घोटालों पर परदा डालना कांग्रेस की पुरानी नीति
कश्मीर समस्या के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार
नागपुर। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का आतंकवादी घटनाओं में हाथ होने की बात कई बार उजागर हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विश्वास में लेकर आईएसआई को आतंकवादी संगठन घोषित करने की मांग भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने की।
राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद के पीछे आईएसआई होने की बात विश्व समुदाय के ध्यान में भी आई है। कश्मीर समस्या कांग्रेस की ही देन है। वोट बैंक की राजनीति तथा रचनात्मक नीति नहीं बनाए जाने से कश्मीर समस्या अधिकाधिक उग्र हो रही है। इसका झटका आम आदमी को लग रहा है। इस पर सर्वमान्य हल निकालना जरूरी है लेकिन केंद्र सरकार इसमें असफल साबित हुई है। इन दिनों देशभर में चर्चित कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच करने की मांग करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि कॉमनवेल्थ को हमारा विरोध नहीं है। घोटाला साबित हो चुका है लेकिन जिस ढंग से यह घोटाला उजागर हो रहा है, वह उचित नहीं है। इस संबंध में प्राथमिक जांच कर संबंधित पर कार्रवाई की जानी चाहिए, फिर वह कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। कांग्रेस इस घोटाले पर परदा डालने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस की यह पुरानी नीति है। देश का सम्मान रखते हुए यह स्पर्धा होनी चाहिए, उसके लिए हमारा 100 प्रतिशत सहयोग रहेगा। राजनाथ ने कहा कि देश की एकात्मता व अखंडता कायम रखकर जातिनिहाय जनगणना हो। देशवासियों को डरा रही महंगाई की समस्या को भाजपा ने संसद के दोनों सदनों में उठाकर रखा। देश के गरीबों को न्याय देने के लिए कोई राजनीति न करते हुए चर्चा होनी चाहिए। इस पर अगर मतदान लिया होता तो सरकार की पराजय तय थी। 1970 के बाद पहली बार विपक्ष महंगाई को लेकर इतना आक्रामक था।
रामजन्मभूमि के मुद्दे पर राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रभु रामचंद्र इस देश की पहचान हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा भी प्रतिबद्ध है। भाजपा ने कभी भी इसका राजनीतिक लाभ नहीं उठाया। लेकिन कांग्रेस ने इसका लाभ अच्छी तरह उठाया। राम मंदिर का मुद्दा राजनीतिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय मुद्दा है। इसी कारण सभी धर्मियों ने इसकी ओर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए। स्वतंत्र विदर्भ राज्य के बारे में राजनाथ सिंह ने कहा कि भाजपा ने विदर्भ राज्य का समर्थन किया है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भी यह प्रस्ताव मंजूर किया है। इसका जवाब सत्तारूढ़ कांग्रेस से ही पूछा जाना चाहिए।
गडकरी की तारीफ
राजनाथ सिंह ने भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी की जी भरकर तारीफ करते हुए कहा कि जबर्दस्त कल्पनाशक्ति, निर्माणशीलता, कृतिशीलता तथा किसी समस्या का हल निकालने की कुशलता आदि तमाम गुण गडकरी में मौजूद हैं। उनके यह गुण मुझे तथा कई लोगों को बहुत कम समय में देखने मिले। राजनाथ ने विश्वास जताया कि 'बेस्ट परफार्मंसÓ वाले इस नेता के कारण भाजपा को जल्द ही अच्छे दिन देखने मिलेंगे।
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविवार, अगस्त 08, 2010
गरीबी रेखा पर सरकार की राय स्पष्ट नहीं
'मीट द प्रेसÓ में नागपुर के पत्रकारों से अनौचारिक चर्चा में ए.बी.बर्धन ने कहा
संजय स्वदेश
नागपुर। गरीबी रेखा पर सरकार की राय स्पष्ट नहीं है। इस मामले में वह स्वयं भ्रम में हैं कि देश में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह कहना है कि भाकपा के वरिष्ठ नेता ए.बी.बद्र्धन का। वे रविवार की शाम धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में पत्रकारों से अनौपचारिकता चर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि योजना आयोग ने पहले कहा कि देश में कुल आबादी के 47 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, फिर बाद में कहा गया कि 27 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। इस आंकड़े को भी सरकार ने रिजेक्ट कर दिया। तेंदुलकर आयोग ने बताया कि देश में 37 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। एन.सी सक्सेना आयोग ने 57 प्रतिशत और कांग्रेस के वर्तमान सांसद अर्जुनसेन गुप्ता आयोग ने बताया कि 77 प्रतिशत लोग गरीब हैं। ये अनाज, तेल, दाल, खरीदने में असमर्थ हैं। ये अपने बच्चों को ठीक से शिक्षा नहीं दे सकते हैं। सभी आकड़ों को सरकार झुठला दिया है। लेकिन अब सरकार यह कोशिश कर रही है कि 37 प्रतिशत की संख्या को मान लिया जाए। महंगाई के खिलाफ वामदल आंदोलन चला रहे हैं। 5 जुलाई को भारत बंद सफल भी रहा। कुछ लोग नुकसान का आंकलन कर रहे हैं लेकिन भूख का आंकलन नहीं हो रहा है। बारिश के बाद महंगाई के विरोध में आंदोलन फिर शुरू होगा।
कहां बह रही है जीडीपी की गंगा?
बर्धन ने कहा कि एपीएल और बीपीएल सिस्टम हटा कर जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) लागू करना चाहिए। यही जनता की जरूरत है। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि देश का समग्र विकास हो रहा है। जीडीपी बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर सबसे ज्यादा एनीमिया से ग्रस्त माताएं भारत में हंै। बाल मृत्यु दर में भारत आगे है। फिर यह जीडीपी की ग्रोथ की गंगा कहां बहती है। उन्होंने कहा कि सभी मुद्दों की जननी महंगाई है। सरकार अन्न सुरक्षा कानून बनाने जा रही है। इसकी आजकल बड़ी चर्चा है। महंगाई और अन्न सुरक्षा एक दूसरे से जुड़े हैं। अन्न सुरक्षाकानून में 3 प्रमुख बातें होनी चाहिए। पहली, अन्न सुरक्षा मतलब देश के हर व्यक्ति को यथेष्ठ अन्य मिले। दूसरी, जो अन्न मिले वह पौष्टिक हो और तीसरी, यह सभी के पहुंच की कीमत के अंदर में उपलब्ध हो, जिससे कि हर कोई खरीद सके। यदि अन्न सुरक्षा कानून में इन तीनों चीजों का समावेश हो तभी यह कानून सफल होगा।
सभी तक अन्न पहुंचाने में सरकार को जो खर्च आएगा, वह जीडीपी का कुल 1.9 प्रतिशत होगा। इसका पूरा हिसाब हमने सरकार को दे दिया है। देश में 20 से 25 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो जनवितरण प्रणाली ठीक कर भी लिया जाए तो भी वे बाहर से खरीदी कर सकते हैं। 75 प्रतिशत लोगों तक जनवितरण प्रणाली पहुंचनी चाहिए।
कश्मीर का बाजार कहां है?
