रविवार, जनवरी 03, 2010

पृथक विदर्भ के लिए त्याग सकते हैं पद


संजय स्व्देश
नागपुर।
यदि पृथक विदर्भ की के लिए जरूरत पड़ी तो पद का त्याग भी किया जा सकता है। यह कहना है कि राज्य के दुग्ध व पशुपालन विकास मंत्री डा. नितिन राऊत का। वे पृथक विदर्भ की मांग को लेकर रविवार को सांसद व पूर्व मंत्री विलासराव मुत्तेमवार के नेतृत्व में सीताबड़ी चौक स्थित गांधी पुतले पर धरना आंदोलन को संबोधित कर रहे थे। डॉ. राऊत ने कहा कि विदर्भ बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडर की कर्मभूमी है। पृथक विदर्भ की मांग आज समय की जरूरत है। यदि इसके लिए राजय मंत्रीमंडल से अपना पद त्याग करने की जरूरत पड़ी तो भी इसकी कुर्बानी देंगे।
सांसद मुत्तेमवार ने कहा कि विदर्भ की मांग वर्षो से हो रही है, जो आज तक स्वीकार नहीं की जा सकी है। स्वतंत्र तेलंगाना राज्य से कहीं अधिक पुरानी विदर्भ की मंाग है। उन्होंने कहा कि फजल अली कमिशन ने विदर्भ राज्य का प्रस्ताव दिया था। जबकि छत्तीसगढ़, उत्ताराखंड और झारखंड के प्रस्ताव को नकार दिया था। सांसद मुत्तेमवार ने कहा कि अखंड विदर्भ महाराष्ट्र में 50 वर्ष के बाद भी विदर्भवासियों को विकास से वंचित रहना पड़ा है। उन्होंने केवल आश्वासन दिए हैं और विदर्भ बदहाली का शिकार होता रहा है। विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। बिजली, पानी की समस्या के साथ अन्य बुनियादी समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। इसके अलावा अनेक समस्याओं के जाल में विदर्भ फंसा हुआ है।
पूर्व विदर्भवादी नेता जामुुंतराव धोटे ने अपने जोशीले अंदाज में कहा कि जो नेता विदर्भ का विरोध कर रहे हैं, वे लोग विदर्भ द्रोही है। उन्होंने इस आंदोलन को सबसे पुराना और सबसे बड़ा आंदोलन बताते हुए कहा कि अब यह आंदोलन और जोर पकड़ेगा। वक्ताओं ने अहिंसा पर जोर देते हुए कहा कि विदर्भ का आंदोलन हिंसात्मक नहीं होगा। इसीलिए आज धरने को महात्मागांधी के पुतले के पास किया गया। धरना पंडाल एवं सड़कों पर सैकड़ों लोग जमा थे। धरना आंदोलन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चला।
धरना आंदोलन में अनेक स्थानीय नेताओं ने हिस्सा लिया। इसमें विशेष रूप से विधायक एस.क्यू. जमा, शहर कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जय प्रकाश गुप्ता, विधायक दीनानाथ पडोल, पूर्व नगर अध्यक्ष हाजी शेख हुसैन, विदर्भ जनांदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी, निगम पार्षद कामिल अंसारी, जनता दल के नगर अध्यक्ष रवि पैगवार आदि भी मौजूद थे।

