शुक्रवार, दिसंबर 26, 2008

हे नाग! तुझे नदी कहे या नाला ( नागपुर )

हे नाग! तुझे नदी कहें या नाला ? संजय स्वदेश/नागपुर. दुनिया के अधिकतर विकसित शहर किसी न किसी नदी के किनारे बसे हैं। लेकिन बहुत कम शहर ही ऐसे हैं जिसके बीचो-बीच एक नदी गुजरती हो। ऐसे शहरों में नागपुर एक रहा है। नगर के बीचों-बीच गुजरने वाली नाग नदी गंदा नाला बना चुकी है। आज स्थिति यह है कि इसके पास से गुजरने वाले लोग इसकी बदबू के कारण दूर भागते हैं। नदी के नाम से पहचाने जाने वाला नागपुर का नाग नदी नाला बन चुकी है। लगभग 19 किलोमीटर लंबी यह नदी कूड़ा-करकट और प्रदूषण से गंदे नाले में का रूप ले चुकी है। इसे नदी कहें या नाला, इसका मतभेद दो पीढ़ियों के बीच है। पुरानी पीढ़ी के लोग इसे अभी भी नदी कहते हैं, लेकिन नई पीढी इसे बड़ी सहजता से नाग नाला कहती है। ऐसी बात नहीं है कि इस नदी की साफ-सफाई कर इसे सौंदर्यीकरण का कार्य नहीं हुए है। ऐसे अनेक कार्य हुए हैं, लेकिन सब कुछ कागजों पर ज्यादा हुआ है। यदि हकीकत में होता तो नदी नाला नहीं बनी रहती। जानकारों का कहना है कि पिछले साल नागपुर महानगर पालिका और केंद्र की जेएनयूआरएम योजना के तहत नाला नहरीकरण योजना बनाई थी। इसके लिए 248 करोड़ रुपये खर्च के लिए तय किए गए थे। लेकिन इस योजना का क्या हुआ, इसका कहीं कोई आता-पता नहीं है। महापौर देवेन्द्र फडणवीस के कार्यकाल 1995 से 2000 में नाग नदी के सौन्दर्यीकरण के लिए एक विशेष योजना बनाई गई थी। योजना बनाने के लिए इकोसिटी फाऊंडेशन नामक संस्था की मदद की बात भी कही गई थी। बाद में केंद्र की राजग सरकार के कार्यकाल में केंद्रीय नदी संरक्षण प्रकल्प में नाग नदी को भी शामिल कर लिया गया। इसके लिए 30 करोड़ रुपये की भी मंजूरी हुई थी। राशि का कुछ हिस्सा राज्य सरकार व मनपा को भी वहन करना था। इस पर नीरी ने प्रदूषण रिपोर्ट भी तैयार की थी। लेकिन योजना कब और कैसे ठंडे बस्ते में चल गई? किसी को कुछ पता ही नहीं चला। इसके अलावा हर साल मनपा की ओर से मानसून आने से पूर्व बरसाती पानी की समुचित बहाव के लिए इसके साफ-सफाई का दावा किया जाता है, लेकिन हकीकत इस नदी के पास से गुजरने पर पता चलता है कि इसके लिए कितना काम हुआ है? जानकारों का कहना है कि वर्षों पूर्व लोग नदी में नहाते थे। डूबकी लगा कर भक्त जन संगमेश्रवर के दर्शन करते थे। समय बदलता गया और नाग नदी केवल गंदगी बहाने का माध्यम बन चुकी है। क्या कहती है नीरी की रिपोर्ट नीरी ने अपनी रिपोर्ट में नाग नदी के पुनर्जीवन को शहर के स्वस्थ व पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया है। नीरी के विशेषज्ञों का कहना है कि नदी का जल प्रवाह ढलान की ओर होने से इसमें परेशानी नहीं आएगी। संस्था ने नदी के किनारे रहने वाले 5 बच्चों की श्वसन प्रक्रिया की जांच की थी। इन बच्चों की तुलना बेहतर वातावरण में रहने वाले दूसरे 5 बच्चों के श्वसन प्रक्रिया से की गई, जिसमें नाग नदी के किनारे रहने वाले बच्चों में सांस लेने में समस्या होने का खुलासा हुआ था। कहां से निकली नदी? कई लोगों में यह भ्रम है कि नाग नदी का उद्गम स्रोत कन्हाण नदी है। लेकिन यह गलत है। 19 किलोमीटर लंबी नाग नदी का उद्गम अमरावती मार्ग के लावा गांव से होता है। वहां से दो प्रवाह निकलते हैं जो थोड़ी दूरी के बाद अलग-अलग दिशाओं से होकर जाते हैं। इसमें से एक अंबाझरी तालाब व दूसरा तेलनखंडी तालाब में मिलता है। दोनों धाराओं का संगम सीताबर्डी में यशवंत स्टेडियम के समीप और बैंक आॅफ महाराष्टÑ के पीछे होता है। इस संगम स्थल पर संगमेश्वर का प्रसिद्ध मंदिर है। बुजुर्गों का कहना है कि इसके घाट पर कभी श्रद्धालुओं की भीड़ जमा होती थी। यहां डूबकी लगाकर ल ोग संगमेश्वर का दर्शन करते थे। संगम से नदी की एक धारा निकलती है और यह आगे चल कर भंडार मार्ग पर पारडी के आगे भरतवाड़ा गांव की ओर मुड़ती हुई निकल जाती है। नदी की पूरी लंबाई वैसी ही निकली है जैसे नाग टेडे-मेड़े चलता है। अंबाझरी के किनारे बांध बंधे होने के तलाब का पानी बाहर नहीं निकलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो नदी के उद्गम का स्रोत बंद हो चुका है। लेकिन यहां नाला होने का अस्तित्व जरूर नजर आता है। बांध के पास से निकला नाला पूरी तरह से सूखा हुआ है। लगभग 50 गज तक दो-तीन जगह बीच के गढ्ढे में थोड़ा सा पानी का जमाव है। शायद ये पानी पिछले दिनों आए बरसात का हो। आगे की ओर बढ़ती नदी के रास्ते में नाले, गटर आदि मिलते है। कन्हाण तक जाते-जाते सैकड़ों गटर और नाले अपने गंदे पानी से इसे समृद्ध कर रहे हैं। इस गंदे पानी से नदी के किनारे जंगली पैधे हरियाली बिखेरे हुए है। कहीं-कहीं गर्मी से बेहाल पशु विशेष कर भौंस और स्वान इसमें बैठे हुए भी नजर आएंगे। मुख्यमंत्री ने की थी सफाई की घोषणा वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता उमेश चौबे का कहना है कि नदी की सफाई के लिए कई बार मांगे तो उठी, लेकिन कोई आंदोलन नहीं हुआ। 2002-2003 में जब नागपुर का त्रिशताब्दी महोत्व मनाया गया, तब इसकी सफाई के लिए विशेष मांग की गई थी। श्री चौबे का कहना है कि इसी वर्ष मुंबई में उनकी तत्कालीन मुख्यमंत्री विलाश राव देशमुख के साथ बैठक हुई। बैठक में नाग नदी की सफाई की मांग उठाई गई। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने एक प्रेसवार्ता में यह घोषणा भी कि की नाग नदी की सफाई की जाएगी। लेकिन हुआ कुछ नहीं। इसके अलावा मनपा के बजट में नाग नदी की सफाई के लिए लाखों की राशि आवंटित होती रही है। लेकिन काम कुछ नहीं हुआ है। यदि होता तो वह हकीकत में सामने नजर आता है। नदी को कहीं से और कभी देखें,तो साफ लगेगा, इसकी सफाई कभी हुई ही नहीं है। नदी के किनारे हुआ था अंग्रेजों के साथ युद्ध इतिहासकार डा. भा.