बर्धन ने कहा कि कश्मीर की समस्या कई मायनों में इन दिनों उलझ गई है। एक ओर कश्मीर घाटी में जहां गोलियां बरस रही हंै, वहीं दूसरी ओर लेह में पानी का कहर बरस रहा है। छोटे से शहर लेह में पानी के बहाव के कोई परंपरागत तरीके नहीं हैं। वहां अभी तक बर्फ ही बरसते रहे हैं। इस कहर में छोटे से शहर के चार से पांच सौ लोगों का गायब हो जाना गंभीर बात है। हम कहते हैं कि कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। शरीर के एक हिस्से में जब चोट लगती है, तो दूसरे हिस्से में दर्द होता है। लेकिन कश्मीर मामले में ऐसा नहीं है। हम संवदेनशून्य हो रहे हैं। यदि भारत कश्मीर का ही अंग है तो लोग कश्मीर के प्रति संवेदना प्रकट करें। सबसे पहले तो यह जरूरी है कि कश्मीर से सेना को हटायी जाए। सेना के कारण वहां के रास्ते और बाजार बंद हैं। कश्मीर में सबसे ज्यादा उत्पादन सेब का होता है। लेकिन वहां सेब का बाजार कहां है। कश्मीर के सामान्य आर्थिक जीवन को भी बंद कर दिया गया है। इसे खोलना जरूरी है।
कॉमन वेल्थ के लिए पैसा है, गोदाम बनाने के लिए नहीं
कॉमन वेल्थ गेम की तैयारियों में अनियमितताओं से पता चलता है कि भ्रष्टाचार के मामले अब ओलंपिक तक पहुंच गए हैं। इस गेम के माध्यम से भारत की प्रतिष्ठा दांव पर है। इसलिए यह कामयाब होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भ्रष्टाचारियों पर कोई रोक-टोक न हो। देश की इज्जत मिट्टी में मिलाने वाले भ्रष्टाचारियों को राजा, महाराजा के पद से हटा दिया जाना चाहिए। सरकार कह रही है कि अनाज का उत्पादन इतना है कि अनाज रखने के लिए गोदाम नहीं है। कॉमन वेल्थ गेम में करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये लेकिन सरकार के पास अनाज के गोदाम बनवाने के लिए पैसे नहीं है।
बॉक्स में
बिहार चुनाव वाम के साथ लड़ेंगे
बिहार चुनाव में वाम दल एकजुट होकर मैदान में उतरें, इसके लिए सहमति बन रही है। पूरी संभावना है कि चुनाव में वाम दल एक ही होंगे।
नक्सलबाद पर हो सार्थक बातचीत
सरकार समझती है कि नक्सलवाद को केवल हथियार से ही रोका जा सकता है। यह संभव भी नहीं है। एक ओर तो राज्य का आतंक है, वहीं दूसरी ओर नक्सलियों का आतंक। दोनों के बीच में मासूम मर रहे हैं। इसके लिए बातचीत का रास्ता सबसे ज्यादा बेहतर है।
गडकरी से मुलाकात हुई
नितिन गडकरी मुझझे मिलने आए। लेकिन किसी को इस बात का तनिक भी विश्वास नहीं होगा कि हमलोगों ने राजनीति की बातें नहीं की। वे मेरे पुराने मित्र हैं। मेरे पास आए तो केवल व्यक्तिगत बातें होती रहीं। विशेष रूप से उनके चीनी उद्योग पर चर्चा हुई।
किन नेताओं के पीछे है विदर्भ की जनता
पृथक विदर्भ के मुद्दे पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में बर्धन ने एक टूक में कहा कि -विदर्भ की जनता तथाकथित विदर्भवादी नेताओं के पीछे है।
Labels:
नागपुर समाचार,
राजनीति,
समाज/ बहस
शनिवार, जुलाई 10, 2010
असंयमित भाषा के बहाने असली मुद्दे टालने की राजनीति
असंयमित भाषा के बहाने असली मुद्दे टालने की राजनीति
संजय स्वदेश
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के बयान पर राष्ट्रीय राजनीति में संयत भाषा को लेकर बवाल मचा हुआ है। आम आदमी का लहू बहाने वाले आतंकियों को फांसी की सर्जा मुकरर्र होने के बाद आखिर सरकार उन्हें क्यों पाल रही है। गड़करी ने जो सवाल उठाया, वह उनका निजी सवाल नहीं, देश की जनता का है। बयान की बहसबाजी में असंयमित भाषा का नाम लेकर असली मुद्दे को दरकिनार किया जा रहा है। सवाल है कि क्या सरकार सयंमित भाषा में किसी जायज सवाल का जवाब देती है।
यदि संयमित और संस्कारों की भाषा में जनता की लगाई गई गुहार सरकार सुनने लगे तो किसी की जुबान भला संस्कार और सयंम की पटरी से क्यों उतरेगी। पर संयम की भाषा में जनता की भावनाओं का समझने की परंपरा किसी भी सरकार ने नहीं निभाई।
ताजा उदाहरण सामने है। 5 जुलाई विपक्षी दलों ने महंगाई के खिलाफ भारत बंद कराया। कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाए, देश भर में बंद शांतिपूर्ण ढंग से सफल रहा। यह संयमित तरीके से बंद था, लेकिन केंद्र सरकार ने इस बंद को असफल करार दिया। कल्पना कीजिये, यदि इस बंद के दौरान देशभर में ङ्क्षहसा होती, तो क्या होता? तब कांग्रेस इसे जरूर सुनती है। उसे इस बात का निश्चय ही एहसास होता कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाकर पहले ही महंगाई की बोझ से जनता की लचकी हुई कमर को तोडऩे वाला निणर्य लिया है। पर कांग्रेस सरकार ने सयंम की हर भाषा
चाहे वह सांकेति हो या फिर शाब्दिक उसे नकारा ही है। असंमित भाषा में अच्छे मुद्दे को उठाने पर हमेशा ही आदर्श भाषा की दुहाही देकर मुद्दे को ही खत्म करने की कोशिश की गई है।
देश की बहुसंख्यक जनता की असली जुबान क्या है, यह नई दिल्ली में रह कर नहीं जाना जा सकता है। दिल्ली के डीटीसी और ब्लूलाइन के बसों में जनता की असली जुबान सुनाई देगी। महंगाई समेत अनेक मुद्दों से जनता का मन सहज ही अक्रोश से भर गया है। उसे मालूम है, खुल कर सामने आने पर कुछ होना-जाना नहीं है, उल्टे उसे कानून की मार पड़ेगी। लिहाजा, शब्दों से भड़ास निकाले का विकल्प बेहतर है।
नितिन गडकरी ने क्या किया? नितिन गडकरी जैसे भाजपा में ढेरो नेता हैं। उनसे भी काबिल हैं, लेकिन वे कांग्रेस के शीर्ष पद तक नहीं पहुंच सकते हैं। क्योंकि कांग्रेस में तो गांधी परिवार का सिमरन चलता है। भाजपा की अंदरुनी कलह चाहे जो भी हो, कम से कम यहां शीर्ष पदों पर चेहरे तो बदलते ही हैं।
महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी से संबंधित एक पुस्तक में एक प्रसंग है। एक समय कांग्रेस ने हिंदी बोलने वालों को पार्टी का सदस्य बनाने पर रोक लगा दी थी। सदस्य बनने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया। क्योंकि तब के पार्टी सदस्यों को यह डर था कि कहीं हिंदी भाषी कांग्रेस का सदस्य बन कर अंग्रेजी बोलने वाले तथाकत्थित अभिजात्य कांग्रेसियों का कद छोटा न हो जाए। हालांकि यह रोक बहुत दिनों तक नहीं चली। लेकिन तब के कांग्रेस के अंदर की अभिजात्यवादी संस्कार आज भी मौजूद हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो युवा नेताओं के नाम पर कांग्रेस के पूर्व प्रभावशाली नेता व मंत्रियों के लाडलों को ही पार्टी टिकट नहीं देती। सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में भी ऐसे ढेरों युवा हैं जिनमें देश को आगे ले जाने की बेहतरीन दूरदृष्टि और नेतृत्व कौशल है। लेकिन यह उनका दुर्भाग्य है देश के ऐसे युवाओं को कांग्रेस ही क्या किसी भी पार्टी में उन्हें मान्यता नहीं है। यदि मान्यता है तो पार्टी के सबसे निचले छोर पर केवल निष्ठा बनाये रखने की। कांग्रेस की नहीं देश का अभिजात्य वर्ग हमेशा ही आम आदमी को नकारती रहा है। भले ही आम आदमी के दम पर उसका प्रतिष्ठा कायम है। पिछड़ों में शरद यादव की प्रतिष्ठा है। वे बिहार के मधेपुरा जैसे पिछड़े इलाकों की जनता का जुबान जानते हैं। तभी तो उन्होंने गडकरी के जुबान का समर्थन किया। कोई तर्क देने वाला कह सकता है कि यदि कांग्रेस गलत ही है तो फिर उसकी सत्ता में वापसी ही क्यों होती है? यही तो असली राजनीति है। प्रतिकूल परिस्थियों को साम,दाम,दंड,भेद से उसे अपने अनुकूल कर लो। जीत पक्की है। इस इस नीति में गैर-कांग्रेसी दल मात खा जाते हों, तो
क्या कहा जाए।
संजय स्वदेश
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के बयान पर राष्ट्रीय राजनीति में संयत भाषा को लेकर बवाल मचा हुआ है। आम आदमी का लहू बहाने वाले आतंकियों को फांसी की सर्जा मुकरर्र होने के बाद आखिर सरकार उन्हें क्यों पाल रही है। गड़करी ने जो सवाल उठाया, वह उनका निजी सवाल नहीं, देश की जनता का है। बयान की बहसबाजी में असंयमित भाषा का नाम लेकर असली मुद्दे को दरकिनार किया जा रहा है। सवाल है कि क्या सरकार सयंमित भाषा में किसी जायज सवाल का जवाब देती है।
यदि संयमित और संस्कारों की भाषा में जनता की लगाई गई गुहार सरकार सुनने लगे तो किसी की जुबान भला संस्कार और सयंम की पटरी से क्यों उतरेगी। पर संयम की भाषा में जनता की भावनाओं का समझने की परंपरा किसी भी सरकार ने नहीं निभाई।
ताजा उदाहरण सामने है। 5 जुलाई विपक्षी दलों ने महंगाई के खिलाफ भारत बंद कराया। कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाए, देश भर में बंद शांतिपूर्ण ढंग से सफल रहा। यह संयमित तरीके से बंद था, लेकिन केंद्र सरकार ने इस बंद को असफल करार दिया। कल्पना कीजिये, यदि इस बंद के दौरान देशभर में ङ्क्षहसा होती, तो क्या होता? तब कांग्रेस इसे जरूर सुनती है। उसे इस बात का निश्चय ही एहसास होता कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाकर पहले ही महंगाई की बोझ से जनता की लचकी हुई कमर को तोडऩे वाला निणर्य लिया है। पर कांग्रेस सरकार ने सयंम की हर भाषा
