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रविवार, अगस्त 01, 2010

हिरण के मांस के साथ 4 गिरफ्तार

नागपुर। वन विभाग ने दिघोरी नाके पर 4 लोगों को हिरण के मांस के साथ पकड़ा है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक वन विभाग के अधिकारियों को गुप्त सूचना मिली थी कि 4 लोग हिरण के मांस को लेकर दिघोरी नाके से गुजरने वाले हैं। विभाग के अधिकारी व कर्मचारियों की टीम पहले से यहां मुस्तैद थी। गिरफ्तार चारों आरोपियों के पास से पांच किलो हिरण का मांस बरामद हुआ। उन पर वन्य जीव संरक्षण कानून 1972 की धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। चारों आरोपी बुद्देश्वर नगर गंगाबाईघाट के रहने वाले हैं। इनमें दशरथ शेट्टीवार, सेलुराज शेट्टी, मुगम शेट्टीवार, सुब्रमन्यम शेट्टी का समोवश है। वन विभाग की इस कार्रवाई में आरएसओ टेकाड़े, डीएस टेकाड़े, डी.ज.े लुटे, मोहिते आदि ने भाग लिया।
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गुरुवार, जुलाई 15, 2010

पोषण आहार का ठेका पाने धरने पर बैठीं महिलाएं

आईएसओ प्रमाणपत्र नहीं होने की शर्त पर बचत गटों को नहीं मिला ठेका
नागपुर।

मंगलवार को दोपहर बचत गट महिला महासंघ की सदस्यों ने रिजर्व बैंक चौक स्थित डा. बाबा साहब आंबेडकर की प्रतिमा के समीप धरना दिया। उनकी मांग है कि राज्य सरकार की महिला व बाल कल्याण विभाग के अंतर्गत स्कूल में वितरण होने वाले पोषण आहार को आंगनवाडी कार्यकताओं व महिला बचट गटों को कार्य दिया जाए। यह कार्य वे पहले से ही करती आ रही हैं। महासंघ की अध्यक्ष करुणा चिमणकर ने बताया कि राज्य सरकार ने वर्ष 2004 से नियमित रूप से राज्य के महिला बचत गटों को स्कूली पोषण आहार वितरण का कार्य दिया था। करीब चार वर्षों तक महिला बचट गटों ने इस कार्य को ईमानदारी व सफलता से किया। इससे प्रभावित होकर राज्य सरकार ने इन्हें न केवल प्रशिक्षण दिया, बल्कि पुरस्कृत भी किया। इस कार्य को पाकर महिला बचट गट से जुड़ी सैकड़ों महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई।
उन्होंने कहा कि महिला बचट गटों के माध्यम से स्कूलों में पोषण आहार उपलब्ध कराने का आदेश नंबर 191/2001 पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को दिया था। तभी से बचट गटों के माध्यम से स्कूलों में पोषण आहार का ठेका दिया गया। महाराष्ट्र में इस प्रयोग की सफलता के बाद वर्ष 2004 से इसे पूरे देशभर में चलाया गया। फिलहाल यह योजना एक अगस्त 2010 तक शुरू रहेगी। आगे के ठेका के लिए सरकार ने निविदा निकाला था। इस निविदा को महिला बचट गटों ने भी भरा था। लेकिन बचट गटों की निविदा यह कह कर रद्द कर दी गई कि उनके आईएसओ -9001 का प्रमाणपत्र नहीं है। इस तरह अगस्त के बाद का ठेका दूसरे किसी को दे दिया गया। महासंघ का कहना है कि जब पहली बार यह ठेका मिला था, तब इस तरह की शर्त नहीं रखी गई। लेकिन इस बार 1500 करोड़ रुपये का ठेका दूसरे को दिया गया है। इसमें भ्रष्टाचार भी हुआ है। इस ठेका को पाने के लिए राज्य भर के 350 महिला बचट गटों ने निविदा भरा था। लेकिन उद्योगपतियों को दिया गया।
महासंघ की मांग है कि 1500 करोड़ रुपये का यह ठेका सरकार को तत्काल रद्द कर स्थानीय स्तर पर इसकी निविदा निकालनी चाहिए। धरना प्रदर्शन में कविता खैरकर, इंदिरा चौधरी, नालंदा गणवीर, संगीता ठाकरे, तोशीबाई खासरकर, सुशीला तिरपुडे, हेमा धुवे, सुजाता वासनिक, वंदना गोडबोले, रंजना गणवीर, उषा उपरे, मनीषा हाडके, प्रतिभा मेश्राम, संगीता ढोक, मीना मेश्राम, सुनीता मेश्राम, सरोज, वंदना गवई, वैशाली, कमल बांते, नमिता सोमकुंवर, सुमन हाडके, माया शेंडे, वर्षा हाडके, पुष्पा टेभरे, गीता सहारे, कोमेश्वरी गणवीर, रत्नमाला मेश्राम, वंदना निकोसे, कांचन जनबंधु, शिला कोचे, कविता पाटिल, माधुरी सोनटक्के, सुनीता सहारे, मीना दिवेकर, नलिनी भगत, सरिता पराते समेत अनेक महिलाएं उपस्थित थीं।
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सबसे ज्यादा जंगल विदर्भ में, शोध संस्थान बनेगा पुणे में

फिर विदर्भ की उपेक्षा
नागपुर।
वैसे तो विदर्भवादी नेता वर्षों से राज्य सरकार पर विकास को लेकर विदर्भ की अपेक्षा करने का अरोप लगाते रहे हैं। लेकिन हाल ही में में इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। राज्य के जंगलों के लिए शोध संस्थान बनाने का प्रस्ताव था। राज्य के सबसे ज्यादा जंगल विदर्भ के जिलों में हैं। फिर भी वन शोध संस्थान पुणे में बनाने का निर्णय राज्य सरकार द्वारा लिया गया है जबकि राज्य के वन विभाग का मुख्यालय नागपुर में है। ज्ञात हो कि शोध संस्थान बनाने का प्रस्ताव संबंधी घोषणा वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश ने जनवरी माह में पत्रकारों से बातचीत में की थी। उस समय पत्रकारों से बातचीत में आश्चर्य व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र का 57 प्रतिशत वन क्षेत्र विदर्भ में ही है।
राज्य के इस निर्णय से विदर्भ के वन प्रेमियों में नराजगी है। सतपुड़ा फाउंडेशन और नेचर कंजर्वेशन सोसाइटी, अमरावती (एनसीएसए) ने सरकार के इस निणर्य का कड़ा विरोध किया है। फाउंडेशन के प्रमुख किशोर रिठे ने कहा है कि सरकार का यह निर्णय वस्तुस्थिति की हकीकत देखते हुए करनी चाहिए। जब सबसे ज्यादा वन क्षेत्र विदर्भ के जिलों में हैं तो फिर संस्थान पुणे में क्यों बनाया जा रहा है? सरकार के इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि विदर्भ के साथ किस तरह से भेदभाव किया जा रहा है। रिठे का कहना है कि शोध संस्थान एक तरह से वन विश्वविद्यालय की तरह से होगा। लेकिन इसके लिए सबसे अनुकूल जगह विदर्भ ही हो सकता है, पर सरकार इसे जंगल से दूर बनाने जा रही है। यह निर्णय एक तरह से विदर्भ के साथ-साथ प्रकृति की उपेक्षा है।
वहीं इस संबंध में वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पुणे एक अच्छा शहर है। वहां पहले से ही कई महत्वपूर्ण संस्थान हैं। शोध कार्य के लिए वहां अच्छा महौल है।
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शनिवार, जून 05, 2010

पर्यावरण संरक्षण का काम कम, दिखावा ज्यादा

नागपुर। विश्व पर्यावरण दिवस पर शनिवार को शहर में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये गए। विभिन्न संगठनों ने अलग-अलग तरीके से पर्यावण दिवस मनाया। कहीं रैली निकाली गई, तो कहीं पर्यावरण के थीम पर पोस्टर बनाओ प्रतियोगिता आयोजित हुई। कुछ संगठनों ने सेमिनार का आयोजन कर पर्यावरण के खतरे को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। पर्यावरण दिवस पर इस क्षेत्र से जुड़े अधिकर विद्वानों ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण को ले कर काम कम और दिखावा ज्यादा हो रहा है।
साइकिल चलाओ, पर्यावरण बचाओ
मराठी विज्ञान परिषद के अध्यक्ष अशोक भट्ट ने बताया कि मनुष्य की मानसिकता जब तक नहीं बदलती, तब तक पर्यावरण संतुलन नहीं हो सकता। मनुष्य ही सबसे बड़ा प्रदूषक है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को देखते हुए सभी लोगों को साइकिल का इस्तेमाल करना चाहिए। वायु प्रदूषण कम करने के लिए यही एकमात्र उपाय है। इसके प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए मराठी विज्ञान परिषद की ओर से महाराष्ट्र स्तर पर 1 जुलाई से 'चलो साइकल चलाएÓ कार्यक्रम का शुभारंभ किया जाएगा।
वन कर्मचारियों को जंगल की चिंता नहीं
वन व्यवस्थापन कार्य से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सूर्यभान खोब्रागड़े ने बताया कि जंगल की कटाई से पर्यावरण का नाश हो रहा है। इसके लिए सरकार के बदलते कानून जिम्मेदार हैं। वन कर्मचारियों को ही जंगल की चिंता नहीं है। वन कर्मचारी बढऩे से वन संपत्ति नष्ट हो रही है। वन कर्मचारी नौकरी के जगह पर नहीं रहते। इससे शिकार, जंगल कटाई और रात में होने वाली अवैध यातायात से जंगल के प्राणी मर रहे हंै। वाहन में केरोसिन के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। सिर्फ समिति व्यवस्था करके शिकार एवं जंगल कटाई पर रोक नहीं लगाई जा सकती। इसके लिए कानून पर अमल करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि वनविकास मंडल के माध्यम से वृक्षरोपण होता है। परंतु बड़े-बड़े वृक्ष जैसे आम, नीम, इमली आदि वृक्ष तोड़कर गुलमोहर एवं सागवान के वृक्ष लगाए जाते हैं। उससे जंगल कटाई और बढ़ रही है। वायु प्रदूषण पर नियंत्रण रखने के लिए 'वृक्ष लगाओ, वृक्ष बचाओÓ सिर्फ कगजों पर नहीं बल्कि प्रत्यक्ष में उस पर कृति होनी चाहिए। वृक्ष प्राणवायु देते हैं और कार्बन-डायऑक्साईड का शोषण करते हंै। लेकिन यह वृक्ष सिर्फ सजावट के लिए नहीं बल्कि पर्यावरण संतुलन में काम आए।
फैशन हो गया है दिवस मनाना
नि:सर्ग संरक्षण संस्था के सचिव दिलीप गाड़े ने बताया कि विश्व पर्यावरण दिन मनाना फैशन जैसे हो गया है। जितनी समाज में जागृती हो रही है उतनी ही पर्यावरण समस्याएं बढ़ रही है। भारतीय संस्कृति में पानी को पवित्र माना गया है। किसी भी पूजा से पहले जल की पूजा की जाती है। किंतु नदी, तलाब में ही पूरे शहर की गंदगी छोड़ी जा रही है। कन्हान, पीली नदी में नागपुर का गंदा पानी छोड़ा जाता हैं। पिछले 10 वर्षों से प्रदूषण नियंत्रण विभाग प्रशासन को नोटिस भेज रहा है फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। इसके लिए पर्यावरण संरक्षण कानून अमल में लाना जरूरी है। गाड़े का कहना है कि पर्यावरण दिवस मनाने के बजाय कार्यों पर बल देना चाहिए। पर्यावरण का अर्थ सिर्फ वातावरण से नहीं बल्कि अन्न-धान्य से भी है। नदी, नालों में प्रदूषण बढऩे से उसका परिणाम खेतों में होनेवाले फसलों पर हो रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी राज्य में पर्यावरण की समस्या नहीं थी। वह अशिक्षित थे, परंतु उन्हें वन का महत्त्व मालूम था।
काम कम दिखावा ज्यादा
ग्लोबल एनवायरमेंट संस्था के सचिव दिनेश घोलासे ने बताया कि पर्यावरण प्रदूषण के लिए सरकार की यंत्रणा जिम्मेदार है। मनुष्य तथा अन्य वन जीवों को अपने जीवन के प्रति संकट का सामना करना पड़ रहा है। प्रदूषित पर्यावरण का प्रभाव पेड़-पौधों एवं फसलों पर हो रहा है। समय के अनुसार वर्षा न होने पर फसलों का चक्रीकरण भी प्रभावित हुआ है। प्रकृति के विपरीत जाने से वनस्पति एवं जमीन के भीतर के पानी पर भी इसका बुरा प्रभाव देखा जा रहा है। जमीन में पानी के स्त्रोत कम हो गए हैं। इस पृथ्वी पर कई प्रकार के अनोखे एवं विशेष तितली, चिडिय़ा, कौए, गिद्ध जैसे वन्य जीव, पौधें गायब हो चुके हैं। बड़े-बड़े उद्योगपति पर्यावरण दिन के नाम पर कार्यक्रम लेकर दिखावा करते हंै। नए फंड, नई योजनाएं सिर्फ कागज पर होती है। सिर्फ 1-2 प्रतिशत लोग ही सही मायने में काम करते हैं। अपनी जन्मदाती पृथ्वी का सरंक्षण करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
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कचरे से दाल रोटी की जुगत में लगे हैं हजारों लोग