रा. अंधारे का कहना है कि सीताबर्डी में जहां इस नदी की दो धाराओं का संगम स्थल है, वहां संगमेश्वर का प्रसिद्ध महादेव मंदिर का निर्माण सेना धुंरंधर मुढ़ोजी भोसले के कार्यकाल में हुआ था। उनका कार्यकाल 1772 से 1788 तक था। इसका निर्माणा दूसरे रघुजी की माता ओर मुढ़ोजी की पत् नी चिमाबाई ने कराया था। यहां संगम का पुराना पुल भी था। जहां तक मेरी स्मृति है 1956 तक इस नदी का पानी स्वच्छ था। गणेश चतुथी से एक दिन पहले तीन पर इस नदी के घाट पर पूजा के लिए महिलाओं की भीड़ जमा होती थी। नदी में गंदगी की शुरुआत 60 के दशक से हुई है। भोंसले काल में नदी का पानी इनतना साफ था कि संगम पर धार्मिक विधियां संपन्न होती थी। आज का सीपीएंड बरार कॉलेज कभी भोसलों का बरसाती महला था। यह नदी के किनारे स्थित था। भोसले राजा खाना खाने के बाद यहां आराम के लिए आते थे। तब नदी के बने सुंदर बांग के प्राकृतिक नजरे आनंद लेते थे। इसी के किनारे बेलवाग और तुलसी आग था। तुलसी आग में मुरलधर का मंदिर उत्कृष्ट कला का नमूना था। भोसले राजघराने की हाथी सुबह इसी नदी में नहाते थे। इससे नदी की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा भोसले घराने का श्मसानघाट भी इसी के गांधीगेट के पास था। कभी थडगाबाग के नाम से मशहूर भोसले घराने का राजघाट में पिंडदान होती थी। यहां ब्राह्मणों के पांव धोये जाते थे। नदी के किनारे आज के यशवंत स्टेडियम की जमीन पर ही भोसले राजा आपा साहब और अंग्रेजों के बीच सीताबर्डी की लड़ाई 181 में हुई थी। तब सक्करदरा का इलाका मेडिकल तक था। अंग्रेजों के साथ भोसलों की अंतिम लड़ाई सक्करदरा में ही नदी के किनारे हुई थी। यहां की डूबकी से मिलती थी पाप से मुक्ति कभी घाट पर लोग दूर-दूर से आकर बैठते थे। संगम की कलकल ध्वनी को सुन कर मन में सुखद शांति की अनुभूति करते थे। दो दशक से ऊपर हो गए। घाट की सीढ़ियां वीरान पड़ी है। सीताबर्डी के संगम चाल स्थित मंदिर के बुजुर्ग पुजारी पं. रामेश्वर प्रसाद तिवारी की का कहना है कि लाखों लोगों की आस्था का प्रतिक इस घाट का सौंदर्य शायद कोई नहीं लौटा सकता है। वे दिन गए जब दूर सड़क पर खड़े लोग संगम को देख श्रद्धा से अपना शीश नवा लेते थे। अब तो इधर कोई झांकता तक नहीं है। बस्ती में रहने वाले बच्चे कभी खेलते हुए यहां तक आ जाते हैं। यहां 6 प्राचीन मंदिर है। कहां यहां दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता था। विभिन्न मौके विशेषकर महाशिवरात्री पर यहां मेले लगते थे। संगम में डूबकी लगाकर लोग मंदिर में देव दर्शन करते थे। भक्त अपने पापों से मुक्ति पाते थे। यहां के मंदिर भी सूने रहते हैं। अब तो महाशिवरात्री को ही भक्तों की संख्या यहां थोड़ी ज्यादा दिखती है। अन्यथा महीने में दस लोग भी इन मंदिरों में आ जाए तो बहुत है। ये श्रद्धालु भी कोई बुर्जुग ही होते हैं। वैसे भी श्रद्धालु यहां आए क्यों? यहां संगम अब दो नदियों का नहीं है। यह दो गंदे नाले का है। बरसात के दिनों में जब पानी भरता है और बहाव कम होता है, तो मनपा की ओर से इसमें की मिट्टी और गंदगी को निकाला जाता है। लेकिन उस गंदगी को मनपाकर्मी किनारे पर ही छोड़ जाते है। जो अगली बारिश में धीरे-धीरे फिर इसमें ही आ जाते हैं। कई बार हुई सफाई की मांग वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता उमेश चौबे का कहना है कि नदी की सफाई के लिए कई बार मांगे तो उठी, लेकिन कोई आंदोलन नहीं हुआ। 2002-2003 में जब नागपुर का त्रिशताब्दी महोत्व मनाया गया, तब इसकी सफाई के लिए विशेष मांग की गई थी। श्री चौबे का कहना है कि इसी वर्ष मुंबई में उनकी तत्कालीन मुख्यमंत्री विलाश राव देशमुख के साथ बैठक हुई। बैठक में नाग नदी की सफाई की मांग उठाई गई। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने एक प्रेसवार्ता में यह घोषणा भी कि की नाग नदी की सफाई की जाएगी। लेकिन हुआ कुछ नहीं। इसके अलावा मनपा के बजट में नाग नदी की सफाई के लिए लाखों की राशि आवंटित होती रही है। लेकिन काम कुछ नहीं हुआ है। यदि होता तो वह हकीकत में सामने नजर आता है। नदी को कहीं से और कभी देखें,तो साफ लगेगा, इसकी सफाई कभी हुई ही नहीं है। यहां की मछलियां थी खास श्री चौबे का कहना है कि वे बचपन में नदी के कई सुंदर घाट देखें है। गणेश विसर्जन की शुरुआत भी सीताबर्डी के संगम से हुई। यह स्थान दर्शनीय रहा है। इस नदी में जो मछलियां रहती थी, वे मच्छरों के अंडे खाती थी। इस कारण कई राज्य के लोग यहां की मछलियों के बीज अपने यहां के नदी और तलाब में ले जाते थे। सिचार्इं के पानी का स्रोत भोंसला बंशज राजे मुढ़ोजी भोंसले यह स्वीकारने से नहीं हिचकते कि नाग नदी नहीं रही। यह पूरी तरह से गंदे नाले में परिवर्तित हो चुकी है। इसकी जो वर्तमान चौड़ाई है, वह कभी तिगुनी होती थी। इसके किनारे अतिक्रमण हुए हैं। कभी धोबियों के लिए यह नदी बेहद उपयोगी होती थी। ब्रिटिश शासन काल से कपड़े धोने के लिए उनके लिए घाट बने थे। छह-सात घोबी घाट तो 1965 तक चले। आज कहीं भी यह घाट नजर नहीं आता है। नदी की पानी का उपयोग आमजन विभिन्न कार्यों में करते थे। इसके किनारे होने वाली खेती की सिंचाई, नाग नदी के भरोसे ही थी। किनारे कई मंदिर थे। महाशिवरात्री और नागपंचमी के दिन मेले लगते थे। राजधानी बने रहने तक इसका पानी कई कार्यों में उपयोग होता था। किनारे के बगीचे इसी से सींचे जाते थे। रेसम बाग, तुलसी बाग में कुंए तो थे, लेकिन सिंचाई के लिए इसके पानी का उपयोग ज्यादा होता था नहीं चला नाग बचाने का अभियान श्री मुढ़ो का कहना है कि नदी की गहराई के बारे में तो हमें ज्ञात नहीं। लेकिन यह 40-50 फीट जरूर होगी। पूर्वजों का कहना था कि नदी पत्थर से बंधी हुई हैं। लेकिन भोंसला इतिहास में इसका कोई लिखीत उल्लेख नहीं है। यदि इसमें से गंदगी निकाल दी जाए तो नगर की समृद्धी में चार चांद लग जाए। नगर में कई अभियान शुरू होते हैं, लेकिन नदी की सफाई के लिए कभी कोई अभियान शुरू नहीं हुआ। इसके अलए अभियान चलाना चाहिए। आश्चर्य की बात यह है कि विभिन्न जन-समस्याओं व पर्यावरण से संबंधित मामलों को लेकर न्यायालय में कई जनहित याचिका दायर की गई। लेकिन नाग नदी की सफाई के लिए किसी ने कोई जनहित याचिका दायर नहीं की। नागपुर नगर की रचना के केंद्र में यह नदी रही है। हालत बिगाड़ने में प्रशासन का भी हाथ करीब 60 के दशक में इसके आसपास अतिक्रमण शुरू हुआ। इसका सारा दोष नगर पालिका को जाता है। नगर पालिका ने इसकी बार्बदी में कम भूमिका नहीं निभाई है। कई जगहों पर नाग नदी की जमीन को स्वयं नगर पालिका प्रशासन ने दूसरे को दिया। सड़क को बढ़ाने के लिए इसकी चौड़ाई घटाई। ढाई-दशक पहले तक हालत ठीक थी नदी के किनारे नगर को बसाने में भोंसले राजाओं का उद्देश्य था कि नगर के आमजन को पानी के परेशानी न हो। पानी के कारण नगर में हरियाली से पर्यावरण स्वच्छ रहने के साथ समृद्धी रहेगी। पुराने नागपुर का भूगोल नदी के इर्द-गिर्द ही है। जिस नदी के नाम से शहर को पहचाना जाता है, उसका अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। 25-30 साल पहले तक नदी का जल अशुद्ध नहीं था और पीने के अतिरिक्त पानी की समस्या नहीं होती थी। ऐतिहासिक फैसले इसके किनारे नागपुर में कई ऐतिहासिक फैसले इस नदी के किनारे हुए है। अंग्रेजों के विरोध में भोंसलों की कई मुहिमों की योजना बनी। क्योंकि नदी के किनारे घाट और मंदिर आसपास की घनी हरियाली से ढकी रहती थी। नागपुर से आजादी की लड़ाई की जो भी मुहिम छेड़ी गई थी, इन्हीं घाटों व मंदिरों से शुरू होती थी। नदी को पार करके कभी हमला नहीं हुआ।

