था किंतु सच्चर कमेटी और स्वामीनाथन रिपोर्ट के दूसरे पक्ष ने मुसलमान के विकास की गति को असंगत बताया। शिक्षा के इतर अपराधिक मामलों के आंकड़ों पर भी गौर करे तो पाएंगे कि हिंसा में मुसलमानों का दखल ज्यादा है। अपराध का वास्ता न्यायालय और पुलिस से पड़ता ही है। पुलिस कार्रवाई की ज्यादती से न्यायालयों के तथ्य में झोल-झाल स्वाभाविक है और इससे अन्याय संभव है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन संस्था राष्टÑीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एमसीआरबी) और देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार सेकुलर और कम्युनल सरकारों का रवैया मुसलमानों के प्रति एक समान रहा है। पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक वामपंथी शासन रहा है। पश्चिम बंगाल के जेलों में बंद कैदी आधे मुसलमान है। महाराष्टÑ और उत्तर प्रदेश में थोड़ी राहत मिली है। वहां हर तीसरा और चौथा कैदी मुसलमान है। जम्मू-कश्मीर, पांडुचेरी, सिक्किम के अलावा देश के अन्य जेलों में मुसलमानों की आबादी का प्रतिशत ज्यादा है। जनगणना रिपोर्ट 2001 के अनुसार मुसलमानों आबादी देश में 13.4 फीसदी थी और दिसम्बर 11 के एनसीआरबी के आंकड़े के अनुसार जेल में 21 फीसदी मुसलमान 21 फीसदी है। जेल यात्रा के चलते कई मुसलमान परिवार तबाह हो गए। आर्थिक, मानसिक और सामाजिक यातनाओं को झेलने वाले परिवारों की कहानी बड़ी मार्मिक है। किसी भी वारदात के बाद संदेह में बड़ी संख्या में मुसलमानों की गिरफ्तारी हुई। ढेरों मामले हैं जिसमें बेगुनाह मुस्लमान वर्षांे जेल में पिसते रहे। मामला झूठ साबित होने पर रिहा हुए। ऐसे हालात की स्थिति वैसे ही हैं जैसे गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है देश की अधिकतर आतंकी वारदातों में जो आरोपी पकड़े जाते हैं, वे ज्यादातर मामलो में मुस्लिम निकले हैं। फिर भी व्यक्ति आतंकी की सजा पूरे कौम को नहीं दी जा सकती है। ऐसे पीड़ितों पर सियासत के दिग्गजों ने अधिकतर सहानुभूति के बोल के ही मरहम लगाया है। परिवार को राहत दिलाए जाने की वकालत अनेक राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने की है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि मुसलमान यदि आज पुलिसिया जुल्म के सामने बेबस नजर आता है तो यह कांग्रेस की भी कमजोरी है। वहीं यह भी सच है कि इस मामले में भाजपा की छवि को भी पाक साफ नहीं कहा जा सकता है। पश्चिम बंगाल में माकपा नेता ज्योति बसु का मुख्य मंत्रित्व काल के 30 साल के लिए विख्यात है। मुसलमान अन्याय के मामले में पश्चिम बंगल का ग्राम देश में सर्वाधिक ऊंचा है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुखतार अब्बास नकवी ने कहा कि राज्यों इस समस्या को मानवीय आधार पर सुलझाना चाहिए। वहीं मुसलमानों पर पक्षपात पूर्ण कार्रवाई पर पीयूसीएल का आरोप है। सरकारें बदली दल बदला पर मुसलमानों की इस समस्याओं का निराकरण नहीं हुआ। क्योंकि सियात में मुसलमान कौम को मोहरे के रूप इस्तमाल किया जा रह है। गुजरात कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार हिदायत देनी पड़ी थी। राज्य में पोटा और टाडा के तहत 280 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें 279 मुसलमान थे। इसमें से मात्र डेढ़ प्रतिशत को सजा हुआ पोटा के तहत 1031 लोगों को गिरफ्तारी हुई। जिसमें मात्र 13 को सजा हुई। लेने समय तक जारी पुलिसिया कार्रवाई पर अकुंश नहीं लगाया गया है। देश के अमूमन राज्यों में मुसलमानों की यही दशा है। जाहिर से इस समाज में शिक्षा की लौ जैसे ही तेज होगी, समाज की सोच प्रगतिशील होगी। आने वाली पीढ़ी में हिंसा और अपराध की राह को छोड़ अपने घर परिवार और भविष्य को सुखमय बनाने में व्यस्त होगी। इसी से समाज भी मजबूत होगा। देश भी मजबूत होगा। -----------------------------------
शुक्रवार, दिसंबर 06, 2013
घसिया की घड़वा में इतिहास की धड़कन
कथा छत्तीसी : बस्तर की घड़वा कला
छत्तीसगढ़ में बस्तर की घडवा कला अथवा ढोकरा कला विश्व प्रसिद्ध है। मिट्टी, मोम और धातु की सम्मिलित है इस कलासाधना से जो सृजित होता है, उसके प्रति मन सहज ही आकर्षित होता है। इसमें कलाकृति धातु की बनती है लेकिन कलाकार उसे मोम में साधता है। बस्तर में मुख्य रूप से से घसिया जनजाति ने घड़वा कला को साधा और शिखर तक पहुँचाया। घसिया के रूप में इस जनजाति को पहचान रियासतकाल में उनके कार्य को ले कर हुई। जानकार कहते हैं कि ये जनजाति दिनो घोड़ों के लिए घास काटने का कार्य किया करती थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि घड़वा कला को किसी काल विशेष से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। मोहनजोदाडो में ईसा से तीन हजार साल पहले प्राप्त एक नृत्य करती लड़की की प्रतिमा लगभग उसी तकनीक पर आधारित है जिसपर बस्तर का घड़वा शिल्प आज कार्य कर रहा है।
प्रसिद्ध घड़वा शिल्पकलाकार जयदेव बघेल ने लिखा है कि बस्तर में इस कला के प्रारंभ के लिए जो मिथक कथा है उसका संबंध आदिमानव और उसकी जिज्ञासाओं से है। जब आदिमानव जंगल में विचरण करता था और शिकार पर आश्रित अपना जीवन निर्वहन किया करता था। इन्ही में से एक आदिमानव की यह कहानी है जो अपने माता-पिता से बिछड़ कर किसी गुफा में रह रहा था। एक दिन उसने पहाड़ पर आग लगी देखी। आग से निकलने वाले रंग तथा चिंगारिया उसे भिन्न प्रतीत हुईं और वह जिज्ञासा वश उस दावानल के निकट चला गया। अब तक आग स्थिर होने लगी थी। वहीं निकट ही उसे एक ठोस आकृति दिखाई पड़ी जो किसी धातु के पिघल कर प्रकृति प्रदत्त किसी सांचे में प्रवेश कर जम जाने के बाद सृजित हुई होगी। यह आकृति उसे अलग और आकर्षित करने वाली लगी। उसे उठा कर वह आदिमानव अपने घर ले आया। उसने इस प्रतिमा के लिए घर का एक हिस्सा साफ किया और इसे सजा कर रखा। इस प्रतिमा के लिए उसका आकर्षण इतना अधिक था कि हमेशा ही वह इसे साफ करता। धीरे धीरे