सोमवार, सितंबर 09, 2013

समाज के रग में दंगे का जहर

देश में शांति का काल हो या अशांति का। मजहबी हिंसा रोज-रोज की बात बन चुकी है। दंगे को रोकने के लिए हर काफर््यू में दो चार दिनों के लिए वहां के नागरिक घरों में दुबक जाते हैं। जिंदगी थम जाती है, किसी के घर में खाने को है या नहीं यह देखने वाला कोई नहीं। किसी मासूम बच्चों को दूध मिला की नहीं, इस सोचने वाला नहीं है। उन्नमादियों ने आग लगाई और पूरी जनता ने सजा भोगी। क्या ऐसे मामले में 24 घंटे के अंदर उन्नमादियों पर नकेल कर कर पूरी जनता को राहत देने की दृढ़ता हमारे प्रशासन तंत्र में नहीं है?
संजय स्वदेश हाल के कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में एक के बाद एक दंगे ने साफ कर दिया है कि प्रशासनतंत्र दंगाइयों को रोकने में नाकाम है। ताजा मामला मुजफ्फरनगर जिले में भड़की हिंसा का है, जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार 26 लोगों की जान गई और दर्जनों लोग घायल हुए। पर गैर सरकारी आंकड़े इससे दोगुने के हैं। ऐसे हर हालात के बाद की तरह सरकार ने काफर््यू लगा दिया। हर काफर््यू में दो चार दिनों के लिए वहां के नागरिक घरों में दुबक जाते हैं। जिंदगी थम जाती है, किसी के घर में खाने को है या नहीं यह देखने वाला कोई नहीं। किसी मासूम बच्चों को दूध मिला की नहीं, इस सोचने वाला नहीं है। उन्नमादियों ने आग लगाई और पूरी जनता ने सजा भोगी। क्या ऐसे मामले में 24 घंटे के अंदर उन्नमादियों पर नकेल कर कर पूरी जनता को राहत देने की दृढ़ता हमारे प्रशासन तंत्र में नहीं है? जब तक दंगाइयों के मन में यह बात नहीं होती है कि उनके छोटे या बड़े कद के आका उनके नापाक हरकतों पर संरक्षण दे देंगे, वे खून कैसे बहाएंगे। पहले भी उत्तर प्रदेश के मुलायम सरकार पर दंगे को लेकर एक समुदाय विशेष पर तुष्टीकरण का आरोप लगा है। पढ़े-लिखे, दूरदर्शी सोच रखने वाले अखिलेश यादव भी पिता की इसी नक्शे कदम पर हैं। केंद्र में बैठी सरकार भी महज वोट वैंक के लिए ऐसी गंभीर मामले में आंखे मूंदे रहती है। मासूम दंगे की आग में जलते मरते हैं। काफर््यू में जनता पीसती रहती है। पीड़ितों की पीढ़ियां इसका दंश झेलती है। हमारे समाज में दंगे में पीड़ितों के भावी पीड़ियों पर क्या असर पड़ा इसको पीछे मुड़कर देखने की किसे पड़ी है। देश के किसी न किसी हिस्से में कहीं छोटे तो कहीं बड़े दंगे होते रहते हैं। लेकिन इस पर नियंत्रण के लिए न समाज में कोई ठोस चिंता दिख रही है और न ही किसी सरकार में दृढ़ता। देश में शांति का काल हो या अशांति का। मजहबी हिंसा रोज-रोज की बात बन चुकी है। दूर-दराज के क्षेत्रों में होने वाले ऐसे दंगे भले ही राष्टÑीय मीडिया के सुर्खियों में नहीं आते हों, लेकिन स्थानीय स्तर पर ही बड़ा भयावह परिणाम छोड़ जाते हैं। पिछले दिनों स्वयं केंद्र सरकार ने संसद में यह स्वीकार किया कि सांप्रदायिक हिंसा सरकार के लिए एक चुनौती के तौर पर उभर रही है। वर्ष 2012 में सांसद में प्रस्तुत पिछले तीन साल में सांप्रदायिक हिंसा के 2,420 मामले सामने आए जिसमें कम से कम 427 लोगों की मौत हो गई। इन आंकड़ों औसत देंखे तो देश में किसी न किसी हिस्से में हर दिन दो सांप्रदायिक हिंसा हो रहे हैं। इस हिंसा में हर माह करीब 11 लोग मौत के घाट उतर रहे हैं। घायलों की संख्या अलग है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2012 के अगस्त तक सांप्रदायिक हिंसा के 338 मामले सामने आए जिसमें 53 लोगों की मौत हुई, जबकि 1,059 लोग घायल हुए। 2010 में सांप्रदायिक हिंसा की 651 घटनाओं में 114 लोगों की मौत हो गई और 2,115 व्यक्ति घायल हो गए। 2009 में सांप्रदायिक हिंसा की 773 घटनाओं में 123 लोगों की मौत हो गई जबकि 2,417 लोग घायल हुए। 2008 में सांप्रदायिक हिंसा की 656 घटनाओं में 123 लोगों की मौत हो गई जबकि 2,270 लोग घायल हुए। हालात को चुनौतीपूर्ण मानते हुए केद्र सरकार ने संबंधित राज्य सरकारों को इस तरह की घटनाओं से सख्ती से निपटने की सलाह देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी भी सांप्रदायिक हिंसा का समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। लेकिन सरकार के नेतृत्व थामने वाले किसी न किसी रूप में किसी सांप्रदाय विशेष के दामन में राजनीतिक लाभ के लिए आंखे बंद कर लेते हैं। इससे समाज के रंगों में जिस जहर का प्रवाह होता है, वह राष्टÑ के लिए घातक है। राष्टÑीय स्तर के अनेक ऐसी हिंसक घटनाओं के कारण देश अंतरराष्टÑीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है। उसका दंश आज भी समाज के सैकड़ों लोग भोग रहे हैं। काल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। मतलब यह है कि धर्म के प्रति लोगों की अस्था ही हद नसेड़ी की अफीक की नशा की तरह है, जो हर कीमत पर नशा नहीं त्यागना चाहता है, भले ही उसकी जान क्यों न चली जाए। समाज की इसी कमजोरी को हर समुदाय के कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ को साधने का हथियार बनाया। भारत में अब तक हुए दंगों में सैकड़ों मासूमों के खून बह गये। पर क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया आदि तर्कों के नाम पर दंगों के उन्मादी जहर को रोकने के लिए समाज की ओर से कोई ठोस पहल की बड़ी जरुरत है। केवल कठोर कानून से काम नहीं चलेगा। कानून को लागू करा कर इसे सख्ती से निपटने की जरूरत है। जब तक लोगों में कानून का डर नहीं होगा और दंगाइयों के मन यह बात नहीं निकलेगी कि दूसरे के खुद बहाने पर उन्हें किसी का संरक्षण काम नहीं आएगा,उनके रंगों में बहता जहर नहीं धुलेगा।