चाहे वह सांकेति हो या फिर शाब्दिक उसे नकारा ही है। असंमित भाषा में अच्छे मुद्दे को उठाने पर हमेशा ही आदर्श भाषा की दुहाही देकर मुद्दे को ही खत्म करने की कोशिश की गई है।
देश की बहुसंख्यक जनता की असली जुबान क्या है, यह नई दिल्ली में रह कर नहीं जाना जा सकता है। दिल्ली के डीटीसी और ब्लूलाइन के बसों में जनता की असली जुबान सुनाई देगी। महंगाई समेत अनेक मुद्दों से जनता का मन सहज ही अक्रोश से भर गया है। उसे मालूम है, खुल कर सामने आने पर कुछ होना-जाना नहीं है, उल्टे उसे कानून की मार पड़ेगी। लिहाजा, शब्दों से भड़ास निकाले का विकल्प बेहतर है।
नितिन गडकरी ने क्या किया? नितिन गडकरी जैसे भाजपा में ढेरो नेता हैं। उनसे भी काबिल हैं, लेकिन वे कांग्रेस के शीर्ष पद तक नहीं पहुंच सकते हैं। क्योंकि कांग्रेस में तो गांधी परिवार का सिमरन चलता है। भाजपा की अंदरुनी कलह चाहे जो भी हो, कम से कम यहां शीर्ष पदों पर चेहरे तो बदलते ही हैं।
महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी से संबंधित एक पुस्तक में एक प्रसंग है। एक समय कांग्रेस ने हिंदी बोलने वालों को पार्टी का सदस्य बनाने पर रोक लगा दी थी। सदस्य बनने के लिए अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया। क्योंकि तब के पार्टी सदस्यों को यह डर था कि कहीं हिंदी भाषी कांग्रेस का सदस्य बन कर अंग्रेजी बोलने वाले तथाकत्थित अभिजात्य कांग्रेसियों का कद छोटा न हो जाए। हालांकि यह रोक बहुत दिनों तक नहीं चली। लेकिन तब के कांग्रेस के अंदर की अभिजात्यवादी संस्कार आज भी मौजूद हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो युवा नेताओं के नाम पर कांग्रेस के पूर्व प्रभावशाली नेता व मंत्रियों के लाडलों को ही पार्टी टिकट नहीं देती। सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में भी ऐसे ढेरों युवा हैं जिनमें देश को आगे ले जाने की बेहतरीन दूरदृष्टि और नेतृत्व कौशल है। लेकिन यह उनका दुर्भाग्य है देश के ऐसे युवाओं को कांग्रेस ही क्या किसी भी पार्टी में उन्हें मान्यता नहीं है। यदि मान्यता है तो पार्टी के सबसे निचले छोर पर केवल निष्ठा बनाये रखने की। कांग्रेस की नहीं देश का अभिजात्य वर्ग हमेशा ही आम आदमी को नकारती रहा है। भले ही आम आदमी के दम पर उसका प्रतिष्ठा कायम है। पिछड़ों में शरद यादव की प्रतिष्ठा है। वे बिहार के मधेपुरा जैसे पिछड़े इलाकों की जनता का जुबान जानते हैं। तभी तो उन्होंने गडकरी के जुबान का समर्थन किया। कोई तर्क देने वाला कह सकता है कि यदि कांग्रेस गलत ही है तो फिर उसकी सत्ता में वापसी ही क्यों होती है? यही तो असली राजनीति है। प्रतिकूल परिस्थियों को साम,दाम,दंड,भेद से उसे अपने अनुकूल कर लो। जीत पक्की है। इस इस नीति में गैर-कांग्रेसी दल मात खा जाते हों, तो
क्या कहा जाए।
बुधवार, जून 23, 2010
हाथ से निकल गई है कश्मीर की समस्या
2
पत्रकार रविन्द्र दाणी की पुस्तक 'मिशन कश्मीरÓ का विमोचित
संजय स्वदेश
नागपुर। आज कश्मीर की स्थिति हाथ से निकल चुकी है। चीन ने भी भारत में अतिक्रमण शुरू कर दिया है। इसमें मासूम जनता बेवजह पीस रही है। कुछ दिनों बाद असाम व तिब्बत के हालात भी ऐसे ही हो जाएंगे। यह कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का। वे कश्मीर समस्या से संबंधित विविध पहलुओं पर पत्रकार रविंद्र दाणी की पुस्तक 'मिशन कश्मीरÓ के विमोचन कार्यक्रम में बोल रहे थे। सिविल लाइन्स स्थित डा. वसंतराव देशपांडे सभागृह में आयोजित कार्यक्रम में पुस्तक का विमोचन सरसंघचालक मोहन भागवत के हाथों हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षत गंजू हेमटोलाजी ने की। प्रमुख अतिथि के रूप में कश्मीर के पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एस.के. सिन्हा उपस्थित थे। गड़करी ने कहा कि भाजपा का अध्यक्ष बनने के बाद मुझे पहली बार कश्मीर जाने का मौका मिला। कश्मीर के जनता के विचार के काफी अलग है। आजकल हमारे देश के सभी निर्णय दिल्ली में होते हैं, वह भी अमेरिकी दवाब में। देश की बाह्य व आंतरिक सुरक्षा पर सवाल खड़ा हो रहा है। उन्होंने कहा कि कहा कि देश को इन बड़ी चुनौतियों से लडऩा है। गडकरी ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा कि इसमें कश्मीर के विविध मुद्दों को शामिल किया है। इस किताब को सभी पढ़े। उन्होंने रविंद्र दाणी का अभिनंदन किया।
हर व्यक्ति से जुड़ा है कश्मीर : भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि कश्मीर की समस्या देश के प्रत्येक नागरिक से जुड़ी हुई है ना कि किसी पार्टी या किसी व्यक्ति विशेष से। इस पर हर किसी को विचार करना चाहिए। कश्मीर पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं। नागपुर में इसके बारे में कई कार्यक्रम हुए। कश्मीर में 60 साल के सत्य की प्रतिक्षा चल रही है। परंतु परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। यह सवाल देश की एकता अखंडता से जुड़ा हुआ है। कश्मीर भारत का ही एक हिस्सा है, इसे ऐसे ही तो किसी को नहीं दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी हो जिससे हर मासूम अपने गांव में निर्भय से रह सके। पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एस. के. सिन्हा ने कश्मीर में हुए विविध युद्धों के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि कश्मीर भारत का एक अटूट अंग है। कश्मीर की समस्या का समाधान कठोर निर्णय से ही संभव है।
०००००००००००००००
Labels:
नागपुर समाचार,
राजनीति
मंगलवार, जून 15, 2010
बिहार में कांग्रेस का खोया जानाधार वापस लाएंगे मराठी माणुस
संजय स्वदेश
गत वर्ष महाराष्ट्र राज्य विधानसभा में भाजपा को करारी मात देने वाली कांग्रेस अब आगामी बिहार चुनावों में सत्तारुढ़ गढ़बंधन को करारी शिकस्त देने की योजना में है। मजेदार बात यह है कि जिस महाराष्ट्र में 'बिहारी माणुषÓ को प्रांतवाद के नाम पर प्रताडि़त किया गया, उसी प्रदेश के स्थानीय नेता बिहार की राजनीति में कांग्रेस के खोया जनाधार जुटाएंगे। मतलब, आगामी बिहार चुनावों में कांग्रेस के लिए मराठी मानुष बिहारियों का दिल जीतने की कोशिश करेंगे।
कांग्रेस आलाकमान ने रामटेक के सांसद और केंद्रीय समाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री मुकूल वासनिक को बिहार का प्रभारी और महाराष्ट्र विधान परिषद सदस्य संजय दत्त को चुनाव 'वार रूमÓ का मुख्य समन्वयक बनाया गया है। इसके अलावा महाराष्ट्र के दर्जन भर से ज्यादा नेताओं को बिहार चुनाव के लिए जिल पर्यवेक्षक बनाया गया है। खबर है कि इस बार बिहार चुनाव में कांग्रेस स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरेगी। सोमवार को कांग्रेस मुख्यालय में मुकूल वासनिक के नेतृत्व में बिहार चुनाव को लेकर बैठक हो चुकी है। बैठम में बिहार के 39 जिलों में से 7 जिलों का चुनाव पर्यवेक्षक महाराष्ट्र के नेताओं को बनाया गया है। इसमें पूर्व केंद्रीयमंत्री सुबोध मोहित को रोहतास जिला, विधायक सुनील केदार को किशनगंज, विधायक राजेंद्र मुलक को कटिहार, हुसैन दलावाई को पुर्णिया, मोहन जोशी को बक्सर, पूर्व सांसद हरि राठौड़ को अररिया और रंजन भोंसले को गया जिले का चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है। इसके अलावा राजस्थान के करीब डेढ़ दर्जन नेता भी बिहार चुनावों में पर्यवेक्षक की भूमिका में होंगे।
ज्ञात हो कि पहले बिहार में कांग्रेस का प्रभार सिख दंगों के दांगी नेता जगदीश टाइटलकर को दिया गया था। लेकिन अब उनसे यह प्रभार लेकर मुकूल वासिनक को दे दिया गया है। वासनिक को बिहार चुनाव में कांग्रेस के खोये जनाधार को वापस लाने के लिए पूरी आजादी भी दे दी गई है। मतलब बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस के हर निर्णय में अब मुकूल वासनिक की खूब चलेगी। राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दौरान मुकूल वासनिक ने ही प्रभार संभाला था। उन्होंने अपनी कुशल रणनीति से कांग्रेस को सत्ता में वापसी कराई। इसलिए वे कांग्रेस अलाकमान के विश्वासपात्र हो गये। कांग्रेस ने टाइटलगर की जगह बिहार में इन्हें मौका देना उचित समझा है।
गत वर्ष महाराष्ट्र राज्य विधानसभा में भाजपा को करारी मात देने वाली कांग्रेस अब आगामी बिहार चुनावों में सत्तारुढ़ गढ़बंधन को करारी शिकस्त देने की योजना में है। मजेदार बात यह है कि जिस महाराष्ट्र में 'बिहारी माणुषÓ को प्रांतवाद के नाम पर प्रताडि़त किया गया, उसी प्रदेश के स्थानीय नेता बिहार की राजनीति में कांग्रेस के खोया जनाधार जुटाएंगे। मतलब, आगामी बिहार चुनावों में कांग्रेस के लिए मराठी मानुष बिहारियों का दिल जीतने की कोशिश करेंगे।