कानून से कैसे रुकेगा aatnakwad

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गुरुवार, दिसंबर 25, 2008

मौसम ने छोड़ा साथ तो फैशन से मिलाया हाथ

तिब्बती शरणार्थियों के गर्म कपड़ों से कौन परिचित नहीं होगा। हर साल सर्दी शुरू होते ही कई तिब्बती सपरिवार नागपुर आते हैं। रंग-बिरंगे फैशनेबल कपड़े नागपुर के लोग खूब पसंद करते हैं। यहां आर्इं तिब्बती महिलाएं पुरुषों से कहीं ज्यादा मेहनत करती हैं। वे घर की रसोई की जिम्मेदारी के साथ ही स्टॉल संभालने की जिम्मेदारी उठाती है। बाकी दिनों में मजदूर की तरह खेतों में काम करती हैं। कभी मौसम की बेरुखी हर साल भारी पड़ती है। कभी खेतों की उपज कम होती है तो, साल सर्दी कम होने से गर्म कपड़ों की बक्री खरीदी अच्छी नहीं रहती है। संजय स्वदेश नागपुर. यशवंत स्टेडियम के समीप पटवर्धन मैदान में सजे तिब्बति शरणार्थियों के गर्म कपड़ों के बाजार में अधिकतर दुकानदार महिलाएं हैं। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि हर साल सर्दी शुरू होते ही नागपुर के इन मेहमानों जीवनयापन केवल गर्म कपड़ों के व्यवसाय से नहीं चलता है। इनका कहना है कि यह केवल तीन-से चार महीने का व्यवसाय है। बाकी समय तो वे खेती करती हैं। इसके बाद भी इतनी कमाई नहीं होती की बाकी समय बिना काम के गुजारा जा सके। यहां आर्इं महिलाएं कहती हैं कि वे घर के पुरुष सदस्यों के साथ खेती में पूरा सहयोग करती हैं। घर की जिम्मेदारी अलग। स्टॉल पर बैठ कर ग्राहकों को भी संभालना पड़ता है। कई महिलाओं ने बताया कि वे बच्चों को इस पेशे से नहीं जोड़ना चाहती हैं। सर्दी शुरू होेते ही खानाबदोश की तरह रहना पड़ता है। गर्म कपड़ों में फैशन यदि मौसम ने बेरुखी दिखाई तो खेती से भारी नुकसान उठाना पड़ता है। तब इस नुकसान की भरपाई अक्सर सर्द मौसम में गर्म कपड़ों के व्यापार से हो जाती है। यहां आई हुबली कहती हंै कि जब खेती पर मौसम की मार पड़ती है, तो सर्दी में फैशनेबल गर्म कपड़ों का साथ मिलता है। नागपुर के लोग गर्म कपड़ों में भी फैशन और स्टाइल देखते हैं। इसलिए यहां फैशनेबल कपड़ों ज्यादा लेकर आते हैं। नौकरी से ज्यादा व्यवसाय में मजा बैंगलूर से आई तेंजिन कहती हैं कि होटल मेजबानी करती हैं। इन दिनों भाई को सहयोग करने नागपुर आई है। अकेले इस स्टॉल को संभालना मुश्किल है। फिर नौकरी से ज्यादा व्यवसाय में मजा है। गर्म कपड़ों का व्यवसाय कुछ महीने का है। कई सालों से इसी व्यवसाय से जुड़े हैं, इसलिए दूसरा बदलने की सोचते नहीं। फसल अच्छी नहीं होन पर आर्थिक संकट मैसूर की डोलमा ने बताया कि वह 5 एकड़ जमीन में खेती करती हैं। पर खेती में लागत ज्यादा होने और मौसम की बेरुखी से जब अच्छी फसल नहीं होती तब आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। उन्हें इस पेशे में नहीं लाना है, क्योंकि यह बहुत तकलीफ वाला है। सर्द मौसम में सुबह जल्दी उठ कर घर का काम, फिर स्टॉल सजाओ, रात को घर वापस जाकर खाना बनाना-खाना। अपने लिए समय ही नहीं मिलता है। प्रेमा दसवीं की छात्रा है। उसके परिवार के लोग गोंदिया में चावल की खेती करते हैं। कहती है वह केवल दुकान में बैठती है। बारी-बारी से दुकान में बैठने से घर के दूसरे लोग आराम कर लेते हैं। बाजार में खेलते बच्चे तिब्बती शरणाथियों के संगठन के प्रमुख टी. नूरपुर ने बताया कि अल्पकालीन समय के लिए बने इस बाजार के लिए वे मनपा को चार लाख रुपये किराये के रूप में देते हैं। मनपा ही हर साल इस बाजार की व्यवस्था करती है। यहां कुल 62 परिवारों के 62 स्टॉल है। सभी लोग सपरिवार आए हैं। कई नन्हें-बच्चे बाजार में ही खेलते नजर आते हैं। सर्दी से कमाई टी. नूरपुर ने बताया कि उनके गर्म कपड़े दिल्ली और पंजाब से आते हैं। कई दुकानदार बैंक से ण लेकर स्टॉल सजाते हैं। विश्वसनीयता के आधार पर व्यापारी कपड़े भी उधार देते हैं। नवंबर से जनवरी तक नागपुर में रहते हैं। इस बीच व्यापारी अपनी उधार वसूली के लिए आते हैं। पिछले साल ठंड ज्यादा होने से कपड़े जल्दी बिक गये थे। इस साल ठंड कम होने से बिक्री सामान्य है। कई दुकानदारों के पास ण चुकाने भर की पर्याप्त कमाई नहीं होने से परेशान हैं। जब सर्दी कम होती है, तो कमाई कम होती है।

... ताकि महंगी में हो सके गुजरा.

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पॅकेज लेने से पहले ही सरे लेने की बेताबी