रविवार, अगस्त 18, 2013

...तो कौन हरचरना जन गण मन गाएगा

आजाद भारत के छह दशक में ऐसे कई मौके आए जब कई जिम्मेदार हस्तियोंं ने राष्टÑध्वज को अपमान किया। लेकिन उसे मानवीय भूल समझ कर अनदेखी कर दी गई। कई राज्यों के सिनेमाघर में फिल्म शुरू होने से पहले लहराते तिरंगे के चलचित्र के साथ राष्टÑगान चलाया जाता है। लोग सम्मान में खड़े होते, कई बैठे रहते हैं। विकसित भारत में राष्टÑध्वज और राष्टÑगान के प्रति तेजी से घटते सम्मान के माहौल में यदि दलित समुदाय राष्टÑध्वज के लिए कमर कसते हैं, लड़ने मरने के लिए तैयार हैं, तो उस पर भृकुटी तानने वाले निश्चित रूप से गलत हैं। यदि ऐसे लोगों का दमन किया गया तो ने फिर कभी कोई फट्टा सुथन्ना हरचरना जन गण मन नहीं गाएगा।
संजय स्वदेश हिंदी के प्रसिद्ध कवि घुवीर सहाय की राष्ट्रगीत पर एक कविता की कुछ पक्तियों पर गौर करें-जनगण मन में कौन वो भाग्य विधाता है। फटा सुथन्ना पहने जिसके गुण हरचरना गाता है...कविता के इस अंश का प्रसंग इस लिए किया जा रहा है कि आजाद भारत के सम्मान व गर्व के प्रतीक राष्टÑध्वज के लिए न जाने देश को कितनी कुर्बानी देनी पड़ी उसी तिरंगे के शान में खड़े होने वाले फटे सुथन्ने हरचरना एक दलित की उस बिहार राज्य में हत्या कर दी जाती है जहां कि स्वतंत्र वीरों ने गोली खाकर तिरंगे को गिरने दिया। बिहार के सासाराम में 67वें स्वतंत्रता दिवस के दिन दलितों पर जैसा जुल्म ढाया गया उससे फिर सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अंग्रेजों से मिली आजादी सभी देशवासियों से लिए थी। सासाराम के बद्दी गांव में दलितों का संत रविदास मंदिर के सामने स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराना ऊंची जाति वालों को इतना नागवार गुजरा कि पत्थर से मारकर एक की हत्या कर दी। हमले में 40 लोग जख्मी हुए हैं। कत्थित सर्वण समुदाय के लोगों की भीड़ ने स्कूली बच्चों को भी नहीं छोड़ा। सड़कों पर दलित बच्चों पर हमले हुए। जो बच्चे घरों में थे उन्हें छत से नीचे फेंक दिया गया। पुलिसकर्मियों पर आरोप है कि उन्होंने इस हमले की अनदेखी की। जख्मी लोगों में ज्यादातर बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं शामिल हैं। बताया गया कि गंभीर रूप से जख्मी लोगों को पटना के पीएमसीएच हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया। मीडिया की मुख्यधारा से यह समाचार गायब है। आॅनलाइन मीडिया में ऐसे समाचार की चर्चा है। सवर्ण समुदाय वाले प्रभाव के माने जाने वाले बद्दी गांव में 15 दिन पहले से ही तनाव का माहौल था। गांव में सवर्ण समुदाय के लोगों ने यह निर्णय लिया था कि स्वतंत्रता सेनानी निशांत सिंह की मूर्ति लगाई जाएगी और वहीं के रविदास मंदिर प्रवेश द्वार के सामने प्लॉट पर तिरंगा फहराएंगे। इसी जगह पर 15 अगस्त के दिन दलित समुदाय के लोग तिरंगा लहराने गए थे। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने दोनों पक्षों के साथ बैठक की थी। प्रशासन के इस पहल से भी गतिरोध और तनाव में कोई कमी नहीं आई। जमाना बदल चुका है, अब वे दिन नहीं रहे जब दलित घुड़कियों पर चुप हो जाया करते थे। आज सीने पर गोली खा कर अपनी मान मर्यादा की रक्षा के लिए मरने से पीछे नहीं हटते हैं। देश में हुई ऐसे अनेक घटना इस बात को साबित भी कर चुकी है। जब सवर्ण समुदाय ने यह निर्णय ले लिया कि उस जगह पर स्वतंत्रता सेनानी निशांत सिंह की मूर्ति के सामने वे तिरंगा लहराएंगे। तो दलित समुदाय के लोगों ने भी इनके डर से पीछे नहीं हटने का फैसला किया था। लिहाजा, यह टकराव स्वाभाविक था। हिन्दुस्तान की धरती पर समय-समय दलित समुदाय ने भी कई महान और साहसी लोगों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने बल पर अंग्रेजी हुकूमत के दांत खट्टे कर दिए थे। बिहार और झारखण्ड की धरती पर बिरसा मुंडा को भगवान का दर्जा अगर दिया जाता है तो उसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह भी है कि मात्र 25 साल की उम्र में उन्होंने लोगों को एकत्रित कर एक ऐसे आंदोलन का संचालन किया जिसने देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान दिया। जिस हिंदू वर्ण व्यवस्था से जन्म सवर्ण समुदाय ने आदिवासियों और दलितों को अपनी बराबरी का दर्जा नहीं दिया, उसके एक बड़े समुदाय को बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज में एकता लाकर देश में धर्मांतरण को रोका और दमन के खिलाफ आवाज उठाई। वीरांगना झल्लकारी बाई के योगदानों को इतिहास में उतनी जगह नहीं मिली जितनी कि वह हकदार थी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में दलित समुदाय के ऐसे अनगिनत योद्धा हैं जिन्होंने आजादी के लिए अपनी जान की कुर्बानी दी। लिहाजा, इस समुदाय को भी राष्टÑध्वज लहराने में उतना ही फक्र महसूस होता है जितना दूसरे समुदाय को। आजाद भारत के छह दशक में ऐसे कई मौके आए जब कई जिम्मेदार हस्तियोंं ने राष्टÑध्वज को अपमान किया। लेकिन उसे मानवीय भूल समझ कर अनदेखी कर दी गई। कई राज्यों के सिनेमाघर में फिल्म शुरू होने से पहले लहराते तिरंगे के चलचित्र के साथ राष्टÑगान चलाया जाता है। ढेरों लोग सम्मान में खड़े होते, कई बैठे रहते हैं। विकसित भारत में राष्टÑध्वज और राष्टÑगान के प्रति तेजी से घटते सम्मान के माहौल में यदि दलित समुदाय राष्टÑध्वज के लिए कमर कसते हैं, लड़ने मरने के लिए तैयार हैं, तो उस पर भृकुटी तानने वाले निश्चित रूप से गलत हैं। यदि ऐसे लोगों का दमन किया गया तो ने फिर कभी कोई फट्टा सुथन्ना हरचरना जन गण मन नहीं गाएगा।

बुधवार, अगस्त 07, 2013

फिर कोई नये नाम से मैदान में डटेगा

संजय स्वदेश करीब डेढ़ दशक पहले जब खबरिया चैनल तेजी से पनपने लगे तब यह चर्चा जोरशोर से हुई कि अब समाचार पत्रों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। वर्तमान हालात देख कर लगता है कि प्रिंट मीडिया ने इन डेढ़ दशक में अपना पांव और मजबूत कर लिया। भारत के समाचार पंजीयक के वर्ष 2011-12 के आंकड़ों के अनुसार देश में 86754 समाचार प्रकाशित हो रहे हैं। इसमें 16310 समाचार पत्रों का तो बकायदा वार्षिक रिपोर्ट भी जमा की गई। इसमें ढेरों संख्या लुघ पत्र पत्रिकाओं की भी है। समाचार चैनलों के विकास के उतार-चढ़ाव के दौर में समाचार पत्रों की विश्वसनीयता समाप्त नहीं हुई। बड़े घराने के बड़े समाचार पत्र समूहों ने तो अपने संस्करणों को बढ़ाया। नई-नई यूनिटों की भी शुरुआत की। आखिर क्यों? कई मीडिया दिग्गजों ने कहा कि अब कालाधन को मीडिया के माध्यम से ही सफेद किया जाने लगा है। संपादकीय नीति पूरी तरह समाचारपत्रों के मालिकानों के द्वारा ही संचालित हो रहे हैं। मंदी के दौर में भी विज्ञापनों की भरमार रही। इसके अलावा भी अनेक ऐसी परिस्थितियां हैं जिससे मीडिया की साख पर बट्टा तो लगा, लेकिन पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से विचारों के साथ खबरों को जानने की बेचैनी कम नहीं हुई। हां, व्यस्त जिंदगी में अखबारों के एक-एक शब्द पढ़ जाने वाले वैसे पाठक अब बिरले ही बचे हैं। देश में ऐसे परिवारों की संख्या कम नहीं है जिनकी चाय बिना अखबार के हजम होती हो। यह जरूर हुआ कि खबरों के प्रसार चाहे प्रिंट हो या इलेकट्रॉनिक माध्यम इनके समाचारों के प्रति मानवीय सवंदेना कम जरूर हुर्इं। समाचारों के सुर्खियों में आने के बाद भी संबंधित तंत्र की निष्क्रियता जरूर साबित हो गई है। बार-बार खबरों की सुर्खियों से भी कभी-कभार सत्ता तंत्र सचेत नहीं होता है तो भला इसमें मीडिया कहां दोषी है। उसके हाथ में क्या है। पत्रकार की जिम्मेदारी कवरेज तक सीमित है। न्याय-अन्याय का वह निर्धारण नहीं कर सकता है। स्थितियों को बतला भर सकता है। उसका काम है सच को परोसाना। बदलते दौर में भले ही मीडिया में ढेरों बुराइयों का शुमार हुआ हो, लेकिन ढेरों बिसंगतियों के बाद आज भी कई बार मीडिया ने अपनी सार्थकर्ता साबित की। अब समाज की बढ़ती असंवेदनशीलता से दुनिया को हिला देने वाली खबरों की उम्र भी सप्ताह से ज्यादा नहीं होती। तो इसमें मीडिया का क्या दोष। आज अखबार वाले वहीं लिख रहे हैं जो समाज पढ़ना चाहता है। टीवी वाले वही दिखा रहे हैं जो उसका दर्शक देखना चाह रहा है, तो किसको कैसे कटघरे में खड़ा किया जाए। ऐसे पाठक और दर्शकों की संख्या निश्चय ही ज्यादा है। लेकिन इन्हीं सबके बीच ऐसे पाठक भी हैं जो देश-दुनिया के सरोकार को लेकर गंभीर हैं। उनके अंदर एक बेचैनी है, उनके मन मुताबिक मीडिया कंटेंट की। वृहद समाज में ऐसे लघु संख्यक पाठकों की बेचैनी लघु स्तर के समाचार पत्र अच्छी तरह समझते हैं। तभी तो विषम परिस्थितियों में आज ढेरों लघु स्तर की पत्र-पत्रिकाएं वर्षों से निरंतर प्रकाशित हैं। ढेरों ने दम तोड़ दिया। आगे भी तोड़ती रहेंगी। फिर कोई नये नाम को लेकर मैदान में डटेगा। सरोकारों को लेकर बियबान में शोर मचाने जैसे हालात में भी लघु स्तर की पत्र पत्रिकाएं बेईमान समाज में वैसे ही कुंदन की तरह चमकती दमकती रहेगी, जैसे कत्थित कलियुगी समाज में सत्यवादी हरिशचंद का नाम।

