बुधवार, फ़रवरी 10, 2010

‘मोरा गोरा अंग लेई ले....’।

जय भगवान गुप्त ‘राकेश’

भारत के लोग भी अजीब हैं। बैठे-ठाले चलती गाड़ी में अड़ंगा लगाने का अजीब शौक पाले हुए हैं और इसी के चलते दूसरों की उन्नति, प्रगति और नेक-नामी से कुढ़ते हुए कुछ न कुछ नया शोशा खड़ा करते रहते हैं। ‘स्लमडाॅग मिलेनियर’ फिल्म में जब रहमान और गुलजार को दो आॅस्कर अवार्डों से नवाजा गया तो पहले तो यह कहा गया कि गायक सुखविंदर को कुछ नहीं मिला और उसके लिए जिम्मेवारी रहमान पर डाली गई, बाद में एक और गीत को लेकर हमारी फिल्मों के सुनहरे युग के संगीतकार रवि जी ने अपनी पुरानी फिल्म ‘नरसी भगत’ का नाम लेकर एक गीत ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अंखियां प्यासी रे’ के लिए दो करोड़ रुपए का दावा ठोक दिया।
अब देखिये बैठे-बिठाये ना आजकल रवि जी कहीं सक्रिय दिखाई देते हैं और न ही किसी चोपड़ा की फिल्म में संगीत संयोजन कर रहे हैं फिर भी उनकी आदतें नहीं जाती और 50 साल पुरानी फिल्म के लिए अपने गीत को सीने से लगाए हुए हैं और उसका मुआवजा मांग रहे हैं, वो भी दो करोड़ रुपए। अब कौन समझाये कि भई जब फिल्म बनी थी और आप ने संगीत दिया था तो उसका महेनताना तो ले चुके। अब एक तो रहमान साहब ने आपके गीत को पुनः लोकप्रिय बनाया, लोगों को याद दिलाया कि हमारे यहां ऐसे-ऐसे महान संगीतकार थे जिनके गीत पचास साल बाद भी दोहराए जा रहे हैं और आप हैं कि एहसान मानने की बजाय मुआवजा मांगने लग गए।
अब एक और नया किस्सा शुरू हो गया है। अब जनाब अपनी शायरी में नए-नए प्रयोग करने के लिए मशहूर जनाब गुलजार साहब पर ही निशाना साध दिया गया है, वह भी एक हिन्दी स्थापित एवं प्रतिष्ठित कवि स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की पुत्री उभा सक्सेना द्वारा कि गुलजार द्वारा फिल्म ‘इश्किया’ का अपना बताया जा रहा गीत ‘इब्न-ए-बतूता’ वास्तव में उनके पिताश्री द्वारा रचित कविता है।
अब बताइये यह भी कोई बात हुई। अब गुलजार साहब इतने बड़े साहित्यकार हैं और किताबों के लगातार अध्ययन में व्यस्त रहते हैं। कहीं पढ़ ली होंगी सक्सेना जी की लाइनें और संगीतकार के साथ गीत लिखते वक्त ‘इब्न-ए-बतूता’ फिट बैठ गया होगा तो हो गया गीत तैयार और गाया गया। अब बताइये इसमें चोरी कहां से आ गई। अभी तक सबसे ज्यादा इस तरह के आरोपों को झेल रहे जनाब संगीतकार अनु मलिक जी अक्सर कहते हैं कि सुर तो सात ही हैं, मुझे अगर आप चोर मानते हैं तो पहले वालों ने भी तो कहीं से लिए ही होंगे इसी तरह के तर्क के आधार पर कहा जा सकता है कि हिन्दी में वर्ण तो 46 ही हैं, आखिर सक्सेना जी ने भी कभी तो कविता को जोड़ा ही होगा। और अब पचास साल होने को आए तो कभी तो रायल्टी का हक खत्म होता होगा बड़ी ज्यादती है कि फिल्म वालों पर जब जो चाहे ले-दे कर इल्जाम लगा देते हैं, यह नहीं देखते कि कितनी मुश्किल से फिल्म तैयार होती है और बड़ी किस्मत वालों की फिल्में चल पाती हैं और वही कलाकार जब फिल्म चल पड़ती है तो सिंग इज किंग हो जाता है नहीं तो चांदनी चैक का गायक भी नहीं बन पाता और सिंगापुर से भी बैरंग आ जाता है।
असल में हमें समझना चाहिए कि चोरी-चकारी छोटे लोगों का काम होता है बड़े लोग कभी भी चोरी नहीं करते, वे तो दूसरे की हल्की चीजों को प्रमोट करते हैं और उनकी शान बढ़ाते हैं। संत शिरोमणि तुलसीदास आज से साढ़े पांच सौ साल पहले ही लिख गए - ‘‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं’’ को वैसे ही थोड़ा कह गए, उनके रामचरित मानस को भी तत्कालीन साहित्यकारों ने हर तरह से दर-किनार करने का काम किया था, इसलिए सक्सेना की बेटी को समझना चाहिए कि इतने बड़े समर्थ गीतकार, निर्माता-निर्देशक पर उंगुली उठाने से पहले अगर उन्हें कुछ एतराज था तो ऐसे व्यक्ति को पहले विश्वास में लेना चाहिए था वे अब तक उन्हें कई फिल्मों के करार इत्यादि दिलवा देते और दोनों का काम बखूबी चलता रहता और अभी तक जिस फिल्म जगत में संगीतकार अनु मलिक और रहमान पर ही गीत-संगीत चुराने के लिए ले-दे हो रही थी उसमें उन्होंने इतने बड़े नाम को खामहखाह ही जोड़ दिया। अब यह तो स्वर्गीय शैलेंद्र के बेटों की शराफत है कि उन्होंने जावेद अख्तर पर ‘‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ जोकि शैलेंद्र जी द्वारा ‘श्री 420’ फिल्म का गीत है के लिए कोई आरोप नहीं लगाया और इसी आधार पर जब वहीं की वहीं एक प्रमाणित गीत के लिए कोई चोरी का इल्जाम नहीं बनता तो एक हिन्दी कविता के आधार पर तो फिल्मी गीत के चुराए जाने का मामला बनना ही नहीं चाहिए क्योंकि दोनों की दुनिया ही अलग है। और सब जानते हैं कि फिल्मी गीतों को साहित्य नहीं माना जाता और साहित्यिक गीतों को गाने लायक नहीं समझा जाता वर्ना तो फिल्म जगत में आज पंत, निराला और बच्चन का ही राज होता वहां साहिर, हसरत और मजरुह और गुलजार का क्या काम फिल्मी गीत तो बनते ही परिस्थिति के अनुसार संगीत निर्देशक द्वारा तैयार की गई धुनों पर हैं अब वहां जो शब्द सूझ गए वे कुछ भी हो सकते हैं मगर बकौल गुलजार साहब चोरी के नहीं हो सकते। और जब इतना बड़ा शायर यह बात कह रहा है तो हमें उनकी बात का एतबार करना चाहिए आखिर वे आॅस्कर अवार्ड विजेता हैं और उनके गीत तो शुरू से ही दूसरों को देने की बात प्रेरणा देते हैं जैसे ‘मोरा गोरा अंग लेई ले....’।

