मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

विदर्भ राज्य की मांग को राज का ठेंगा


मस्तिष्क में खूनी की आपूर्ति नहीं हो रही है तो सिर को धड़ से अलग नहीं किया जा सकता।
नागपुर। मनसे सुप्रीमों राज ठाकरे ने विदर्भ राज्य की मांग को ठेंगा दिखा दिया है। नागपुर में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में राज ठाकरे पत्रकारों से बातचीत में कहा कि पृथक विदर्भ की मांग पर उन्होंने साफ कहा, नहीं। पृथक विदर्भ राज्य नहीं। मेरा मत स्पष्ट है। संयुक्त महाराष्ट्र की स्वर्ण जयंती के अवसर पर 'डायवोर्सÓ की बात करना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति नहीं हो रही है तो सिर को धड़ से अलग नहीं किया जा सकता। महाराष्ट्र से अलग होकर विदर्भ स्वतंत्र राज्य बन जाए, तब भी विदर्भ की समस्याएं हल नहीं होंगी। विदर्भ के लिए ठोस उपाययोजना (कांक्रीट प्लान) पर अमल किया जाना चाहिए।

राज ने स्पष्ट किया कि वे इन दिनों खामोश हैं। विदर्भ के लिए ठोस उपाय योजना पर कोंकण, मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र को भी शामिल कर लिया। विदर्भ की उपेक्षा पर मस्तिष्क में रक्त पहुंचाने की बजाए सिर काटने की बात कही। विदर्भ की जनता के अन्याय तो हुआ है लेकिन अभी राज इसका अध्ययन कर रहे हैं। राज इस बात का भी अध्ययन कर रहे हैं कि जिस पार्टी ने पृथक विदर्भ की खिलाफत की उसके विधायक कैसे यहां से चुन कर आते हैं। किसानों की आत्महत्या पर भी अध्ययन जारी है। डा. आंबेडकर ने जब तीन मराठीभाषी राज्य की बात की थी उस समय की परिस्थिति और आज की परिस्थिति के बीच अध्ययन जारी है। अधिवेशन के बाद स्थिति स्पष्ट करुंगा। जनमत का मामला है। नाजुक प्रश्न है। विदर्भ पर मतदान कराया जाना चाहिए।
जब राज ठाकरे को यह याद दिलाया गया कि परप्रांतियों के मसले पर जिस पुस्तक के आधार पर वे बाबासाहब की भूमिका स्पष्ट करते हैं, उसमें डा. आंबेडकर ने महाराष्ट्र के त्रिविभाजन की बात कही है, राज ने साफ-साफ कहा कि इस समय उन्हें कुछ नहीं कहना है। उन्होंने इस संबंध में प्रश्न पूछने को भी मना किया। इतना जरूर कहा कि बाबासाहब ने जब यह कहा था कि उस समय की परिस्थिति और आज की परिस्थिति में फर्क है।
सांसद विलास मुत्तेमवार के स्वतंत्र विदर्भ की मांग पर उन्होंने तल्ख टिप्पणी की। राज ने कहा, इस राज्य में गत 50 वर्षों से कांग्रेस का शासन है। विदर्भ को महाराष्ट्र में शामिल कांग्रेस ने किया। अन्याय भी उसी ने किया। मुत्तेमवार भी कांग्रेस के ही सांसद हैं। राज ने कहा, मुत्तेमवार पहले अपनी पार्टी के नेताओं से पूछ लें, फिर पृथक विदर्भ की मांग करें।
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सदन में नहीं उठ रहा है पृथक विदर्भ का मुद्दा

संजय स्वदेश
नागपुर। विदर्भ के नेता और विभिन्न संगठन पृथक विदर्भ की मांग पर एक मंच पर आने की बातें भले ही कर रहे हों पर विधानमंडल में जनप्रतिनिधियों के रुख को देखकर लगता है कि विदर्भ का मुद्दा हवा बन कर ही रह जाएगा और पूर्व की भांति इस बार भी शीतसत्र तुरंत समाप्त हो जाएगा। सरकार मुंबई चली जाएगी। मुद्दा फिर शांत हो जाएगा। सदन के बाहर विदर्भ के विभिन्न क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों के पृथक विदर्भ पर बयान सुन कर भले यह लगे कि वे ही इसके सबसे बड़े हिमायती हैं। पर सदन के अंदर पृथक विदर्भ का मुद्दा नहीं उठाया जा रहा है और न ही शीतसत्र के निकट दिनों में चर्चा की संभावना दिख रही है। वहीं दूसरी ओर शीतसत्र के दूसरे सप्ताह तक ही विधायक बोरियत महसूस करने लगे हैं। विधानमंडल के दोनों सदनों की स्थिति यह है कि हर चर्चा सत्र में आधी सीटें खाली रहती हैं। पर दोनों पक्षों के नये विधायक सदन के कामकाज को समझने में खासी रुची दिखा रहे हैं। सत्र में उनकी उपस्थिति ही नजर आती है।
सदन से गायब रहने वालों में सत्ता पक्ष को साथ-साथ विपक्ष के विधायक भी शामिल हैं। हालांकि शीतसत्र के शुरूआत में इसको लेकर राजस्वमंत्री नारायण राणे ने विपक्ष की कम उपस्थिति पर चुटकी भी ली थी। सदन में पूछे जाने वाले पहले से निर्धारित अधिकतर प्रश्नों की सूची में पांच से ज्यादा विधायकों के नाम होते हैं, पर सवाल पूछते वक्त उस सूची में से एक या दो ही विधायक सदन में उपस्थित रहते हैं। वहीं शीत सत्र शुरू होने से पहले विपक्ष ने सत्ता पक्ष को सदन में घेरने का दावा किया था। पर हल्के-फुल्के विरोध के अलावा विपक्ष कुछ खास आक्रमण नहीं दिखा। सत्र के अंत में सदन में प्रस्तुत किए जाने वाले नियोजन विधेयक के आज प्रस्तुत होने की संभावना है।
ज्ञात हो कि नई सरकार के गठन के बाद पहला अधिवेशन नागपुर में हो रहा है। सरकार ने 23 दिसंबर तक अधिवेशन के चलने की घोषणा की है। लेकिन अब विधायकों को यह तीन सप्ताह पहाड़ लगने लगे हैं। पहले सप्ताह में ही 12 और 13 को अवकाश था, तो दूसरे सप्ताह में 17 से 20 दिसंबर तक विधि मंडल के कार्य बंद रहेंगे जो 21 से 23 दिसंबर तक चलेंगे। इसी कारण जल्दी कार्य निपटाने के लिए सोमवार और मंगलवार को दोनों सदन देर तक चलते रहें। पहले और दूसरे सप्ताह में चार दिनों के अवकाश और सदन में विधायकों की कम उपस्थिति से अधिवेशन का जोश ठंडा पड़ता दिख रहा है। लिहाजा, आज 16 दिसंबर को सदन में नियोजन विधेयक प्रस्तुत होने की संभावना बढ़ती दिख रही है। जानकारों का कहना है कि 18 दिसंबर को होने वाले विधानपरिषद के चुनावों के मद्देनजर सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी चुनावी रणनीति में लगे हुए हैं।
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सदन में नहीं उठ रहा है पृथक विदर्भ का मुद्दा

