सोमवार, दिसंबर 15, 2008

साडी वाव्स्था आग लगने की बाद की हैं.

सारी व्यवस्था आग लगने के बाद की है
नागपुर को जिस तरह से एक मॉडल सिटी बनाने की बात की जा रही है, उसमें आपतकालिन स्थिति में जीवन रक्षक व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। नवनिर्मित भवनों में भी इसकी व्यवस्था नहीं की जा रही है। विभिन्न आवासीय व व्यावसायिक भवनों में जो भी कुछ व्यवस्था है, वह आग लगने के बाद उसके बुझाने के लिए है। लेकिन आग फैलने से कैसे रोके इसकी व्यवस्था मुश्किल से ही मिलेंगे। लोग पैसिव लाइफ सेफ्टी मैनर को नहीं जानते हैं। स्मोक मैनेजमेंट की व्यवस्था नहीं होती है। हालांकि ये आग से बचाव के तकनीकी भाषा है। लेकिन इसके प्रति लोगों में जागरूकता बेहद जरूरी है। भवनों में अग्निशमन के उपकरण तो होते हैं, लेकिन आग जाए और उससे निकला हुआ धुंआ कहीं और न फैले इसकी व्यवस्था कहां की जा रही है? भवन डिजायन कने वाले आर्किटेक और इंटिरियर डिजायनरों को स्वयं इस बात की पहल करनी चाहिए। अनेक लोग अपनी गाढ़ी कमाई से बहुमंजिले इमारतों पर फ्लैट्स लेते हैं। लेकिन आपतकालीन समय में उनका जीवन कितना सुरक्षित है? इस पर न ही वे विचार करते हैं और न ही भवन निर्माता? हमारे संस्थान में विभिन्न राज्यों के अनेक विभागों के अधिकारी प्रशिक्षण के लिए आते हैं, वे बताते हैं कि आम लोगों में इसके प्रति जागरूकता नहीं है। यदि स्थानीय प्रशासन नियम को सख्त करें तो आपतकालीन स्थिति में लोगों का जीवन सुरक्षित हो सकता है।
डा. शमीम,
प्रमुख,फैकल्टी ऑफ फायर इंजीनियरिंग एक टेक्नोलॉजी
राष्टï्रीय अग्निशमन महाविद्याल, नागपुर
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आग अगनी मिले न पुरोहितं. खाक होने के लिए कोफी है जरी सी लापरवाही