Âñ·ð¤Á ƒææðá‡ææ âð ÂãUÜð ŸæðØ ÜðÙð ·¤è ÕðÌæÕè
â¢ÁØ SßðÎàæ,
Ùæ»ÂéÚU, ×ãUæÚUæCïþU çßÏæÙâÖæ ·ð¤ àæèÌ â˜æ ×ð´ ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU Ùð Sßè·¤æÚU ç·¤Øæ ãñU ç·¤ ¥æˆ×ãUˆØæ ·ð¤ ·¤æÚU‡æ Îðàæ-ÎéçÙØæ ×ð´ âéç¹Øæð´ ×¢ð ¥æ° ç·¤âæÙæð´ ·ð¤ çܰ ÂýÏæÙ×¢˜æè ·ð¤ ÚUæãUÌ Âñ·ð¤Á ×ð´ ·¤§ü ·¤ç×Øæ¢ ãñ¢UÐ §Ù ·¤çרæð´ ·ð¤ ·¤æÚU‡æ çÙØç×Ì ·¤Áü ÖÚUÙð ßæÜð Âæ¢¿ °·¤Ç¸U âð ¥çÏ·¤ Öêç× ßæÜð ç·¤âæÙæð´ ×ð´ ¥â¢Ìæðá ãñUÐ ÖÜð ãUè ÂýÏæÙ×¢˜æè âð ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU ·¤æð Âýæ# x ãUÁæÚU xw ·¤ÚUæðǸU ·ð¤ Âñ·ð¤Á ·¤æ âæÚUæ L¤ÂØæ ç·¤âæÙæð´ Ì·¤ ¥Öè ÙãUè´ Âãé¢U¿æ ãñ¢UÐ Üðç·¤Ù ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU §âð ¥Âæü# ×æÙ·¤ÚU °·¤ ¥æñÚU ÚUæãUÌ Âñ·ð¤Á ÎðÙð ·¤è ÌñØæÚUè ×ð´ ãñUÐ ·¤ãUæ Áæ ÚUãUæ ãñU ç·¤ ÙØð ÚUæãUÌ Âñ·ð¤Á ×ð´ ç·¤âæÙæð´ ÜæÖ ÎðÙð ·ð¤ çܰ } Ÿæð‡æè ÕÙæ§ü »§ü ãñUÐ §â×¢ð v~~v âð ÂãUÜð x Üæ¹ zz ãUÁæÚU ·¤ÁüÎæÚU Öè ãñ¢Ð çÁÙ ÂÚU v ãUÁæÚU x® ·¤ÚUæðǸU L¤ÂØð ·¤æ Õ·¤æØæ ãñUÐ §â·ð¤ ¥Üæßæ çÙØç×Ì ·¤Áü ÜðÙð ßæÜð w{ Üæ¹ ç·¤âæÙ ãñ¢UÐ »ýæ×è‡æ ·ð¤çÇUÅU â¢SÍæ¥æð´ ·¤æð Öè §â â×SØæ ·¤æð ãUÜ ·¤ÚUÙð ·ð¤ çܰ âÚU·¤æÚU âð v ãUÁæÚU ~v ·¤ÚUæðǸU L¤ÂØð ·¤è ÁM¤ÚUÌ ãñUÐ çßÏæÙâÖæ ×¢ð ç·¤âæÙ ¥æˆ×ãUˆØæ °ß¢ âê¹ð ç·¤ çSÍçÌ ÂÚU ãéU§ü Ü¢Õè ¿¿æü ×ð´ ç·¤âæÙæð´ ·¤è â×SØæ¥æð´ ·¤æ ÌêÜ çÎØæ »ØæÐ ×æ×Üð ·¤æð ÌêÜ ÎðÙð ·ð¤ ÕæÎ ãUè ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU Ùð âÎÙ ·¤æð ÁæÙ·¤æÚUè Îè ç·¤ ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU ·ð¤¢¼ý ·ð¤ ·¤Áü ×æÈ¤è ·ð¤ çܰ ߢç¿Ì yv Üæ¹ ~® ãUÁæÚU ç·¤âæÙæð´ ·¤æð ·¤Áü ×æÈ¤è ·¤æ °·¤ ¥æñÚU Âñ·ð¤Á ÎðÙð ·¤è ØæðÁÙæ ×ð´ ãñUÐ ÙØð Âñ·ð¤Á ·ð¤ çܰ ·é¤Ü vvwy ·¤ÚUæðǸU L¤ÂØð ·¤è ¥æßàØ·¤Ìæ ãñUÐ §â·ð¤ ¥çÌçÚU€Ì ßáæü ÙãUè´ ãUæðÙð âð ¥æñÚU çßçÖ‹Ù ÚUæð»æð´ ·ð¤ ·¤æÚU‡æ ÙCïU ãUé§ü ȤâÜ ·ð¤ çܰ ×饿ßÁæ ÎððÙð ·¤è Öè ƒææðá‡ææ ãUæðÙè ãñUÐ çßΏæü °ß¢ ×ÚUæÆUßæÇ¸Uæ ç⢿æ§ü ¥çÖØæÙ ·ð¤ ÁçÚU° ç⢿æ§ü âéçßÏæ ÕɸUæÙð ·¤è ÁM¤ÚUÌ ãñUÐ çSÍçÌØæ¢ ¿æãðU Áæð ãUæð, Îð¹Ùæ Øã ãñU ç·¤ âÎÙ ×ð´ ·ë¤çá×¢˜æè ÕæÕÜæâæãÕU ÍæðÚUæÌ, âãUæ·¤çÚUÌæ ×¢˜æè ãUáüßÏü ÂæçÅUÜ ¥æñÚU ÚUæÁSß ×¢˜æè