संजय स्वदेश
वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में ऐसा लगता है कि दुनिया का सबसे बड़े लोकतंत्र का अंतिम न्यायालय भी न्याययिक प्रक्रिया में आम आदमी के प्रति सहानुभूति खोता जा रहा है। देश की सबसे बड़ी न्यायालय सुप्रीम कोर्ट की यह आलोचना करने वाला कोई और नहीं बल्कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट ही है। न्यायमूर्ति जी.एस. सिंघवी और ए.के गांगुली की खंडपीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश की चुनौति में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत की यह आलोचना की।
दो-तीन दिन पहले की बात है, सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश गांगुली ने रविन्द्र नाथ टैगोर के एक कथन का उदाहरण देते हुए कहा कि वैश्वीकरण और उदारीकरण से हालत ऐसे हो गए हैं जिसमें लोग पागलों की तरह पश्चिमी जीवन शैली की ओर भाग रहे हैं। न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि हमारी न्याय प्रणाली में आम आदमी धीरे-धीरे सरकते हुए हासिये पर आ गए है। अदालती प्रक्रिया आम आदमी की स्थिति और धौर्य को नहीं समझ पाती है। यह स्थिति संवैधानिक रूप से उत्पन्न हुई है। यदि कोई इस स्थिति को बदलना चाहता है तो उसे देश के नजदीक से देखना चाहिए। इसके लिए देश का भ्रमण करने की भी जरूरत है। न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा कि हमारे संविधान का बुनियादी आकार आम आदमी के बदल गया है। संविधान इन्हीं आम आदमी पर शासन के लिए नहीं बना है। पर वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में आम आदमी अनेक समस्याओं के बोझ से लदा हुआ है, जिससे वह विकास की मुख्यधारा से जुडऩे के बजाय हाशिये पर चला गया है।
रविवार, जनवरी 31, 2010
हम आम आदमी दर्द समझने नाकाम : सुप्रीम कोर्ट
शुक्रवार, जनवरी 29, 2010
बाबा बनकर 'गुमनाम' हुए नेताजी?
बाबा बनकर 'गुमनाम' हुए नेताजी?
29 Jan 2010, 1513 hrs
नवभारतटाइम्स.कॉम
नई दिल्ली ।। आजाद भारत का सबसे बड़ा रहस्य एक बार फिर चर्चा में है। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक न
ेताजी सुभाष चंद्र बोस पर बनी एक डॉक्युमेंट्री ने इस मुद्दे को फिर जीवित कर दिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले नेताजी की मृत्यु की जांच पर बने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया था।
कमिशन के अध्यक्ष, जस्टिस मनोज मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि दावों के उलट नेताजी की मृत्यु 1945 में प्लेन हादसे में नहीं हुई थी। मुखर्जी ने डॉक्युमेंट्री बनाने वाले फिल्ममेकर अमलनकुसुम घोष को बताया है कि मुझे अब 'पूरा विश्वास' है कि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में रहने वाले गुमनामी बाबा के भेस में वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे।
हालांकि अपनी रिपोर्ट में मुखर्जी ने गुमनामी बाबा के बोस होने की संभावना को नकार दिया था अलबत्ता उन्होंने यह कहा था कि नेताजी की मृत्यु प्लेन क्रैश में नहीं हुई थी।
मीडिया में आई खबर के मुताबिक, जस्टिस मुखर्जी का यह बयान 'ब्लैक बॉक्स ऑफ हिस्ट्री' नाम की डॉक्युमेंट्री का हिस्सा है जो 18 फरवरी को कोलकाता में दिखाई जाएगी। पता चला है कि मुखर्जी ने दावा किया है कि उन्होंने ये बातें 'ऑफ द रेकॉर्ड' कही थीं और घोष ने उनकी आपसी बातचीत का इस्तेमाल किया है जो कानूनन और नैतिकता के नजरिए से गलत है।
बताया जा रहा है कि डॉक्युमेंट्री में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मुखर्जी 1985 में मरे गुमनामी बाबा से मिले कागजात की जांच की बात करते हुए कहते हैं, 'निजी तौर पर मैं महसूस करता हूं (मेरा नाम न लें) और मुझे 100 फीसदी विश्वास है कि वह (गुमनामी बाबा) ही नेताजी थे।'
उधर, फिल्ममेकर घोष ने मुखर्जी के इस बयान को डॉक्युमेंट्री में इस्तेमाल करने को सही ठहराया है। वह कहते हैं कि, जस्टिस मुखर्जी ने जो कुछ मुझे बताया उसका राष्ट्रीय महत्व है। इसे दो लोगों की आपसी बातचीत नहीं कह सकते। घोष नहीं मानते कि जो उन्होंने किया वह अनैतिक है। बल्कि घोष कहते हैं कि जस्टिस मुखर्जी जैसे व्यक्ति को इतनी अहम बात जनता से छिपानी नहीं चाहिए थी क्योंकि लोगों को नेताजी के बारे में सच जानने का अधिकार है। घोष ने नेताजी और गुमनामी बाबा से जु़ड़े कई लोगों से बातचीत की। घोष का दावा है कि नेपाल के रास्ते नेताजी साधु के भेस में उत्तर प्रदेश पहुंचे और 1983 से फैजाबाद के राम भवन में रहने लगे।
जिन लोगों से बातचीत की गई उनमें हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ क्रिमिनॉलजी के पूर्व अडिशनल डायरेक्टर डॉ. बी. लाल भी शामिल हैं। लाल का कहना है कि गुमनामी बाबा और नेताजी की राइटिंग 'बिल्कुल एक जैसी' थी। गुमनामी बाबा के निजी चिकित्सक डॉ. आर. के. मिश्रा और पी. बंदोपाध्याय के मुताबिक गुमनामी बाबा के पास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कागजात और बोस परिवार की तस्वीरों से भरे 40 बक्से थे। यह कागजात और तस्वीरें नेताजी के अलावा किसी और के पास नहीं हो सकते थे।
29 Jan 2010, 1513 hrs
नवभारतटाइम्स.कॉम
नई दिल्ली ।। आजाद भारत का सबसे बड़ा रहस्य एक बार फिर चर्चा में है। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक न
ेताजी सुभाष चंद्र बोस पर बनी एक डॉक्युमेंट्री ने इस मुद्दे को फिर जीवित कर दिया है। गौरतलब है कि चार साल पहले नेताजी की मृत्यु की जांच पर बने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया था।
कमिशन के अध्यक्ष, जस्टिस मनोज मुखर्जी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि दावों के उलट नेताजी की मृत्यु 1945 में प्लेन हादसे में नहीं हुई थी। मुखर्जी ने डॉक्युमेंट्री बनाने वाले फिल्ममेकर अमलनकुसुम घोष को बताया है कि मुझे अब 'पूरा विश्वास' है कि उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले में रहने वाले गुमनामी बाबा के भेस में वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे।
हालांकि अपनी रिपोर्ट में मुखर्जी ने गुमनामी बाबा के बोस होने की संभावना को नकार दिया था अलबत्ता उन्होंने यह कहा था कि नेताजी की मृत्यु प्लेन क्रैश में नहीं हुई थी।
मीडिया में आई खबर के मुताबिक, जस्टिस मुखर्जी का यह बयान 'ब्लैक बॉक्स ऑफ हिस्ट्री' नाम की डॉक्युमेंट्री का हिस्सा है जो 18 फरवरी को कोलकाता में दिखाई जाएगी। पता चला है कि मुखर्जी ने दावा किया है कि उन्होंने ये बातें 'ऑफ द रेकॉर्ड' कही थीं और घोष ने उनकी आपसी बातचीत का इस्तेमाल किया है जो कानूनन और नैतिकता के नजरिए से गलत है।
बताया जा रहा है कि डॉक्युमेंट्री में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मुखर्जी 1985 में मरे गुमनामी बाबा से मिले कागजात की जांच की बात करते हुए कहते हैं, 'निजी तौर पर मैं महसूस करता हूं (मेरा नाम न लें) और मुझे 100 फीसदी विश्वास है कि वह (गुमनामी बाबा) ही नेताजी थे।'
उधर, फिल्ममेकर घोष ने मुखर्जी के इस बयान को डॉक्युमेंट्री में इस्तेमाल करने को सही ठहराया है। वह कहते हैं कि, जस्टिस मुखर्जी ने जो कुछ मुझे बताया उसका राष्ट्रीय महत्व है। इसे दो लोगों की आपसी बातचीत नहीं कह सकते। घोष नहीं मानते कि जो उन्होंने किया वह अनैतिक है। बल्कि घोष कहते हैं कि जस्टिस मुखर्जी जैसे व्यक्ति को इतनी अहम बात जनता से छिपानी नहीं चाहिए थी क्योंकि लोगों को नेताजी के बारे में सच जानने का अधिकार है। घोष ने नेताजी और गुमनामी बाबा से जु़ड़े कई लोगों से बातचीत की। घोष का दावा है कि नेपाल के रास्ते नेताजी साधु के भेस में उत्तर प्रदेश पहुंचे और 1983 से फैजाबाद के राम भवन में रहने लगे।