खाक होने के लिए काफी है जरा-सी लापरवाही
संजय कुमार
नागपुर. नगर में बढ़ती आबादी, विकास की तेज रफ्तार में आग के प्रति छोटी-सी लापरवाही बेहद खतरनाक है। हर साल आगजनी की छोटी-बड़ी सैकड़ों घटनाएं होती हैं, जिसमें करोड़ों रुपये की संपत्ति का नुकसान होता है। महानगर पालिका के अग्निशमन विभाग के प्रमुख अग्निशमन अधिकारी चंद्रशेखर जाधव की माने तो बीते वित्तीय वर्ष 200-08 में आगजनी की कुल 23 घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें 3,53,85,8160 रुपये का नुकसान हुआ। गत एक माह में गर्मी के चढ़ते पारे के साथ दर्जन भर से अधिक आगजनी की घटनाएं हुई हैं। नागपुर में कई इमारत व सावर्जनिक जगहों पर अग्निशमन के लिए जरूरी साधनों का अभाव है। हालांकि नेशनल बिल्डिंग कोड एनबीसी के मुताबिक पंद्रह मिटर के ऊपर की ऊंचाई वाले भवनों में अग्निशमन के संसाधनों को लगाकर विभाग से एनओसी लेना जरूरी होता है। इसके साथ ही हर तरह के व्यावसायिक गतिविधियों वाले भवन चाहे कितनी भी ऊंचाई के क्यों न हों, उसमें नियमानुसार आग पर नियंत्रण पाने वाले जरूरी उपकरण रखना आवश्यक है। अग्निशमन विभाग के सूत्रों की मानें तो विभाग ने पिछले दिनों करीब 200 भवनों में अग्निशमन सुविधाओं की लापरवाही को लेकर उन्हें नोटिस जारी किया है। इसमें नगर के कई नामी-गिरामी बिल्डर भी हैं। इतना ही नहीं नगर की कई बहुमंजिले इमारतों में आपातकाल के लिए अलग से कोई सुरक्षित दरवाजा नहीं है। इतवारी जैसे क्षेत्र में अनेक पुराने बाजारों की गलियां इतनी संकरी हैं कि आग लगने की स्थिति में आग पर काबू पाना मुश्किल है। श्री जाधव का कहना है कि जब कभी इतवारी क्षेत्र की किसी गली में आग लगती है तो संकरी गलियों में दमकल की गाडिय़ां भी नहीं घुस पाती हैं। इस कारण आग लगने की स्थिति में करीब एक हजार मीटर की पाइप-लाइन बिछाना पड़ता है। पुराने भवन और इमारतों में लगे आग बुझाने के गैस-सिलेंडर पुराने हैं। व्यावसायिक भवनों में जहां ये सिलेंडर लगे हैं, उसके आसपास खड़े गार्ड या कर्मचारी को इसे चलाना आता ही हो, यह जरूरी नहीं। हालांकि हर साल इन सिलेंडरों की रिफीलिंग करनी पड़ती है। लेकिन लोग इसके रिफिलिंग को लेकर सतर्क नहीं हैं। मुख्य अग्निशमन अधिकारी का कहना है कि उनकी टीम समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों में औचक निरीक्षण कर यह देखती है कि जरूरत के जगह पर कहां आग-निरोधी उपकरण रखे हैं। नियमों का उल्लंघन करने पर उन्हें नोटिस दी जाती है। अधिकतर आवासीय भवन 15 मिटर से कम ऊंचाई के हैं। लेकिन एनबीसी के नियमानुसार इनमें अग्निशमन उपकरणों को लगाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। 15 मिटर से अधिक उंचाई से ऊपर के भवनों में विभाग से एनओसी लेना अनिवार्य है। भवन निर्माताओं को चाहिए वे 15 मिटर से कम ऊंचाई वाले भवनों में भी अग्निरोधी उपकरणों की व्यवस्था करें। आपातकालीन सिढिय़ां रखे। अधिकर लोग फ्लैट आदि खरीदने के दौरान हर तरह की कागजी कार्रवाई दुरुस्त करते हैं, हर तरह की सुविधा देखते हैं। लेकिन आग से बचाव के लिए वहां किस तरह की सुविधा है, यह देखते ही नहीं। यह कितना जरूरी होता है, यह लोगों को तब समझ आती है, जब कोई घटना घट जाती है।
अग्निशमन उपकरणों का व्यवसाय करोड़ों का
भले ही नागपुर के कई व्यावसायिक भवनों में अग्निशमन उपकरणों के प्रति लापरवाही देखी जा सकती है। यहां ऐसे दर्जनों व्यावसायिक भवन हैं, जहां अग्निशमन के लिए करोड़ों रुपये के उपकरण लगे हैं। ये उपकरण अंतरराष्टï्रीय स्तर के हैं। आग लगने परे यह अपने आप अलार्म बजता है और केंद्रीय नियंत्रण कक्ष में यह भी सूचना देता है कि आग कहां लगी है और किस ओर फैल रही है। ऐसे भी उपकरण लगे हैं, जो आग के हिट से उसपर लगा कांच अपने आप टूूट जाता है और आग पर पानी गिरने लगता है। अग्निशमन उपकरणों के व्यावसाय में करीब बीस साल से जुड़े मनोज जाधव का कहना है कि दो दशक पहले तक स्थिति यह थी कि लोगों को बहुत ज्यादा समझा-बुझाकर उनके यहां अग्निरोधी यंत्र लगाये जाते थे। तब साल में दो-तीन ही ऐसे काम मिलते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। हर साल करीब 25-30 भवनों में इसका काम मिलता है। नागपुर में ऐसे करीब दर्जन भर भवन हैं जिनमें हर एक में करीब एक से दो करोड़ रुपये खर्च करके इसकी व्यवस्था की गई है। हर शॉपिंग मॉल्स में इसकी व्यवस्था की जा रही है। क्योंकि कोई भी व्यावसायिक कंपनी आपातकालीन समय का जोखिम नहीं लेना चाहती हैं।
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रेलवे स्टेशन पर व्यवस्था खस्ता
यदि नागपुर रेलवे स्टेशन पर आग लगे तो स्थिति खतरना हो सकती है। अंदर के प्लेटफार्म से बाहर निकलने के दो ही पूल हैं। भीड़-भाड़ के दौरान यदि आग लगती है, तो वहां लोगों की अफरातरफरी मचना स्वाभाविक है। हालांकि रेल प्रशासन यह जरूर कहती है कि यहां अग्निशमन के सभी जरूरी उपकरण है। लेकिन हकीकत यह है कि यदि प्लेटफार्म पर एक छोर से दूसरे छोर तक घुम कर देखे आग बुझाने के लिए जरूरी चीजें नहीं मिलेंगी।
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खाली हैं अग्निशमन विभाग में 98 पद
महानगर प्रतिनिधि
नागपुर. नगर में कुल 8 फायर स्टेशन हैं। लेकिन नगर की बढ़ती आबादी और इसके विस्तार को देखते हुए इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। विभाग का कहना है कि अभी तीन और नये फायर स्टेशन खोलने की जरूरत है। तीन निर्माणाधिन है जिसमें जरीपटका, त्रिमूर्ति नगर और नरेन्द्र नगर के फायरस्टेशन हैं। अंतराष्टï्रीय सिटी की ओर कदम बढ़ाते नागपुर में आग की घटनाओं पर काबू पाने के लिए 8 फायर स्टेशनों में चीफ फायर ऑफीसर से लेकर क्लीनर तक कुल 411 पद हैं, जिनमें से 98 पद रिक्त हैं। मुस्तैद कर्मी मात्र 313 ही है। रिक्त पदों में सीनियर लिडिंग फायरमैन और लिडिंग फायरमैन के पद ज्यादा है। आग नियंत्रण करने में इस पद के कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई लोगों की शिकायत है कि आग लगने की स्थिति में विभाग का दूरभाष व्यस्त रहता है। इस संबंध में विभाग का कहना है हर रोज सैकड़ों फोन कॉल्स आते हैं, जिसमें से दो -तीन सही होती हैं। विभाग में टेलीफोन ऑपरेटर के कुल दस पद हैं जिसमें से पांच अभी भी रिक्त हैं।
बॉक्स में
गत वर्षों में नागपुर में लगी छोटी, मध्यम और बड़े स्तर की आग की घटनाओं को विवरण
वर्ष छोटी मध्यम बड़ी कुल नष्टï संपत्ति
१९९९ २५० २४७ ०७१ २,४८,२२,६९०
२००० ३४५ २३९ ०४९ २,७८,०७,८५०
२००१ ३२४ १५१ ०५८ २,४३,०२,४००
२००२ ५६१ १५१ ०७३ ४,०२,२१,८७०
२००३ ४९३ ०६९ ०७७ ५,६७,४८,०२५
२००४ ४३७ ०५९ ०६४ ३,३२,९३,७००
२००५ ४५८ १०३ ०६६ ४,८०,३३,७८७
२००६ ४४७ ०७० ०५९ ४,२५,१५,१५५
२००७ ४९० १४९ ०९८ २,१०,३१,१२०