संजय स्वदेश
नागपुर। विदर्भ के नेता और विभिन्न संगठन पृथक विदर्भ की मांग पर एक मंच पर आने की बातें भले ही कर रहे हों पर विधानमंडल में जनप्रतिनिधियों के रुख को देखकर लगता है कि विदर्भ का मुद्दा हवा बन कर ही रह जाएगा और पूर्व की भांति इस बार भी शीतसत्र तुरंत समाप्त हो जाएगा। सरकार मुंबई चली जाएगी। मुद्दा फिर शांत हो जाएगा। सदन के बाहर विदर्भ के विभिन्न क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों के पृथक विदर्भ पर बयान सुन कर भले यह लगे कि वे ही इसके सबसे बड़े हिमायती हैं। पर सदन के अंदर पृथक विदर्भ का मुद्दा नहीं उठाया जा रहा है और न ही शीतसत्र के निकट दिनों में चर्चा की संभावना दिख रही है। वहीं दूसरी ओर शीतसत्र के दूसरे सप्ताह तक ही विधायक बोरियत महसूस करने लगे हैं। विधानमंडल के दोनों सदनों की स्थिति यह है कि हर चर्चा सत्र में आधी सीटें खाली रहती हैं। पर दोनों पक्षों के नये विधायक सदन के कामकाज को समझने में खासी रुची दिखा रहे हैं। सत्र में उनकी उपस्थिति ही नजर आती है।
सदन से गायब रहने वालों में सत्ता पक्ष को साथ-साथ विपक्ष के विधायक भी शामिल हैं। हालांकि शीतसत्र के शुरूआत में इसको लेकर राजस्वमंत्री नारायण राणे ने विपक्ष की कम उपस्थिति पर चुटकी भी ली थी। सदन में पूछे जाने वाले पहले से निर्धारित अधिकतर प्रश्नों की सूची में पांच से ज्यादा विधायकों के नाम होते हैं, पर सवाल पूछते वक्त उस सूची में से एक या दो ही विधायक सदन में उपस्थित रहते हैं। वहीं शीत सत्र शुरू होने से पहले विपक्ष ने सत्ता पक्ष को सदन में घेरने का दावा किया था। पर हल्के-फुल्के विरोध के अलावा विपक्ष कुछ खास आक्रमण नहीं दिखा। सत्र के अंत में सदन में प्रस्तुत किए जाने वाले नियोजन विधेयक के आज प्रस्तुत होने की संभावना है।
ज्ञात हो कि नई सरकार के गठन के बाद पहला अधिवेशन नागपुर में हो रहा है। सरकार ने 23 दिसंबर तक अधिवेशन के चलने की घोषणा की है। लेकिन अब विधायकों को यह तीन सप्ताह पहाड़ लगने लगे हैं। पहले सप्ताह में ही 12 और 13 को अवकाश था, तो दूसरे सप्ताह में 17 से 20 दिसंबर तक विधि मंडल के कार्य बंद रहेंगे जो 21 से 23 दिसंबर तक चलेंगे। इसी कारण जल्दी कार्य निपटाने के लिए सोमवार और मंगलवार को दोनों सदन देर तक चलते रहें। पहले और दूसरे सप्ताह में चार दिनों के अवकाश और सदन में विधायकों की कम उपस्थिति से अधिवेशन का जोश ठंडा पड़ता दिख रहा है। लिहाजा, आज 16 दिसंबर को सदन में नियोजन विधेयक प्रस्तुत होने की संभावना बढ़ती दिख रही है। जानकारों का कहना है कि 18 दिसंबर को होने वाले विधानपरिषद के चुनावों के मद्देनजर सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी चुनावी रणनीति में लगे हुए हैं।
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सोमवार, दिसंबर 14, 2009

जनता मांगे पृथक विदर्भ

विदर्भ बंटवारे के मुद्दे पर मुख्यमंत्री के बयान की हुई आलोचना
संजय
नागपुर। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण द्वारा रविवार को रांची में किए गए पृथक विदर्भ विरोधी बयान की तिखी प्रतिक्रिया हुई है। रविवार को मुख्यमंत्री श्री चव्हाण ने कहा था कि विदर्भ की जनता महाराष्ट्र का बंटवारा नहीं चाहती। राज्य का किसी भी सूरत में बंटवारा नहीं होगा। मुख्यमंत्री के इस बयान से पृथक विदर्भ राज्य की मांग करने वाले जनप्रतिनिधियों और व्यापारी वर्ग ने कड़ी आलोचना की है। वहीं कांग्रेस नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया में मुख्यमंत्री के बयान से अनजान होने की बात कह कर बात टाल दिया लेकिन उन्होंन विदर्भ का पुरजोर समर्थन किया। भाजपा नेता और व्यापारी वर्ग के कई लोगों का कहना है कि मुख्यमंत्री के कथन से यह साबित हो गया है कि उनका ध्यान विदर्भ की जनता की ओर नहीं है, यदि ध्यान होता तो ऐसा बयान नहीं देते।
यही है सही समय
भाजपा विधायक देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि मानते हैं कि विदर्भ राज्य बनाने का सही वक्त आ गया है। इस मुद्दे को ध्यान में लाने के बजाय अब स्वरुप देने की दिशा में पहल करना जरुरी हो गया है। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में अनेक छोटे राज्यों को बनाया गया, छोटे-छोटे राज्य अगर होगे तो समुचे क्षेत्र का विकास मे आसानी हो जाती है। साथ ही हर आम इंसान को इससे न्याय मिल जाता है। बड़े राज्य में कई क्षेत्र विकास से वंचित रह जाते हैं।
अब उपेक्षा का दर्द सहा नहीं जाता
पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने कहा कि विर्दभ राज्य बनाने की दिशा में मैंने अनेक आंदोलन किये। इतने वर्षो में भी विर्दभ का विकास जैसा होना चाहीए था, नहीं हो पाया, मैं तो शुरु से ही अलग विर्दभराज्य बनाने के पक्ष में हूं। आजादी के 50 साल से ज्यादा समय होने के बाद भी विर्दभ का विकास नहीं हो पाया, पश्चिम महाराष्ट्र के नेताओं ने हमेशा ही विदर्भ के साथ सौतेला व्यवहार किया है। विकास कार्य भी उन्हीं के क्षेत्रों में ज्यादा हुए हैं। अब यह दर्द सहा नहीं जाता। अगर विर्दभ का सही मायनों में विकास करना है तो अलग राज्य का गठन अब हो जाना चाहिए।
नेता नहीं आम जनता की मांग
कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रणजीत देशमुख ने कहा कि अलग विर्दभ राज्य बनाने के लिए मैंने अनेक आंदोलन किये। जनता की आवाज केंद्र तक पहुंचाई। आज जनता खुद चाहती है की पृथक विदर्भ का गठन हो। कांग्रेस ही हमें न्याय दे सकती है। मैंने इस मांग के लिए अनेक प्रयास किए हैं। विदर्भ के सभी विधायकों, सांसदों को इसके लिए एक हो जाना चाहिए। विदर्भ राज्य की मांग तो तेलंगाना राज्य की मांग से भी पुरानी है, अब तेलंगाना की तर्ज पर पृथक विर्दभ राज्य की घोषणा भी हो जानी चाहीए, क्योकि अब यह मांग नेताओ की ना होकर आम विर्दभवासी की हो गई है।
पहले ही लिखा जा चुका है केंद्र को पत्र
कांग्रेस विधायक दीनानाथ पडोले भी पृथक विदर्भ के समर्थन में हैं। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि हम सभी कांगे्रसी नेताओ को इसकी पहल शुरु करनी चाहिए। सांसद विलास मुत्तेमवार ने तो केंद्र सरकार को पत्र लिखकर हम विर्दभवासियों की भावनाओं से अवगत भी करवा दिया है। छोटे राज्य बनने से विकास कार्यो में गति आ जाती है। हम हर क्षेत्र का विकास कर सकते हैं। सरकार की सभी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच जाती है। सभी पार्टी के नेताओ ने इस दिशा में एकजूट होकर पहल करनी चाहिए।
जनता मिला रही है सुर-से सुर
भाजपा विधायक सुधाकर देशमुख ने कहा कि पृथक विदर्भ बनाने के बारे में भाजपा ने हमेशा अपनी खुली सोच का परिचय दिया है। हम हमेशा की अलग विदर्भ राज्य बनाने के पक्ष में कहते आये हैं। सही मायनो में विकास होने के लिए पृथक विर्दभ जरुरी हो गया है। इसके लिए व्यापक स्तर पर एक अभियान छेडऩे की आवश्यता है। छोटे राज्यों के गठऩ से ही विकास कार्य पूरे होगे, अब जनता भी विदर्भ राज्य के पक्ष मे सुर मिला रही है।