शनिवार, जून 08, 2013

कुटीर उद्योग भी बचाते vikash दर को

31 मार्च 2007 की स्थिति के मुताबिक देश में पांच लाख पंजीकृत उद्यमों को बंद किया गया। सबसे ज्यादा 82966 इकाइयां तमिलनाडु में बंद हुईं। इसके बाद 80616 इकाइयां उत्तर प्रदेश में, 47581 इकाइयां कर्नाटक में, 41856 इकाइयां महाराष्ट्र में, 36502 इकाइयां मध्य प्रदेश में और 34945 इकाइयां गुजरात में बंद करनी पड़ीं। बंद होने के सरकारी आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा कि जब पंजीकृत उद्यमों को अकाल मौत आ गई, तब देश के गैर पंजीकृत और परंपरागत कुटीर उद्योगों का क्या हश्र हुआ हो, वे कैसे दम तोड़े होंगे संजय स्वदेश करीब बीस साल पहले जब देश की अर्थव्यवस्था बदहाल थी, तब उसे मजबूत करने के नाम पर तब के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने देश के द्वार विदेशी बाजारों के लिए खोल दिए। तरह-तरह के सपने दिखाकर जनता को विदेशी कंपनियों के लिए तैयार कर लिया गया। हालांकि उससे देश के विकास पर फर्क भी पड़ा। बाजार में पैसे का प्रवाह तेज हुआ, लोग समृद्ध भी हुए। पर इस प्रवाह में देश का पारंपरिक व मौलिक बाजार का वह ढांचा चरमरा गया, जिस कीमत में न केवल संतोष था बल्कि सुख-चैन भी था। लेकिन अब इसके घातक परिदृश्य सामने आने लगे हैं। बाजार के जानकार कहते हैं कि केवल कृषि उत्पादों और स्वास्थ्य सेवाओं पर करीब 54 लाख करोड़ रु पया हर साल बहकर देश से बाहर चला जाता है। यदि परंपरागत बाजार के ढांचे में इतने धन का प्रवाह देश में ही होता तो शायद उदारीकरण की समृद्धि के पीछे चली नकारात्मक चीजें देश की मौलिक व पारंपरिक ढांचे को नहीं तोड़ती। उदारीकरण की मनमोहनी हवा चलने से पहले गांव के बाजार पारंपरिक हाट की शक्ल में ही गुलजार होते थे। यही समय उसके गुलजार होने का उत्तरार्ध काल था। करीब दो दशक में ही आधुनिक बाजार के थपेड़ों में पारंपरिक गांव के बाजार में सजने वाले वे सभी उत्पाद गायब हो चुके हैं, जो कुटीर उद्योगों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संरचना को मजबूत किए हुए थे। यहां एक उदाहरण गिनाने से बात नहीं बनेगी। 20 साल पहले जिन्होंने हाट का झरोखा देखा होगा, उनके मन मस्तिष्क में उन उत्पादों के रेखाचित्र सहज ही उभर आएंगे। फिलहाल, तब से देश करीब डेढ़ पीढ़ी आगे आ चुका है। जिन गांवों में शहर की हर सुविधा के कमोबेश पहुंचने के दंभ पर सफल विकास के दावे किए जा रहे हैं, उसका असली लाभ कौन ले रहा है? कहने और उदाहरण देने की जरूरत नहीं है कि उन फटेहाल ग्रामीण या किसानों की संख्या में कमी नहीं आई है, जो आज भी जी-तोड़ मेहनत मजदूरी और महंगी लागत के बाद आराम की रोटी खाने लायक मुनाफे से दूर हैं। पर शहर में अपने उत्पादों को बेचते-बेचते कॉरपोरेट कंपनियों ने गांवों में बाजार विकसित कर लिया। कॉरपोरेट व्यवस्था की नीति ही है कि वह किसी व जिस भी बाजार में जाए वहां पहले से जमे उसके जैसे उत्पादों के बाजार को किसी न किसी तरह से प्रभावित करें। इसमें सफलता का सबसे बेहतर तरीका है कि प्रतिस्पर्धी की मौलिक योग्यता नष्ट कर दी जाए। मतलब दूसरे की मौलिक उत्पादन की क्षमता की संरचना को ही खंडित करके बाजार में अपनी पैठ बना कर जेब में मोटा मुनाफा ठूंसा जा सकता है। विदेशी पूंजी के बयार से जब बाजार गुलजार हुआ तब लघु और मध्यम श्रेणी की औद्योगिक गतिविधियों में काफी हलचल हुई। उनके आंकड़ों को गिना कर सरकार ने समय-समय पर अपनी पीठ भी थपथपाई। आज उसी नीति की सरकार के आंकड़े जो हकीकत बयां कर रहे हैं, वे भविष्य के लिए सुखद नहीं कहे जा सकते। गत दिनों सरकार ने संसद में जो ताजा जानकारी दी उसके अनुसार 31 मार्च 2007 की स्थिति के मुताबिक देश में पांच लाख पंजीकृत उद्यमों को बंद किया गया। सबसे ज्यादा 82966 इकाइयां तमिलनाडु में बंद हुईं। इसके बाद, 80616 इकाइयां उत्तर प्रदेश में, 47581 इकाइयां कर्नाटक में, 41856 इकाइयां महाराष्ट्र में, 36502 इकाइयां मध्य प्रदेश में और 34945 इकाइयां गुजरात में बंद करनी पड़ीं। बंद होने के सरकारी आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा कि जब पंजीकृत उद्यमों की अकाल मौत आ गई, तब देश के परंपरागत कुटीर उद्योगों का क्या हश्र हुआ हो, वे कैसे दम तोड़े होंगे? उनसे जुड़े लाखों लोग कैसे जीवन जी रहे होंगे। कॉरपोरेट के रूप में आई विदेशी पूंजी का तेज प्रवाह ने ही कुटीर उद्योगों की मौलिक कार्यकुशलता की योग्यता को नष्ट कर दिया। गांवों में ही तैयार होने वाले पारंपरिक उत्पाद के ढांचे को तोड़ दिया। हसियां, हथौड़ा, कुदाल, फावड़े तक बनाने के धंधे कॉरपोरेट कंपनियों ने गांवों के कारीगरों से छीन लिए। इस पेशे से जुड़े कारीगर अब कहां है? कभी-कभार बड़े शहर की शक्ल में बदलते अर्धविकसित शहर के किसी चौक-चौराहे पर ऐसे कारीगर परिवार के साथ फटेहाली में तंबू लगाए दिख सकते हैं पर उन्हें हमेशा काम मिलता हो, ऐसी बात नहीं है। सब कुछ तो बाजार में है। यह तो एक उदहारण है। लकड़ी के कारीगरों के हाल देख लें। बड़े-बड़े धन्ना सेठों ने इसके कारोबार पर कब्जा कर लिया। इस परंपरागत पेशे से जुड़े कारीगर अब उनके लिए मामूली रकम में रौदा घंसते हुए उनकी जेबें मोटी कर रहे हैं। हालांकि कंपनियों ने लकड़ी की उपयोगिता के ढेरों विकल्प दे दिए हैं। यह सब कुछ गांव तक पहुंच चुका है। शहर से लगे गांव के अस्तित्व तो कब के मिल चुके हैं। दूरवर्ती गांवों में तेजी से रियल इस्टेट का कारोबार सधे हुए कदमों से पांव पसार रहा है। शायद इसी दंभ पर स्टील कंपनियां निकट भविष्य में केवल ग्रामीण इलाके में अपने लिए 17 हजार करोड़ डॉलर का बाजार देख अपनी तिजोरी बढ़ाने के सपनें संजो रही हैं। http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9/// rastriya sahara me hastshep page no 2//publish on 8/6/2013