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सारी व्यवस्था आग लगने के बाद की है
नागपुर को जिस तरह से एक मॉडल सिटी बनाने की बात की जा रही है, उसमें आपातकाल की स्थिति में जीवनरक्षक व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। नवनिर्मित भवनों में भी इसकी व्यवस्था नहीं की जा रही है। विभिन्न आवासीय व व्यावसायिक भवनों में जो भी कुछ व्यवस्था है, वह आग लगने के बाद उसे बुझाने के लिए है। लेकिन आग फैलने से कैसे रोके इसकी व्यवस्था मुश्किल से ही मिलेंगे। लोग पैसिव लाइफ सेफ्टी मैनर को नहीं जानते हैं। स्मोक मैनेजमेंट की व्यवस्था नहीं होती है। हालांकि ये आग से बचाव के तकनीकी भाषा है। लेकिन इसके प्रति लोगों में जागरूकता बेहद जरूरी है। भवनों में अग्निशमन के उपकरण तो होते हैं, लेकिन आग बुझ जाए और उससे निकला हुआ धुंआ कहीं और न फैले इसकी व्यवस्था कहां की जा रही है? भवन डिजायन करने वाले आर्किटेक और इंटीरियर डिजाइनरों को स्वयं इस बात की पहल करनी चाहिए। अनेक लोग अपनी गाढ़ी कमाई से बहुमंजिले इमारतों पर फ्लैट्स लेते हैं। लेकिन आपातकालीन समय में उनका जीवन कितना सुरक्षित है? इस पर न ही वे विचार करते हैं और न ही भवन निर्माता? हमारे संस्थान में विभिन्न राज्यों के अनेक विभागों के अधिकारी प्रशिक्षण के लिए आते हैं। वे बताते हैं कि आम लोगों में इसके प्रति जागरूकता नहीं है। यदि स्थानीय प्रशासन नियम को सख्त करें तो आपातकालीन स्थिति में लोगों का जीवन सुरक्षित हो सकता है।
डा. शमीम,
प्रमुख,फैकल्टी ऑफ फायर इंजीनियरिंग एक टेक्नोलॉजी
राष्टï्रीय अग्निशमन महाविद्यालय, नागपुर
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वर्ष छोटी मध्यम बड़ी कुल नष्टï संपत्ति
१९९९ २५० २४७ ०७१ २,४८,२२,६९०
२००० ३४५ २३९ ०४९ २,७८,०७,८५०
२००१ ३२४ १५१ ०५८ २,४३,०२,४००
२००२ ५६१ १५१ ०७३ ४,०२,२१,८७०
२००३ ४९३ ०६९ ०७७ ५,६७,४८,०२५
२००४ ४३७ ०५९ ०६४ ३,३२,९३,७००
२००५ ४५८ १०३ ०६६ ४,८०,३३,७८७
२००६ ४४७ ०७० ०५९ ४,२५,१५,१५५
२००७ ४९० १४९ ०९८ २,१०,३१,१२०
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दावानल का नहीं कोई हल
पास नहीं पैसे, आग बुझाएं कैसे
जंगल की आग बुझाने में संसाधनों की कमी आ रही आड़े
प्रति वर्ष आग की भेंट चढ़ जाते हैं हजारों हेक्टेयर आरक्षित वन
राजेश यादव
नागपुर : वन विभाग विदर्भ के जंगलों में लगी आग को बुझाने के लिए अभी भी बाबा आदम के जमाने की परंपरागत तकनीक के सहारे है। अर्थात आग को झाडिय़ों से पीट-पीटकर बुझाया जाता है। विभाग गर्मियों में इस कार्य के लिए मजदूरों की विशेष भर्ती करता है। लेकिन ज्यादातर मौकों पर इनका समय पर उपयोग ही नहीं हो पाता। कारण, इन मजदूरों को आग लगने के स्थान तक ले जाने के लिए अलग कोई वाहन नहीं हैं। अन्य कार्यों में लगे विभागीय वाहनों को जब तक बुलाया जाता है, तब तक सैकड़ों हेक्टेयर जंगल आग की भेंट चढ़ चुका होता है। वन विभाग के सूत्र बताते हैं कि जंगलों में लगी आग पर नियंत्रण के लिए जो बजट आवंटित किया जाता है, वह इतना कम होता है कि किसी तरह से आग बुझाने के कार्य में लगे लोगों को मजदूरी भर मिल पाती है। उपकरणों की तो बात ही छोड़ दीजिए। संसाधनों की कमी का आलम यह है कि पूरे राज्य में वन विभाग के पास अपना कोई फायर टेंडर नहीं है। आग बुझाने के आधुनिक उपकरणों को तो छोड़ ही दें, इस कार्य में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों का भी टोटा है। वाहनों की कमी के अलावा संचार साधनों की कमी से भी विभाग जूझ रहा है। संचार सुविधाएं न होने से आरक्षित जंगलों में लगी आग की सूचना वरिष्ठï अधिकारियों को समय पर नहीं मिल पाती। फलस्वरूप आग बुझाने वाले विशेष दल को रवाना करने में काफी समय लग जाता है। राज्य में कुल 11 वन सर्किल हैं, पर केवल चार सर्किल को वायरलेस सुविधाओं से जोड़ा गया है। उस पर से भी काफी पुरानी तकनीक का होने के कारण ज्यादाकर सेट खराब पड़े हुए हैं। ऐसे में समय पर आग की सूचना अपने बड़े अधिकारियों तक पहुंचाना, दूर दराज के सघन वनों में तैनात वनकर्मियों के लिये टेढ़ी खीर है। पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश ने वनकर्मियों को मोबाइल फोन से लैस कर दिया है। जिसमें विभागीय नंबरो पर मुफ्त में काल की जा सकती है। यह योजना वहां काफी सफल रही और वहां आग पर काबू पाने में इससे काफी मदद मिल रही है। पर महाराष्टï्र में यह प्रस्ताव अभी-भी वनमंत्री के पास विचाराधीन पड़ हुआ है।
कितना जला जंगल
वन विभाग के अधिकृत आंकडों को ही ले तो प्रतिवर्ष हजारों हेक्टेयर आरक्षित वन आग की भेंट चढ़ जाते हैं। वर्ष 2006-00 में राज्य में वनों में आग लगने की 24 घटनाएं दर्ज की गई। इसमें 32 हेक्टेयर वनभूमि पर खड़े सघन जंगल को भारी क्षति पहुंची। जनवरी,200 से सितम्बर 200 तक राज्य में वनों में आग लगने की 126 घटनाएं दर्ज की गई, जिसमें 26112 हेक्टेयर वनभूमि जलकर खाक हो गई।
क्यों और कब लगती है आग
सूत्रों की मानें तो जंगल में लगने वाली 90 प्रतिशत आग मानव जनित होती है। खासकर फरवरी से लेकर अप्रैल तक के महीनों में सर्वाधिक आग लगने की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। सूत्रों के अनुसार उत्तम दर्जे का तेंदू पत्ता इक_ïा करने के लिए लोग जानबूझकर आग लगा देते हैं। तेंदू की झुलसी हुई झाडियों से जो नई कपोले आती हैं उनकी बाजार में भारी मांग को देखते हुए ऐसा किया जाता है। कई बार महुआ बीनने के लिए भी आग लगा दी जाती है। आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर आग लगने की घटनाएं 11 बजे से 3 बजे तक दिन में ही होती है।
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कभी हेलीकाप्टर से बुझाई जाती थी आग
मात्र दो दशक पहले विदर्भ के लोगों को इस बात का गर्व था कि वनों में लगने वाली आग बुझाने के लिए उनके पास विशेष किस्म का हेलीकाप्टर है। दरअसल संयुक्त राष्टï्र विकासनिधि से भारत में वन संपदा के संरक्षण एवं जंगलों में लगने वाली आग पर नियंत्रण के लिए आग बुझाने के विशेष उपकरणों से लैस दो हेलीकाप्टर देश को मिले थे। इनमें से एक हेलीकाप्टर हलद्वानी में तैनात किया गया दूसरा राज्य के वनबहुल चन्द्रपुर जिले में संयुक्त राष्टï्र की विशेष सहायता जब तक मिलती रही तब तक तो ठीक चलता रहा, पर जैसे ही यह सहायता राशि बंद हुई, हेलीकाप्टर को ईंधन के ही लाले पड़ गए। जब राज्य सरकार ने भी हाथ खींच लिया तो केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इस विशेष हेलीकाप्टर को वापस बुला लिया। हेलीकाप्टर तो गया ही जंगल में आग बुझाने के काम आने वाले संयुक्त राष्टï्र संघ द्वारा दिए गए आधुनिक उपकरण भी धीरे-धीरे बेकार हो गए। अब आलम यह है कि राज्य के वन विभाग के पास आग बुझाने के काम आने वाला एक फायर टेंडर तक नहीं है।