कांग्रेस आलाकमान ने रामटेक के सांसद और केंद्रीय समाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री मुकूल वासनिक को बिहार का प्रभारी और महाराष्ट्र विधान परिषद सदस्य संजय दत्त को चुनाव 'वार रूमÓ का मुख्य समन्वयक बनाया गया है। इसके अलावा महाराष्ट्र के दर्जन भर से ज्यादा नेताओं को बिहार चुनाव के लिए जिल पर्यवेक्षक बनाया गया है। खबर है कि इस बार बिहार चुनाव में कांग्रेस स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरेगी। सोमवार को कांग्रेस मुख्यालय में मुकूल वासनिक के नेतृत्व में बिहार चुनाव को लेकर बैठक हो चुकी है। बैठम में बिहार के 39 जिलों में से 7 जिलों का चुनाव पर्यवेक्षक महाराष्ट्र के नेताओं को बनाया गया है। इसमें पूर्व केंद्रीयमंत्री सुबोध मोहित को रोहतास जिला, विधायक सुनील केदार को किशनगंज, विधायक राजेंद्र मुलक को कटिहार, हुसैन दलावाई को पुर्णिया, मोहन जोशी को बक्सर, पूर्व सांसद हरि राठौड़ को अररिया और रंजन भोंसले को गया जिले का चुनाव पर्यवेक्षक बनाया गया है। इसके अलावा राजस्थान के करीब डेढ़ दर्जन नेता भी बिहार चुनावों में पर्यवेक्षक की भूमिका में होंगे।
ज्ञात हो कि पहले बिहार में कांग्रेस का प्रभार सिख दंगों के दांगी नेता जगदीश टाइटलकर को दिया गया था। लेकिन अब उनसे यह प्रभार लेकर मुकूल वासिनक को दे दिया गया है। वासनिक को बिहार चुनाव में कांग्रेस के खोये जनाधार को वापस लाने के लिए पूरी आजादी भी दे दी गई है। मतलब बिहार चुनाव के दौरान कांग्रेस के हर निर्णय में अब मुकूल वासनिक की खूब चलेगी। राजस्थान में विधानसभा चुनाव के दौरान मुकूल वासनिक ने ही प्रभार संभाला था। उन्होंने अपनी कुशल रणनीति से कांग्रेस को सत्ता में वापसी कराई। इसलिए वे कांग्रेस अलाकमान के विश्वासपात्र हो गये। कांग्रेस ने टाइटलगर की जगह बिहार में इन्हें मौका देना उचित समझा है।
मंगलवार, मई 11, 2010
संघ परिवार वाले इतने कपटी हो सकते हैं : सहाय
लोभियों के जाल में फंसा झारखंड, राज्यपाल शीघ्र दखल लें : सहाय
नागपुर। झारखंड आज लोभियों के जाल में बुरी तरह फंस चुका है। पिछले 20 दिनों से वहां सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। अनिश्चित राजनीतिक स्थितियों के बीच राज्यपाल को दखल लेना जरूरी हो गया है। यह कहना है केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री सुबोधकांत सहाय का। वे सोमवार की शाम नागपुर में पत्रकारों से चचा्र कर रहे थे। सहाय ने कहा कि लोभियों के जाल में फंस चुके झारखंड राज्य का एक-एक अंग लोभ नोंच रहे हैं। भाजपा वहां जिस तरह का राजनीतिक खेल खेल रही है, उससे उसका लोभी चेहरा पहली बार उजागर हुआ है। भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर रही है। यह पहली बार देखने में आया है कि संघ परिवारर वाले इतने कपटी हो सकते हैं।
सहाय ने कहा कि बिहार से अलग होने पर झारखंड राजस्व तथा विद्युत उत्पादन में सरप्लस था, लेकिन पिछले 10 में से 8 वर्षों तक झारखंड में भाजपा की सरकार ने झारखंड को काफी पीछे ले जाकर छोड़ दिया है। पहले झारखंड के 3 जिलों में ही नक्सलवाद था, आज वह 24 जिलों में फैल चुका है। आज भाजपा झारखंड के साथ घिनौना मजाक कर रही है। झारखंड के साथ ही बने छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड आज कहां से कहां पहुंच गए लेकिन झारखंड लगातार पीछे जा रहा है। भाजपा को इसका प्रायश्चित करना ही होगा। आज भाजपा इस प्रयास में है कि जो भी उसके स्वार्थ की पूर्ति करेगा, वही मुख्यमंत्री बनेगा। इसी कारण से झारखंड में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। भाजपा संसदीय बोर्ड कोई ठोस फैसला नहीं ले पा रहा है। यह समझ में नहीं आ रहा है कि यह संसदीय बोर्ड है या मदारियों का अड्डïा! झामुमो नेता शिबू सोरेन आज परिवारवालों के अलावा भाजपा के कारण भी निरीह, असहाय हो चुके हैं। झामुमो के विधायकों को हाईजैक करने का प्रयास भाजपा कर रही है जिससे स्थिति खराब हो चुकी है। राज्यपाल को तुरंत दखल लेना जरूरी हो गया है।
सामूहिक खेती करें किसान
सहाय ने विदर्भ के बदहाल किसानों को सामूहिक खेती करने का आह्ïवान करते हुए कहा कि इसमें उनका तो लाभ होगा ही, निवेशकों का भी लाभ होगा। अमरावती में सोमवार को आयोजित निवेशक सम्मेलन को बेहद सफल बताते हुए सहाय ने कहा कि इसमें कृषि व अन्य उद्योगों से जुड़े उद्योजक शामिल हुए थे। अमरावती में फुड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री जरूरी बताते हुए सहाय ने कहा कि इसके लिए सरकार पूरी मदद करेगी। उन्होंने किसानों व निवेशकों से मिलकर सामूहिक खेती करने की सलाह दी। निवेशक कृषि उद्योग में पैसा लगाएंगे और किसान मेहनत करेगा। नुकसान होने पर निवेशक सहेगा। फुड प्रोसेसिंग यूनिट को राज्य और केंद्र सरकार मिलकर 25 प्रतिशत या 50 लाख रुपये की मदद करेंगे। राज्य सरकार क्वालिटी कंट्रोल लैब के लिए 100 प्र.श. तथा निजी क्षेत्र की कंट्रोल लैब को 50 प्र.श. तक मदद केंद्र सरकार देगी। फुड प्रोसेसिंग डिप्लोमा-डिग्री कोर्स चलाने वाले कालेजों को भी उनका मंत्रालय हरसंभव मदद करेगा। सहाय ने कहा कि किसान बाजारोन्मुखी खेती करते हैं तो उन्हें काफी लाभ मिलेगा। देश में हरितक्रांति लाना हो तो सामूहिक खेती ही एकमात्र चारा है। खेती व्यापार आधारित होनी चाहिए। किसान इससे 10,000 रु. प्रतिमाह कमाएगा तो भी राजा बन जाएगा। खेती में निवेश करने वाले को राज्य सरकार ने भी प्रोत्साहित करना चाहिए। अगले एक-दो माह में केंद्र सरकार सामूहिक खेती के बारे में ठोस निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में केंद्र सरकार विदर्भ के उद्योगों को प्राथमिकता देगी बशर्ते वे कृषि आधारित उद्योग हों। चर्चा के समय राज्य के पशु संवर्धन व दुग्ध विकास मंत्री नितिन राऊत भी उपस्थित थे।
0000
Labels:
कृषि/विदर्भ,
नागपुर समाचार,
राजनीति
शनिवार, मई 01, 2010
संघ मुख्यालय में शिवराज की दस्तक
संजय स्वदेशमध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शनिवार को सुबह करीब 8.30 बजे नागपुर पहुंचे। उन्होंने महल स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय में संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की। संघ सूत्रों का कहना है कि चौहान ने संघ प्रमुख से करीब दो-ढाई घंटे तक चर्चा की।
नागपुर।
ज्ञात हो कि दो दिन पूर्व भाजपा की पूर्व नेता और मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी नागपुर आकर संघ मुख्यालय में संघ प्रमुख से बातचीत की। ये सारी चर्चाएं उमा भारती की भाजपा में वापसी की अटकलों को लेकर हो हो सकती हैं। गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान उमा भारत के प्रबल विरोधी माने जाते हैं। संघ मुख्यालय से हरी झंडी मिलने के बाद भी भाजपा के उमा विरोधी नेताओं के कारण उनकी पार्टी में वापसी बार-बार टल रही है। उमा भारती के संघ मुख्यालय में आने के दो दिन बाद शिवराज सिंह के संघ मुख्यालय में आने से उमा भारती के प्रति अपना विरोध जताने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
जानकारों की मानें तो उमा भारती की भाजपा में वापसी को लेकर चल रही अटकलों के कारण शिवराज चौहान की सिरदर्दी बढ़ गई थी। इसी कारण उन्होंने आनन-फानन में मध्य प्रदेश के पार्टी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए प्रभात झा के नाम पर इच्छा के विरुद्ध सहमति दे दी थी। इसी बीच 27 अप्रैल को उमा भारती गुपचुप तरीके से फिर नागपुर आकर संघ मुख्यालय में संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की। इससे पहले भी वे कई बार संघ मुख्यालय आ चुकी है। पर मध्य प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के समय ही उमा नागपुर आई। एक बात तो स्पष्ट है कि अब उमा भारती की यदि भाजपा में वापसी होती है तो वे राज्य की राजनीति से ऊपर केंद्रीय राजनीति में रहेंगी।
जानकारों का कहना है कि कल्याण सिंह लोध समाज से थे। लेकिन कल्याण सिंह की वापसी की राह में अभी राजनाथ सिंह व अन्य कुछ नेताओं का बड़ा रोड़ा है। इसलिए संभावना है कि उमा भारती को वापस पार्टी में लाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में खड़ा किया जाए, जिससे कि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में लोध समाज के वोटों को भाजपा में पक्ष कर सके।
Labels:
नागपुर समाचार,
राजनीति
सोमवार, अप्रैल 26, 2010
लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर। विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर। विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
सोमवार, अप्रैल 19, 2010
भाजपा का दामन थाम सकते हैं प्रकाश आंबेडकर

दलित वोटों के लिए छोटे आंबेडकर को अपने पक्ष में मिलाने के लिए भाजपा पहले से ही है तैयार