सोमवार, फ़रवरी 08, 2010

आतंकवाद शोले के गब्बर से भी क्रूर था असली गब्बर

याहू! मेरा याहू! मेल जागरण मुख्य पृष्ठ Font help खोज


dainik_jagran/Jan 19, 09:56 pm
आगरा। 'बेटा रो मत चुप हो जा, नहीं तो गब्बर आ जायेगा' 'शोले' के गब्बर सिंह का यह डॉयलॉग केवल कल्पना आधारित नहीं था, बल्कि वास्तविकता में एक समय चंबल घाटी में गब्बर की हुकूमत चलती थी। यही नहीं, वास्तविक गब्बर फिल्मी गब्बर से कहीं अधिक क्रूर था। उसकी क्रूरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 'शोले' में जहां फिल्मी गब्बर ने सिर्फ ठाकुर बलदेव सिंह के परिवार को बरबाद किया था, चंबल के कुख्यात ने दो दर्जन परिवारों के कुलदीपक बुझाकर निर्ममता की हद पार कर दी थी।

अमजद खान ने 'शोले' फिल्म में जिस गब्बर का किरदार जिया, वह मूल रूप से मध्यप्रदेश राज्य के भिंड का रहने वाला था। 1957 में 22 बच्चों को लाइन में खड़ा करके गोली भून डाला था। ऐसा उसने तांत्रिक के कहने पर इष्ट देवी को प्रसन्न करने के मकसद से किया था। तांत्रिक का कहना था कि अगर वह 116 बच्चों की बलि दे तो उसके बल और साम‌र्थ्य में वृद्धि होगी। वैसे कुछ ग्रामीणों के मुताबिक उनके गांव के किसी व्यक्ति के गब्बर की मौजूदगी की खबर पुलिस को देने से बौखलाकर उसने बच्चों की हत्याएं की थीं। इस कांड के बाद उ.प्र. और म.प्र. सरकार ने उस पर 20-20 हजार, जबकि राजस्थान सरकार ने 10 हजार का इनाम घोषित किया था।

गब्बर उर्फ गबबरा गुर्जर 1926 में मप्र के भिंड जिले के एक मजरे में पैदा हुआ था। 13 नवम्बर 1959 को मप्र पुलिस के तत्कालीन युवा आईपीएस आरपी मोदी ने उसे 'गम का पुरा' नामक गांव में मुठभेड़ में ढेर कर दिया था। पूर्व आईपीएस और पुलिस एकेडमी हैदराबाद के पूर्व निदेशक पीवी राजगोपाल द्वारा संपादित और हाल में प्रकाशित पुस्तक 'द ब्रिटिश, द बैंडिट्स एंड द बॉर्डर मैन' में इसका ब्यौरा है। यह पुस्तक मध्यप्रदेश के पूर्व आईजी केएफ रुस्तम जी की पुलिस डायरी और रिकार्डो पर आधारित है।

नेहरू जी को था बर्थडे गिफ्ट

आगरा : गब्बर सिंह को धराशाई किये जाने की खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उनके 59वें जन्म दिवस पर उपहार स्वरूप खुद रुस्तम जी ने सुनाई थी। राजगोपाल की पुस्तक में उल्लेख है कि नेहरू जी इस क्रूर दस्यु का जल्द से जल्द खात्मा चाहते थे।

गब्बर गुर्जर को ही जिया था अमजद ने

आगरा : सांसद जया बच्चन के पिता तरुण कुमार भादुड़ी ने अपनी रिपोर्टो पर आधारित एक पुस्तक 'अभिशप्त चंबल' भी लिखी। इसमें गब्बर गुर्जर का विवरण भी है। तरुण ने पत्रकार के नाते चंबल के बारे में रिपोर्टिग की थी। जब अमजद खान को गब्बर सिंह के रोल के लिए चुन लिया गया तो उसने सबसे पहले इसी किताब को मंगवाया था और शूटिंग के दौरान लगातार इसे साथ रखता था। तम्बाकू चबाने और 'कितने आदमी थे' डॉयलॉग भी इसी किताब में दिये विवरण पर आधारित माना जाता है।