पर्यावरण दिवस पर विशेष

हवाओं में जहर घुल गया है। बारिश के पानी में तेजाबी असर दिखता है। मिट्टी की उपज कम हो गई है। बर्फ के पहाड़ गल रहे हैं। कहीं सूखा हैं, तो कहीं रेगिस्तान में बारिश होती है। नदियां सूख रही हैं, भूजल गिर रहा है। बीमारियां बढ़ती जा रही है। शहर कूड़े के ढेर में बदल रहे हैं और पेड़ पौद्यों के हिस्से की जगह कांक्रिट और प्लास्टिक ने ले ली है। कोई शहर इससे अछूता नहीं है। कभी-कभी किसी खास मौके पर कोई सेलिबे्रटी या फिर किसी संगठन के कार्यकर्ता कचरा सफाई अभियान या फिर पर्यावरण संरक्षण का कोई अभियान चलाकर लोगों को सचेत करने की कोशिश करते हैं। कचरा फैलाने वालों में गरीब नहीं हैं। गरीबों ने कचरे के ढेर से जीविका का रास्ता सुलभ कर लिया है। इसमें महिलाएं और बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है।

कचरा होगा आमदनी बढ़ेगी
संजय swadesh
नागपुर।
संतरनगरी में महिला और बच्चों समेत करीब पांच हजार लोग कचरा से अपनी जीविका चला रहे हैं। अनुमान है कि 65 प्रतिशत संख्या महिलाओं की है। इनके कल्याण के लिए कुछ संगठन सक्रिय होकर काम कर रहे रहे हैं, लेकिन कचरा चुनने वाले के जीवन स्तर में किसी तरह का सुधार नहीं दिखता है। हर वर्ष पर्यावरण दिवस के मौके पर संतरानगरी में किसी न किसी तरह के कार्यक्रम आयोजित कर पर्यावरण सरंक्षण की बात कही जाती है। पर कुछ ठोस नतीजा नहीं निकलता है। पर्यावरण में तरह-तरह के प्रदूषण घुलने की मात्रा हर साल बढ़ती जा रही है।
नागपुर के भांडेवाड़ी डंपिंग यार्ड में हर दिन शहर के कोने-कोने से दर्जनों ट्रक कचरा भर कर लाते हैं। पर शहर में कचरा-चुन कर इसकी साफ-सफाई की जिम्मेदारी भले ही कहने के लिए मनपा के पास हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है की नगर में हजारों ऐसे महिला और बच्चे हैं जो कचरे से न केवल अपना जीवन-यापन करते हैं, बल्कि शहर की गंदगी को कम करते हैं। हर दिन सड़े-गले, बदबू वाले कचरे की ढेर की खाक छानने वाले ये लोग उच्च शिक्षित नहीं हैं। कचरे से पर्यावरण को दूषित करने में इनकी भूमिका भी नहीं है। लेकिन हर दिन कचरे की ढेर से जीविका चलाने वाली महिलाएं शहर की स्वच्छता बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका हैं।
कचरा चुनने वाली चौथी कक्षा की कोमल, छठी कक्षा कि प्रतिज्ञा ने बताया कि वे स्कूल भी जाती हैं। पढ़-लिख कर क्या बनेंगी, अभी तक कुछ सोचा नहीं है। कचरा चुन कर घर का चूल्हा जलाने वाली सुनीता ने बताया कि हर दिन कचरे की ढेर की खाक छानने से 50 से 60 रुपये की आमदनी हो जाती है। पुष्पा राऊत के दो लड़के और एक बेटी हैं। बेटी को पढ़ा रही हैं। पुष्पा नहीं चाहती कि उनकी बेटी भी बड़ी होने तक कचरा से ही अपनी जीविका की राह निकाले। बेटी भी मां के साथ हर दिन इस काम को देती है। स्कूल जाती है, पर सहपाठी नहीं जानते कि वह कचरा भी चुनती है। इसलिए कोई भेदभाव नहीं करता है। रुकमा विभा और मीरा ने बताया कि इस काम को छोड़ कर हर दिन इतनी आमदनी वाला दूसरा कौन-सा काम कर सकते हैं? लोग हमे अछूत मानते हैं, इसलिए घर में नौकरानी भी नहीं रख सकते हैं। पर्यावरण को दूषित करने वाले कचरे के कम होने की दूर-दूर तक संभावना नहीं दिख रही है। जब कचरा होगा तो इसे चुनने वाले की जरूरत तो पड़ेगी ही। जहिर से तमाम अभियान कचरा चुनने वाले का न जीवन स्तर सुधार सकते हैं और न हीं उनका पेशा बदलवा कर पुर्नवास करवा सकते हैं।
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नाग नदी का मिटते अस्तिस्व

नागपुर। दुनिया के अधिकतर विकसित शहर किसी न किसी नदी के किनारे बसे हैं। लेकिन बहुत कम शहर ही ऐसे हैं जिसके बीचो-बीच एक नदी गुजरती हो। ऐसे शहरों में नागपुर एक रहा है। नगर के बीचों-बीच गुजरने वाली नाग नदी गंदा नाला बना चुकी है। आज स्थिति यह है कि इसके पास से गुजरने वाले लोग इसकी बदबू के कारण दूर भागते हैं। नदी के नाम से पहचाने जाने वाला नागपुर का नाग नदी नाला बन चुकी है। नयी पीढ़ी इसे नाला के रूप में ही जानती है। उसके सामने नदी कहने पर उसे आश्चर्य होता है।
जानकारों का कहना है कि पिछले साल नागपुर महानगर पालिका और केंद्र की जेएनयूआरएम योजना के तहत नाला नहरीकरण योजना बनाई थी। इसके लिए 248 करोड़ रुपये खर्च के लिए तय किए गए थे। लेकिन इस योजना का क्या हुआ, इसका कहीं कोई आता-पता नहीं है। महापौर देवेन्द्र फडणवीस के कार्यकाल 1995 से 2000 में नाग नदी के सौन्दर्यीकरण के लिए एक विशेष योजना बनाई गई थी। योजना बनाने के लिए इकोसिटी फाऊंडेशन नामक संस्था की मदद की बात भी कही गई थी। बाद में केंद्र की राजग सरकार के कार्यकाल में केंद्रीय नदी संरक्षण प्रकल्प में नाग नदी को भी शामिल कर लिया गया। इसके लिए 30 करोड़ रुपये की भी मंजूरी हुई थी। राशि का कुछ हिस्सा राज्य सरकार व मनपा को भी वहन करना था। इस पर नीरी ने प्रदूषण रिपोर्ट भी तैयार की थी। लेकिन योजना कब और कैसे ठंडे बस्ते में चल गई? किसी को कुछ पता ही नहीं चला।
सामाजिक कार्यकर्ता उमेश चौबे का कहना है कि नदी की सफाई के लिए कई बार मांगे तो उठी, लेकिन कोई आंदोलन नहीं हुआ। 2002-2003 में जब नागपुर का त्रिशताब्दी महोत्व मनाया गया, तब इसकी सफाई के लिए विशेष मांग की गई थी। श्री चौबे का कहना है कि इसी वर्ष मुंबई में उनकी तत्कालीन मुख्यमंत्री विलाश राव देशमुख के साथ बैठक हुई। बैठक में नाग नदी की सफाई की मांग उठाई गई। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने एक प्रेसवार्ता में यह घोषणा भी कि की नाग नदी की सफाई की जाएगी। लेकिन हुआ कुछ नहीं। इसके अलावा मनपा के बजट में नाग नदी की सफाई के लिए लाखों की राशि आवंटित होती रही है। लेकिन काम कुछ नहीं हुआ है।

इसके अलावा हर साल मनपा की ओर से मानसून आने से पूर्व बरसाती पानी की समुचित बहाव के लिए इसके साफ-सफाई का दावा किया जाता है, लेकिन हकीकत इस नदी के पास से गुजरने पर पता चलता है कि इसके लिए कितना काम हुआ है? लगभग 19 किलोमीटर लंबी यह नदी कूड़ा-करकट और प्रदूषण से गंदे नाले में का रूप ले चुकी है। मनपा नाग नदी की साफ-सफाई के लिए जो अभियान चलाती है, लेकिन इसका पर केवल रुपये ही खर्च होते हैं। हर साल की तरह इस साल भी साफ-सफाई हकीकत में यही है कि इसका कचरा निकला कर किनारे पर ही रख दिया जाता रहा है, बारिश आते ही पानी के बहाव के साथ यह कचरा फिर से नाले में ही मिल जाएगा।