जनता कर रही है भरपूर समर्थन
विधायक सुनिल केदार ने मानते हैं कि विदर्भ की मांग पुरानी है। अलग राज्य बनाने के लिए इसके पहले भी अनेक आंदोलन किये गए। छोटे राज्य बनाने से हम विकास कार्यो को जल्द ही साकार कर सकते हैं। आम इंसान तक विकास कार्य तेजी से पहुंच जाते हैं। आज विदर्भ के युवा बेरोजगार हैं। उद्योग धंधे नहीं के बराबर है। सभी पार्टियों के नेताओं को इस मुद्दे पर आपसी सहमति बनानी चाहिए। कांग्रेस पार्टी जब अलग तेलंगाना राज्य बना सकती है, तो विर्दभ को भी पृथक विर्दभ राज्य बना सकती है। यह मांग तो काफी पुरानी है, अब जनता भी इसके समर्थन में कुद पड़ी है।
तेलंगाना से पुरानी विदर्भ की मांग
भाजपा के विधायक कृष्णा खोपडे कहते हैं कि विदर्भ को तो वर्षों पहले ही पृथक राज्य का दर्जा दे दिया जाना चाहिए। वर्षों से इसकी मांग जारी है। अब समय आ गया है कि सभी दलों के नेता इसके लिए एकजुट होकर एक मंच पर आएं। विदर्भ की मांग तेलांगना से पहले की है। इसलिए पहले पृथक विदर्भ का प्रस्ताव स्वीकार करना चाहिए। स्वतंत्र विदर्भ के कारण ही विदर्भवासियों को न्याय मिलेगा। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में ही छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड जैसे राज्यों की घोषणा की गयी थी और वहां विकास की रफ्तार तेज हुई।
कांग्रेसी नेताओं ने किए हैं आंदोलन
कांग्रेस के पूर्व विधायक अनीस अहमद कहते हैं कि विदर्भ के अनेक इलाकों में अभी तक विकास नहीं पहुंच पाया है। युवा बेरोजगारी की गर्त में गिरते जा रहे हैं। हम सभी पार्टी के नेताओं को अलग से विदर्भ राज्य बनाने का प्रस्ताव तैयार करना चाहिए। कांग्रेस पार्टी भी विदर्भ राज्य बनाने के बारे में सोच सकती है। मगर इसके लिए हमें और कोशिश करनी पड़ेगी। विदर्भ के अनेक इलाके आज भी विकास कार्यां से कोसों दूर दिखाई देते हैं। पृथक विदर्भ के लिए पहले भी कांग्रेसी नेताओं ने कई आंदोलन किये हैं।

शर्म की बात
चंद्रशेखर बावनकुळे कहते है कि- पृथक विर्दभ राज्य का गठऩ अब हो जाना चाहिए। भाजपा तो इस मुद्दे पर लामबंद हो गई है। हर दिन कोई न कोई किसान मर रहा है। हम उन्हें बचा नहीं पा रहे हैं। पश्चिम महाराष्ट्र के नेता हमसे सौंतेला व्यवहार करते हैं। इतने वर्ष बीत गए मगर हम विर्दभ का ठीक ढंग से विकास नहीं कर पाये, यह हमारे लिए शर्म की बात है।

भाजपा के विधायक एकनाथराव खडसे ने कहा कि हम तो शुरु से ही पृथक विर्दभराज्य बनाने के पक्ष में हंै, अब इसे अमलीजामा पहना दिया जाना चाहिए। भाजपा के शासनकाल में हमने हमेशा छोटे राज्यों के गठऩ में सकारात्मक सोच दिखाई है। छोटे राज्यों में प्रगति और उन्नति जल्दी होती है। आज विर्दभ का किसान भूखमरी की कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है। सरकार द्वारा शुरु की गई योजनाओं का लाभ उसे नहीं मिल पाया है। उसका लगातार शोषण किया जा रहा है, उनके मन में घोर निराशा है। अलग विर्दभ राज्य बनाने से ही सही मायनो में विर्दभवासीयों को न्याय मिल पायगा। अब यह मांग जनता की मांग बन चुकी है।
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व्यापारियों की प्रतिक्रिया

अशोक राव का बयान गलत
व्यापारी हरगोविंद सारडा ने कहा कि मुख्यमंत्री का बयान पूरी तरह से गलत है। अंग्रेशी शासनकाल में नागपुर पहले सी.पी.एंड बेरार की राजधानी थी। तब यहां खूब तरक्की हुई। तबकी हुई तरक्की का आनंद आज लिया जा रहा है। महाराष्ट्र में जुडऩे के कारण विदर्भ क्षेत्र विकास कार्यों से पूरी तरह से उपेक्षित हो गया है। इसलिए यह समय की मांग है कि विदर्भ के समग्र विकास के लिए इस अलग राज्य का दर्जा दिया जाए।
मुख्यमंत्री को जानकारी नहीं
वेद के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश बासवानी ने बताया कि मुख्यमंत्री यदि विदर्भ के विकास की ओर ध्यान देते तो उन्हें ऐसा बयान देने की नौबत नहीं आती। यदि ऐसा विदर्भ की जनता अलग विदर्भ नहीं चाहती है, तो फिर जनता आंदोलन क्यों कर रही है। लगता है मुख्यमंत्री को विदर्भ की जनता के आंदोलन के बारे में जानकारी नहीं है।
कांग्रेस विधायक भी कर रहे है विदर्भ की मांग
नागपुर इतनवारी किराना मार्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष हस्तीमल कटारिया का कहना है कि मुंख्यमंत्री अशोक चव्हाण विदर्भ के पहले से ही खिलाफ रहे हैं। वे भला विदर्भ के पक्ष में बयान क्यों देंगे। इसलिए राज्य से बाहर विरोध में बयान दे रहे हैं। उन्होंने शिवसेना के बयानों को विदर्भ की जनता का आधार बनाकर विरोधी विरोधी बयान दे दिया। स्वतंत्र विदर्भ की मांग तो स्वयं कांग्रेस के विधायक भी कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री को इस मामले में अब शिवसेना के विधायकों का पक्ष अच्छा लगने लगा है।
...तो होगी विदर्भ की चांदी ही चांदी
कपड़ा व्यावसायी अजय कुमार मदान ने कहा कि जिस दिन अलग विदर्भ का अस्तित्व आ जाएगा, विदर्भ की चांदी-ही चांदी होगी। विदर्भ के पास क्या नहीं है? यहां के संसाधनों के दम पर मराठवाड़ा के और राज्य के दूसरे क्षेत्रों का विकास हो रहा है। पृथक विदर्भ होने पर नागपुर राजधानी होगी और एक राजधानी के लिए आवश्यक हर चीज यहां पहले से मौजूद है। मुख्यमंत्री का विदर्भ विरोधी बयान पूरी तरह से गलत है। यही मौका है विदर्भ के जनप्रतिनिधियों को एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए।
नहीं जानते विदर्भ का इतिहास
व्यावसायी निलेश सूचक का कहना है कि मुख्यमंत्री को शायद विदर्भ का इंतिहास नहीं पता है, तभी उन्होंने ऐसा बयान दिया है। स्वतंत्र विदर्भ के पक्ष में जामंतराव धोटे और नासिकराव तिरपुड़े ने वर्षों पहले आंदोलन किया था। वर्तमान में हालत यह है कि विदर्भ में बैकलॉग बढ़ता जा रहा है। यदि अभी के अभी पृथक विदर्भ की घोषणा कर दी जाए तो विदर्भ के पास इतना सामर्थ है कि वह अपने पांव पर मजबूती के साथ खड़ा रहे।

