महाभारत काल में कान्हा रस्सी से बांधे गए हैं। बच्चों को घरों में बांध कर रखने, उन्हें मारने-पीटने की घटनाएं आज भी जारी है। एकल परिवारों में बच्चों की स्वछंदता समाप्त हो चुकी है। उनसे हर क्षेत्र में अव्वल होने अपेक्षा बढ़ गई है। थोड़ी-थोड़ी बात पर मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना घर-घर की बात हो चुकी है।संजय स्वदेश शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के बाद यहे बेहद जरूरी है कि बच्चों को हिंसा से संरक्षण का भी मौलिक अधिकार मिले। इसके अभाव में भोले मन वाला बचपन घर और स्कूल में मानसिक व शारीरिक रूप से पीड़ित है। देश दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों पर नियंत्रण के लिए हिंसा का उपयोग नहीं किया गया है। भारत के पौराणिक कथाओं में तो इसके उदाहरण है। भगवान श्रीकृष्ण अपनी नटखट कारनामों से माता यशोदा को इतना तंग करते हैं कि मां कभी कान्हा को रस्सियों से बांध देती हैं, तो कभी ओखली में बांध कर अनुशासित करने का प्रयास करती है। बच्चों को घरों में बांध कर रखने, उन्हें मारने-पीटने की घटनाएं आज भी जारी है। पर चंचल बाल मन की शरारत भला कहां छुटती है। बच्चों की सहज पृवृत्तियां जब माता-पिता या शिक्षक के लिए भारी लगने लगती है तो उनका धैर्य टूट जाता है। वे बच्चों की बाल मनोवृत्ति समझने के इतर उस पर नियंत्रण के लिए हिंसा का रुख अख्तियार कर लेते हैं। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ, एकल परिवार बढ़े। बच्चे एकल परिवार में ही सीमित रहने लगे। उनकी स्वछंदता समाप्त हो गई है। माता-पिता की अपेक्षाओं ने सब कुछ कठोर अनुशासन में बांध दिया है। हर क्षेत्र में बच्चों से परिणाम अव्वल होने अपेक्षा बढ़ गई है। अपेक्षाओं के विपरित होने पर बच्चों के साथ हिंसा आम हो चुकी है। मतलब घर-घर में कान्हा के कान मरोड़ जा रहे हैं। वे पीटे जा रहे हैं। आधुनिक भारत के स्कूलों में अनुशासन का पाठ मार से ही शुरू होती थी।हालांकि जागरूकता बढ़ने के बाद भी हाल के वर्षों में स्कूल में बच्चों को पिटने की घटनाएं कम हुई हैं, लेकिन इससे प्रकरण थाने तक पहुंचने लगे हैं। लिहाजा, शिक्षकों में दंड का भय बढ़ा है। पहले ये मामले थाने तक पहुंचते ही नहीं थे। बच्चों को पीटना शिक्षकों का अघोषित अधिकार था। पीटे जाने के बाद भी बच्चे माता-पिता से इसकी शिकायत नहीं करते थे। उल्टे उनके मन में इस बात का भय होता था कि कहीं शिकायत पर घर में फिर पिटाई न हो जाए। घर की चाहरदिवारी में अपनों से हिंसा के शिकार होने वाले मामले विशेष स्थितियों में ही थाने तक पहुंचते हैं। घर के अपने बच्चों को पिटते हैं तो यह अनुशासन की सीख होती है, और स्कूल में शिक्षक यही कदम उठाता है तो यह अपराध होने लगा है। पर घर हो या स्कूल, बच्चों पर कहीं भी हिंसा है तो अपराध ही। इसी हिंसा को रोकने के लिए सरकार कड़े कानूनों का नया खाका तैयार कर रही है। यह निश्चय ही सराहनीय और स्वागत योग्य कदम है। सरकार जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 की जगह नए कानून पर काम कर रही है। पुराने कानूनों के स्थान पर सरकार जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन आॅफ चिल्ड्रन) बिल 2014 पेश करने की तैयारी है। नए कानूनों को सरकार ने बच्चों के अधिकारों और अंतरराष्टÑीय कानूनों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। माता-पिता या अभिभावकों या शिक्षकों को अब बच्चों को पीटना या उनकी गलतियों के लिए कोई सजा देना या किसी तरह से प्रताड़ित करना भारी पड़ेगा। बच्चों के खिलाफ ऐसा व्यवहार करने पर आने वाले सालों में पांच साल तक के लिए जेल की सजा हो सकती है। करीब दो वर्ष पहले आई यूनिसेफ के एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के तमाम विकासशील देशों में बच्चों को अनुशासित करने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। ऐसा उनके अपने ही घरों में होता है। यह हिंसा शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक किसी भी तरह की हो सकती है। दुनिया भर में 2 से 14 साल के आयुवर्ग के हर चार में तीन बच्चों को अनुशासित करने के लिए किसी न किसी तरह की हिंसा का सहारा लिया जाता है। इसी तरह हर चार में तीन बच्चे मनोवैज्ञानिक हिंसा या आक्रामकता के शिकार होते हैं, जबकि हर चार में से दो बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने के लिए शारीरिक सजा दी जाती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दुनिया के 33 देशों के निम्न व मध्यम आय वर्ग वाले परिवारों में 2 से 14 साल की आयुवर्ग के बच्चों पर ऐसी हिंसा हुई, जिसमें उनके माता-पिता या अभिभावक शामिल थे। भारत में यही हालात है। यहां घर से लेकर स्कूल तक बच्चे हिंसा से पीड़ित हैं। भारत के शिक्षा दर्शन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले चिंतक महर्षि अरविंद अपने एक लेख में कहते हैं कि शिक्षक राष्टÑ निर्माण के वे माली हैं जो अपनी मेहनत से इसकी नींव को सींचते हैं। दुर्भाग्य देखिए, आज 21वीं सदी में न ऐसे मेहनत व धैर्य वाले शिक्षक हैं और न गुरुकुल जैसी शिक्षा परंपरा। सब कुछ बदला-बदला। अंतराष्टÑीय स्तर के स्कूल और शिक्षा पद्धति। इसके बाद भी राष्टÑीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के आंकड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में बच्चों के साथ स्कूलों में होने वाले दुर्व्यवहार, यौन शोषण, शारीरिक प्रताड़ना के मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। करीब सात साल पहले 2007 में केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय ने अपने एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया था कि स्कूल जाने वाला हर दूसरा बच्चा किसी ने किसी तरह से शारीरिक या मानसिक हिंसा का शिकार हो रहा है। करीब दो दशक पहले बच्चों को स्कूल छोड़ने का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों द्वारा पीटे जाने का भय होता था। जब स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों केआंकड़ें बढ़े तो सरकार ने मिड डे मिल के माध्यम से भीड़ बढ़ा दी। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को नई पीढ़ी आ चुकी है, उसने पुराने शिक्षकों की तरह मारपीट कर पढ़ाना छोड़ पढ़ाने से ही मुंह मोड़ लिया है। इसके बाद भी आए दिन किसी स्कूल में बच्चों के पीटे जाने की घटनाएं आ ही जाती है। ऐसी घटनाएं अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों से आती हैं। ऐसे मामलों में प्रकरण भी वहीं दर्ज हुए हैं। जब मारपीट से बच्चे की हालत ज्यादा खराब हुई और अभिभावकों ने इसकी सुध ली। निजी स्कूलों में बेहतर शिक्षा के लिए मोटी फीस देकर बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावक सचेत हैं। लिहाजा, निजी स्कूलों में काफी हद तक शारीरिक हिंसा की घटनाएं कम हुर्इं है। लेकिन सरकारी स्कूलों में हालत सरकार भरोसे ही है।
मंगलवार, अगस्त 05, 2014
स्कूल से घर तक पीटे जा रहे कान्हा
संदर्भ : जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बदलाव की पहल
मंगलवार, जुलाई 29, 2014
सजा के खौफ का सामाजिक संक्रमण