इससे प्रतिमा में चमक आने लगी। कहते हैं इसी चमक से प्रभावित हो कर वह स्वयं को भी चमकाने लगा। मतलब रोज स्नानादि कर सज संवर कर रहने लगा। यह धातु और वह आदिमानव जैसे एक दूसरे के पूरक हो गए थे। समय के साथ दोनो में ही वैशिष्ठता की दमक उभरने लगी थी जिसे ग्रामीणों ने महसूस किया। जब कारण पूछा गया तो इस आदिमानव ने ग्रामीणों को वह जगह दिखाई जहाँ से उसे धातु का यह प्रकृति द्वारा गढा गया टुकड़ा प्राप्त हुआ था। इस स्थान पर सभी ने पाया कि वह दीमक का टीला था, जिसमें आग से पिघला द्रव धातु-द्रव्य प्रवेश कर गया था और उसने वही आकार ले लिया था। उसी स्थल पर मधुमक्खी का छत्ता भी पाया गया जिससे मोम, सांचा और धातु को कलात्मकता देने का आरंभिक ज्ञान उन ग्रामीणों को हुआ होगा। कहते है कि उस आदि कलाकार ने धातु के इस टुकड़े को अपनी मां माना। उसके प्रति श्रद्धा और प्रेम दिखाया। यह भी कहा जाता है कि उस आदिकलाकार ने सबसे पहले अपनी माँ की आकृति बनाने का यत्न किया। धीरे-धीरे वह अपने आसपास की वस्तुओं और पशु-पक्षियों को भी इस कला के माध्यम से मूर्त रूप देने लगा। लिहाजा, कालांतर में इस कला में बाघ, भालू, हिरण, कुत्ता, खरगोश, नाग कछुवा, मछली, पक्षी, गाय, बकरा, बंदर आदि की कृतियां मिलती हैं। इसी तरह विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ घडवा कला के रूप में परिवर्तित होती रहीं। कर्मकोलातादो, मूलकोलातादो, भैरमदेव, भीमादेव, राजारावदेव, दंतेश्वरीदेवी, माता देवी, परदेसीन माता, हिंग्लाजिन देवी, कंकालिन माता आदि की मूर्तियाँ इस कला के विकास के विभिन्न चरणों में सृजित की गई। लाला जगदलपुरी भी अपनी पुस्तक बस्तर इतिहास एवं संस्कृति में उल्लेखित करते हैं कि बस्तर के घड़वा कला कर्मी पहले कुँडरी, कसाँडी, समई, चिमनी और पैंदिया तैयार करते थे। अब लोग देवी देवता, स्त्री पुरुष, हरिण, हाथी, अकुम आदि बनाते आ रहे हैं।
बस्तर की यह कला असाधारण है। इसकी गहराई में उतरने पर किसी न किसी रूप में इतिहास सामने आने लगता है। सिंधु घाटी की सभ्यता अगर धातु की ऐसी प्रतिमाओं की निमार्ती थी तो निश्चित ही इस सभ्यता के नष्ट होने के साथ जो पलायन हुए उनके साथ ही यह कला भी स्थानांतरित हुई होगी। बस्तर में नाग शासकों ने लगभग सात सौ वर्ष तक शासन किया है और इतिहास उनके आगमन का स्थल मध्य एशिया के पश्चात सिंधुघाटी का क्षेत्र ही मानता रहा है। लिहाजा, यह भी अनुमान लगाया जाता है कि इसी प्रक्रिया में यह कला बस्तर की जनजातियों के पास भी पहुंची हो। इन प्रतिमाओं का महापाषाणकालीन सभ्यता से भी संबंध जोड़ कर देखा गया है तो क्या यह माना जा सकता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में ही समानांतर बसे मानव समूहो को भी धातु को गला कर आकृतियाँ देने की यह कला ज्ञात थी जिसमे गोदावरी के तट पस बसे आदिम समूह भी सम्मिलित थे? फिलहाल यह अभी शोध का विषय है।
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संपर्क- संजय स्वदेश
सोमवार, दिसंबर 02, 2013
मीठी चीनी की कड़वी घूंट
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शक्कर उत्पादन को लेकर सरकार को अपने रैवए पर विचार करना चाहिए। गन्ने की पेराई पर मिलर्स का प्रतिबंध निश्चित रूप से दादागिरी है। इसमें सरकार का दखल जरूरी है। कृषकों के हितों का पोषण सरकार की जवाबदारी है। चीनी विवाद मात्र से थोक बाजार में उठान के संकेत मिल चुके हैं। इस असर खुदरा बाजार पर भी पड़ेगा। आलू, प्याज, टमाटर की महंगाई की मार से पस्त जनता को कड़वी शक्कर को मुश्किल से पचाना पड़ेगा।----------------------------------- संजय स्वदेश महंगाई से जूझ रही जनता को आगामी दिनों में महंगी शक्कर का भी बोझ ढोना पड़ सकता है। इस मामले में केंद्र सरकार और खाद्य मंत्रालय की पहल की सराहना नहीं की जा सकती है। उत्तर प्रदेश में शक्कर मिलर्स ने गन्ने की पेराई बंद कर दी है। गन्ना किसान सरकारी राहत के लिए सड़क पर उतर आए। महाराष्ट्र के सांगली और कोल्हापुर में भी किसानों ने अपने तेवर दिखाए। कर्नाटक के बेलगाम में भी गन्ना किसानों की उग्रता दिखी। हालात देख कर यह सहज अनुमान लगाए जा सकते हैं कि गन्ना किसानों के हाल क्या है। चीनी मिलों की लचर व्यवस्था पर सरकार का अंकुश असफल है। हालत इस बात के भी संकेत दे हैं कि आने वाले दिनों में गन्ने की खेती प्रभावित होगी। लिहाजा, चीनी का उत्पादन घटना तय है। फिलहाल सरकार ने वर्तमान हालत को देखते हुए चीनी उत्पादन में तीन प्रतिशत की कमी होने का संकेत दे दिया है। सरकार, चीनी मिलर्स और गन्ना किसानों का यह संघर्ष आज के नहीं हैं। केंद्र सरकार ने बीमार शक्कर मिलों को जीवन प्रदान करने के लिए ऋण मुक्त ब्याज देने पर विचार किया। लेकिन जिस तरह बीमार मिलो (उद्योगपतियों) की चिंता की गई यदि उस चिंता में किसानों को भी शामिल कर लिया जाता तो, किसानों के आक्रोश पर तत्काल सहानुभूति के छिंटे जरूर पड़ जाते। सरकार का यह कह कर खुश होना उत्पादन की कमी से देश में शक्कर आपूर्ति की समस्या नहीं आएगी, कुशल व्यापार नीति पर बट्टा लगाना जान पड़ता है। यदि हम शक्कर पर आत्मनिर्भर हैं तो निर्यात का पुख्ता इंतजाम किया जाना चाहिए। किसानों को अधिक प्रोत्साहन देना चाहिए। शक्कर का कच्चा माल गन्ना किसानों की सौगात है। कच्चे माल की बुनियाद पर ही उद्योग की स्थापना की जाती है। ऐसे में गन्ना किसानों की मांग को दरकिनार करके बीमार शक्कर मिलों की चिंता उद्योगपतियों पर मेहरबानी से गन्ना किसानों का उग्र होना स्वाभाविक है। भारत शक्कर के उत्पादन और खपत करने दोनों में उस्ताद माना जाता है। दुनिया में ब्राजील के बाद भारत में शक्कर का उत्पादन सबसे ज्यादा है। ऐसे में देश के गन्ना किसान को खुशहाल होना चाहिए, मगर अफसोस गन्ना किसानों को अपनी बदहाली को लेकर सड़कों पर उतरना पड़ता है। लगातार आंदोलन के बाद भी उनकी सुध नहीं ली जाती है। शक्कर उत्पादन को लेकर सरकार को अपने रैवए