शनिवार, जनवरी 02, 2010

प्यार, कौमार्य और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

संजय स्वदेश
दुष्कर्म के एक मामले में उच्चतम न्यायलय का एक महत्पूर्ण निर्णय आया है। दुष्कर्म के आरोप में एक दोषी को यह कह कर निर्दोष करार दे दिया कि पीड़िता ने खुद कौमार्य खोया। खबर प्रकाशित हुई। नये साल के पहले दिन। अंदर के पेज में। छोटे से कॉलम में। नये साल के जश्न में डूब कुछ ही पाठकों का ध्यान इस खबर की ओर गई होगी।
खबर पर ध्यान इसलिए गया क्योंकि शीर्षक में कौमार्य शब्द जुड़ा था। सेक्स की दुनिया से संबंधित हर खबर पर चटकारे लेकर पढ़ा जाता है। कम लोग ही संवेदनशील होते है। जिन्होंने इस खबर को पढ़ी होगी, उन्हें यह जरूर सोचा होगा कि देश के उच्चतम न्यायलय भी कभी-कभी कैसी अनाप-शनाप शब्दों का उल्लेख कोई निर्णय देकर इतिहास बना देता है। फिर चाहे भविष्य में उस निर्णय का उल्लेख कर कितना भी गलत कार्य क्यों न हो।
उच्चतम न्यायल ने एक लड़की के साथ बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए जा चुके सुनील नाम के एक शख्त को यह कहते हुए बरी किया कि पीड़िता ने खुद उससे कौमार्य भंग कराया। दूसरे, पिता बेटी के नबालिग होने का प्रमाण नहीं दे पाये। मामला प्यार का था। इसलिए शारीरिक संबंध आपसी राजामंदी से बनी थी। सुनील के वकील ने अदालत को तर्क दिया था कि कौमार्य भंग करते वक्त लड़की ने विरोध नहीं किया था, इसलिए मामला बलात्कार कहा हुआ! यह तो सेक्स हुआ, आपसी राजमंदी का। देश में हर साल सैकड़ों ऐसे मामले दर्ज होते हैं, जब कोई व्यक्ति या युवा किसी लड़की को शादी के हसीन सपने दिखाकर प्यार के खुशनुमे अहसास से बासना की नदी में उतर जाता है। जब उत्साह ठंडा पड़ता है, तो प्यार का रंग फिका दिखने लगता है। प्रेमी प्रेमिका से कतराने लगता है। प्रेम में छली गई, एक बेटी, बहन रोने-कल्पने के बाद सब कुछ भुलाकर नये सिरेसे नई जिंदगी संवारने में जुट जाती है। कुछ खुदकुशी की राह चुनती है। पर नई जिदंगी की राह पर चलने वाली लड़की के दिल में छले जाने की टीस कायम रहती है। जो टिस बर्दास्त नहीं कर पाती हैं, पुलिस तक पहुंच जाती है। ऐसे लड़कियों की जगहंसाई नहीं होनी चाहिए। सम्मान के नजरिये से देखना चहिए। आखिर उसने हिम्मत ही तो की है। प्यार में छले जाने के खिलाफ। ठीक है कि उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते वक्त जोर-जबरजस्ती नहीं की गई होगी। पर उसे खुशनुमे एहसासों के साथ आबरू लुटाने के लिए मानसिक रूप से मजबूर तो किया ही जाता है।
प्रेम प्रसंगों में अंतिम लक्ष्य विवाह ही तो होता हैं। मानसिक रूप से आश्वत करके किसी मासूम की इज्जत से खिलवाड़ किस श्रेणी में रखी जाएगी। बाप बेटी को नबालिग साबित करने में नाकाम रहा। इसमें बेटी का क्या दोष। मान भी लेते हैं, लड़की नबालिग नहीं थी, पर उसकी आबरू से खिलवाड़ तो हुआ ही था। देश में ऐसे हजारों मामले हैं, जिसमें विवाह का झांसा देकर कोई न कोई मुंह काला करता है। हवस की आग बुझाकर लड़की को उसके हाल पर छोड़ देता है। समाज में कई मर्द ऐसे हैं जो अपनी मित्र मंडली में लड़की की रजामंदी से उसके साथ बनाये गए संबंधों के बाद उसे ठुकरा देने का संस्मरण सुनाते है। उच्चतम न्यायलय के ऐसे निर्णय ऐसी प्रवृत्ति के लोगों की मानसिकता को मजबूत करेगा। किसी न किसी तरह की झांस में फंस कर मानसिक रूप से किसी न किसी लाडली की आबरू से खिलवाड़ चलता रहेगा।
दुष्कर्म के मामले में वर्षों से यह मांग हो रही थी कि इसकी सुनवाई महिला जज करें। अब जाकर इसके लिए केंद्र सरकार ने मंजूरी दी है। कानून के नये संशोधन के जरिए धारा 376 की घाराओं में सभी अपराधों की सुनवाई महिला जज ही करेगी। गिरफतार व्यक्ति की चिकित्सा जांच तुरंत होगी। पीड़िता का बयान उसके घर जाकर माता-पिता अथवा किसी गेर सरकारी सामाजिक संस्था की मौजूदगी में महिला पुलिस उसके अधिकारी घर जाकर लेगी। सरकार की यह पहल स्वागत योग्य है। अभी तक ऐसे मामलों में कानूनी पेंच ऐसे हैं कि शारीरिक रूप से दुष्कर्म पीड़िता को थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने से लेकर अदालत के कटघरे में तरह-तरह के सवाल के वाण फेंके जाते हैं। या यूं कहें कि कोर्ट में जज के सामने फिर से बलात्कार होता हैं। यदि पीड़िता ने मानसिक रूप से इसे सहन करते हुए सवालों का जवाब दे दिया तो शायद दोषी पर आरोप सिदध हो जाए। पर कोर्ट में फिर से पीड़ित होने के डर के कारण अधिकतर मामले दब ही जाते है।
भ्रष्टाचार के अनेक प्रकरण आने के बाद भी देश में न्यायापालिका का सम्मान है। इसके बाद भी विवेक के तर्क की कसौटी पर उच्च और उच्चतम न्यायाल ने कई मामले में ऐसे निर्णय दिए है, जो आसानी से हजम नहीं हुए। अमूमन उच्चतम न्यायालय में मामला निचली अदालतों से होकर जाता है। उच्चतम न्यालय के जज भी नीचली अदालतों से तरक्की पाते हुए नियुक्ति पाते हैं। अनुभव का लंबा सफर साथ रहता है। इसके बाद भी ऐसे प्रकरण में निणर्य निश्चय ही न्यायमूर्ति की मानसिकता पर अंगुली उठाते है। दुष्कर्म के मामले जब भी मीडियां के सुर्खियों में आए, काफी हो हल्ला मचा। कई मामलों में फिल्में तक बन गईं। पर थोड़े दिन बाद लोग सब कुछ भूल जाते है। सुनवाई मंद रफतार से चलती रहती है। जब तक निर्णय आता है, घटना के बारे में लोगों को याद तक नहीं रहता है। इतनी लंबी अवधि तक याद रखना स्वाभाविक भी नहीं है। अदालत सुनाई की लंबी अवधि पर किसी की लगाम नहीं है। अब मीडियां को ऐसे मामलों के लिए लामबंद होकर हो-हल्ला करना चाहिए जिससे एक कोर्ट का निर्णय दूसरे कोर्ट में पलटने का खेल न खेला जाता है और पीड़ित न्याय के लिए तरसता रहता है।

बुधवार, दिसंबर 30, 2009

स्वतंत्र विदर्भ के लिए कांग्रेस में लॉबिंग हुई तेज

संजय स्वदेश
विलास मुत्तेमवार नागपुर। संसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री विलास मुत्तेमवार ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर स्वतंत्र पृथक विदर्भ राज्य के गठन में अपेक्षित सहयोग का अनुरोध किया है। पत्र में उन्होंने विदर्भ के मांगों का उल्लेख करते हुए बताया कि यह कितना पुराना है और विदर्भ की जनता के हित में स्वतंत्र विदर्भ राज्य के गठन कितना आवश्यक है।

श्री मुत्तेमवार ने सोनिया गांधी को लिखे पत्र में उन्हें सबसे पहले पृथक तेलंगाना राज्य के गठन में केंद्र सरकार की पहल के लिए बधाई देते हुए पृथक विदर्भ के मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित कराया है। पृथक विदर्भ का मुद्दा तेलंगाना राज्य की मांग से भी पूरानी है। पत्र में कही गई अपनी बातों को समर्थन में श्री मुत्तेमवार ने कई पुरानी बातों का हवाला देकर यह स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार के अलावा कांग्रेस की ओर से गठित कई आयोग और समितियों ने पृथक विदर्भ पर अपनी सहमति दी है। आजादी से पूर्व 1888 में अंग्रेसी प्रशासकों ने ब्रिटिस आयुक्तालय में पृथक विदर्भ के लिए प्रस्ताव रखा था। इसके अलावा 1918 में संविधान समीक्षा समिति और डार कमेटी तथा जे.वी.पी. कमेटी ने पृथक विदर्भ पर अपनी सहमति दी थी।