नौकरी मांगने की बजाय निर्माण करें मराठी माणुस : मनोहर जोशी

संजय स्वदेश
नागपुर। मराठी लोगों को नौकरी मांगने की बजाय नौकरी निर्माण करनी चाहिए। मराठी आदमी व्यापार उद्योग में सामने आए और सिर्फ पैसा कमाने का उद्देश्य उसके सामने हो और इसी उद्देश्य को सामने रखकर 24 घंटे मेहनत करे। यह आह्वान शिवसेना के वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी ने किया है। वे नागपुर के हिंगणना स्थित जे.एम.सी.सी.आई.के सत्कार समारोह में बोल रहे थे।

मनोहन जोशी ने कहा कि मैं यह बात इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि मैं भी एक व्यवसायी व्यापारी और उद्योजक हूं। समारोह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का सत्कार होने वाला था, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण नितिन गडकरी समारोह में नहीं आ सके। समारोह में मराठी उद्योजकों व्यवसायिकों को उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया गया। समारोह मेें सांसद शिवाजीराव अढालराव पाटिल प्रमुख अतिथि तथा उपमहापौर शेखर सावरबांधे, सुधीर सावंत, मनोहर सालवे, विकास देवधर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

जोशी ने कहा कि नागपुर में यह सत्कार समारोह आयोजित करने की वजह यह है कि यहां के मराठी उद्योजक अपने उद्योगधंधों को और तेज गति प्रदान करें और चेम्बर के सदस्य बने। इसी दिशा में चेम्बर काम कर रहा है और नागपुर के मराठी उद्यमी भी इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे। मराठी व्यक्ति व्यवसाय और धंधा कर पैसा कमाए। यही है अमीर बनने का एकमात्र रास्ता। उन्होंने कहा कि जिद करो, स्पर्धा करो। कष्ट उठाओ और खूब पैसा कमाओ। मैंने अपना व्यवसाय कोचिंग क्लास से शुरू किया, फिर तकनीक के क्षेत्र में गया। आज राज्य में 52 और देश के अन्य शहरों में 12 मेरी तकनीकी संस्थाएं हैं। होटल, बांधकाम आदि व्यवसाय भी मैं कर रहा है। इस देश में ऐसा कोई नियम नही है। जिसे 'मोड़ा' न जा सके इसलिए नियमों का हवाला मत दो। बल्कि पैसे कमाने के नियम बताओं उन्हें ढूंढने की कोशिश करो। श्री. जोशी ने नागपुर विभाग के चेम्बर के अध्यक्षपद के मंगेश काशीकर, सचिव के लिए प्रदीप नगरारे तथा कोषाध्यक्ष के लिए विवेक पाठक के नामों की चेम्बर के कार्याध्यक्ष शिवाजी घोषणा की।

राव पाटिल ने कहा कि मराठी व्यक्ति का विकास हो इसी उद्देश्य से 1994-95 में चेम्बर की स्थापना की गई थी। कला साहित्य के क्षेत्र में मराठी भाषी है। लेकिन उद्योग धंधों में नहीं मराठी लोगों को एक प्लेट फॉर्म पर लाने के उद्देश्य से चेम्बर की स्थापना की गई। देश-विदेश के बड़े-बड़े उद्योगपति जो प्रकाश में नही आना चाहते थे। चेम्बर ने उन्हे सामने लाया ताकि उनसे प्रेरणा और मार्गदर्शन लेकर मराठी व्यक्ति व्यवसाय में आगे बढ़ सके। इस अवसर पर गोपालराव सिराड़कर, अजीत दिवालकर, अतुल यमसवार, सुनील सिर्सीकर और डॉ. चंद्रशेखर देशपांडे का शाल श्रीफल व सम्मान चिन्ह देकर सत्कार किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई। मंच संचालन स्मिता खनगई तथा आभार प्रदर्शन प्रदीप नगरारे ने किया। कार्यक्रम बड़ी संख्या में मराठी उद्योजक उपस्थित थे।

शनिवार, फ़रवरी 06, 2010

मृत्यु पूर्व किसी एक बयान के आधार पर सजा नहीं

बांबे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने कहा है कि यदि मृतक ने मरने के पूर्व एक से ज्यादा बयान दिए हो और सभी बयामों में घटना की वजह अलग-अलग बताई गई हो तो किसी एक बयान को स्वीकार कर आरोपियों को सजा देना, आरोपी के साथ अन्याय होंगा। न्यायाधीश ए.पी.लावांदे व पी.डी.कोदे की संयुक्तपीठ ने ऐसे ही एक मामले में मरने के पूर्व दिए गए 4 बयानों को दर-किनार कर आरोपियों को निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया हैं। अदालत ने यह फैसला दहेज बली के मामले में देते हुए आरोपी बालू पोरेड्डीवपार एवं श्रीमती कलाबाई संतोषवार को रिहा किया हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार आरोपी बालू उसकी मां पार्वताबाई व बहन कलाबाई के साथ मिलकर उसकी पत्नी राजेश्वरी को दहेज के लिए प्रताडि़त करता था। दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर इन्होंने राजेश्वरी पर केरोसिन ड़ालकर उसे आग के हवाले कर दिया था, जिसके बाद मौत हो गई। पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामले की सुनवाई कर जिला अदालत ने बालू व कलाबाई को दोषी करार देते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी। जिला अदालत द्वारा दी गई सजा को चुनौती देते हुए अधिवक्ता राजेन्द्र डागा ने हाईकोर्ट को बताया मृतक ने मरने के पूर्व 4 बयान दिए थे। इन सभी बयानों में अलग- अलग लोगों पर केरोसिन छिड़कने, पकड़कर रखने एवं आग लगाने के आरोप लगाए गए हैं। ऐसे हालात में जिला अदालत ने 4 में से एक बयान को स्वीकार कर आरोपियों को सजा देकर गलती की है। अधिवक्ता डागा ने जिला अदालत के फैसले को खारिज कर आरोपियों को बरी करने के आदेश देने की प्रार्थना हाईकोर्ट से की थी।