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए महाराष्ट्र सरकार बनाएगी कानून






संजय स्वदेश
नागपुर। चिकित्सकों पर होने वाले हमलों को रोकने के लिए राज्य सरकार के प्रस्तावित विधेयक की तर्ज पर पत्रकार एवं प्रसार माध्यमों पर होने वाले हमले को रोकने के लिए विधानसभा में आर.आर.पाटील ने कानून बनाने का आश्वासन दिया है।
सोमवार को विधानमंडल के दोनों सदनों के कवरेज करने वाले पत्रकारों ने सदन की पे्रस गैलरी में बैठने के बजाय विधानसभा के बाहर काला रिबन लगाकर बैठ गए। अपने मागों के समर्थन में नारे लगाने लगे।
पत्रकारों के धरने को मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, संसदीय कार्यमंत्री हर्षवर्धन पाटील, विपक्ष नेता एकनाथ खड़से, विधानपरिषद सदस्य व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष नितिन गड़करी, मनसे गटनेता बाला नांदगावंकर ने भेंट दी।
विधानसभा का कामकाज शुरू होते ही मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने पुणे के पत्रकार संघ के अध्यक्ष योगेश कुटे पर हुए जानलेवा हमले का निषेध कर मामले पर गंभीरता से जांच कराने का आश्वासन दिया। उन्होंने आश्वासन देते हुए कहा कि डॉक्टरों पर होने वाले हमलों पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार नए कानून बनाने का प्रस्ताव बना रही है। इसी की तर्ज पर पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर रोक लगाने के लिए भी प्रस्ताव बनाने के के बारे में भी सरकार सोच रही है। मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि गत कई वर्षो से सरकार केवल आश्वासन ही दे रही है। ठोस कदम कब उठाएगी? विपक्ष ने इस कानून के प्रस्ताव को शीतसत्र में ही रखने की मांग की।
इस पर गृहमंत्री आर. आर. पाटील ने कहा कि पिछले दिनों
एक चैनल के पर हमले की घटना में सरकार ने उचित कार्रवाई की है लेकिन यह कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसलिए स्वतंत्र बिल लाने की आवश्यकता है। शीतसत्र में यदि तकनीकी कार्रवाई पूरी होती है तो यह प्रस्ताव रखने की हर संभव कोशिश की जाएगी।
योगेश कुटे के मामले में सरकार का पक्ष न्यायालय में रखने के लिए एड. एस. के. जैन को नियुक्त करने की पत्रकारों की मांग को विपक्ष में सदन में उठाकर समर्थन किया। इसे गृहमंत्री आर.आर.पाटील ने स्वीकार किया और हमलों की जांच के लिए गठीत कमेटी के कार्यो पर विशेष ध्यान देने का आश्वासन दिया।

रविवार, दिसंबर 13, 2009

आईएमआई का खेल हो गया फेल


संजय स्वदेश

एक दिसंबर से नकली ईएमआई नंबर के कारण भले ही लाखों चीनी मोबाइल खामोश हो गए हों, लेकिन इसके बाद भी लोगों को भ्रम इसके आकर्षण के प्रति नहीं टूटा है। हालांकि एक दिसंबर के देश भर में लाखों चीनी मोबाइल धारकों को हैंडसेट बंद हो गया। लेकिन इस बाद भी मोबाइल रिपेयर करने वालों ने किसी न किसी तरह का जुगाड़ अपना कर इसे फिर चालू कर दिया है। रहस्यम तकनीक के कारण देशभर के बाजार में अभी भी चाइना मोबाइल फोन के हैंडसेट धडल्ले से बगैर बिल और गारंटी के बिक रहे हैं। चीनी हैंडसेटों की ब्रिकी कानूनी है या गैर-कानूनी इस बारे में न पुलिस के पास कोई जवाब है और न ही कस्टम विभाग और चुंगी विभाग कुछ स्पष्टï कहते हैं। कस्टम विभाग का कहना है कि आयातित मोबाइल के संबंध में कोई मानक नहीं है। कोई भी उत्पादक पांच प्रतिशत की कस्टम ड्यूटी देकर हैंडसेट देश के अंदर निर्यात कर सकता है। तो वहीं चुंगी विभाग का कहना है कि जब जानकारी मिलती है, तो छापा मारने की कार्रवाई होती है। किसी भी शहर में ट्रांसपोर्ट के जरिये इलेक्ट्रॉनिक आइटम जो कुछ भी आता है, उसकी बिल्टी व बिल देखकर तीन प्रतिशत चुंगी कर लगाई जाती है। पर चीनी हैंडसेट के डिलर सारा काम चोरी-छिपे करते हैं। चोरी-छिपे होने वाले इस कारोबार से विभाग चुंगी कर कैसे वसूल सकता है? इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। वहीं बिना बिल के बिकने वाले इन हैंडसेट से सरकार को लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है। बिक्री कर विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि चाइनामेड हैंड सेटों के बारे में संपूर्ण जानकारी जुटा रहा है कि ये कहां से कैसे आते हैं और नागपुर में इसका व्यवसाय कैसे संचालित हो रहा है? रिपोर्ट तैयारी होने के बाद जल्दी ही इसके विरुद्ध एक अभियान के तहत छापामार कार्रवाई की योजना है।
आईएमआई नंबर का खेल
मजे की बात यह है कि इन हैंडसेट के आईएमआई यानी इंटरनेशन मोबाइल इक्विपमेंट आईडेटिटी नंबर प्रमाणिक हैं कि नहीं, इसकी गारंटी देने वाला कोई नहीं है। हालांकि कई चाइनिज हैंडसेटों पर ये नंबर अंकित होते हैं, वे असली होते हैं या नकली? इसका जवाब दुकानदारों के पास नहीं है? जब कोई मोबाइल बिकता है, तो दुकानदार इसी आईएमआई नंबर को बिल में लिखता है। मोबाइल खोने से इसी नंबर से यह जानने की कोशिश की जाती है कि वह हैंडसेट कहां है? विभिन्न आपराधिक घटनाओं में पुलिस दोषियों के मोबाइल के इन्हीं नंबरों से ट्रैस करने की कोशिश करती है। जानकार यह भी कहते हैं कि आईएमआई नंबर गलत होने से ऐसे हैंडसेटï्स के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। सूत्रों का कहना है कि एक दिसंबर के बाद हजारों की संख्या में चाइनिज मोबइल के बंद होने के बाद एक गिरोह ऐसा सक्रिय हो गया है जो पुराने बंद हो चुके मोबाइल के ईएमआई नंबर का इसमें उपयोग कर रहे हैं। सीताबर्डी स्थित इलेक्ट्रिॉनिक बाजार में चाइनिज मोबाइल के रिपेयर करने का दावा कई दुकानदार कर रहे हैं। अब ये फर्जी ईएमआई नंबर के कारण बंद पड़े हैंडसेट को फिर से चालू करने का भी दावा कर रहे हैं।
निर्माता और ग्राहक कौन?
बाजार में धड़ल्ले से बिकने वाले इन हैंडसेटों का असली निर्माता कौन है, इसे ग्राहक जानने की कोशिश नहीं करते हैं। विक्रेता यह बताने को तैयार नहीं कि उनके पास ये माल कहां से आता है? वे बस इतना ही कहते हैं कि डीलर दुकान में खुद दे जाते हैं। डिलर कौन है? इसकी भी कोई जानकारी नहीं है। बिना ब्रांड वाले ऐसे हैंडसेटों के बारे में दुकानदार यह दावा करते हैं कि कम कीमत में महंगे हैंडसेटों की सुविधा मिलेगी। प्रयोग में लाने वाले उपभोक्ता की यह आम शिकायत होती है कि उसके कई फंक्शन बाद में उपयोगी नहीं रहे। इसके खरीदारों में वैसे लोगों की संख्या ज्यादा है, जो ऐसे हैंडसेटों के दुष्परिणों को नहीं जानते हैं। इसके अतिरिक्त इसके खरीदारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो अधिक सुविधाओं वाला हैंडसेट उपयोग करना चाहता है, पर बजट कम होता है। लिहाजा वे कम कीमत में चाइना मेड हैंडसेट खरीदने से नहीं चूकते। मजे की बात यह है कि दुकानदार भी ऐसे हैंडसेटों को बेचने में ज्यादा उत्साहित हैं। क्योंकि सस्ते होने से इसके ग्राहक ज्याद हैं और इस पर मुनाफा का प्रतिशत ज्यादा है। वहीं ब्रांडेड कंपनियों के हैंडसेट में मुनाफा का प्रतिशत कम है।
ाइनिज मोबाइल का सारा कारोबार ग्रे मार्केट में हो रहा है। खरीदार यह जानने की कोशिश नहीं कर रहे हैं कि इतने सारे फीचर्स वाले चाइनिज हैंडसेट इतने सस्ते क्यों है? गुणवत्ता की दृष्टिï से ये कितने प्रमाणिक और सुरक्षित हंै, इसकी कोई खैर-खबर लेने वाला नहीं है। सस्ते में ब्रांडेड कंपनियों की महंगी सुविधा युक्त हैंडसेट के बाराबर फीचर उपलब्ध कराने वाले चायनिज हैंडसेट बिना बिल के बिक रहे हैं। इसकी न कोई गारंटी है और न ही खरीदने के बाद इसमें दोष आने पर सर्विस सेंटर आदि की सुविधा है। जानकारों का कहना है कि हर माह नेपाल आदि सीमावर्ती क्षेत्रों से गैर-कानूनी तरीके से करीब 6 लाख चाइनिज हैंडसेटï्स का आयात कर दिल्ली लाया जाता है और फिर वहीं से देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसे भेजा जा रहा है।
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शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