आजादी के बाद 1955 में राज्य पुर्नगठन आयोग ने सरकार से कहा था कि स्वतंत्र विदर्भ से ही यहां की जनता को लाभ मिलेगा। इसके बाद 1960 में विदर्भ के नेताओं को राष्ट्रीय नेताओं ने स्वतंत्र विदर्भ राज्य की गठन का आश्वासन दिया। 1988 में युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह महसूस किया कि विदर्भ के साथ अन्याय हो रहा है, इसके लिए उन्होंने पी. संगमा को इस पर विस्तृत जानकारी देने की जिम्मेदारी सौंपी थी। श्री संगमा ने भी पृथक विदर्भ के लिए अपनी सहमति सरकार को दी। 1996 में राष्ट्रीय नेता अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, श्रीमती मीरा कुमार, के. करूणाकरण, स्व.राजेश पायलट, बलराम जाखड़, मुकुल वासनिक, वसंत साठे, एनकेपी साल्वे, स्व. सुधाकर नाईक समेत कई राष्ट्रीय और स्थानीय नेताओं का प्रतिनिधि मंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौडा से मुलाकात कर स्वतंत्र विदर्भ राज्य के गठन की मांग की। वर्ष, 2000 में जिन तीन नये राज्यों का गठन हुआ। उनका प्रस्ताव 1955 में गठीत राज्य पुर्नगठन आयोग ने नहीं दिया था।

श्री मुत्तेमवार ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को यह याद दिलाया है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, संसद और विधायक कई मौके पर आपसे मुलाकात कर पृथक विदर्भ के लिए आपके सहयोग की अपेक्षा जता चुके हैं। इसके लिए आपने पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी के नृतृत्व में स्वतंत्र विदर्भ और तेलंगाना राज्य के लिए पार्टी की एक कमेटी भी बनाई थी। लेकिन अब कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने पृथक तेलंगाना राज्य की पहल करते हुए विदर्भ की अनदेखी कर दिया।

गत पचास सालों में विदर्भ की जनता ने कांग्रेस के प्रति भरोसा जताया है, लेकिन गत दस सालों में इस क्षेत्र के करीब 7 हजार किसानों ने आत्महत्या की है। क्षेत्र के पांच जिले नक्सल समस्या से गंभीर रूप से प्रभावित हैं, बेरोजगारी की समस्या भी गंभीर है। लिहाजा, विदर्भ की जनता इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि विदर्भ का आर्थिक व समाजिक विकास स्वतंत्र राज्य का दर्जा प्राप्त होने के बाद ही संभव हो पाएगा।

श्री मुत्तेमवार ने कहा कि कि विदर्भ के जनता तोड़-फोड़ वाली मानसिकता के नहीं है। यहां की जनता राष्ट्रपिता महात्मागांधी बिनानोबा भावे और डा. बाबा साहेब आंबेडकर की तरह हमेशा ही शांति और प्यार तथा अहिंसा के राह पर चलने में विश्वास करती हैं। मुझे डर है कि कही विदर्भ की जनता पृथक विदर्भ के लिए इस राह से भटक न जाए। मुझे लगता है कि वह समय आ गया है जब विदर्भ की जनता को सम्मानित करते हुए कांग्रेस नेतृत्व विदर्भ की जनता की भावनाओं को समझते हुए उसके साथ आए।