जिन लोगों से बातचीत की गई उनमें हैंडराइटिंग एक्सपर्ट और नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ क्रिमिनॉलजी के पूर्व अडिशनल डायरेक्टर डॉ. बी. लाल भी शामिल हैं। लाल का कहना है कि गुमनामी बाबा और नेताजी की राइटिंग 'बिल्कुल एक जैसी' थी। गुमनामी बाबा के निजी चिकित्सक डॉ. आर. के. मिश्रा और पी. बंदोपाध्याय के मुताबिक गुमनामी बाबा के पास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कागजात और बोस परिवार की तस्वीरों से भरे 40 बक्से थे। यह कागजात और तस्वीरें नेताजी के अलावा किसी और के पास नहीं हो सकते थे।
गुरुवार, जनवरी 28, 2010
बुलंदियों पर रहा विदर्भ, महाराष्ट्र ने बरबाद किया
नाग-विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स में परिचर्चा
नागपुर । नाग-विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स में आयोजित 'विदर्भ की बुलंदियां व पतनÓ परिचर्चा में वक्ताओं का मानना था कि विदर्भ की धरोहर और आर्थिक स्थिति प्राचीन काल में अपनी बुलंदियों पर थी। विदर्भ के पतन पर दु:ख व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सन 1956 में मुंबई राज्य तथा 1960 में महाराष्ट्र में इसका विलय हो जाने के बाद विदर्भ क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई।
गोंडकाल से आजादी तक बलवानों का राज
विदर्भ के इतिहास का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने कहा कि गोंड राजा के काल से देश की आजादी तक यहां बलवान लोगों का राज रहा। पशु पालन, खेती एवं व्यापार भरपूर था। धार्मिक ग्रंथो में बहुत सी जगह विदर्भ का उल्लेख हुआ है। रुक्मिणी की कृष्णजी से विवाह, महाभारत में कुंतिपुर का उल्लेख नल-दमयंति की कहानी, रामायण में जनपदास के रूप में विदर्भ का उल्लेख तथा कालिदास की कविता 'मेघदूतम्Ó में यक्ष गंधर्व के संदर्भ में विदर्भ का उल्लेख यह बताता है कि यह कितनी प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है तथा धार्मिक और बुद्धिजीवियों का केंद्र रहा है।
अंग्रेजों के समय भी व्यवसाय बढ़ा
अंग्रेजों के काल में भी यहां के व्यवसाय का खूब विस्तार हुआ। यहां की टीक, सागवन लकड़ी विश्वप्रसिद्ध हुई। जंगलों से लाख का, मैग्नीज आदि का बहुत बड़े रूप में निर्यात हुआ। यहां के कपड़ा मिलों ने सूती कपड़ा क्षेत्र में पूरे देश में अपना नाम कमाया। यहां का वातावरण, लोगों की मेहनत और बुद्धिमत्ता को देखते हुए अंग्रेजों ने भी इसे अपना एक बड़ा प्रशासनिक क्षेत्र बनाया। भौगोलिक रूप से विदर्भ हिंदुस्तान का मध्य क्षेत्र है। यहां के लोग मेहनती व शांत स्वभाव के हैं। यहा का वातावरण एवं ऋतुएं सभी के लिए सहयोगी हैं। यहां का स्थल, रोड, रेल व हवाईं मार्गों से सभी राज्यों से जुड़ा है। यहां पर सभी गांवों में बड़े-बड़े तालाब थे। उच्च किस्म की पशु-संपदा थी। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, वन संपदा तथा खनिज से परिपूर्ण यह क्षेत्र अपने स्थान से 800 कि.मी.क्षेत्र के दायरे में सबसे विकसित क्षेत्र था और यहां के वासियों को इस पर गर्व था। इतनी बुलंदियों पर रहने वाले विदर्भ की गाथा सभी वक्ताओं ने रखी।
महाराष्ट्र में विलय के बाद हुई उपेक्षा
विदर्भ के पतन पर दु:ख व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सन 1956 में मुंबई राज्य तथा 1960 में महाराष्ट्र में इसका विलय हो जाने के बाद विदर्भ क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई। इसका कुछ कारण राज्य सरकार की अनदेखी तथा महाराष्ट्र के अन्य राज्यों से विदर्भ की संस्कृति में फर्क भी महत्वपूर्ण है। वक्ताओं ने कहा कि समय पर विदर्भ के हित में निर्णय नही लेना यहां का बढ़ता हुआ पिछड़ापन यह दर्शाता है कि राज्य सरकार ने यहां पैसा देना तो दूर यहां का पैसा महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों के विकास के लिए किया। कोई न कोई बहाना लेकर यहा की परियोजनाओं को पूर्ण होने नहीं दिया। यहां के विकास को आकड़ों की हेराफेरी में कागजों पर रखा गया। सिंचन के अभाव में यहां का कृषि क्षेत्र खत्म हो गया और किसानों ने आत्महत्या की। मुंबई, पुणे के कारखानों को प्रोत्साहन देकर मुुंबई और उसके आसपास रखा गया। बाहर के लोग आकर वहां बसे मगर विदर्भ में बेरोजगारी हो गई। सारे प्रशासनिक अधिकार मुंबई में केंद्रित रखकर अपना काम कराने के लिए विदर्भ के लोगों की चप्पलें घिस गईं। विदर्भ के हक छीनने वाले लोग जब कभी विदर्भ राज्य की थोड़ी बहुत भी कुछ होने की उम्मीद जगती है तो ये लोग उसमेें अड़ंगा लगाते है और ऐसा जताने की कोशिश करते हैं कि विदर्भवासियों पर अहसान हो रहा है। वक्ताओं का यही निश्कर्ष था कि यदि विदर्भवासी खुशहाली चाहते हैं और आने वाली पीढ़ी को सुनहरा विदर्भ देना चाहते हैं तो उन्हें महाराष्ट्र से विदर्भ को अलग करना ही होगा। जरूरत पड़े तो इसके लिए आंदोलन को और तीव्र करना होगा।
इस अवसर पर हेमंत खुंगर, अध्यक्ष, सुनहरा स्वतंत्र विदर्भ समिति के संयोजक बी.सी. भरतिया, प्रकाश मेहाडिया, महामंत्री मयूर पंचमतिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, अजयकुमार मदान, कोषाध्यक्ष हेमंत रविंद्रकुमार गुप्ता, शब्बर शकीर, प्रकाश जैस, सतीश गायकवाड, राजेश वाधवानी, गजानंद गुप्ता, लालचंद गुप्ता आदि प्रमुखता से उपस्थित थे। ऐसी जानकारी चेंबर के मानद सचिव व समिति के महामंत्री प्रकाश मेहाडिया ने दी।
नागपुर । नाग-विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स में आयोजित 'विदर्भ की बुलंदियां व पतनÓ परिचर्चा में वक्ताओं का मानना था कि विदर्भ की धरोहर और आर्थिक स्थिति प्राचीन काल में अपनी बुलंदियों पर थी। विदर्भ के पतन पर दु:ख व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सन 1956 में मुंबई राज्य तथा 1960 में महाराष्ट्र में इसका विलय हो जाने के बाद विदर्भ क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई।
गोंडकाल से आजादी तक बलवानों का राज
विदर्भ के इतिहास का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने कहा कि गोंड राजा के काल से देश की आजादी तक यहां बलवान लोगों का राज रहा। पशु पालन, खेती एवं व्यापार भरपूर था। धार्मिक ग्रंथो में बहुत सी जगह विदर्भ का उल्लेख हुआ है। रुक्मिणी की कृष्णजी से विवाह, महाभारत में कुंतिपुर का उल्लेख नल-दमयंति की कहानी, रामायण में जनपदास के रूप में विदर्भ का उल्लेख तथा कालिदास की कविता 'मेघदूतम्Ó में यक्ष गंधर्व के संदर्भ में विदर्भ का उल्लेख यह बताता है कि यह कितनी प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है तथा धार्मिक और बुद्धिजीवियों का केंद्र रहा है।
अंग्रेजों के समय भी व्यवसाय बढ़ा
अंग्रेजों के काल में भी यहां के व्यवसाय का खूब विस्तार हुआ। यहां की टीक, सागवन लकड़ी विश्वप्रसिद्ध हुई। जंगलों से लाख का, मैग्नीज आदि का बहुत बड़े रूप में निर्यात हुआ। यहां के कपड़ा मिलों ने सूती कपड़ा क्षेत्र में पूरे देश में अपना नाम कमाया। यहां का वातावरण, लोगों की मेहनत और बुद्धिमत्ता को देखते हुए अंग्रेजों ने भी इसे अपना एक बड़ा प्रशासनिक क्षेत्र बनाया। भौगोलिक रूप से विदर्भ हिंदुस्तान का मध्य क्षेत्र है। यहां के लोग मेहनती व शांत स्वभाव के हैं। यहा का वातावरण एवं ऋतुएं सभी के लिए सहयोगी हैं। यहां का स्थल, रोड, रेल व हवाईं मार्गों से सभी राज्यों से जुड़ा है। यहां पर सभी गांवों में बड़े-बड़े तालाब थे। उच्च किस्म की पशु-संपदा थी। शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, वन संपदा तथा खनिज से परिपूर्ण यह क्षेत्र अपने स्थान से 800 कि.मी.क्षेत्र के दायरे में सबसे विकसित क्षेत्र था और यहां के वासियों को इस पर गर्व था। इतनी बुलंदियों पर रहने वाले विदर्भ की गाथा सभी वक्ताओं ने रखी।