सिचाईं के पानी का स्रोत

भोंसला बंशज राजे मुढ़ोजी भोंसले यह स्वीकारने से नहीं हिचकते कि नाग नदी नहीं रही। यह पूरी तरह से गंदे नाले में परिवर्तित हो चुकी है। इसकी जो वर्तमान चौड़ाई है, वह कभी तिगुनी होती थी। इसके किनारे अतिक्रमण हुए हैं। कभी धोबियों के लिए यह नदी बेहद उपयोगी होती थी। ब्रिटिश शासन काल से कपड़े धोने के लिए उनके लिए घाट बने थे। छह-सात घोबी घाट तो 1965 तक चले। आज कहीं भी यह घाट नजर नहीं आता है। नदी की पानी का उपयोग आमजन विभिन्न कार्यों में करते थे। इसके किनारे होने वाली खेती की सिंचाई, नाग नदी के भरोसे ही थी। किनारे कई मंदिर थे। महाशिवरात्री और नागपंचमी के दिन मेले लगते थे। राजधानी बने रहने तक इसका पानी कई कार्यों में उपयोग होता था। किनारे के बगीचे इसी से सींचे जाते थे। रेसिम बाग, तुलसी बाग में कुंए तो थे, लेकिन सिंचाई के लिए इसके पानी का उपयोग ज्यादा होता था। आश्चर्य की बात यह है कि विभिन्न जन-समस्याओं व पर्यावरण से संबंधित मामलों को लेकर न्यायालय में कई जनहित याचिका दायर की गई। लेकिन नाग नदी की सफाई के लिए किसी ने कोई जनहित याचिका दायर नहीं की। नागपुर नगर की रचना के केंद्र में यह नदी रही है।
करीब 60 के दशक में इसके आसपास अतिक्रमण शुरू हुआ। इसका सारा दोष नगर पालिका को जाता है। नगर पालिका ने इसकी बार्बदी में कम भूमिका नहीं निभाई है। कई जगहों पर नाग नदी की जमीन को स्वयं नगर पालिका प्रशासन ने दूसरे को दिया। सड़क को बढ़ाने के लिए इसकी चौड़ाई घटाई। नदी के किनारे नगर को बसाने में भोंसले राजाओं का उद्देश्य था कि नगर के आमजन को पानी के परेशानी न हो। पानी के कारण नगर में हरियाली से पर्यावरण स्वच्छ रहने के साथ समृद्धी रहेगी। पुराने नागपुर का भूगोल नदी के इर्द-गिर्द ही है। जिस नदी के नाम से शहर को पहचाना जाता है, उसका अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। 25-30 साल पहले तक नदी का जल अशुद्ध नहीं था और पीने के अतिरिक्त पानी की समस्या नहीं होती थी।
नदी के किनारे रहने वाले बच्चे बीमार
नीरी ने अपनी रिपोर्ट में नाग नदी के पुनर्जीवन को शहर के स्वस्थ व पर्यावरण की दृष्टिï से महत्वपूर्ण बताया है। नीरी के विशेषज्ञों का कहना है कि नदी का जल प्रवाह ढलान की ओर होने से इसमें परेशानी नहीं आएगी। संस्था ने नदी के किनारे रहने वाले कुछ बच्चों की श्वसन प्रक्रिया की जांच की थी। इन बच्चों की तुलना बेहतर वातावरण में रहने वाले दूसरे बच्चों के श्वसन प्रक्रिया से की गई, जिसमें नाग नदी के किनारे रहने वाले बच्चों में सांस लेने में समस्या होने का खुलासा हुआ था।
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मंगलवार, जून 01, 2010

भीषण गर्मी से मर रहे हैं 'फ्लाई फॉक्सÓ

संजय कुमार
नागपुर। बीते सप्ताह की गर्मी केवल मनुष्यों पर कहर बन कर नहीं बरपी है। पशु-पक्षियों और अन्य वन्य जीवों पर भी इसका भीषण असर पड़ा है। गत सप्ताह भीषण गर्मी से नगर में करीब 150 चमगादड़ मर गए। चमगादड़ों की मौत से पक्षी मित्रों में मायूसी है। भारतीय पक्षी संरक्षण नेटवर्क के नागपुर संयोजक राजू कसांबे ने बताया कि वे कुछ दिन पूर्व जब महत्वपूर्ण पक्षियों का मुआयना करने वर्धा रोड़ स्थित केंद्रीय करागृह और रहाटे कालोनी चौक समीप के तालाब के पास पहुंचे तो चौंक गए। जब उन्होंने यहां पहले भ्रमण किया था, तो यहां के बरगद के पेड़ से लटकने वाले कुल चमगादड़ों की संख्या 300 के करीब थी। लेकिन इस बार लटकने वाले चमगादड़ों की फौज आधी दिखी। ज्ञात हो कि नगर के कुछ खास क्षेत्रों के बरगद आदि के पेड़ ही चमगादड़ों के लटकने के प्रमुख ठिकाने हैं। इनमें से प्रमुख रूप से नागपुर स्थित केंद्रीय करागृह के पास स्थित तालाब, शुक्रवारी तलाब के पार्क के पेड़, और सिविल लाइन्स में उद्योग भवन के पास के बरगद के पेड़ों पर दिन के समय चमगादड़ लटकते हुए दिखाई देते हैं। ज्ञात हो कि दिन के समय तेज रौशनी के कारण चमगादड़ को दिखाई नहीं देता हैं। इसलिए वे सुबह सूर्य की किरणें निकलने से पहले ही अपने ठिकाने पहुंच कर पेड़ की टहनियों से लटक जाते हैं। लेकिन दिन के समय भीषण गर्मी और सूरज की तीखी किरणों ने सैकड़ों चमगादड़ों की जान ले ली है। गर्मी से गश खाकर पेड़ से नीचे गिरने वाले चमगादड़ों पर कुत्ते झपट पड़ते हैं और उनका काम तमाम कर देते हैं। पक्षी मित्रों का कहना है कि चमगादड़ों की इस तरह से मौत से इनकी घटती संख्या चिंताजनक है। वहीं कुछ लोगों में यह भ्रम है कि चमगादड़ रात में फलों को नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि चमगादड़ एक तरह से किसानों को मित्र हैं, वे उन्हीं फलों को खाते हैं जो खराब हो चुके होते हैं या फिर उन्हीं फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जो फल बनने वाले नहीं होते हैं। भूख मिटाने की प्रक्रिया में चमगादड़ ऐसे कीटों को खाते हैं जो फसल या फूलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इस तरह से चमगादड़ किसानों के दुश्मन नहीं मित्र होते हैं। पक्षी मित्रों का कहना है कि चमगादड़ 'फ्लाई फॉक्सÓ हैं। लेकिन इस तरह भारी संख्या में मरने से प्रकृति असंतुलन का खतरा बढ़ता जा रहा है। ज्ञात हो कि चमगादड़ों को वन्य जीव सुरक्षा कानून 1972 के तहत सुरक्षा प्रदान की गई है। लेकिन समाज में फैली भ्रांतियों के कारण किसान इन्हें अपना दुश्मन मानकर इन्हें मारने के लिए तरह-तरह के उपाय करते हैं। नागपुर में शायद यह पहला मौका है जब इतनी बड़ी संख्या में चमगादड़ों के मरने की घटना हुई है। भीषण गर्मी से इतनी ही संख्या में यवतमाल जिले के वणी में पक्षियों के मरने की खबर आई थी।

मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

1500 करोड़ खर्च, फिर भी कंठ सूखा

नागपुर। भीषण गर्मी में अघोषित बिजली कटौती के साथ ही पेयजल की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। गत दिनों नागपुर आए केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी से बताया कि नागपुर के आधारभूत ढांचा के विकास के लिए महानर पालिका को जवार लाल नेहरू नेशनाल अर्बन रिनीवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत 1500 करोड़ रूपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। रविवार को प्रकाशित इस खबर से संतरानगरी के लोग हैरत में हैं। उन्हें आश्चर्य इस बात की है किआधारभूत ढांचे के विकास में इतना खर्च होने के बाद भी पानी के लिए हाहाकार क्यों मचा हुआ है। जबकि जलापूर्ति से जुड़ी चार परियोजना समय से पहले ही पूरी हो चुकी है। जयपाल रेड्डी ने नागपुर जब कहा कि नागपुर में खर्च 1500 करोड़ रूपये के कार्यों का वे ब्यौरा लेंगे। इससे मनपा का जल प्रदाय विभाग में खलबली मची हुई है। क्योंकि जेएनएनयूआरएम का पूर्ण रूपये से क्रियान्वयन 2012 तक होना है, योजना को शुरू हुए चार साल हो चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि इस राशि के खर्च में भारी धांधली और अनियमितता बरती गई है। वहीं केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की सरकार और मनपा में भाजपा का शासन होने से समीक्षा को लेकर रेड्डी खासे गंभीर दिखे। पानी के बढ़े हुए बिलों को लेकर उन्होंने राज्य मुख्यमंत्री तक से बातचीत करने को भी कहा।
मनपा आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार से मिली इस राशि को पाइल लाईन से नष्ट होने वाले जल को रोकने और इसकी आपूर्ति व्यवस्था को और उन्नत करने के अलावा के अलावा फूटी हुई पाइप लाइन के मरम्मत आदि पर खर्च किया गया। पूर्व महापौर विकास ठाकरे इस फंड के दुरुपयोग और योजना में कत्थित भ्रष्टाचार का पहले ही आरोप लगा चुके हैं। मनपा कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार पाइप लाइनों से होने वाले रिसाव को दुरुस्ती किया जा चुका है। इस पर करीब 323 करोड़ का रूपये का खर्च आया। इसी तरह से जलापूर्ति के लिए पाइलाइनों का विस्तार और उनके नवीनीकरण का कार्य भी समाप्त हो चुका है। इसमें करीब 4349 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। महानगर पालिका की मानें तो जेएनएनयूआरएम के तहत मनपा ने आधारभूत ढांचे के विकास के लिए कुल 17 योजनाएं चलाई थी। महज चार योजनाएं ही अभी पूरी हुईं है। अधिकतर योजनाएं अभी चालू है या फिर वह शुरू होने की प्रक्रिया में है।
गैर-सरकारी संगठन जनआक्रोश के अध्यक्ष डा. अनिल लद्धड ने बताया कि जेएनएनयूआरएम के तहत पेयजल की आपूर्ति के लिए बेहतर कार्य किया गया होता, तो नगर में कोई इलाका प्यास नहीं रहता। इस फंड की भारी भरकम राशि खर्च कर मनपा ने 22*7 की तर्ज पर जनगर में पेयजल आपूर्ति के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट सितंबर,2009 में बनी थी। इसकी शुरूआत मनपा के धरमपेठ जोन से हुई। तब यह कहा गया था कि इसके लिए नये मीटर लगेंगे। पर आज हकीकत यह है कि इस जोन के आधे से भी ज्यादा घरों में 22*7 तर्ज पर जलापूर्ति तो दूर की बात है, अभी तक पानी के मीटर तक नहीं बदले। यह स्थिति नगर के रिहायसी इलाके की है। इसलिए नगर के दूसरे विकसित इलाकों की हालत कैसी होगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अब इस योजना को असफल होते देख मनपा ने पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का शिगूफा छेड़ दिया। लेकिन इस योजना के लागू होते ही बार-बार पानी की दरों में बढ़ोतरी के बाद भी पेयजल की सुचारु आपूर्ति नहीं होने से जनता का आक्रोश बढ़ा हुआ है। जबकि जयपाल रेड्डी को भी इस योजना के बारे में जानकारी नहीं थी।
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सोमवार, अप्रैल 19, 2010