महात्मा गांधी के नाम पर

अनिल
विश्वविद्यालय प्रशासन के विरोध में मुंडन करवाते दलित छात्र वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय में एक ओर आज जहां ’स्थापना दिवस’ मनाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर दलित विद्यार्थी पढ़ाई लिखाई पर अपने अधिकार को हासिल करने के लिए अनशन पर बैठे हैं। इन विद्यार्थियों ने इस दिन को ’शोक दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया है।
पिछले नौ दिसंबर को दीक्षांत समारोह के बहिष्कार से लेकर आज यह दूसरा बड़ा आयोजन हुआ, विद्यार्थियों द्वारा जिसके सामूहिक बहिष्कार की घोषणा की जा रही है। ऐसे वक्त में यहां इस पूरे आयोजन और इस ’स्थापना दिवस’ की ऐतिहासिकता पर एक नज़र डालना तर्कसंगत होगा। तीन साल पहले, 29 दिसंबर 2006 को तत्कालीन कुलपति जी गोपीनाथन के कार्यकाल में अकादमिक धांधलियों के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन में लगभग चालीस छात्र-छात्राओं को जेल भेज दिया गया था। तत्कालीन प्रशासन की निरंकुशता और बेशर्मी का एक नमूना यह था कि स्थापना दिवस के उस आयोजन में मिठाइयां बांटते हुए आदोलनरत विद्यार्थियों के बारे में मंच से एक भद्दी टिप्पणी की गई थी जिसका आशय कुछ इस तरह था कि कुछ ’सनकी’ क़िस्म के लोग यह ’समारोह’ जेल में मना रहे होंगे। अब, मंच से ऐसी बातें नहीं होंगी। हो भी नहीं सकतीं। लेकिन विश्‍वविद्यालय के वातावरण में आज भी अन्याय और भेदभाव को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित करने वाली स्थितियां मौजूद हैं। समाज में सत्ताधारी सांस्कृतिक वर्चस्व को बनाए रखने वाली सभी ताक़तें एक भिन्न रूप और भिन्न तरीक़ों से सत्ता के पायदान पर आसीन हो गई हैं। उनमें से मात्र कुछेक ज़रूरी मसलों पर वर्तमान दलित छात्र-छात्राएं आंदोलनरत हैं, लेकिन वर्तमान प्रशासन नीतिगत स्तर पर इन सारे मुद्दों को ’नाजायज़’ और व्यक्‍तिगत स्तर पर अपनी ’प्रतिष्‍ठा’ का मुद्दा मान रहा है। उसने इन्हें नज़रअंदाज़ करने और इन मुद्दों को ’पचाने’ के नए और अपेक्षाकृत बेहतर तकनीकी ईजाद कर ली है। अब ’उपलब्धियों’ का बखान करने वाले अतिरंजित जनसंपर्क द्वारा लोगों को सरलता से मूर्ख बनाया जा सकता है। सांस्थानिक जनसंपर्क द्वारा सतही प्रचार करने के इस उपक्रम से वास्तविक मुद्दों को चट कर जाने में आसानी हो जाती है। स्थानीय स्तर पर पत्रकारिता के तिकड़मों के कारण ऐसे हवाई दावों को चुनौती मिलनी भी मुश्किल हो रही है। साथ ही स्थानीय जनमानस के बीच ऐसी छवि गढ़ने की कोशिश की जाती है जैसे कि विश्‍वविद्यालय कोई ’असामान्य’ तथा हर तरह के सवालों से परे रहने वाला संस्थान हो। अब सक्रिय तथा गतिशील हिंदी समाज तो यहां की स्थितियों पर कोई रोज़मर्रा की निगरानी रख नहीं रहा है कि उसे इन सेकंड हैंड तथा आत्ममुग्ध विवरणों को आलोचनात्मक ढंग से परखने का मौक़ा मिले।
वर्तमान कुलपति विभूति नारायण राय को विश्‍वविद्यालय में आए तेरह-चौदह महीने हो चुके हैं। उनके इस एक साल के कार्यकाल और कामों के बारे में अब कुछेक वस्तुपरक टिप्पणियां कदाचित की जा सकती हैं। दिलचस्प है कि इस दौरान विश्‍वविद्यालय के प्रति अवधारणा और विज़न के बारे में उनकी भाषा और शब्दावली में आश्‍चर्यजन ढंग से, ग़ौरतलब परिवर्तन आया है। कुलपति के रूप में अपने पहले वर्धा आगमन से लेकर अब तक उन्होंने हिंदी समाज और उसकी विसंगतियों, विश्‍वविद्यालय से समाज की अपेक्षाएं, प्रशासन के कामकाज आदि के बारे में कई बार बयान दिए हैं जो काफ़ी उलझाने वाले अंदाज़ (पोलेमिक स्टाइल) के जीते जागते नमूने हैं। यहां एक उदाहरण देना उचित होगा जिससे उनके अकादमिक विज़न के बारे में कुछ ठोस राय बनाई जा सकती है। इस स्थापना दिवस की पूर्वसंध्या पर उन्होंने कहा, “हिंदी को मात्र साहित्य या चिंतन की भाषा नहीं बनानी है, इसे वैश्‍विक स्तर पर एक भाषिक राजदूत की भूमिका निभानी है।” ज़ाहिर है, ऐसा उन्होंने हिंदी विश्‍वविद्यालय की भूमिका के संदर्भ में कहा है। साल भर पहले, कुलपति का कार्यभार ग्रहण करते वक़्त उन्होंने कबीर को याद करते हुए कहा था कि हिंदी विश्‍वविद्यालय को हिंदी समाज में नवजागरण के अग्रदूत की भूमिका निभानी होगी। यहां हिंदी भाषी समाज में हिंदी के प्रगतिशील चिंतन पक्ष के प्रति एक ज़ोर था। लेकिन साल भर में शब्दावली ख़ामोश तरीक़े से बदल गई। और अब कई पदासीन लोगों को ऐसे प्रसंगों को याद करना बाल में खाल निकालने जैसा लगने लगता है।