महाराष्ट्र में विलय के बाद हुई उपेक्षा
विदर्भ के पतन पर दु:ख व्यक्त करते हुए वक्ताओं ने कहा कि सन 1956 में मुंबई राज्य तथा 1960 में महाराष्ट्र में इसका विलय हो जाने के बाद विदर्भ क्षेत्र की पूर्ण रूप से उपेक्षा की गई। इसका कुछ कारण राज्य सरकार की अनदेखी तथा महाराष्ट्र के अन्य राज्यों से विदर्भ की संस्कृति में फर्क भी महत्वपूर्ण है। वक्ताओं ने कहा कि समय पर विदर्भ के हित में निर्णय नही लेना यहां का बढ़ता हुआ पिछड़ापन यह दर्शाता है कि राज्य सरकार ने यहां पैसा देना तो दूर यहां का पैसा महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों के विकास के लिए किया। कोई न कोई बहाना लेकर यहा की परियोजनाओं को पूर्ण होने नहीं दिया। यहां के विकास को आकड़ों की हेराफेरी में कागजों पर रखा गया। सिंचन के अभाव में यहां का कृषि क्षेत्र खत्म हो गया और किसानों ने आत्महत्या की। मुंबई, पुणे के कारखानों को प्रोत्साहन देकर मुुंबई और उसके आसपास रखा गया। बाहर के लोग आकर वहां बसे मगर विदर्भ में बेरोजगारी हो गई। सारे प्रशासनिक अधिकार मुंबई में केंद्रित रखकर अपना काम कराने के लिए विदर्भ के लोगों की चप्पलें घिस गईं। विदर्भ के हक छीनने वाले लोग जब कभी विदर्भ राज्य की थोड़ी बहुत भी कुछ होने की उम्मीद जगती है तो ये लोग उसमेें अड़ंगा लगाते है और ऐसा जताने की कोशिश करते हैं कि विदर्भवासियों पर अहसान हो रहा है। वक्ताओं का यही निश्कर्ष था कि यदि विदर्भवासी खुशहाली चाहते हैं और आने वाली पीढ़ी को सुनहरा विदर्भ देना चाहते हैं तो उन्हें महाराष्ट्र से विदर्भ को अलग करना ही होगा। जरूरत पड़े तो इसके लिए आंदोलन को और तीव्र करना होगा।
इस अवसर पर हेमंत खुंगर, अध्यक्ष, सुनहरा स्वतंत्र विदर्भ समिति के संयोजक बी.सी. भरतिया, प्रकाश मेहाडिया, महामंत्री मयूर पंचमतिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, अजयकुमार मदान, कोषाध्यक्ष हेमंत रविंद्रकुमार गुप्ता, शब्बर शकीर, प्रकाश जैस, सतीश गायकवाड, राजेश वाधवानी, गजानंद गुप्ता, लालचंद गुप्ता आदि प्रमुखता से उपस्थित थे। ऐसी जानकारी चेंबर के मानद सचिव व समिति के महामंत्री प्रकाश मेहाडिया ने दी।
बीटी बैंगन के विरोधियों ने जयराम रमेश को घेरा
शवयात्रा निकाली, पुतला जलाया
निर्णय 15 फरवरी से पहले : जयराम रमेश
संजय स्वदेश
नागपुर। बी.टी. बैंगन पर नागपुर में आयोजित महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की जनसुनवाई में हिस्सा लेने आए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बी.टी. बैंगन के विरोधियों ने रास्ता रोक कर नारेबाजी करते हुए देसी बैंगन की शवयात्रा निकाली और पुतला फंूका। प्रदर्शन को देखते हुए पर्यावरण मंत्री खुद विरोधियों का समझाने के लिए कार से उतरे।
उत्तर अंबाझरी रोड स्थित आई.एम.ए. सभागृह बी.टी. बैगन की जनसुनवाई के दौरान खचाखच भरा हुआ था। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आए वैज्ञानिक, किसान, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कई लोगों के तर्क सुनने के बाद पर्यावरण मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि बी.टी. बैंगन पर अपना निर्णय वे 15 फरवरी से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप देंगे। जनसुनवाई के दौरान अधिकतर लोगों ने बी.टी. बैंगन के विरोध में तर्क देते हुए इसे देसी बैंगन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया। भारत में बी.टी. बैंगन के बीज बेचने वाली कंपनी कृभको के वैज्ञानिकों ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। विदर्भ के किसान नेता शरद जोशी ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बीज पद्धति और उत्पादन में तकनीक का उपयोग आज जरूरत है। शरद जोशी के पक्ष में 5 जीप और 5 टैक्सी में लोग आए थे। शरद जोशी के भाषण के दौरान वे बी.टी. के पक्ष में नारे लगा रहे थे। कॉटन रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी बी.टी. बैंगन के पक्ष में तर्क रखा। हाईस्कूल तक के पाठ्यक्रमों में जैविक खेती के विषय में पढ़ाया जाता है। फिर यहां रासायनिक उपयोग से तैयार बीज से खेती करने की बात की जा रही है। इससे एक विरोधाभास उत्पन्न हो रहा है।
कीड़े मारने की दवा के लिए हो शोध
लेकिन जनसुनवाई के दौरान बी.टी. बैंगन विरोधियों की आवाज बुलंद रही।
कृषि विशेषज्ञ शरद निंबालकर ने कहा कि देश के किसान वर्षों से देसी बैंगन उगा रहे हैं। केवल कीड़े मारने के लिए पूरे बीज को बदल कर उसे अनुवांशिक बनाना ठीक नहीं है। अभी जो बीज तैयार हुआ है कि उस पर 10-15 साल का ही शोध हुआ है। इसका असर अगली पीढ़ी पर क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है। केवल वैज्ञानिक तरीके से कीड़े मारने के लिए बीज बदलने के बजाय देश के वैज्ञानिकों को नई दवाओं की खोज करनी चाहिए। इससे देसी बीज के उपयोग से ही उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और किसानों को लाभ हो सकता है।
मनुष्य की प्रजनन क्षमता पर असर
मध्यप्रदेश से आए सामाजिक कार्यकर्ता जयंत वर्मा ने कहा कि बी.टी. के रूप में ऐसा बीज दिया जा रहा है जो कीटनाशक होगा। लेकिन उसका मानव स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा, इसका परीक्षण नहीं किया गया है। विदर्भ में बी.टी. कॉटन उगाने वाले किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की। लेकिन इस पर जनसुनवाई नहीं हुई। फिर बी.टी. पर जनसुनवाई क्यों हो रही है? डा. स्नेहलता वर्मा ने कहा कि अनुवांशिक आधार पर तैयार बी.टी. बैंगन से मनुष्य की प्रजनन क्षमता के अलावा शरीर के अन्य भागों पर भी असर पड़ सकता है।
तीन घंटे की सुनवाई में विरोध ज्यादा
तीन घंटे की जनसुनवाई में एक घंटा किसानों के लिए, 45 मिनट वैज्ञानिकों के लिए, बाकी समय सामाजिक कार्यकर्ता व अन्य के लिए निर्धारित था। ज्ञात हो कि बीटी बैंगन यानी जेनेटिकली मोडिफाइड बैंगन को बीते साल जैसे ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने किसानों तक पहुंचाने का फैसला किया, किसानों और कार्यकर्ताओं ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। सरकार को फरवरी तक बीटी बैंगन के मामले में अंतिम निर्णय लेना है इसलिए पर्यावरण मंत्री कई राज्यों का दौरा कर रहे हैं।
अगली सुनवाई चंडीगढ़ में
देश भर में छह जगहों पर जनसुनवाई होनी है। भुवनेश्वरी, कोलकाता और अहमदाबाद के बाद नागपुर में जनसुनवाई के बाद चंडीगढ़, बंगलुरु और हैदराबाद में जनसुनवाई आयोजित होनी है। हर जनसुनवाई में पर्यावरण मंत्री का विरोध हो रहा है। विरोध में किसान बढ़-चढ़ का हिस्सा ले रहे हैं। वैज्ञानिकों का एक तबका भी इस बैंगन का विरोधी है।
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निर्णय 15 फरवरी से पहले : जयराम रमेश
संजय स्वदेश
नागपुर। बी.टी. बैंगन पर नागपुर में आयोजित महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की जनसुनवाई में हिस्सा लेने आए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का बी.टी. बैंगन के विरोधियों ने रास्ता रोक कर नारेबाजी करते हुए देसी बैंगन की शवयात्रा निकाली और पुतला फंूका। प्रदर्शन को देखते हुए पर्यावरण मंत्री खुद विरोधियों का समझाने के लिए कार से उतरे।