ÇUæ. ÂÌ¢»ÚUæß ·¤Î× ØçÎ Âñ·ð¤Á ·¤è ƒææðá‡ææ ·¤ÚUÌð Öè ãñU Ìæð ©Uâð ¥×Ü ×ð´ ·¤Õ Ì·¤ ÜæÌð ãñ´UÐ ÂýÏæÙ×¢˜æè ·¤æ ÚUæãUÌ Âñ·ð¤Á ·¤æ ÕǸUæ çãUSâæ ¥Öè Ì·¤ ç·¤âæÙæ¢ð ·¤æð ÚUæãUÌ ÙãUè´ Âãé¢U¿æ ÂæØæ ãñUÐ Øæ çȤÚU ¥æÙð ßæÜð çÎÙæð´ ×ð´ ¿éÙæß ·ð¤ ×gðÙÁÚU Øð ßæðÅU ÜéÖæßÙè Âñ·ð¤Á ÕÙ ·¤ÚU ÚUãU Áæ°»æÐ Áæð ¿éÙæß ÕæÎ çȤÚU âð Æ¢UÇðU ÕSÌð ×ð´ ÂǸU Áæ° ¥æñÚU Âæ¢¿ âæÜ ÕæÎ ¥»Üæ ¿éÙæß ¥æÙð âð Âêßü ©Uâ·¤è âéÏ Üè Áæ°Ð
ßãUè´ ÎêâÚUè ¥æðÚU ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU ·¤è â¢ÖæçßÌ Âñ·ð¤Á ƒææðá‡ææ âð Âêßü ãUè çßçÖ‹Ù ÎÜæð´ ×ð´ §â ·¤æ ŸæðØ ÜðÙð ·¤è ãUæðǸU ¿æÜê ãæð »§ü ãñUÐ ™ææÌ ãUæð ç·¤ ÁÕ ÂýÏæÙ×¢˜æè Ùð ÚUæãUÌ Âñ·ð¤Á ƒææðçáÌ ç·¤Øæ Íæ ÌÕ ÚUæCïþUßæÎè ·¤æ¢»ýðâ ÂæÅUèü Ùð çßÎÖü ×ð´ ÚñUÜè ¥æØæðçÁÌ ·¤ÚU ŸæðØ ÜðÙð ·¤è ·¤æðçàæàæ ·¤èÐ çàæßâðÙæ ·ð¤ ©Ugß ÆUæ·¤ÚðU Ùð ç·¤âæÙ ΢ÇUè çÙ·¤æÜ ÁÙÌæ ·¤æð ØãU ÕÌæÙð ·¤è ·¤æðçàæàæ ·¤è ç·¤ ·¤Áü×æÈ¤è ©UÙ·¤è ÂãUÜ âð ãéU§ü ãñUÐ §â ÂãUÜ ×ð´ ÖæÚUÌèØ ÁÙÌæ ÂæÅUèü Öè ÂèÀðU ÙãUè´ ÚUãUèÐ ÖæÁÂæ ¥ŠØÿæ ÚUæÁÙæÍ çâ¢ãU ·¤è Öè ÚñUÜè ¥æØæðçÁÌ ãUé§üÐ ×ÁðÎæÚU ÕæÌ ØãU ãñU ç·¤ ·¢ð¤¼ý ¥æñÚU ÚUæ…Ø ×ð´ âžææ ãUæðÙð ·ð¤ ÕæÎ Öè Âñ·ð¤Á ·¤æ ŸæðØ ÜðÙ𠷤梻ýðâ çÂÀUǸU »§üÐ çSÍÌ ØãU ãñU ç·¤ çßÎÖü ·¤è ÁÙÌæ ·ð¤ ·¤æ¢»ýðâ ·¤è âæ¹ ·¤æð »ãUÚUè ¿æðÅU Ü»è ãñUÐ ÂýÏæÙ×¢˜æè ¥æñÚU ·¤æ¢»ýðâ ¥ŠØÿæ âæðçÙØæ »æ¢Ïè ·¤æ ÁÕ ÚUæ…Ø ÎæñÚUæ ãéU¥æ Ìæð ÚUæ…Ø ·ð¤ ÙðÌæ ©Uٷ𤠥æ»ð ÂèÀ¸ðU ƒæé×Ìð ÚUãðUÐ Õè¿ ×ð´ ÂæÅUèü ·ð¤ ÚUæ…Ø ¥ŠØÿæ ÂÎ ·¤æð Üð·¤ÚU ·¤æÈ¤è »éÅUÕæÁè ¿ÜèÐ ¥æ¢ÌçÚU·¤ ·¤ÜãU ×ð´ ãUè ·¤æ¢»ýðâ ·ð¤ ÙðÌæ È¢¤âð ÚUãðU ¥æñÚU ßãUè´ ÎêâÚðU ÎÜ Âñ·ð¤Á çÎÜæÙ ·¤è ¥ÂÙè ⢃æáü ·¤è »æÍæ Üð·¤ÚU ÁÙÌæ ·ð¤ Õè¿ Âãé¢U¿ »°Ð ¥Õ çßÂÿæè çÕÁÜè ·¤ÅUæñÌè ·¤æð ×遨 ×égæ ÕÙæ ·¤ÚU ©UÀUæÜ ÚUãðU ãñ´UÐ ·¤æ¢»ýðâ ¥æ¢ÌçÚU·¤ ·¤ÜãU ×ð´ ãUè »é×âé× çι ÚUãUè ãñUÐ ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU ·ð¤ ÙØð ×éç¹Øæ Øàæß¢Ì ÚUæß ¿ÃãUæ‡æ ·ð¤ Âæâ ·ð¤ßÜ v® ׿ãU ·¤æ âר ãUñ, ÂÚU ßð ¿æãð´U Ìæð ÁÙÌæ ·ð¤ Õè¿ ¥ÂÙè ¥æñÚU ·¤æ¢»ýðâ ·¤è ©UÂçÜçŽÏØæð ·¤æð ÁÙÌæ Ì·¤ Âã¢éU¿æ·¤ÚU ·é¤ÀU ÜæÖ Âýæ# ·¤ÚU â·¤Ìð ãñ´UÐ
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गुरुवार, दिसंबर 18, 2008