यह एक सुपरिचित तथ्य है कि देश के भीतर हिंदी के प्रचारात्मक ’राजदूत’ की भूमिका के लिए कई हिंदी प्रचार समितियां सालों से चल रही हैं। इनके ज़िम्मे प्राथमिक काम हिंदी समाज के हिंदी के कर्मकांडी सांस्कृतिक वर्चस्व को स्थापित करते हुए उन्हें वैध ठहराने से लेकर, सड़े गले परंपरावादी विचारों के पुनरोत्पादन तक का है। एक पतित नौकरशाही मशीनरी ने इनका धंधा और आसान कर दिया है। अब हिंदी विश्‍वविद्यालय भी इस पटाखा तैयारी में व्यस्त है कि वह इसी लीक का अनुसरण करते हुए, विश्‍वविद्यालय की बौद्धिक सरगर्मीयुक्‍त ज़िम्मेदारी से अपने आप को घटाकर (रिड्यूज़ कर) अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर पर ऐसे ही प्रचारात्मक ’राजदूत’ की भूमिका का निर्वहन करेगा। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि भूतपूर्व दो कुलपतियों का कार्यकाल ऐसी ही समझदारियों से संचालित कार्यपद्धतियों की असफलता का दौर रहा है। इन्हीं विचारों की उपज में उस अकादमिक भ्रष्‍टाचार के उत्स हैं जिसने स्थितियों को और दयनीय बना दिया।
पिछले एक साल में, भवन आदि के निर्माण में अपेक्षाकृत तेज़ी आई है। ढांचागत निर्माण के जो काम पिछले कई सालों से प्रशासनिक इच्छा की कमी के कारण स्थगित पड़े रहे उनकी शुरुआत हो गई है। लेकिन अकादमिक तौर पर कोई भेदभावरहित व्यवस्था अब तक नहीं बन पाई है। न ही अकादमिक गुणवत्ता को बनाने का कोई पैमाना और आदर्श निर्मित किया गया है। इस बीच, कई बड़े, महत्त्वाकांक्षी जनसंपर्क समारोह आयोजित किए गए। इनमें हिंदी समाज के कई लेखक, कवि तथा आलोचकों ने अभिनंदनयुक्‍त भागीदारी की। आंशिक तौर पर लोगों की प्रदर्शनयुक्‍त भागीदारी सुनिश्‍चित हुई जिसके माध्यम से हिंदी के दूर-दूर तक पसरे साहित्यिक समाज को लुभावना संदेश दे दिया गया कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। और, भेदभाव के पुराने ढांचे क़ायम रहे। बस, औज़ार बदल गए। भाषा बदल गई, उसके स्वरूप में आंशिक हेरफेर किया गए लेकिन वर्चस्व के प्रतिमान नहीं बदले। अनुष्‍ठानिक गुणगान जारी रहे बस, उसकी पद्धतियां बदल गईं।
सत्ता के नीचे के पायदानों पर ऐसे कई लोग हैं जिनका व्यवहार प्रमाणिक रूप से जातिवादी हैं। जो अपने अधिष्‍ठाता, विभागाध्यक्ष या पदाधिकारी होने के रसूख का इस्तेमाल अपने भ्रष्‍ट आचरण को मूंदने-ढांपने के लिए करते हैं। साफ़ साफ़ असहमति व्यक्‍त करने वाले छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और ग़ैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करते हैं। अब बात बात पर भयाक्रांत करने वाली नौकरशाही घुड़कियों का एक ऐसा मज़बूत घेरा निर्मित हुआ है कि अधिकतर लोग चुपचाप प्रशासन से सुविधाजनक नज़दीकी बनाए रखने में ही अपनी भलाई समझने लगे हैं। आम छात्र-छात्राओं के बीच यह यह बात सौ फ़ीसदी प्रमाणित हो गई है कि विश्‍वविद्यालय में उन्हीं विद्यार्थियों को तरक़्क़ी या ’नियुक्‍ति’ मिलती है जो हां में हां मिलाते हुए ’फ़ील गुड’ मुद्रा में रहते हैं। अकादमिक कौंसिल में छात्र-छात्रा प्रतिनिधियों के नाम पर हुई हालिया नियुक्‍ति इसका सर्वाधिक ज्वलंत उदाहरण है जहां मनमाने ढंग से यह नियुक्‍तियां संपन्न कर ली गईं। सौ से अधिक छात्र छात्राओं के विरोध पत्र के बावजूद अब तक कोई उचित कारवाई नहीं की गई है। अंततः आंदोलन का रास्ता अख़्तियार करने वाले छात्र राहुल कांबले को अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। आज नागपुर तथा वर्धा के स्थानीय मीडिया में जो ख़बरें छपी हैं उनमें लफ़्फ़ाज़ियों तथा स्तुतिगान का एक नपा तुला मिश्रण मौजूद है।
यह एक दारूण दृश्‍य है कि आज जनसंपर्क के मुखौटे और पाखंड के घटाघोप के बीच अपनी न्यायपूर्ण मांगों के लिए विश्‍वविद्यालय में छात्र-छात्राओं का एक बड़ा समूह ’स्थापना दिवस’ को एक ’शोक दिवस’ के रूप में मना रहा है। तीन सौ नियमित विद्यार्थियों वाले हिंदी विश्‍वविद्यालय में कुछ छात्र पिछले बीस पच्चीस दिनों से भूखे बैठे हैं और ऐसे अनुष्‍ठान पूरे घमंड के साथ जारी हैं। ऐसे में तीन साल पुराने स्थापना दिवस समारोह की यादें ताज़ी हो जाना स्वाभाविक है, जब उस समय की संख्या के लिहाज़ से एक तिहाई छात्र-छात्राएं जेल में हों और अपनी क्रूरता को सामान्य बनाने (नॉर्मलाइज़ करने) के लिए विश्‍वविद्यालय प्रशासन मिठाइयां बांट रहा था। क्या अब हिंदी के सक्रिय और चिंतित बुद्धिजीवियों को यह सवाल नहीं करना चाहिए कि हिंदी के नाम पर आख़िर यह कैसा समाज रचने की बुनियाद निर्मित की जा रही है?
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मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