उत्तर अंबाझरी रोड स्थित आई.एम.ए. सभागृह बी.टी. बैगन की जनसुनवाई के दौरान खचाखच भरा हुआ था। इसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आए वैज्ञानिक, किसान, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। कई लोगों के तर्क सुनने के बाद पर्यावरण मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि बी.टी. बैंगन पर अपना निर्णय वे 15 फरवरी से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप देंगे। जनसुनवाई के दौरान अधिकतर लोगों ने बी.टी. बैंगन के विरोध में तर्क देते हुए इसे देसी बैंगन और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया। भारत में बी.टी. बैंगन के बीज बेचने वाली कंपनी कृभको के वैज्ञानिकों ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। विदर्भ के किसान नेता शरद जोशी ने बी.टी. के पक्ष में तर्क दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक बीज पद्धति और उत्पादन में तकनीक का उपयोग आज जरूरत है। शरद जोशी के पक्ष में 5 जीप और 5 टैक्सी में लोग आए थे। शरद जोशी के भाषण के दौरान वे बी.टी. के पक्ष में नारे लगा रहे थे। कॉटन रिसर्च के वैज्ञानिकों ने भी बी.टी. बैंगन के पक्ष में तर्क रखा। हाईस्कूल तक के पाठ्यक्रमों में जैविक खेती के विषय में पढ़ाया जाता है। फिर यहां रासायनिक उपयोग से तैयार बीज से खेती करने की बात की जा रही है। इससे एक विरोधाभास उत्पन्न हो रहा है।
कीड़े मारने की दवा के लिए हो शोध
लेकिन जनसुनवाई के दौरान बी.टी. बैंगन विरोधियों की आवाज बुलंद रही।
कृषि विशेषज्ञ शरद निंबालकर ने कहा कि देश के किसान वर्षों से देसी बैंगन उगा रहे हैं। केवल कीड़े मारने के लिए पूरे बीज को बदल कर उसे अनुवांशिक बनाना ठीक नहीं है। अभी जो बीज तैयार हुआ है कि उस पर 10-15 साल का ही शोध हुआ है। इसका असर अगली पीढ़ी पर क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है। केवल वैज्ञानिक तरीके से कीड़े मारने के लिए बीज बदलने के बजाय देश के वैज्ञानिकों को नई दवाओं की खोज करनी चाहिए। इससे देसी बीज के उपयोग से ही उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और किसानों को लाभ हो सकता है।
मनुष्य की प्रजनन क्षमता पर असर
मध्यप्रदेश से आए सामाजिक कार्यकर्ता जयंत वर्मा ने कहा कि बी.टी. के रूप में ऐसा बीज दिया जा रहा है जो कीटनाशक होगा। लेकिन उसका मानव स्वरूप पर क्या असर पड़ेगा, इसका परीक्षण नहीं किया गया है। विदर्भ में बी.टी. कॉटन उगाने वाले किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की। लेकिन इस पर जनसुनवाई नहीं हुई। फिर बी.टी. पर जनसुनवाई क्यों हो रही है? डा. स्नेहलता वर्मा ने कहा कि अनुवांशिक आधार पर तैयार बी.टी. बैंगन से मनुष्य की प्रजनन क्षमता के अलावा शरीर के अन्य भागों पर भी असर पड़ सकता है।
तीन घंटे की सुनवाई में विरोध ज्यादा
तीन घंटे की जनसुनवाई में एक घंटा किसानों के लिए, 45 मिनट वैज्ञानिकों के लिए, बाकी समय सामाजिक कार्यकर्ता व अन्य के लिए निर्धारित था। ज्ञात हो कि बीटी बैंगन यानी जेनेटिकली मोडिफाइड बैंगन को बीते साल जैसे ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने किसानों तक पहुंचाने का फैसला किया, किसानों और कार्यकर्ताओं ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। सरकार को फरवरी तक बीटी बैंगन के मामले में अंतिम निर्णय लेना है इसलिए पर्यावरण मंत्री कई राज्यों का दौरा कर रहे हैं।
अगली सुनवाई चंडीगढ़ में
देश भर में छह जगहों पर जनसुनवाई होनी है। भुवनेश्वरी, कोलकाता और अहमदाबाद के बाद नागपुर में जनसुनवाई के बाद चंडीगढ़, बंगलुरु और हैदराबाद में जनसुनवाई आयोजित होनी है। हर जनसुनवाई में पर्यावरण मंत्री का विरोध हो रहा है। विरोध में किसान बढ़-चढ़ का हिस्सा ले रहे हैं। वैज्ञानिकों का एक तबका भी इस बैंगन का विरोधी है।
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सोमवार, जनवरी 25, 2010
हैपी बर्थ डे टू टाइगर...
चिरी, जान, ली का धूमधाम से मना जन्मदिनसंजय स्वदेश
नागपुर के महाराजबाग प्राणी उद्यान में शनिवार की शाम तीन शावकों का जन्मदिन कुछ अनोखे अंदाज में मनाया गया। केरी, जॉन और ली नाम के तीनों बाघ एक साल पहले चंद्रपुर के जंगल से महाराजबाग में लाए गए थे। तीनों शावकों की मां को किसी शिकारी ने मार दिया था, इसलिए ये जंगल में अनाथ घूम रहे थे।
शनिवार को इन्हें देखने के लिए बड़ों के साथ-साथ बच्चों का हुजूम उमड़ पड़ा। महाराजबाग में इनका जन्मदिन मनाने के लिए विशेष व्यवस्था भी कर रखी थी। यहां आए नन्हे-मुन्ने अपनी तोतली भाषा में हैपी बर्थ डे टू टाइगर... गा रहे थे। हाथों में गुब्बारे लिये उत्साहित होकर तीनों बाघों की अठखेलियां देख रहे थे।
महाराजबाग में प्रभारी अनिल बारस्कर ने बताया कि ठीक एक साल पहले जब तीनों शावकों को यहां लाया गया था, तब वे पूरी तरह से बदहाल थे। इनकी जीने की संभावना बहुत कम थीं। महाराजबाग के कर्मचारियों ने रात-दिन इनकी सेवा कर इन्हें स्वस्थ बनाया। किसी शिकारी ने इनकी मां को मार दिया था। जंगल में ये तीनों शावक अनाथ घूम रहे थे। बारस्कर ने बताया कि जब ये यहां आए थे, तब तीन किलो के थे। इनके पास जाने वाले हर व्यक्ति की गोद में बैठ जाते थे। हर महीने आधा किलो इनका वजन बढ़ते गया। अब ये 60 किलो के हैं। पूरी तरह से स्वस्थ।
खेला फुटबॉल
तीनों का जन्मदिन मनाने के लिए महाराजबाग में विशेष व्यवस्था की गई थी। हैपी बर्थ डे थ्री इडियट्स लिखा हुआ बैनर और तीनों बाघों के पुराने फोटो लगे थे। तीनों शावक अब बाघ हो चुके हैं। महाराजबाग के कर्मचारियों ने इनके जन्मदिन के लिए विशेष भोजन के रूप में मांस की व्यवस्था की गई थी। इस बीच उनके पास किसी ने एक फुटबॉल फेंक दी। फुटबाल देखते ही केरी, जॉन और ली यह भूल गए कि उनके लिए विशेष भोजन परोसा जा चुका है और वे फुटबाल खेलने में व्यस्त हो गए। जब फुटबॉल से दिल भर गया तो मांस पर टूट पड़े।
बच्चों ने काटा थ्री इडियट्स का केट
पिंजरे से बाहर एक बड़े केक को बच्चों के हाथों कटवाया गया। बच्चों के साथ-बड़ों ने भी बाघों के जन्मदिन का केक खाया। यहां आए सभी बच्चे खासे उत्साहित थे। एक बाघ के जन्मदिन में शामिल होने की खुशी उनके चेहरे पर कुछ अलग
ही अंदाज में दिख रही थी। केक पर प्रतीक रूप में शिकारी का फोटो बना हुआ था क्योंकि इन तीनों बाघों की मां को शिकारी ने मार कर अनाथ कर दिया था। महाराजबाग के प्रभारी अनीस बारस्कर ने बताया कि जंगली जीवों के संरक्षण का संदेश देने के उद्देश्य से ही तीनों बाघों का जन्मदिन इस अंदाज में मनाया गया। शायद यह पहला मौका है जब किसी प्राणी उद्यान में तीन बाघों का जन्मदिन मनाया जा रहा हो और बच्चे उसके जन्मदिन की गीत गा रहे हों।
रविवार, जनवरी 24, 2010
विदेशी मेहमानों के साथ मराठी में बात करेंगे महारास्ट्र के मंत्री
राज्य की नयी संस्कृति नीति की घोषणा १ माय को
संजय स्वदेश
महाराष्ट्र में टैक्सी लाईसेंस के लिए मराठी भाषा के अनिवार्य होने का मुद्दा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार ने एक नई विवादास्पद नीति प्रकाश में आई है। 1 मई से लागू होनेवाली राज्य की नई सांस्कृतिक नीति के मुताबिक अब राज्य के मंत्री विभिन्न कार्यक्रमों में मराठी में ही बातचीत करेंगे। यदि कार्यक्रम में विदेशी अतिथि भी हो, तो भी मराठी भाषा में ही बातचीत करनी होगी। मेहमनों की भाषा को समझने के लिए दोभाषिये का सहयोग लिया जाएगा।
ज्ञात हो कि गत बुधवार को राज्य सरकार ने नई नीति के तहत यह घोषणा की कि टैक्सी का लाईसेंस लेने के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता के साथ-साथ राज्य में 15 साल से निवास करने का प्रमाणपत्र आवश्यक होगा। पर राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे उछलने के कारण फिलहाल फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। शुक्रवार को राज्य की सांस्कृति नीति का एक नया प्रस्ताव मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को सौंपा गया है, जिसमें मराठी भाषा और मराठी संस्कृति के प्रचार के लिए विभिन्न नीतियों का मसौदा है। इस नीति की घोषणा 1 मई को राज्य स्थापना दिवस के मौके पर होगा।