रविवार, दिसंबर 14, 2008

कौन सुनेगा हमरी

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पत्नी पीडितो की व् सुनिए.

संजय कुमार
नागपुर. अभी तक ज्यादातर महिलाओं पर अत्याचार के मामले सामने आते रहे हैं। इसे रोकने के लिए सशक्त कानून भी बनाएं गए हैं। समय बदल रहा है। महीला सशक्तिकरण के जमाने में अब पति पत्नी से पीडि़त हैं। चाहे वे पत्नी के लगाए गए दहेज प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के झूठे आरोप हो या फिर घर में आपसी कलह। यदि ऐसा नहीं होता है तो पत्नी पीडि़त बीते 19 नंवबर को पुरुष दिवस के रूप में मनाने की जरूरत नहीं पड़ती है। आप माने या न माने? राष्टï्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि आत्महत्या के मामलेे में विवाहित पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में ज्यादा है। 2005-2006 के आंकड़ों के मुताबिक विवाहित पुरुषों में आत्महत्या के दर्ज कुल 10935 और महिलाओं की 5805 थी। प्रतिशत की दृष्टिï से पुरुषों की संख्या 64 है और महिलाओं की संख्या 36 प्रतिशत है। मतलब हर 8 मिनट में एक विवाहित पुरुष आत्महत्या कर रहा है। विवाहित महिलाओं का आत्महत्या का दर प्रति 13 मिनट में एक है। जानकारों का मनना है आत्महत्या करने वाले अधिकतर मामले परिवारिक कलह का ही कारण बनी। आंकड़े साल-दर साल बढ़ रहे हैं।
पत्नी से प्रताडि़त होने के मामले विदर्भ क्षेत्र के पुरुष भी पीछे नहीं है। तीन साल पूर्व नागपुर में पत्नी पीडि़तों एक संगठन बना। आज करीब 600 पत्नी पीडि़त के सदस्य है। इसमें सबसे ज्यादा संख्या नागपुर के लोगों की है। संगठन के जुड़े लोगों का कहना है कि पुरुष आत्महत्या के मामले प्रकाश में तो आते हैं पर पीछे की स"ााई से बहुत कम ही लोग रू-ब-रू हो पाते हैं। कई बार इन कानूनों का दुरूपयोग कर पत्नी पति को प्राडि़त करती है। ऐसे ही पीडि़त पुरुषों का कहना है कि उनके परिवार की जुड़ी महिलाएं भी दुखी हैं। पत्नी को प्रताडि़त करने वाली महिलाएं जब कानून का संरक्षण लेती हैं तो वे घर के अन्य महिला सदस्यों पर भी प्रताडऩा का अरोप लगाता हैं। पीडि़त पति हर रविवार को रामदासपेठ स्थित लैंडा पार्क में सुबह 9 बजे बैठक करते हैं। एक दूसरे की समस्या सुनते हैं और सहयोग करते हैं। जब नया पीडि़त आता है तो उनकी काउंसलिंग होती है जिससे कि वह आत्महत्या न कर सके। पीडि़तो का आरोप है कई महिलाएं कानूनी अधिकारों का दुरुपयोग कर परिवार को बदनाम करती है। दहेज विरोधी काननू का हवाला देकर घर-परिवार में बर्चस्त जमाने की कोशिश करती हैं। खेद की बात है कि जैसे ही पत्नी आरोप लगाती है और बात थाने तक पहुंचती है और मामला दर्ज होता है तो पति महोदाय जेल चले जाते हैं। घोर अवसाद का शिकार हो जाते है। पत्नी के हरकतों से बेटे भाई की जिंदगी में पडऩे वाली खलल से कई मां-बहनों का दिल टूटा है। युवा पति कोर्ट-कचरही के चक्कर काटते-काटते अधेड़ हो रहे हैं। पीडि़त संगठन के एक सदस्य ने बताया कि इस चक्कर में पड़े अधिकतर लोग आत्महत्या अंतिम विकल्प मान लेते हैं। क्योंकि जैसे ही पत्नी के अरोप पुलिस दर्ज करती है। नौकरी चाहे सरकारी हो या निजी चली जाती है। श्रम और रोजगार मंत्रालय के वर्ष 2001-05 के जारी आंकड़ों के मुताबिक निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से करीब 14 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोनी पड़ी। कई सर्वे व जांच में यह बात सामने आ चुकी है कि आईपीसी की धारा 498 को बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इसके तहत कई पतियों पर दहेज के लिए पत्नी को प्रताडि़त करने के झूठे अरोप लगे हैं। दो साल पूर्व लागू घरेलू हिंसा उन्नमूलन कानून 2005 से तो महिलाओं को और ताकत दे दी है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 में एक सिविल याचिका 583 में यह टिप्पणी की थी कि इस कानून को तैयार करते समय कई खामियां रह गई है। उन खामियों को फायदा उठा कर कई पत्नी पति को धमका रहे हैं।
पत्नी पीडि़त इंद्रौरा निवासी महेश जांबुडकर (परिवर्तित नाम) संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर टेक्सटाइल इंजीनियर बनें। 2001 में डिप्लोमा किए हुए इंजीनियर लड़की से विवाह हुआ। विवाह के बाद सब कुछ सामान्य रहा। श्री जांबुडकर कहते हैं कि कुछ महीने तो सब कुछ सामान्य रहा, एक बेटी भी हुई। पारिवारिक मामले में धीरे-धीरे ससुरालवालों का हस्तेक्षप बढ़ता गया। घर जवाई बनने का दवाब बनाया। पत्नी में अहंम आ गया। वह हमारे परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ बिलकुल नहीं रहना चाहती थी। विवाद इतना बढ़ा कि एक बार मेरे ही खाने में जहर मिलाकर मायके चली गई। जिंदा बच गया तो दहेज प्रताडऩा का मुकदमा दर्ज करा दिया। वकील ने तर्क दिया मैंने इतना प्रताडि़त किया कि मजबूरन खाने में जहर मिलाना पड़ा। साथ में घर के दूसरे सदस्यों का नाम प्रताडि़त करने वालों में जोड़ दिया। मुकदमा आज भी चल रहा है। बच्ची से मिलने के लिए आज भी तड़प रहा हूं। मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि करीब एक साल से मेंटल स्ट्रेस की मेडीकल देकर छुट्टी पर हूं और कोर्ट का चक्कर काट रहा हूं।
कुछ ऐसी ही कहानी गोपाल भगवतकर (परिवर्तित नाम) का है। चंद्रपुर में जल संपदा विभाग में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत हैं। 21 दिसंबर, 2000 को समाज सेवा में स्नातकोत्तर लड़की से विवाह हुआ। श्री भगवतकर कहते हैं कि सास-ससुर का हमारे घर में अनावश्यक हस्तक्षेप होने से वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं हो पाया। माता-पिता की ताकत पाकर पत्नी स्वच्छंद जिंदगी जिना चाही। परिवार टूटने बचाने के लिए हरसंभव कोशिश नकाम रही। पत्नी की मांग यही रही कि वह घर के दूसरे सदस्यों के साथ नहीं रहेगी। आखिर दजेह प्रताडऩा का झूठा अरोप लगाई। आरोपियों में उन रिश्तेदारों के भी नाम डाला जो दूसरे शहर में सकून की जिंदगी जी रहे थे। मेरी जिंदगी के साथ पूरे परिवार के दूसरे सदस्यों की जिंदगी में खलल पड़ चुकी है।
पत्नी पडि़तयों के संगठन और सेव इंडिया फैमिली नागपुर ईकाई के प्रमुख कार्यकर्ता राजेश बखारिया कहते हैं कि यदि पत्नी किसी भी कारण से आत्महत्या करती है तो पुलिस तुरंत केस दर्ज कर आरोपियों को हवालात में ले लेती है। घर घरेलू कलह से तंग आकर पति आत्महत्या करता है तो पत्नी से पूछताछ नहीं होती है। कुछ दिन पूर्व की नंदनवन में एक व्यक्ति से खिलाफ पत्नी ने घरेलू हिंसा मामले केस दर्ज कराया। वह व्यक्ति जेल गया। तुरंत जमानत नहीं होने मिलने से दो सप्ताह बाद जेल से बाहर आया। बाहर आते ही उसने आत्महत्या कर ली। उसके घर वालों के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं हुई। श्री बखरिया का कहना है कि पत्नी के प्रताडि़त करने के अधिकतर मामले साल 2000 से तेजी से बढ़े है। इसका प्रमुख जिम्मेदार टीवी पर प्रसारित होने वाले कुछ धारावाहिक हैं। जिनकी अनाप-शनाप कहानी में नकारात्मक छबि वाली महिला पात्रों ने समाज में गलत असर छोड़ा है। श्री बखारिया का कहना है कि पहले विवाह के समय बेटी बिदा करने के बाद लोग कहते थे कि डोली में बिदा गई है अब तो ससुराल से अर्थी ही वापस आएगी। लेकिन आज उल्टा है। लड़की वाले यह समझाकर भेजते हैं कि घर में कोई काम न करें? कोई बोले तो हमसे बताएं। कुल मिलाकार लड़कों वालों में वधु पक्ष के परिवार के अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ा है। जिनसे महिलाओं में अहंम छा जाता है। घरेलू हिंसा देखनी हैं तो स्लम बस्तियों में जाइए। जहां रोज शराब के नशे में पति पत्नी की पिटाई करते हैं। वहां के मामले दर्ज नहीं होते है। अधिकतर मामले मध्यम वर्ग, अपर मध्यम वर्ग और थोड़ा निम्न वर्ग के हैं। हमारा संगठन किसी महिला संरक्षण कानून का विरोध नहीं करता है। पर इसके होने वाले दुरुपयोग को रोकने के लिए पुुरुष आयोग के गठन की मांग करता है। लेकिन सुनने वाले कोई नहीं है।