नदी को नाला कह जिम्मेदारियों से बच जाती हैं हर सरकार

नागपुर। मानव ने जल को जीविका का साधन मान लिया, इसी कारण उसके सामने जल का गंभीर संकट उत्पन्न हो रहा है। यदि जल को जीवन माना गया होता तो इसे पोषण मिलता है। अब जल संकट से निपटने के लिए जल साक्षरता चलाने की जरूरत है। यह कहना है प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह का। वे अमरावती रोड स्थित विनोबा भावे केंद्र में जल बिरादरी की आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे। श्री सिंह ने कहा कि नागपुर की नाग नदी पूरी तरह से नाला बन चुकी है।
राज्य के जिम्मेदार मंत्री भी इसे नदी कहने की भूल नहीं करते हैं। वे दृढ़ शब्दों में कहते हैं कि नाग नाला अब कभी नदी नहीं बन सकती है। उन्होंने कहा कि किसी भी नदी को नाला कह कर हर राज्य की सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बच जाती है। क्योंकि सरकार जानती है कि किसी भी नदी के जमीन को कानून नहीं बदल सकता है। उन्होंने कहा कि नदी संस्कृति का अंक है। जैसे ही संस्कृति पर संभ्यता हावी होती है, नदी नाला बन जाती है। नदी के नाला होने से सरकार समेत स्थानीय निकाय की जिम्मेदारियां कम हो जाती हैं। जो शहर अपने आप को विकसित कहते हैं, उनका पैमाना यह है वे अपने यहां के बहने वाली नदी को नाला बना लेते हैं। दिल्ली युमना नदी को नाला बना कर राजनीतिक राजनधानी होने का गर्व करती है। मुंबई की भी नदी है, पर आर्थिक राजधानी होने का गर्व है। इसी तरह बराणसी में नदी नाला बन रही है और शहर सांस्कृति राजधानी होने का गर्व कर रहा है। उन्होंने कहा कि वह नदी भाग्यशाली है जिसके नाले के बदलने स्वरूप को रोकने के लिए लोग संकल्प कर रहे हैं। आज भी देश में ईमानदार लोग सक्रिय है। ऐसी लोगों के संघर्ष का ही परिणाम है कि विदर्भ में अदानी परियोजना को रद्द करना पड़ा।
श्री सिंह ने कहा कि शहरों में गांव के लोग मजबूरी में पलायन कर रहे हैं। इसे रोकना बेहद जरूरी है। मजबूरी में शहर आए ग्रामीण बेवश होकर बदहाल जिंदगी जी रहा है। मजबूरी में कच्ची और मलीन बस्तियां बन रही हैं। ज्यादा कमाने के बाद भी वह खुश नहीं है। सरकार को इन ग्रामीणों की मजबूरी समझना चाहिए। उसे रोजगार के लिए गांव में ही विकल्प उपलब्ध कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस समय हिंदुस्तान में संस्कृति ओर संभ्यता का संघर्ष हो रहा है। शहरों में सभ्यता हावी है। यह गांवों में भी प्रसारित हो रही है। संस्कृति पंचतत्वों से बनी है। इसलिए संस्कृति में आत्मा है। संभ्यता की प्रवृति ठीक नहीं है। यह शोषण से विकसित हुआ है। इसमें कोई आत्मा नहीं है। इसलिए संस्कृति और संभ्यता के अंतर को समझना बेहद जरूरी है। श्रोताओं से बातचीत के दौरान राजेन्द्र सिंह ने कहा कि आकर््िटेक इंजीनियरों को जन संरक्ष्ण के लिए आगे आना चाहिए। हर नये बनने वाले मकान व भवन में प्रकृति जल के संरक्षण के उपाय करना चाहिए। मनपा के आयुक्त असीम गुप्त कार्यशाला का उद्घाटन करने वाले थे। लेकिन वे उपस्थित नहीं हो सके। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पर्यावरण विशेषज्ञ रमेश लाडखेडकर ने किया। प्रस्ताविक भाषण जल बिरादरी के विदर्भ समन्वयक श्याम पांढरी पांडे ने दिया। जल बिरादरी के नागपुर समन्वयक स्वानंद सोनी ने अतिथियों का स्वागत किया।
भारत को बार्बाद चीन का हाईड्रोजन परियोजना
एक सवाल के जवाब में राजेंद्र सिंह ने बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी के उपर चीन अपनी सीमा में चांग नदी के पानी से हाइड्रोजन बम बनाने की परियोजना शुरू करने वाला है। अभी परियोजना आरंभिक चरण में है। अभी वहां डैम बनाने के लिए स्थानीय निवासियों को हटाया गया है। भारत सरकार इस परियोजन पर यह कहकर विरोध नहीं कर रही है कि परियोजना चीन अपनी सीमा के अंदर शुरू कर रहा है। जबकि हकीकत यह है कि इसका पूरा नुकसान केवल भारत का है। वह बाढ़ के जरिये भारत को परेशान कर सकता है। यह स्थिति वैसे ही है जैसे कोई अपने घर के दिवाल के पास कोई बम चलाने के लिए पलीते में आग लगा दिया हो। ऐसी स्थिति में यह कह कर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि यह काम घर की सीमा से बाहर हो रहा है।
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मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते


एम.ए रफी
नागपुर।
नागपुर में विधान सभा का शीतसत्र समाप्त हो गया। विधानभवन परिसर में प्रसिद्ध सूफी संत सैय्यद जलालुद्दीन बाबा का दरबार मौजूद है। वर्षों पुरानी यह मजार 'मीठा नीम दरबारÓ कहलाती है। इसी मज़ार के ठीक सामने कुछ लोग खुली सड़क पर आसमान के नीचे न केवल दिन गुजार रहे हैं बल्कि, वे रातें भी यही गुजारते हैं। इनका जीवन मस्ती में गुजर रहा है, लेकिन क्या वे लोग सही मायने में सुखी हंै?
रुखी-सुखी बासी कुछ भी मिल गया तो खा लिया। नहीं मिला तो राम-रहीम का नाम लेकर घुटने से पौरों को दबा कर सोने लगे। भूख जब तक सही जा सकी, नींद आती रही। नहीं तो उठ कर बैठ गए। घुटनों को सुकेड़ कर पेट दबाये आसमान को निहारते-निहारते रात गुजार दी। विधानसभा को शीतसत्र के दौरान भी ये लोग बाबा के दरबार के पास थे। सरकारी महकमे की चमचमाती लाल, पिली बत्तियों में चलने वाले सरकार और अधिकारियों की शायद ही इधर नजर पड़ी होगी। यहां से गुजरने वाले शायद ही कभी सोचते होंगे कि यहां कोई बंदा बिना चादर संतरानगरी की शबनमी ठंड में रात गुजारता होगा। मजार में चादर चढ़ाने के बजाय एक चादर यहां भी चढ़ा लिया जाए। जब संवाददाता ने इन लोगों से पूछा कि यहां आप लोग सरकार से क्या चाहते हैं, तो उन्होंने उलटे सवाल दाग दिया। कौन सरकार, कैसी सरकार? यहां तो हमे कोई सरकार नजर नहीं आती। गरीब, बेसहारों की यह कहानी यही खत्म नहीं होती। शहर की अधिकांश दरगाहों, मंदिरों के सामने, रेल्वे स्टेशन के करीब, चौराहों और फुटपाथों पर यह नजारा दिखाई दे रहा है। कोई एक चादर में 10 डिगी तक तापमान का ठंड गुजार रहा है, तो कोई बोरा ओठकर चैन की निंद में डूबा है। ऐसे जगहों पर कुछ लोग ऐसे भी नजर आते हैं जो एक अखबार बिछाकर रात गुजारते हैं। इस ठंड में ऐसी जगहों पर रात गुजारने वालों में अधिकतर मजदूर, भिखारी और कुछ अनाथ तथा बेसहारा शामिल होते हैं। ऐसे लोगों पर किसी शायद ने ठीक ही लिखा है:-
सो जाते है फुटपाथ पर अखबार बिछा कर, मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।