1979-80 में भगलपुर जेल में कैदियों की आंख में तेजाब डाल कर अंधा करने का आंखफोड़वा प्रकरण हुआ। जेल की चाहरदिवारी की यह कू्रर घटना मीडिया माध्यम से समाज तक पहुंची। देश में किसी महिला पर तेजाब फेंकने का पहला मामला 1982 में आया। तकनीक के युग में मीडिया मजबूत हुआ तो दूर दराज की तेजाब हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। खबरों से अपराधी अपराध के तरीके जानने लगे हैं। बदायूं कांड़ के बाद कई महिलाओं के शव हत्या के बाद पेड़ से लटकाएं गये। शायद अपराधियों में सजा के खौफ का सामाजिक संक्रमण की किसी पर तेजाब फेंकने के कू्रर कर्म से रोक सकें।बीते 25 जुलाई को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की अंबाह तहसील की एक अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया। एक साल पहले तेजाब डालकर अपनी शादीशुदा कथित प्रेमिका की हत्या करने के मामले में एक युवक को फांसी की सजा सुनाई। फांसी की सजा देते वक्त कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि इस अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा पर्याप्त नहीं है, इसलिए मृत्युदंड दिया जाता है। इससे मृतक के परिजनों के साथ-साथ समाज की आत्मा भी आहत हुई है। देश में संभवत: यह पहला मामला है, जब किसी व्यक्ति पर तेजाब फेंकने वाले अपराधी को फांसी की सजा कोर्ट ने सुनाई है। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने तेजाब के हमलों, विशेषकर ठुकराये हुये प्रेमियों द्वारा किये जा रहे ऐसे हमले की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुये कहा कि स्थिति दयनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या से निबटने के प्रति केंद्र सरकार की सुस्ती पर सवाल उठाया। यह पहला ऐसा मामला नहीं है, जिसमें कोर्ट ने सरकार की उदासीनता पर निशाना साधते हुए उसे कटघरें में खड़ा किया हो। चाहे फटकार जितनी भी पड़े, सरकार की सुस्ती उसी बेरहमी से बनी रही है, जिस बेरहमी कोई अपराधी किसी मासूम के चेहरे पर तेजाब फेंक का उसकी जिदंगी नरक बना देता है। कोर्ट ने इसी दिन तेजाब हमलों की पीड़ितों के पुनर्वास की नीति तैयार करने का भी निर्देश दिया। यह भी कोई पहला निर्देश नहीं है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 31 मार्च तक तेजाब की खरीद-बिक्री और दूसरे विषाक्त पदार्थों के दुरुपयोग की रोकथाम के लिए राज्य सरकारों को नियम बनाने का निर्देश दिया था। अक्सर कोर्ट के ऐसे आदेश-निर्देश और टिका-टिप्पणी संबंधित प्रकरणों के तारीख वाले दिन के अगले दिन अखबारों में होते हैं। फिर न इस पर कोई चर्चा करता है और न ही कोई पीड़िता की सुध लेता है। पीड़िता की हर दिन की जिंदगी असमान्य अवस्था में कटती है। जो निराश हो चुकी हैं, वे मौत का इंतजार कर रही हैं। जिन्हें अपराधियों को सजा दिलाने का हौसला है, वे आत्मविश्वास से लवरेज होकर बेरहम समाज में अपनी लड़ाई लड़ रही है। ऐसी पीड़िताओं में लक्ष्मी मिशाल है। उसे हर संवेदनशील सैल्यूट करता है। देश के हर राज्य में तेजाबी हमले कई दर्दनाक कहानियों के उदाहरण हैं। विभिन्न रिपोर्ट के अनुसार ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि हर साल देश में करीब एक हजार मासूम तेजाब हमले की शिकार हो रही हैं। लेकिन सरकारी आंकड़ों में यह महज सौ, सवा सौ की होता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो से ऐसे मामलों का स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिल पाता क्योंकि तेजाब हमले का अधिकतर मामला आईपीसी की धारा 307 (हत्या का प्रयास), धारा 320 (गम्भीर चोट पहुंचाना) और धारा 326 (घातक हथियारों से जान-बूझकर प्रहार करके चोट पहुंचाने) के तहत दर्ज किए जाते हैं। लिहाजा, तेजाब हमले के सही आंकड़ें सामने नहीं आ पाते हैं। इसे घटनाओं के खिलाफ लड़ने वाले विभिन्न स्वयंसेवी संगठन उन्हीं घटनाओं का ब्यौरा जुटा पाते हैं, जो किसी तरह मीडिया में आ जाए। देश के दूर दराज में होने वाली ऐसी घटनाएं वहीं तक रह जाती है। हालांकि आजकल मीडिया की सक्रियता के चलते ऐसे मामले राष्टÑीय स्तर की मीडियों की सुर्खियों में आने लगे हैं। लेकिन इस कू्ररता को अंजाम देने वाले अपराधियों के दिन में खौफ नहीं बैठ पा रहा है। आजाद भारत की आजादी का वर्षगांठ की 66वीं सालगिरह सामने हैं। गैर कीजिए, गुलाम भारत और आजादी भारत के अगले तीन दशक में तेजाब फेंकने की बेरहम प्रकरण सामने आने का उल्लेख नहीं मिलता है। गूगल में एशिड फैक्ट्री खोजो तो हिंदी फिल्म की कहानी मिलती है। बताया जाता है कि भारत में किसी महिला पर 1982 में भारत में तेजाब हमले का पहला मामला प्रकाश में आया था। 1979-80 में भगलपुर जेल में कैदियों की आंख में तेजाब डाल कर अंधा करने का आंखफोड़वा प्रकरण हुआ। जेल की चाहरदिवारी की यह कू्रर घटना मीडिया माध्यम से समाज तक पहुंची। संभवत समाज के कुठितज मन वाले अपराधियों ने जान लिया कि बदला लेने का यह भी एक तरीका हो सकता है। अस्सी के दशक देश का वह दौर था जब एक एक नया भारत करवट ले रहा था, धीरे-धीरे विकास की ओर अग्रसर, देश-दुनिया से कदमताल करने की बेताबी के साथ। तब स्वर्णकार तेजाब का उपयोग करते थे। मतलब तेजाब के उपभोक्ताओं का वर्ग एक ही था। धीरे-धीरे देश में वाहन चले। उसमें लगने वाली बैट्री के लिए तेजाब की खपत बढ़ी। उत्पादन भी बढ़ा। लिहाजा, विकास की गति के साथ-साथ जैसे-जैसे तेजाब सर्व सुलभ होते गया, समाज में क्रूरतम सोच रखने वाले इसे अपना हथियार बनाना शुरू किया। यह भी गौर की बात है कि जैसे-जैसे देश ने विकास किया, देश में तेजाब हमले की घटनाएं बढ़ी। तकनीक के युग में मीडिया मजबूत हुआ तो दूर दराज की तेजाब हमले की घटनाएं भी सामने आने लगी हैं। समाज का संवेदनशील तबका इन खबरों से चिंता जताने लगा है। इसके अपराधियों को कठोर सजा के लिए एकजुट स्वर भी उठने लगे हैं। लेकिन कुंठित और कू्रर मानसिकता वाला मन कहां बदल रहा है? वे खबरों से ऐसे अपराध के तरीके जानने लगे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बदायूं कांड को देंखे। दुष्कर्म के बाद हत्या कर शव को पेड़ पर लटकाने की घटना जैसे सुर्खियों में आर्इं, देश के दूसरे हिस्सों में एक के बाद इसी तरह की कई घटनाएं हुर्इं, जिसमें हत्या के बाद शव को पेड़ से लटका दिया गया। एक स्थान के अपराधी के अपराध के तरीके पढ़ कर दूसरे क्षेत्र के अपराधी उससे पे्ररित हो रहे हैं। मतलब यह बीमारी और कू्रर मानसिक का समाजिक सक्रमण है। अपराधियों में कानून की लंबी प्रक्रिया और बच कर निकलने की पूरी संभावना के कारण सजा का खौफ नहीं पल रहा है। मुरैना जिले की अंबाह तहसील कोर्ट ने घटना के एक साल के अंदर फैसला सुना कर भले ही सराहनीय कार्य किया हो, लेकिन दूसरे की जिंदगी नरक बना कर अपनी जिंदगी बचाने के लिए ये अपराधी शीर्ष कोर्ट तक न जाने कितने साल खुली हवा में मौज की सांस लेते रहेंगे और पीड़िता हर दिन नरक भोगती रहेगी। मध्यप्रदेश में 25 जुलाई को निचली अदालत ने तेजाब हमले के दोषी को फांसी की सजा सुनाई और इसके चौथे दिन 28 जुलाई को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के आरामबाग इलाके में चार लोगों ने एक कॉलेज छात्रा के उपर तेजाब का हमला कर भाग गए। शायद अपराधियों में सजा के खौफ का सामाजिक संक्रमण की किसी पर तेजाब फेंकने के कूृ्रर कर्म से रोक सकें।
मंगलवार, जुलाई 01, 2014
असाढ़ में सूखा : का बरखा जब कृषि सुखानी
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यह पहला ऐसा मौका नहीं है जब मानसून ने दगाबाजी की हो। आजाद भारत में दर्जनों बार सूखा पड़ा। लेकिन इससे न कोई सबक लिया गया और न ही इससे निपटने कोई ठोस और सार्थक तैयारी ने मूर्त रूप लिया। मौसम विभाग इस बात का आश्वासन दे रहा है कि जून में हुई बारिश की कमी की भरपाई अगस्त में हो जाएगी। लेकिन अगस्त तक ऐसी राहत रामचरितमानस की पंक्ति-का बरखा जब कृषि सुखानी को चरितार्थ करती है।
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संजय स्वदेश