केरोसिन का काला /गरीबों के हक पर डाका

संजय स्वदेश
कालाबाजरी को दो रूपों में देखा जा सकता है। पहला अगर वस्तु का अचानक बाजार में अभाव बन जाता है और दूसरा वस्तु की उपयोगिता कुछ इस तरह से हो कि उसके जरिये अधिक मुनाफा कमाया जा सके। इसी तरह का एक उत्पाद है- केरोसिन या मिट्टी का तेल जिसका उपयोग स्टोव में खाना बनाते और रोशनी के लिए किया जाता है। रसोईगैस के इस्तेमाल के चलते बेशक इसके प्रयोग में थोड़ी कमी आई है, लेकिन आज भी इसकी उपयोगिता दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में बनी हुई है। वहां इसका उपयोग बहुसंख्यक लोग रोशनी के लिए करते हैं। सरकार इसे गरीबों को राशन कार्ड के जरिये सस्ते दरों पर उपलब्ध कराती आ रही है। लेकिन पिछले एकाद सालों में जैसे ही पेट्रोलियम पदार्थों की दामों में तेजी से बढ़ोतरी हुइ है, इसकी कालाबाजारी तेजी से बढ़ती ही जा रही है। क्योंकि पेट्रोलियम पदार्थों में पूरी तरह से विलय हो जाने के कारण इसका प्रयोग मिलावट के लिए किया जाने लगा है। इसकी कीमत पेट्राल- डीजल के मुकाबले काफी कम है। आमजन के लिए उपयोगी होने के कारण ही सरकार ने इसे आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में रखा है जिसकी वजह से इस पर भारी पैमाने पर सब्सिडी दी जाती है। मगर इसकी कालाबाजारी से सरकार को सालाना ५७०० करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
हाल ही में फिक्की द्वारा कराये गए एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि गरीबों को राशन कार्ड के जरिये मिलने वाले कुल किरोसीन तेल का ३८.६ फीसदी हिस्सा कालाबाजारी की भेंट चढ़ जाती है। जिसकी वजह से सरकार को करोड़ों रुपये का सालाना नुकसान तो हो ही रहा है, इसके साथ ही गरीबों को यह सस्ते दरों पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो रहा है। जिसके चलते जैसे-तैसे कम रोशनी में ही वे अपने घरों में गुजारा कर रहे हैं। जिस मिटï्टी तेल के हकदार सिर्फ और सिर्फ गरीब हैं, उस तेल की जितनी बड़ी मात्रा में आज कालाबाजारी हो रही है, उसमें में कई तरह की कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा सकती हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य और कर के बीच सामंजस्य बैठाने की जरूरत है। पिछले कुछ महीनों में पेट्रोलियम पदार्थों विशेषकर डीजल और पेट्रोल के दामों मे जबर्दस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला। तेल के भाव अंतरराष्टï्रीय खुले बाजार की तर्ज पर तय करने कारण ही कुछ ही माह के अंतराल पर डीजल-पेट्रोल की कीमतें बढ़ती रही हैं। जबकि सब्सिडी के चलते मिट्टी के तेल की कीमतों को इसलिए स्थिर रखा जाता है क्योंकि इसका उपयोग आम लोग कर रहे हैं। इसी का फायदा कालाबाजारी करने वाले उठा रहे हैं। वे कम कीमत वाले इस किरोसिन को पेट्रोल-डीजल में मिलावट कर बेच रहे हैं। वर्तमान वित्तीय वर्ष में मिटावटी तेल के कारण ही सरकार को १५००० करोड़ रुपये सब्सिडी का बोझ उठाना पड़ेगा। हालांकि इसे रोकने के लिए सरकार कई वर्र्षों से प्रयास कर रही हैं, लेकिन अभी भी संतोषजनक सफलता नहीं मिल पा रही है। शुरूआत में मिटï्टी का तेल स्वच्छ पारदर्शी और रांगहीन होता था जिसे पेट्रेल-डीजल में मिलाने के बाद बिलकुल ही पता नहीं चल पाता था। सिवाय उसकी गंध से ही पहचाना जा सकता था। बाद में सरकार ने किरोसिन में नीला रंग मिलना अनिवार्य बना दिया। सरकार का कहना था कि इससे मिलावट को रोका जा सकेगा। लेकिन सरकार के इस पहल का भी कोई फायादा नहीं हुआ। वर्तमान में सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों में किरोसिन की मिलावट को रोकने के लिए मार्कर प्रणाली शुरू की है। जिसकी वजह से पेट्रोलियम पदार्थों में मिलावट का पता लगाया जा सकेगा। मगर यह प्रणाली कितनी कारगर होगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा?
मिट्टी के तेल की कालाबाजारी में छोटे दुकानदार ही नहीं बल्कि बड़े स्तर पर भी पर भी लोग शामिल हैं। पेट्रोल पंपों में इसका इस्तेमाल मिलावट के लिए बड़े पैमान पर चोरी-छिपे हो रहा है। विडंबना यह भी है कि तमाम जांच विभाग होने के बाद भी इस तरह की कालाबाजारी जारी है। किरोसिन का आवंटन सही तरिके से हो, इसका दायित्व केंद्र सरकार खासतौर पर वित्तमंत्रालय, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले से जुड़े विभागों पर बनता है। लेकिन इसके बाद भी ये सभी मंत्रालय मिल कर इस बात की व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं कि किस तरह से इस कालाबाजारी को रोका जा सके और सरकारी सहायता प्राप्त उत्पाद सीधे अपने लक्ष्य तक पहुंच सके। मिट्टी के तेल पर दी जाने वाली सब्सिडी सीधे तौर पर गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले लोगों के लिए दी जाती है। इसके बाद भी अगर कालाबाजारी का यह खेल जारी रहता है तो इसका सीधा मतलब है कि गरीबों के हिस्से की सब्सिडी काटकर उसका लाभ अघोषित तौर पर उन लोगों को दिया जा रहा है जो पहले से ही साधन संपन्न हैं। देखा जाए तो यह स्थिति गरीबी उन्नमुलन जैसे कार्यों के लिए भी चिंताजनक है। इसलिए सरकार को केरोसिन की कालाबाजारी को रोकने के लिए गंभीरता से विचार कर किसी कारगर नीति को लागू करने के लिए सोचना चाहिए।

संसद के पास काम नही


संसद घटती बैठकों की संख्या

जन-प्रतिनिधियों की कामचोरी का प्रमाण

संजय स्वदेश

जनता माने या न मानें? उनके ही चुने जनप्रतिनिधियों के पास उनके लिए वक्त नहीं है। यह सच्चाई संसद की कार्यवाही का इतिहास बयां कर रही है। संसद की बैठकों की संख्या देखें तो पता चलता है कि अब तक 1956 में लोकसभा की सबसे अधिक कुल 151 बैठक ही हो पाई है। 196 में 98, 2003 में 4 बैठक ही हुईं। इस वर्ष अभी तक तीन सप्ताह की भी बैठक नहीं पूरी हो पाई है। इस अवधि में संसद में जो कुछ भी हुआ, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं जो इतिहास बने। देशहीत और जनहीत से मुद्दों पर न तो किसी तरह की बहस हुई और न ही कोई ठोस निर्णय हो पाए। वर्ष 2008 का उत्तराद्र्ध चल रहा है। अब तक हुई बैठक के आधार पर यह साल संसदीय इतिहास का सबसे खराब सालों में गिना जाएगा। उम्मीद थी कि इस साल 2004 में पेश बीज विधेयक अधिनियम, ग्राम न्यायालय और दलितों व आदिवासियों के आरक्षण से संबंधित विधेयक, 200 में पेश किए गए असंगठित मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा से संबधित महत्वपूर्ण विधेयक को मंजूरी मिल जाएगी। इसी साल बजट सत्र में सरकार ने बड़ी ही शिद्दत से ग्रामीण न्यायालय विधेयक पेश कर गांवों की आम जनता के बीच विभिन्न मामलों में जल्दी न्याय की आशा जगाई थी। कहा गया कि इस विधेयक के पास होने से गांव के लोगों को उनकी चौखट पर ही न्याय मिल जाएगा। उन्हें शहर स्थित कोर्ट-कचहरी में सालों चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय में लंबित करीब 45 हजार मामलों में त्वरित न्याय के लिए न्यायधिशों की संख्या बढ़ाने की बात हुई थी। न्यायायिक क्षेत्र में भ्रष्टïाचार से लडऩे के लिए भी एक विधेयक पेश किया गया था। दंगे की आग में देश का कोई इलाका न झुलसे, इसके लिए सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए 2005 में पेश विधेयक भी अभी ठंडे बस्ते में हैं। बीते बैठक में इस विधेयक को मंजूरी की सबसे ज्यादा जरूरत थी। क्योंकि उड़ीसा में हुए सांप्रदायिक मामले समेत पूर्व दंगे की कई घटनाएं अभी भी टीस दे रही हैं। सरकार अपने विधायी एजेंटे में अच्छे से अच्छे कानून बनाने की बात तो करती है, पर संसद की बैठक होने पर तत्कालीक मुद्दे के शोर-गुल में विधेयक की बात हमेशा गौण होती रही है। महंगाई की मार से हर कोई त्रस्त है। आम आदमी एक-एक रुपये की जुगत में है। वहीं इस वितीय वर्ष में संसद की कार्यवाही पर 440 करोड़ रुपये खर्च होने है। 440 करोड़ रुपये भारतीय करदाताओं की उगाही राशि का नाला बना हुआ है। संसद में बैठै चाहे कोई भी दल हो? मौका देख एक दूसरे पर लांछन लगाने में कोई भी दल नहीं चूकते हैं। पर जब बात मानधन और जीवनवृति की अथवा विविध सुविधाओं की आती है तो, सांसदों में हैरान कर देने वाली एकता दिखी है। बीस मीनट की कार्यवाही में संसदों का मानधन संबंधित विधेयक पारित होने का इतिहास है। सांसदों को नहीं भुलना चाहिए कि एक साल में इतनी बड़ी राशी खर्च करने के बाद पचास बैठक भी नहीं हो पाना उनकी कामचोरी को सिद्ध करने के लिए काफी हैं। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, सदस्यों की मिल-बांट कर अपना विकास करने का खेल चालू है। राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र नोएडा हो या नागपुर में मिहान प्रोजेक्ट। जहां भी ऐसी जगहों पर विकास की गंगा बहायी जा रही है, वहां आसपास इनसे जुड़े लोगों के ही कारोबार की नींव मजबूत हो रही है। इसी विकास की बहती गंगा के किनारे रहने वाले मजदूर, शिल्पकार, बुनकर आदि जैसे आम जन बदहाल है। साल भर में बैठक कम होने के बाद भी प्रतिनिधि कहां गुम हैं? इस जन को पता नहीं? बैठकों की घटती संख्या के कारण चाहे जो भी गिनाये जायें, पर सदस्य साल में कम से कम तीन माह यानी नब्बे दिन की भी बैठक करें तो बात बनें। यदि इस साल बैठक कम भी हुई तो भी लोकसभा क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों की प्रखर उपस्थिति और सक्रियता भी तो दिखनी चाहिए।
संपर्क
संजय स्वदेश
बी २/३५ पत्रकार सहनिवास, अमरावती रोड
सिविल लाइन्स,नागपुर, महाराष्टï्र ४४०००१
मोबाइल ९८२३५५१५८८