संरक्षण अधिकारी की बाट जोहता घरेलू हिंसा सुरक्षा कानून


संजय स्वदेश
नागपुर।
महिलाओं के लिए घरेलू हिंसा संरक्षण कानून के लागू हुए तीन साल से भी ज्यादा का समय हो गया। पर अनेक राजयों में अभी तक संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की। इसकी अतिरिक्त जिम्मेदारी राज्य में महिला बाल कल्याण अधिकारी व समाज कल्याण अधिकारियों को दी गई है। घर के भीतर अपनों से हिंसा झेल रही महिलाएं, तुरंत न्याय की उम्मीद से इस कानून के तहत मुक दमें दर्ज तो करा रही हैं, पर संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति नहीं होने से वे वकीलों का सहारा लेने को मजबूर हैं। कोर्ट में मामले लंबे खिंच रहे हैं। कानून का लाभ पहुंचाने के लिए सरकार ने अलग से संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति की बात कही थी, पर ऐसा हुआ नहीं।
पहले से काम के बोझ तले दबे महिला बाल-कल्याण विभाग या जिला समाज कल्याण अधिकारी घरेलू हिंसा संरक्षण के मामले में महत्वूपर्ण भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। कानून में साफ कहा गया है कि राज्य सरकार जनसंचार माध्यमों का सहारा लेकर महिलाओं को इस कानून के बारे में अधिक-से अधिक जागरूक करेंगी। वहीं जब महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकायत लेकर थाने पहुंचती है, तो तो पहले उन्हें परामर्श देकर मामले को सुलझाने की सलाह दी जाती है। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं ने नागपुर के प्रमुख थानों में महिला परामर्श केंद्र संचालित किए हैं, जहां थाने में आने वाले घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में संबंधित लोगों को परामर्श देकर समस्या का समाधान किया जाता है।
शहरी क्षेत्र में जिन थानों में ऐसे परामर्श केंद्र चल रहे हैं, वहां हर माह करीब 20-25 मामले आते हैं। यहां महिलाएं तब आती हैं जब घरेलू झगड़े में उन पर होने वाले अत्याचार बर्दास्त से बाहर हो जाता है। इन दिनों आने वाले अधिकतर मामले शराब पीकर पत्नी को पीटने के हैं। आश्चर्य की बात है कि उच्च शिक्षित और अच्छे घरों की महिलाएं ज्यादा प्रताडि़त हैं। ऐसे मामलों में थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने से पूर्व परामर्श की सुविधा है। लेकिन थाने के बाहर ऐसा कोई केंद्र नहीं होने से महिलाएं थाने में बेहिचक नहीं आ पाती हैं।
पढ़ी लिखी महिलाएं ज्यादा प्रताडि़त
समाज में यह धारणा है कि गरीब समुदाय के लोग अपनी पत्नियों को ज्यादा प्रताडि़त करते हैं, लेकिन आने वाले केसों की हकीकत यह है कि पढ़े-लिखे परिवारों में महिलाएं ज्यादा प्रताडि़त हो रही हैं। कई मामलों में यह होता है कि पति-पत्नी दोनों कामकाजी होते हैं, तो कोई किसी की नहीं सुनना चाहता है। पति की मानसिकता यह होती है कि पत्नी लोकलाज के कारण थाने नहीं पहुंचेगी, इसलिए वह जुल्म करने से नहीं डरते हैं। आजकल डॉक्टर, इंजीनियर जैसे दूसरे प्रतिष्ठिïत सेवाओं से जुड़े परिवारों की महिलाएं शिकायत लेकर थाने पहुंचने लगी हैं। संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति नहीं होने से गैर-सरकारी संस्थाओं की और से संचालित विभिन्न केंद्र में महिलाओं को रखने की व्यवस्था की गई है। लेकिन संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति नहीं होने से घरेलू हिंसा पीडि़तों के लिए स्वतंत्र पुर्नवसन केंद्र की भी व्यवस्था नहीं हो पाई है।
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वोट की कानूनी अनिवार्यता से दूर होगा राजनीति से थ्री-सी फैक्टर

संजय स्वदेश
नागपुर।
भाजपा विजन 2025 नाम से एक कार्ययोजना तैयार करने जा रही है जिसमें पार्टी की भविष्य की रुपरेखा और कार्यों का वर्णन होगा। इस पर कार्य चल रहा है। फरवरी में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद नये पदाधिकारियों की नियुक्ति होगी। फिर नये पदाधिकारियों की सहमति से विजन-2025 की नीति के अनुरूप कार्य किया जाएगा। यह कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी का। वे मंगलवार को धंतोली स्थित तिलक
पत्रकार भवन में मिट द प्रेस कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।
जनांदोलन की तैयारी
अपने विजन डाक्यूमेन्ट की झलक देते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि जहां एक ओर भाजपा की कोशिश होगी कि मुसलमानों के मन में भाजपा को लेकर जो भय है वह दूर किया जाए वहीं दूसरी ओर देश के निचले तबकों तक पहुंचने की कोशिश की जाएगी। नितिन गडकरी का कहना है कि भाजपा की कोशिश होगी कि देश के समस्त दलितों में कम से कम 10 प्रतिशत दलित भाजपा के समर्थक हों। सबसे पहले इस नीति पर निकट भविष्य में बिहार में होने वाले चुनाव के दौरान कार्य किया जाएगा। मंहगाई और सुरक्षा को मुद्दा बनाकर भाजपा एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करेगी। स्थानीय स्तर के मुद्दों को उठाने के लिए भी भाजपा कार्यकर्ता आंदोलन का सहारा लेगे। नितिन गडकरी ने संकेत दिया है कि अब पार्टी सड़क पर उतरकर लोगों की समस्याओं को उठायेगी। राष्ट्र की सर्वाधिक उन्नति कैसे हो, इस पर पार्टी प्रोफेशनल तरीके से कार्य करेगी।
राजनीति का थ्री-सी फैक्टर
श्री गडकरी ने कहा कि यदि मतदान को कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया जाए तो राजनीति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले थ्री-सी फैक्टर (क्राइम, कैश और कास्ट) का प्रभाव काफी कम हो सकता है। गुजरात में मतदान की कानूनी अनिवार्यता के लिए नरेन्द्र मोदी की पहल अच्छी है। यह कानून राष्ट्रीय स्तर पर बननी चाहिए। यह राष्ट्रीय हित में है। भाजपा शासित प्रदेशों में यह कानून बनाया जा सकता है, लेकिन ऐसा करने पर यह कह कर शोर माचाया जाएगा कि यह भाजपा का एजेंडा है। बेहतर होगा कि इसके लिए लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसकी पहल करे। संसद में इस कानून को रखे तो इसे भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह से समर्थन करेगी।
झारखंड में शिबू सोरेन के साथ गठबंधन की सरकार बनाने पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में श्री गडकरी ने कहा कि इसके लिए पार्टी में आम राय लेकर ही निर्णय लिया गया था। कुछ लोग इसके पक्ष में थे, कुछ लोग विपक्ष में बैठने की बात पर राजी थे। लेकिन राजनीति एक युद्ध है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति आती है। इन्हीं स्ििथतियों में हमें जनतहित में बेहतर मार्ग निकालना होगा।
मुस्लिमों को कांग्रेस ने क्या दिया
गडकरी ने कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि 62 साल के शासन में कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को क्या दिया। आज मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक लोग खोमचा लगाकर, ट्रक ड्राइवर, क्लीनर, फेरीवाले के रूप में अपना जीवन यापन कर रहे हैं। निरक्षरता आज भी है। भाजपा इस समुदाय के उन्नति के लिए पहल करेगी। इन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ेगी। वक्फ बोर्ड की जिन जमीनों ने राजनेताओं ने कब्जा कर लिया है, उसे वापस लेकर, वहां शैक्षणिक संस्थान बनाकर मुस्लिम समुदाय के लिए उन्नति की नई राह खोली जा सकती है।
स्वतंत्र विदर्भ के पक्ष में भाजपा
गडकरी ने एक सवाल के जवाब में कहा केंद्र सरकार तेलंगाना मुद्दे को आग देने का कार्य कर रही है। एनडीए के कार्यकाल में तीन पृथक राज्य- झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ असानी से बन गए थे। उन्होंने कहा कि पार्टी पृथक विदर्भ राज्य के पक्ष में है। इसके लिए पार्टी ने भुवनेश्वर में आयोजित एक बैठक में ही इसके इसे अपने एजेंडे में शामिल कर लिया था। अब केंद्र सरकार इसे संसद में रखे तो इसका भरपूर समर्थन किया जाएगा।