नागपुर। दलित वोटों की राजनीतिक मारामारी में भाजपा भी खम ठोंककर मैदान में उतरने की पूरी तैयारी में है। इसके लिए एक रणनीतिबद्ध तरीके से भाजपा के प्रतिनिधि बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर को अपने साथ मिलाने के प्रयास में हैं। पूछने पर भले ही प्रकाश आंबेडकर इस बात से इनकार करें। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और आंबेडकर दोनों की राजनीतिक मजबूरी है कि वे एक हो जाएं। सूत्रों का कहना है कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो जून में विदर्भ में दो जिलों में होने वाले परिषद के चुनाव में प्रकाश आंबेडकर के साथ भाजपा का गठबंधन हो सकता है। मतलब कांग्रेस को करारी शिकस्त देने के लिए भाजपा की भारिप बहुजन महासंघ साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरेंगे। जानकारों की मानें तो यह दोनों की दलों की राजनीतिक मजबूरी है। भारिप बहुजन महासंघ अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकती। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी हार से सहमी हुई है। नये अध्यक्ष कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे घटक और प्रकाश आंबेडकर का भरोसा नहीं है। हालांकि रिपाई नेता रामदास आठ्वल्ले अभी भी प्रकाश आंबेडकर से उनके साथ मिलकर मजबूत होने का आह्वान करते हैं। लेकिन प्रकाश आंबेडकर कई मौके पर खुले आम कांग्रेस की अलोचना करने के साथ यह कह चुके हैं कि रिपाई के दूसरे घटक कभी भी कांग्रेस के साथ खड़े हो सकते हैं। इसलिए रिपाई घटकों के साथ उनका गठबंधन होने का कोई सवाल ही नहीं है।
हालांकि अभी भी प्रकाश आंबेडकर अभी भी भाजपा से दूरी बनाये दिख रहे हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देशन में भाजपा के प्रतिनिधि प्रकाश आंबेडकर से संपर्क में है। नितिन गड़करी के साथ प्रकाश आंबेडकर के रिश्ते भी मधुर माने जाते हैं। यदि इस चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिलती तो राष्ट्रीय स्तर पर गडकरी की काफी किरकिरी हो सकती है। इसलिए दोनों जिला परिषद के चुनाव को जीतने के लिए भाजपा हर जोखिम लेने को तैयार है। वैसे भी भाजपा के पास अभी कोई कद्दवार दलित नेता नहीं है जिससे कि वह हिंदुत्व के वोट बैंक के साथ ही दलित वोट बैंकों पर कुछ सेंध लगा सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी की कमान संभालने के बाद यह साफ कह दिया था कि उनका लक्ष्य पार्टी के मौजूदा वोट प्रतिशत में दस प्रतिशत बढ़ाना है। इसके लिए भाजपा नए मित्रों व नए क्षेत्रों में पहुंच बनाने में परहेज नहीं करेगी। यदि प्रकाश आंबेडकर भाजपा के साथ आते हैं तो इससे भाजपा को न केवल विदर्भ में लाभ मिलेगा। बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। अनेक घटनाक्रमों में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रति दलित का विश्वास घटता जा रहा है। इस लिहाजा से भी प्रकाश आंबेडकर भाजपा के लिए काफी लाभकारी हो सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि एक सीमित क्षेत्र में केवल अपनी पार्टी के दम पर प्रकाश आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति से ओझल है। यदि वे भाजपा का दामन थामते हैं तो लोकसभा से पूर्व उनके राज्य सभा में जाने की राह भी असान हो सकती है। पिछले दिनों में प्रकाश आंबेडकर ने इस बात का संकेत दे दिया था कि कांग्रेस आलाकमान यदि पृथक विदर्भ आंदोलन को समर्थन नहीं देता है तो वे अपनी रणनीति बदलने से परहेज नहीं करेंगे। अभी तब वे भाजपा से दूर-दूर खड़े दिख रहे थे। लेकिन भविष्य में भी ऐसा होगा यह जरूरी नहीं।
0000
Labels:
नागपुर समाचार,
राजनीति,
विदर्भ
रविवार, अप्रैल 18, 2010
जनता की अदालत में गडकरी का आरोपपत्र
महंगाई को लेकर संप्रग सरकार पर लगाए 14 आरोपमुंबई। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने महंगाई के मुद्दे पर केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार को जबर्दस्त ढंग से घरते हुए जनता का आरोपपत्र प्रस्तुत किया है। मुंबई में आयोजित एक पत्रकार परिषद में उन्होंने कहा कि केंद्र की संप्रग सरकार को एक वर्ष का समय पूर्ण हो रहा है। 100 दिन में महंगाई दूर करने का सरकार का दावा पूरी तरह फेल हो गया है। जीवनावश्यक चीजों के दाम 100 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। अनाज के गोदाम भरे होने के बाद भी गरीबों को जरूरी अनाज नहीं मिल पा रहा है। गडकरी ने केंद्र सरकार को सौंपे पत्र में कुल 14 आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि भारत में अनाज की कीमतें बढऩे से भूखे पेट रहने वालों की संख्या बढ़ रही है। गरीबों को अनाज देने में सरकार फेल हो गई है। सक्सेना कमेटी के अनुसार अभ भी 51 प्र.श. गरीबों के पास अभी भी बीपीएल अंत्योदय राशन कार्ड उपलब्ध नहीं है। जनता भूखी न रहे इसकी नैतिक जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सरकार इसमें असफल रही है। कई राज्यों की गरीबी रेखा के नीचे वाली जनता को इस हक से सरकार ने वंचित रखा और संविधान की धारा 21 का उल्लंघन किया। महंगाई केवल अक्षम्य लापरवाही के कारण बढ़ी। लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ गया। जनता को दिए गए आश्वासन जनता ने नहीं निभाकर संविधान की धारा 47 का उल्लंघन किया। सरकारी गोदाम भरे होने के बाद भी देश में महंगाई है। केंद्र ने इसे बाद भी बफर स्टाक को खुला क्यों नहीं किया? गोदामों में अनाज सड़ता रहा फिर भी जनता भूखी क्यों? संप्रग सरकार अन्न धान्य सुरक्षा कानून 2006 के अनुसार गरीबों को मूलभूत जरूरत अनाज देने में भी विफल रही। 80 लाख टन गेहूं के बोरे एफसीआई गोदामों में भरे पड़े हैं। एफसीआई भी मंडी व अन्य लोगों से गेहूं लेने में विफल रहा है। आरोप लगाया गया है कि प्रधानमंत्री के मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने जीवनावश्यक वस्तु कानून का अक्षम्य उल्लंघन किया है। इस कानून के अनुसार अनाज की कालाबाजारी करना अपराध है लेकिन केंद्र सरकार ने स्वयं ही आवश्यक अनाज की फ्यूचर फारवर्ड ट्रेडिंग करने के लिए कमोडिटी एक्सचेंज के जरिये अनुमति दी तथा अनाज को बेकार कर दिया। शक्कर तथा अन्य जरूरी चीजों को संग्रहित कर रखा तथा मूल्य वृद्धि कर व्यापारियों को भरपूर लाभ दिलाया। यह गैरजमानती अपराध है। कमोडिटी एक्सचेंज किसानों की बजाय अब व्यापारियों के हित में उपयोगी साबित हो रहा है। गडकरी ने आरोप लगाया कि संप्रग सरकार ने देश की जनता को विश्व बाजार की गलत जानकारी देकर जनता की आंखों में धूल झोंकी। वैश्विक दर भारतीय दर से आधी है। यह देश की जनता के साथ धोखाधड़ी है। भारत में 11 प्रतिशत से अधिक महंगाई का दर विश्व में सर्वाधिक है। चीन का जीडीपी दर 9.5 प्र.श. (भारत का 7.2 प्र.श.) होकर भी चीन में केवल 2 प्र.श. महंगाई है जबकि भारत में महंगाई दर 11 प्र.श. है। आरोप यह भी है कि केंद्र सरकार ने राज्य के संविधानात्मक निर्देशित तत्वों का उल्लंघन किया है। इसके अलावा आयात-निर्यात में गड़बड़ी कर देश की जनता के साथ धोखाधड़ी की है। केंद्र सरकार की आयात-निर्यात नीति अपारदर्शी एवं गड़बड़ी पैदा करने वाली है। गडकरी ने का कि भारतीय संविधान के अनुसार जनता को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय मिलना जरूरी है लेकिन केंद्र सरकार इसमें पूरी तरह असफल साबित हुई है। कांग्रेस गरीबी हटाने की बजाय गरीबी को बढ़ा रही है। केंद्र सरकार पर ग्राहक संरक्षण कानून का अक्षम्य उल्लंघन करने का आरोप भी लगाया गया है। केंद्र की गलत आर्थिक नीतियों के कारण किसानों को उनकी कृषि उपज का कम मूल्य मिल रहा है तथा आम उपभोक्ता उसे दोगुने मूल्य पर खरीद रहा है। संप्रग सरकार गरीबों का नहीं बल्कि मध्यस्थों का, अमीरों का, शक्कर सम्राटों की है।
गडकरी ने कहा कि वे जनता का यह आरोपपत्र जनता के न्यायालय में ही प्रस्तुत कर रहे हैं और जनता के सामने लापरवाही केंद्र सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने का आह्ïवान कर रहे हैं।
गडकरी ने कहा कि वे जनता का यह आरोपपत्र जनता के न्यायालय में ही प्रस्तुत कर रहे हैं और जनता के सामने लापरवाही केंद्र सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने का आह्ïवान कर रहे हैं।
रविवार, मार्च 28, 2010
बाबा रामदेव को पार्टी नहीं बनाने की सलाह : जावड़ेकर
संजय स्वदेश
नागपुर। बाबा रामदेव का काम जीवन, स्वास्थ्य के संबंध में है, जिसका सभी सम्मान करते हैं। लेकिन राजनीति में कोई पार्टी आती है तो दूसरी पार्टी को सोचना पड़ता है। रामदेव बाबा से भाजपा को कोई घबराहट नहीं है। यह कहना है भाजपा प्रवक्ता व राज्यसभा सदस्य प्रकाश जावड़ेकर का। श्री जावड़ेकर शनिवार को नागपुर श्रमिक पत्रकार संघ भवन में पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जहां तक राजनीति का सवाल है तो भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी ने उन्हें राजनीति में नहीं आने की सलाह दी है।