अब तेंदुए पर गड़ी शिकारियों की कातिल नजर

देशभर में पहली तिमाही में मारे गए 291 तेंदुए, विदर्भ में आधे दर्जन से ज्यादा
संजय स्वदेश
नागपुर।
बाघ की खालों और अन्य सामग्री के अवैध व्यापार को रोकने के लिए देशभर में कड़ी सुरक्षा होने के बाद अब शिकारियों की खतरनाक नजर तेंदुए को लग गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल और हड्डियों की अच्छी खासी मांग है। पर्यावरण प्रेमी और वन्य अधिकारियों का अनुमान है कि हर साल देशभर में करीब 500 तेंदुओं का शिकार होता है। इसमें विदर्भ के जंगलों के तेंदुए भी शामिल हैं। वन विभाग के सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र के जंगल ही नहीं देशभर के जंगलों से तेंदुए उसी तरह से गायब हो रहे हैं, जिस तेजी से बाघ गायब हो रहे थे। लेकिन सरकार का पूरा ध्यान बाघों के संरक्षण पर है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि गत तीन वर्ष में देशभर में तेंदुओं की संख्या का आठवां हिस्सा शिकारियों का शिकार बन गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल की अपेक्षा उनकी हड्डियों की मांग ज्यादा है। खासकर चीन में यह मांग अधिक है। यहां इन हड्डियों का इस्तेमाल दवाएं बनाने में होता है। स्थानीय शिकारी तेंदुए की खाल के लिए करीब 20 से 35 हजार रुपये तक कीमत पाते हैं। बड़े शहरों में सौदा तय होने पर खाल की कीमत 50 हजार रुपये तक भी हो जाती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक लाख रुपये तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में करीब 8,000 तेंदुए हैं। देश में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा तेंदुओं की हड्डियों और खाल के अवैध व्यापार का मुख्य केंद्र माना जाता है।
वन विभाग सूत्रों का कहना है कि इस साल की पहली तिमाही में देश भर में करीब 291 तेंदुए मारे गए हैं। इसमें आधे दर्जन से भी ज्यादा संख्या के तेंदुए विदर्भ के जंगलों के हैं। वर्ष 2009 में 290 और 2008 में 157 तेंदुए मारे गए थे। गत पर जहां एक साल में 290 तेंदुए मारे गए थे, वहीं यह आंकड़ा इस वर्ष की पहली तिमाही में ही पूरी हो गई। मतलब साफ है कि हर दिन कम से कम तेंदुए शिकारियों के हाथ लग रहे हैं। यदि तेंदुए की शिकार की गति इसी तेजी से बढ़ती रही तो आने वाले पांच से सात वर्षों में भारत से तेंदुए की प्रजाति ही समाप्त हो सकती है। जानकारों का कहना है कि बाघों की गणना चलने से वन विभाग के अधिकारी खासे सक्रिय है। इसलिए शिकारियों ने तेंदुओं को शिकार बनाना शुरू कर दिया है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 के अुनसार वन क्षेत्र के किसी भी जीव का शिकार अपराध है। पर यह कानून संगठित वन्य जीवन अपराध को रोकने में नकाम साबित हो रहा है।

शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010


कल कहीं मायूस भालू न मर जाए

संजय स्वदेश
कभी नागपुर का 'मिनी चिडिय़ाघरÓ महाराजबाग को देखने की ललक लिए दूर-दराज के लोग आते थे। यहां चार दशक की उम्र पार कर चुके लोग कहते हैं, नागपुर में पहली बार आने वाले हर किसी के मन में महाराजबाग जाने की ललक होती थी। जमाना बदला, तो ललक कम हो गई। किसे फुर्सत है, पिंजड़े में कैद वन्य जीवों को निहारने की। धीरे-धीरे यहां के वन्य जीव भी कम होने लगे, तो लोगों में इसके प्रति आकर्षण कम हो गया। लेकिन अभी भी इतवार और अन्य छुट्टियों के दिन लोग बच्चों को यहां लेकर आते हैं। शहर की आबादी बढऩे से प्रेमी युगलों के लिए यह जगह डेटिंग के लिए अच्छी लगी। अब महाराजबाग प्रशासन ने यहां प्रवेश लिए निजी हाथों में टिकट का ठेका दे दिया है। इससे हर वर्ष महाराजबाग को ठेके से मोटी कमाई हो जाती है। ठेकेदार प्रेमी युगलों से दोगुने दाम में टिकट बेचकर मुनाफा कमाते हैं। पर यहां आने वाले वयस्क बच्चों बच्चों को वन्य जीवों को दिखाते हुए शायद की उनकी आंखों में झांक कर उसकी पीड़ा समझने की कोशिश करते होंगे। फिलहाल, विदर्भ सूखे के साथ भीषण गर्मी की चपेट में है। दिल्ली में 40 डिग्री तापमान से बेहाली की खबर देश देखता है। ऐसी गर्मी को सहन करने वाले और अनुमान करने वाले जरा यह सोचे की 45 डिग्री के तापमान में क्या होता होगा। आग बरसाते आसमान ने गत तीन दिनों में ही महाराज बाग के तीन वन्य जीवों को मौत के मुंह में सुला दिया।
सतही स्तर पर इसकी खबरें तो यहां के समाचारपत्रों की सुर्खियां बनीं। पर हकीकत यह है एक मंत्री की गलती से यहां की पूरी व्यवस्था ठप्प हो गई। खबरिया चैनलों को देखने वालों को याद होगा कि गत वर्ष नागपुर में एक मंत्री ने जिद में आकर महाराजब बाग के बाघ के पिंजरे में अपने सुरक्षाकर्मी और प्रेस के साथ घुस गए। बाघ को पुचकार कर वाहवाही लूटी। 'बाघ बहादुर मंत्रीÓ शीर्षक से सुर्खियों में आई यह खबर मंत्री के लिए गले की हड्डी बन गई। लिहाजा मामले की लिपापोती के लिए यहां के प्रभारी डा. सुनील बावस्कर को अकोला हस्तांरण कर दिया गया। अकोला के प्रभारी को यहां भेज दिया गया। लेकिन पूर्व प्रभारी डा. सुनील बावस्कर कोर्ट की शरण में चले गए। कोर्ट ने स्थांतरण पर तत्काल रोक लगा दी। मामला लंबित है। पर असल में इससे महाराजबाग की सुचारु रूप से चल रही व्यवस्था लंबित पड़ गई। एक ही जगह दो-दो प्रभारी ड्यूटी पर। प्रभारी पद को लेकर अंदरूनी विवाद इतना गंभीर हो गया है कि यहां के प्राणी भीषण गर्मी में राम भरोसे हो गए हैं। इनकी हालत देखकर लगता है कि अब इनका कोई मां-बाप नहीं रहा। इसी सब का परिणाम यह निकला कि पिछले सप्ताह यहां इलाज के लिए लाया गया राष्ट्रीय पशु मोर ने भी दम तो दिया। मोर के मरने की गम अभी महाराज बाग भूला भी नहीं पाया था कि गुरुवार को एक और मोर और एक हिरण भीषण गर्मी को सहन नहीं कर पाये। गुरुवार की शाम छह बजे जहां एक मोर ने दम तोड़ा, वहीं रात करीब आठ बजे एक हिरण ने दम तोड़ दिया। सुबह 11 बजे मृत हिरण और मोर को पशु चिकित्सा अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। मोर करीब एक वर्ष का था। इसकी आयु 5 वर्ष की मानी जाती है। वहीं हिरण की आयु 6 से 7 वर्ष की बताई जा रही है, जिसकी औसत आयु 15 से 20 वर्ष की होती है।
मोर और हिरण की मौत होने की खबर महाराजबाग के अधिकारियों को मिलते ही वे सुबह वहां निरीक्षण के लिए पहुंचे। निरीक्षण की औपचारिक भर था। दो मृत्य वन्य जीव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। घास पर चलने वाले हिरण, सांभर और चितल यहां पत्थरिले जमीन पर कुलांचे मारते हैं। हर पिंजड़ा गंदा है। 45 डिग्री की के तापमान में जब सभी पशु बचैन होकर छाये में खड़े दिखते हैं, तो वहीं भालू पिजड़े के लोहे से सिर टिकाये दिखा। ऐसा लगता है कि वह यहां से आजाद होने के सपने में इतना मशगूल है कि आसमान से बरस रहे आग की परवाह ही नहीं है। निश्चय ही वह बीमार होगा। शायद आने वाले दिनों में ऐसी भी गर्मी पड़ी और प्रशासन लापरवाह रहा तो, वह भी भगवान को प्यारा हो जाएगा। पर इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है। दो-दशकों से गांव में मदारी कोई भालू लेकर नहीं आता है। इसलिए इन दो दशकों में बड़ी हुई पीढ़ी भालू के प्रति लागव कैसे रखेगा। आज कौन रामायण पढ़ता है जो श्रीराम की सेना में भालू की प्रजाति 'जामुवंतÓ की महत्ता समझे।
'वनराजÓ बाघ पिंजड़े में कूलर लगा है। पर दोपहर के समय वे भीषण गर्मी में वे छोटे पिंजड़े से निकल कर बड़े पिजड़े के परिसर में घुमते हैं। बेचैनी से इधर-अधर भटकते हैं। पता चला कि बाघ के पिजड़े में रखे कूलर में पानी ही नहीं डाला जाता है। फिर कूलर से ठंडी हवा कहां से आएगी। वनराज समझते होंगे कि इस कूलर निकलती लू से बाहर की गर्मी अच्छी।
सरकार को तनिक भी इस बात का ख्यान नहीं है कि पिछली बार मंत्री की एक भूल ने यहां की पूरी व्यवस्था को लचर कर दी। दो-दो प्रभारी आ जाने से यहां की कर्मचारियों की तो चांदी हो गई है। वे किसी की सुनें। कौन-असली और प्रभावी प्रभारी है, इसको लेकर दोनों प्रभारी दुविधा में है। इसलिए वे भी सुस्त पड़ गए हैं। इसका सीधा असर यहां की व्यवस्था पर पड़ है। एक तो महाराज बाग पहले से ही कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है, उपर से प्रभारी पद के झगड़े से पशुओं की देखरेख की व्यवस्था पूरी तरह से बदहाल हो चुकी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार महाराज बाग में करीब 80 वन्य जीव हैं। इनकी देखरेख के लिए 20 कर्मचारियों का पद है। फिलहाल 10 कर्मचारी ही कार्यरत हैं। प्रभारियों के झगड़े के कारण यहां के अन्य कर्मचारी भी खूब आराम फरमा रहे हैं। पशुओं के वाड़े में रखा पानी कई दिनों तक बदला नहीं जाता है। धूप के कारण वाडे का पानी भी उबल जाता है। इससे प्यासे जीव प्यासे ही रह जाते हैं। यहां के वन्य जीवों की बेचैनी का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जैसे की कोई चीतल, सांभर और हिरण के वाडे के पास आता है, वे दौड़ के इस उत्सुकता से आते हैं कि कोई उन्हें कुछ खिला दे। पर कोई चिडिय़ा घर में इन्हें खिलाने के लिए कुछ लेकर तो नहीं आता है। संयोग से मेरी जेब में भुने हुए चन्ने का छोटा सा पॉकेट था। जैसे ही चने का पॉकेट हाथ में लिया। पांच-छह चीतल और हिरण यह समझ गए कि वह खाने की चीज है। पिजड़े के छोटे तारों से मुंह का छोटा-हिस्सा बाहर निकाल दिया। मुश्किल से ही सही मेरी हथेली को स्पर्श करते हुए उनके जीभ ने दो-चार दाने अपने मुंह में खींच लिये। यह देख चीतल, सांभर और हिरण का पूरा झुड़ मेरी ओर बड़ा। पर उन सबके पेट भरने भर के लिए चने कहा थे। पूरे चन्ने उनके वाड़े में फेंक दिया। सभी लपके। मिनट भर में चन्ने चट कर गए। फिर उत्सुकता से खड़े होकर हमें निहारने लगे। भले ही ये चीतल, सांभर और हिरण हमारी भाषा नहीं बोलते हों, पर दो-चार चने के दाने खाने वाले हिरणों ने अपने कृतज्ञता भरे आंखों की भाषा से हमें एहसास करा दिया कि यहां वे भूखे रहते हैं। भूखे पेट से शरीर जल्दी गर्मी की चपेट में आता है। यह लिखते वक्त बार-बार उन व्याकुल हिरणों की आंखे मेरी आंखों के सामने आ रहा है। मन में डर लग रहा है कहीं कल कोई दूसरा हिरण या वह मायूस भालू न मर जाए।
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शनिवार, अप्रैल 10, 2010