अगले चुनाव में उम्मीदवारों की सूची जारी करेंगे बाबा रामदेव

तीन साल में 150 लाख करोड़ की हो सकती है देश की जीड़ीपी : बाबा रामदेव
संजय स्वदेश
नागपुर।

देश की राजनीति की दशा और दिशा बदलने के लिए योग गुरु बाबा रामदेव अगले चुनाव में अपने उम्मीदवरों की सूची जारी करेंगे। बाबा रामदेव नागपुर के धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में पत्रकारों से अनौचारिक चर्चा कर रहे थे। उन्होंन कहा कि उन्हें राजनीति नहीं करनी है, बल्कि देश की राजनीति बदलनी है। आज राजनीति का अर्थ घटिया कार्यों से लगाया जाता है। जब भी कोई गलत कार्य करता है, लोग कहते हैं क्यों राजनीति करते हो। इसी घटिया राजनीति को बदलनी है। योग के साथ राजनीति बदलने की बात करना देशद्रोह नहीं। उन्होंने बताया कि यह सब कुछ उनके राष्ट्रीय स्वाभिमान अभियान का हिस्सा होगा। सत्ता भ्रष्टाचारी, बेईमान लोगों के लिए नहीं है। इनकी राजनीति को उखाड़ फेंकने के लिए योग के साथ नई भूमिका में आया हूं। इसके लिए गांव-गांव में ईमानदार कार्यकर्ताओं को जोड़ रहे हैं। ये कार्यकर्ता हर गांव में नि:शुल्क योग विद्यालय संचालित करेंगे। हर जिले में कम से कम 500 कार्यकर्ता बनाने का लक्ष्य है। यदि हर जिले के सौ कार्यकर्ता ईमानदारी से हर दिन 11 नये लोगों को जोड़े तो एक जिले में एक माह में 30 हजार से भी ज्यादा स्वाभिमानी कार्यकर्ता बनेंगे और यही कार्यकर्ता लोकसभा में अपने ईमानदार प्रतिनिधि भेजेंगे, विधानसभा की राजनीति तय करेंगे। उन्होंने कहा कि हर गांव में योग गुरु लोगों को बीमारी से मुक्त करेंगे। योग से स्वस्थ्य हुआ व्यक्ति बुराई से मुक्त होगा। हजारों ऐसे उदाहरण है कि योग करने वाले व्यसनों से मुक्त हुए हैं।
ये है बाबा बजट
बाबा रामदेव ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित होनी चाहिए। देश में ग्रामीण उद्योग पर जोर देना चाहिए। विलेज हाउसिंग स्कीम चलानी चाहिए, हर गांव में स्कूल और चिकित्सालय होना चाहिए। कचरा का बेहतर प्रबंधन हो, कृषि में निवेश हो। इस तरह से उन्होंने 12 सेक्टर में विशेष कार्य करने की बात कही। इससे देश का जीडीपी अपने आप बढ़ जाएगा। यदि सरकार इन क्षेत्रों में ध्यान दे तो अगले तीन साल में देश का जीड़ीपी 150 लाख करोड़ का हो सकता है। अब आप कहेंगे कि इसके लिए पैसे कहां से आएंगे। स्वीस बैंक में पड़े काले धन को मंगाने में क्या बुराई है?
बड़े नोट करों बंद, रूक जाएगा भ्रष्टाचार

बाबा रामदेव ने कहा कि अब जनता बहुत जल्द केंद्र सरकार की बेवकूफाना बजट देखेगी। यह बजट ग्राम अधारित नहीं होती है। उन्होंने कहा कि यदि देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना है, तो बड़े नोटों की छपाई बंद कर देनी चाहिए और बड़े नोटों को तीन-चार माह की सूचना देकर रद्द कर देनी चाहिए। जब कोई किसी को करोड़ों का का रिश्वत देगा तो उसे ट्रक में भर कर ले जाएगा।
रखने वालों को गोदाम बनाने पड़ेंगे। इससे भ्रष्टाचार पर स्वत: लगाम लगेगा। एक सवाल के जवाब में बाबा रामदेव नक कहा कि अब जो लोग रिश्वत के रूप में दूसरी चीज जैसे सोने का बिस्कुट आदि मांगते हैं, यह रास्ता भी बंद हो सकता है। रिश्वत देने वाला नोटों भरा ट्रक लेकर तो खरीदारी करने जाएगा नहीं। वह चेक से भुगतान करेगा। इससे बेहतर होगा कि वह ईमानदारी से कार्य करंे और करायें।
ब्यूरोक्रेट्स के आगे झुक गए थे मनमोहन सिंह