मेलघाट में मौत का मंजर : सरकार ने कहा सीआडी करेगी जांच


संजय स्वदेश
महाराष्ट्र का अमरावती जिले का मेलघाट है। सतपुड़ा पर्वतमाला की पश्चिमी वादियों में मेलघाट देश भर में कोरकू जनजाति और टाइगर रिजर्व के लिए प्रसिद्ध है। पर कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में कुपोषण की काली छाया पड़ गई है।
लिहाजा, यहां मौत का मंजर दिखता है। कुपोषण से नन्हे शिशुओं की मौत की कीमत पर यहां का स्वास्थ्य महकमा मौज कर रहा है। हर साल मरने वाले सैकड़ों शिशुओं की मौत जिम्मेदारी किसकी है? इसका को कोई सवाल उठाता है और न ही जवाब देने वाला है। जब जब कुपोषण से मासूम शिशुओं के अकाल मौत के गाल में समाने की खबरे मीडिया में आई तो सरकारी महकमा। थोड़ी-देर के लिए सचेत हो जाता है। पौष्टिक व अन्य दवाओं के वितरण का दावा किया जाता है। सरकार के स्थानीय स्वास्थ्य कार्यों के आंकड़ों जारी होते हैं। पर परिणाम सकारात्मक नहीं निकलता है। पिछले साल सरकार ने कुपोषण से होने वाली बाल मृत्य दर को रोकने और प्रसव के दौरान आवश्यक उपकरणों के लिए खरीदने के लिए डिस्पोजेबल डिलेव्हरी किट्स में का प्रस्ताव मंजूर किया। पर सामग्री खरीदने के जिम्मेदार सरकारीकर्मी कम कीमत और हल्की क्वालिटी के किट्स खरीदकर करोड़ों डकार गए। इसे साबित करने के लिए किसी दस्ताबेज की जरूरत नहीं है। नागपुर में चल रहे राज्य विधानमंडल के शीतसत्र में शुक्रवार को राज्य के लोक स्वास्थ व परिवार कल्याण मंत्री सुरेश शेट्टी ने यह स्वीकार किया कि सामग्री खरीदने में अनियमितता हुई है। खरीदे गए उपकरणों की क्वालिटी से वे स्वयं संतुष्ठ नहीं हैं। लिहाजा, इस मामले में सीआईडी से जांच कराने की घोषणा कर दी। तो गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने जांच की जिम्मेदारी डीआईजी स्तर के अधिकारी को देने की घोषणा कर दी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए गृहमंत्री ने झटपट यह भी घोषणा कर दी कि सीआईडी इस रिपोर्ट को अगले अधिवेशन से पूर्व तक सरकार को सौंप देगी। स्वास्थ्य मंत्री ने सदन को आश्वान दिया कि जांच रिपोर्ट में दोषियों पर तुरंत कार्यवाई करते हुए उन्हें निलंबित किया जाएगा। मामला यही रफा-दफा हो गया। पर इस क्षेत्र में चालू वित्तिय वर्ष से अक्टूबर तक मेलघाट 349 बच्चे कुपोषण के कारण काल की भेंट चढ़ गए। जब कि इन बच्चों को बचाने के लिए सरकार ने महंगे दामों पर 25 हजार किट्स खरीदे थे।
बॉक्स में
वर्ष 2007-08 के दौरान 3 और 4 श्रेणी के कुल 727 बच्चे के कुपोषण से ग्रस्त होने के मामले प्रकाश में आए थे। इसमें 467 बच्चे मरे। वर्ष 2008-09 में इस श्रेणी के कुल 578 बच्चे कुपोषित हुए, जिसमें से 467 बच्चों की मौत हुई। वर्तमान वित्तिय वर्ष में अक्टूबर तक कुल 587 बच्चों के कुपोषित होने के मामले प्रकाश में आए हैं, जिसमें 349 बच्चे मौत के मुंह में समा गए।

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टाईगर रिजर्ब की हकीकत का खुलासा करने वाली विस्फोट डॉट कॉम पर शिरीष खरे का एक आलेख गत वर्ष 19 दिसंबर का प्रकाशित हुआ था। पर टाईगर रिजर्ब क्षेत्र की एक हकीकत की जानकारी हुई थी। http://www.visfot.com/index.php/jan_jeevan/575.html

छुटती नहीं काफीर, ये मुंह को लगी है...