इस नीति को तैयार करने के लिए गत वर्ष अगस्त माह में डा. एक.एस. सलुंके की एक कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने राज्य की भाषा के प्रचार व प्रसार के लिए भाषा भवन बनाने के प्रस्ताव के साथ ही केंद्र व राज्य सरकार के कार्यालयों में हिंदी अधिकारियों की तर्ज पर राज्य में मराठी अधिकारियों की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा रंगमंच और ललित कला को प्रोत्साहन के लिए भी विशेष प्रस्ताव दिये गए हैं।
संजय स्वदेश
महाराष्ट्र में टैक्सी लाईसेंस के लिए मराठी भाषा के अनिवार्य होने का मुद्दा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि राज्य सरकार ने एक नई विवादास्पद नीति प्रकाश में आई है। 1 मई से लागू होनेवाली राज्य की नई सांस्कृतिक नीति के मुताबिक अब राज्य के मंत्री विभिन्न कार्यक्रमों में मराठी में ही बातचीत करेंगे। यदि कार्यक्रम में विदेशी अतिथि भी हो, तो भी मराठी भाषा में ही बातचीत करनी होगी। मेहमनों की भाषा को समझने के लिए दोभाषिये का सहयोग लिया जाएगा।
ज्ञात हो कि गत बुधवार को राज्य सरकार ने नई नीति के तहत यह घोषणा की कि टैक्सी का लाईसेंस लेने के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता के साथ-साथ राज्य में 15 साल से निवास करने का प्रमाणपत्र आवश्यक होगा। पर राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे उछलने के कारण फिलहाल फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। शुक्रवार को राज्य की सांस्कृति नीति का एक नया प्रस्ताव मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को सौंपा गया है, जिसमें मराठी भाषा और मराठी संस्कृति के प्रचार के लिए विभिन्न नीतियों का मसौदा है। इस नीति की घोषणा 1 मई को राज्य स्थापना दिवस के मौके पर होगा।
इस नीति को तैयार करने के लिए गत वर्ष अगस्त माह में डा. एक.एस. सलुंके की एक कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने राज्य की भाषा के प्रचार व प्रसार के लिए भाषा भवन बनाने के प्रस्ताव के साथ ही केंद्र व राज्य सरकार के कार्यालयों में हिंदी अधिकारियों की तर्ज पर राज्य में मराठी अधिकारियों की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा रंगमंच और ललित कला को प्रोत्साहन के लिए भी विशेष प्रस्ताव दिये गए हैं।
शनिवार, जनवरी 23, 2010
मैं जिंदा हूं, वी विल कम टू इंडिया

संजय स्वदेश
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धरती के मानचित्र पर भारत सबसे अधिक रहस्यमय देश हैं. भारत में ऐसे कई पात्र ऐसे हैं जो संसार के रंगमंच से कभी विदा ही नहीं हुए. इसमें रामायण और महाभारत काल के कुछ पात्र आज भी उपस्थित माने जाते हैं. नेताजी ऐसे ही चरित्र हो गये हैं. आजादी के रंगमंच का एक ऐसा नायक जो आता तो है लेकिन जिसके जाने का कोई प्रमाण नहीं मिल पाता है.
नेताजी सुभाषचंद्र बोस। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक। ऐसा महानायक जिसका कद महत्मा गांधी से भी ज्यादा उंचा था। पर गांधी के नेहरू प्रेम से देश की राजनीति की ऐसी धारा बही कि इस महानयक को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया गया। आजादी के छह दशक बाद भी सरकार इस महानायक के मौत के रहस्य से परदा उठाने में कभी गंभीर नहीं रही। समय-समय पर अनेक विवाद हुए। पर जांच आयोग से मामला ठंडे बस्ते में दम दोड़ चुका है। 23 जनवरी 2010 को नेताजी की 113वीं जयंती है। नेताजी की अब तक जिवीत रहने की संभावना बहुत कम बचती है। पर नेताजी के मौत या उनके गायब होने के रहस्य जानने के लिए लोगों में हमेशा उत्सुकता रही है।

एनडीए सरकार के कार्यकाल में गठित मुखर्जी आयोग ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, उसे यूपीए सरकार ने अपने कार्यकाल में खारिज कर दिया गया था। महानायक के मौत के रहस्य से परदा हमेशा कभी नहीं हटा। बार-बार यह बात उठी कि आखिर ताइवान में 18 अगस्त 1945 को कोई विमान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ तो नेताजी अचनाक कहां गायब हो गये? कुछ वर्ष पूर्व यूपीए सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट यह कह कर खारिज कर दिया था कि उसमें कुछ भी नया नहीं है। जो बातें मुखर्जी आयोग ने कही हैं, वैसी बातें पहले भी होती रही है और उस पर काफी चर्चा हो रही है। लेकिन तब विवाद इस बात पर ज्यादा हुआ था कि मुखर्जी आयोग को अपनी जांच पूरी करने में सरकार की कई एजेसियों ने सकारात्मक रवैया नहीं अपना। यहां तक कि सरकार ने आयोग को रूस जाने तक की अनुमति नहीं दी गई थी।
सरकारी गलियारे में दबती है शोर
इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है कि देश की आजादी में अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले वीर योद्धा का अस्तित्व कहां खो गया यह आजाद भारत के छह दशक से भी ज्यादा समय में नहीं पता लगाया जा सका। किसी भी राष्ट्र के स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनी ऐतिहासिक धरोहर होती है। आने वाली पीढिय़ां इन्हीं के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए एक अपने देश के लिए सोचती हैं, कुछ करती हैं और किसी विशेष दिवस पर उनकी यादों को ताजा कर गौरवांवित होती है, एक ताकत पाती है। पर वर्तमान पीढ़ी बहुत प्रोफेसनल है। उस याद नेताजी के आदर्श से कुछ लेना नहीं है। उन्हें इतिहास तक सीमित रखना चाहती है। जिन्हें रुचि है, वे समय-समय पर नेताजी के मौत से परदा उठाने और उनके बिरासत को सहेजने की बात उठाते हैं। उनका शोर सरकारी गलियारे में दब जाता है।

खबर के लिए रिपोर्टर कानून तोड़ते हैं
मुखर्जी आयोग का कहना था कि उसके जांच में ताईवान के अलावा किसी देश से भी सहयोग नहीं मिला। 1946 में सुभाष चंद्र बोस जिंदा थे। उन्हें रूस में देखा गया था, लेकिन इस दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। लेकिन जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए से अधिकृत जानकारी मिली थी कि १८ अगस्त १९४५ में ताईवान के ताईहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं था। लेकिन अमेरिका के एक अखबार शिकागों ट्रिब्यून के रिपोर्टर अल्फ्रेड बेक ने ताईहाकू हवाई अड्डे का पर दुर्घटना से संबंधित कुछ तस्वीर पेश कि थी। तब खोसला आयोग के सामने इस चित्र से संबंधित प्रमाणिकता साबित नहीं हो पाई थी। इस चित्र को प्रस्तुत करने वाले रिपोर्टर का खुद कहना था कि उस हवाई अड्डे पर चित्र खिंचना प्रतिबंधित था, तो फिर उसने कैसे ये फोटो ले लिये? पर यह कहकर रिपोर्टर की फोटो को खारीज नहीं किया जा सकता था। क्योंकि रिपोर्ट ऐसे की चुनौतीपूर्ण कार्यों को अंजाम देते हैं। इसके लिए चोरी-छिपे कानूनी नियमों के सामने आंख मुंद लेते हैं।
कहीं जापान का षडयंत्र तो नहीं?विमान दुर्घटना प्रकरण में एक और बात गौर करने वाली यह है कि नेताजी की विमान दुर्घटना में हुई मौत का समाचार सबसे पहले जापानी रेडियों ने प्रसारित किया था। और उसके बाद कई ऐसे दलीले मिली जिससे नेताजी के जिंदा होने पर बल मिला। इससे यह भी लगता है कि जपान ने एक सुनियोजित योजना के तहत नेताजी को मृत घोषित किया, क्योंकि ब्रिटिश सेना को नेताजी की सरगर्मी से तलाश थी। हो सकता हो कि जपान के द्वितीय विश्व युद्ध में हार जाने बाद के ब्रिटिश सेना द्वारा उन्हें जापान में खोजने की कार्यवाही से बचना चाहता हो। इसलिए उसने रेडियों से उन्हें मरने की खबर प्रसारित कर दी हो।

गुप्त मिशन से कहीं मंचुरिया तो नहीं गये