असाढ़ के दिनों में झमाझम बारिश से तरबतर होते जनजीवन के दृश्यों से साहित्य संसार समृद्ध है। लेकिन व्यवहारिक धरातल पर 21वीं सदी के असाढ़ का मूड़ कुछ अलग है। बीते जून में शेयर बाजार का सूचकांक कुलांचे भरता रहा। इसी महीने के अंतिम दिनों में असम भीषण बारिश के बाद बाढ़ से कराह उठा। लगातार बारिश और बाढ़ से करीब दजर्न भर लोग अकाल काल के ग्रास बन गए। वहीं देश का पश्चिमी हिस्सा आधा असाढ़ गुजरने के बाद भी बारिश की बाट जोह रहा है। मानसून दगा दे गया। जिस आषाड़ में जब तक देश को तरबतर हो जाना चाहिए था, वहां इंद्रदेव के मेघों ने आधी मेहरबानी भी नहीं दिखाई। मानसून के शुरुआती बौछार से अन्नदाता किसान के चेहरे की रौनक बढ़ा दी थी। उम्मीद में किसानों ने खोतों की निराई, बुआई भी कर दी। लेकिन अब पश्चिमी भारत के करीब बीस लाख किसान बारिश की बाट जोहते हुए भविष्य की चिंता में डूब गए हैं। फसल तैयार होने से पहले बीज धरती के गर्भ में ही चौपट हो रही है। इधर केंद्र सरकार ने भी यह घोषणा कर दी कि देश के कुछ हिस्सों में इस बार सूखा पड़ सकता है। महंगाई की मार झेल रही जनता को सरकार ने अगाह कर दिया कि हमे सूखे को लेकर तैयार रहना चाहिए।
संयुक्त राष्टÑ नेशनल ओसियनिक एंड एटमोस्फोरिक एडमिनिस्ट्रेशन के आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष मई माह इतिहास में सबसे गर्म रहा है। धरती तपती रही। धरती और समुद्र का औसत तापमान 0.74 सेल्सियस अधिक रहा। 20वीं सदी में यह तापमान औसतन 14.8 सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था। इस भीषण गर्मी के बाद मानसून से राहत की उम्मीद थी। लेकिन जून महीने में बारिश के आंकड़ों पर नजर डाले तो पता चलता है कि जून माह में 100 मिमी से कम बारिश केवल दो साल हुई है, लेकिन वह भी इस वर्ष के आंकड़े 43.4 मिमी से अधिक ही रही। 2009 में जून माह में 85.7 मिमी और 1926 में 97.2 मिमी बारिश हुई थी। पिछली सदी में जून माह में सबसे कम बारिश 1905 में हुई थी, जो महज 88.7 मिमी रही थी। कुल मिलाकर अब तक करीब सामान्य से 45 फीसदी कम बारिश हुई है। यह पहला ऐसा मौका नहीं है जब मानसून ने दगाबाजी की हो। आजाद भारत में दर्जनों बार सूखा पड़ा। लेकिन इससे न कोई सबक लिया गया और न ही इससे निपटने कोई ठोस और सार्थक तैयारी ने मूर्त रूप लिया। बड़े-बड़े डैम बने तो उसके दरवाजे तब खुलते हैं, जब पानी की जरूरत नहीं होती है। महाराष्टÑ में हजारों एकड़ जमीन में कपास, सोयाबीन और दूसरी फसलें बो चुके किसान वर्षा के अभाव में नुकसान को लेकर डरे हुए हैं। किसानों ने मानसून की आहट से ही जून महीने की शुरुआत में बुआई के साथ ही उर्वरक और कीटनाशकों का भी खेतों में छिड़काव कर दिया था। अनेक किसानों ने यह कार्य भारी भरकम कर्ज लेकर किया है। अब उनके आंखों के सामने फसल चौपट होने के साथ कर्ज में डूबने का अंधकारमय भविष्य नजर आने लगा है। हालांकि मौसम विभाग इस बात का आश्वासन दे रहा है कि जून में हुई बारिश की कमी की भरपाई अगस्त में हो जाएगी। लेकिन अगस्त तक ऐसी राहत रामचरितमानस की पंक्ति-का बरखा जब कृषि सुखानी को चरितार्थ करती है।
सोमवार, जून 23, 2014
मानव तस्करी की मंडी में मासूम
----------------------------- हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती है। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब .आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है। --------------------संजय स्वदेश बीते दिनों केरल पुलिस के 16 अधिकारियों ने झारखंड के 123 बच्चों को केरल से जसीडीह स्टेशन पहुंचाया गया। ये बच्चे मानव तस्करी के जरिए केरल के अनाथालय में पहुंचाया गया था। पिछले वर्ष भी इसी तरह थोक में बच्चों की मानव तस्करी की एक और मामले का पर्दाफाश हुआ था। राजस्थान के भरतपुर रेलवे स्टेशन से 184 बाल मजदूरों को मुक्त करा कर पटना पहुंचाया गया। आए दिन देश के हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती हंै। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है। मां-बाप का जिगर का जो टुकड़ा दु:खों की हर छांव से बचता रहता है, वह इस गैंग में चंगुल में आने के बाद एक ऐसी दुनिया में गुम हो जाता है, जहां से न बाप का लाड़ रहता है और मां के ममता का आंचल। किसी के अंग को निकाल कर दूसरे में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है, तो किसी को देह के धंधे में झोंक दिया जाता है, तो हजारों मजदूरी की भेंट चढ़ जाते हैं। गुमशुदा होने के समान्य आंकड़ों के अनुसार देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है। मतलब देशभर में चौबीस घंटे में कुल 24 लोगों के जिगर के टुकड़ों को छिन कर जिंदगी के अंधेरे में ढकेल दिया जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं और उनमें से करीब 11,000 का ही पता लग पाता है। भारत में मानव तस्करी को लेकर यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है और देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है, जहां देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है। वर्ष 2009 से 2011 के बीच लगभग 1,77,660 बच्चे लापता हुए जिनमें से 1,22,190 बच्चों को पता चल सका, जबकि अभी भी 55 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हैं जिसमें से 64 फीसदी यानी लगभग 35,615 नाबालिग लड़कियां हैं। वहीं इस बीच करीब 1 लाख 60 हजार महिलाएं लापता हुईं जिनमें से सिर्फ 1 लाख 3 हजार महिलाओं का ही पता चल सका। वहीं लगभग 56 हजार महिलाएं अब तक लापता हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011-12 में एनजीओ की मदद से 1532 बच्चों को बचाया जा सका। वर्ष 2009-2011 के बीच लापता हुए लगभग 3,094 बच्चों का अबतक कोई सुराग नहीं लग पाया है जिनमें से 1,636 लड़कियां हैं तो वहीं इस दौरान गायब हुईं लगभग 3,786 महिलाएं भी अबतक लापता हैं। गायब बच्चों के माता-पिता के आंखों के आंसू सूख चुके हैं। पर उनकी यादें हर दिन टिस मारती है। ऐसी बात नहीं है कि इन तरह के अपराधों के रोकथाम के लिए कानून नहीं है। कानून तो है, पर इसका क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पा रहा है। यदि क्रियान्वयन भी होता है तो इसमें इतनी खामियां हैं कि मानव तस्करों के गिरोह पर मजबूती से नकेल नहीं कसा जा पता है। कई मामलों में तो देखा गया है कि ऐसे कानूनों की जानकारी थाने में तैनात पुलिसवालों को भी नहीं होती है। हालांकि गृहमंत्रालय की विभिन्न इकायों के माध्यम से करीब 225 मानव तस्कर विरोधी इकाइयां सक्रिय हैं। गृह मंत्रालय की मानव तस्करी विरोधी इकाइयों 2011 से अब तक देश भर में 4000 से अधिक बचाव अभियान चलाये और 13742 पीड़ितों को बचाया। साथ ही 7087 मानव तस्करों को गिरफ्तार कराया। जल्द ही 100 और नई ऐसी इकाइयां गठित होने वाली है। लेकिन सरकार की मानव तस्कर विरोधी गतिविधियां जिस गति से सक्रिय है, उससे कई ज्यादा तेज तस्करों का गिरोह हैं। देश और देश के बाहर दूर दराज के गरीब ग्रामीणों व आदिवासी क्षेत्र के बच्चे इसी तरह मानव तस्करी की आग में जलते जा रहे हैं। भारत ने मानव तस्करी रोकने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संधियों को मंजूरी दी है। इनमें संयुक्त राष्ट्र ट्रांसनेशनल संगठित अपराध संधि और महिलाओं और बच्चों की तस्करी से जुडी दक्षेस संधि जैसे समझौते शामिल हैं। इसके अलावा बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय समझौता है। इसके बावजूद बांग्लादेश और नेपाल से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर मानव तस्करी जोरों पर होती है। बांग्लादेश और नेपाल से सीमा पार मानव तस्करी में संगठित गिरोह शामिल हैं, लेकिन सफल जांच और मुकदमे के शायद ही ऐसे कोई मामले हों, जो अपराधियों के मन में भय पैदा करते हों। कई बार यह देखा गया है कि मानव तस्करी से निपटने के लिए सीमा रक्षक बलों, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसे आयोगों तथा राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच त्वरित समन्वय और सक्रियता की भी भारी कमी है। जब तक तस्कर पीड़ित मासूमों को अपने परिवार का सदस्य समय कर मानव तस्करों के खिलाफ कार्य करने वाली सरकारी एजेंसियां सक्रिय होकर कार्य नहीं करेंगी, देश में इस काले अमावीय धंधे का थोक बाजार फलता फूलता रहेगा।