जरा परिचारो की सुनिए

ÁÚUæ ÂçÚU¿ÚUæð´ ·¤è âéçÙØð...
w® L¤ÂØð ×ð´ } ƒæ¢ÅðU ·¤è Ç÷UØêÅUè? ãUæ¢ ÕæÕæ! ãUæ¢!
ÚUæ…Ø ·ð¤ âñ·¤Ç¸Uæð´ ç¿ç·¤ˆâ·¤æ ·ð´¤¼ýæð´ ×ð´ ÙâæðZ ·¤è âãUæØÌæ ·ð¤ çܰ ãUÁæÚUæð´ ÂçÚU¿ÚU ×çãUÜæ°¢ ·¤æØüÚUÌ ãñUÐ Øð Ù ·ð¤ßÜ ¥SÂÌæÜ ·¤è âæÈ¤-âȤæ§ü ·¤ÚUÌè ãñ´U, ÕçË·¤ ×ÚUèÁæð´ ·¤è Ìè׿ÚUÎæÚUè ·¤ÚUÙð ßæÜè ÙâæðZ ·¤æð âãUØæð» ·¤ÚUÌè ãñUÐ ¥æòÂÚðUàæÙ ×ð´ ©UÂØæð» ãUçÍØæÚæð´ ·¤æð ÏæðÙð âð Üð·¤ÚU ·¤¿Úæ ©UÆUæÙð Ì·¤ ·¤è çÁ×ðÎæÚUè §Ù ÂÚU ãñUÐ ·¤æ»Áæð´ ÂÚU §Ù·¤è âðßæ Ìæð ¥Ë·¤æÜèÙ ãñUÐ ÂÚU ãU·¤è·¤Ì ×ð´ Âê‡æü·¤æÜèÙ âðßæ ·ð¤ ÕÎÜð ×ãUÁ Õèâ L¤ÂØð ÂýçÌ çÎÙ ·¤è ÎÚU âð ׿ÙÎðØ ÂæÌè ãñ´UÐ
Ùæ»ÂéÚU âð â¢ÁØ SÃæÎðàæ
ÚUæ…Ø ·ð¤ çÁÜæ ÂçÚUáÎ ·ð¤ ⢿æçÜÌ ÂýæÍç×·¤ ç¿ç·¤ˆâæ ·ð´¤¼ý ß ©U·𴤼ýæð´ ×𢠷¤æØüÚUÌ ÂçÚU¿Ø âðßæ ·ð¤ °ßÁ ç×ÜÙð ßæÜè ׿ÙÎðØ ·ð¤ ÕÁæØ ßðÌÙ ×æ¢» ·¤ÚU ÚUãUè ãñ¢UÐ çÂÀUÜð çÎÙæð´ Ùæ»ÂéÚU ×ð´ çßÏæÙâÖæ àæèÌ â˜æ ·ð¤ ÎæñÚUæÙ ÚUæ…Ø ·ð¤ âæÌ çÁÜæð´ ·ð¤ ÂçÚU¿ÚU ⢻ÆUÙæð´ ·¤è ·¤ÚUèÕ ¿æÚU âæñ ×çãUÜæ ·¤æØü·¤Ìæü¥æð´ Ùð §â·ð¤ çܰ ÂÚU ÏÚUÙæ-ÂýÎàæüÙ ç·¤ØæÐ ãUÚU ÕæÚU ·¤è ÌÚUãU §‹ãð´U ÁÙÂýçÌçÙçÏØæð´ âð ¥æàßæâÙ ·¤è âæãUÙéÖêç× ·ð¤ çâßæ° ·é¤ÀU ÙãUè´ ç×ÜæÐ ×ã¢U»æ§ü ·ð¤ Á׿Ùð ×ð´ ×ãUÁ {®® L¤ÂØð ÂýçÌ׿ãU ·ð¤ ׿ÙÎðØ ÂÚU Âê‡æü·¤æÜèÙ âðßæ°¢ ÎðÙæ ׿×êÜè ÕæÌ ÙãUè´ ãñUÐ »ýæ×è‡æ ÿæð˜ææð´ ×¢ð ãUÚU çSÍÌ ãUÚU °·¤ ÂýæÍç×·¤ ©U¿æÚU ·ð´¤¼ý ·ð¤ ÂèÀðU Âæ¢¿ âð ÀUãU »æ¢ß çÙÖüÚU ãñ´UÐ ·¤§ü ׿×Üæð´ ×ð´ ÎêÚU çSÍÌ »æ¢ßæð´ ×¢ð ÁÕ ç¿ç·¤ˆâ·¤ç×üØæð´ ·ð¤ âæÍ ÎêÚU-ÎÚUæÁ ·ð¤ »æ¢ßæð´ ×ð´ ÁæÙæ ÂǸUÌæ ãñU, ÌÕ ·¤æð§ü ¥çÌçÚU€Ì Öžææ Ùãè´ ç×ÜÌæ ãñUÐ âÚU·¤æÚU Ùð ÁÙÌæ ·ð¤ SÃææS‰Ø âðßæ¥æð´ ·¤æð ŠØæÙ ×ð¢ ÚU¹·¤ÚU ·¤§ü ÌÚUãU ·¤è ØæðÁÙæ°¢ Üæ»ê ·¤è ãñUÐ §â·ð¤ ÌãUÌ ÎðÚU ÚUæÌ Ì·¤ ×ÚUèÁ ç¿ç·¤ˆâæ ·ð´¤¼ý ×ðð´ ¥æÌð ÚUãUÌð ãñ´UÐ ÎêÚU-ÎÚUæÁ ·ð¤ »æ¢ßæð´ ×¢ð çßçÖ‹Ù SßæSÍ ØæðÁÙæ¥æð´ ·ð¤ ÌãUÌ ÁæÙð ÂÚU ç·¤âè ÌÚUãU ·¤è æžææ æè ÙãUè´ ç×ÜÌæÐ