संजय स्वदेश

नागपुर। पिछले दिनों महाराष्ट्र सरकार ने अनाज से शराब उत्पादन की नीति घोषित की। सरकार ने कहा कि अनाज से शराब बनाई जाएगी। नागपुर में जारी राज्य विधानमंडल के शीतसत्र में इसको लेकर काफी हो- हल्ला हुआ। विपक्ष ने कहा कि जब जनता के लिए खाने का अनाज नहीं है, फिर शराब क्यों? सरकार का तर्क था कि सड़े ही अनाज से शराब बनाएंगे। फिर विपक्ष बरसी। पूछा सरकार ऐसी लापरवाही ही क्यों करें कि अनजा सड़े। सूत्र कहते हैं कि निजी शराब कंपनियों ने सरकार को मोटी रकम खिलाकर अनाज से शराब बनाने का लाईसेंस लिया। महाराष्ट्र में झुनका भाकर गरीबों में बहुत लोकप्रिय है। झुनका ज्वारी की रोटी होती है। भाकर बेशन होता है। स्थिति यह है कि बहुसंख्य गरीब जनता को सबसे सस्ता अनाज ज्वारी भी नसीब नहीं होती है कि उसका झुनका बनाएं। अनाज से शराब बनाने के पीछे गरीबों के हिस्से के इसी झुनके को हड़पना था। गरीबों के हिस्से का अनाज सस्ते में लुटों की नीति। इससे बनी शराब अमीर पीते। गरीब भले ही ज्वारी से बने रोटी नहीं खाता। पर गरीबी के गम में यह उसके हिस्से के अनाज से बनी महंगी शराब का गटकता।
जो भी अनाज हर इंसान की बुनियादी जरूरत है। इस पर शराब उत्पादक कंपनियों की काली नजर से बचाना बेहद जरूरी है। भारी विरोध के बाद अब सरकार इसी नीति पर फिर से विचार करने का आश्वासन दिया है। हालांकि इसके लिए राज्य में 23 कंपनियों को लाइसेंस जारी किया गया है। गृहमंत्री आर.आर. पाटील ने इसके लिए पहले से जारी लाइसेंस पर भी विचार करने का आश्वासन दिया है। ध्यान रहें, अनाज से शराब नहीं बनाने का आश्वासन दिया है। जारी लाइसेंस पर विचार करने की बात कहीं है। इस पर ठोस निर्णय नहीं लिया। मामला साफ है। सरकार शराब कंपनियों के भारी दवाब में है। इस कंपनियों से इससे मतलब नहीं है कि शराब बनाने के लिए अनाज किसके हिस्से से आएगा।
शिवसेना की विधायक निलक गोरे ने विधान परिषद में आनाज से शराब उत्पादन की सरकारी नीति के विरोध में कहा कि अनाज खाने की प्राथमिक वस्तु हैं। राज्य के एक ओर जहां अनाज की कमी के कारण किसान आत्महत्या कर रहें हैं, वहीं सरकार अनाज से शराब बनाने की बात कह रही है। अनाज से शराब उत्पादन की नीति से अनाज की कलाबाजारी बढ़ जाएगी। श्रीमती गोरे के सवाल पर राज्य के राजस्व मंत्री नारायण राणे ने भी समर्थन करते हुए कहा कि अनाज खाने के लिए है न की शराब बनाने के लिए। लिहाजा अगली बार इसके लिए लाइसेन्स जारी नहीं होंगे। पर मंत्री महोदय नहीं सोचते,जो लाईसेंस पहले ही जारी हो गए, उसका क्या? राज्य में 23 कंपनियों को लाईसेंस दिए जा चुके हैं। आगे नहीं भी दिए जाएं तो फर्क पड़ता है। गरीबों के हक का अनाज को मय के द्वारा हलक में उतारने के लिए 23 कंपनियां पर्याप्त हैं।
विपक्ष के विरोध का श्री राणे के समर्थन के पीछे मजबूरी है। शीतसत्र के शुरूआत में ही यह कह कर विवाद में आए थे कि विदर्भ कि किसान शराब पीकर आत्महत्या करते हैं। इस पर विपक्ष समेत प्रबुद्ध लोगों ने नारायण राणे को कटघरे में शामिल किया। घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने। कर्ज में फंसे किसान को दारू पीने के लिए भला कौन कर्ज देता है। राणे को लगा कि उन्होंने गलत वक्तव्य दे दिया है तो विपक्ष के पाले में एक टूट कह दिया-अनाज खाने के लिए है शराब के लिए नहीं।
गृहमंत्री आर.आर. पाटील रानीति के पुरोधा हैं। जानते हैं थोड़े दिनों बाद जनता इस मुदद् को भूल जाएग। जनता को भरमाने के लिए विधानपरिषद को आश्वासन देते हुए कहा कि इस मामले पर मुंख्यमंत्री अशोक चव्हाण से भी चर्चा हुई है। कुछ अनाज खाने के लिए नहीं होते हैं, लेकिन उसे पशुओं के आहार में उपयोग लाया जाता है। अब सरकार केवल उन अनाज से शराब बनाने की अनुमति देगी, जो एकदम निम्म कोटी के हैं और उसे पशु भी नहीं खाते हैं। श्री पाटील की यह सफाई भी विचार के लायक है। जरा सोचिए जो अनाज पशु भी नहीं खाएंगे, उससे शराब बनेगा। क्या वह सड़ा अनाज जहर नहीं होगा? पर इसे सरकार क्यों सोचेगी। गालिब ने कहा है - छुटती नहीं काफीर, ये मुंह को लगी है। जब नागपुर में सत्र खत्म होता है, विधायक निवास की सफाई के दौरान अधिकतर कमरे से दारू की बोतल ही निकलती हैं।

मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

एचआईवी एड्स का सच और सवाल


सुरक्षित यौन सम्बन्धों के लिए कण्डोम का प्रयोग करें। नैतिक शिक्षा का ये नारा खालिस कारोबारी है। पूरे अभियान की आक्रामकता की ताकत भी कारोबार ही है। नैतिक रूख में अगर जरा सी तब्दीली करने की हिम्मत सरकार दिखाये तो दूसरी बीमारियों से मरने वाले हर साल लाखो लोग बच सकते हैं।