कटघरे में कब खड़े होंगे 'वनराज के हत्यारे


नागपुर में बाघ के पोस्टर के साथ फोटो खिंचवाता एक वन्य जीव प्रेमी

संजय स्वदेश
बाघों के गणना का कार्य जारी है। गणना कार्य के लिए जुटाये गए संकेतों के समग्र अध्ययन के आधार पर ठोस निष्कर्ष निकालने से पहले ही किसी क्षेत्र में कम तो किसी क्षेत्र में ज्यादा बाघ होने की खबर भी आ रही है। तरह-तरह के कयास हैं। कोई कह रहा है, बाघों की संख्या वर्तमान संख्या 1411 से कम होगी। कही यह संख्या बढऩे की खबर आ रही है।
अब ये आंकड़े घटे या बढ़े, एक बात तय है, बाघों की संख्या एकदम दोगुनी तो होने से रही। तमाम हो-हल्लाओं के बाद भी वन्य जीव (विशेकर बाघ) का शिकार व उनके अंगों की तस्करी नहीं रूकी। देश में कई जघन्य मानवीय अपराधों के दोषी के खिलाफ तो सजा की खबर आपने पढ़ी होगी। पर क्या आपको याद है कि आपने वन्य जीव कानून के अंतगर्त दोषी किसी अपराधी की सजा के बारे में कभी खबर पढ़ी है। इस सवाल पर शायद आप निरुत्तर हो, पर निरुत्तर होने वालों में आप अकेले होंगे। देश में लाखों लोग ऐसे होंगे जिन्होंने बाघों के बचाने की चर्चाओं को सुना होगा, लेकिन इनकी हत्या के दोषियों के सजा के बारे में शायद ही सुने हो।
आप मान या न मानें, यह हकीकत है। बाघ को हिम्मती हत्यारों में कानून का भय नहीं है। फिलहाल अभी केवल महाराष्ट्र की बात करते हैं। राज्य में वन्य जीव संरक्षण कानून-1972 के उलंघन के खिलाफ विभिन्न वन सर्कल में दर्ज मामले वर्षों से लंबित है। महाराष्ट्र में कुल 11 वन सर्कल में वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत फिलहाल 675 मामले लंबित है। लंबित मामलों में नागपुर सर्कल में सबसे ज्यादा 200 केस लंबित है। दूसरे स्थान पर मेलघाट सर्कल है, जहां फिलहाल 158 मामले लंबित है। सबसे कम लंबित मामलों में मुंबई सर्कल है, जहां केवल 4 मामले ही लंबित है। अधिकतर मामले 10 से 15 साल पुराने हैं। मामलों के लंबित होने से ही शिकारियों व वन्य जीव तस्करों के हौसले बुलंद हैं। गत तीन वर्ष के आंकड़े कहते हैं कि महाराष्ट्र में वन्य जीव संरक्षण कानून के उल्लंघन के 123 आरोपी बरी कर दिए गए। वहीं इस अवधि में महज 55 आरोपियों पर ही दोष सिद्ध किया जा सका। मतलब कुल आरोपियों में महज 11 प्रतिशत पर ही दोष सिद्ध हो पाता है। बाकी के 89 प्रतिशत किसी न किसी तरह के दांव-पेंच लगाकर या कानून की कमजोरी या सरकारी अमले की लापरवाही के कारण साफ बच कर निकल जाते हैं। इन आंकड़ों दर्ज ज्यादातर मामले वन्य जीव शिकार, खालो की तस्करी और वन्य जीवों के विभिन्न अंगों की अवैध व्यापार के हैं।
वन विभाग के सूत्रों की मानें तो इस कानून के तहत दर्ज मामले इसलिए प्रालंबित हैं, क्योंकि इसकी जांच प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी गंभीरता से नहीं लेते हैं। पहले तो केस दर्ज नहीं होता है, यदि किसी तरह से केस दर्ज हो भी जाता है तो जांच से जुड़े अधिकारी कुछ ले-देकर केस को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। वन विभाग के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि केस के लंबित होने की मुख्य वजह संबंधित विभाग के कर्मचारियों को आवश्यक प्रशिक्षण न होने के अलावा, स्टॉफ की कमी, प्रोत्साहन का अभाव, आवश्यक वाहनों की कमी समेत अन्य कई जरूरतों का अभाव है। सुना है कि मध्य प्रदेश सरकार ने वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत दर्ज मामलों के जल्दी निपटारे के लिए ‘ग्रीन कोर्ट' का गठन किया है। यह कितना कारगर है, यह इसकी कोई खबर नहीं पढ़ी। पर विशेषज्ञ कहते हैं कि महाराष्ट्र में भी लंबित इन मामलों के निपटारे के लिए ऐसे कोर्ट के गठन किये जाने चाहिए। अभी तक सामान्य अदालत में ये केस होने से न्यायधिशों का ध्यान इस पर कम रहता है। इसके अलावा वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत दर्ज केस लडऩे के लिए जो सरकारी वकील होते हैं, उन पर भी पहले से ही दूसरे कई केस का भारी बोझ होता है। इसलिए भी वे इन मामलों को अपनी रुचि कम दिखाते हैं। इसके अलावा वन विभाग के पास भी न्यायाधिक अधिकारी की व्यवस्था नहीं होने से ये मामले समान्य अदालत में ही चलते हैं। इन मामलों के निपटारे के लिए न केवल ‘ग्रीन कोर्ट' की आवश्यकता है, बल्कि वन्य जीवों से जुड़ी एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला के साथ ही इस कानून के उल्लंघन करने वालों के खिलाफ जांच पड़ताल करने वाली एक विशेष शाखा होनी चाहिए। अभी भी वन विभाग से जुड़े अधिकारी कर्मचारियों में वन्य जीव कानून से जुड़ी जानकारियों का अभाव रहता है। स्वतंत्रण प्रशिक्षित कर्मचारियों की शाखा नहीं होने से मामले की जांच पुलिस करती है। वन क्षेत्रों में तैनात वन अधिकारी भी इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। कई बार तो उन्हें यह खुद ही नहीं पता रहता है कि मामले में अगली बार अदालत में कब पेश किया जाएगा। इस मामले में वे पूरी तरह से पुलिस पर निर्भर रहते हैं।
मामले की गंभीरता को समझते हुए इस मुद्दे को गत वर्ष लोकसभा में भी उठाया गया था। इसके बाद भी सरकार इसको लेकर दूर-दूर तक गंभीर नहीं दिख रही है। केंद्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोषण करते हैं। इसी बीच शिकारी-तश्कर अपना काम कर देते हैं। उन्हें कानून की कमजोरी मालूम है। समान्य समझ की बात है। निजी आंनद के लिए बाघों के शिकार के दिन लद गए। इनके अंगों की तस्करी से मोटी कमाई के उद्देश्य से इनका शिकार जारी है। संगठित गिरोह सक्रिय है। संगठित गिरोह के अपराधी कानून की कमजोरियों से खेलना अच्छी तरह से जानते हैं। तभी तो वन्य जीव संरक्षण के कानून भी बना तो अजादी के करीब ढाई दशक बाद 1972 में। पर कानून बनने के 38 साल बाद भी सरकार वन्य जीव का शिकार करने संगठित गिरोहों के मन में भय का वतावरण भी नहीं तैयार कर पाई।
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सोमवार, मार्च 29, 2010

कृषि भूमि के सहारे बढ़ेगा वन क्षेत्र


photo by me from manipur

संजय स्वदेश
गत कुछ वर्षों में वनों की लगातार कटाई से देश के वन क्षेत्रों में भारी कमी आई है। पर्यावरण के लिए यह निश्चय ही चिंता का विषय है। फिलहाल देश में 12 प्रतिशत वन क्षेत्रों की कमी है। यह कहना है भारतीय वन सर्वेक्षण के महानिदेशक तथा इंदिरा गांधी नैशन फॉरेस्ट अकादमी के निदेशक डा. आर.डी. जर्काता का। नागपुर के मूल निवासी जकार्ता ने नागपुर में एक बातचीत में कहा कि फिलहाल देश में 33 प्रतिशत भू क्षेत्रों में वन क्षेत्र होना चाहिए। लेकिन यह अभी 13 प्रतिशत कम 21 प्रतिशत के करीब है। अब इस कमी को दूर करने का एक ही उपाय- कृषि भूमि पर वृक्षारोपण है। लेकिन यह संभव नहीं दिखता है।
रियल इस्टेट क्षेत्र कृषि भूमि पर अपना जबददस्त कब्जा कर लिया है। फिलहाल वन क्षेत्र में वृद्धि के लिए उठाये जाने वाल सरकारी कदम नाकाफी है। जब केंद्र सरकार के एक जिम्मेदार अधिकारी यह बात कहें तो यह निश्चय ही चिंता की बात है। सरकारी कदम नकाफी होने पर हमेशा जनता को जागरूक होने का आह्वान किया जाता है। देश ही नहीं दुनिया में हो रहे जलवायु परिवर्तन को देखते हुए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण की आवश्यकता है। भारतीय वन सर्वेक्षण देश के जंगलों पर सेटलाइट के जरिए नजर रखता है। इसी आधार पर होने वाल वनों के अध्ययन रिपोर्ट को केंद्र सरकार को भेजी जाती है।
भारतीय वन सर्वेक्षण पिछले 22 वर्षों से हर साल केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भेज रहा है। इसके आधार पर ही केंद्र सरकार राज्यों के वन विभागों को आवश्यक दिशा निर्देश जारी करती है। केंद्र सरकार का हमेशा से यह तर्क होता है कि वन क्षेत्रों को बढ़ाने में योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकार के कंधे पर होती है। वहीं राज्य सरकार हमेशा किसी न किसी बहाने से अपना कंधा झटकती दिखती है। कभी फंड का रोना रोया जाता है, तो कभी केंद्र की ओर से देरी की बात कही जाती है। राज्य और केंद्र सरकार का सारा समय एक दूसरे पर दोषारोपण में ही चला जाता है।
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शुक्रवार, मार्च 12, 2010

200 रूपये में राजहंस!