अमिताभ और मोदी सोनियाजी के लिए आवंछनीय
मुंबई के एक समारोह में फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन के अतिथि होने से उठे विवाद पर पूछे गए सवाल पर जावड़ेकर ने कहा कि अमिताभ का अपमान कला व संस्कृति का अपमान है। इस तरह का अपमान करना कांग्रेस की संस्कृति को दर्शाता है। नरेन्द्र मोदी और अमिताभ बच्चन दोनों सोनियाजी के अवांछनीय हैं। सोनिया गांधी व अमिताभ बच्चन के परिवार के बीच नहीं पटती। इसलिए उन पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश से बिग बी का अपमान किया गया है। यह अलोकतांत्रिक है, हम इसकी भत्र्सना करते हैं। कांग्रेस ने अपनी मर्यादा को तोड़ा है। बच्चन के मामले में मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को हाईकमान के समक्ष सफाई देनी पड़ती है, यह बड़ी शर्मनाक बात है। गुजरात ब्रांड एंबेसडर तो एक बहाना है, सही कारण तो बच्चन और गांधी परिवार का झगड़ा है। आईपीएस अधिकारी अंजू गुप्ता के बयान पर उन्होंने कहा कि मामला कोर्ट में चल रहा है, इस पर कुछ भी बोलना उचित नहीं होगा।
विदर्भ का मुद्दा उठाने के लिए ही खोला गया विभागीय कार्यालय
विदर्भ के संदर्भ में जावड़ेकर ने कहा कि भाजपा पिछले 12 साल से विदर्भ की मांग कर रही है। विदर्भ की आवाज को दिल्ली में उठाने के उद्देश्य ही नागपुर में विदर्भ विभागीय कार्यालय खोला गया है। विदर्भ की सारी शिकायतों की सुनवाई के लिए वे खुद माह में एक तथा सांसद हंसराज अहीर दो बार इस कार्यालय में उपस्थित रहेंगे।
रविवार, मार्च 14, 2010
नई दिल्ली टू गडकरी वाडा
भाजपा का मिनी मुख्यालय गडकरी वाडा
संजय स्वदेश
नितिन गडकरी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष क्या बनें, भाजपा की राजनीति नागपुर से संचालित होने लगी है। स्वाभावित है। गडकरी नागपुर के हैं, संघ कार्यालय नागपुर में है। भाजपा संघ की जन्मदात्री 'मांÓ है। अध्यक्ष होने के नाते पार्टी के 'पतिÓ तो गडकरी ही हुए। इस लिहाज से गडकरी 'सासु मांÓ का दामन भला कैसे छोड़ सकते हैं। वह भी उस मां का जिसने पार्टी के पोस्टर चिपकाने वाले गड़करी जैसे साधारण कार्यकर्ता को पार्टी के शिखर पर पहुंचा देती है। गडकरी के माध्यम से संघ ने पूरी तरह से भाजपा को अपने नियंत्रण में ले लिया है। तभी तो गुजरात के संघी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के लिए सबसे योग्य बताने में गडकरी थोड़े भी नहीं हिचके। हर जगह संघ कैडर प्रभावी होगा। तभी तो अध्यक्ष बनते ही उन्होंने संघ कैडर के प्रभावी नेताओं को पार्टी में वापस लेने का संकेत दिया। इस कवायद में उमा भारती पहले ही संघ मुख्याल में चक्कर लगा चुकी है। पार्टी में किनारे चल रहे कट्टर संघी संजय जोशी को लेकर चर्चा है। इंदौर में रामराज्य के साथ अंत्योत्दय की भी बात हुई। मतलब राष्ट्रवादी की जो बाते संघ करता है, उसके के अनुसरण में करते हुए गडकरी अपनी नीतियों को कारगर तरीके से प्रभावी करने की जुगत में लगे हुए हैं। गडकरी के संकेत स्पष्ट है। पार्टी में रहना है तो संघ की माननी होगी। स्थिति को पार्टी के कई नेता अभी से ही भांप गए हैं। समझ गए हैं कि बिना नागपुर के पार्टी में बड़े कद की गुंजाइश नहीं है। तभी रविवार, 15 मार्च को नागपुर में आयोजित पृथक विदर्भ राज्य की जनसभा में गडकरी को समर्थन देने दो राज्य के मुख्यमंत्री समेत, एक राज्य के उपमुख्यमंत्री आए। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रणम सिंह, उत्तरांचल के मुख्यमंत्री रमेश पोखारिया और झारखंड के उप-मुख्यमंत्री रघुवरदास। सभी ने गडकरी के सुर से सुर मिलाया। अपने सुर- में दूसरे का सुर मिलता देख किसे अच्छा नहीं लगता है। लोकसभा में विपक्ष के उप नेता गोपीनाथ मुंडे ने भी विदर्भ के मुद्दे को संसद में उठाने की हामी भर दी। यहीं मुड़े कभी गडकरी के घोर विरोधी थे। प्रमोद महाजन के जमाने में मुंडे के पीछे-पीछे गडकरी चलते थे। आज गडकरी के नेतृत्व में विदर्भ में आकर पृथक विदर्भ का समर्थन कर रहे हैं।
कहने के लिए तो नागपुर की यह जनसभा पृथक विदर्भ के लिए थी। लेकिन हकीकत में यह राष्ट्रीय स्तर पर गडकरी की मजबूती दिखाने का एकतरह का 'पीआरÓ का एक नमूना था। भले ही गडकरी अपने गढ़ में हार चुके हों, पर पार्टी में अपने 'गढ़Ó को और मजबूत कर रहे हैं। गडकरी का पीआर बढ़ाने आए दो राज्यों के मुख्यमंत्री और एक राज्य के उपमुख्यमंत्री ने इस जनसभा के माध्यम से गडकरी के संबंध प्रगाढ़ करने की कोशिश की है। उत्तरांचल के मुख्यमंत्री रमेश पोखारिया यह जानते हैं कि उनके राज्य के मुख्यमंत्री का ताज उनके सिर कैसे आया? उत्तरांचल में पार्टी में पोखारियों को न चाहने वालों की कमी नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी पार्टी की एक लॉबी 'चावल वाले बाबाÓ की टांग खिंचने की जुगत में है। अब भला कैसे कैसे यह नहीं कहा जा सकता कि एक उप मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री की कुर्सी के सपने देखता है। भविष्य में झारखंड में भाजपा के शासन आने पर रघुवरदास को गडकरी से गहरी आशा है। समय से पहले इन नेताओं ने भविष्य में गडकरी की महत्ता को भांप कर नागुपर आने का मौका ढूढ़ लिया। भविष्य के लिए गडकरी के साथ प्रगाढ़ संबंध बनाने कवायद कर अपने राजनीतिक भविष्य के लिए निवेश कर दिया है। कुछ वर्षों से पार्टी में किनारे चल रहे पार्टी प्रकाश जावड़ेकर पहले भूले-भटके ही नागपुर आते थे। गडकरी के अध्यक्ष बनने ही नागपुर आने की सिलसिला शुरू हो गया है। अब तो वे नागपुर में हर सप्ताह राज्य के संसदीय कार्यालय में आएंगे। इनसे पहले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रविशंकर प्रसाद भी नागपुर आए। चोरी-छिपे शत्रुघ्न सिन्हा भी नागपुर आए। संकेत है कि आने वाले दिनों में और भी नेता नागपुर की ओर रुख करेंगे। पार्टी का 'मिनी मुख्यालयÓ नागपुर में गडकरी वाडा हो जाए तो आश्चर्य नहीं।
शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010
भाजपा में उमा की वापसी तय, इंदौर में होगी घोषणा
संजय स्वदेश,
www.visfot.com, 12 February, 2010 09:52;00
इंदौर में होगा खुलासा
मोहन भागवत और नितिन गडकरी बुधवार की शाम की शाम नागपुर में थे। दोनों एक कार्यक्रम में साथ थे। गुफ्तगू करते भी दिखे थे। अगले दिन गुरुवार को उमा भारती आईं। दोनों से उमा भारती की संघ मुख्याल में ही मुलाकत हुई। पर संघ और भाजपा ने इसका औपचारिक खुलासा नहीं किया है। उमा भारती के पारिवारिकर सूत्रों की मानें तो भाजपा में उमा की वापसी करीब तय हो चुकी है। संभावना है कि 19 फरवरी तक उमा भाजपा में होगी। इसको लेकर औपचारिक रूप से इंदौर में होने वाली पार्टी के अधिवेशन में आम सहमति बनाई जाएगी। अधिवेशन के अंतिम दिन उमा को पार्टी में वापस लेने की घोषणा हो सकती है।
नितिन गडकरी पहले ही दे चुके हैं संकेत
ज्ञात हो कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद नागपुर में एक पत्रकार से अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि वे पार्टी से बाहर गए जनाधार वाले दिग्गज नेताओं की घर वापसी चाहते हैं। बाद में जब यह मामला सुर्खियों में आया तो गडकरी ने कहा कि यदि पार्टी से निकले नेता पार्टी में दुबारा वापस आना चाहते हैं तो इस पर पार्टी और संबंधित नेता के राज्य स्तर की ईकाई से चर्चा करके ही निर्णय लिया जाएगा।
पहले भी गुपचुप आ चुकी है संघ मुख्यालय
उमा भारती पहले भी गुपचुप तरीके से संघ मुख्यालय आ चुकी हैं। हालांकि तब भी उन्होंने कहा था कि वे वर्धा के एक गांव में पारिवारिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं थीं। उसी दिन संसद में लिबरहान आयोग की रपट संसद में पेश हुई थी। उसमें उमा भारती का नाम था। तब उमा ने कहा था कि आयोग की रपट में नाम होने की खबर सुन कर वे नागपुर रूक गईं थी और अपना पक्ष रखने के लिए मीडिया से बातचीत की। तब भी सूत्रों ने कहा था कि वे गुपचुप तरीके से संघ मुख्यालय घुम आईं थीं।
मजबूर हैं उमा
पुरानी कहावत है। मरता क्या न करता? अपनी अलग पार्टी बनाकर उमा कुछ नहीं कर पाईं। भाजपा से अलग होने के बाद उमा को अपने घटते वजूद का अहसास हो चुका है। दूसरे भारतीय जनशक्ति पार्टी को चलाने और मजबूत करने के लिए पार्टी को वित्तिय संकट गंभीर है। पहले प्रह्लाद पटेल का सहारा था। अब उनका साथ भी पूरी तरह से छूट चुका है। लिहाजा, उमा भारती के सामने भाजपा के आलावा दूसरा कोई विकल्प बचा नहीं है।
www.visfot.com, 12 February, 2010 09:52;00
उमा भारती भाजपा में वापस आ रही हैं. गुरुवार को दिन में नागपुर में भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत से उमा भारती की गुप्त मुलाकात में उनकी वापसी की तिथि भी तय हो गयी है और इंदौर में भाजपा कार्यकारिणी के आखिरी दिन उनकी वापसी की घोषणा करने की तैयारी है.