सोमवार, जून 03, 2013

हत्याकांड के हत्यारे

By संजय स्वदेश 01/06/2013 16:25:00
छत्तीसगढ़ की दरभा घाटी में हुआ भीषण हत्याकांड सिर्फ वहीं होकर खत्म हो गया हो, ऐसा नहीं हो पाया। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अपने तरह से इस सबसे जघन्य और अमानवीय हत्याकांड के बाद जिस तरह से मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक दलों द्वारा व्यवहार किया जा रहा है वह बताता है कि दरभा घाटी में हुए नरसंहार के दोषी अकेले माओवादी भर नहीं है। हमारा मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक जमात भी हत्याकांड के छिपे हुए हत्यारे की तरह व्यवहार कर रहा है। इस जघन्य हत्याकांड के बाद नक्सलवाद पर बहस चलाकर अगर मीडिया और सोशल मीडिया ने इसे कमजोर करने की साजिश की तो एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर राजनीतिक दल इस हत्याकांड की हत्या करने में जुट गये हैं।
रायपुर से संजय स्वदेश की रिपोर्ट- ---- कम से कम छत्तीसगढ़ के नेताओं से किसी ने यह उम्मीद बिल्कुल नहीं की होगी, जैसा वे कर रहे हैं। अभी हत्याकांड के तेरहवीं भी नहीं बीती कि राजनीतिक दल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के लिए मैदान में उतर आये हैं। हादसे के बाद जो आरोप-प्रत्यारोप की राजनीतिक चल रही है, वह राजनीतिक शुचिता को तार-तार करने वाली है। जिस हत्याकांड की जिम्मेदारी खुद हत्यारे ले रहे हैं। लिखित पर्चे भेज रहे हैं। खुले आम फिर से नरसंहार की चेतावनी दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दल बयानबाजी कर एक दूसरे को दोषी ठहराकर क्या साबित करना चाहते हैं? लेकिन लगता है कि इस हत्याकांड की हत्या करके कम के कम प्रदेश में कांग्रेस के कुछ नेता अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुट गये हैं। छत्तीसगढ़ में अगला विधानसभा चुनाव होने में करीब नौ महीने शेष है। लेकिन लगता यही है कि राजनीतिक दलों का ध्यान इसी ओर केंद्रित है। दुखद सच यही है कि राजनीतिक दलों ने हत्याकांड के असल मुद्दे की ही हत्या कर दी है। कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में फिर से परिर्वतन यात्रा शुरू करने का फैसला ले लिया। दिवंगत नेताओं की तेरवीं के कांग्रेस अब नंदकुमार पटेल और महेंद्र कर्मा की फोटो लेकर परिवर्तन यात्रा लेकन जनता के बीच जाएगी। इसकी रणनीति घटनाक्रम के करीब एक सप्ताह के अंदर ही कांग्रेस बना चुकी है। मतलब कांग्रेस अपने नेताओं की हत्या को सत्ता पाने की कीमत में रूप में भुनाना चाहती है। बयानों की खुल्लम खुल्ला राजनीति इस नक्सली वारदात के बाद ही कांग्रेस का यह आरोप लगाया था कि राज्य के इंटेलिजेंस प्रमुख और मुख्यमंत्री के बीच गहरी सांठगांठ है, जिसके कारण राज्य के गृह मंत्री अधिकारविहीन हो गए हैं। भक्त चरण दास ने पार्टी की सोच का खुलासा करते हुए कहा कि राज्य सरकार के पास इस हमले की पूरी जानकारी थी, बावजूद इसके सरकार मौन और निष्क्रिय बनी रही। इसी गंभीर वातावरण में पड़ोसी प्रदेश मध्यप्रदेश के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया ने भी खूब राजनीतिक चमकाई। साफ-साफ मीडिया को बयान दिया कि पूरा षड्यंत्र भाजपा का है, तो मध्यप्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने आरोप लगाया दिया कि हमले के मुख्य षड्यंत्रकारी छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी हैं। आरोप सुन जोगी ने तड़ से प्रेस कान्फ्रेन्स कर नरेंद्र सिंह तोमर के खिलाफ कानूनी नोटिस भेजने की घोषणा की। सर्वदलील बैठक में बन सकती थी बात घटनाक्रम को लेकर प्रदेश की भाजपा सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई। इसमें मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने हिस्सा ही नहीं लिया। प्रदेश कांग्रेस महामंत्री भूपेश बघेल और वरिष्ठ विधायकअकबर ने कह दिया कि मुख्यमंत्री ही आरोप के घेरे में हैं। षडयं9 में सरकार के शामिल रहने का शक है तो ऐसे लोगों को बैठक में बुलाने का अधिकार नहीं। हालांकि मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि सर्वदलीय बैठक की तिथि प्रतिपक्ष नेता वरिष्ठ कांग्रेसी रविंद्र चौबे और केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत से चर्चा कर के तय की गई थी। जो भी एक सार्थक उद्देश्य के लिए बुलाई गई बैठक का बहिष्कार कर बयानबाजी कर राजनीति करने के बजाय कांग्रेस नक्सलियों के ढृढ़ सफाये के मुद्दे पर सरकार को झुका ही सकती थी। आंध्र प्रदेश से ले सबक छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश में एक बार नक्सलियों ने चंद्रबाबू नायडू की हत्या करने की कोशिश की। लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में 2004 में कांग्रेस ने यह घोषणा की कि यदि वह जीतती है तो नक्सलियों से बातचीत करेगी। कांग्रेस जीत भी गई। तब कांग्रेस पर यह आरोप लगा कि उसने चुनाव में नक्सलियों से साठगांठ कर सत्ता पाने में कामयाब रही। सत्ता मिलने पर कांग्रेस ने नक्सलियों से बातचीत का रास्ता अख्तियार किया। लेकिन नक्सली अपनी राह छाड़ने को राजी नहीं थे। बातचीत के दौरान नक्सली अपनी ताकत बढ़ाने और संगठन मजबूत करने में लगे रहें। तब राजशेखर रेड्ड़ी ने नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। विशेष रूप से नक्सलियों से लड़ने के लिए गठित विशेष सुरक्षा बल को आधुनिकीकरण किया। आधुनिक हथियार और तकनीक से लैस इस सुरक्षा बल के लड़ाके नक्सलियों के लिए खौफ के प्रतिक बन गए। इसके परिणामस्वरूप आंध्र प्रदेश में नक्सली घटनाओं में तेजी से कमी आई। आंध्र के नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के जंगलों में शरण ली। यहां के आदिवासियों को अपना मातहत बना कर खूनी खेल खेल रहे हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में किसी भी दल में ऐसी कोई बयान नहीं दिया जिससे यह लगे कि उनमें सत्ता पाकर नक्सलियों पर सख्ती से नकेल की दृढ़ता हो। लेकिन यहां तो मुखर्तापूर्ण ढंग से बयानबाजी कर नेता अपने ही गले के छुरी चला रहे हैं। गरमा गया नक्सलबाद इस नक्सली नरसंहार के बाद सोशल मीडिया बहस का एक बहुत बड़ा केंद्र बन गया। लेकिन इस बहसबाजी में भी हत्याकांड की बजाय नक्सलबाद एक गंभीर मुद्दे के रूप में उभार दिया गया। समाचार चैनलों पर भी इस मुद्दे पर हुए बहस में नक्सलबाद का मुद्दा ज्यादा केंद्रीत नजर आया। प्रिंट मीडिया, खासकर छत्तीसगढ़ की प्रिंट मीडिया ने तो हत्याकांड के बड़े-बड़े फोटो प्रकाशित कर मानवता को झकझोरने की कोशिश की। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विशेष कार्यक्रम चलाए गए या चलाए जा रहे हैं, उससे एक बात तो साफ-साफ नजर आ रही है कि यह बड़ा हादसा, उन तमाम नक्सली हत्याकांडों की तरह हो गया जो पहले हुए। यानी मौत के मातम पर मौत का मजा। मीडिया को मिला शिंदे का मसाला एक प्रमुख समाचार चैनल पर तो यह समाचार प्रसारित कर दी गई कि इस भीषण नक्सली वारदात के बाद केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे विदेश में छुट्यिां मना रहे हैं। चैनल ने यह भी बताया कि शिंदे अमेरिका में 19 से 22 तक आयोजित एक कार्यक्रम में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने गए हैं। लेकिन हादसे के बाद भी नहीं लौटे। चैनल तो हकीकत की पड़ताल नहीं की। शिंदे कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अपनी आंख के इलाज के लिए वे अस्पताल में भर्ती थे। नक्सली हत्याकांड के अगले दिन ही प्रधानमंत्री और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी छत्तीसगढ़ पहुंच गई। केंद्रीय गृहराज्यमंत्री भी आ गए। फिर शिंदे को घेरने की क्या जरूरत पड़ी। मतलब समाचार चैनल ने भी इस नक्सली वारदात में टीआरपी का एक मसाला ही खोजा। क्यों नहीं बताया पीएम के जापान दौरे का लाभ छत्तीसगढ़ में नक्सली वारदात के तीसरे दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जापान के दौरे पर गए। मीडिया ने यह भी आलोचना की कि ऐसे हालात में पीएम को विदेश नहीं जाना चाहिए था। लेकिन पीएम का जापान जाना कितना जरूरी था। इस पर तो कोई बात ही नहीं हुई। गत दिनों चीन के प्रधानमंत्री भारत दौरे पर आए थे। भारत की पर मनोवैज्ञानिक दवाब के लिए चीनी पीएम भारत दौर के बाद पड़ोसी देश पाकिस्तान गए। जिस दिन चीनी पीएम भारत आए थे, उसी दिन मनमोहन सिंह की जापान यात्रा तय हो गई थी। मनमोहन सिंह का जापान जाना चीन को जवाब देना था। जापान जाकर भारत में बुलेट ट्रेन चलाने के लिए महत्वपूर्ण समझौता हुआ। जबकि भारत में बुलेट ट्रेन चलाने के लिए फांस के साथ डील ुहई थी। फांस की कंपनी ने भारत में सर्वे भी कर लिया था। पहले चरण में पुणे, मुंबई और अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन चलाने का ब्लूप्रिंट भी तैयार हो चुका था। इसके बाद भी भारत की इस बदली हुई कूटनीति के बारे में मीडिया ने कुछ ठोस चीज जनता को नहीं बताई। दुनिया जानती है, बुलेट ट्रेन तकनीक में चीन दुनिया में सबसे आगे हैं। भारत ने जापान से करार कर उसे बुलेट ट्रेन का एक बड़ा बाजार दे दिया। यह चीन को ठीक उसी तरह का करारा मनोवैज्ञानिक जवाब है जिस तरह चीन पीए भारत आकर पाकिस्तान गए और वहां उसकी पीठ ठोक आए। आए दिन सीमा विवाद को लेकर भारत को तंग करने वाले चीन को अब उसका पड़ोसी जापान भारत में रह कर बुलेट ट्रेन के बाजार के माध्यम से चीन को चुनौती देता रहेगा। केपीएस गिल ने बहती गंगा में हाथ धोया छत्तीसगढ़ के नक्सली वारदात में बयान देकर एक ओर जहां नेता राजनीतिक की रोटी सेंकने में लगे हैं, वहीं इस बहती गंगा में पूर्व आईपीएस अधिकारी केपीएस गिल ने भी हाथ धो लिया। के.पी.एस. गिल को छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से लड़ने के लिए सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था। छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजनीतिक सरगर्मी में उन्होंने यह बयान दिया कि नक्सलियों के सफाये के लिए उन्होंने जो रणनीति मुख्यमंत्री रमन सिंह को बताई, उस पर मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया थी कि वेतन लो और मौज करो। यह बात कितनी सच है यह तो केपीएस गिल जाने और रमन सिंह। लेकिन सच यह है जितने दिन गिल साहब छत्तीसगढ़ में रहे सीएम के कथिला सलाह पर खूब अमल किया। खूब मौज मारा। तमाम तरह के एैश सरकारी खर्चे पर। दबी जुबान में पुलिस महकम के लोग यह भी कहते हैं कि दादा के उम्र के गिल साहब बेड पर नई लड़कियों के भी शैकिन थे।