बैड बाजा में बदहाली के सुर


बैंड का नाम हो। इन दिनों दुकानदारी बहुत बढ़ गई है। पहले दुकानें कम थी। हालांकि आज जितनी संख्या में दुकानें हैं, उसके अनुपात में अव्च्छे कलाकरों की कमी है। इन कलाकारों की कोई नई पीढ़ी तैयार नहीं हो रही है। वर्तमान पीढ़ी नई पीढ़ी को बेहतर शिक्षा देकर उन्हें दूसरे व्यावसायिक क्षेत्रों से जोडऩा चाहती है।

कुशल कलाकारों की कमी से कहीं इतिहास न बन जाए बैंड बाजे

नागपुर से संजय स्वदेश
शादी-विवाह में शान का प्रतीक माने जाने वाले बैंड बाजे में अच्छे कलाकारों की लगातार कमी होती जा रही है। व्यवसाय घटने के कारण भले ही बैंड संचालक यह बात मानने से कतराते हों, हकीकत यह है कि बैंडपार्टी के वर्तमान कलाकार अपने बच्चों की इसे पेशे में कतई नहीं डालना चाहते हैं। एक शोध रपट के मुताबिक अधिकतर कलाकार किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है। नई पीढ़ी को इस कला में रुचि नहीं। यदि स्थिति ऐसी रही तो एक से डेढ़ दशक बाद इसके अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। डीजे सिस्टम आने के कारण भी बैंड के व्यवसाय पर असर आया है। कलाकारों की कमी के कारण महंगे होते बैंडपार्टी के कारण आर्थिक रूप से कमजोर समुदाय में होने वाले शादी-विवाह में पंजाबी ढोल का क्रेज बढ़ता जा रहा है। हालांकि शादी-विवाह में आज भी बैंड शान का प्रतीक माना जाता है। नाम न छापने की शर्त पर एक बैंड संचालक ने बताया कि कार्यक्रम ज्यादा होने और कलाकारों की कमी के कारण कई बैंड संचालक गैर-प्रशिक्षित लोगों को पोशाक पहनाकर टीम में खड़ा कर देते हैं। कुशल वादक ही गाने व धुन बजाते हैं और बाकी बैंड बजाने का नकल करते हैं। किसी समय दिन भर लिए तय होने वाले बैंडबाजे अब घंटे की दर से बजते हैं। एक साधारण बैंड कम से कम 5 हजार रुपये घंटे में उपलब्ध है, वहीं पंजाबी ढोल 400 से 1000 रुपये घंटे की दर से उपलब्ध है। लिहाजा कम बजट में होने वाली शादी में ढोल बजाने वालों की पूछ बढ़ गई है। ढोल बजाने के पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़े रमेश बावने उर्फ मलंग बाबा का कहना है कि धामनगांव, फूलगांव, यवतमाल, वर्धा आदि क्षेत्रों के लोग इस पेशे से ज्यादा जुड़े हुए हैं।इससे साल भर व्यवसाय तो नहीं मिलता है, पिछले कुछ सालों से विवाह मुहूर्त कम होने से कई बार बैंड पार्टी की कमी हो जाती है। इसलिए कुछ लोग डीजे के साथ ढोले वाले को रख लेते हैं। लेकिन इसमें भी अच्छे ढोल कलाकरों की कमी है। आम आदमी धुमाल पाटी, पंजाबी भांगड़ा ढोल में कोई अंतर नहीं समझ पाते हैं। इसलिए आवश्यक मौके पर कई बार संदल वाले भी ढोल की भूमिका में उतर आते हैं। इसके अलावा रिक्शाचालक, खोमचे लगाने वाले, फटपाथ में दुकान सजाने वाले कई मजदूर विवाह मुहूर्त के दिनों में ढोल बजाने का काम शुरू करने लगे हैं।
श्री बावने का कहना है कि गरीब लोगों का शादी का बजट कम होता है। वे बैंड का खर्चा नहीं उठा सकते हैं। इसलिए वे ही ढोल पार्टी बुलाते हैं। गैर-वैवाहिक कार्यक्रमों में पंजाबी ढोल की मांग बढ़ती जा रही है। पर विभिन्न ताल व धुनों पर ढोल बजाने वाले नागपुर में बहुत कम कलाकार है। श्री बावने की मानें तो नागपुर में करीब सौ कलाकर ही ढोल वजाने वाले हैं।
ढोल बजाने वाले अशोक बावने का कहना है कि हमारी टीम में तीन लोग ही होते हैं। दो ढोल बजाने वाले और एक गोला बजाने वाला। गोला बजाने वाले हर्षद ने बताया कि उसे एक कार्यक्रम में गोला बजाने के एवज में 25 से 30 रुपये घंटे की मजदूरी मिलती है। आम दिनों में वह मेहनत मजदूरी करता है और ढोल वालों के संपर्क में रहता है। श्री अशोक ने बताया कि ढोल की आवाज में बराती खूब झूमते हैं। उनमें कई लोग ऐसे होते हैं जो शराब पीकर ढोल के सामने नाचते हैं। वे हमारे साथ अभ्रदता से पेश आते हैं। इस कारण इस पेशें में मन नहीं लगता है। रोजगार का दूसरा विकल्प नहीं होने से ढोल बजाना मजबूरी है।
डीजे संचालक विवेक का कहना है कि विवाह-पार्टियों में डीजे की लोकप्रियता बढ़ी है। पर बैंड पार्टियों को पछाडऩा अभी बाकी है। कई वैवाहिक समारोह में बैंड और डीजे दोनों होते हैं। बैंड बाजे के साथ जब बारात गंतव्य पर पहुंच जाती है, तब डीजे धमाल शुरू होता है। बहुत कम ही ऐसी बारात होती है जो केवल डीजे के साथ दुल्हन के दरवाजे पर पहुंचती है।
1935 में बना था पहला बैंड
जानकारो का कहना है कि सरदार नरेंद्र सिंह प्रधान ने 1935 में एक बैंड पार्टी की स्थापना की। उन्होंने कई लोगों को बैंड कलाकार के लिए विभिन्न वाद्यों का प्रशिक्षण दिया। नये नये बाद्य यंत्रों और संगीत के धुनों से लोगों को आकर्षित किया। यहां तक की मध्यप्रदेश के कई नगरों में आयोजित होने वाले मांगलिक कार्यों के मौके पर उनके बैंड को बुलाया गया। बाद में हिंदी सिनेमा के संगीत बैंड आने से और भी लोकप्रियता बढ़ी।
तब डांसर भी करते थे मनोरंजन
बैंड संचालक रमेश पुराने दिनों को याद करते हुए कहते है पहले बैंड में डांसर अनिवार्य रूप से रखा जाता था। जिस फिल्म का गानाा बजता था, उस डांसर को उस तरह की वेशभूषा और नकल उतारनी पड़ती थी। बात उन दिनों की है जब जय संतोषी मां फिल्म खूब हिट हुई थी। बैंड में उसके गाने बजते थे। तब डांसर संतोषी मां की वेशभूषा में खड़ा होता और बैंड के धुन पर उसकी आरती उतारी जाती थी। बाद में हिंदी फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती, गोविंदा आदि के डांस गाने लोकप्रिय हुए तो बराती भी बैंड धुनों पर डांस करने लगे। श्री प्रधान कहते हैं कि पहले श्रीगणेश वंदना से बैंड बाजने की शुरूआत होती थी। मेरा यार बना है दुल्हा..., आज मेरे यार की शादी है... आदि गाने बैंड बाजे के लिए हमेशा लोकप्रिय रहे हैं। कलाकारों का मानना है कि इस पेशे में प्रतिष्ठïा नहीं रही है।