संजय स्वदेश
दिसंबर शुरू हुआ। एड्स दिवस और सप्ताह की धूम शुरू हो गई। हर ओर प्रचार अभियान की धूम है। जॉच के लिए विशेष कैंप आयोजित हो रहे हैं। पर जितना हो हल्ला एड्स को लेकर किया जाता रहा है, ऐसा प्रभावशाली अभियान उन दूसरी बीमारियों के खिलाफ नहीं है, जिससे हर साल लाखों लोग मरते हैं। इन बीमारियों से मरने वाले लागों की संया एड्स से मरने वाले लोगों से कई गुना ज्यादा है। टी.वी. कैंसर, हैजा, मलेरिया आदि बीमारियां से आज भी करोड़ों लोग मर रहे है।
करीब तीन दशक जब अमेरिका में एचआईवी या एड्स का पहला मामला दर्ज हुआ था, तब पूरी दुनिया में इस नई बीमारी से तहलका मच गया था। हर देश इसे रोकने के लिए ऐसे अभियान में जुट गया जैसे कोई महामारी फैल रही हो। महामारी रोकने सरीके अभियान आज भी चल रहे हैं। करोड़ों रूपये आज भी खर्च हो रहे है। पर अभी तक न इसकी कारगर दवा खोजी जा सकी और न टीका। एड्स निर्मूलन अभियान में भारत समेत दूसरे पिछड़े और गरीब देशों में पहले से व्याप्त दूसरी गंभीर बीमारियों के प्रति सरकार की गंभीरता हल्की पड़ गई। पिछले साल ही स्वस्थ्य मंत्री अबुमणि रामदौस ने लोकसभा को बताया था कि 1986 से लेकर तब तक 10170 लोगों की मौत एड्स से हुई। उनके बयान के आधार पर औसतन हर साल 500 लोग मर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर हर साल साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग क्षय रोग के समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। अकाल काल के गाल में सामने वाले कैंसर रोगी भी कमोबेश इतने ही हैं। 2005-06 में एड्स नियंत्रण पर 533 करोड़ खर्च हुए जबकि क्षय रोग उन्मूलन पर 186 करोड़, कैंसर नियंत्रण पर 69 करोड़। आखिर अभियान के पीछे छिपने वाली इस खौफनाक हकीकत के असली चेहरे को सरकार क्यों नहीं पहचान पा रही है?
एक विचार करने वाली बात यह भी है कि जब एड्स निर्मूलन अभियान शुरू हुए थे। तब से ही कई प्रसिद्ध चिकित्सों व वैज्ञानिकों ने इसे खारिज किया। आरोप लगा कि एचआईवी एड्स की आड़ में कंडोम बनाने वाली कंपनियां भारी लाभ कमाने के लिए अभियान को हवा दे रही है। पर आरोपियों की आवाज एड्स के इस अभियान में गुम है। अभियान के शुरूआती दिनों में ही प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक कैरी मुलिस ने अभियान पर सवाल खड़ा किया था। संदेह जताने वाले कैरी मुलिस वही जैव रसायन वैज्ञानिक हैं जिन्हें 1993 का नोबेल पुरस्कार मिला। पालिमरेज चेन रिए क्सन तकनीक के विकास का श्रेय इन्हें ही हैं। इसी तकनीक का इस्तेमाल कर वायरस परीक्षण होता है। अमेरिकी पत्रिका पेंट हाऊस के सितंबर 1998 अंक में अपने प्रकाशित प्रकाशित लेख में बड़े ही तािर्कक तरीके से एड्स की अवधारणा को खंडित किया था। इनके अलावा भी दुनिया के कई बड़े वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि मानव सयता के हर कालखंड में किसी न किसी रूप में एड्स जैसी खतरनाक स्वास्थ्य स्थिति का खौफ रहा है। चरक संहिता में एड्स से मिलती-जुलती स्थिति होने का उल्लेख भी मिलता है। वैज्ञानिक दावा करते है कि एड्स अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। यह शरीर की ऐसी स्थिति है जिसे मनुष्य की रोग प्रतिरोध क्षमता नष्ट हो जाती है और वह धीरे-धीरे मौत की ओर अग्रसर हो जाता है।
हालांकि एड्स की स्थिति निश्चय ही गंभीर है। रोकथाम के लिए अभियान चलाया ही जाना चाहिए। मजे की बात यह है कि एड्स नियंत्रण अभियान जितने पैमाने पर चलाया जा रहा है, उस पैमाने पर एचआईवी एड्स पीडि़तों की संया नहीं है। समय-समय पर जारी होने वाले एचआईवी एड्स से ग्रस्त लोगों की संख्या में हमेशा संदिग्ध रही है। किसी साल कहां गया कि भारत एड्स की राजधानी बन रही है। तो कभी रिपोर्ट आई कि यहां एड्स प्रभावित लोगों की संया में कमी आई है। यह किसी मजेदार पहेली से कम नहीं है। एड्स और एचआईवी दोनों अलग-अलग धारणा है। प्रभावित व्यक्ति शायद ही समाज में कभी नजर आए। पर प्रचार इतना हो चुका है कि आज छोटे-छोटे बच्चों के जेहन में जनसंचार माध्यमों ने एड्स की जानकारी डाल दी है। मासूम नन्हें-मुन्ने भी जानने लगे हैं कि सुरक्षित यौन-संबंध के लिए कंडोम जरूरी है। यह स्वाभाविक भी है। जब देश-विदेश की दवा कंपनियों से लेकर हजारों उनजीओ इसके प्रचार-प्रसार में जुटे हो तो इतनी सफलता अपेक्षित है। एक तरह से कहें तो कम समय में इसके बारे में इतना प्रचार हो चुका है जितना की दूसरी बीमारियों के बारे में जागरूकता होनी चाहिए।
अभी भी केंद्र सरकार एड्स नियंत्रण पर हर साल करोड़ रूपये का बजट तय कर रही है। राज्य सरकार का बजट अलग होता है। विदेशी अनुदान भी अतिरिक्त है। बजट की भारी-भरकम राशि ने जनहीत के दूसरे कार्यो में लगे गैर-सरकारी संस्थाओं के मन में लालच भर दिया। जितना जल्दी एड्स विरोधी कार्यक्रम चलाने के लिए अनुदान मिल जाता है, उतना दूसरे कार्यों के लिए नहीं। लिहाजा, कई संस्थानों ने जनहित में जारी दूसरी परियोजनाओं को छोड़ कर एड्स अभियान का दामन पकड़ लिया है, जितने रूपये अभियान चलाने के लिए जितनी राशि एनजीओ को मिले, उतनी कम राशि खर्च करके उन लाखों गर्भवती माताओं को बचाया जा सकता हैं, जिन्हें समुचित इलाज की सुविधा नहीं मिल पाती है। डायरिया से ग्रस्त करीब 90 प्रतिशत महिलाओं भी अकाल काल के गाल में सामने से रोका जा सकता है। इतनी भारी भरकम राशि का अगर एक हिस्सा भी ईमानदारी से कुपोषित महिलाओं और बच्चों पर खर्च होता तो एक आज एक ऐसी नई सेहतमंद पीढ़ी जवान होती जो एड्स के खतरे से पहले ही सावधान रहती। पर एड्स नियंत्रण अभियान का जादू कुछ ऐसा छा गया है जिसने देश की बहुसंख्यक आबादी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है जिससे दूसरी जनस्वास्थ्य की दूसरी सुविधाओं को बेहतर तरीके से उपलब्ध कराने के अभियान पीछे छूट चुके हैं।
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मराठी भाषा में

एचआयव्ही एड्स : सत्य आणि समस्या

सुरक्षित यौन संबंधांसाठी कण्डोमचा उपयोग करावा. नैतिक शिक्षणाची ही घोषणा फक्त व्यवहारी आहे. या अभियानाची आक्रमकता, ताकद पण व्यवहारी आहे. सरकारने नैतिकतेकडे बघण्याचा दृष्टिकोन बदलला तर इतर रोगांंनी दर वर्षी मरणाऱ्या लाखो लोकांचा जीव वाचू शकतो.