भारतीय बाजार से चीन मालामाल

--------------------ॅ----------------- भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर भारतीय व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं। ----------------------------------------
संजय स्वदेश पड़ोसी देश चीन कभी भी भारत का विश्वस्त नहीं रहा। लेकिन वैश्विक स्तर पर बदले हालात और बाजार के प्रभाव के कारण कूटनीतिक स्तर पर हमेशा दोनों देशों के संबंधों को सकारात्मक बनाये रखने की पहल दोनों देशों की ओ से होती है। वैश्विक स्तर पर मजबूत होते भारत के कदम चीन की आंखों में हमेशा खटकता रहा है। लिहाजा, चीन ने हमेशा से हर मोर्चे पर भारत को कमजोर करने की कोशिश करता रहा है। कभी सीमा में घुसपैठ करके तो कभी देश के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के वेबसाइटों साइबर धावा बोलकर मानसिक रूप से अशांत करता है। लेकिन आर्थिक स्तर पर चीन भारत को जिस तरह से खोखला कर रहा है, वह निश्चय ही गंभीर है। मीडिया में भारतीय सीमा पर चीनी सैनिकों की हलचल की खबरों पर नजर ज्यादा रहती है, लेकिन इस हलचल के पीछे चीन से जुड़े आर्थिक मुद्दे अक्सर गौड़ होते गए हैं। करीब दशक भर पहले जब चीनी माल भारत में सस्ते दामों में पहुंचा तब लोगों ने हाथों-हाथ लिया। हालांकि चीन अभी भी भारत की हर जरूरत की समान यहां तक ही हमारे भगवान की मूर्तियों तक को भेज रहा है। शुरुआती दिनों में वस्तुओं की गुणवत्ता इतनी खराब निकली कि धीरे-धीरे लोगों को विश्वास चीनी वस्तुओं से उठने लगा। लेकिन शुरुआती दौर में चीन ने भारती व्यपारियों को भीषण तरीके से मानसिक आघात पहुंचाया। अब भारत आने वाला चीनी माल में अब थोड़ी बहुत गुणवत्ता आने लगी है। यहीं कारण है कि गुणवत्ता को लेकर टूटा जनता का विश्वास किफायती दाम के कारण फिर बहाल होने लगा है। आम भारतीय बाजार में ब्रांडेट कंपनियों का 20 से 40 हजार में मिलने वाला टेबवलेट चीनी ब्रांड में हूबहू दो-चार हजार में उपलब्ध हो जा रहा है। जो लोग ब्रांडेड टेबलेट नहीं खरीद पाते हैं, चीनी टेबलेट से टशन मारते हैं। यह तो केवल टेबलेट भर की बात है। खिलौना, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं से लेकर, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं चीनी उत्पाद भारत में उपलब्ध हैं। समझदार भारतीय उपभोक्ता अब किफायती दर के साथ गुणवत्ता की तुलना कर वस्तुओं को चुनने लगा है। चीन से आयातित सस्ती वस्तुओं से भारतीय कारोबारियों और निर्माताओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सबसे अधिक नुकसान भारत के छोटे और मझौले उद्यमियों पर पड़ा है। भारत के बड़े बाजार में धंधा कर चोखा मुनाफा बटोरने वाली कंपनियों की दो जमात है। एक वह जो अपने उत्पाद में थोड़ी बहुत गुणवत्ता देकर भारतीय व्यापारियों के ग्राहकों को लुभा रहे हैं, दूसरे वे हैं जो घटिया उत्पाद या धोखा देकर देशी व्यापारी, कपंनियां या ग्राहकों का पैसा हड़प ले रही हैं। हालही में चीन से व्यापार करने वालों को भारतीय दूतावास ने खबरदार करते हुए सचेत रहने को कहा। पिछले वर्ष 86 भारतीय कंपनियों को चीनी कपंनियों ने धोखा दिया। धोखा खाने वाले छोटे और मझोले स्तर के भारतीय कारोबारी थे। दिया है कि भारतीय कंपनियां कोई भी कारोबारी समझौता करने से पहले चीनी कंपनियों की जांच-परख कर लें। जो चीनी चीनी कंपनियां धोखाधड़ी में शामिल पाई गर्इं है, वे रसायन, स्टील, सौर उर्जा के उपकरण, आॅटो व्हील, आर्ट एंड क्राफ्ट्स, हाडर्वेयर और बायोलॉजिकल टेक्नोलॉजी के कारोबार से जुड़ी हैं। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब भारतीय कंपनियों ने चीन से मशीनरी मंगवाई। जब इसकी इंस्टालेशन करने के बाद काम शुरू किया तो मशीन चली ही नहीं। चीनी वेबसाइट देखकर भारतीय व्यापारी सामान खरीदने को आर्डर देते हैं। चीनी कंपनियां उनसे पैसा तो ले लेती है, लेकिन बाद में सामान भेजती ही नहीं। भारतीय दूतावास ऐसी धोखेबाजी चीनी कंपनियों की सूची आॅनलाइन उपलब्ध करा रहा है। चीनी कंपनियों की धोखेबाजी के धंधे से अलग अनेक चीनी कंपनियां भारत में बेहतर धंधा कर मालामाल हो रही हैं। देश की प्रतिष्ठित औद्योगिक संगठन का दावा हैकि चीन भारतीय अर्थव्यवस्था को किसी भी तरह से नुकसान पहुंचाने का खतरा नहीं उठा सकता है क्योंकि उसके भारत से व्यापक व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं। भारत के बढ़ते बाजार में चीन की हिस्सेदारी में बड़ी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। फिलहाल चीन का भारत में वार्षिक कारोबार 40 अरब डॉलर यानी की करीब 2 लाख 22 हजार करोड़ रुपये हो रहा है। संभावना है कि चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा बड़ 44 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। एसोचैम का सुझाव है कि भारत और चीन को आपस में व्यापारिक अंतर को पाटने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। -----------------------