शनिवार, दिसंबर 21, 2013
फाइलों के झुरमुटों में अटकी दलहन क्रांति
पीली क्रांति पर ग्रहण
संदर्भ : दलहन और तिहलन का घटता उत्पादन बढ़ता आयात
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खास बात : देश में हर साल 30 हजार करोड़ के खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 90 के दशक में तिलहन के मामले में देश आत्म निर्भरता के करीब था। देश में घरेलू जरूरत का 97 प्रतिशत तक उत्पादन हो रहा था। 2007-2008 से लेकर अब तक कृषि कैलेंडर का अवलोकन करे तो स्वष्ट होता है कि जहां धान, गेहूं, कपास सहित अन्य खाद्यान्नों के उत्पादन का ग्राफ बढ़ा है, वही दलहन तिलहन का उत्पादन घटा है।
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संजय स्वदेश
विकास की रफ्तार में खेती के दरकिनार होने का मुद्दा गाहे-बगाहे सतह पर आता है। मुद्दे में इतनी गर्मी नहीं होती है कि उस पर सरकार कुछ ठोस निर्णय ले। लिहाजा, अन्नादाता पर हमदर्दी के बादल तो खुब गरजते हैं। पर हकीकत में जो होता है, वह उनके लिए संतोषजनक नहीं होता है। इस तरह के ढेरों झंझावातों के बावजूद किसानों ने अपने पसीने से देश का पेट भरने लायक अनाज उगाया है।
धान और गेहूं के बाद दलहन और तिलहन जरूरी अनाजों में है। लेकिन करीब एक दशक से दहलन और तिलहन का उत्पादन पर भारी नकारात्मक असर पड़ा है। दशक भर पहले देश में दलहन और तिलहन उत्पादन को लेकर हम दंभ भरते थे। इसे पीली क्रांति की संज्ञा दिया था। लेकिन कब इस क्रांति पर ग्रहण लग गया किसी ने सुध ही नहीं ली। हालात तो यह हैं कि देश में दलहन और तिलहन का आयात बढ़ता जा रहा है। कृषि उत्पादों के आयात शुल्क में कमी
देश के किसानों के साथ के साथ मजाक से कम नहीं है। पटरी से उतरी दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए सुझाए गए उपायों पर अमल तो दूर उन्हें फाइलों के झुरमुटों में ही अटका दिया गया है। लिहाजा, हकीकत के उपाय खेतों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। संसद के शीत सत्र में ही एक संसदीय समिति ने इसको लेकर सरकार की आलोचना की है। समिति ने अपनी 46 की रिपोर्ट में दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए दिए सुझाव पर पहल करने की सिफारिश भी की है। कृषि विभाग ने तिलहन और पाम तेल पर राष्ट्रीय मिशन एनएमओ ओपी के संबंध में भी निर्णय नहीं लिया है, जो चिंता का विषय है। सोयाबीन, मुंगफली, मुंग, उड़द और अरहर की खेती के बढ़ावा देकर दलहन और तिलहन के को आकर्षित करने समर्थन मूल्य में वृद्धि कर उन्नत बीज के साथ आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध करने की जरूरत है। किंतु अफसोस समिति की सिफारिशों पर गौर नहीं किया जा रहा है। दलहन और तिलहन पर यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए गए तो आयात में और वृद्धि स्वाभाविक है।
फिलहाल देश में हर साल 30 हजार करोड़ के खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 90 के दशक में तिलहन के मामले में देश आत्म निर्भरता के करीब था। देश में घरेलू जरूरत का 97 प्रतिशत तक उत्पादन हो रहा था। किसानों को तकनीक और बीज के मामले में प्रोत्साहन नहीं मिलने से उत्पादन में गिरावट चली आई। दूसरी और आयात शुल्क में 75 प्रतिशत तक छूट दी जाने लगी, जिससे किसान पिछड़े उत्पादन गिरा और हमारी आत्म निर्भरता धराशायी हो गई है। इसके बाद भी दलहन और तिलहन के मामले अनुदार रवैया अपनाया जा रहा है। यह खतरे की घंटी है। आयात शुल्क घटाने से विदेशी विनिमय का लाभ इंडोनेशिया, मलेशिया, अमरीका और ब्राजील के किसानों को मिल रहा है। यदि दलहन-तिलहन के समर्थन मूल्य पर इजाफा किया जाता है तो आयात घटेगा और देश के किसान लाभान्वित होंगे।
राजीव गांधी के शासन काल 1985 में कमोबेश यही स्थिति बनी थी। तब संसद में बहस हुई। बहस का सार था हम पेट्रोल डीजल क्यों खरीदते हैं? तर्क आया दोनों वस्तुओं का उत्पादन देश में नहीं होता है। पर दहलन तिलहन हमारे श्रम का नतीजा है। फौरन कृषि नीति पर बदलाव किया गया। यात्र एक दो वर्ष के अंतराल में हमारी आयात निर्भरता घटने लगी। किंतु डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अनिवार्य मामले में उपेक्षा मिली। 2007-2008 से लेकर अब तक कृषि कैलेंडर का अवलोकन करे तो स्वष्ट होता है धान, गेहूं, कपास सहित अन्य खाद्यान्नों के इस उत्पादन में उतरोत्तर तरक्की कर रहे हैं। बस दलहल तिलहन पिछड़ रहा है। इस सूरत में दलहन और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए ठोस पहल किया जाना चाहिए।
आयल सीड्स टेक्नालाजी मिशन को हासिल करना आज के दौर में बेहद सरल कार्य है। इस मामले में एक और विसंगति सामने आई है। सोयाबीन के उत्पादन के लिए जेनेटिकल मोडिफाइड कृत्रिम रूप से संवर्धित यानी जीएम सोसाबीन के उत्पादन बढ़ावा दिया जा रहा है। इस प्रजाति के बीज का उत्पादन सामान्य सोयाबीन से 4 से 20 प्रतिशत कम होता है। इस बीज को बढ़ावा देने देश को क्या लाभ होगा इसका खुलासा नहीं किया गया है। आश्चर्य की बा है कि कृत्रिम रूप से संवर्धित बीजों के अन्य उत्पादों का कम विरोध कर चुके है। उसके बाद सोयाबीन को बढ़ावा देना जांच का विषय हो सकता है।
सिफारिशी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि दलहन तिलहन के उत्पादन में आवश्यकता अनुसार उत्पादन के लिए देश में 30 प्रतिशत कृषि रकबे की आवश्यकता पड़ेगी। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र की परंपरागत खेती के साथ अलसी, सोयाबीन, सरसो और तिल की फसल आसानी से उगाई जा सकता है। दलहन और तिलहन के उत्पादन रकबे में वृद्धि से धान और गेहूं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी। किंतु इससे हमारी आर्थिक व्यवस्था पर बल आने की संभावना नहीं के बराबर होगी। पाम यानी ताड़ बुनियादी तौर से मुरस्थली उपज है। इसके लिए भारत की भूमि को ज्यादा उपयुक्त नहीं माना जाता है। पाम से 10 प्रतिशत अतिरिक्त कार्बन डिस्चार्ज होता है। जो बेहद हानिकारक है। इसलिए खाद तेल के विकल्प के रूप में पाम की जगह सोयाबीन आदि को बढ़ावा देना चाहिए। रिक्त भूमि का उपयोग दलहन और लिए परंपरागत रूप में किया जाता रहा है। इस प्रचलन में लाने के लिए कठिन प्रयास के आवश्यकता ही नहीं है।
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शनिवार, दिसंबर 14, 2013
अशिक्षा, अपराध के अंधी गलियारे में मुस्लिम