खट्टे-मीठे अनुभव
अमरावती के सिंदुरागनाघाट के 52 वर्षीय आजाबराव खंडारे कहते हैं कि बचपन में घर में पारिवार का माहौल ऐसा था कि बैंड बजाना सीख लिया। बाद में अनेक तरह के खट्टे-मीठे अनुभव हुए। इस पेशे में साल भर रोजगार नहीं है। शादी के मौके पर अच्छी पोशाक तो पहल लेते हैं। बाद में मैली-कुचैली जिंदगी चलती है। मेहनत मजदूरी करके गुजारा करना पड़ता है। इसी कारण अपने दोनों बेटों को कोई भी बाद्य यंत्र नहीं सीखने दिया। श्री खंडारे कहते हैं कि पिताजी क्लोरनेट बजाते थे। उन्होंने ने ही तरंमबोल बजाना सीखाया, जिसे फूकने के लिए काफी ताकत चाहिए। कलेजे पर जोर पड़ता है। आज इससे शरीर कमजोर हो गया है।
रात दस बजे के बाद प्रतिबंध
करीब छह साल पहले की बात है कि मनपा ने सड़कों पर बैंड बजाने की पाबंदी लगा दी थी। इस कारण शाम के समय होने वाले शादी में बैंड नहीं बजते थे। आज भी रात दस बजे के बाद बैंड नहीं बजा सकते हैं। इसकी ध्वनि भी 50 से 60 डेसीबल की बीच होनी चाहिए।
पोशाक पर होता है अच्छा-खासा खर्च
बैंडबाजा संचालक का पुश्तैनी काम संभालने वाले रमेश प्रधान कहते हैं कि पहले बैंड के कलाकारों को खोजनें में बहुत ही दिक्कत होती थी। दादा जी कहते थे कि ग्रामीण क्षेत्र के दूर-दराज के इलाके में उन्हें संपर्क के लिए जाना पड़ता था। यातायात के साधन नहीं होने से परेशानी होती थी। एक गांव शाम में कलाकारों को बुलाने गए और बस नहीं पकड़ सके तो अगले दिन आना पड़ता था। कई बार घर से निकले सप्ताह भर से ज्यादा हो जाता था। इस तरह भाग दौड़ से ही बैंड संचालित होता था। यह स्थिति करीब साठ के दशक तक बनी रही। अस्सी के दशक तक आते आते यह समस्या सुलझ गई। आमतौर पर एक बैंड पार्टी की टीम में 22 कलाकार होते हैं। अधिकतर सदस्य आसपास के कलाकार होते हैं। इसमें प्रमुख रूप से अकोला, अमरावती, आदि क्षेत्रों के होते हैं। कलाकारों की कमी और मांग बढऩे के कारण ही दिन भर के लिए बुक होने वाले बाजे घंटे से बजना शुरू हुए। आमतौर पर एक सीजन में अच्छा बैंड 300-400 घंटे का व्यवसाय कर लेता है। आजकल स्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि हर साल 1 लाख तक का नया सूट तैयार करना पड़ता है जिससे कि कलाकार स्मार्ट दिखे।
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नई पीढ़ी में रुचि नहीं
नागपुर. बैंड बाजे से जुड़े लोगों पर शोध करने वाली शिरीषपेठ निवासी वैशाली रूईकर का कहना है कि जिस तरह से बैंड पार्टी में कुशल कलाकरों की कमी हो रही है, उसको देखते हुए करीब ढेड़ दशक बाद इसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इससे जुड़े कलाकारों की नई पीढ़ी तैयार नहीं हो रही है। जो कुशल कलाकार थे, वे अधेड़ या बूढ़े हो चुके हैं। वर्तमान कलाकर मुश्किल से 10 से 15 साल तक इससे जुड़े रह सकते हैं। बैंड के विकास तथा उसके वाद्यों को बजाने का प्रशिक्षण देने के लिए कोई संस्थान भी नहीं है। श्रीमती रूईकर का कहना है कि बैंड के गाने की धुन दम लगाकर फूंकने और सांस पर निर्भर है। मुंह से फूंक कर बजाने वाले वाद्ययंत्रों के कलाकार फेफडे की बीमारियों की चपेट में जल्दी आ जाते हैं। श्रीमती वैशाली का कहना है कि 2005-06 में नागपुर और आसपास के कलाकारों से बातचीत पर हुए शोध के दौरान पाए गए तथ्यों के मुताबिक 90 प्रतिशत कलाकारों ने यह स्वीकार किया कि बैंड बजाने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। इनमें 0 प्रतिशत कलाकारों ने माना कि बैंड बजाने से वे छाती में दर्द की शिकायत हुई है। 20 प्रतिशत ने स्वीकार किया कि लगातार फूकने और वाद्ययंत्र लटकाने के कारण पेट की बीमारी से ग्रस्त हुए। 10 प्रतिशत कलाकरों ने बताया कि समुचित आहार व नशा नहीं करने से इस तरह की बीमारियों से बचा जा सकता है। इसके साथ ही शोध में यह बात भी सामने आई कि अधिकतर कलाकार किसी न किसी तरह के नशे के आदि हैं।
सामाजिक व आर्थिक स्थिति
85 प्रतिशत कलाकारों ने बताया कि समाज में उन्हें सम्मान नहीं मिलता है। बैंड कलाकारों को आर्थिक समस्याओं से हमेशा जूझना पड़ता है औसतन कलाकार दो हजार रुपये प्रति माह भी नहीं कमा पाते हैं। बातचीत में 55 प्रतिशत कलाकारों ने स्वीकार किया कि वे दो हजार रुपये प्रतिमाह कमा लेते हैं। दस प्रतिशत कलाकार महीने में मुश्किल से हजार रुपये कमा पाते हैं। तीन हजार रुपये महीने कमाने वाले कलाकारों की संख्या करीब 20 तथा 5 हजार रुपये महीने कमाने वाले कलाकारों की संख्या 15 प्रतिशत ही मिली। 91 प्रतिशत कलाकारों ने बताया कि वे कर्ज में डूबे हैं।
बॉक्स में
लधु शोध में कहा गया कि जिस क्षेत्र में बैंड बजते हैं, उसके आसपास के करीब 100 मीटर के दायरे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक किटाणु नष्टï हो जाते हैं।
मालिक और कलाकारों का संबंध
बैंड कलाकार के साथ मालिक एक निर्धारित हिस्सेदारी के तहत अनुबंध करते हैं। जितनी राशि उन्हें मिलती है। एक निश्चित रकम मालिक काट कर बाकी रकम कलाकरों में बांट देते हैं। दूर-दराज से आने वाले कलाकारों को रहने और भोजन की व्यवस्था मालिक की ओर से ही कराई जाती है। एक जगह से दूसरे जगह पर जाने पर परिवहन का खर्च भी मालिक को उठाना पड़ता है। बाद में जब हिसाब होता है तब वह खर्च मालिक की ओर से काट लिया जाता है। कलाकारों को विशेष पोशाक दी जाती है, उसकी धुलाई और प्रैस का खर्च भी मालिक की जिम्मेदारी होती है। लेकिन बाद में इसके भी पैसे काट लिए जाते हैं। जिस दिन बैंड पार्टी को कही जाना होता है, सभी कलाकारों को कार्यालय में आना पड़ता है।
संपर्क: संजय स्वदेश,
बी-35, पत्रकार सहनिवास, अमरावती रोड,
सिविल लाइन्स, नागपुर -440001, महाराष्टï्र,