पूर्व में गठित खोसला आयोग ने यह साबित किया था कि नेताजी शुरू से ही सोवियत संघ जाना चाहते थे और सोवियत संघ से ही भारत की आजादी का संघर्ष चलाना चाहते थे। लेकिन उनका सोवियत संघ से पहले जर्मनी पहुंचना जरूरी थी। क्योंकि उनको सहायता के लिए पहले ही जर्मनी से आश्वासन मिल चुका था। इतिहास के मुताबिक उन दिनों जर्मनी में भारत के हजारों सैनिक कैद थे। जर्मनी के शासकों ने नेताजी को आश्वासन दिया था कि वे इन भारतीय सैनिकों को कैद से रिहा कर देंगे जिनका उपयो नेताजी अपनी आजाद हिंद फैज में कर सकते थे। इसी सहायता से उन्होंने अंग्रेजी सेनाओं का जमकर मुकाबला भी किया। लेकिन जब द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी और जापान हार के कगार पर पहुंचने लगे तो इसका सीधा प्रभाव आजाद हिंद फौज पर पड़ा। तब नेताजी ने एक गुप्त योजना के मुताबिक रूस की यात्रा पर जाने की तैयारी कर लिया। जिस विमान से वह सफर कर रहे थे व दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें नेताजी की मौत हो गई। लेकिन कई दस्तावेज अब भी खोसला आयोग पास है, जिसके मुताबिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने इस गुप्त मिशन के चलते मंचूरियां तक पहुंच गए थे। बाद में मंचूरिया को रूसी सेनाओं ने जापान से छीन लिया और वहां के सैनिकों को उन्होंने बंदी बना लिया जिसमें नेताजी भी थे। फिर बंदी सैनिकों को रूस ले जाया गया, जहां उन खतरनाक जेलों में डाल दिया गया, जहां से कैदियों को सिर्फ मरने की खबर आती है। इसी प्रकरण में कहा जाता है कि नेताजी को स्टॉलिन ने फांसी दे दी थी।
पत्र लिखा, तो जवाब नहीं आया
नेताजी के एक भतीजे अभियनाथ बोस ने खोसला आयोग को यह बयान दिया था कि एक बार उन्हें एक ब्रिटिश राजनयिक ने फोन पर बताया कि १९४७ में नेताजी के साथ रूसी अधिकारियों ने बहुत ही बुरा बर्ताव किया था। उनके पिता यानी नेताजी के भई शरद चंद्र बोस ने १९४९ में अपने बेटे से कहा था कि उन्हें कुछ कूटनीतिक सूत्रों के जरिए पता चला है कि सोवियत संघ में नेताजी को साइबेरिया के यातना शिविर में रख गया था और १९४७ में स्टालिन ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया था। कहा जाता है कि नेताजी के बड़े भाई शरदचंद्र बोस ने इस संबंध में तत्कालीन गृहमंत्री बल्लभ भाई पटेल को सूचित किया था और पेटल ने इस बात की सारी जानकारी प्राप्त करने के लिए मास्कों में तत्कालीन भारतीय राजदूत डॉ. राधाकृष्णनन को एक पत्र लिखा। डॉï राघाकृष्णन ने गृहमंत्री के पत्र का कोई जवाब नहीं दिया।
निष्कर्ष पर नहीं पहुची कमेटी
मुखर्जी आयोग से पहले नेताजी की मृत्यु से रहस्य से पर्दा उठाने के लिए मुखर्जी आयोग से पहले शाहनवाज कमेटी और बाद में गठित खोसला आयोग कमेटी किसी भी निष्कर्ष में पर नहीं पहुंची। खोसला आयोग ने भी यह कह कर रहस्य को और गहरा दिया कि विमान दुर्घटना में नेताजी के मरने का भी कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। किसी भी आयोग को आज तक ऐसा कोई प्रमाण हाथ नहीं लगा जो यह साबित कर सके कि जिस विमान में नेताजी सफर कर रहे थे, उसमें उन्हें बैठते हुए देखा गया था।
नेता जी ने कहा था
आयोग का यह दावा को इससे भी पुष्ठिï होती है कि भारतीय राष्ट्रीय सेना के एक सिपाही निजामुद्दीन का यह कहना है कि जब नेताजी के मौत की खबर प्रसारित हुई, तब उसके बाद उन्होंने खुद नेताजी का वायरलेस संदेश ग्रहण किया था, जिसमें उन्होंने कहा था - मैं जिंदा हूं, वी विल कम टू इंडिया। लेकिन नेताजी की बेटी अनिता पैफ ने पिछले साल भारत यात्रा के दौरान साफ कहा था कि उन्हें यकीन है कि उनके पिता का निधन विमान हादसे में हो चुका है।
डीएनए टेस्ट का विचार बुरा नहीं विवाद इतना उलझ गया है कि हर पक्ष से विश्वसनीयता उठ चुकी है। जपान में रखी नेताजी की अस्थियों की असलियत पर संदेह उठने लगा है तो सरकार नेताजी की अस्थियों की डीएनए डेस्ट करार उसका मिलान उनकी बेटी से करने का विचार क्यों नहीं करती है? क्योंकि नेताजी की रहस्यमई मौते से पर्दा उठाने पर ही देश की आजादी के इतिहास से नेताजी और उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना के योगदान को और गौरव दिलाया जा सकता है।
... और आज के दिन यह खबर आई
हर साल 23 जनवरी पर नेताजी के विषय पर कुछ न कुछ खास समाचार प्रकाशित होता है। आज 23 जनवरी, 2010 को प्रकाशित खबर के मुताबिक थाईलैंड में रहने वाले त्रिलोक सिंह चावला आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दो पिस्तौलों को सहेजकर रखे हुए हैं। वह अपने जीते जी नेताजी की यह अमानत भारत सरकार को सौंपना चाहते हैं। नेताजी के सचिव रहे 89 वर्षीय त्रिलोक ने इस संबंध में बात करने के लिए अपने बेटे संतोष सिंह चावला को दिल्ली भेजा है। संतोष विगत दो हफ्तों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने की कोशिश में हैं, ताकि इन दोनों पिस्तौलों को सरकार को सौंपकर अपने पिता की अधूरी ख्वाहिश पूरी कर सकें। बैंकॉक से बातचीत में त्रिलोक ने कहा कि नेताजी चाहते थे कि आजादी के बाद मैं उन्हें ये दोनों पिस्तौलें लाल किले में लौटा दूं। मुझे इन हथियारों को सौंपने के आठ दिन बाद ही एक विमान हादसे में उनके निधन की खबर आई। मैं अभी भी नहीं मानता कि नेताजी हमारे बीच नहीं हैं और मैं आज तक उनकी राह देख रहा हूं। परंतु उम्र बढऩे के साथ अब चाहता हूं कि उनकी अमानत को अपने मुल्क को ही सौंप दिया जाए। भारत सरकार इन पिस्तौलों को स्वीकार करने में अनिच्छुक दिखती है और इसकी वजह भी नहीं पता। इन्हें वापस लेने के लिए भारत सरकार को थाईलैंड सरकार से सीधे संपर्क साधना चाहिए।
शुक्रवार, जनवरी 22, 2010
मत्सय और दुग्ध व्यवसाय का हब बन सकता है भारत

21वीं सदी शिक्षा के प्रबंधन का युग: डा.कलाम
संजय स्वदेश
नागपुर। महाराष्ट्र पशु एवं मत्शय विज्ञान विश्वविद्यालय के चौथे दीक्षांत समारोह में पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने कहा कि भारत डेयरी और मत्सय क्षेत्र में दुनिया का बड़ा हब बन सकता है। नागपुर के उत्तर अंबाझरी रोड़ स्थित एलएडी कॉलेज परिसर आयोजित समारोह में पशु और मत्सय विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री लेने वाले डॉक्टरों से आह्वान किया कि वे तकनीक का सहारा लेकर डेयरी क्षेत्र में एक नई क्रांति करें। डा. कलाम ने कहा कि पशु वैद्यकिय क्षेत्र में शोध का स्तर बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके शिक्षण में तकनीक का उपयोग होना चाहिए। विज्ञान को तकनीकी से जोडऩा चाहिए। क्योंकि तकनीक देश की आर्थिक स्थिति से जुड़ी है। वर्तमान सदी शिक्षा के प्रबंधन की शदी है। उन्होंने डॉक्टरों से डेयरी तकनीकी के सहारे राष्ट्रीय दुग्ध मिशन की मजबूती के लिए उन्होंने दुध के उत्पादन बढऩे का अह्वान किया।
डा. कलाम ने कहा कि देश में पशुओं की नस्ल सुधारने की जरूरत है। देश में 200 मिलियन पशु है। इस मामले में भारत दुनिया में बहुत बड़ा देश है। पर इसके बाद भी देश में दुध उत्पादन कम होता है। डा. कलाम ने बाबा बसरैया महाराज का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे बसरैया महाराज ने पशुओं के सहारे आदिवासियों की सेवा की। उन्हें नि:शुल्क दुध पिलाया। उन्होंने बताया कि ऐसी कई कहानी है जिसमें पशुओं के सहारे किसानों की जीवन सुधर गई। देश में खेती सीमित हुई है, इससे पशुओं के चारे पर असर पड़ा है। पशुओं को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पा रहा है। डा. कलाम ने कहा कि इसके लिए किसानों का आवश्यक प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। मत्सय क्षेत्र पर चर्चा करते हुए डा. कलाम ने कहा कि भारत दुनिया में मछली उत्पादन में अग्रणी देशा में एक है। ग्रामीण विकास में भी इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। फिलहाल देश में 7 विलियन टन मछली का वार्षिक उत्पादन होता है। जीडीपी में इसकी एक प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इस उत्पादन को 10 विलियन टन वार्षिक किया जाना चाहिए। विज्ञान और तकनीक के सहारे इस क्षेत्र में भी तेजी से विकास की संभावनाएं हैं। उन्होंने एमएएफएस की डिग्री लेने वाले विद्यार्थियों से मत्सय क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान सदी शिक्षा के प्रबंधन का युग है। हर शिक्षित व्यक्ति को अपने ज्ञान का प्रबंधन कर देश की उन्नति में अपनी भागीदारी दिखानी चाहिए।