उन्होंने बताया कि बड़े नोटों को छापना बंद करने की बात उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी की थी। मनमोहन सिंह बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं। मनमोहन सिंह ने भी स्वीकार किया कि बड़े नोट बंद होने से भ्रष्टाचार रूकेगा। तब मनमोहन सिंह ने बताया कि जब वे रिजर्ब बैंक के अपने गर्वनर के कार्यकाल में थे, तब बड़े नोट बंद करने की पहल भी की थी। लेकिन देश के ब्यूरोक्रेट्स ने ऐसा नहीं होने दिया। लेकिन अब मनमोहन सिंह स्वयं प्रधानमंत्री हैं, तो बड़े नोट बंद करने में क्या परेशानी है।
वैदिक चिकत्सा में हो शोध
बाबा रामदेव ने कहा कि 50 लाख करोड़ रूपये के हेल्थ सेक्टर में पारंपरिक वैदिक चिकित्सा पद्धति का योगदान नगण्य है। पारंपरिक शिक्षा पर शोध होनी चाहिए। जिससे की सस्ते में गरीबों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके। 99 प्रतिशत बीमारियों का समाधान योग में है।
कोई मराठी या बंगाली में न्याय क्यों नहीं मांगता
मराठी मुद्दे पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में योग गुरु ने कहा कि भाषावाद की समस्या की जड़ निर्धनता और भ्रष्टाचार है। महाराष्ट्र के लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है। दूसरे राज्यों के लोग वहां रोजगार नहीं होने से यहां आ रहे हैं। सभी को समझना चाहिए कि यह भारत है और भारत सबका है। राज्य के रोजगार में स्थानीय लोगों की प्राथमिकता तक बात ठीक है, लेकिन लेकिन भाषा के नाम पर मारपीट करना निश्चय ही गलत है। उन्होंने कहा कि अदालत की भाषा अंग्रेजी है। कोई क्यों नहीं कहता है कि उसे बंगाली या मराठी भाषा में न्याय चाहिए। मराठी महाराष्ट्र की भाषा नहीं है। यह भारतीय भाषा है। इसे भारतीय भाषा के रूप में सम्मान होना चाहिए।
कानून अंग्रेजों के जमाने का
बाबा रामेदव ने कहा कि देश में कानून व्यवस्था अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे हैं। ये कानून अंग्रेजों ने भारतीयों का दबाने और लुटने के लिए बनाये हुए थे। आजादी के इतने बर्ष बाद अंग्रेजों के जमाने का कानून चल रहा है। इसे बदलना चाहिए।

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गुरुवार, फ़रवरी 04, 2010

लड़कियों के चरित्र पर लांछन लगाने वाले पत्रकार

संजय स्वदेश

इन दिनों में एक-दो पत्रकार महोदय दो-चार बेव-ब्लॉग पर मीडिया के उन लोगों पर नाम और संस्थान के नाम लिए बगौर संकेतों से चर्चा कर रहे हैं, जो महिलाओं का यौन-शोषण करते हैं। चर्चा में उन महिलाओं मीडियाकर्मियों की ओर भी संकेत हैं, जो इस पेशे में आगे बढऩे के लिए प्रभावशाली सहकर्मी के साथ हमबिस्तर होती है। ऐर्सी चर्चाओं पर तरह-तरह की प्रतिक्रिया आईं। पर प्रतिक्रिया देने वाले अधिकतर मर्द निकलें। एक दो बहनों ने हिम्मत दिखा कर प्रतिरोध किया। कहने की कोशिश की कि लड़कियां उतना समझौता नहीं करती, जितना कि लिखा जा रहा है?
जो भी हो, मामला जब भी सैक्स से जुड़ा होता है, उसे चटकारे लेकर लिखे-पढ़े और सुने जाते हैं। पर इन चर्चाओं ने किसी मर्द ने प्रतिभाशाली महिला मीडियाकर्मी का उदाहरण नहीं दिया। आज बेहतरीन कार्य करने वाली किसी भी महिला मीडियाकर्मी के सहकर्मी से चर्चा करें। उनमें से दो-चार उनके चरित्र पर लांछन लगाने वाले जरूर मिल जाएंगे। चर्चा करने वाले मीडिया के दूसरे हाउस तक भी पहुंचती है। पत्रकारों की आपसी चर्चाओं में चटकारे लेकर संबंधित महिला पत्रकार के इज्जत पर संदेह आम हो चुकी है।
सफलता की राह पर आगे बढ़ रही महिलाओं के मनोबल को गिराने का सबसे मजबूत हथियार है, उनके चरित्र पर लांछन लगाना। यह सबसे आसान काम हैं। झट से उसके साथ किसी का संबंध जोड़़ दो। शब्दों से उसकी इज्जत को तार-तार कर दो। मैंने भी सुना है, टी.वी. पर कई दिग्गज महिला मीडियाकर्मियों के बारें में कि उनका यौन संबंध फलां-फलां के साथ है। इन्हीं संबंधों पर वे आगे बढ़ी है। पर कभी भरोसा नहीं किया। जब व्यक्ति का चरित्र पतित होता है, तो उसका आत्मबल कमजोर हो जाता है। और मीडिया में कमजोर आत्मबल वाले भला कहां टिकते या टिकती हैं? चलिए कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं, कि ऐसे संबंधों पर कुछ महिलाएं आगे निकल गई। लेकिन जो आगे निकली हैं, जरा उनके कार्यों को तो देखें। सफलता की शिखर पर बैठी महिला मीडियाकर्मी क्या पुरुषों से कम काम करती हैं?
मजेदार बात यह है कि महिला पत्रकारों के चरित्र पर लांछन लगाने वाले ऐसे लोग हैं जो पत्रकारिता में किसी न किसी कारणवश पिछड़ कर कुंठित हो चुके हैं। निराश होकर प्रतिभाशाली पत्रकारों की सफलता की आग से जल रहे हैं। मैं प्रिंट मीडिया के कई हाउस में काम कर चुका हूं। महिलाएं सहकर्मी रहीं। हमारे पुरुष सहकर्मियों ने भी महिला सहकर्मियों के बारे में चरित्र हनन को लेकर चर्चाएं की। लेकिन मुझे कभी उन पर संदेह नहीं हुआ। उनके कार्य प्रखर और तेवर भरे रहे।
पेशें में तेवर दिखाने वाली महिलाओं ने जब भी किसी पुरुष के साथ हंस कर बात क्या कर ली, झट से चर्चा होने लगी-कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर हैं।
फिलहाल अभी ब्लॉग और बेव पर जितनी चर्चाएं हो रही हैं और जिस तरह से महिला पत्रकारों की आबरू उछाली जा रही है, वास्तव में उतना होता नहीं है। किसी भी महिला के साथ यौन-संबंध स्थापित करना आसान काम नहीं है। और मीडिया में आने वाली हर लड़की इतनी गिरी हुई नहीं रहती है, कि झट से वे किसी के साथ हमबिस्तर हो जाएं। बॉय-फ्रेंड के मामलों में अगर कुछ होता है तो बाल अलग है।
जो लड़कियां बेवाकी से पत्रकारिता कर रही हैं, उन पर चरित्र पर संदेह करने वाले जरा एक बार जरूर सोचे कि जिस उम्र और अनुभव में वह जो कर रही है, उसके मुकाबले वे कितना बेहतर कर रहे हैं। लड़कियों की प्रतिभा के सामने पिछड़ते पुरुष पत्रकार यह नहीं भुले कि वे भी किसी के भाई या पति हैं। चाहे महिला हो या पुरुष, चरित्र गिराकर पत्रकारिता करने वालों में बेवाकी की पत्रकारिता की साहस कहा?