मर्ज की मजबूरी पर लूट का गोरखधंधा

संदर्भ : जरूरी दवाओं को सरकारी मूल्य से ज्यादा पर बिक्री ---- कई कंपनियों ने अनेक जरूरी दवाओं के लिए गत कुछ वर्षों में ग्राहकों से लगभग 2,362 करोड़ रुपए अधिक वसूले। इसमें से करीब 95 फीसदी रकम से संबंधित मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। कई कंपनियों ने तो जुर्माने के रूप में एक पैसा भी नहीं भरा है। कंपनियां कानूनी दांव पेंच का सहारा लेकर मामले को लंबित करवा देती हैं, तब तक बाजार में उनकी मनमानी चलती रहती है। कंपनियों की तिजोरी भरती जाती है। इसके बाद भी दवा से मरीज की जान बचे या जाए इसकी गारंटी भी नहीं है। ---- संजय स्वदेश कोई बीमारी जब जानलेवा हो जाती है तो लोग इलाज के लिए क्या कुछ नहीं दांव पर लगा देते हैं। क्या अमीर क्या गरीब। ऐसे हालात में वे मोलभाव नहीं करते हैं। इस नाजुक स्थिति को भुनाने में दवा उत्पादक कंपनियों ने मोटी कमाई का बेहतरीन अवसर समझ लिया है। सरकारी नियमों को खुलेआम धत्ता बता कर दवा कंपनियां जरूरी दवाइयों की मनमानी कीमत वसूल रही हैं। कंपनियों की इस मनमानी पर सरकार की नकेल नाकाम है। दवा मूल्य नियामक राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने अपने हालिया रिपोर्ट में कहा है कि सिप्ला, डॉ. रेड्डीज लैब्स और रैनबैक्सी जैसी प्रमुख बड़ी दवा कंपनियों ने ग्राहकों से तय मूल्य से ज्यादा में दवाएं बेचीं। रिपोर्ट के अनुसार बेहतरीन उत्पादकों की सूची में शामिल इन कंपनियों ने कई जरूरी दवाओं के लिए गत कुछ वर्षों में ग्राहकों से लगभग 2,362 करोड़ रुपए अधिक वसूले। इसमें से करीब 95 फीसदी रकम से संबंधित मामले विभिन्न राज्यों उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। इनमें से कई कंपनियों ने तो जुर्माने के रूप में एक पैसा भी नहीं भरा है। ऐसे मामलों में कंपनियां कानूनी दांव पेंच का सहारा लेकर मामले को लंबित करवा देती हैं। तब तक बाजार में उनकी मनमानी चलती रहती है। जनता की जेब कटती रहती है। कंपनियों की तिजोरी भरती जाती है। इसके बाद भी दवा से मरीज की जान बचे या जाए इसकी गारंटी भी नहीं है। सरकार एनपीपीए के माध्यम से ही देश में दवाओं का मूल्य निर्धारित करती है। वर्तमान समय में एनपीपीए ने 74 आवश्यक दवाओं के मूल्य निर्धारित कर रखा है। नियम है कि जब दवा की कीमत में बदलाव करना हो तो कंपनियों को एनपीपीए से संपर्क जरूरी है। लेकिन देखा गया है कि कई बार कंपनियां औपचारिक रूप से आवेदन तो करती हंै पर दवा का मूल्य मनमाने ढंग से बढ़Þा देती हैं। निर्धारित मूल्यों की सूचीबद्ध दवाओं से बाहर की दवाओं के कीमतों में बढ़Þोत्तरी के लिए भी एनपीपीए से मंजूरी अनिवार्य है। इसमें एनपीए अधिकतम दस प्रतिशत सालाना वृद्धि की ही मंजूरी देता है। लेकिन अनेक दवा कंपनियों ने मनमाने तरीके से दाम बढ़Þाए हैं। दवा कंपनियों के इस मुनाफे की मलाई में दवा विक्रेताओं को भी अच्छा खासा लाभ मिलता है। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में कार्यरत एक गैर सरकारी संगठन प्रतिभा जननी सेवा संस्थान की एक रिपोर्ट ने इस बात का खुलासा किया कि दवा कंपनियां केवल अधिक कीमत वसूल की ही अपनी जेब नहीं भरती है, बल्कि वे सरकारी कर बचाने एवं अपने ज्यादा उत्पाद को खापने के लिए खुदरा और थोक दवा विक्रेताओं को भी मुनाफे का खूब अवसर उपलब्ध कराती हैं। जिसके बारे में आम जनता के साथ-साथ सरकार भी बेखबर है। कंपनियां दवा विक्रेताओं को दवाओं का बोनस देती है। मतलब एक केमिस्ट किसी कंपनी की एक स्ट्रीप खरीदता है तो नियम के हिसाब से उससे एक स्ट्रीप का पैसा लिया जाता हैं लेकिन साथ ही में उसे एक स्ट्रीप पर एक स्ट्रीप फ्री या 10 स्ट्रीप पांच स्ट्रीप फ्री दे दिया जाता है। बिलिंग एक स्ट्रीप की ही होती है। इससे एक ओर सरकार को कर नहीं मिल पाता वहीं दूसरी ओर कंपनियां दवा विक्रेताओं को अच्छा खासा मुनाफा कमाने का मौका दे देती है। वे निष्ठा से उसके उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा बेचने की कोशिश करते हैं। दवा विक्रेताओं ने अपना संघ बना रखा है। ए अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) से कम पर दवा नहीं बेचते हैं। ग्राहक की दयनीयता से इनका दिल भी नहीं पसीजता है। दवा कंपनियां के इस खेल का एक बनागी ऐसे समझिए। मैन काइंड कंपनी की निर्मित अनवांटेड किट भी स्त्रीरोग में उपयोग लाया जाता है। इसकी एमआरपी 499 रुपए प्रति किट है। खुदरा विक्रेता को यह थोक रेट में 384.20 रुपए में उपलब्ध होता है। लेकिन कंपनी खुदरा विक्रेताओं को एक किट के रेट में ही 6 किट बिना कीमत लिए मतलब नि:शुल्क देती है। बाजार की भाषा में इसे एक पर 6 क डिल कहा जाता है। इस तरह से खुदरा विक्रेता को यह एक किट 54.80 रुपए का पड़ा। अगर इस मूल्य को एम.आर.पी से तुलना करके के देखा जाए तो एक कीट पर खुदरा विक्रेता को 444 रुपए यानी 907.27 प्रतिशत का मुनाफा होता है। हालांकि कुछ विवादों के चलते कुछ प्रदेशों में यह दवा अभी खुलेआम नहीं बिक रही है। मर्ज मिटाने की दवा में मोटी कमाई के खेल को समझने के लिए और और उदाहरण सुनिए। सिप्रोफ्लाक्सासिन 500 एम.जी और टिनिडाजोल 600 एम.जी नमक से निर्मित दवा है। जिसे सिपला, सिपलॉक्स टी जेड के नाम से बेचती है। लूज मोसन (दस्त) में यह बहुत की कारगर दवा है। सरकार ने जिन 74 दवाइयों को मूल्य नियंत्रण श्रेणी में रखा है। इस दवा की सरकार द्वार तय बिक्री मूल्य 25.70 पैसा प्रति 10 टैबलेट बताई गई है। मगर देश की सबसे बड़ी कंपनी का दावा करने वाली सिपला इस दवा को पूरे देश में 100 रुपए से ज्यादा में बेच रही हैं। यानी हर 10 टैबलेट वह 75-80 रुपए ज्यादा वसूल कर रही है। मजबूत अधिकार और मानव संसाधानों की कमी के कारण ही दवाओं के मूल्य निर्धारण करने के लिए ही बनी एनपीपीए बिना दांत का शेर साबित हो रहा है। जनता में इस बात को लेकर किसी तरह का जागरूकता नहीं होने से इसकी खिलाफत नहीं होती है। चूंकि मामला जान से जुड़ा होता है, इसलिए हर कीमत पर दवा लेकर लोग जान बचाने की ही सोचते हैं। ऐसी विषम स्थिति में भला कोई दवा विक्रेता से मोल भाव क्यों करे? नियम तो यह है कि केमिस्ट दुकानों में दवा के मूल्य सूची प्रर्दशित होना जरूरी है। लेकिन किसी भी दवा दुकान में झांक लें, इस नियम का पालन नहीं दिखेगा। जो दवा मिलेगी उसपर कोई मोलभाव नहीं। खरीदने की छमता नहीं तो कही भी गुहार पर तत्काल राहत की कोई गुंजाइश नहीं। नियम की दृढ़ता से लागू हो इसके लिए सरकार के पास पर्याप्त निरीक्षक भी नहीं है। जनता गुहार भी लगाना चाहे तो कहां जाए? सीधे एनपपीपीए में लिखित शिकायत की जा सकती है, लेकिन यह प्रक्रिया लंबी है। जनता को तो दवा खरीदते वक्त तत्काल राहत चाहिए। हर किसी को दवा मूल्य नियामक राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के बारे में जानकारी भी नहीं है। जिन्हें जानकारी हैं, वे शिकायत भी नहीं करते हैं। संजय स्वदेश