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भिखारियों की आमदनी आम आदमी से ज्यादा
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संजय
नागपुर। आप माने या न माने, नगर में भीख मांगने वाले कई भिखारी ऐसे हैं जिनकी आमदनी आम आदमी की आमदनी से कई गुना ज्यादा है। इतना ही नहीं इनमें भीख से मिलने वाले धन का लालच इतना है कि यदि इन्हें भीख मांगने की शर्त पर पुनर्वास की व्यवस्था की जाए, तो भी इन्हें संतोष नहीं होगा। इन दिनों नगर में ताजबाग में ताजुद्दीन बाबा का उर्स का माहौल है। उर्स में शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आ रहे हैं। लिहाजा, ताजबाग परिसर में एकाएक भिखारियों की संख्या तेजी से बढ़ गई है।
दिल खोलकर भीख देते हैं श्रद्धालु
ताजुद्दीन बाबा के मजार पर आने वाले श्रद्धालु जी खोलकर भिखारियों को भीख दे रहे हैं। कई लोग ऐसे है जो 50 से 100 रुपये भी भीख दे रहे हैं। उर्स के दौरान यहां एक भिखारी की औसतन आय 500 रुपये से भी ज्यादा है। उर्स के दौरान ताजबाग परिसर में करीब 300 भिखारियों का जमावाड़ा है। यदि औसतन एक भिखारी को प्रतिदिन 500 रुपये भी भीख में मिलती है तो प्रतिदिन यहां 1,50,000 हजार रुपये भीख में जा रहे हैं। एक महीने के उर्स में करीब 4 से 5 लाख रुपये इन भिखारियों के जेब में गए। शारीरिक रूप से पूरी तरह से विकलांग कई भिखारियों की आमदनी प्रतिदिन हजार रुपये को भी पार कर रही है। जिन भिखारियों के हाथ-पांव नहीं हैं, उनकी आय ज्यादा है। इसके प्रति लोगों के दिल में दया की भावना उमड़ती है और वे कम विकलांग भिखारियों की अपेक्षा हाथ-पांव रहित भिखारियों को भीख देना पसंद करते हैं।
रिक्शा चालक बना भिखारी
ताजबाग परिसर में कई भिखारी ऐसे हैं जो शारीरिक रूप से सलामत हैं। बातचीत में इसमें से एक भिखारी ने बताया कि वह आम दिनों में रिक्शा चलाता है। काफी मेहनत के बाद भी दो सौ रुपये की भी जुगत नहीं हो पाती है, लेकिन जब यहां उर्स शुरू होता है, तब थोड़ी बदहाली दिखाकर हर दिन तीन से चार सौ रुपये की आमदनी हो जाती है। इन दिनों ताजुद्दीन बाबा परिसर में भीख मांगने वाले करीब 70 फीसदी भिखारी नागपुर से बाहर के हैं। यहां मिठाई बेचने वाले नुरूल हक ने बताया कि यहां हमेशा ही भिखारियों का जमवड़ा रहता है लेकिन उर्स शुरू होते ही नगर के बाहर के भिखारी यहां आ जाते हैं। उर्स खत्म होते ही रातोंरात भिखारी कहां और कैसे गायब हो जाते हैं, किसी को पता तक नहीं चलता। नुरूल ने बताया कि पूरी तरह अपंग अपाहिज भिखारी जो चल नहीं सकते, स्वयं खा नहीं सकते, वे भी उर्स शुरू होने वाले दिन ही अचानक आते हैं और उर्स खत्म होते ही एकाएक गायब हो जाते हैं।
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संगठित गिरोह है सक्रिय
जानकारों को कहना है कि इस भिखारियों का एक संगठित गिरोह योजनाबद्ध तरीके से इन भिखारियों को उन जगहों पर लाता और ले जाता है, जहां समय-समय पर भीड़ उमड़ती है। विशेषकर मंदिर और पूजा-पाठ वाले स्थलों पर विभिन्न मौके पर आयोजित होने वाले धार्मिक आयोजनों पर लाने, ले जाने की पूरी व्यवस्था यह गिरोह करता है। हर दिन भिखारियों से होने वाली आय में से एक बड़ी रकम स्वयं रखते हैं। भिखारियों को रहने और उनके मनपसंद खाने की व्यवस्था के साथ ही शराब आदि की व्यवस्था करते हैं। इसके साथ ही इन भिखारियों में एक भिखारी मुखिया होता है।
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गुरुवार, जनवरी 21, 2010
हडताल से विदर्भ में जनजीवन ठप
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संजय स्वदेश
नागपुर। बुधवार को पृथक विदर्भ राज्य के गठन के लिए विदर्भस्तरीय हड़ताल को जनता का व्यापक समर्थन मिला। जिन सड़कों और फुटपाथ पर हर दिन भीड़-भार नजर आती थी, आज सूनी नजर आई। भीड़भाड़ वाले स्थलों पर इक्का-दुक्का लोग नजर आए। नागपुर से होकर गुजरने वाले लंबी दूरी की ट्रेन सेवा को साथ-साथ लोकल ट्रेन सेवा पर भी हड़ताल का काफी प्रभाव पड़ा।
पृथक विदर्भ के लिए विदर्भ राज्य संग्राम समिति के बैनर तले हड़ताल का आयोजन किया गया था। इसे जनता का स्वस्फूर्त प्रतिसाद मिला और शतप्रतिशत अभूतपूर्व बंद पूरे विदर्भ में रहा। आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर था जब शांतिपूर्ण तरीके से की गई किसी हड़ताल को इस प्रकार का स्वस्फूर्त प्रतिसाद मिला। बुलढाणा जिले के सिंदखेडराजा से गोंदिया और गड़चिरोली और अमरावती जिले के अंतिम गांव तक हड़ताल के आह्वान पर बंद सफल और शांतिपूर्ण रहा। विदर्भ के कुछ स्थानों पर बसों पर पथराव की सूचना मिली है। जरीपटका सहित विदर्भ के 9 स्थानों पर ट्रेनें रोकी गईं। कई ट्रेनें घंटों देर से चलीं। विदर्भ भर में 90 हजार आटोरिक्शा बंद रहे।व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहने से लगभग 300 करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान व्यक्त किया गया है।
नागपुर में सुबह ही विदर्भवादियों ने जिलाधीश, पुलिस आयुक्त और विभागीय आयुक्त कार्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर ताला जड़ दिया। नागपुर महानगर पालिका में कामकाज पूरी तरह ठप रहा। हड़ताल आमतौर पर शांतिपूर्ण रही। हालांकि इस दौरान पुलिस ने पूर्व राज्य मंत्री सुलेखा कुंभारे सहित नागपुर में 248 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर बाद में रिहा कर दिया।
अमरावती जिले में भी बंद पूरी तरह सफल रहा। नक्सल प्रभावित गड़चिरोली जिले में हड़ताल को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिलने की खबर है। इतना ही नहीं यह आह्वान भी किया गया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे स्वयं सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पृथक विदर्भ की सिफारिश करें। नागपुर शहर के लगभग 125 संगठनों ने इस हड़ताल को समर्थन दिया। बैंक शुरू रहे। कुछ शासकीय कार्यालय भी शुरू रहे परन्तु उसमें उपस्थिति नाममात्र की रही। स्टार बस सेवा पूरी तरह ठप रही। आटोरिक्शा और स्टार बस बंद होने से शहर की अंतर्गत परिवहन व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। निजी कार्यालय पूरी तरह बंद रहे।
बुधवार को हमेशा भीड़-भाड़ से भरी रहने वाली इतवारी, सदर, सीताबर्डी, महल, गांधीबाग आदि हिस्सों की गलियां और सड़कें सूनसान रहीं। प्रदर्शनकारियों ने सुरेन्द्र नगर में एक पेट्रोल पम्प पर पथराव कर पेट्रोल पम्प की एक मशीन को तोड़ दिया। रविभवन में एक दो पहिया वाहन काइनेटिक होंडा जला दी गयी। कई स्थानों पर टायर भी जलाकर विदर्भ के लिए आवाज बुलंद की गई। पृथक विदर्भ के लिए नेताओं ने विदर्भ के अलग-अलग जिलों की कमान संभाली। जिसमें सांसद विलास मुत्तेमवार ने नागपुर, सांसद दत्ता मेघे ने वर्धा, विदर्भवीर जाम्बुवंतराव धोटे ने यवतमाल, सांसद हंसराज अहीर ने चंद्रपुर, विधायक नाना पटोले ने भंडारा, गोंदिया में खुशाल बोपचे आदि के नेतृत्व में शांतिपूर्वक ढंग से आंदोलन किया गया। भारतीय जनता पार्टी ने विधायक देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में हड़ताल को समर्थन दिया। नागपुर के शहर पुलिस ने भी किसी प्रकार की अप्रिय घटना रोकने के लिए तगड़ा बंदोबस्त लगा रखा था। शहर पुलिस आयुक्त प्रवीण दीक्षित के नेतृत्व में शहर के चप्पे-चप्पे पर पुलिस पूरी मुस्तैदी के साथ नजर आई। शहर में एसआरपीएफ की 5 कंपनियां भी तैनात की गई थीं। प्रतापनगर थानांतर्गत सुरेन्द्र नगर में गजभिये के इंडियन ऑइल पेट्रोल पम्प पर कुछ लोगों ने पथराव किया जिससे एक मशीन क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण मीटर बंद हो गया।