इंदौर में होगा खुलासा
मोहन भागवत और नितिन गडकरी बुधवार की शाम की शाम नागपुर में थे। दोनों एक कार्यक्रम में साथ थे। गुफ्तगू करते भी दिखे थे। अगले दिन गुरुवार को उमा भारती आईं। दोनों से उमा भारती की संघ मुख्याल में ही मुलाकत हुई। पर संघ और भाजपा ने इसका औपचारिक खुलासा नहीं किया है। उमा भारती के पारिवारिकर सूत्रों की मानें तो भाजपा में उमा की वापसी करीब तय हो चुकी है। संभावना है कि 19 फरवरी तक उमा भाजपा में होगी। इसको लेकर औपचारिक रूप से इंदौर में होने वाली पार्टी के अधिवेशन में आम सहमति बनाई जाएगी। अधिवेशन के अंतिम दिन उमा को पार्टी में वापस लेने की घोषणा हो सकती है।
नितिन गडकरी पहले ही दे चुके हैं संकेत
ज्ञात हो कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद नागपुर में एक पत्रकार से अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि वे पार्टी से बाहर गए जनाधार वाले दिग्गज नेताओं की घर वापसी चाहते हैं। बाद में जब यह मामला सुर्खियों में आया तो गडकरी ने कहा कि यदि पार्टी से निकले नेता पार्टी में दुबारा वापस आना चाहते हैं तो इस पर पार्टी और संबंधित नेता के राज्य स्तर की ईकाई से चर्चा करके ही निर्णय लिया जाएगा।
पहले भी गुपचुप आ चुकी है संघ मुख्यालय
उमा भारती पहले भी गुपचुप तरीके से संघ मुख्यालय आ चुकी हैं। हालांकि तब भी उन्होंने कहा था कि वे वर्धा के एक गांव में पारिवारिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं थीं। उसी दिन संसद में लिबरहान आयोग की रपट संसद में पेश हुई थी। उसमें उमा भारती का नाम था। तब उमा ने कहा था कि आयोग की रपट में नाम होने की खबर सुन कर वे नागपुर रूक गईं थी और अपना पक्ष रखने के लिए मीडिया से बातचीत की। तब भी सूत्रों ने कहा था कि वे गुपचुप तरीके से संघ मुख्यालय घुम आईं थीं।
मजबूर हैं उमा
पुरानी कहावत है। मरता क्या न करता? अपनी अलग पार्टी बनाकर उमा कुछ नहीं कर पाईं। भाजपा से अलग होने के बाद उमा को अपने घटते वजूद का अहसास हो चुका है। दूसरे भारतीय जनशक्ति पार्टी को चलाने और मजबूत करने के लिए पार्टी को वित्तिय संकट गंभीर है। पहले प्रह्लाद पटेल का सहारा था। अब उनका साथ भी पूरी तरह से छूट चुका है। लिहाजा, उमा भारती के सामने भाजपा के आलावा दूसरा कोई विकल्प बचा नहीं है।
गुरुवार, फ़रवरी 11, 2010
खान के 'रण में कूदी उमा भारती
उमा ने कहा :- बाल ठाकरे-राज देश छोड़ें
संजय स्वदेश
नागपुर।
शिवसेना बनाम अभिनेता शाहरुख खान के 'रणÓ में भारतीय जनशक्ति पार्टी की फायरब्रांड नेता उमा भारती ने भी छलांग लगा दी है। उन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे पर उन्हीं की आक्रामक शैली में हमला बोलते हुए कहा है कि हिन्दी का विरोध करने वाले बाल ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे लंदन जाकर बस जाएं और वहीं मराठी का प्रचार-प्रसार करें। संतरानगरी में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं उमा भारती ने रेलवे स्टेशन पर कुछ पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ये दोनों नेता हिन्दी का विरोध कर रहे हैं, जबकि अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव पर किसी तरह की आपत्ति नहीं कर रहे हैं। सुश्री भारती ने अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म 'माई नेम इज खानÓ का विरोध न करने की सलाह देते हुए कहा कि ऐसे आंदोलनों से फ्लॉप होने वाली फिल्म कई बार हिट हो जाती है।
उमा ने कहा कि उम्र के लिहाज से शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे को अब लिखना बंद कर देना चाहिये। उन्होंने पिछले दिनो क्या लिखा, क्या कहा यह भी याद नहीं? उनके लिखने बोलने में अब पहले जैसी धार या ललकार भी नहीं रही। दोनों चाचा-भतीजे बेवजह लोगो को भड़काने का कार्य कर रहे हैं। और दोनों की आपसी लड़ाई का कांग्रेस न केवल लाभ ले रही है, बल्कि उन्हें संरक्षण देने का भी कार्य कर रही है।
... tab होता विरोध तो ठीक था
उन्होंने कहा की शाहरूख खान पर पहले भी संदिग्ध लोगों के साथ संबंध होने का आरोप लग चुका है। जब शाहरूख को अमेरिका हवाई अड्डे पर रोका गया था तो उसने इस बात को लेकर नाराजी व्यक्त कर लोगों की सहानुभूति पाना चाहा था। मगर बाद में जब उस पर और गंभीर आरोप लगे तब खान खामोश हो गया। उन्होंने कहा कि इस खान में दम नहीं है। इसका विरोध करने से इस फिल्म को अब फिल्म काफी लोकप्रिय हो चुकी है। शिवसेना के विरोध प्रदर्शन का लाभ फिल्म निर्माता तथा शाहरूख खान को मिलेगा।
शाहरुख की देशभक्ति पर शक नहीं
उमा ने कहा कि मैं शाहरुख खान की देशभक्ति पर शक नहीं करती। मगर शाहरूख का नाम भी कुछ उन संदिग्ध लोगों के साथ जुड़ चुका है जो आतंाकवादी संगठनों से संपर्क रखते हैं। यदि शिवसेना इस बात का विरोध करती तो जायज था। मगर फिल्म के विरोध में कोई तुक नहीं दिखाई दे रहा है।
चाता-भतीजे को चुनौति
उन्होंने कहा कि उत्तर भारतियों का विरोध जायज नही है। मैं तो दोनों चाचा-भतीजे को चैलेंज करती हंू की जब मैं मुंबई जब जाऊं तो मेरा विरोध करके दिखाये। मैं उनसे बिलकुल नहीं डऱती।
संजय स्वदेश
नागपुर।
शिवसेना बनाम अभिनेता शाहरुख खान के 'रणÓ में भारतीय जनशक्ति पार्टी की फायरब्रांड नेता उमा भारती ने भी छलांग लगा दी है। उन्होंने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे पर उन्हीं की आक्रामक शैली में हमला बोलते हुए कहा है कि हिन्दी का विरोध करने वाले बाल ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे लंदन जाकर बस जाएं और वहीं मराठी का प्रचार-प्रसार करें। संतरानगरी में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं उमा भारती ने रेलवे स्टेशन पर कुछ पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ये दोनों नेता हिन्दी का विरोध कर रहे हैं, जबकि अंग्रेजी भाषा के बढ़ते प्रभाव पर किसी तरह की आपत्ति नहीं कर रहे हैं। सुश्री भारती ने अभिनेता शाहरुख खान की फिल्म 'माई नेम इज खानÓ का विरोध न करने की सलाह देते हुए कहा कि ऐसे आंदोलनों से फ्लॉप होने वाली फिल्म कई बार हिट हो जाती है।
उमा ने कहा कि उम्र के लिहाज से शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे को अब लिखना बंद कर देना चाहिये। उन्होंने पिछले दिनो क्या लिखा, क्या कहा यह भी याद नहीं? उनके लिखने बोलने में अब पहले जैसी धार या ललकार भी नहीं रही। दोनों चाचा-भतीजे बेवजह लोगो को भड़काने का कार्य कर रहे हैं। और दोनों की आपसी लड़ाई का कांग्रेस न केवल लाभ ले रही है, बल्कि उन्हें संरक्षण देने का भी कार्य कर रही है।
... tab होता विरोध तो ठीक था
उन्होंने कहा की शाहरूख खान पर पहले भी संदिग्ध लोगों के साथ संबंध होने का आरोप लग चुका है। जब शाहरूख को अमेरिका हवाई अड्डे पर रोका गया था तो उसने इस बात को लेकर नाराजी व्यक्त कर लोगों की सहानुभूति पाना चाहा था। मगर बाद में जब उस पर और गंभीर आरोप लगे तब खान खामोश हो गया। उन्होंने कहा कि इस खान में दम नहीं है। इसका विरोध करने से इस फिल्म को अब फिल्म काफी लोकप्रिय हो चुकी है। शिवसेना के विरोध प्रदर्शन का लाभ फिल्म निर्माता तथा शाहरूख खान को मिलेगा।