संजय स्वदेश

डिसेंबर सुरू झाला आहे. एड्स दिवस आणि सप्ताहची सर्वत्र धूम आहे. सगळीकडे प्रचार अभियान सुरू आहेत. तपासणीसाठी विशेष कॅम्प आयोजित केले जात आहेत. परंतु जितकी जागृती एड्सच्या संदर्भात केली जात आहे तेवढे प्रभावशाली अभियान अन्य रोगांसंदर्भात केले जात नाही. खरं तर अन्य रोगांमुळे मरणाऱ्यांचे प्रमाण जास्त आहे. दर वर्षी एड्स व्यतिरिक्त अन्य रोगांमुळे सात लाख लोक मरतात. क्षय रोग, कॅन्सर, मलेरिया आदी रोगांमुळे आजही करोडो लोक मरतात.
तीन दशकांपूर्वी अमेरिकेत एचआयव्ही एड्सचे पहिले प्रकरण दाखल केले गेले होते. तेव्हा संपूर्ण जगात या रोगाने हंगामा केला होता. प्रत्येक देश यास रोखण्यासाठी अभियान राबवायला लागला. जशी कोणती महामारी पसरत आहे. यास थांबण्यासाठी आज पण अभियान राबवले जात आहेत. करोडो रुपये आजही खर्च केले जात आहेत. आतापर्यंत या रोगाचा मुळापासून नायलाट करणारे औषध सापडलेले नाही. एड्स निर्मूलन अभियानात आघाडीवर असलेल्या भारतसह दुसऱ्या मागास आणि गरीब देशांत पहिलेपासून असलेल्या गंभीर रोगाकडे सरकार गांभीरतेने लक्ष देत नाही. मागील वर्षी आरोग्यमंत्री अबुमणी रामदोस यांनी लोकसभेत सांगितले की, १९८६ पासून आतापर्यंत १०१७० लोक एड्समुळे मरण पावले. त्यांच्या म्हणण्यानुसार, दर वर्षी ५०० लोक या रोगाने मरतात. तर दुसरीकडे दर वर्षी साडेतीन लाखापेक्षा अधिक लोक क्षय रोगावर योग्य उपचार न झाल्याने मरतात. कॅन्सरने मरणाऱ्यांचे प्रमाणही असेच आहे. २००५-०६ मध्ये एड्स नियंत्रणावर ५३३ कोटी रुपये खर्च झाले जेव्हा की क्षय रोग उन्मूलनावर १८६ कोटी, कॅन्सरच्या नियंत्रणावर ६९ कोटी खर्च झाले आहे. या अभियानामागे लपलेला हा भयानक चेहरा सरकार ओळखू का शकत नाही?

एक विचार करायला भाग पाडणारी गोष्ट अशीही आहे की, एड्स निर्मूलन अभियान सुरू झाले तेव्हा अनेक प्रसिद्ध डॉक्टरांनी आणि वैज्ञानिकांनीही त्यास विरोध करण्याचा प्रयत्न केला होता. एचआयव्ही एड्सच्या नावावर कण्डोम उत्पादक कंपन्या मोठ्या प्रमाणात लाभ मिळविण्यासाठी अभियानाला प्रोत्साहन देत आहे असा आरोपही केला जात होता. परंतु, आरोप करणाऱ्यांचा आवाज एड्सच्या या अभियानात दबून गेला. अभियानच्या सुरुवातीलाच प्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक कैरी मुलिस यांनी अभियानावर प्रश्न उपस्थित केला होता. शंका उपस्थित करणारे जैव रसायन वैज्ञानिक कैरी मुलिस यांना १९९३ चा नोबेल पुरस्कार मिळाला आहे. पालिमरेज चेन रिअॅक्सन पद्धतीच्या विकासाचे श्रेय त्यांनाच जाते. या पद्धतीचा वापर करून व्हायरस परीक्षण होत आहे. कैरी मुलिस यांनी अमेरिकी पत्रिका 'पेंट हाऊसÓच्या सप्टेंबर १९९८ च्या अंकात प्रकाशित लेखात तांत्रिक कारणं देऊन एड्सच्या प्रसाराचे खंडन केले होते. याव्यतिरिक्त जगातील अनेक मोठ्या वैज्ञानिकांनी हे स्वीकारले होते की मानव प्रत्येक कालखंडात कोणत्या न कोणत्या रूपात एड्ससारख्या भयानक रोगाची भीती कायम राहते. चरक चिकित्सेत एड्सशी मिळत्या-जुळत्या रोगाचा उल्लेख सापडतो. वैज्ञानिकांचा दावा आहे की एड्स हा काही रोग नाही. ही शरीराची अशी अवस्था आहे ज्यात मनुष्याची रोगप्रतिकारशक्ती नष्ट होते आणि तो हळूहळू मरणाकडे सरकत जातो.
खरं तर एड्स ही अवस्था गंभीर आहे. एड्सवर नियंत्रणासाठी अभियान चलावायलाच पाहिजे. गमतीची गोष्ट ही आहे की एड्स नियंत्रण अभियान ज्या प्रमाणात राबविले जात आहे त्या प्रमाणात एचआयव्ही एड्सग्रस्तांची संख्या नाही. वेळोवेळी जाहीर होणारी एचआयव्ही एड्सग्रस्तांची संख्याही नेहमी संदिग्ध राहिली आहे. कोणत्या वर्षी सांगितले गेले की भारत एड्सची राजधानी होत आहे, तर कधी सांगितले जाते की येथे एड्सने प्रभावित लोकांची संख्या कमी आहे. हे एखाद्या गमतीदार कोड्यापेक्षा कमी नाही. एड्स आणि एचआयव्ही दोन्ही वेगवेगळे आहे. प्रभावित व्यक्ती कदाचित दृष्टीस पडते. परंतु, प्रचार इतका झाला आहे की आज लहान मुलांच्या डोक्यातही जनसंचार माध्यमांनी एड्सची माहिती टाकली आहे. मासूम लहान-लहान बाळांनाही माहिती झाले आहे की सुरक्षित यौन-संबंधासाठी कंडोम जरूरी आहे. हेही स्वाभाविक आहे जेव्हा देश-विदेशातील औषध कंपन्या याच्या प्रचार-प्रसारात गुंतल्या आहेत तर हे यश अपेक्षित आहेच. एक प्रकारे म्हटले तर कमी वेळात एड्सबद्दल इतका प्रचार झाला आहे जो अन्य दुसऱ्या आजारांबद्दल जागरूकता निर्माण करण्यासाठी व्हायला पाहिजे.
आताही केंद्र सरकार एड्स नियंत्रणावर दर वर्षी करोडो रुपये अर्थसंकल्पात दाखवीत असते. राज्य सरकारचा खर्च वेगळा होत आहे. अतिरिक्त विदेशी अनुदान पण मिळत असते. अर्थसंकल्पात दाखविलेल्या भक्कम राशीमुळे समाजसेवी गैरसरकारी संस्थांच्या मनात लालूच निर्माण झाली आहे. जितक्या लवकर एड्स विरोधी कार्यक्रम राबविण्यासाठी मिळते तितक्या लवकर इतर दुसऱ्या कोणत्याही कार्यक्रमाकरिता मिळत नाही. त्यामुळे अनेक संस्थांनी समाजहिताच्या दुसऱ्या योजना सोडून एड्स अभियान राबविणे सुरू केले आहे. जितकी राशी अभियान राबविण्यासाठी खर्च केली जाते तितक्याच राशीत त्या लाखो गर्भवती महिलांना वाचविले जाऊ शकते ज्यांना आवश्यक उपचार आणि सुविधा मिळत नाही. डायरियाग्रस्त जवळपास ९० टक्के महिलांना सुविधा पुरवून मरणाच्या दाढेतून वाचविले जावू शकते. इतक्या मोठ्या रकमेचा एक भागही प्रामाणिकपणे कुपोषित महिला आणि मुलांवर खर्च केला असता तर आज एक अशी नवीन स्वस्थ तरुण पिढी तयार झाली असती जी एड्सचा सामना करायला आधीच तयार असती. परंतु, एड्स नियंत्रण अभियानाने देशातील बहुसंख्यजनतेचे लक्ष्य अशा पद्धतीने आपल्याकडे केले आहे की अन्य जनआरोग्याच्या सुविधा उपलब्ध करून देण्याचे अभियान मागे पडले आहेत.