रोकी गई ट्रेनें सुबह करीब 9.30 बजे विदर्भ राज्य संग्राम समिति की महिला आघाडी की रूपाताई कुलकर्णी के नेतृत्व में एक टे्रन को मंगलवारी सदर परिसर में रोकने की योजना बनाई गई लेकिन इस टे्रन को पुलिस ने पहले ही आउटर पर जरीपटका क्षेत्र में रोक दिया। प्रदर्शनकारियों ने 10.15 बजे तक प्रदर्शन कर गिरफ्तारी दी। जीआरपी के पुलिस अधीक्षक सिंघल ने बताया कि आंदोलनकारियों ने नागपुर जिले में जरीपटका सहित 9 स्थानों पर रेल रोको आंदोलन किए। जरीपटका इलाके में एक ट्रेन को पुलिस ने पहले ही रोक कर आंदोलनकारियों को टे्रन के पास पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया। प्रदर्शनकारी मंगलवारी सदर इलाके में ट्रेन के आने का इंतजार कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार मुंबई-गोंदिया पैसेंजर (विदर्भ एक्सप्रेस) टे्रन को मालखेड़-चांदूर के पास 11 मिनट तक रोके रखा गया। बल्लारशा-काजीपेठ पैसेंजर को बल्लारशा में लगभग आधे घंटे तक रोका गया। नागपुर-नागभीड़ पैसेंजर को नागभीड़ में रोका गया। नरखेड़-दांडीमेटा में एक रेल इंजिन को रोका गया।
बसों पर पथराव कहीं-कहीं आंदोलनकारी कुछ उग्र नजर आए। नागपुर में टेलीफोन एक्सचेंज चौक, ग्रामीण क्षेत्र के कुही मंडल तथा कुछ निजी बसों पर पथराव कर उन्हें नुकसान पहुंचाया गया। हालांकि इस पथराव में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई। एसटी महामंडल की 600 में से सिर्फ 200 बसें ही चल सकीं। जो चलीं वो भी कई घंटे देर से चलीं। 90 हजार आटो बंद रहे रोजमर्रा की जिन्दगी में आवागमन के लिए आटो सबसे महत्वपूर्ण साधन माने जाते हैं। लेकिन विदर्भ बंद के आंदोलन में आटो संगठनों ने भी अपना पूरा समर्थन दिया। विदर्भ में बुधवार को लगभग 90 हजार आटो बंद रहे। आटो के बंद रहने से रोजाना आटो से आवागमन करने वाले नागरिकों को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
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शीतकालीन अधिवेशन नहीं होने देंगे : मुत्तेमवार
लग विदर्भ राज्य की मांग को लेकर शहर में जगह-जगह राजनीतिक दलों सहित आम जनता ने भी जमकर प्रदर्शन किया। विदर्भ राज्य की मांग की अगुआई कर रहे पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विलास मुत्तेमवार ने इस हड़ताल को शतप्रतिशत सफल बताया। नाग-विदर्भ चेंबर आफ कामर्स में व्यापारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विधान मंडल के पिछले शीतकालीन अधिवेशन के समापन अवसर पर ही मैंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को बता दिया था कि महाराष्ट्र विधान मंडल का नागपुर में यह आखिरी शीतसत्र है। सन 2010 में यहां विदर्भ राज्य की गठित सरकार और जनप्रतिनिधियों का अधिवेशन होगा। इस अवसर पर चेंबर के अध्यक्ष हेमंत खुंगर, प्रकाश वाधवानी, बी.सी. भरतिया सहित कई व्यवसायी उपस्थित थे। उन्होंने चेतावनी दी कि अब विदर्भ विरोधी नेताओं को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। हम अहिंसा के मार्ग पर चलकर अलग विदर्भ राज्य की मांग कर रहे हैं। समूचे विदर्भ मेंं सभी राजनीतिक दलों सहित जनता भी शांतिप्रिय ढंग से आंदोलन कर रही है। जो लोग हिंसा का मार्ग अपनायेंगे उनके साथ विदर्भ राज्य संग्राम समिति का कोई नाता नहीं होगा। विदर्भ के सभी 11 जिलों में अलग विदर्भ की मांग को लेकर सारे स्कूल, कॉलेज, व्यापारी प्रतिष्ठान बंद रखे गये हैं। विदर्भ की जनता का विशेष रूप से आभार मानते हुये विलास मुत्तेमवार ने कहा कि विदर्भ राज्य की मांग हेतु मैंने पहले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, अहमद पटेल सहित कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को ज्ञापन दिया है। उन्होंने इस मांग को जायज ठहराते हुये इसका अध्ययन करने हेतु एक समिति का गठन किया है। अब इस मामले पर जल्द निर्णय लेने का वक्त आ गया है। भारतीय जनता पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दल भी हमारा साथ दे रहे हैं। अब अलग विदर्भ राज्य जनता की आवाज बन चुकी है। इस बार के विदर्भ बंद को विशेष रूप से जनता का समर्थन प्राप्त होने से यह चिंगारी अब ज्वालामुखी का रूप धारण कर चुकी है जिसे बुझाना अब नामुमकिन हो गया है।
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जरूरत नहीं नक्सलियों के मदद की जनता हमारे साथ हैं - पुरोहित : पृथक विदर्भ के लिए भाजपा द्वारा किया गया आंदोलन सफल होने का दावा कर भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद बनवारीलाल पुरोहित ने स्पष्ट किया कि नक्सलियों की मदद वे कभी भी नहीं लेना चाहेंगे। क्योंकि पृथक विदर्भ के लिए जनता ने विदर्भवादियों का खुलकर साथ दिया। जनता के रहते नक्सलियों की मदद की जरूरत नहीं है। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर नक्सलवाद के खिलाफ पहले से ही नीति निर्धारित है। इसलिए महाराष्ट्र स्तर पर उसे बदलने की आवश्यकता नहीं है। और हम उस नीति पर ही चलना चाहेंगे। कभी भी उनकी मदद पार्टी को गंवारा नहीं होगी। चाहे मुद्दा कोई भी हो।
पुरोहित ने बताया कि जांबुवंतराव धोटे व प्रकाश आम्बेडकर की नक्सलियों की मदद लेने की व्यक्तिगत राय है। वह विदर्भ संग्राम परिषद का यह निर्णय नहीं है। भाजपा परिषद का राष्ट्रीय स्तर का घटक दल है। और वह एकमात्र दल है। जिसके आंदोलन से राष्ट्रीय स्तर दबाव बनेगा। नितिन गडकरी विदर्भ के होने से भी राष्ट्रीय स्तर पर पृथक विदर्भ के मुद्दे को बल मिला है। इसके लिए हमें किसी प्रकार के आरक्षण मांगने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि भुवनेश्वर में भाजपा की कार्यकारिणी की एक हुई एक सभा में पृथक विदर्भ का प्रस्ताव पारित किया गया था। भाजपा का यह प्रमुख आश्वासन रहा है। जिसके मद्देनजर भाजपा पृथक विदर्भ के लिए लड़ रही है। यह आरपार की लड़ाई है। विदर्भ में सभी जगह भाजपा कार्यकर्ता नेता पदाधिकारी, सांसद- विधायकों नेता सहित जनता ने बंद को सफल कराया। जनता पुरे जोहा के साथ शामिल हुई।
कांग्रेस पर अप्रत्यक्षरूप से वार कर पुरोहित ने कहा कि विदर्भ के समर्थन में राष्ट्रीय स्तर पर केवल भाजपा ही आगे है। वर्ष 1979 मेें महाराष्ट्र विधिमंडळ में अशासकीय प्रस्ताव के तहत पृथक विदर्भ का मुद्दा चर्चा के लिए रखा था। तीन घंटे तक इसपर बहस हुई थी।
भाजपा विदर्भ राज्य का विकास प्रारुप बना रही है। चार सदस्यीय समिति अध्ययन कर विदर्भ प्राकृतिक अप्राकृतिक संसाधनों का लिखा जोखा जनता के समक्ष रखेगी। और जनजागरण के माध्यम से पृथक विदर्भ को अधिक व्यापक रुप देने का प्रयास करेगी। यह जानकारी देते दुर पुरोहित ने कांग्रेस राकांपा की ओर अंगुली निर्देश करते हुए बताया कि पश्चिम महाराष्ट्र हो या मराठवाड़ा या अन्य महाराष्ट्र के इलाके सभी जगहों से भाजपा के नेता व जनता का पृथक विदर्भ को भरपूर समर्थन है।
भाजपा के विदर्भ कार्यालय में आयोजित पत्रपरिषद में पुरोहित बोल रहे थे। उनके साथ भाजपा विधायक देवेंद्र फडणवीस, सुधाकर देशमुख, महापौर अर्चना डेहनकर अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे।
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