शाहरुख की देशभक्ति पर शक नहीं
उमा ने कहा कि मैं शाहरुख खान की देशभक्ति पर शक नहीं करती। मगर शाहरूख का नाम भी कुछ उन संदिग्ध लोगों के साथ जुड़ चुका है जो आतंाकवादी संगठनों से संपर्क रखते हैं। यदि शिवसेना इस बात का विरोध करती तो जायज था। मगर फिल्म के विरोध में कोई तुक नहीं दिखाई दे रहा है।
चाता-भतीजे को चुनौति
उन्होंने कहा कि उत्तर भारतियों का विरोध जायज नही है। मैं तो दोनों चाचा-भतीजे को चैलेंज करती हंू की जब मैं मुंबई जब जाऊं तो मेरा विरोध करके दिखाये। मैं उनसे बिलकुल नहीं डऱती।
सोमवार, फ़रवरी 08, 2010
नौकरी मांगने की बजाय निर्माण करें मराठी माणुस : मनोहर जोशी
संजय स्वदेश
नागपुर। मराठी लोगों को नौकरी मांगने की बजाय नौकरी निर्माण करनी चाहिए। मराठी आदमी व्यापार उद्योग में सामने आए और सिर्फ पैसा कमाने का उद्देश्य उसके सामने हो और इसी उद्देश्य को सामने रखकर 24 घंटे मेहनत करे। यह आह्वान शिवसेना के वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी ने किया है। वे नागपुर के हिंगणना स्थित जे.एम.सी.सी.आई.के सत्कार समारोह में बोल रहे थे।
मनोहन जोशी ने कहा कि मैं यह बात इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि मैं भी एक व्यवसायी व्यापारी और उद्योजक हूं। समारोह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का सत्कार होने वाला था, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण नितिन गडकरी समारोह में नहीं आ सके। समारोह में मराठी उद्योजकों व्यवसायिकों को उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया गया। समारोह मेें सांसद शिवाजीराव अढालराव पाटिल प्रमुख अतिथि तथा उपमहापौर शेखर सावरबांधे, सुधीर सावंत, मनोहर सालवे, विकास देवधर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
जोशी ने कहा कि नागपुर में यह सत्कार समारोह आयोजित करने की वजह यह है कि यहां के मराठी उद्योजक अपने उद्योगधंधों को और तेज गति प्रदान करें और चेम्बर के सदस्य बने। इसी दिशा में चेम्बर काम कर रहा है और नागपुर के मराठी उद्यमी भी इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे। मराठी व्यक्ति व्यवसाय और धंधा कर पैसा कमाए। यही है अमीर बनने का एकमात्र रास्ता। उन्होंने कहा कि जिद करो, स्पर्धा करो। कष्ट उठाओ और खूब पैसा कमाओ। मैंने अपना व्यवसाय कोचिंग क्लास से शुरू किया, फिर तकनीक के क्षेत्र में गया। आज राज्य में 52 और देश के अन्य शहरों में 12 मेरी तकनीकी संस्थाएं हैं। होटल, बांधकाम आदि व्यवसाय भी मैं कर रहा है। इस देश में ऐसा कोई नियम नही है। जिसे 'मोड़ा' न जा सके इसलिए नियमों का हवाला मत दो। बल्कि पैसे कमाने के नियम बताओं उन्हें ढूंढने की कोशिश करो। श्री. जोशी ने नागपुर विभाग के चेम्बर के अध्यक्षपद के मंगेश काशीकर, सचिव के लिए प्रदीप नगरारे तथा कोषाध्यक्ष के लिए विवेक पाठक के नामों की चेम्बर के कार्याध्यक्ष शिवाजी घोषणा की।
राव पाटिल ने कहा कि मराठी व्यक्ति का विकास हो इसी उद्देश्य से 1994-95 में चेम्बर की स्थापना की गई थी। कला साहित्य के क्षेत्र में मराठी भाषी है। लेकिन उद्योग धंधों में नहीं मराठी लोगों को एक प्लेट फॉर्म पर लाने के उद्देश्य से चेम्बर की स्थापना की गई। देश-विदेश के बड़े-बड़े उद्योगपति जो प्रकाश में नही आना चाहते थे। चेम्बर ने उन्हे सामने लाया ताकि उनसे प्रेरणा और मार्गदर्शन लेकर मराठी व्यक्ति व्यवसाय में आगे बढ़ सके। इस अवसर पर गोपालराव सिराड़कर, अजीत दिवालकर, अतुल यमसवार, सुनील सिर्सीकर और डॉ. चंद्रशेखर देशपांडे का शाल श्रीफल व सम्मान चिन्ह देकर सत्कार किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई। मंच संचालन स्मिता खनगई तथा आभार प्रदर्शन प्रदीप नगरारे ने किया। कार्यक्रम बड़ी संख्या में मराठी उद्योजक उपस्थित थे।
नागपुर। मराठी लोगों को नौकरी मांगने की बजाय नौकरी निर्माण करनी चाहिए। मराठी आदमी व्यापार उद्योग में सामने आए और सिर्फ पैसा कमाने का उद्देश्य उसके सामने हो और इसी उद्देश्य को सामने रखकर 24 घंटे मेहनत करे। यह आह्वान शिवसेना के वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी ने किया है। वे नागपुर के हिंगणना स्थित जे.एम.सी.सी.आई.के सत्कार समारोह में बोल रहे थे।
मनोहन जोशी ने कहा कि मैं यह बात इसलिए बोल रहा हूं, क्योंकि मैं भी एक व्यवसायी व्यापारी और उद्योजक हूं। समारोह में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का सत्कार होने वाला था, लेकिन स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण नितिन गडकरी समारोह में नहीं आ सके। समारोह में मराठी उद्योजकों व्यवसायिकों को उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित किया गया। समारोह मेें सांसद शिवाजीराव अढालराव पाटिल प्रमुख अतिथि तथा उपमहापौर शेखर सावरबांधे, सुधीर सावंत, मनोहर सालवे, विकास देवधर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
जोशी ने कहा कि नागपुर में यह सत्कार समारोह आयोजित करने की वजह यह है कि यहां के मराठी उद्योजक अपने उद्योगधंधों को और तेज गति प्रदान करें और चेम्बर के सदस्य बने। इसी दिशा में चेम्बर काम कर रहा है और नागपुर के मराठी उद्यमी भी इस कार्य को आगे बढ़ाएंगे। मराठी व्यक्ति व्यवसाय और धंधा कर पैसा कमाए। यही है अमीर बनने का एकमात्र रास्ता। उन्होंने कहा कि जिद करो, स्पर्धा करो। कष्ट उठाओ और खूब पैसा कमाओ। मैंने अपना व्यवसाय कोचिंग क्लास से शुरू किया, फिर तकनीक के क्षेत्र में गया। आज राज्य में 52 और देश के अन्य शहरों में 12 मेरी तकनीकी संस्थाएं हैं। होटल, बांधकाम आदि व्यवसाय भी मैं कर रहा है। इस देश में ऐसा कोई नियम नही है। जिसे 'मोड़ा' न जा सके इसलिए नियमों का हवाला मत दो। बल्कि पैसे कमाने के नियम बताओं उन्हें ढूंढने की कोशिश करो। श्री. जोशी ने नागपुर विभाग के चेम्बर के अध्यक्षपद के मंगेश काशीकर, सचिव के लिए प्रदीप नगरारे तथा कोषाध्यक्ष के लिए विवेक पाठक के नामों की चेम्बर के कार्याध्यक्ष शिवाजी घोषणा की।
राव पाटिल ने कहा कि मराठी व्यक्ति का विकास हो इसी उद्देश्य से 1994-95 में चेम्बर की स्थापना की गई थी। कला साहित्य के क्षेत्र में मराठी भाषी है। लेकिन उद्योग धंधों में नहीं मराठी लोगों को एक प्लेट फॉर्म पर लाने के उद्देश्य से चेम्बर की स्थापना की गई। देश-विदेश के बड़े-बड़े उद्योगपति जो प्रकाश में नही आना चाहते थे। चेम्बर ने उन्हे सामने लाया ताकि उनसे प्रेरणा और मार्गदर्शन लेकर मराठी व्यक्ति व्यवसाय में आगे बढ़ सके। इस अवसर पर गोपालराव सिराड़कर, अजीत दिवालकर, अतुल यमसवार, सुनील सिर्सीकर और डॉ. चंद्रशेखर देशपांडे का शाल श्रीफल व सम्मान चिन्ह देकर सत्कार किया गया। कार्यक्रम की शुरूआत दीप प्रज्ज्वलन से हुई। मंच संचालन स्मिता खनगई तथा आभार प्रदर्शन प्रदीप नगरारे ने किया। कार्यक्रम बड़ी संख्या में मराठी उद्योजक उपस्थित थे।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
.jpg)