संपर्क
मोबाइल ०९८२३५५१५८८८

बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया को बचाने रचा गया इतिहास

नागपुर। मंगलवार 2 फरवरी का दिन संतरानगरी के लिए ऐतिहासिक गवाह का दिन बन गया। इतिहास रचने का यह कार्य हुआ है, ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया को बचाने के नाम पर। धंतोली स्थित यशवंत स्टेडिम में सुबह 9 बजे से शुरू हुआ म्यूजिकल चेयर शो संभवत: दुनिया का अपने प्रकार का अब तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम रहा। कार्यक्रम को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज करने के लिए आवेदन किया जाएगा। यशवंत स्टेडियम में जेसीआई ऑरेंज सिटी की ओर से आयोजित म्यूजिकल चेयर शो में 45 स्कूलों के 10129 बच्चों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के माध्यम से उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए दुनिया को संदेश दिया।
ढाई दशक पहले हुआ था ऐसा आयोजन
जानकारों का कहना है कि करीब 25 साल पहले इस तरह के म्यूजिक चेयर का आयोजन सिंगापुर में हुआ था। उस आयोजन में 8238 लोगों ने हिस्सा लिया था। भारत में इस तरह का यह सबसे बड़ा और पहला म्यूजिकल चेयर शो हैं जिसमें 10129 विद्यार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड का कोई पदाधिकारी इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले पाया, क्योंकि इसके लिए 7 लाख रूपये की राशि का अतिरिक्त खर्च आता। इसलिए कार्यक्रम की पूरी रिकॉडिंग की जा चुकी है। रिकॉडिंग गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड समिति के पास भेजा जाएगा। एक माह बाद यह पता चलेगा कि कार्यक्रम को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में शामिल किया गया की नहीं?
कार्यक्रम के उद्घाटन मौके पर शहर पुलिस आयुक्त प्रवीण दीक्षित, जेसीआई आरेंज सिटी के अध्यक्ष हेमंत नाडियाना राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार, जेसी अमर खंडेलवाल, सीनेटर महेश राठी, अशोक राठी आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। म्यूजिकल चेयर शो में संगीत की धुनों पर एक साथ हजारों विद्यार्थियों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए खेल का आनंद लिया। कार्यक्रम में 5वीं से 9वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को शामिल गया। म्यूजिकल शो में कुल 95 राउंड रखे गए थे। हर राउंड में करीब एक हजार से अधिक बच्चे संगीत की धुन पर अपनी कुर्सी बचाने की कवायद करते नजर आए। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड की चयन समिति के दिशा-निर्देश में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम की व्यवस्था के लिए जेसीआई के 500 से अधिक अधिकारी व सदस्यों ने सहयोग किया। उन्होंने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग से पृथ्वी पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यदि पर्यावरण प्रदूषण को समय रहते नहीं रोका गया तो निकट भविष्य में पृथ्वी के विनाश की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। कार्यक्रम का मंच संचालन जेसी मुकेश आसर ने किया।

मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010

बाघ सुरक्षा पर भारी पड़े खान माफिया


forest minister patang rao kadam talking with junallist of nagpur


बाघ बफर जोन के गांवों के पुनर्वसन की जरूरत नहीं : कदम
संजय स्वदेश
नागपुर।
आखिर खनन ठेकेदारों की प्रभावशाली लॉबी ने बाघ बफर जोन पर भारी पड़ गई। चंद्रपुर के ताड़ोबा-अंधारी में टाईगर रिजर्व परियोजना (टीएटीआर) से प्रभावित गांवों के पुनर्वास को लेकर गुरुवार को आयोजित बैठक के बाद नागपुर आए महाराष्ट्र के वनमंत्री पतंगराव कदम ने बताया कि बाघ बफर जोन के गांवों के पुनर्वसन की जरूरत ही नहीं है। मतलब साफ है। बाघ बफर जोन के लिए प्रस्तावित जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। वनमंत्री ने इस निर्णय के पीछे तर्क दिया कि वन विभाग बाघों की सुरक्षा और प्रभावित गांवों के लिए उनके लिए खुद खास व्यवस्था करने की योजना में है। यहां इंसान और जानवर एक ही क्षेत्र में रहेंगे। उन्होंने कहा कि अभ्यारण्य का निर्माण करते समय गांवों को अभ्यारण्य के क्षेत्र से बाहर बसाना पड़ता है। मगर बफर जोन में ऐसा नहीं करना पड़ता। ताड़ोबा में जानवरों को पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं है, पानी की तलाश में जानवर गांव-बस्ती तक आ जाते हैं। यह एक गंभीर समस्या है। इस विषय पर विभाग के शीर्ष अधिकारियों से चर्चा कर इसका हल निकाला जाएगा। सूत्रों का कहना है कि वनमंत्री ने बाघ बफर जोन के लिए प्रस्तावित जमीनों के अधिग्रहण नहीं करने का निर्णय खन माफियाओं के प्रभाव में आकर लिया है। जब से यह योजना प्रस्तावित थी, तब से खनन क्षेत्र के ठेकेदार वन विभाग के अधिकारियों के साथ मंत्री पर प्रस्तावित क्षेत्र को बाघ बफर जोन के लिए नहीं देने के लिए लॉबिंग कर रहे थे।
अब मारेंगे नहीं पकड़ेंगे बाघ

पिछले दिनों चंद्रपुर जिले में एक तेंदुए के कारण 5 लोगों की मौत हुई। पिछले साल भी वन्य जीवों का ग्रामीणों पर हमला हुआ था। जब लगातार लोग मर रहे थे, तब ग्रामीणों पर हमला करने वाले बाघों को मारने का आदेश दिया गया था। ऐसी घटनाओं के सवाल पर वनमंत्री का कहना है कि अब ग्रामीणों पर बाघ हमला करेंगे तो, पहले उसे पकडऩे का प्रयास किया जाएगा। पकडऩे का विकल्प नहीं मिलने पर ही उसे मारने का आदेश दिया जाएगा।
पुलिस के साथ पहुंचते है वनकर्मी
एक सवाल के जवाब में वनमंत्री ने कहा कि लोगों की शिकायत रहती है कि जब तेंदुएं किसी इंसान पर हमला कर मार दते हैं तो वन अधिकारी तुरंत घटनास्थल पर नहीं पहुंचते। इस शिकायत में आंशिक सच्चाई है, क्योंकि जहां ऐसी घटना होती है, वहां का माहौल अलग होता है। अगर वन अधिकारी अकेला उस जगह पर तुरंत चले जाएं तो आक्रोशित लोग वनकर्मी को भी मार सकते हैं। इसलिए घटनास्थल पर पुलिस पहुंचने के बाद ही वन अधिकारी घटनास्थल पर जाते हैं।
भूखे बाघ-तेदुएं गांव में आते हैं
जंगल में बाघ, तेंदुएं व अन्य जानवरों को खाना-पानी नहीं मिल पाता है, तो वे गांवों कि तरफ आते हैं। कई बार जानवरों की आपसी लड़ाई में भी कई बाघ और तेंदुएं घायल हो जाते हैं, उनको सुरक्षित रखने तथा उनका इलाज करवाने के लिए उन्हें रेस्क्यू सेंटर में रखना आवश्यक होता है। फिलहाल वन विभाग के अलग-अलग रेस्क्यू सेंटर में तकरीबन 60 तेंदुएं हैं। एक इंसान को मारने से किसी तेंदुएं की गिनती नरभक्षकी के रूप में नहीं की जाती, उसके लिए कुछ मानक निश्चित किये गये हैं। कुछ उद्यानों में तेंदुओं को रखा है। वन विभाग तेंदुओं पर ध्यान रखने के लिए विडियो रिकॉर्डिग की योजना में है।
मुआवजा बढ़ाने पर विचार
वन संरक्षित क्षेत्रों में जिन किसानों की खेती का जानवर नुकसान करते हैं, उन्हें वन विभाग की ओर से 2000 रूपये प्रति हेक्टर के हिसाब से मुआवजा दिया जाता है। ज्यादा नुकसान होने पर 15 हजार रूपये प्रतिहेक्टेयर की दर से मुआवजा दिया जाता है। वन्य जीवों द्वारा किसानों की फसल नष्ट करने पर दी जाने वाली भरपाई की प्रतिहेक्टेयर दो हजार रूपये की दर से मुआवजा राशि काफी कम है। वनमंत्री का कहना है कि इसे बढ़ाने के लिए जल्द ही मंत्रिमंडल के सामने प्रस्ताव लाया जाएगा।
अभ्यारण्य की जमीन की भरपाई कहीं और
वनमंत्री पतंग राव कदम का कहना है कि राज्य में 6 सेंचुरीज(अभ्यारण्य) के गठन में जितना वन संरक्षित भाग कम होने वाला है, उसकी भरपाई राज्य में कहीं और की जाएगी। इसके लिए वन विभाग राज्य सरकार से जमीन की मांग करेगी। इसके लिए प्रस्ताव पुनर्गठन कमेटी में रखी गई है। लेकिन अभी इसकी मंजूरी नहीं मिली है। मानसिंग को अभ्यारण्य घोषित करने का निर्णय पहले ही हो चुका है।