------------------------------ देश और राज्यों में सरकारें बदलती रही, मुसलमानों की बेहतरी के लिए समितियां और आयोग बनते रहे। उनकी सिफारिशों पर बहस मुनासिब होती है मगर देश में मुसलमानों की हालत नहीं बदली। ------------------------------संजय स्वदेश पेड़ काट कर डाल को सींचने से वृक्ष के जीवन की आशा व्यर्थ है। देश में मुस्लिम आबादी के साथ कुछ ऐसी ही कहानी है। सियासी दांव पर लगे मुस्लिम समाज की बहुसंख्यक लोग शिक्षा और रोजगार में पिछड़ गए हैं। नाकारात्मक माहौल में पल बढ़ कर आपराधिक मामलों में भी पिस रहे हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि मुसलमानों की आबादी का जो प्रतिशत देश में है, उससे ज्यादा प्रतिशत जेल में है। कई बार शक के आधार पर पुलिस कार्रवाई और अन्याय के प्रणाली के शिकार मुसलमानों की बड़ी संख्या नाक जेल जाती है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस बात को लेकर एक सार्वजनिक बयान दिया कि इस तरह शक के आधार पर मुस्लिम समाज के बेगुनाह लोगों की गिरफ्तारी नहंी की जाए। ऐसे पीड़ितों की अन्याय के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई बुलंदी से नहीं उठती है। सिस्टम और परिस्थितियों के कारण उनके मन में द्वेष के बीज अंकुरित हो जाते हैं। सियासी गलियारों में मुसलमानों के हित की वकालत बड़ी चालाकी और लुभावनी तरिके से की जाती है। लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ कार्य हुए होते तो आज हालात यह नहीं होते। जबानी जमा खर्च का लाभ बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी तक नहीं पहुंच पाया है। सियासी लाभ के लिए इन पक्ष में दिये जाने वाले बयान सर्व धर्म समभाव की भावना का पोषण भी नहीं करते हैं। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, मुस्लिम समाज में शिक्षा, न्याय व अन्य आंकड़े हकीकत बताते हैं। यह आंकड़े ही कहते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ही मुस्लिमों की उपस्थिति का प्रतिशत अन्य पिछड़ी जातियों से कमतर है। आजादी के साथ ही मुसलमानों की बेहतरी के लिए चिंता जाहिर की गई और यह चिंता आज भी जाहिर की जा रही है, पर कौम की बड़ी आबादी हमारी सामाजिक और न्याय प्रणाली से आहत है। इसकी मूल वजह मुसलमानों के शिक्षा के प्रतिशत में कमी को कहना गलत नहीं होगा। देश में मुसलमानों के अलावा अन्य कई जातियां अल्प संख्य वर्ग शामिल हैं, जिनकी साक्षरता दर पर संतोष नहीं जताया जा सकता है किंतु उनकी माली हालत मुस्लिमों की तुलना में ज्यादा तेज गति से सुधर रही है। सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के बाद भी उन्हें थोड़ा बहुत लाभ मिल जा रहा है। मुस्लिम जमात के बच्चों की बुनियादी तालिम मदरसों से शुरू होती है। राष्टÑीय अल्पसंख्यक शिक्षा निगरानी समिति की स्थायी समिति ने मदरसों की बदहाली पर चिंता जाहिर कर चुका है। मदरसों के आधुनिकीकरण के तैयार मॉडल में शिक्षकों को बेहतर वेतन और कंप्यूटरीकरण के लिए वित्तीय वर्ष 2012-2013 में 9905 मदरसों के लिए 182.49 करोड़ की मंजूरी दी गई है। जिसे अमलीजामा पहनाना शेष है। इसलिए फिलहाल इस राहत को दूर के ढोल सुहावने से ज्यादा और कुछ नहीं कहा जा सकता है। बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, असम, पश्चिम बंगाल और पंजाब में मुसलमानों की आबादी करीब 45 प्रतिशत है। इन राज्यों के साक्षरता प्रतिशत में पश्चिम बंगाल और दिल्ली को छोड़कर अन्य राज्यों में मुसलमानों की साक्षरता प्रतिशत असंतोष कारक है। देश के 374 जिलों में से 67 जिले अल्पसंख्यक बहुल है। सन् 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के उल्लेखनीय पक्ष में मुसलमानों को कई योजना में लाभ नहीं मिलने की बात बताई थीं। स्वामीनाथन एस अंकलेसरीया की अध्यक्ष रिपोर्ट में भी मुसलमनों की तरक्की को लेकर चर्चा की गई। मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक समृद्धि को लेकर हुई बहस में मुसलमानों का मूल्यांकन कमतर किया जा रहा था किंतु सच्चर कमेटी और स्वामीनाथन रिपोर्ट के दूसरे पक्ष ने मुसलमान के विकास की गति को असंगत बताया। शिक्षा के इतर अपराधिक मामलों के आंकड़ों पर भी गौर करे तो पाएंगे कि हिंसा में मुसलमानों का दखल ज्यादा है। अपराध का वास्ता न्यायालय और पुलिस से पड़ता ही है। पुलिस कार्रवाई की ज्यादती से न्यायालयों के तथ्य में झोल-झाल स्वाभाविक है और इससे अन्याय संभव है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन संस्था राष्टÑीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एमसीआरबी) और देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार सेकुलर और कम्युनल सरकारों का रवैया मुसलमानों के प्रति एक समान रहा है। पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक वामपंथी शासन रहा है। पश्चिम बंगाल के जेलों में बंद कैदी आधे मुसलमान है। महाराष्टÑ और उत्तर प्रदेश में थोड़ी राहत मिली है। वहां हर तीसरा और चौथा कैदी मुसलमान है। जम्मू-कश्मीर, पांडुचेरी, सिक्किम के अलावा देश के अन्य जेलों में मुसलमानों की आबादी का प्रतिशत ज्यादा है। जनगणना रिपोर्ट 2001 के अनुसार मुसलमानों आबादी देश में 13.4 फीसदी थी और दिसम्बर 11 के एनसीआरबी के आंकड़े के अनुसार जेल में 21 फीसदी मुसलमान 21 फीसदी है। जेल यात्रा के चलते कई मुसलमान परिवार तबाह हो गए। आर्थिक, मानसिक और सामाजिक यातनाओं को झेलने वाले परिवारों की कहानी बड़ी मार्मिक है। किसी भी वारदात के बाद संदेह में बड़ी संख्या में मुसलमानों की गिरफ्तारी हुई। ढेरों मामले हैं जिसमें बेगुनाह मुस्लमान वर्षांे जेल में पिसते रहे। मामला झूठ साबित होने पर रिहा हुए। ऐसे हालात की स्थिति वैसे ही हैं जैसे गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है देश की अधिकतर आतंकी वारदातों में जो आरोपी पकड़े जाते हैं, वे ज्यादातर मामलो में मुस्लिम निकले हैं। फिर भी व्यक्ति आतंकी की सजा पूरे कौम को नहीं दी जा सकती है। ऐसे पीड़ितों पर सियासत के दिग्गजों ने अधिकतर सहानुभूति के बोल के ही मरहम लगाया है। परिवार को राहत दिलाए जाने की वकालत अनेक राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने की है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि मुसलमान यदि आज पुलिसिया जुल्म के सामने बेबस नजर आता है तो यह कांग्रेस की भी कमजोरी है। वहीं यह भी सच है कि इस मामले में भाजपा की छवि को भी पाक साफ नहीं कहा जा सकता है। पश्चिम बंगाल में माकपा नेता ज्योति बसु का मुख्य मंत्रित्व काल के 30 साल के लिए विख्यात है। मुसलमान अन्याय के मामले में पश्चिम बंगल का ग्राम देश में सर्वाधिक ऊंचा है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुखतार अब्बास नकवी ने कहा कि राज्यों इस समस्या को मानवीय आधार पर सुलझाना चाहिए। वहीं मुसलमानों पर पक्षपात पूर्ण कार्रवाई पर पीयूसीएल का आरोप है। सरकारें बदली दल बदला पर मुसलमानों की इस समस्याओं का निराकरण नहीं हुआ। क्योंकि सियात में मुसलमान कौम को मोहरे के रूप इस्तमाल किया जा रह है। गुजरात कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार हिदायत देनी पड़ी थी। राज्य में पोटा और टाडा के तहत 280 लोगों को गिरफ्तार किया, जिसमें 279 मुसलमान थे। इसमें से मात्र डेढ़ प्रतिशत को सजा हुआ पोटा के तहत 1031 लोगों को गिरफ्तारी हुई। जिसमें मात्र 13 को सजा हुई। लेने समय तक जारी पुलिसिया कार्रवाई पर अकुंश नहीं लगाया गया है। देश के अमूमन राज्यों में मुसलमानों की यही दशा है। जाहिर से इस समाज में शिक्षा की लौ जैसे ही तेज होगी, समाज की सोच प्रगतिशील होगी। आने वाली पीढ़ी में हिंसा और अपराध की राह को छोड़ अपने घर परिवार और भविष्य को सुखमय बनाने में व्यस्त होगी। इसी से समाज भी मजबूत होगा। देश भी मजबूत होगा। -----------------------------------
शुक्रवार, दिसंबर 06, 2013
घसिया की घड़वा में इतिहास की धड़कन
कथा छत्तीसी : बस्तर की घड़वा कला