×ãUæÚUæDïU ÚUæ…Ø ÂçÚU¿ÚU ⢻ÆUÙ ·¤è âç¿ß ·¤æ¢ÌæÕæ§ü »æðçߢÎÚUæß ׿Ùð ·¤ãUÌè ãñ´U ç·¤ ·¤æ»Áæð´ ÂÚU ¥æÁ Öè ©UÙ·¤è âðßæ ÂæÅUü-ÅUæ§× ãñ´UÐ ÂÚU ãU·¤è·¤Ì ×ð´ ÙâæðZ ·ð¤ âæÍ ç¿ç·¤ˆâ·¤æ ·ð´¤¼ýæð´ ×ð´ ©UÙ·¤è âðßæ ãUÚU çÎÙ ¥æÆU ƒæ¢ÅðU âð ·¤× ÙãUè´ ãUæðÌè ãñUÐ ¥æòÂÚðUàæÙ ·ð¤ ÕæÎ ·¤è »¢Î»è ·¤æð Îð¹·¤ÚU ãUÚU ç·¤âè ·¤æð çƒæÙ ¥æ â·¤Ìè ãñUÐ §â ÌÚUãU ·¤è Ì×æ× »¢Î»è ·¤è âæÈ¤-âȤæ§ü âð Üð·¤ÚU ÙâæðZ ·ð¤ ÎêâÚðU âãUØæð» ×ð´ ·ð¤ ÕÎÜð Ù ·¤æð§ü â×æÙ ç×ÜÌæ ãñU ¥æñÚU Ù ãUè ç·¤âè àææâ·¤èØ ·¤×ü¿æÚUè ·¤æ ÎÁæüÐ §â ·¤æØü ·ð¤ ÕÎÜð Õâ ·¤× ÉUæ§ü ãUÁæÚU L¤ÂØð ÂýçÌ׿ãU ßðÌÙ ·¤è ׿¢» ãñUÐ ·¤ãUÌè ãñ âÚU·¤æÚU âæð ÚUãUè ãñUÐ ãU׿ÚUæ ÎÎü ©Uâ Ì·¤ ÙãUè´ Âãé¢U¿ ÚUãUæ ãñUÐ ÁãUæ¢ ·¤ãUè´ ÎÎü ·¤ãUæð ¥æàßæâÙ ·¤è âãUæÙéÖêçÌ ç×ÜÌè ãñUÐ §ÌÙæ ãUè ÙãUè´ °·¤ Îàæ·¤ â𠪤ÂÚU ·¤è âðßæ ¥ßçÏ ÂêÚUè ãUæðÙð ·ð¤ ÕæÎ Öè Ù ·¤æð§ü Âý׿ðàæÙ ç×Üæ ¥æñÚU Ù ãUè ·¤æð§ü â¢ÌæðáÁÙ·¤ ׿ÙÎðØßëçh ãéU§üÐ ·¤ãUÌè ãñ´U ç·¤ ×ã¢U»æ§ü ·ð¤ §â Á׿Ùð ×ð´ ×ãUÁ Õèâ L¤ÂØð ÂýçÌçÎÙ ·¤è ÎÚU âð Âê‡æü·¤æÜèÙ âðßæ°¢ ¥æÁ ç·¤â Âðàæð ×ð´ ãUæðÌè ãñUÐ v~}® Ì·¤ ·ð¤ ÂçÚU¿ÚUæð´ ·¤æð ÚUæ…Ø âÚU·¤æÚU Ùð Âê‡æü ·¤æÜèÙ âðßæ ·¤æ ÎÁæü çÎØæ ãñUÐ âðßæ â׿# ãUæðÙð ·ð¤ ÕæÎ ©U‹ãð¢ ÂðàæÙ Öè ç×Ü ÚUãè ãñUÐ v~}® ·ð¤ ÕæÎ Öè ãUÁæÚUæð´ ÂçÚU¿ÚUæð´ ·¤è çÙØéç€Ì ãéU§ü, Áæð ¥æÌ ·¤ Âê‡æü·¤æÜèÙ âðßæ ·ð¤ çܰ ¥æÁ Ì·¤ ÌÚUâ ÚUãUè ãñU¢Ð ·¤æðËãUæÂéÚU ·¤è âéá׿ ÇUæÅðU ·¤æ ·¤ãUÙæ ãñU ç·¤ ÁÕ v~~{ ×ð´ ßð ÂçÚU¿ÚU ·ð¤ M¤Â ×ð¢ Ü»è ÌÕ Îæð âæñ L¤ÂØð ç×ÜÌð ÍðÐ ¥æÁ {®® L¤ÂØð ÂýçÌ׿ãU ·ð¤ ׿ÙÎðØ ç×Ü ÚUãUæ ãñUÐ ×ã¢U»æ§ü ·ð¤ ·¤æÚU‡æ §ÌÙè ÚUæçàæ ×ð´ »éÁæÚUæ ×éçà·¤Ü âð ãUæð ÚUãUæ ãñUÐ ·¤× Úæçàæ ·ð¤ ¥Üæßæ ãU×ðàææ ÙâæðZ ·ð¤ ÌæÙð âéÙÙð ÂǸUÌð ãñ´UÐ ·¤Öè ÀéUÅUï÷ÅUè ÙãUè´ ÎðÌèÐ ¥·¤æðÜæ çÁÜð ·¤è ×¢ÁéÜæ Õæ¢»ÚU ·¤æ ·¤ãUÙæ ãñU ç·¤ ÁÕ æè ·¤ãUè ÏÚUÙæ ×ð´ ÁæÌè ãñ´U, ·ð¤ßÜ ¥æàßæâÙ ãUè ç×ÜÌæ ãñUÐ ¥æñÚ¢U»æÕæÎ ·¤è »¢»ê ÇUæ·¤æðÚU·¤ÚU Ùð ÕÌæØæ ç·¤ Âñâð ·¤è ·¤×è ·ð¤ ·¤æÚU‡æ ÎêÚU-ÎÚUæÁ çSÍÌ ¥çÏ·¤æçÚUØæð´ ·ð¤ ΍ÌÚU Øæ â¢Õ¢çÏÌ ×¢˜æè ·ð¤ ·¤æØüÜØ ×ð´ ÙãUè´ Áæ ÂæÌð ãñ´UÐ Îæð-Ìè٠⢻ÆUÙ ·ð¤ â×êãU ×ð´ ×é¢Õ§ü ¥æñÚU çÎËÜè Ì·¤ Áæ·¤ÚU ÏÚUÙæ ÂýÎàæüÙ ×ð´ çãUSâæ çÜØæ Üðç·¤Ù ¥æàßæâÙ ·ð¤ çâßæ ·é¤ÀU Ùãè´ ç×ÜæÐ ·¤æàæ, ãU×ð´ Âý׿ðàæÙ ãUæð Ìæð ÕéɸUæÂð ×ð´ Âð´àæÙ ·¤æ âãUæÚUæ ç×Ü Áæ°Ð
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18/12/2008