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सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

शांति, अहिंसा के लिए दौड़े हजारों पग

नागपुर। रविवार की सुबह नागपुर के कस्तूरचंद पार्क मैदान से अंतरराष्ट्रीय मैराथन में हजारों पग शांति, अंहिसा के लिए दौड़े। रविवार की सुबह धुंधली बेला में जब पक्षी भी क्लब नहीं कर रहे थे, तभी से यहां चहल-पहल शुरू हो गई थी। सुबह करीब 5 बजे के पहले से ही मैराथन में हिस्सा लेने वाले अपने घर से निकल पड़े। नगर के विभिन्न इलाकों से धावक कस्तूरचंद पार्क की ओर मैराथन की खास टी-शर्ट पहने जा रहे थे। हर दिन इस मार्ग से गुजरने वाला यातायात बदला हुआ था। हालांकि इस मैराथन में हिस्सा लेने विदेश समेत महाराष्ट्र से करीब 90 हजार से ज्यादा लोगों ने पंजीयन कराया था। लेकिन दौड़ते वक्त इससे कुछ कम संख्या में ही धावक दिखे। स्पर्धा की भावना से दौडऩे वाले कुछ लोग ही थे। अधिकतर धावक मैराथन को एक मस्ती और सुबह-सुबह मनोरंजन का माध्यम मानकर उत्साहपूर्वक यहां आए थे। कस्तूरचंद पार्क की व्यवस्था बेहतरीन थी। रिजर्ब बैंक चौक पर मंच बना था। यहीं से विभिन्न वर्गों की मैराथन दौड़ हर दस मिनट के अंतराल पर शुरू हुई। रिजर्व बैंक चौक पर ही बूटीबोरी के दत्त विद्या मंदिर के विद्यार्थियों का एक समूह बैंड की ध्वनि से धावकों का उत्साहवर्धन कर रहा था।

पारंपरिक पोशाक में आकर्षण

कस्तूरचंद पार्क में हजारों की संख्या में पीले टी. शर्ट में लोग उपस्थित थे। कई लोगों का समूह किसी संस्था विशेष के नेतृत्व में आया था। हाथ में विभिन्न सामाजिक संदेश देने वाली तख्ती लिए हुए थे। महात्मा गांधी की जयघोष हो रही थी। मैदान के बीचोंबीच बने मंच पर न्यू इंग्लिश हाईस्कूल के विद्यार्थी नृत्य और गीत की मनमोहक प्रस्तुति दे रहे थे। तेज आवाज में बजने वाले डीजे की धुन पर मैराथन में आए लोग स्वयं को थिरकने से नहीं रोक पा रहे थे। मेरे देश की धरती सोना उगले-उगले हीरा मोती... की धुन पर छात्राओं के एक समूह ने मनमोहक लेझिम की प्रस्तुति दी। कुछ विद्यार्थी कृत्रिम जटा लगाए गेरुये वस्त्र में दौड़ रहे थे तो छात्राएं पारंपरिक मराठी और अदिवासी वेशभूषा में दौड़ते हुए शांति और अहिंसा का संदेश दे रहे थे। इन स्कूली विद्यार्थियों का एक समूह लेझिम करता हुआ भी मैराथन में शामिल हुआ।

शांति और अहिंसा के अलावा भी संदेश

युवाओं की अनेक टोली अलग-अलग अंदाज में मैराथन में दौड़ी पर इनमें कई युवा समूहों ने लोगों का आकर्षण अपनी ओर खींचने के लिए विभिन्न तरीके अपनाये। धावक नं. 2731 ने तो माथे और कमर पर पेड़ की टहनियां बांध कर दौड़ते हुए पेड़ बचाने का संदेश दिया। जरीपटका की बी.जे.एस. गल्र्स हाई स्कूल की करीब 55 छात्राएं अपने हाथ में महात्मा गांधी के अलग-अलग सद्वाक्यों की तख्ती लेकर चलते दिखे।
पृथक विदर्भ के लिए दौड़

वहीं युवा संघ के एक कार्यकर्ता पृथक विदर्भ का संदेश दे रहा था। लोगों को भीड़ में अलग दिखने के लिए हाथ में जो तख्ती पकड़े था, उस पर लिखा हुआ था- रोज जगता था लड़की के लिए, आज जगा हूं पृथक विदर्भ के लिए। इसके अतिरिक्त मैराथन की भीड़ में कुछ विद्यार्थियों का समूह पढ़ाई की बोझ से विद्यार्थियों को आत्महत्या नहीं करने की सलाह देने वाली प्रेरणा देने के लिए हाथ में तख्ती लिए चल रहे थे। इसके अलावा एक धावक महात्मा गांधी की वेशभूषा में सबसे अलग दिख रहा थे।
'थ्री इडियट्सÓ भी थे....

विद्यार्थियों के एक समूह ने हालिया रिलीज फिल्म 3 इडियट्स की तर्ज पर मैराथन में हिस्सा लिया। फिल्म में जहां ऑल इज वेल... गाना है, इसी गाने की तर्ज पर उन्होंने पृथक विदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि ऑल इज नॉट वेल। उन्होंने बताया कि वे इसीलिए इडियट्स हैं, क्योंकि विदर्भ पिछड़ रहा है। यदि पृथक विदर्भ राज्य का गठन हो जाता है, तो नो इडियट्स हो जाएंगे। थ्री इडिट्स की भूमिका में एक विद्यार्थी किसान आत्महत्या, दूसरा गांधी और तीसरा पुलिस की भूमिका में था।