छत्तीसगढ़ में बस्तर की घडवा कला अथवा ढोकरा कला विश्व प्रसिद्ध है। मिट्टी, मोम और धातु की सम्मिलित है इस कलासाधना से जो सृजित होता है, उसके प्रति मन सहज ही आकर्षित होता है। इसमें कलाकृति धातु की बनती है लेकिन कलाकार उसे मोम में साधता है। बस्तर में मुख्य रूप से से घसिया जनजाति ने घड़वा कला को साधा और शिखर तक पहुँचाया। घसिया के रूप में इस जनजाति को पहचान रियासतकाल में उनके कार्य को ले कर हुई। जानकार कहते हैं कि ये जनजाति दिनो घोड़ों के लिए घास काटने का कार्य किया करती थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि घड़वा कला को किसी काल विशेष से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। मोहनजोदाडो में ईसा से तीन हजार साल पहले प्राप्त एक नृत्य करती लड़की की प्रतिमा लगभग उसी तकनीक पर आधारित है जिसपर बस्तर का घड़वा शिल्प आज कार्य कर रहा है।
प्रसिद्ध घड़वा शिल्पकलाकार जयदेव बघेल ने लिखा है कि बस्तर में इस कला के प्रारंभ के लिए जो मिथक कथा है उसका संबंध आदिमानव और उसकी जिज्ञासाओं से है। जब आदिमानव जंगल में विचरण करता था और शिकार पर आश्रित अपना जीवन निर्वहन किया करता था। इन्ही में से एक आदिमानव की यह कहानी है जो अपने माता-पिता से बिछड़ कर किसी गुफा में रह रहा था। एक दिन उसने पहाड़ पर आग लगी देखी। आग से निकलने वाले रंग तथा चिंगारिया उसे भिन्न प्रतीत हुईं और वह जिज्ञासा वश उस दावानल के निकट चला गया। अब तक आग स्थिर होने लगी थी। वहीं निकट ही उसे एक ठोस आकृति दिखाई पड़ी जो किसी धातु के पिघल कर प्रकृति प्रदत्त किसी सांचे में प्रवेश कर जम जाने के बाद सृजित हुई होगी। यह आकृति उसे अलग और आकर्षित करने वाली लगी। उसे उठा कर वह आदिमानव अपने घर ले आया। उसने इस प्रतिमा के लिए घर का एक हिस्सा साफ किया और इसे सजा कर रखा। इस प्रतिमा के लिए उसका आकर्षण इतना अधिक था कि हमेशा ही वह इसे साफ करता। धीरे धीरे इससे प्रतिमा में चमक आने लगी। कहते हैं इसी चमक से प्रभावित हो कर वह स्वयं को भी चमकाने लगा। मतलब रोज स्नानादि कर सज संवर कर रहने लगा। यह धातु और वह आदिमानव जैसे एक दूसरे के पूरक हो गए थे। समय के साथ दोनो में ही वैशिष्ठता की दमक उभरने लगी थी जिसे ग्रामीणों ने महसूस किया। जब कारण पूछा गया तो इस आदिमानव ने ग्रामीणों को वह जगह दिखाई जहाँ से उसे धातु का यह प्रकृति द्वारा गढा गया टुकड़ा प्राप्त हुआ था। इस स्थान पर सभी ने पाया कि वह दीमक का टीला था, जिसमें आग से पिघला द्रव धातु-द्रव्य प्रवेश कर गया था और उसने वही आकार ले लिया था। उसी स्थल पर मधुमक्खी का छत्ता भी पाया गया जिससे मोम, सांचा और धातु को कलात्मकता देने का आरंभिक ज्ञान उन ग्रामीणों को हुआ होगा। कहते है कि उस आदि कलाकार ने धातु के इस टुकड़े को अपनी मां माना। उसके प्रति श्रद्धा और प्रेम दिखाया। यह भी कहा जाता है कि उस आदिकलाकार ने सबसे पहले अपनी माँ की आकृति बनाने का यत्न किया। धीरे-धीरे वह अपने आसपास की वस्तुओं और पशु-पक्षियों को भी इस कला के माध्यम से मूर्त रूप देने लगा। लिहाजा, कालांतर में इस कला में बाघ, भालू, हिरण, कुत्ता, खरगोश, नाग कछुवा, मछली, पक्षी, गाय, बकरा, बंदर आदि की कृतियां मिलती हैं। इसी तरह विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियाँ घडवा कला के रूप में परिवर्तित होती रहीं। कर्मकोलातादो, मूलकोलातादो, भैरमदेव, भीमादेव, राजारावदेव, दंतेश्वरीदेवी, माता देवी, परदेसीन माता, हिंग्लाजिन देवी, कंकालिन माता आदि की मूर्तियाँ इस कला के विकास के विभिन्न चरणों में सृजित की गई। लाला जगदलपुरी भी अपनी पुस्तक बस्तर इतिहास एवं संस्कृति में उल्लेखित करते हैं कि बस्तर के घड़वा कला कर्मी पहले कुँडरी, कसाँडी, समई, चिमनी और पैंदिया तैयार करते थे। अब लोग देवी देवता, स्त्री पुरुष, हरिण, हाथी, अकुम आदि बनाते आ रहे हैं।
बस्तर की यह कला असाधारण है। इसकी गहराई में उतरने पर किसी न किसी रूप में इतिहास सामने आने लगता है। सिंधु घाटी की सभ्यता अगर धातु की ऐसी प्रतिमाओं की निमार्ती थी तो निश्चित ही इस सभ्यता के नष्ट होने के साथ जो पलायन हुए उनके साथ ही यह कला भी स्थानांतरित हुई होगी। बस्तर में नाग शासकों ने लगभग सात सौ वर्ष तक शासन किया है और इतिहास उनके आगमन का स्थल मध्य एशिया के पश्चात सिंधुघाटी का क्षेत्र ही मानता रहा है। लिहाजा, यह भी अनुमान लगाया जाता है कि इसी प्रक्रिया में यह कला बस्तर की जनजातियों के पास भी पहुंची हो। इन प्रतिमाओं का महापाषाणकालीन सभ्यता से भी संबंध जोड़ कर देखा गया है तो क्या यह माना जा सकता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में ही समानांतर बसे मानव समूहो को भी धातु को गला कर आकृतियाँ देने की यह कला ज्ञात थी जिसमे गोदावरी के तट पस बसे आदिम समूह भी सम्मिलित थे? फिलहाल यह अभी शोध का विषय है।
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संपर्क- संजय स्वदेश
सोमवार, दिसंबर 02, 2013
मीठी चीनी की कड़वी घूंट
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शक्कर उत्पादन को लेकर सरकार को अपने रैवए पर विचार करना चाहिए। गन्ने की पेराई पर मिलर्स का प्रतिबंध निश्चित रूप से दादागिरी है। इसमें सरकार का दखल जरूरी है। कृषकों के हितों का पोषण सरकार की जवाबदारी है। चीनी विवाद मात्र से थोक बाजार में उठान के संकेत मिल चुके हैं। इस असर खुदरा बाजार पर भी पड़ेगा। आलू, प्याज, टमाटर की महंगाई की मार से पस्त जनता को कड़वी शक्कर को मुश्किल से पचाना पड़ेगा।----------------------------------- संजय स्वदेश महंगाई से जूझ रही जनता को आगामी दिनों में महंगी शक्कर का भी बोझ ढोना पड़ सकता है। इस मामले में केंद्र सरकार और खाद्य मंत्रालय की पहल की सराहना नहीं की जा सकती है। उत्तर प्रदेश में शक्कर मिलर्स ने गन्ने की पेराई बंद कर दी है। गन्ना किसान सरकारी राहत के लिए सड़क पर उतर आए। महाराष्ट्र के सांगली और कोल्हापुर में भी किसानों ने अपने तेवर दिखाए। कर्नाटक के बेलगाम में भी गन्ना किसानों की उग्रता दिखी। हालात देख कर यह सहज अनुमान लगाए जा सकते हैं कि गन्ना किसानों के हाल क्या है। चीनी मिलों की लचर व्यवस्था पर सरकार का अंकुश असफल है। हालत इस बात के भी संकेत दे हैं कि आने वाले दिनों में गन्ने की खेती प्रभावित होगी। लिहाजा, चीनी का उत्पादन घटना तय है। फिलहाल सरकार ने वर्तमान हालत को देखते हुए चीनी उत्पादन में तीन प्रतिशत की कमी होने का संकेत दे दिया है। सरकार, चीनी मिलर्स और गन्ना किसानों का यह संघर्ष आज के नहीं हैं। केंद्र सरकार ने बीमार शक्कर मिलों को जीवन प्रदान करने के लिए ऋण मुक्त ब्याज देने पर विचार किया। लेकिन जिस तरह बीमार मिलो (उद्योगपतियों) की चिंता की गई यदि उस चिंता में किसानों को भी शामिल कर लिया जाता तो, किसानों के आक्रोश पर तत्काल सहानुभूति के छिंटे जरूर पड़ जाते। सरकार का यह कह कर खुश होना उत्पादन की कमी से देश में शक्कर आपूर्ति की समस्या नहीं आएगी, कुशल व्यापार नीति पर बट्टा लगाना जान पड़ता है। यदि हम शक्कर पर आत्मनिर्भर हैं तो निर्यात का पुख्ता इंतजाम किया जाना चाहिए। किसानों को अधिक प्रोत्साहन देना चाहिए। शक्कर का कच्चा माल गन्ना किसानों की सौगात है। कच्चे माल की बुनियाद पर ही उद्योग की स्थापना की जाती है। ऐसे में गन्ना किसानों की मांग को दरकिनार करके बीमार शक्कर मिलों की चिंता उद्योगपतियों पर मेहरबानी से गन्ना किसानों का उग्र होना स्वाभाविक है। भारत शक्कर के उत्पादन और खपत करने दोनों में उस्ताद माना जाता है। दुनिया में ब्राजील के बाद भारत में शक्कर का उत्पादन