मंगलवार, दिसंबर 16, 2008

जंगल बचने में जुटी ह अं तीन हज़ार महिलाये.

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सोमवार, दिसंबर 15, 2008

कहा जाएगा मानसून का पानी

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कम के लिए लड़के चाहिए.

बुद्धरक्षित को "कामगार मुले पाहिजेे"
पढ़ाई पूरी करने के शर्त पर ब"ाों को रोजगार देते हैं
संजय कुमार
नागपुर. नगर के विभिन्न चौक-चौराहों पर गुजरते वक्त दीवारों पर कामगार मुले पाहिजे का इश्तहार नजर आता है। पढ़़ते समय शायद ही कभी इसके सामाजिक उद्देश्य के बारे में कोई सोचता हो? आमतौर पर पढ़ कर लोग यही समझते हैं कि इस माध्यम से ब"ाों को काम दिया जाता है लेकिन स"ााई कुछ और है। इश्तहार देने वाले सुजाता नगर के बुद्धरक्षित बन्सोड पढऩे-लिखने की उम्र में मजदूरी करने वाले ब"ाों के लिए रोजगार के साथ-साथ शिक्षा की राह आसान करने का बीड़ा उठाये हुए हैं। गत एक वर्ष से वे अब तक दर्जनों ब"ाों को शिक्षा की राह दिखा चुके हैं।
यहां बाल मजदूरी नहीं होती
श्री बन्सोड का कहना है कि हर दिन उनके पास पांच-छह ब"ाों के फोन आते हैं। फोन करने वाले ब"ो को वे घर बुलाते हैं। उनकी हर स्थिति अच्छी तरह से समझते हैं। यदि ब"ो की उम्र 14 साल से ऊपर होती है, तो उसे इस शर्त पर कार आदि की साफ-सफाई का काम देते हैं कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करेगा। यदि लड़के की उम्र 14 साल से कम होती है, तो उसे समझाते हैं और उसे नगर के नि:शुल्क छात्रावास में दाखिला दिलाते हैं। इसके लिए कुछ आर्थिक सहयोग भी देते हैं। स्वयं ट्यूशन पढ़ाते हैं। यदि किसी कारणवश उस समय छात्रावास में दाखिले का समय निकल चुका होता है, तो उसके माता-पिता से मिल कर इस बात के लिए सहमत करते हैं कि ब"ो को पढ़ायें और निश्चित समय पर छात्रावास में दाखिला दिलायें, जहां उन्हें नि:शुल्क शिक्षा मिलेगी।
स्टेशन पर खोजते हैं भागे हुए ब"ो
वे रोज सुबह 4 बजे स्टेशन पर बाहर से भाग कर आने वाले ब"ाों की तलाश में जाते हैं। यदि किसी दिन ऐसा लड़का मिल जाता है, तो उससे बातचीत कर दोस्ती करते हैं। उसे काम के साथ-साथ पढ़ाई कराने के लिए सहमत कर अपने घर लाते हैं। फिर उसके साथ घर जाकर ब"ो के माता-पिता से मिलते हैं और उन्हें काम कराने के बजाये पढ़ाने के लिए सहमत करते हैं।
कहां से मिली प्रेरणा?
बुद्धरक्षित 12 भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं। उम्र 32 साल की है। बचपन में हीे गंदे नाले और गलियों में प्लास्टिक और हड्डियां चुनते थे। उसे बेचने से जो पैसा मिलता था, उससे पेट भरते। एक बार घर से भाग कर मुंबई गए तो वहां गलत लोगों के चंगुल में फंस गए। लेकिन मां की याद ने वापस नागपुर आने के लिए विवश कर दिया। नागपुर वापस आए तो "बहुजय हिताय संस्था" से संपर्क हुआ। यहां से मजदूरी के साथ-साथ पढ़ाई की प्रेरणा मिली। स्नातक पूरी करने के बाद समाज सेवा में स्नातकोत्तर किया। फिलहाल डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं।
जेल में बंद मासूमों को देनी है नई जिंदगी
कानून की पढ़ाई करने का मकसद उन ब"ाों को एक नई जिंदगी देना है जो बचपन में छोटे-मोटे अपराध के कारण जेल में हैं। भागे हुए ब"ाों को पढ़ाने के उद्देश्य से कई लोग आर्थिक मदद देते हैं। 14 साल से अधिक उम्र के जो ब"ो हमारी टीम में होते हैं। वे पढ़ाई के साथ-साथ सप्ताह में एक या दो बार कार धोते हैं। इसके एवज में उन्हें 1000-1200 रुपया मासिक पारिश्रमिक मिल जाता है।
क्या कहते हैं लोग?
लीक से हटकर काम करने वाले दूसरे लोगों की तरह श्री बन्सोड को भी लोग पागल समझते हैं। घर वालों के विरोध के चलते दत्ता मेघे कॉलेज के समीप आनंद अत्रे ले-आऊट में अलग किराये के एक कमरे में रहते हैं। यहां लकड़ी जलाकर भोजन बनाते हैं। जब वे गंदी बस्तियों में ब"ाों के माता-पिता को पढ़ाने के लिए समझाने जाते हैं, तो लोग हंसते हैं। लेकिन बुद्धरक्षित को इन सबकी चिंता नहीं। उनका काम तो बस अपने काम में लगे रहना है।

जंगल बचने में जुटी mahilaye

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