मंगोलिया से हर वर्ष भारत में आने वाले दुर्लभ राजहंस (बार हेड़ेड़ गीज) को जाल बिछाकर पकड़कर उसे 200 से 300 रुपए में बेचे जाने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आय है। चन्द्रपुर और वर्धा के पक्षी मित्रों ने अपने स्तर का स्टिंग आपरेशन करते हुए दुर्लभ प्रजाति के राजहंस को बेचते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया। इस मामले से संबंधित एक दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के मुताबिक इस खुलासे से राज्य के पक्षीमित्र एवं पक्षी अध्ययनकर्ताओं को गहरा सदमा पहुंचा है। मंगोलियन राजहंस को भारतीय वन्यजीव संरक्षण कानून की अनुसूची-2 के अंतर्गत समिलित किया गया है। चंद्रपुर जिले के वरोरा पास के चारगांव बांध में प्राय: दुर्लभ मंगोलियन राजहंस सैकड़ों की तादाद में आते हैं। पिछले वर्ष चंद्रपुर के पक्षी अध्ययनकर्ता और निरीक्षकों ने चारगांव बांध परिसर में 640 राजहंस को खोजकर उसकी सूची वन विभाग को सांैपी थी। इस बार चारगांव बांध लगभग सूख जाने से यहां बहुत कम राजहंस ही दिखाई दिए, जबकि अधिकतर चंद्रपुर-वर्धा सीमा के खांबाड़ा समीप पोथरा बांध में चले गए। पर्यावरण प्रेमी और पत्रकार मुकेश वालके ने बताया कि कि यहां स्थानीय मछुआरों द्वारा जाल बिछाकर इस दुर्लभ प्रजाति के राजहंस को पकड़ा जाता है। पकड़े वाले इसका महत्व नहीं जाते हैं। वे पोथरा, समुद्रपुर और खांबाडा जैसे गांवों में दलालों को 200-300 प्रति नग में बेचा देते हैं। चन्द्रपुर के पक्षी मित्र प्रविण कडु, एम. एस. आर. शाद , योगेश सूर्यवंशी और धीरज खोंडे ने इस मामले की पोल खोलने की सोची। हकीकत जानने और देखने के लिए पोथरा गांव पहुंचे। तब उन्होंने एक मछुआरे को 300 रुपए में राजहंस बेचते देखा। उन्होंने स्वयं इस पक्षी को मछुआरे से खरीद कर उसे वन विभाग के स्थानीय कार्यालय में सूचित किय और राजहंस को वन अधिकारियों के हवाले किया। मछुआरे द्वारा राजहंस के पकड़े जाने के बाद से राजहंस बीमार था। वन अधिकारियों ने उसे इलाज के बाद सुरक्षित छोड़ देने की जानकारी दी है। पर खुले आसमान में उड़े मंगोलियन राजहंस को क्या पता कि भारतीय जमीन पर उसके कई दुश्मन उसे जाल में फांसने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।
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शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2010

बाघ बफर जोन पर भारी पड़े खनन माफिया


forest minister talking with journalist of nagpur

वनमंत्री पतंगराव कदम ने बताया कि बाघ बफर जोन के गांवों के पुनर्वसन की जरूरत ही नहीं
संजय स्वदेश
नागपुर।

आखिर खनन ठेकेदारों की प्रभावशाली लॉबी बाघ बफर जोन पर भारी पड़ गई। चंद्रपुर के ताड़ोबा-अंधारी में टाईगर रिजर्व परियोजना (टीएटीआर) से प्रभावित गांवों के पुनर्वास को लेकर गुरुवार को आयोजित बैठक के बाद नागपुर आए महाराष्ट्र के वनमंत्री पतंगराव कदम ने बताया कि बाघ बफर जोन के गांवों के पुनर्वसन की जरूरत ही नहीं है। मतलब साफ है। बाघ बफर जोन के लिए प्रस्तावित जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। वनमंत्री ने इस निर्णय के पीछे तर्क दिया कि वन विभाग बाघों की सुरक्षा और प्रभावित गांवों के लिए उनके लिए खुद खास व्यवस्था करने की योजना में है। यहां इंसान और जानवर एक ही क्षेत्र में रहेंगे। उन्होंने कहा कि अभ्यारण्य का निर्माण करते समय गांवों को अभ्यारण्य के क्षेत्र से बाहर बसाना पड़ता है। मगर बफर जोन में ऐसा नहीं करना पड़ता। ताड़ोबा में जानवरों को पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं है, पानी की तलाश में जानवर गांव-बस्ती तक आ जाते हैं। यह एक गंभीर समस्या है। इस विषय पर विभाग के शीर्ष अधिकारियों से चर्चा कर इसका हल निकाला जाएगा। सूत्रों का कहना है कि वनमंत्री ने बाघ बफर जोन के लिए प्रस्तावित जमीनों के अधिग्रहण नहीं करने का निर्णय खन माफियाओं के प्रभाव में आकर लिया है। जब से यह योजना प्रस्तावित थी, तब से खनन क्षेत्र के ठेकेदार वन विभाग के अधिकारियों के साथ मंत्री पर प्रस्तावित क्षेत्र को बाघ बफर जोन के लिए नहीं देने के लिए लॉबिंग कर रहे थे।

अब मारेंगे नहीं पकड़ेंगे बाघ

पिछले दिनों चंद्रपुर जिले में एक तेंदुए के कारण 5 लोगों की मौत हुई। पिछले साल भी वन्य जीवों का ग्रामीणों पर हमला हुआ था। जब लगातार लोग मर रहे थे, तब ग्रामीणों पर हमला करने वाले बाघों को मारने का आदेश दिया गया था। ऐसी घटनाओं के सवाल पर वनमंत्री का कहना है कि अब ग्रामीणों पर बाघ हमला करेंगे तो, पहले उसे पकडऩे का प्रयास किया जाएगा। पकड़ने का विकल्प नहीं मिलने पर ही उसे मारने का आदेश दिया जाएगा।

पुलिस के साथ पहुंचते है वनकर्मी
एक सवाल के जवाब में वनमंत्री ने कहा कि लोगों की शिकायत रहती है कि जब तेंदुएं किसी इंसान पर हमला कर मार दते हैं तो वन अधिकारी तुरंत घटनास्थल पर नहीं पहुंचते। इस शिकायत में आंशिक सच्चाई है, क्योंकि जहां ऐसी घटना होती है, वहां का माहौल अलग होता है। अगर वन अधिकारी अकेला उस जगह पर तुरंत चले जाएं तो आक्रोशित लोग वनकर्मी को भी मार सकते हैं। इसलिए घटनास्थल पर पुलिस पहुंचने के बाद ही वन अधिकारी घटनास्थल पर जाते हैं।

भूखे बाघ-तेदुएं गांव में आते हैं
जंगल में बाघ, तेंदुएं व अन्य जानवरों को खाना-पानी नहीं मिल पाता है, तो वे गांवों कि तरफ आते हैं। कई बार जानवरों की आपसी लड़ाई में भी कई बाघ और तेंदुएं घायल हो जाते हैं, उनको सुरक्षित रखने तथा उनका इलाज करवाने के लिए उन्हें रेस्क्यू सेंटर में रखना आवश्यक होता है। फिलहाल वन विभाग के अलग-अलग रेस्क्यू सेंटर में तकरीबन 60 तेंदुएं हैं। एक इंसान को मारने से किसी तेंदुएं की गिनती नरभक्षकी के रूप में नहीं की जाती, उसके लिए कुछ मानक निश्चित किये गये हैं। कुछ उद्यानों में तेंदुओं को रखा है। वन विभाग तेंदुओं पर ध्यान रखने के लिए विडियो रिकॉर्डिग की योजना में है।

मुआवजा बढ़ाने पर विचार
वन संरक्षित क्षेत्रों में जिन किसानों की खेती का जानवर नुकसान करते हैं, उन्हें वन विभाग की ओर से 2000 रूपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मुआवजा दिया जाता है। ज्यादा नुकसान होने पर 15 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर की दर से मुआवजा दिया जाता है। वन्य जीवों द्वारा किसानों की फसल नष्ट करने पर दी जाने वाली भरपाई की प्रतिहेक्टेयर दो हजार रूपये की दर से मुआवजा राशि काफी कम है। वनमंत्री का कहना है कि इसे बढ़ाने के लिए जल्द ही मंत्रिमंडल के सामने प्रस्ताव लाया जाएगा।

अभ्यारण्य की जमीन की भरपाई कहीं और
वनमंत्री पतंग राव कदम का कहना है कि राज्य में 6 सेंचुरीज(अभ्यारण्य) के गठन में जितना वन संरक्षित भाग कम होने वाला है, उसकी भरपाई राज्य में कहीं और की जाएगी। इसके लिए वन विभाग राज्य सरकार से जमीन की मांग करेगी। इसके लिए प्रस्ताव पुनर्गठन कमेटी में रखी गई है। लेकिन अभी इसकी मंजूरी नहीं मिली है। मानसिंग को अभ्यारण्य घोषित करने का निर्णय पहले ही हो चुका है।

शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010

बाघ बफर जोन पर खनन माफिओं का खतरा

संजय स्वदेश
नागपुर।
खनन ठेकेदारों की एक लॉबी वन विभाग के अधिकारियों के साथ साठगांठ कर ताड़ोबा-अंधारी में टाईगर रिजर्व परियोजना (टीएटीआर) को प्रभावित करने के लिए विशेष लॉबिंग कर रही है। इनके लॉबिंग के प्रभाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के वनमंत्री ने इस विषय पर चंद्रपुर में 25 फरवरी को चंद्रपुर में एक जनसुनवाई आयोजित की है। इसमें उठने वाले मुद्दे पर की रिपोर्ट के लिए एक समिति भी गठित की गई है। जबकि जानकारों का कहना है कि बाघों के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना के लिए इस तरह की जनसुनवाई की अवश्यकता ही नहीं है। हालांकि टाईगर रिजर्व क्षेत्र से बाहर 625 वर्ग किमी की जमीन अधिग्रहित करने का प्रस्ताव है। इससे 75 गांव विस्थापित होंगे। पिछले दिनों नागपुर आए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस योजना में विस्थापितों के पुर्नवास के लिए राज्य सरकार को 1000 करोड़ रुपया देने की घोषणा की थी। वरिष्ठ पर्यावरणविद् व सतपुडा फाऊंडेशन के प्रमुख किशोर रिठे का कहना है कि जनसुनवाई की रिपोर्ट के आधार पर टाईगर रिजर्व के बफर जोन का मामला नहीं टाला जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 के अनुसार कुछ परियोजनाओं
में ही जन सुनवाई की बात कही गई है, जबकि टीएटीआर बफर जोन इन परियोजनाओं से बाहर आता है। लिहाजा, इस पर किसी तरह की जनसुनवाई की जरूरत नहीं बनती है। जबकि राज्य वनविभाग स्वयं जनसुनवाई के लिए उत्सुक है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह जनसुनवाई खनन क्षेत्र के ठेकेदारों और उनके प्रभाव में आए भ्रष्ट अधिकारियों की साठगांठ से प्रभावित है। वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि यदि ताड़ोबा-अंधारी क्षेत्र के टाईगर बफर जोन को अंतिम रूप से मंजूरी मिल जाती है, तो खनन क्षेत्र में सक्रिय ठेकेदार व वनविभाग के कुछ आला अधिकारियों की अच्छी-खासी कमाई बंद हो सकती है। लिहाजा, इसी डर से एक योजनाबद्ध तरीके से लॉबिंग की जा रही है। सूत्रों की मानें तो खनन विभागों के ठेकेदरों की लॉबी ने राज्य के वन मंत्री पतंगराव कदम को बफर जोन की मंजूरी देेने से मना करने के लिए करीब-करीब तैयार कर लिया है। विरोध के लिए रिजर्व क्षेत्र से प्रभावि होने वाले ग्रामीणों को भी उकसाया जा रहा है। जिससे कि वे सरकार के इस योजना का विरोध करें और यह बफर जोन प्रभावित हो। बफर जोन से विस्थापित होने वाले लोगों की शिकायत सुनने के लिए वनममंत्री ने चंद्रपुर में एक जनसुनवाई का निर्णय लिया। खानन विभाग और वन अधिकारियों की एक लॉबी इस बैठक में जनप्रतिनिधियों के माध्यम से बफर जोन की प्रस्तावित योजना को प्रभावित करना चाहते हैं। जनसुनवाई में ग्रामीणों को जबरदस्त रूप से विरोध करने के लिए अभी तैयार किया जाने लगा है।
ज्ञात हो कि कि वर्ष 2006 के वन्यजीव संरक्षण कानून (1972) के अनुसार टाईगर रिजर्व क्षेत्र के आसपास के इलाकों को वन क्षेत्रों से जोड़ कर बफर जोन बनाने की मंजूरी दी गई थी। जिससे कि बाघ वन क्षेत्रों तक ही सीमित रहें। मनुष्यों पर हमला न करे और कोई बाघों का अवैध शिकार नहीं कर सके।