गुरुवार, मार्च 21, 2013

प्राचीन भाषा की हत्या का उपक्रम

संदर्भ : सिविल सेवा परीक्षा से पाली को हटाना
तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है।
संजय स्वदेश संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम से अंग्रेजी की अनिवार्यता को फिलहाल रोक कर के केंद्र सरकार ने खूब वाहवाही बटोरी। यह खबर कई प्रमुख समाचारपत्रों के प्रमुखता से प्रकाशित हुई। हिंदी प्रेमियों ने खूब स्वागत किया। लेकिन इसी के साथ आयोग ने भारत की प्राचीन भाषा पालि का गला घोंट दिया। किसी को कोनोकान खबर नहीं लगी। पालि भाषा एवं साहित्य अनुसंधान परिषद ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। पर अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है। न कहीं शोर सुनाई दिया और न ही कई कोई बड़ा विरोध। आयोग की परीक्षाओं से अंग्रेजी की अनिवार्यता को हटाने के लिए वर्षों आंदोलन चले। करीब एक दशक पहले की बात है तब आयोग के मुख्य द्वार पर हिंदी समर्थित विरोधियों का एक तंबू हमेशा दिखता था। वहां के बैनर पर यह लिखा होता था कि हिंदी के समर्थन में चलने वाला देश में अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन। एक बार दिल्ली में शाहजहां रोड़ से गुजरते वक्त किसी ने बताया था कि इसके समर्थन में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज उतर चुके हैं। लेकिन कब उस आंदोलन का दम घुट गया और प्रदर्शनकारियों का तंबू हट गया, किसी को कानोकान खबर नहीं चली। ऐसे समय में जब न कोई आंदोलन था और न ही कहीं से कोई दबाव। आयोग ने हिंदी के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर देने की घोषणा कर दी। बात असानी से हजम नहीं होती। जब समाज में अंग्रेजी का भूत भूत सवार हो रहा हो, तब अपने आप आयोग ने आखिर रहमदिली क्यों दिखाया। ढेरों ऐसे प्रतिभाशाली लोग हैं जिन्होंने आयोग की अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण परीक्षा में असफलता की मुंह खाई। लेकिन अन्य क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर पहुंचे। फिलहाल चर्चा, आयोग के पाठ्यक्रम से पालि को हटाने को लेकर है। प्राचीनकाल की जनभाषा और धार्मिक अल्पसंख्यकों बौद्धों की एक मात्र भाषा को हटाने के पीछे आयोग की क्या मंशा रही, इसे न ही उसने बताना उचित समझा और न ही सार्वजनिक रूप से समझाना। पालि भषा के विषय को लेकर सिवलि सेवा की मुख्य परीक्षा देने वाले प्रतिभागियों की संख्या हजारों में है। जिसमें से अधिकतर प्रतिभागी सफलता को प्राप्त करते हैं। मजेदार बात यह है कि सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा में इस भाषा को ऐच्छिक विषय के रूप में चुनने वाले अधिकतर प्रतिभागी दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय से होते हैं। आयोग के कठिन मापदंडों के कारण ही वर्षों से आरक्षित वर्ग के भरपूर अफसर बनाने में पूरी तरह से नकाम रहे हैं। शीर्ष सेवा में सैकड़ों पद आरक्षित वर्ग के रिक्त पड़े हैं। महंगे और पहुंच से दूर पाठ्यक्रमों में दाखिला नहीं मिलने के कारण हर वर्ष हजारों विद्यार्थी पालि और बौद्ध अध्ययन में दाखिला लेते हैं। हालात तो यह है कि एक ओर जहां विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग में सन्नाटा पसरता जा हरा है, वहीं पालि और बौद्ध अध्ययन के विभाग गुलजार होने लगे हैं। इसके बाद भी बिना किसी ठोस तर्क दिए बगैर पालि के प्रति यूपीएससी की मनमानी उसकी साकारात्मक मंशा को जाहिर नहीं करती है। दलित, आदिवासी और पिछड़े हमेशा ही इस बात को लेकर यह शोर मचाते रहे हैं कि जिन कठिन राहों को वे अपनी मेहनत से आसान बना रहे हैं नीति नियंता किसी न किसी तरह से उनके राह में और अड़ंगा डालते हैं। सिविल सेवा परीक्षा से पालि का हटाना देश के उन हजारों युवाओं के सपने तोड़ने जैसा है जो पालि का अध्ययन कर रहे हैं और इस विषय के साथ देश की सर्वोच्च प्रतिष्ठित सेवा क्षेत्र अपनी काबिलियत सिद्ध करना चाहते हैं। सिविल सेवा की परीक्षा में संस्कृत, उर्दू और पंजाबी को अभी भी रखा गया है। जैसे संस्कृत हिंदुओं से, उर्दू मुस्लिमों से तथा पंजाबी सिक्खों से संबंधित है। वैसे ही पालि बौद्ध धर्म के लोगों से संबंधित है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में इनकी संख्या बढ़ रही है। भविष्य में निश्चय ही समाज में इस भाषा की प्रतिष्ठा और रूढ़ होगी। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आज पालि बोलता कौन है? यही सवाल संस्कृत और उर्दू को लेकर भी उठाया जा सकता है। संस्कृत बोलने वाले एक प्रतिशत लोग भी देश में नहीं है। संस्कृत भाषा के प्रति बचे खुचे लोगों का भी मोहभंग हो रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में संचालित संस्कृत के पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी भी नहीं पहुंच रहे हैं। लेकिन पालि भाषा की स्थिति संस्कृत से उलट है। वर्तमान समय में पालि को लगभग 55 विश्वविद्यालयों में पालि एवं बौद्ध अध्ययन विषयों का अध्यपन हो रहा है। विदेशों को छोÞड़कर सिर्फ भारत में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग हर साल दो बार यूजीसी नेट एवं जेआरएफ की परीक्षा पालि भाषा में भी आयोजित करवा रहा है। सभी लगभग 55 विश्वविद्यालयों और उनके संबंद्ध कॉलेजों में स्रातक, एमए, एमफिल, पीएचडी की उपधियां दी जाती है। इसके साथ ही पालि भाषा एवं साहित्य में प्रमाण-पत्र, डिप्लोमा एवं पालि आचार्य की भी उपाधि दी जाती है। इतना ही नहीं वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, बिहार माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं महाराष्टÑ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में भी पालि भाषा विषय की पढ़ाई हाई स्कूल एवं इंटरमीडिएट कक्षाआ में होती है। इसके अलावा देशभर के करीब पचास से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पाली भाषा विभाग संचालित है। पालि भाषा के बिना प्राचीन भारतीय इतिहास को जनाना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी है, क्योंकि पालि भाषा भारत देश की प्राच्य भाषाओं (पालि,प्रकृत व संस्कृत) में से एक महत्पूर्ण भाषा है। ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि ही नहीं बल्कि सार्क देशों और दक्षिणी एशियाई देशों के साथ हमारी विदेश नीतियों को भी यह भाषा प्रभावित करती है। क्योंकि इन देशों में बौद्ध धर्म का प्रभाव ज्यादा है। तमाम सार्थक बिंदुओं की अनदेखी करते हुए केवल पालि भाषा को यूपीएसी की परीक्षा से अचानक हटाने का निर्णय अदूरदर्शिता नहीं है। जिस भाषा से रोजगार उपलबध होती है, वह उतना ही समृद्ध होती है। रोजगार उपलब्ध करा कर ही अंग्रेजी ने हिंदी को मात दे दी। पाली संस्कृत को पछाड़ रही है। ऐसे समय में जब यूपीएससी द्वारा पालि को पाठ्यक्रम से हटाने का निर्णय इसका गला घोंटने से कम नहीं है।