पर विचार करना चाहिए। गन्ने की पेराई पर मिलर्स का प्रतिबंध निश्चित रूप से दादागिरी है। इसमें सरकार का दखल जरूरी है। कृषकों के हितों का पोषण सरकार की जवाबदारी है। गन्ने की पेराई बंद करने, मिलर्स पर किसानों का करोड़ों रुपए का बकाया, निर्धारित मूल्य पर गन्ने का भुगतान और अन्य कारणों से सरकार द्वारा मिलर्स पर दर्ज कराई गई एफआईआर गतिरोध का मुख्य मुद्दा है। रिपोर्ट पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने से किसान नाराज हैं और मिलर्स की दबंगई जारी है। इन परिस्थितियों में गन्ना गतिरोध समाप्त होते नहीं दिखता है। पेराई के बंद होने से किसानों की परेशानी बढ़Þ जाएगी। उत्पादन विलंब से शुरू होगा इससे लागत में वृद्धि स्वाभाविक है। जिसका बोझ अंतत: जनता के कंधे पर ही आएगा। पिछले दिनों उत्पादन में कमी की चर्चा मात्र से हाजिर स्टाक में शक्कर की कीमत में एक प्रतिशत के इजाफे से थोक में शक्कर की कीमत 3200 से 3275 रुपए प्रति क्विंटल हो गई। इधर आशंका जाहिर की जा रही है कि आगामी दिनों में शक्कर की दर में तीन प्रतिशत की बढ़Þोतरी हो सकती है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार से पहले ही शक्कर के उत्पादन शुल्क पर वृद्धि करने की अपनी मंशा जाहिर कर चुकी है। साथ ही चीनी मिलों को नियंत्रण मुक्त की योजना को प्रस्तुत किया जा चुका है और इसे अमलीजामा पहने की कवायद जारी है। हालांकि इस योजना को अंजाम देने के पीछे उतार-चढ़ाव, आयात-निर्यात में व्याप्त असंतुलन, प्रर्याप्त भंडारण की कमी आदि को महत्वपूर्ण कारण माने जा सकते हैं। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के अध्यक्ष सी रंगराजन की अगुआई वाली समिति ने पिछले साल ही शक्कर से जुड़े हुए दो तरह के नियंत्रण, मसलन-निर्गम प्रणाली और लेवी शक्कर को अविलंब समाप्त करने की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं, इस समिति ने शक्कर उधोग पर आरोपित अन्यान्य नियंत्रणों को भी क्रमश: समाप्त करने की बात कही थी। इस मामले पर अभी भी कार्रवाई लंबित है। यदि इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाता है तो उसके सुख परिणाम समाने आएंगे इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है। विनियंत्रण के मामले में देश के सर्वाधिक उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के अलावा अन्य 10 राज्यों ने अपनी मंशा से केंद्र को अवगत करा दिया है। इससे विनियंत्रण का रास्ता साफ हो गया है। इस लिहाज से कहा जा सकता है अब गेंद केंद्र के पाले में है। विनियंत्रण को किसानों के पक्ष में माना जा रहा है। वे अपने गन्ने की बिक्री अधिक कीमत देने वाले मिलर्स को बेच सकेंगे। किंतु हरहाल में गन्ने की न्यूनतम मूल्य के निर्धारण में सरकार का दखल होगा। लेकिन सरकार की इस दखल को चीनी मिलर्स की लॉबी अपने पक्ष में प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। विनियंत्रण के लिए हाईलेबल पर लाबिंग की जा रही है। चीनी उद्योग एक प्रकार से विनियंत्रण के पक्ष में है। इससे गन्ने के उत्पादन में स्थिर आने की बात कही जा रही है। इस नीति में एक दूसरा व्यवहारिक पहलू को नजरअंदाज किया जा रहा है। देश के गन्ना किसान मानसून पर आश्रित हैं। गन्ने की उगाई में हुए नुकासन के बाद किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के प्ररकणों को भूला नहीं जा सकता है। लिहाजा, विनियंत्रण की संकल्पना को पूर्णरूपेण सही नहीं ठहराया जा सकता है। शक्कर उद्योग पर सरकार का नियंत्रण दो तरीके से किया जाता है। सरकार शक्कर का कोटा तय करती है जिसे खुले बाजार में बेचा जाता है। मिलर्स से उत्पादन का 10 प्रतिशत शक्कर लेवी में ली जाती है। जिसे राशन दुकानों में उपलब्ध कराया जाता है। फिलहाल लेवी की 20 रुपए की शक्कर 13.50 रुपए में बेची जा रही है। किंतु इससे किसानों को राहत मिलने की गुंजाइश कम है। बताया जा रहा है 98 लाख टन शक्कर हमारे मौजूदा स्टाक में है। आगामी वित्तीय वर्ष में हमार उत्पादन 2.44 करोड़ टन के रहने की संभावना है। इससे हमारे कुल उत्पादन में हमको दो से ढाई लाख टन का नुकसान उठाना पड़ सकता है। उत्पादन आंकड़ों के लिहाज से इस परिस्थिति की गणना सामान्य उतार-चढ़ाव के रूप से देखा जाएगा। किंतु देश की आर्थिक समृद्धि और प्रतियोगी नजरिए से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) ने सरकार के दावा को खोखला बताया है। संघ के अनुसार उत्तर प्रदेश के साथ तमिलनाडुु में भी शक्कर उत्पादन में गिरावट की आशंका है। इधर महाराष्ट्र में भी किसानों को असंतोष उजागर हो रहा उत्पादन में गिरावट से चीन के मूल्य में अप्रत्यशित वृद्धि हो सकती है। जिस पर नियंत्रण आसान नहीं होगा। गन्ना किसान और मिलर्स के बीच में सरकार द्वारा निर्धारित 280 रुपए प्रति क्विंटल गन्ने की कीमत विवाद का प्रमुख मुद्दा है। चीनी विवाद मात्र से थोक बाजार में उठान के संकेत मिल चुके हैं। इस असर खुदरा बाजार पर भी पड़ेगा। आलू, प्याज, टमाटर की महंगाई की मार से पस्त जनता को कड़वी शक्कर को मुश्किल से पचाना पड़ेगा। -------------------------------------------------
मंगलवार, नवंबर 19, 2013
गरीब की देह पर मौत का ट्रायल
संदर्भ : दवा परीक्षण पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
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भारत में दवा परीक्षण का कारोबार करीब एक अरब डालर का है। दवा परीक्षण के दुष्प्रभााव के कारण करीब 12 हजार लोग पीड़ित है। कुछ इतने दर्द में हैं कि वे मौत की दुआएं मांग रहे हैं। सरकारें बगले झांक रही है। मरे हुए लोगों को कोई ढंग के मुआवजे के लिए कहीं कोई बुलंद आवाज नहीं है। शायद सरकार ठीकठाक मुआवजा दिला दे तो मरने वाले के गरीब परिवार के दर्द पर मरहम लग सके।
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संजय स्वदेश