सबसे ज्यादा है। ऐसे में देश के गन्ना किसान को खुशहाल होना चाहिए, मगर अफसोस गन्ना किसानों को अपनी बदहाली को लेकर सड़कों पर उतरना पड़ता है। लगातार आंदोलन के बाद भी उनकी सुध नहीं ली जाती है। शक्कर उत्पादन को लेकर सरकार को अपने रैवए पर विचार करना चाहिए। गन्ने की पेराई पर मिलर्स का प्रतिबंध निश्चित रूप से दादागिरी है। इसमें सरकार का दखल जरूरी है। कृषकों के हितों का पोषण सरकार की जवाबदारी है। गन्ने की पेराई बंद करने, मिलर्स पर किसानों का करोड़ों रुपए का बकाया, निर्धारित मूल्य पर गन्ने का भुगतान और अन्य कारणों से सरकार द्वारा मिलर्स पर दर्ज कराई गई एफआईआर गतिरोध का मुख्य मुद्दा है। रिपोर्ट पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने से किसान नाराज हैं और मिलर्स की दबंगई जारी है। इन परिस्थितियों में गन्ना गतिरोध समाप्त होते नहीं दिखता है। पेराई के बंद होने से किसानों की परेशानी बढ़Þ जाएगी। उत्पादन विलंब से शुरू होगा इससे लागत में वृद्धि स्वाभाविक है। जिसका बोझ अंतत: जनता के कंधे पर ही आएगा। पिछले दिनों उत्पादन में कमी की चर्चा मात्र से हाजिर स्टाक में शक्कर की कीमत में एक प्रतिशत के इजाफे से थोक में शक्कर की कीमत 3200 से 3275 रुपए प्रति क्विंटल हो गई। इधर आशंका जाहिर की जा रही है कि आगामी दिनों में शक्कर की दर में तीन प्रतिशत की बढ़Þोतरी हो सकती है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार से पहले ही शक्कर के उत्पादन शुल्क पर वृद्धि करने की अपनी मंशा जाहिर कर चुकी है। साथ ही चीनी मिलों को नियंत्रण मुक्त की योजना को प्रस्तुत किया जा चुका है और इसे अमलीजामा पहने की कवायद जारी है। हालांकि इस योजना को अंजाम देने के पीछे उतार-चढ़ाव, आयात-निर्यात में व्याप्त असंतुलन, प्रर्याप्त भंडारण की कमी आदि को महत्वपूर्ण कारण माने जा सकते हैं। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के अध्यक्ष सी रंगराजन की अगुआई वाली समिति ने पिछले साल ही शक्कर से जुड़े हुए दो तरह के नियंत्रण, मसलन-निर्गम प्रणाली और लेवी शक्कर को अविलंब समाप्त करने की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं, इस समिति ने शक्कर उधोग पर आरोपित अन्यान्य नियंत्रणों को भी क्रमश: समाप्त करने की बात कही थी। इस मामले पर अभी भी कार्रवाई लंबित है। यदि इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाता है तो उसके सुख परिणाम समाने आएंगे इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है। विनियंत्रण के मामले में देश के सर्वाधिक उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के अलावा अन्य 10 राज्यों ने अपनी मंशा से केंद्र को अवगत करा दिया है। इससे विनियंत्रण का रास्ता साफ हो गया है। इस लिहाज से कहा जा सकता है अब गेंद केंद्र के पाले में है। विनियंत्रण को किसानों के पक्ष में माना जा रहा है। वे अपने गन्ने की बिक्री अधिक कीमत देने वाले मिलर्स को बेच सकेंगे। किंतु हरहाल में गन्ने की न्यूनतम मूल्य के निर्धारण में सरकार का दखल होगा। लेकिन सरकार की इस दखल को चीनी मिलर्स की लॉबी अपने पक्ष में प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। विनियंत्रण के लिए हाईलेबल पर लाबिंग की जा रही है। चीनी उद्योग एक प्रकार से विनियंत्रण के पक्ष में है। इससे गन्ने के उत्पादन में स्थिर आने की बात कही जा रही है। इस नीति में एक दूसरा व्यवहारिक पहलू को नजरअंदाज किया जा रहा है। देश के गन्ना किसान मानसून पर आश्रित हैं। गन्ने की उगाई में हुए नुकासन के बाद किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के प्ररकणों को भूला नहीं जा सकता है। लिहाजा, विनियंत्रण की संकल्पना को पूर्णरूपेण सही नहीं ठहराया जा सकता है। शक्कर उद्योग पर सरकार का नियंत्रण दो तरीके से किया जाता है। सरकार शक्कर का कोटा तय करती है जिसे खुले बाजार में बेचा जाता है। मिलर्स से उत्पादन का 10 प्रतिशत शक्कर लेवी में ली जाती है। जिसे राशन दुकानों में उपलब्ध कराया जाता है। फिलहाल लेवी की 20 रुपए की शक्कर 13.50 रुपए में बेची जा रही है। किंतु इससे किसानों को राहत मिलने की गुंजाइश कम है। बताया जा रहा है 98 लाख टन शक्कर हमारे मौजूदा स्टाक में है। आगामी वित्तीय वर्ष में हमार उत्पादन 2.44 करोड़ टन के रहने की संभावना है। इससे हमारे कुल उत्पादन में हमको दो से ढाई लाख टन का नुकसान उठाना पड़ सकता है। उत्पादन आंकड़ों के लिहाज से इस परिस्थिति की गणना सामान्य उतार-चढ़ाव के रूप से देखा जाएगा। किंतु देश की आर्थिक समृद्धि और प्रतियोगी नजरिए से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) ने सरकार के दावा को खोखला बताया है। संघ के अनुसार उत्तर प्रदेश के साथ तमिलनाडुु में भी शक्कर उत्पादन में गिरावट की आशंका है। इधर महाराष्ट्र में भी किसानों को असंतोष उजागर हो रहा उत्पादन में गिरावट से चीन के मूल्य में अप्रत्यशित वृद्धि हो सकती है। जिस पर नियंत्रण आसान नहीं होगा। गन्ना किसान और मिलर्स के बीच में सरकार द्वारा निर्धारित 280 रुपए प्रति क्विंटल गन्ने की कीमत विवाद का प्रमुख मुद्दा है। चीनी विवाद मात्र से थोक बाजार में उठान के संकेत मिल चुके हैं। इस असर खुदरा बाजार पर भी पड़ेगा। आलू, प्याज, टमाटर की महंगाई की मार से पस्त जनता को कड़वी शक्कर को मुश्किल से पचाना पड़ेगा। -------------------------------------------------
मंगलवार, नवंबर 19, 2013
गरीब की देह पर मौत का ट्रायल
संदर्भ : दवा परीक्षण पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
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भारत में दवा परीक्षण का कारोबार करीब एक अरब डालर का है। दवा परीक्षण के दुष्प्रभााव के कारण करीब 12 हजार लोग पीड़ित है। कुछ इतने दर्द में हैं कि वे मौत की दुआएं मांग रहे हैं। सरकारें बगले झांक रही है। मरे हुए लोगों को कोई ढंग के मुआवजे के लिए कहीं कोई बुलंद आवाज नहीं है। शायद सरकार ठीकठाक मुआवजा दिला दे तो मरने वाले के गरीब परिवार के दर्द पर मरहम लग सके।
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संजय स्वदेश
आंध्र और गुजरात में 2009-10 के दौरान अनैतिक रूप से दवा परीक्षण के मामले में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और परीक्षण करने वाली संस्था को नोटिस दिया है। जिस दिन कोर्ट ने यह नोटिस जारी किया उसके अगले दिन विदेशी मीडिया ने यह समाचार जारी किया कि विदेशी दवा कंपनियों के लिए भारत में क्लिनीकल ट्रायल सबसे महंगा पड़ रहा है। जबकि अभी तक अधिकतर रपटें यही कह रही थीं कि चीन के बाद भारत में दवा परीक्षण का बेहतरीन माहौल है। इस उपलब्धि में दवा परीक्षण का इतिहास बहुत काला रहा है। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि वर्ष 2005 से 2012 के बीच 475 दवाओं के परीक्षण की वजह से 2,644 मरीजों की मौत हुई। सन् 2008 में 288, 2009 में 637 और 2010 में 668 लोगों की मौत हुई है। इस तरह से एक जान की औसत कीमत महज ढाई लाख रुपए आंकी गई। मुआवजा देने वाली कंपनियों में मर्क, क्विनटाइल्स, बेयर, एमजेन, ब्रिस्टल मेयर्स, सानोफी और फाइजर भी शामिल हैं। निश्चय ही मुआवजे के लिए महज ढाई लाख की रकम दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है।