सोमवार, फ़रवरी 08, 2010

नौकरी मांगने की बजाय निर्माण करें मराठी माणुस : मनोहर जोशी

संजय स्वदेश
नागपुर। मराठी लोगों को नौकरी मांगने की बजाय नौकरी निर्माण करनी चाहिए। मराठी आदमी व्यापार उद्योग में सामने आए और सिर्फ पैसा कमाने का उद्देश्य उसके सामने हो और इसी उद्देश्य को सामने रखकर 24 घंटे मेहनत करे। यह आह्वान शिवसेना के वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी ने किया है। वे नागपुर के हिंगणना स्थित जे.एम.सी.सी.आई.के सत्कार समारोह में बोल रहे थे।

मनोहन जोशी ने कहा कि मैं यह बात इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि मैं भी एक व्यवसायी व्यापारी और उद्योजक हूं। समारोह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का सत्कार होने वाला था, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण नितिन गडकरी समारोह में नहीं आ सके। समारोह में मराठी उद्योजकों व्यवसायिकों को उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया गया। समारोह मेें सांसद शिवाजीराव अढालराव पाटिल प्रमुख अतिथि तथा उपमहापौर शेखर सावरबांधे, सुधीर सावंत, मनोहर सालवे, विकास देवधर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

जोशी ने कहा कि नागपुर में यह सत्कार समारोह आयोजित करने की वजह यह है कि यहां के मराठी उद्योजक अपने उद्योगधंधों को और तेज गति प्रदान करें और चेम्बर के सदस्य बने। इसी दिशा में चेम्बर काम कर रहा है और नागपुर के मराठी उद्यमी भी इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे। मराठी व्यक्ति व्यवसाय और धंधा कर पैसा कमाए। यही है अमीर बनने का एकमात्र रास्ता। उन्होंने कहा कि जिद करो, स्पर्धा करो। कष्ट उठाओ और खूब पैसा कमाओ। मैंने अपना व्यवसाय कोचिंग क्लास से शुरू किया, फिर तकनीक के क्षेत्र में गया। आज राज्य में 52 और देश के अन्य शहरों में 12 मेरी तकनीकी संस्थाएं हैं। होटल, बांधकाम आदि व्यवसाय भी मैं कर रहा है। इस देश में ऐसा कोई नियम नही है। जिसे 'मोड़ा' न जा सके इसलिए नियमों का हवाला मत दो। बल्कि पैसे कमाने के नियम बताओं उन्हें ढूंढने की कोशिश करो। श्री. जोशी ने नागपुर विभाग के चेम्बर के अध्यक्षपद के मंगेश काशीकर, सचिव के लिए प्रदीप नगरारे तथा कोषाध्यक्ष के लिए विवेक पाठक के नामों की चेम्बर के कार्याध्यक्ष शिवाजी घोषणा की।

राव पाटिल ने कहा कि मराठी व्यक्ति का विकास हो इसी उद्देश्य से 1994-95 में चेम्बर की स्थापना की गई थी। कला साहित्य के क्षेत्र में मराठी भाषी है। लेकिन उद्योग धंधों में नहीं मराठी लोगों को एक प्लेट फॉर्म पर लाने के उद्देश्य से चेम्बर की स्थापना की गई। देश-विदेश के बड़े-बड़े उद्योगपति जो प्रकाश में नही आना चाहते थे। चेम्बर ने उन्हे सामने लाया ताकि उनसे प्रेरणा और मार्गदर्शन लेकर मराठी व्यक्ति व्यवसाय में आगे बढ़ सके। इस अवसर पर गोपालराव सिराड़कर, अजीत दिवालकर, अतुल यमसवार, सुनील सिर्सीकर और डॉ. चंद्रशेखर देशपांडे का शाल श्रीफल व सम्मान चिन्ह देकर सत्कार किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई। मंच संचालन स्मिता खनगई तथा आभार प्रदर्शन प्रदीप नगरारे ने किया। कार्यक्रम बड़ी संख्या में मराठी उद्योजक उपस्थित थे।

बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया को बचाने रचा गया इतिहास

नागपुर। मंगलवार 2 फरवरी का दिन संतरानगरी के लिए ऐतिहासिक गवाह का दिन बन गया। इतिहास रचने का यह कार्य हुआ है, ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया को बचाने के नाम पर। धंतोली स्थित यशवंत स्टेडिम में सुबह 9 बजे से शुरू हुआ म्यूजिकल चेयर शो संभवत: दुनिया का अपने प्रकार का अब तक का सबसे बड़ा कार्यक्रम रहा। कार्यक्रम को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज करने के लिए आवेदन किया जाएगा। यशवंत स्टेडियम में जेसीआई ऑरेंज सिटी की ओर से आयोजित म्यूजिकल चेयर शो में 45 स्कूलों के 10129 बच्चों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के माध्यम से उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए दुनिया को संदेश दिया।
ढाई दशक पहले हुआ था ऐसा आयोजन
जानकारों का कहना है कि करीब 25 साल पहले इस तरह के म्यूजिक चेयर का आयोजन सिंगापुर में हुआ था। उस आयोजन में 8238 लोगों ने हिस्सा लिया था। भारत में इस तरह का यह सबसे बड़ा और पहला म्यूजिकल चेयर शो हैं जिसमें 10129 विद्यार्थियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड का कोई पदाधिकारी इस कार्यक्रम में हिस्सा नहीं ले पाया, क्योंकि इसके लिए 7 लाख रूपये की राशि का अतिरिक्त खर्च आता। इसलिए कार्यक्रम की पूरी रिकॉडिंग की जा चुकी है। रिकॉडिंग गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड समिति के पास भेजा जाएगा। एक माह बाद यह पता चलेगा कि कार्यक्रम को गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में शामिल किया गया की नहीं?
कार्यक्रम के उद्घाटन मौके पर शहर पुलिस आयुक्त प्रवीण दीक्षित, जेसीआई आरेंज सिटी के अध्यक्ष हेमंत नाडियाना राष्ट्रीय अध्यक्ष संतोष कुमार, जेसी अमर खंडेलवाल, सीनेटर महेश राठी, अशोक राठी आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे। म्यूजिकल चेयर शो में संगीत की धुनों पर एक साथ हजारों विद्यार्थियों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए खेल का आनंद लिया। कार्यक्रम में 5वीं से 9वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को शामिल गया। म्यूजिकल शो में कुल 95 राउंड रखे गए थे। हर राउंड में करीब एक हजार से अधिक बच्चे संगीत की धुन पर अपनी कुर्सी बचाने की कवायद करते नजर आए। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड की चयन समिति के दिशा-निर्देश में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम की व्यवस्था के लिए जेसीआई के 500 से अधिक अधिकारी व सदस्यों ने सहयोग किया। उन्होंने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग से पृथ्वी पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। यदि पर्यावरण प्रदूषण को समय रहते नहीं रोका गया तो निकट भविष्य में पृथ्वी के विनाश की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। कार्यक्रम का मंच संचालन जेसी मुकेश आसर ने किया।

मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010

बाघ सुरक्षा पर भारी पड़े खान माफिया


forest minister patang rao kadam talking with junallist of nagpur


बाघ बफर जोन के गांवों के पुनर्वसन की जरूरत नहीं : कदम
संजय स्वदेश
नागपुर।
आखिर खनन ठेकेदारों की प्रभावशाली लॉबी ने बाघ बफर जोन पर भारी पड़ गई। चंद्रपुर के ताड़ोबा-अंधारी में टाईगर रिजर्व परियोजना (टीएटीआर) से प्रभावित गांवों के पुनर्वास को लेकर गुरुवार को आयोजित बैठक के बाद नागपुर आए महाराष्ट्र के वनमंत्री पतंगराव कदम ने बताया कि बाघ बफर जोन के गांवों के पुनर्वसन की जरूरत ही नहीं है। मतलब साफ है। बाघ बफर जोन के लिए प्रस्तावित जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। वनमंत्री ने इस निर्णय के पीछे तर्क दिया कि वन विभाग बाघों की सुरक्षा और प्रभावित गांवों के लिए उनके लिए खुद खास व्यवस्था करने की योजना में है। यहां इंसान और जानवर एक ही क्षेत्र में रहेंगे। उन्होंने कहा कि अभ्यारण्य का निर्माण करते समय गांवों को अभ्यारण्य के क्षेत्र से बाहर बसाना पड़ता है। मगर बफर जोन में ऐसा नहीं करना पड़ता। ताड़ोबा में जानवरों को पीने के पानी की भी व्यवस्था नहीं है, पानी की तलाश में जानवर गांव-बस्ती तक आ जाते हैं। यह एक गंभीर समस्या है। इस विषय पर विभाग के शीर्ष अधिकारियों से चर्चा कर इसका हल निकाला जाएगा। सूत्रों का कहना है कि वनमंत्री ने बाघ बफर जोन के लिए प्रस्तावित जमीनों के अधिग्रहण नहीं करने का निर्णय खन माफियाओं के प्रभाव में आकर लिया है। जब से यह योजना प्रस्तावित थी, तब से खनन क्षेत्र के ठेकेदार वन विभाग के अधिकारियों के साथ मंत्री पर प्रस्तावित क्षेत्र को बाघ बफर जोन के लिए नहीं देने के लिए लॉबिंग कर रहे थे।
अब मारेंगे नहीं पकड़ेंगे बाघ