आंध्र और गुजरात में 2009-10 के दौरान अनैतिक रूप से दवा परीक्षण के मामले में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और परीक्षण करने वाली संस्था को नोटिस दिया है। जिस दिन कोर्ट ने यह नोटिस जारी किया उसके अगले दिन विदेशी मीडिया ने यह समाचार जारी किया कि विदेशी दवा कंपनियों के लिए भारत में क्लिनीकल ट्रायल सबसे महंगा पड़ रहा है। जबकि अभी तक अधिकतर रपटें यही कह रही थीं कि चीन के बाद भारत में दवा परीक्षण का बेहतरीन माहौल है। इस उपलब्धि में दवा परीक्षण का इतिहास बहुत काला रहा है। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि वर्ष 2005 से 2012 के बीच 475 दवाओं के परीक्षण की वजह से 2,644 मरीजों की मौत हुई। सन् 2008 में 288, 2009 में 637 और 2010 में 668 लोगों की मौत हुई है। इस तरह से एक जान की औसत कीमत महज ढाई लाख रुपए आंकी गई। मुआवजा देने वाली कंपनियों में मर्क, क्विनटाइल्स, बेयर, एमजेन, ब्रिस्टल मेयर्स, सानोफी और फाइजर भी शामिल हैं। निश्चय ही मुआवजे के लिए महज ढाई लाख की रकम दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है।
मध्यप्रदेश आंध्र प्रदेश में ऐसे गुपचुप दवा परीक्षण से होने वाली मौतों पर काफी हो हल्ला मच चुका है। फिर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अचानक किसी विदेशी मीडिया के माध्यम से यह प्रचार करना कि भारत में ऐसे परीक्षण महंगा सौदा है, कुछ और संकेत कर रहे हैं। कुछ ही दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने क्लीनिकल परीक्षणों के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि ये परीक्षण देश की जनता के हित में होने चाहिए और सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये इसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
जीवन बचाने जैसे सकारात्मक उद्देश्य के साथ दवाओं का परीक्षण तो ठीक है। लेकिन मरीज के परीजनों को अंधेरे में रख कर मरीज के साथ जानलेवा परीक्षण निश्चित रूप से न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता हैं। अमूमन यह देखा गया है कि दवाओं का परीक्षण मानसीक रूप से कमजोर लोगों पर किया गया। कई बार मानसिक रूप से ठीक लोगों पर भी परीक्षण हुआ, लेकिन उनके परीजनों को इसकी जानकारी नहीं दी गई। इस क्रम ढेरों प्रयोग असफल हुए और ढेरों मौतें भी हुई। ताजी रिपोर्ट तो कहती है कि दवा परीक्षण के दुष्प्रभााव के कारण करीब 12 हजार लोग पीड़ित है। कुछ इतने दर्द में हैं कि वे मौत की दुआएं मांग रहे हैं। सरकारें बगले झांक रही है। मरे हुए लोगों को कोई ढंग के मुआवजे के लिए कहीं कोई बुलंद आवाज नहीं है। शायद सरकार ठीकठाक मुआवजा दिला दे तो मरने वाले के गरीब परिवार के दर्द पर मरहम लग सके। ऐसे पीड़ित परिवारों की इतनी हैसियत नहीं होती है कि वे दवा कंपनियों को कोर्ट में घसीट सकें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (ंडब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2010 में भारत में क्लिनिकल ट्रायल का कारोबार करीब एक अरब डालर का हो गया है। किंतु मरीजों मरीजों को मौत के मुआवजे के नाम पर केवल खानपूर्ति की जाती रही है। ऐसे मौत में पोस्टमार्टम भी होता है तो उसकी रिपोर्ट ऐसे बनाई जाती है, जिससे दवाओं के प्रयोग की काली हकीकत नहीं होती है। अमूमन दवाओं का प्रयोग गरीब मरीजों पर होते हैं। प्रयोग सफल हो जाए तो मौत उन्हें ताड़पाकर गले लगाती है। यदि दवा का प्रयोग सफल हो जाए तो वही दवा गरीबों को सुलभ नहीं होती है। आंध्र प्रदेश और गुजरात में सन् 2009-10 के दौरान दवा परीक्षणके मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 162 नई दवाओं के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाया दिया है। लेकिन केवल प्रतिबंध लगा देने भर से किसी पीड़ित गरीब को कोई न्याय नहीं मिल जाता है। मौत देने वाले ऐसे परीक्षणों में जिम्मेदारी किसकी सुनिश्चित की गई। किसी को कोर्ट ने दंड दिया तो ऐसी खबर नहीं आती।
कोई विदेशी मीडिया भले ही भारत में दवा परीक्षण के महंगे होने का यह दवा करें, लेकिन अब तक के परीक्षण के आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि भारत बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के लिए पिछले कुछ बरसों से दवाओं के परीक्षण का हब बन चुका है। गरीब मरीज इनके प्रयोग के सबसे सस्ते शिकार हैं। परीक्षण के बारे में उनको कोई जानकारी भी नहीं दी जाती, न ही कोई नियम-कायदे अपनाए जाते हैं।
दवा के परीक्षण के खिलाफ सक्रिय संगठनों का दावा है कि देश में ऐसे मौतों का सही अांकड़ा नहीं है। सन् 2010-2012 के मध्य ड्रग कंट्रोलर जनरल ने 1,065 लोगों पर दवा परीक्षण की अनुमति दी। लिहाजा, अनुमति लेकर दवाओं के परीक्षण के दौरान जो मौतें हुई उसके ही अांकड़े सामने आते हैं। जबकि एक दवा के प्रयोग की अनुमति लेकर कंपनियां कई दवाओं का प्रयोग करती हैं। इनमें से कई कंपनियां भारतीय कंपनियों को अपना एजेंसी बनाती है वे खुद चीन, मेलेशिया, सिंगापुर आदि देशों से उनके माध्यम से अपना प्रयोग करवाती हैं, जिससे कि विपरीक्ष स्थिति में वह भारत के कानूनी पचड़े से दूर रहे।
शनिवार, नवंबर 16, 2013
छत्तीसगढ़ की सियासत में वोट कटवा गैंग
संजय स्वदेश
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव घोषणा से पूर्व प्रदेश में तीसरे मोर्चे की जोरशोर से कुलबुलाहट थी। कहा जा रहा था कि तीसरा मोर्चा प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस का गणित बिगाड़ेगी। लेकिन मजेदार बात यह है कि दो दिन बाद दूसरे चरण का मतदान होना है और तीसरा मोर्चा का कही कोई बजूद ही नजर नहीं आ रहा है। एक दो विधानसभा क्षेत्र छोड़ दे तो न कही पोस्टर दिखा और कहीं कोई रैली। हालात देख कर तो ऐसे ही लग रहा है जैसे हर क्षेत्र में यह कत्थित तीसरे मोर्चे से जुड़े लोग वोट काटवा बन गए हैं। उनके मैदान में होने से दूसरे किसी एक उम्मीदवार को जीत का गणित सुलझता दिख रहा है। अभिभाजित मध्यप्रदेश के विधानसभा में कभी छत्तीसगढ़ क्षेत्र से 15 विधायक भेजने वाले विधायक में अजीत तरक ही शून्यता दिख रही है। चुनाव आयोग के आंकड़े देखें तो छत्तीसगढ़ में दर्जनभर से ज्यादा क्षेत्रीय दल हैं। इसके बाद भी यहां की राजनीतिक में कोई तीसरा दल मजबूती से नहीं उभरा। चुनाव घोषणा से पहले प्रमुख क्षेत्रीय दलों में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच से तीसरे विकल्प की जोरशोर से चर्चा थी। आज जब सबको सामने आना चाहिए था तो वे अंधेरे में, परदे के पीछे हैं।