मध्यप्रदेश आंध्र प्रदेश में ऐसे गुपचुप दवा परीक्षण से होने वाली मौतों पर काफी हो हल्ला मच चुका है। फिर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अचानक किसी विदेशी मीडिया के माध्यम से यह प्रचार करना कि भारत में ऐसे परीक्षण महंगा सौदा है, कुछ और संकेत कर रहे हैं। कुछ ही दिन पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने क्लीनिकल परीक्षणों के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि ये परीक्षण देश की जनता के हित में होने चाहिए और सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये इसकी इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
जीवन बचाने जैसे सकारात्मक उद्देश्य के साथ दवाओं का परीक्षण तो ठीक है। लेकिन मरीज के परीजनों को अंधेरे में रख कर मरीज के साथ जानलेवा परीक्षण निश्चित रूप से न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता हैं। अमूमन यह देखा गया है कि दवाओं का परीक्षण मानसीक रूप से कमजोर लोगों पर किया गया। कई बार मानसिक रूप से ठीक लोगों पर भी परीक्षण हुआ, लेकिन उनके परीजनों को इसकी जानकारी नहीं दी गई। इस क्रम ढेरों प्रयोग असफल हुए और ढेरों मौतें भी हुई। ताजी रिपोर्ट तो कहती है कि दवा परीक्षण के दुष्प्रभााव के कारण करीब 12 हजार लोग पीड़ित है। कुछ इतने दर्द में हैं कि वे मौत की दुआएं मांग रहे हैं। सरकारें बगले झांक रही है। मरे हुए लोगों को कोई ढंग के मुआवजे के लिए कहीं कोई बुलंद आवाज नहीं है। शायद सरकार ठीकठाक मुआवजा दिला दे तो मरने वाले के गरीब परिवार के दर्द पर मरहम लग सके। ऐसे पीड़ित परिवारों की इतनी हैसियत नहीं होती है कि वे दवा कंपनियों को कोर्ट में घसीट सकें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (ंडब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2010 में भारत में क्लिनिकल ट्रायल का कारोबार करीब एक अरब डालर का हो गया है। किंतु मरीजों मरीजों को मौत के मुआवजे के नाम पर केवल खानपूर्ति की जाती रही है। ऐसे मौत में पोस्टमार्टम भी होता है तो उसकी रिपोर्ट ऐसे बनाई जाती है, जिससे दवाओं के प्रयोग की काली हकीकत नहीं होती है। अमूमन दवाओं का प्रयोग गरीब मरीजों पर होते हैं। प्रयोग सफल हो जाए तो मौत उन्हें ताड़पाकर गले लगाती है। यदि दवा का प्रयोग सफल हो जाए तो वही दवा गरीबों को सुलभ नहीं होती है। आंध्र प्रदेश और गुजरात में सन् 2009-10 के दौरान दवा परीक्षणके मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 162 नई दवाओं के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाया दिया है। लेकिन केवल प्रतिबंध लगा देने भर से किसी पीड़ित गरीब को कोई न्याय नहीं मिल जाता है। मौत देने वाले ऐसे परीक्षणों में जिम्मेदारी किसकी सुनिश्चित की गई। किसी को कोर्ट ने दंड दिया तो ऐसी खबर नहीं आती।
कोई विदेशी मीडिया भले ही भारत में दवा परीक्षण के महंगे होने का यह दवा करें, लेकिन अब तक के परीक्षण के आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि भारत बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के लिए पिछले कुछ बरसों से दवाओं के परीक्षण का हब बन चुका है। गरीब मरीज इनके प्रयोग के सबसे सस्ते शिकार हैं। परीक्षण के बारे में उनको कोई जानकारी भी नहीं दी जाती, न ही कोई नियम-कायदे अपनाए जाते हैं।
दवा के परीक्षण के खिलाफ सक्रिय संगठनों का दावा है कि देश में ऐसे मौतों का सही अांकड़ा नहीं है। सन् 2010-2012 के मध्य ड्रग कंट्रोलर जनरल ने 1,065 लोगों पर दवा परीक्षण की अनुमति दी। लिहाजा, अनुमति लेकर दवाओं के परीक्षण के दौरान जो मौतें हुई उसके ही अांकड़े सामने आते हैं। जबकि एक दवा के प्रयोग की अनुमति लेकर कंपनियां कई दवाओं का प्रयोग करती हैं। इनमें से कई कंपनियां भारतीय कंपनियों को अपना एजेंसी बनाती है वे खुद चीन, मेलेशिया, सिंगापुर आदि देशों से उनके माध्यम से अपना प्रयोग करवाती हैं, जिससे कि विपरीक्ष स्थिति में वह भारत के कानूनी पचड़े से दूर रहे।
शनिवार, नवंबर 16, 2013
छत्तीसगढ़ की सियासत में वोट कटवा गैंग
संजय स्वदेश
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव घोषणा से पूर्व प्रदेश में तीसरे मोर्चे की जोरशोर से कुलबुलाहट थी। कहा जा रहा था कि तीसरा मोर्चा प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस का गणित बिगाड़ेगी। लेकिन मजेदार बात यह है कि दो दिन बाद दूसरे चरण का मतदान होना है और तीसरा मोर्चा का कही कोई बजूद ही नजर नहीं आ रहा है। एक दो विधानसभा क्षेत्र छोड़ दे तो न कही पोस्टर दिखा और कहीं कोई रैली। हालात देख कर तो ऐसे ही लग रहा है जैसे हर क्षेत्र में यह कत्थित तीसरे मोर्चे से जुड़े लोग वोट काटवा बन गए हैं। उनके मैदान में होने से दूसरे किसी एक उम्मीदवार को जीत का गणित सुलझता दिख रहा है। अभिभाजित मध्यप्रदेश के विधानसभा में कभी छत्तीसगढ़ क्षेत्र से 15 विधायक भेजने वाले विधायक में अजीत तरक ही शून्यता दिख रही है। चुनाव आयोग के आंकड़े देखें तो छत्तीसगढ़ में दर्जनभर से ज्यादा क्षेत्रीय दल हैं। इसके बाद भी यहां की राजनीतिक में कोई तीसरा दल मजबूती से नहीं उभरा। चुनाव घोषणा से पहले प्रमुख क्षेत्रीय दलों में छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच से तीसरे विकल्प की जोरशोर से चर्चा थी। आज जब सबको सामने आना चाहिए था तो वे अंधेरे में, परदे के पीछे हैं।
आपातकाल के दौरान छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा का गठन श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी ने किया था। नियोगी खुद कभी चुनाव नहीं लड़े लेकिन प्रत्याशी खड़े करते रहे। मोर्चे ने पहली जीत 1985 में दर्ज की जब उसके टिकट पर जनकलाल ठाकुर विधायक निर्वाचित हुए। ठाकुर 1993 में भी जीते। नियोगी की हत्या के बाद मोर्चे की कमान उनकी पत्नी आशा नियोगी ने थामी। लेकिन छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद मोर्चा अपनी मौजूदगी नहीं दिखा सका। फिलहाल नियोगी की बेटी मुक्तिगुहा नियोगी नगर पंचायत की अध्यक्ष है। लेकिन वह भी कांग्रेस की राजनीतिक करती है। नियोगी के राजनीतिक संघर्ष की विरासत की लौ बुझती दिख रही है।
गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भाजपा के एक बागी हीरासिंह मरकाम ने बनाई थी। मरकाम ने 1993 में चुनाव लड़ा और हार गए। वह 1998 में चुनाव जीत गए। लेकिन पृथक छत्तीसगढ़ बनने के बाद वर्ष 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव में वह हार गए। पार्टी का मत प्रतिशत भी घटता गया। दोनों ही चुनावों में पार्टी ने प्रत्याशी उतारे लेकिन उसका खाता नहीं खुला। इस बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी इसलिए चर्चा में आई क्योंकि उसके टिकट पर सक्ती सीट से सक्ती राजघराने के सुरें्रद बहादुर सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस ने उनका टिकट का दावा खारिज कर दिया जिससे नाराज हो कर सिंह गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में शामिल हो गए और उसके टिकट पर सक्ती सीट से खड़े हो गए।
छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच बिल्कुल नया क्षेत्रीय दल है जिसका गठन भी भाजपा के ही एक बागी ने किया। भाजपा से दो बार विधायक और 4 बार सांसद रहे ताराचंद साहू ने 2008 में छत्तीसगढ़ स्वाभिमान मंच का गठन किया। वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में साहू ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस दोनों को कड़ी टक्कर दी थी। इस बार भी उन्होंने करीब 45 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए हैं। लेकिन एक दो विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ दे तो कहीं भी यह दल मैदान जंग में कड़ी टक्कर देता नहीं दिख रहा है।
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