पिछले दिनों चंद्रपुर जिले में एक तेंदुए के कारण 5 लोगों की मौत हुई। पिछले साल भी वन्य जीवों का ग्रामीणों पर हमला हुआ था। जब लगातार लोग मर रहे थे, तब ग्रामीणों पर हमला करने वाले बाघों को मारने का आदेश दिया गया था। ऐसी घटनाओं के सवाल पर वनमंत्री का कहना है कि अब ग्रामीणों पर बाघ हमला करेंगे तो, पहले उसे पकडऩे का प्रयास किया जाएगा। पकडऩे का विकल्प नहीं मिलने पर ही उसे मारने का आदेश दिया जाएगा।
पुलिस के साथ पहुंचते है वनकर्मी
एक सवाल के जवाब में वनमंत्री ने कहा कि लोगों की शिकायत रहती है कि जब तेंदुएं किसी इंसान पर हमला कर मार दते हैं तो वन अधिकारी तुरंत घटनास्थल पर नहीं पहुंचते। इस शिकायत में आंशिक सच्चाई है, क्योंकि जहां ऐसी घटना होती है, वहां का माहौल अलग होता है। अगर वन अधिकारी अकेला उस जगह पर तुरंत चले जाएं तो आक्रोशित लोग वनकर्मी को भी मार सकते हैं। इसलिए घटनास्थल पर पुलिस पहुंचने के बाद ही वन अधिकारी घटनास्थल पर जाते हैं।
भूखे बाघ-तेदुएं गांव में आते हैं
जंगल में बाघ, तेंदुएं व अन्य जानवरों को खाना-पानी नहीं मिल पाता है, तो वे गांवों कि तरफ आते हैं। कई बार जानवरों की आपसी लड़ाई में भी कई बाघ और तेंदुएं घायल हो जाते हैं, उनको सुरक्षित रखने तथा उनका इलाज करवाने के लिए उन्हें रेस्क्यू सेंटर में रखना आवश्यक होता है। फिलहाल वन विभाग के अलग-अलग रेस्क्यू सेंटर में तकरीबन 60 तेंदुएं हैं। एक इंसान को मारने से किसी तेंदुएं की गिनती नरभक्षकी के रूप में नहीं की जाती, उसके लिए कुछ मानक निश्चित किये गये हैं। कुछ उद्यानों में तेंदुओं को रखा है। वन विभाग तेंदुओं पर ध्यान रखने के लिए विडियो रिकॉर्डिग की योजना में है।
मुआवजा बढ़ाने पर विचार
वन संरक्षित क्षेत्रों में जिन किसानों की खेती का जानवर नुकसान करते हैं, उन्हें वन विभाग की ओर से 2000 रूपये प्रति हेक्टर के हिसाब से मुआवजा दिया जाता है। ज्यादा नुकसान होने पर 15 हजार रूपये प्रतिहेक्टेयर की दर से मुआवजा दिया जाता है। वन्य जीवों द्वारा किसानों की फसल नष्ट करने पर दी जाने वाली भरपाई की प्रतिहेक्टेयर दो हजार रूपये की दर से मुआवजा राशि काफी कम है। वनमंत्री का कहना है कि इसे बढ़ाने के लिए जल्द ही मंत्रिमंडल के सामने प्रस्ताव लाया जाएगा।
अभ्यारण्य की जमीन की भरपाई कहीं और
वनमंत्री पतंग राव कदम का कहना है कि राज्य में 6 सेंचुरीज(अभ्यारण्य) के गठन में जितना वन संरक्षित भाग कम होने वाला है, उसकी भरपाई राज्य में कहीं और की जाएगी। इसके लिए वन विभाग राज्य सरकार से जमीन की मांग करेगी। इसके लिए प्रस्ताव पुनर्गठन कमेटी में रखी गई है। लेकिन अभी इसकी मंजूरी नहीं मिली है। मानसिंग को अभ्यारण्य घोषित करने का निर्णय पहले ही हो चुका है।


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गुरुवार, जनवरी 28, 2010

बीटी बैंगन के विरोधियों ने जयराम रमेश को घेरा

शवयात्रा निकाली, पुतला जलाया
निर्णय 15 फरवरी से पहले : जयराम रमेश
संजय स्वदेश
नागपुर।
बी.टी. बैंगन पर नागपुर में आयोजित महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की जनसुनवाई में हिस्सा लेने आए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बी.टी. बैंगन के विरोधियों ने रास्ता रोक कर नारेबाजी करते हुए देसी बैंगन की शवयात्रा निकाली और पुतला फंूका। प्रदर्शन को देखते हुए पर्यावरण मंत्री खुद विरोधियों का समझाने के लिए कार से उतरे।
उत्तर अंबाझरी रोड स्थित आई.एम.ए. सभागृह बी.टी. बैगन की जनसुनवाई के दौरान खचाखच भरा हुआ था। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आए वैज्ञानिक, किसान, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कई लोगों के तर्क सुनने के बाद पर्यावरण मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि बी.टी. बैंगन पर अपना निर्णय वे 15 फरवरी से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप देंगे। जनसुनवाई के दौरान अधिकतर लोगों ने बी.टी. बैंगन के विरोध में तर्क देते हुए इसे देसी बैंगन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया। भारत में बी.टी. बैंगन के बीज बेचने वाली कंपनी कृभको के वैज्ञानिकों ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। विदर्भ के किसान नेता शरद जोशी ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बीज पद्धति और उत्पादन में तकनीक का उपयोग आज जरूरत है। शरद जोशी के पक्ष में 5 जीप और 5 टैक्सी में लोग आए थे। शरद जोशी के भाषण के दौरान वे बी.टी. के पक्ष में नारे लगा रहे थे। कॉटन रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी बी.टी. बैंगन के पक्ष में तर्क रखा। हाईस्कूल तक के पाठ्यक्रमों में जैविक खेती के विषय में पढ़ाया जाता है। फिर यहां रासायनिक उपयोग से तैयार बीज से खेती करने की बात की जा रही है। इससे एक विरोधाभास उत्पन्न हो रहा है।
कीड़े मारने की दवा के लिए हो शोध
लेकिन जनसुनवाई के दौरान बी.टी. बैंगन विरोधियों की आवाज बुलंद रही।
कृषि विशेषज्ञ शरद निंबालकर ने कहा कि देश के किसान वर्षों से देसी बैंगन उगा रहे हैं। केवल कीड़े मारने के लिए पूरे बीज को बदल कर उसे अनुवांशिक बनाना ठीक नहीं है। अभी जो बीज तैयार हुआ है कि उस पर 10-15 साल का ही शोध हुआ है। इसका असर अगली पीढ़ी पर क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है। केवल वैज्ञानिक तरीके से कीड़े मारने के लिए बीज बदलने के बजाय देश के वैज्ञानिकों को नई दवाओं की खोज करनी चाहिए। इससे देसी बीज के उपयोग से ही उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और किसानों को लाभ हो सकता है।
मनुष्य की प्रजनन क्षमता पर असर
मध्यप्रदेश से आए सामाजिक कार्यकर्ता जयंत वर्मा ने कहा कि बी.टी. के रूप में ऐसा बीज दिया जा रहा है जो कीटनाशक होगा। लेकिन उसका मानव स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा, इसका परीक्षण नहीं किया गया है। विदर्भ में बी.टी. कॉटन उगाने वाले किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की। लेकिन इस पर जनसुनवाई नहीं हुई। फिर बी.टी. पर जनसुनवाई क्यों हो रही है? डा. स्नेहलता वर्मा ने कहा कि अनुवांशिक आधार पर तैयार बी.टी. बैंगन से मनुष्य की प्रजनन क्षमता के अलावा शरीर के अन्य भागों पर भी असर पड़ सकता है।
तीन घंटे की सुनवाई में विरोध ज्यादा
तीन घंटे की जनसुनवाई में एक घंटा किसानों के लिए, 45 मिनट वैज्ञानिकों के लिए, बाकी समय सामाजिक कार्यकर्ता व अन्य के लिए निर्धारित था। ज्ञात हो कि बीटी बैंगन यानी जेनेटिकली मोडिफाइड बैंगन को बीते साल जैसे ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने किसानों तक पहुंचाने का फैसला किया, किसानों और कार्यकर्ताओं ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। सरकार को फरवरी तक बीटी बैंगन के मामले में अंतिम निर्णय लेना है इसलिए पर्यावरण मंत्री कई राज्यों का दौरा कर रहे हैं।

अगली सुनवाई चंडीगढ़ में
देश भर में छह जगहों पर जनसुनवाई होनी है। भुवनेश्वरी, कोलकाता और अहमदाबाद के बाद नागपुर में जनसुनवाई के बाद चंडीगढ़, बंगलुरु और हैदराबाद में जनसुनवाई आयोजित होनी है। हर जनसुनवाई में पर्यावरण मंत्री का विरोध हो रहा है। विरोध में किसान बढ़-चढ़ का हिस्सा ले रहे हैं। वैज्ञानिकों का एक तबका भी इस बैंगन का विरोधी है।
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सोमवार, जनवरी 25, 2010

हैपी बर्थ डे टू टाइगर...

चिरी, जान, ली का धूमधाम से मना जन्मदिन
संजय स्वदेश
नागपुर के महाराजबाग प्राणी उद्यान में शनिवार की शाम तीन शावकों का जन्मदिन कुछ अनोखे अंदाज में मनाया गया। केरी, जॉन और ली नाम के तीनों बाघ एक साल पहले चंद्रपुर के जंगल से महाराजबाग में लाए गए थे। तीनों शावकों की मां को किसी शिकारी ने मार दिया था, इसलिए ये जंगल में अनाथ घूम रहे थे।
शनिवार को इन्हें देखने के लिए बड़ों के साथ-साथ बच्चों का हुजूम उमड़ पड़ा। महाराजबाग में इनका जन्मदिन मनाने के लिए विशेष व्यवस्था भी कर रखी थी। यहां आए नन्हे-मुन्ने अपनी तोतली भाषा में हैपी बर्थ डे टू टाइगर... गा रहे थे। हाथों में गुब्बारे लिये उत्साहित होकर तीनों बाघों की अठखेलियां देख रहे थे।
महाराजबाग में प्रभारी अनिल बारस्कर ने बताया कि ठीक एक साल पहले जब तीनों शावकों को यहां लाया गया था, तब वे पूरी तरह से बदहाल थे। इनकी जीने की संभावना बहुत कम थीं। महाराजबाग के कर्मचारियों ने रात-दिन इनकी सेवा कर इन्हें स्वस्थ बनाया। किसी शिकारी ने इनकी मां को मार दिया था। जंगल में ये तीनों शावक अनाथ घूम रहे थे। बारस्कर ने बताया कि जब ये यहां आए थे, तब तीन किलो के थे। इनके पास जाने वाले हर व्यक्ति की गोद में बैठ जाते थे। हर महीने आधा किलो इनका वजन बढ़ते गया। अब ये 60 किलो के हैं। पूरी तरह से स्वस्थ।
खेला फुटबॉल
तीनों का जन्मदिन मनाने के लिए महाराजबाग में विशेष व्यवस्था की गई थी। हैपी बर्थ डे थ्री इडियट्स लिखा हुआ बैनर और तीनों बाघों के पुराने फोटो लगे थे। तीनों शावक अब बाघ हो चुके हैं। महाराजबाग के कर्मचारियों ने इनके जन्मदिन के लिए विशेष भोजन के रूप में मांस की व्यवस्था की गई थी। इस बीच उनके पास किसी ने एक फुटबॉल फेंक दी। फुटबाल देखते ही केरी, जॉन और ली यह भूल गए कि उनके लिए विशेष भोजन परोसा जा चुका है और वे फुटबाल खेलने में व्यस्त हो गए। जब फुटबॉल से दिल भर गया तो मांस पर टूट पड़े।
बच्चों ने काटा थ्री इडियट्स का केट
पिंजरे से बाहर एक बड़े केक को बच्चों के हाथों कटवाया गया। बच्चों के साथ-बड़ों ने भी बाघों के जन्मदिन का केक खाया। यहां आए सभी बच्चे खासे उत्साहित थे। एक बाघ के जन्मदिन में शामिल होने की खुशी उनके चेहरे पर कुछ अलग
ही अंदाज में दिख रही थी। केक पर प्रतीक रूप में शिकारी का फोटो बना हुआ था क्योंकि इन तीनों बाघों की मां को शिकारी ने मार कर अनाथ कर दिया था। महाराजबाग के प्रभारी अनीस बारस्कर ने बताया कि जंगली जीवों के संरक्षण का संदेश देने के उद्देश्य से ही तीनों बाघों का जन्मदिन इस अंदाज में मनाया गया। शायद यह पहला मौका है जब किसी प्राणी उद्यान में तीन बाघों का जन्मदिन मनाया जा रहा हो और बच्चे उसके जन्मदिन की गीत गा रहे हों।