आपातकाल के दौरान छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का गठन श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी ने किया था। नियोगी खुद कभी चुनाव नहीं लड़े लेकिन प्रत्याशी खड़े करते रहे। मोर्चे ने पहली जीत 1985 में दर्ज की जब उसके टिकट पर जनकलाल ठाकुर विधायक निर्वाचित हुए। ठाकुर 1993 में भी जीते। नियोगी की हत्या के बाद मोर्चे की कमान उनकी पत्नी आशा नियोगी ने थामी। लेकिन छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद मोर्चा अपनी मौजूदगी नहीं दिखा सका। फिलहाल नियोगी की बेटी मुक्तिगुहा नियोगी नगर पंचायत की अध्यक्ष है। लेकिन वह भी कांग्रेस की राजनीतिक करती है। नियोगी के राजनीतिक संघर्ष की विरासत की लौ बुझती दिख रही है।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भाजपा के एक बागी हीरासिंह मरकाम ने बनाई थी। मरकाम ने 1993 में चुनाव लड़ा और हार गए। वह 1998 में चुनाव जीत गए। लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ बनने के बाद वर्ष 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में वह हार गए। पार्टी का मत प्रतिशत भी घटता गया। दोनों ही चुनावों में पार्टी ने प्रत्याशी उतारे लेकिन उसका खाता नहीं खुला। इस बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी इसलिए चर्चा में आई क्योंकि उसके टिकट पर सक्ती सीट से सक्ती राजघराने के सुरें्रद बहादुर सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने उनका टिकट का दावा खारिज कर दिया जिससे नाराज हो कर सिंह गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में शामिल हो गए और उसके टिकट पर सक्ती सीट से खड़े हो गए।
छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच बिल्कुल नया क्षेत्रीय दल है जिसका गठन भी भाजपा के ही एक बागी ने किया। भाजपा से दो बार विधायक और 4 बार सांसद रहे ताराचंद साहू ने 2008 में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच का गठन किया। वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में साहू ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस दोनों को कड़ी टक्कर दी थी। इस बार भी उन्होंने करीब 45 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए हैं। लेकिन एक दो विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ दे तो कहीं भी यह दल मैदान जंग में कड़ी टक्कर देता नहीं दिख रहा है।
मंगलवार, नवंबर 12, 2013
चेहरा विहीन कांग्रेस,दल विहिन बीजेपी
संजय स्वदेश
प्रसिद्ध यूरोपिय लेखक रूडयार्ड किपलिंग की एक कहावत है- भेड़िये को ताकत मिलती है भेड़िया से और भेड़िया को ताकत मिलती है भेड़िये से। भेडिया नेता है भेडिये समूह। जब एक भेडिया भेडियों के आगे नेतृत्व करता हुआ आगे आगे चलता है तो उसका मन इस आत्मविश्वास से लबरेज रहता है कि उसके पीछे उसका पूरा समूह खड़ा है। वहीं समूह में चल रहे भेड़ियों को इस बात का गुमान रहता है कि उसका नेता आगे-आगे चल रहा है। लिहाजा, भेड़ ओर भेड़िये दोनों एक दूसरे के ताकत बने रहते हैं। छत्तीसगढ़ के सियासी समर में इस बार रूडयार्ड की कहावत याद आ गई।
छत्तीसगढ़ की फिजाओं में इस बार सियासी नजारा विहंगम है। विधानसभा चुनाव परिणाम का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह तो बाद की बात है लेकिन आरोप प्रत्यारोप की सियासत में कांग्रेस को छलिया बताने वाली भाजपा भी सहमी है, तो प्रदेश सरकार को धोखेबाज कह कर भाजपा को घेरने वाली कांग्रेस प्रदेश स्तर पर मजबूत नेतृत्व के अभाव में अंदर ही अंदर डरी हुई है। कहने के लिए तो कांग्रेस की ओर से प्रदेश अध्यक्ष और केंद्रीय कृषि मंत्री डा. चरणदास महंत कांग्रेस का चेहरा हैं। पर सच तो यही है कि खुद को एक शातिर राजनीतिज्ञ समझने वाले महंत प्रदेश स्तर की जनता को पूरी तरह स्वीकार्य नहीं है।
कांग्रेस की इस स्थिति से उलट भाजपा की हालत है। रमन सिंह का चेहरा सर्व स्वीकार है। जनता में लोकप्रिय है। जनता फिर से इन्हें सीएम के रूप में देखना चाहती है। लेकिन चुनावी समर में इनके कई उम्मीदवार ऐसे हैं जो जनता को शायद ही हजम हो। लिहाजा वोट देने वाली जनता के सामने दो विकल्प बनते हैं। या तो वह चेहरा देख कर पार्टी के नाम पर इवीएम का बटन दवाएं या फिर उम्मीदवार देख कर। भाजपा की ओर से डा. रमन सिंह को सौम्य चेहरा प्रदेश स्तर की जनता में मन में सहज स्वीकार्य है। लेकिन इस बार चुनावी मैदान में भाजपा के कई ऐसे उम्मीदवार हैं जो जनता को स्वीकार्य नहीं है। लिहाजा, वे खुद अपने दम पर जीत के लिए जनता से मनुहार करने के बजाय डा. रमन सिंह को फिर से सीएम बनाने के नाम पर मतदाताओं के जज्जबात को उभरने की कोशिश में है।
चुनाव से पूर्व गुटबाजी में बिखरी कांग्रेस की एकता फिलहाल संतुलित दिख रही है। अजीत जोगी को कांग्रेस आलाकमान से इस चुनाव के लिए मना कर गुटबाजी पर लगाम दे दी। लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वह कांग्रेस के पक्ष में लहर बनाने में सफलता पाते नहीं दिख रहे हैं। यह खराब स्वास्थ्य का ही नतीजा है कि पिछले चुनाव की तुलना में इस बार जोगी की सभाएं कम हुई हैं। लिहाजा, कांग्रेस के पास चुनाव जीतने के लिए कुछ खास मुद्दों (विशेष कर बस्तर का जीरम कांड) पर जनता की सहानुभूति की लहर चलने का विकल्प बचता है। पर चुनावी मौसम में सियासी लहर को चलाने की वह कुशलता भी कांग्रेस में दिख नहीं रही है।
भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा अपनों से मुकाबला
दो चुनावों से अपना परचम लहराती आई भाजपा के लिए इस बार समस्या प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेस की ओर से कम, खुद अपने ही असंतुष्टों की ओर से ज्यादा पैदा हो रही है। पार्टी हालांकि विकास के दम पर अपनी नैया पार होने की उम्मीद बांधे हुए है ,लेकिन असंतुष्ट स्वर उसे अहसास करा रहे हैं कि उसकी राह आसान नहीं होगी। फिलहाल भाजपा राज्य में बीते 10 साल के दौरान अपने शासनकाल में हुए विकास को गिनाते हुए ओर केंद्र के कुशासन को बताते हुए जनता से वोट मांग रही है। जगह जगह की जनसभाओं में भाजपा के दिग्गज जनता को बता रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में धान की खरीदी पूरे देश में एक मिसाल है। यहां की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरे देश में सराहा जाता है जिसमें महिलाओं को परिवार का मुखिया बना कर उनका सशक्तिकरण किया गया है। पहले इस राज्य को पलायन वाले राज्य के तौर पर जाना जाता था लेकिन राज्य सरकार ने यहां रोजगार के अवसर सृजित कर इसकी तस्वीर बदल दी है।
बागी करुणा का कितना असर
हाल ही में भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद करुणा शुक्ला ने मुख्यमंत्री रमण सिंह के खिलाफ राजनंदगांव सीट से खड़ी कांग्रेस की उम्मीदवार अलका मुदलियार के पक्ष में चुनाव प्रचार कर अपनी नाराजगी खुल कर जाहिर कर दी। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला ने अपनी उपेक्षा से नाराज हो कर इसी साल चुनावों से पहले पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया है।
करूणा ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरें्रद मोदी और रमन सिंह दोनों को निशाने पर लेते हुए कथित तौर पर कहा कि गोधरा के बाद राज्य में हुए दंगों के दाग मोदी के दामन से और जीरम घाटी में हुए नक्सली हमले के दाग रमन सिंह के दामन से कभी नहीं धुल सकते। टिकट न मिलने से नाराज दो विधायकों ने तो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। इस पर प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक पैकरा ने पूर्व विधायक गणेशराम भगत और राजाराम तोड़ेम सहित कुछ बागियों को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से 6 साल के लिए निलंबित कर दिया। लेकिन करुणा के इस बगावती तेवर से भाजपा पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके नाम पर जनता की भीड़ उमड़ती हो ऐसा कोई करिश्माई व्यक्तित्व उनमें नहीं है। हालांकि करुणा की बगावत को भुनाने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष चरण दास महंत ने उन्हें कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का आॅफर दिया था। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। प्रदेश के कई दिग्गज भाजपाइयों ने तो यहां तक कह दिया कि करुणा शुक्ला के जाने से भाजपा पर केवल एक वोट का अंतर पड़ेगा। करुणा को इस तरह भाव नहीं देने से यह साफ होता है कि राजानीतिक में करुणा शुक्ला का वजूद उनके मामा पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेयी के कारण था।
क्यों शांत हैं जोगी कुनबा
कांग्रेस की दिखने वाली एकता के पीछे की कहानी बहुत कम लोग समझ पा रहे होंगे। कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश स्तर पर सबसे बड़े सिरदर्द अजीत जोगी को मना कर बड़ी सफलता पा ली। अंदरखाने के जानकार कहते हैं कि जोगी को राज्य सभा में भेजने का आवश्वासन मिला तो बेटे अमित जोगी ओर पत्नी रेणु जोगी को विधायकी का टिकट के सौदे पर जोगी मान गए। बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में बड़े और छोटे जोगी ने चुनावी मैदान में हुकार भरी थी। लेकिन इस बार अमित जोगी खुद समर में होने के कारण पूरा ध्यान उन्हें भारी मतों से जिताने पर लगा है। स्वास्थ्य कारणों से इस बार अतीज जोगी की सभाएं पिछली चुनाव की तुलना में बहुत कम हुई हैं।
छग में कांग्रेस सत्ता का इतिहास
छत्तीसगढ़ के वर्ष 2000 में अस्तित्व में आने के बाद से अब तक कांग्रेस की सरकार केवल एक बार ही रही है और पिछले दो विधानसभा चुनावों में सत्ता भाजपा को मिली। राज्य में वर्ष 2008 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 50 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस को यहां 38 और बहुजन समाज पार्टी को दो सीटें मिली थीं।
मंगलवार, नवंबर 05, 2013
बंगलादेश का बीटी बैगन
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संदर्भ : भारत में नामंजूरी के बाद पड़ोसी देश में बीटी के व्यावसायिक उपयोग की मंजूरी का भारत में असर
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भारत में बीटी के प्रभावों का इतिहास काला है। वर्ष 1996 में बीटी का जीएम बीज भारत आया। उस समय मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसकी उगाई की गई। मप्र में इसकी उगाई अहितकर और नुकासनदेह साबित हुआ। महाराष्ट्र में इसकी उगाई 30 हजार हेक्टेयर में की गई। तब फसल बर्बाद होने से 200 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की थी और करोड़ों का नुकसान हुआ था। ************************संजय स्वदेश कुछ वर्ष पूर्व बीटी बैंगन को लेकर देश में हो हल्ला मचा था। देशभर में जनसुनवाई हुई थी। भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने इसके मंजूरी के मंसूबों से मुंह फेर लिया, वही बीटी बैगन अब पड़ोसी देश बंगलादेश के रास्ते भारत में प्रवेश करेगा। बंगलादेश सरकार ने इसे अपने देश में व्यावसायिक खेती के लिए मंजूरी दे दी है। अब बंगलादेश में धड़ल्ले से बीटी बैंगन की खेती होगी। लिहाजा, वहां का बैंगन लुढ़क कर बिना किसी विरोध के भारत भी पहुंचेगा। फिलहाल इस ओर गंभीरता से किसी का ध्यान भी नहीं है। बंगलादेश में बीटी बैंगन की