मंगलवार, जनवरी 03, 2012

एक दिन संपादकीय प्रकाशित नहीं होने से क्या होता

संजय स्वदेश मणिपुर में उग्रवादियों से मिल रही लगातार धमकियों के विरोध में मंगलवार, 3 जनवरी को वहां के अखबारों में संपादकीय प्रकाशित नहीं हुए। आॅल मणिपुर वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन के एक प्रवक्ता ने बताया कि विभिन्न गुटों के उग्रवादी अखबारों पर आरोप लगाते हैं कि वे उनके बयानों को जगह नहीं देते हुए उनके विरोधियों से जुड़ी बातों को प्रकाशित करते हैं और इसके लिए ये गुट स्थानीय अखबारों को धमकियां देते हैं।
ऐसी ही एक घटना के तहत एक उग्रवादी गुट ने 2 जनवरी को एक लोकप्रिय दैनिक के परिसर में एक शक्तिशाली ग्रेनेड फेंका था, जिसके साथ एक पत्र भी था। इस पत्र के मुताबिक कि संपादक, यह अंतिम चेतावनी है, अगली बार ग्रेनेड फट जाएगा। प्रवक्ता ने कहा कि यूनियन ने सरकार से मीडिया संस्थानों को उचित सुरक्षा देने को कहा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।
इस खबर को पढ़ कर मुझे आश्चर्य हुआ। जिन अलगावादियों के संरक्षण में राष्टÑीय स्तर की मुख्यधारा की खबरे दबा देने वाले मणिपुर के पत्रकारों को जब अपने ऊपर बात आई तो सरकार संरक्षण मांग रहे हैं। केंद्र सरकार से सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि मणिपुर के अधिकतर पत्र किसी न किसी अलगावादी गुटों के संरक्षण में हैं। अखबार संरक्षण पाने वाले अलगावादी गुट के प्रतिस्पर्धी की नकारात्मक खबरें ज्यादा प्रकाशित करता है तो टकराव होना स्वाभाविक है। खूंखार लोगों से दोस्ती में भला प्रेम की नसीहत कहां मिलती है।
वे शांतिपूर्ण विरोध की करना कहां जानते हैं, वे तो सीधे ग्रेनेड फेंक कर अपनी आवाज सुनाना चाहते हैं। यह घटना अखबारों को संरक्षण देने वाले अलगावादी गुटों की आपसी लड़ाई की एक छोटा का उदहारण भर है।
मणिपुर का चौथा खंभा लोकतंत्र का नहीं, अलगावादियों का पाया बना हुआ है। अब एक अलगावादी गुट दूसरे के पाये को तोड़ कर अपना बर्चस्व दिखाना चाहते हैं।
वर्ष 2009 के उतराद्ध में करीब एक सप्ताह मणिपुर प्रवास पर रहा। स्टॉल पर जो भी अखबार मिले, सब खरीद कर गहनता से पढ़ा। अधिकतर अखबार अंग्रेजी के थे, एक दो असमी और बांग्लाभाषा के मिले जिनके संस्करण बाहर से आए थे। वहां से हिंदी का एक भी पत्र प्रकाशित नहीं हो रहा है। कभी-कभार किसी ब्लॉग पर यह चर्चा होती है कि मणिपुर में हिंदी की पत्रिका निकलती है, पर मुझे मणिपुर में कोई पत्र मिला न पत्रिका मिली। संभव है किसी संस्थान का विभाग हिंदी में पत्रिका निकाल कर पूरे मणिपुर स्तर का होने का शाबासी पाता हो। यहां तक की केबल पर हिंदी चैनल नहीं दिखते हैं। डिश टीवी से दिखते हैं, पर डिश टीवी वाले उपभोक्ताओं की संख्या नागण्य हैं।
मणिपुर के अखबारों में बड़ी खबरे चीन से ज्यादा प्रभावित दिखी। इसके दो कारण हो सकते हैं, या तो वहां के पाठक चीन के खबरों में रुचि रखते है या फिर अखबार जानबूझ कर चीन बातों को मणिपुर के लोगों तक पहुंचा रहे हैं, जिससे कि उनकी मनोदशा पूरी तरह चीन के अनुकूल बनी रहे। खुफिया विभाग कह ही चुका है कि मणिपुर समेत पूर्वोत्तर भारत के अलगावादियों को खूब संरक्षण दे रहा है।
यदि आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि पूर्वोत्तर से बाहर के अखबरों में मणिपुर की जितनी भी खबरें आती हैं, वे अधिकतर सैन्य गतिविधियों की होती है या फिर किसी न किसी तरह से केंद्र सरकार के उपेक्षित व्यवहार का उजागर करने वाली वाली रहती है। जो पत्रकारबंधु किसी समाचार पत्र में किसी एजेंसी की खबरें प्रतिदिन देखते होंगे तो निश्चय ही उन्हें इस बात का आभास होगा कि जिस तरह से गैर-हिंदीभाषी क्षेत्र असम, कोलकाता अथावा उत्तर भारत से जम्मू-कश्मीर, पंजाब आदि की खबरें आती है,कभी भी मणिपुर या पूर्वोत्तर राज्यों की खबरें नहीं आती है। घटनापरक या आयोजन की खबरें तो मिलेगी, पर व्यवस्था की हकीकत रू-ब-रू कराने वाली मणिपुर की खबर कभी नहीं आती है?
दरअसल मणिपुर के अखबार ही नहीं चाहते हैं कि उनकी धरती के लोग राष्टÑ की मुख्यधारा की खबरे पढ़ें। यदि उनकी ऐसी मंसा नहीं होती तो मणिपुर के अखबारों में ऐसी खबरें गायब नहीं रहती। राष्टÑ की मुख्यधारा तो छोड़िये राज्य सरकार पूरी तरह से अलगावादियों के सामने पंगु है। सप्ताह भर मणिपुर प्रवास में कभी ऐसी खबर नहीं मिली कि जो जनहित से जुड़ी और विकास के लिए सरकार को प्रेरित करती हो। जिन खुंखार अलगावादियों को मणिपुरी पत्रकारों ने अपनी कलम की धार से डराया नहीं, अब वे उन पर ही ग्रनेड फेंके तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसके विरोध में यदि पूरे अखबर एक दिन संपादकीय नहीं लिखते हैं तो इससे अलगावादियों हृदय नहीं पसीजने वाला है। उनका एकमात्र मकसद है पूर्वोत्तर की स्वायत्ता।

शनिवार, दिसंबर 31, 2011

भिखारी की गोद में किसका लाल

संजय स्वदेश
ब्लैक एंड ह्वाइट के जमाने में एक फिल्म आई थी बूट पालिस। इस फिल्म में सौतेली मां की क्रूर निर्दयता की कहानी दिल को झकझोरती है। कैसे मासूम बच्चे न चाहते हुए भी भीख मांगने के लिए मजबूर हैं। हालांकि वे इस पेशे को छोड़ना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कहीं से इसके लिए प्रोत्साहन नहीं है। तब समाज में ऐसे लोग थे जो ऐसे नौनिहालों को गले लगाकर अपनी संतान की तरह परवरिश करते थे। लिहाजा, फिल्म का अंत सुखांत होता है। जमाना बदला। स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म आई। नौनिहालों का शोषण धंधे में बदल गया, मगर ऐसे बच्चों को गले लगा कर बचाने वाले नहीं बचे।
भीख मांगने का कारोबार करोड़ों में है। बच्चों को बहला-फुलसलाकर या गरीबों से खरीद कर उन्हें बड़े शहरों में भीख मंगवाने का धंधा तेजी से फलफूल रहा है। ताजा उदाहरण ऐसे शहर का है तो देश और दुनिया में आईटी हब के नाम से प्रसिद्ध बेंगलुरु है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चमक-धमक और विकास की तेज रफ्तार के बीच दूसरे का बचपन बेच मोटी कमाई के धंधा का उजागर हुआ।
दिसंबर के मध्य में बेंगलुरु पुलिस ने भिखारी माफिया के चंगुल से लगभग 3 सौ बच्चों को छुड़ाया। महानगरों की सड़कों पर गरीब मांओं की गोद में भूखे, बीमार, लाचार बच्चे और उनके द्वारा भीख मांगे जाने का दृश्य किस ने नहीं देखा होगा। यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि मासूम अपनी असली मां की गोद में है या किराए पर लाया गया है। बेंगलुरु में जिन बच्चों को पुलिस ने छुड़ाया है, उनमें से अधिकतर दूसरे राज्यों से अपहृत अथवा मां-बाप द्वारा बेच दिए गए या किराए पर दिए गए बच्चे थे। केवल गरीबी के कारण ही बच्चे इस स्थिति में नहीं पहुँच रहे हैं । क्रूरता यह है कि नशा करवाकर मासूमों से भीख मंगवाने का संगठित धंधा चलाकर कुछ अपराधी कानूनी पंजे से दूर ऐश मौज कर रहे हैं।
दो महीने से दो साल तक तक के अबोध बच्चों को नशे का आदी बनाकर फिर किराए की मांओं की गोद में डाल दिया जाता है। ताकि ये भूख से रोएं नहीं या किसी और की गोद में जाने की जिद न करे, बस अचेतन अवस्था में पड़े रहें और इनसे ऐसी स्थिति में रख कर भीख मांगने में आसानी हो। पुलिस ने अब तक सिर्फ 3 सौ बच्चे छुड़ाएं हैं, लेकिन सैकड़ों और बच्चे अभी भी ऐसे गिरोहों के चंगुल में फंसे हो सकते हैं। छुड़ाए गए बच्चों में कर्नाटक के अलावा आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के बच्चे भी थे। इन बच्चों को बेहद बुरी हालत में पुलिस ने पाया। कई घंटे बाद ये बच्चे होश में आ पाए और इनमें से अधिकतर भूखे थे।
आंकड़ों के मुताबिक सालाना साठ हजार बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस के पास दर्ज होती है। इनमें से कितने बच्चे अपने मां-बाप के पास सुरक्षित पहुंचते होंगे, कहना कठिन है। लेकिन यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पुलिस, गैर सरकारी संगठनों व अन्य कल्याणकारी संस्थाओं की मदद जिन बच्चों तक नहीं पहुंच पाती होगी, जिन्हें आपराधिक संगठनों के चंगुल से नही बचाया जाता होगा, उनका भविष्य क्या होता होगा और इनसे बनने वाले देश का भविष्य क्या होगा?
हो सकता है राज्य सरकारों की कार्रवाई से कुछ लोग कानून के फंदे में आ जाएं। किंतु अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी है। एक समाचारपत्र ने अपने संपादकीय में इस घटना पर तीन सवाल उठाया। बच्चों को नशा करवा कर उनसे भीख मंगवाने जैसे गंभीर अपराध करने वालों के लिए कितनी कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि यह केवल भीख मंगवाने का अपराध और मासूमों की जिंदगी की बलि देकर अपनी जेब भरने का धंधा भर नहीं है, बल्कि उन मासूमों को नशे की दुनिया में धकेलने का क्रूर खेल भी है, जिन्होंने अभी ठीक से आंखे खोलकर दुनिया देखना भी नहीं सीखा है।
दूसरा सवाल, गरीबी के कारण समाज में पनपने वाले अपराध को समाजशास्त्रीय, राजनीतिक और आर्थिक नजरिए से परख कर उसका निदान किस तरह नीति-नियंता करेंगे? तीसरा सवाल यह है कि विकास की चमक से चौंधियाई हमारी आंखे समाज में पनप रहे इस अंधकार को कब तक अनदेखा करती रहेंगी?
बेंगलुरु में ऐसे गैंग का पर्दाफाश तब हुआ जब कुछ गैरसरकारी संस्थाओं की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई की। ऐसे गैर-सरकारी संस्थाओं को कार्य समाज में सम्मान के योग्य हैं। इनसे प्रेरणा लेकर व्यक्तिगत स्तर पर भी बच्चों का बचपन बचाने के लिए हरसंभव कोशिश के संकल्प से नये साल का शुभारंभ किया जा सकता है। क्या आप ले रहे हैं बचपन को एक छांव देने के प्रयास का संकल्प ?