शनिवार, दिसंबर 26, 2009

सुधांशु महाराज के सहयोगियों की गुंडागर्दी



विश्व जागृति मिशन के खिलाफ थाने में मामला दर्ज
संजय स्वदेश
नागपुर।
आए दिन साधु संतों के कारनामों की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। पिछले दिनों संत आसाराम बापू पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज किया। अभी यह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि नागपुर के रेशिमबाग मैदान में चल रहे विश्व जागृति मिशन के आचार्य सुधांशु महाराज से जुड़ा मामला सुर्खियों में आया है। मिशन के खिलाफ तहसील थाने में मारपीट का मामला दर्ज हुआ है।
संत सुधांशु महाराज के खासमखास साथी रहे एम.पी. मानसिंगका ने उन पर गंभीर आरोपों लगाएं हैं। मानसिंगका ने 26 दिसंबर को 'दैनिक 1857Ó को दिए एक विज्ञापन के माध्यम से सुधांशु महाराज के विश्व जागृति मिशन पर गंभीर आरोप लगाए, जिसके प्रकाशित होते ही उनके भक्तों में खलबली मच गई। सुधांशु महाराज के साथ कई वर्ष बिताने वाले मानसिंगका ने सुधांशु महाराज से 22 सवाल पूछते हुए दावा किया है कि इनके सही उत्तर वे नहीं दे सकते हैं, क्योंकि सुधांशु महाराज दोषी है।
रेशिमबाग मैदान में चल रहे विराट सत्संग उत्सव में जब 'दैनिक 1857Ó को भक्तों ने पढ़ा तो खलबली बच गई। भक्तों के हाथों में 'दैनिक 1857Ó में प्रकाशित विज्ञापन को देखते ही सुधांशु महाराज के स्वयं सेवक आक्रोशित हो गए। उन्होंने खुलेआम गुंडों जैसा बर्ताव करते हुए अखबार की प्रतियों को जनता से छिनना शुरु किया। रेशिमबाग मैदान के बाहर खड़े अखबार बेचने वाले हॉकर्स धर्मदास केशव रंगारी (35), सचिन ज्ञानेश्वर वांढरे को सरेआम पीटना शुरू कर दिया। उनके मोबाइल फोन छिन लिये। अचानक हुई इस घटना से संत-संग परिसर का महौल गरमा गया। दोनों हॉकरों से मारपीट करते हुए पुलिस स्टेशन कोतवाली लाया गया। अखबार में प्रकाशित विज्ञापन से क्रोधित होकर विश्व जागृति मिशन के स्वयंसेवकों ने अपनी असभ्यता का परिचय देकर उन हॉकर्स को पीटा, जिनका इसमें कोई कुसूर नहीं है। पुलिस स्टेशन में विश्व जागृति मिशन के पदाधिकारियों द्वारा एम.पी. मानसिंगका समेत 'दैनिक 1857Ó बेचनेवाले दोनों हॉकरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई। जिसकी जांच की जा रही है। अन्यायग्रस्त दोनों हॉकरों ने भी सुधांशु महाराज के स्वयंसेवकों पर मारपीट, डराने, धमकाने के बारे में रिपोर्ट दर्ज करवाई है। जिसके तहत पुलिस ने धारा 323, 506 आयपीसी का मामला दर्ज कर लिया है।
एम.पी. मानसिंगका और सुधांशु महाराज की आपसी खटपट पुरानी है। दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ अनेक जगहों पर रिपोर्ट दर्ज करा रखी हैं। कुछ मामले तो कोर्ट में विचाराधीन बताये जा रहे हैं। एम.पी.मानसिंगका ने खुलेआम सुंधाशु महाराज को एक सार्वजनिक मंच पर बहस की चुनौती दी है, ताकि उनके लगाये आरोपों के जवाब जनता जान सके। मानसिंगका का कहना है कि मिशन की ओर से टैक्स बचाने के नाम पर दान के रूप में झूठे और जाली कागजात बनाकर लाखों रूपये की लूट की जा रही है। सरकारी विभाग को झूठी जानकारी देकर करोड़ों, अरबों रुपयों का गबन इस संस्था द्वारा किया जा रहा है। मानसिंगका कहते हैं कि धर्म के नाम पर किया जा रहा अनैतिक व्यापार बंद होना चाहिये।