खेती से भारत के लिए खतरे की बात यह है कि दोनों देशों की सीमाएं सांझा है। यदि खेती बांगलादेश के सीमावर्ती खेतों में होगी तो प्रदूषण भारत में भी आएगा। इतना ही नहीं बांग्लादेश से भारत में फल, सब्जियों का काफी आयात किया जाता है। लिहाजा, इस रास्ते भारत की थाली में बीटी बैंगन के लुढ़ने की पूरी संभावना बनती है। इस स्वाभाविक हालात को देखते हुए ही इस बात से इनकार नहीं की जा सकती है कि बीटी बीज के उत्पादक कंपनियों ने भारत में सीधे प्रवेश में असफलता के बाद पड़ोसी देश के रास्ते यहां प्रवेश करने की योजना बनाई होगी। बड़े पैमाने पर धन कमाने की लालसा रखने वाली बीटी बीज उत्पादक कंपनियां अपने छोटे देश के रास्ते भारत में घुसने की कवायद में है। यदि बंगलादेश में बीटी बैंगन की खेती हो रही है तो इसके भारत में प्रवेश में देरी नहीं होगी। फिलहाल बंगलादेश में इसकी व्यावसायिक खेती की हरी झंडी मिलने के बाद भारत में होने वाले प्रभावों को लेकर मीडिया में मौन की स्थिति है। हालांकि इंटरनेट पर दिखी एक समाचार के मुताबिक इस पर विरोध जताते हुए ‘कोलीजन फॉर ए जीएम फ्री इंडिया’ संगठन ने केंद्रीय पर्यावरण एवं वन राज्य मंत्री जयंती नटराजन को पत्र लिखकर कहा है किवो बांग्लादेश की सरकार से बीटी बैंगन की व्यावसायिक खेती की मंजूरी के फैसले पर तुरंत रोक लगाने की मांग करे। बीटी बैंगन के बीज उत्पादक कंपनी मांसेंटो और महिको भारत में कड़े विरोध के बाद मुंह को को खा चुकी है। जब भारत में दाल नहीं गली तो इन कंपनियों ने अपनी लॉबिंग फिलीपींस जैसे देश में किया। वहां भी इन कंपनियों के मंसूबे पर पानी फिर गया। आर्थिक रूप से कमजोर देश बंगलादेश को इस कंपनी ने अपने झांसे में ले लिया। ढाका में महज दो दिन में ही व्यावसायिक खेती मंजूरी मिल गई। बांगलादेश के सीमावर्ती इलाकों के किसाने अपने बीजों का आदान प्रदान भारतीय किसानों से करते हैं। इस रास्ते भारत में मांसेंटो और महिको के मंसूबे थोड़ा या कम जरूर पूरे होते दिख रहे हैं। भारत में बीटी के प्रभावों का इतिहास काला है। वर्ष 1996 में बीटी का जीएम बीज भारत आया। उस समय मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में इसकी उगाई की गई। मप्र में इसकी उगाई अहितकर और नुकासनदेह साबित हुआ। महाराष्ट्र में इसकी उगाई 30 हजार हेक्टेयर में की गई। तब फसल बर्बाद होने से 200 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की थी और करोड़ों का नुकसान हुआ था। भारत के बीटी विरोधियों का तर्क है कि बैसिलस थुरियनजीनिसस (बीटी) नामक एक मृदा जीवाणु से प्राप्त किया जाता है। बीटी बैंगन और बीटी कपास (कॉटन) दोनों में इस विधि का प्रयोग होता है। आनुवांशिक संशोधित फसल (जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें) यानी ऐसी फसलें जिनके गुणसूत्र में कुछ मामूली से परिवर्तन कर के उनके आकार-प्रकार और गुणवत्ता में मनवांछित स्वरूप प्राप्त किया जा सकता है। वैज्ञानिकों को अब यह ज्ञात है कि प्राकृतिक तौर पर विभिन्न जीन्स को अलग-अलग कार्य बंटे हैं, जैसे, कुछ जीन्स प्रोटीन निर्माण करते हैं तो कुछ रासायनिक प्रक्रिया की देख-रेख करते हैं। मानव शरीर में भी यही प्रक्रिया चलती है। बीटी बैक्टीरिया में एक जीन होता है जो कुछ खास किस्म के लार्वा के विरुद्ध कार्य करता है। यह लार्वा कपास या बैंगन की फसल के लिए हानिकारक होते हैं। लार्वा विरोधी इस कोशिका को कपास या बैंगन के पौधे के डीएनए में कृत्रिम रूप से निषेचित किया जाता है। इस कोशिका के जीन्स में कीटनाशक कोड निहित होता है। कीटाणु जब इस जीन्स से बनी फसलों को खाना शुरू करते हैं, तो वे शीघ्र ही मर जाते हैं। इन जीन्स से निर्मित पौधों पर कीटनाशक मारने वाले छिड़काव का भी विपरीत प्रभाव नहीं होता है। भारत में इससे पूर्व जीएम राइस जैसी फसलों पर प्रयोग हो चुके हैं जिसमें प्रोटीन की अधिक मात्र मौजूद रहती है। इससे पूर्व देश में फसलों के हाइब्रिडाइजेशन भारतीय परिवेश के लिहाज से सही साबित नहीं हुए थे। जिस कारण महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कई अन्य हिस्सों में फसलों को नुकसान पहुंचा था। 2002 में देश में 55 हजार किसानों ने देश के चार मध्य और दक्षिणी राज्यों में कपास फसल उगाई थी। फसल रोपने के चार माह बाद कपास के ऊपर उगने वाली रुई ने बढ़Þना बंद कर दिया था। इसके बाद पत्तियां गिरने लगीं। अकेले आंध्र प्रदेश में ही कपास की 79 प्रतिशत फसल को नुकसान पहुंचा था। महाराष्टÑ के विदर्भ में तो किसानों ने अधिक उत्पादक के लालच में भारी ब्याज पर ज्यादा कर्ज लेकर खेती की थी। लेकिन जब फसल ने धोखा दे दिया तो कर्ज के तनाव में आत्महत्या करने लगे। विदर्भ में एक के बाद एक किसान आत्महत्या की खबरों ने भारत को अंतरराष्टÑीय स्तर पर सुर्खियों में ला दिया था। जिस समय तब में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश जहां जहां बीटी बैंगन के भारत में व्यावसायिक प्रयोग की मंजूरी से पूर्व जनसुनवाई कर रहे थे, वहां-वहां विरोध में प्रदर्शन हो रहे थे। कई किसानों ने देसी बीजों से बड़े आकार प्रकार के बैंगनों का अपने खेतों से तोड़ कर लाया और उन्हें बताया कि हमारे देशी बीजों में वह क्षमता है, जिसे किसान अपनी मेहनत से प्रयोगशाला से निकले बीटी बीजों को मात दे खकते हैं। बस किसानों को बेहतर संरक्षण और प्रोत्साहन की दरकार है। ऐसा भी नहीं है कि भारत में बीटी किश्म के बीजों के समर्थक नहीं है। कई वैज्ञानिक बीटी की पैरोकारी भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो अभी तक इसका कोई पुख्ता प्रमाण मौजूद नहीं है कि जीएम फसलों से सेहत को सीधे तौर पर कोई नुकसान पहुंचता हो। हालांकि, यह नुकसान नहीं पहुंचाएगा इस बात की कोई गारंटी भी नहीं है। जीएम फसलों से अनजाने में एलर्जी, एंटीबायटिक विरोध, पोषण की कमी और विषाक्तता (टॉक्सिंस) हो सकती है। इसके बावजूद बीटी समर्थकों का कहना है कि हरेक भूखे पेट तक भोजन पहुंचाने के लिए हमें अपनी पारंपरिक भोजन शैली को ही आधार बनाना होगा। मांसेंटो और महिको भारत ने भारत में केवल बैंगन और कपास की आड़ में ही अपना बाजार नहीं देख रही हैं। ये कंपनियां करीब चार दर्जन खद्यान फसलों के आड़ में अपना करोबार समृद्ध कराना चाहती है। बताया जा रहा है कि गेहूं, बासमती चावल, सेब, केला, पपीता, प्याज, तरबूज, मिर्च, कॉफी और सोयाबीन आदि कुल 41 खद्यान्न फसलों में ये कंपनियां अपना शोध कर रही हैं। ये सभी खद्यान्न फसलों को देश के विभिन्न हिस्सों में भारतीय किसान अपनी मेहनत से भारी मात्रा में उगाते हैं। निश्चित रूप से माहिको और मांसेंटो को भारत केवल बैंगन और कपास के रूप में अपना बाजार नहीं दिख रहा है, उनकी नजर देश के दर्जनों खद्यान्न उत्पादन बीजों पर है। यदि ये एक बार किसी न किसी तरह से देश में घुस गई तो धीरे-धीरे अन्य खद्यान्न उत्पादनों पर अपना एक छत्र राज्य कर लेगी। उसका पर्यावरण पर असर नाकारात्मक पड़े या उसके सेवन करने वाले के शरीर में बीमारी हो, यह सब मुनाफा कमाने वाली कंपनियां भला कहां सोचती हैÞ।
शनिवार, अक्टूबर 26, 2013
जाति पूछो जनता की
संदर्भ : जाति जनगणना का क्या हुआ
जाति जनगणना का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि देश में पिछली बार सन 1931 में अंग्रेजों ने जातियों की गिनती करवाई थी। 21वीं सदी में एक दशक निकल जाने के बाद केंद्र सरकार ने इसके लिए मन बनाया। 21 दिन में पूरी होने वाली 2011 की आम जनगणना के लिए जो राशि खर्च हुई, उस पर प्रति व्यक्ति औसतन 18 रुपये का खर्च आया। वहीं जाति जनगणना में प्रति व्यक्ति औसतन करीब 30 रुपये के हिसाब से बजट रखा गया। लेकिन इनती भारी-भरकम राशि खर्च होने के बाद भी जाति जनगणना का अतापता नहीं है।संजय स्वदेश करीब एक बरस पहले की बात है। घर पर दो लोग टेबलेट के साथ लैस हो कर आए। जाति गनगणना की जानकारी ली। एक पर्ची दिया और चले गए। आज सहज की वह बात याद आई तो अपने कई मित्रों से यह पूछा कि क्या उनकी भी जाति पूछने वाले कोई आए थे। उन्होंने बताया कि आज तक उनके पास ऐसे सवाल लेकर कोई नहीं आया। जबकि सरकार की एक इकाई वर्ष 2011 से अब तक देश में जाति जनगणना में लगी है। देश की सियासत में मचे काफी बवाल के बाद करीब ढाई बरस पहले जून, 2011 में सामाजिक, आर्थिक व जाति जनगणना की शुरुआत हुई। सरकार ने बताया कि सामाजिक, आर्थिक व जाति जनगणना 2011 में सितंबर तक पूरा कर लिया जाएगा। क्या आपको कभी आपके जेहन में यह सहज ख्याल आया कि इस जनगणना का क्या हुआ। सरकार ने जाति जनगणना के परियोजना के लिए 3543.29 करोड़ रुपये का भारी भरकम बजट तय किया था। देश में हर दस साल पर होने वाली जनगणना 21 दिन में पूरी होती है। 2011 में जो आम जनगणना हुई थी उसके मुकाबले जाति जनगणना के लिए 1345 करोड़ रुपये की अधिक राशि का प्रावधान किया गया। इस जनगणना को पूरी करने के लिए हाईटेक तकनीक अपनाने की भी बात कही गई थी। करीब ढ़ाई महीने पहले एक आरटीआई से यह जानकारी मिली थी कि इस परियोजना में महज 293 करोड़ रुपये ही शेष बचे थे। शायद इन ढ़ाई महीनों में यह राशि और भी अल्प हो चुकी होगी। भारी भरकम बजट के इस गणित को और सरलता से समझिए। 2011 की आम जनगणना के लिए जो राशि खर्च हुई, उस पर प्रति व्यक्ति औसतन 18 रुपये का खर्च आया। वहीं जाति जनगणना में प्रति व्यक्ति औसतन करीब 30 रुपये के हिसाब से बजट रखा गया। लेकिन इनती भारी-भरकम राशि खर्च होने के बाद भी जाति जनगणना का क्या हाल है, इसकी चिंता किसी को नहीं है। सियासी गलियारे में उन लोगों को भी ध्यान नहीं है जिन्होंने जाति जनगणना के पुराजोर पैरोकार थे। इस जनगणना के खिलाफ गला फाड़ कर विरोध करने वालों भी अब चुप है। कम से कम विरोधी तो यह सवाल खड़े कर ही सकते हैं कि इनती बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी जाति जनगणना की हालत क्या है। सरकार चाहती तो 2011 के ही आम जनगणना में महज एक जाति का कॉलम जोड़ कर देश में जातिवार जनसंख्या का आंकड़ा जान सकती थी। लेकिन अफसरशाही ने नियम कायदों का धौंस दिखा कर गोपनियता की दुहाई देकर अपनी मनमर्जी चला ली। लिहाजा, नई परियोजना बनी। भारी भरकम बजट रखा गया और परिणाम क्या आया आज तक कोई खबर नहीं। जाति जनगणना का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि देश में पिछली बार सन 1931 में अंग्रेजों ने जातियों की गिनती करवाई थी। अंगरेज तो चले गए, लेकिन उसके बाद आजाद भारत की सरकार ने कभी जाति जनगणना की सुध नहीं ली। जबकि देश के संतुलित समाजिक व जातिगत विकास के लिए यह जनगणना बेहतर जरूरत थी। जाति व्यवस्था पर संचालित हजारों वर्षों के सामाजिक व्यवस्था को आजाद भारत में इसे समाज की आवश्यक बुराई कर कर हासिये पर रख दिया गया। लेकिन दशकों बाद जब हाशिये के जाति के लोग पढ़ लिख कर सचेत हुए तो इक्कीसवी सदी की सरकार जाति जनगणना की सुध लेती है। पर इसके लिए अपनाये जााने वाले इस युग की हाईटेक तकनीक में यह जाति जनगणना पूरी तरह से दम तोड़ती दिख रही है। इसमें कोई शक नहीं कि देश में जाति की राजनीति होती है। हर चुनाव में उम्मीदवारों के चयन के वक्त जातिय समीकरण का विशेष ध्यान रखा जाता है। भारी भरकम बजट उपलब्ध करा कर सरकार भले ही देश की जातिगत जनगणना में फेल होती दिख रही हो, लेकिन राजनीतिक दल हमेशा इसमें अव्वल रहे हैं। हर राजनीतिक दल चुनाव से पहले संबंधित क्षेत्र के जातिय मतदाओं की संख्या के आधार पर अपना राजनीतिक गणित समझ-बुझ लेते हैं। आम कार्यकर्ता मतदाता सूची और पंचायत स्तर पर मिले कमोबेश आंकड़ों से अपना सटीक हिसाब निकाल कर आला कमान को सौंपते हैं। और उसी पर राजनीतिक चलती है। जनगणना विभाग से जुड़े जानकार बताते हैं कि हाईटेक तकनीक से होने वाली जाति जनगणना में करीब छह करोड़ टेबलेट का उपयोग होने वाला था। सरकार ने कितना टेबलेट खरीदा वही जाने। *******************
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