बदहाली में बंद बाजा

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गुरुवार, जुलाई 10, 2008

गेम4 women

<स्रद्ब1>समाचार- 2हैदराबाद की 7-सीज टैक्नोलॉजिज के प्रबंधक निदेशक मारुति शंकर का मानना है कि आज के भारतीय समाज में महिलाएं किसी भी मामले में निर्णय लेने में प्रभावशाली भूमिका निभाती हैं। यदि किसी बात में उनकी सहमति मिलने का मतलब पूरे परिवार की सहमति। यदि मम्मी किसी गेम से खुश हैं तो बच्चें को भी उस गेम को खेलने से नहीं रोकेगी। कंपनी महिलाओं और बच्चों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा तथा मस्तिष्क विकास से जुड़े गेम तैयार करने में लगी है। इस कंपनी के ऑनलाइन गेम्स डॉट कॉम के पोर्टल ऑनलाइनगेम्स डॉट कॉम के 14 लाख ग्राहकों में 30 प्रतिशत महिलाएं है। समाचार- 2मुंबई की गेम्स टू विन के सीईओ आलोक केजरीवाल के अनुसार दुनिया भर मे इंटरनेट उपभोक्ता में महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। महिलाएं सबसे महत्वूपर्ण ग्राहक साबित हो रही हैं, क्योंकि परिवार में बड़ी खरीद के निणर्य अमूमन गृहिणी लेती है। ऑनलाइन गेमिंग को विज्ञापनों का बहुत सहारा होता है। यदि विज्ञापनों के जरिये महिलाओं को लुभाना है तो उनके मुताबिक गेम भी तैयार करना होगा। समाचार- 3गेम्म टु विन कंपनी इंटïयूशन यानी आभास के आधार पर गेम तैयार कर रही है, जिसे महिलाएं आराम से खेल सकें। इसको खेलने के लिए किसी तरह के दिशा निर्देश पढऩे की जयरत नहीं होगी। कंपनी ने महिलाओं को लुभाने के लिए करीब 4 करोड़ रुपये खर्च करके 60 गेम तैयार किया है। एक कंपनी ने तो सिने तारिका मलाइका अरोड़ा खान को अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया है। इनके लिए मनोरंजन, कंपनी के लिए बाजार थकान मिटाने और मनोरंजन के लिए मम्मी खेलने लगीं बच्चों का गेम कंप्यूटर गेम केवल बच्चे व युवजनों के खेलने के नहीं रहे। अब फुर्सत के समय घर में अकेली बोर होती महिलाएं भी बच्चों का कंप्यूटर खोल मनोरंजन के लिए गेम खेलने लगी हैं। वुमन भास्कर,नागपुर. घीसे-पीटे धरावाहिकों की कहानी से गृहिणियां उबने लगी हैं। वे अब अपने मनोरंजन के लिए गेमिंग का सहारा ले रही है। स्कूल की खुलते ही जहां बच्चे आधे से ज्यादा दिन स्कूल और टï्यूशन क्लास में व्यस्त हो गए हैं, वहीं पतिदेव के दफ्तर जाने के बाद कई बारियत से बचने के लिए गृहिणियों ने कंप्यूटर पर गेम खेलने की उत्सुकता बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि गेमिंग उत्पाद की कुछ कंपनियां महिलाओं को ध्यान में रख कर कुछ नये-नये रोचक गेम बनाने में जुटी हैं। वर्धमानगर की पूनम अग्रवाल का कहना है कि कई बार घर के काम जल्दी खत्म हो जाते हैं। टेलीविजन पर भी मनपसंद का कार्यक्रम नहीं आता है। बोरियत दूर करने के साथ-साथ थकान मिटाने के लिए कंप्यूट पर गेम खेलना अच्छा माध्यम है। एमबीए की छात्रा वैशाली शेंडे का कहना है कि कभी बोरियत होती है तो लॉपटॉप पर गेम खेल लेती हूं। खेलने में बड़ा मजा आता है। किला भेद और दुश्मनों को सफाया करने में इतना रोमांच आता है कि गेम जीते बगैर इसे बंद करने का मन नहीं करता है। जब तक पूरी तरह से जीतती नहीं, खेलना बंद नहीं करती हूं। इसे खेलेन के लिए मम्मी को भी सीखाया है। उसे भी की-बोर्ड पर कंप्यूटर पर दुश्मनों पर गोली चलाना अच्छा लगता है। संगीता पांडे का कहना है कि बच्चों को खेलते देख उत्सुकता होती है। लेकिन उन्हें इसे कम खेलने और पढ़ाई ज्यादा करने की सलाद देती हूं। कभी-कभी बच्चे मुझे भी गेम खेलना सीखने की कोशिश करते हैं। नगर के विभिन्न साइबर कैफे में गेम खेलने आने वाले ग्राहकों में युवतियां भी शामिल है। मास्टर माईंड कंप्यूटर कैफे के संचालक विनोद गजभिये का कहना है कि अब लड़के-लड़कियां कंप्यूटर पर चैटिंग की अपेक्षा गेम खेलना पसंद करते हैं। इसमें उन्हें ज्यादा मजा आने लगा है। रामदास पेठ स्थित बिग बाजार में गेमिंग का एक अलग ही जोन है, जहां अभिभावक अपने बच्चों को गेम खेलने के लिए लाते हैं। बच्चों को खेलते देख उनमें भी खेलने की उत्सकुता होती है। हालांकि वे लोकलाज से यहां नहीं खेलते हैं, लेकिन घर में कंप्यूटर पर गेम खेलने की हसरत जरूर पूरी करते हैं। अपने बच्चे के साथ आई श्रीमती हेमा ने बताया कि यहां उनका बेटा हमेशा आने की जिद करता है। उसे गेम खेलने में मजा आता है। उसे खेलने देख कर उन्हें भी खेलने का मन करता है। लेकिन बच्चों के बीच में उन्हें गेम खेलना अजीब लगेगा, यह सोचकर वे घर के कंप्यूटर पर कभी-कभी गेम खेल लेती हैं। बॉक्स- 3 10 करोड़ डॉलर का होगा गेमिंग बाजार स्ट्रेटजी और पज्जल आदि पर आधारित गेम अब केवल पुरुष ही नहीं खेलते हैं। मोबाइल पर गेम महिलाओं को भा रहे हैं। बहुराष्टï्रीय कंपनियां देश में महिलाओं को आकर्षित करने की विशेष योजना पर कार्य कर रही हैं। गेम में वे सुपरमेन की जगह सुपन वुमन का चरित्र तैयार कर रहे हैं। ज्ञात हो कि भारत में तकरीबन 1.2 करोड़ महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं। कुल भारतीयो द्वारा इंटरनेट के उपयोग के लिहाज से यह संख्या एक तिहाई बैठी है। जानकारों का कहना है कि भारत में ऑनलाइन कैजुअल गेमिंग बाजार 2010 तक 10 करोड़ डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। दुनिया भर में पहले ही गेमिंग का बाजार 2.25 अरब डॉलर तक पहुंच गयाहै और उम्मीद जताई जा रही है कि इस श्रेणी में 2010 तक महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़कर दोगुनी हो जाएगी। बॉक्स- 2मनोविश्लेषक की राय मनोविश्लेषकों के मुताबिक गेमिंग में महिलाओं रूची का कारण अधिक कामकाजी होना है। संयुक्त परिवार नहीं रहे। एकल परिवार में महिलाएं एक ही तरह के टीवी सिरियलों से ऊबने लगी है। अधिक थकान और तनाव दूरे करने के लिए थोड़ी देर उन्हें गेम खेलना अच्छा लगता है। हालांकि वे थोड़ी देर सोच कर बैठती है, लेकिन उसमें उनकी रोचकता इतनी बढ़ जाती है कि वे किसी गेम को पूरी तरह जिते बगैर कंप्यूटर नहीं छोडऩा चाहती हैं। मनोरंजन के लिए एक निश्चित समय गेम खेलने में बुराई नहीं है, लेकिन थोड़ी देर की मनोरंजन की लालच में इसके अभ्यस्त होने ने उनके दूसरे जरूरी काम भी प्रभावित होते हैं।

रविवार, जनवरी 20, 2008

गरबा और दांडिया से कम नहीं सिद्धियों का धमाल



बादशाह का कमाल

देश में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर मौके पर नृत्य की परंपरा है। हर नृत्य में भावनाओं की अभिव्यंजना होती है। अफ्रीका मूल के, पर गुजरात में आ बसे सिद्धियों का परंपरागत नृत्य हजरत बाबा गौर की इबादत में किया जाता है। शायद ही ऐसी कोई पुस्तक हो, जहां इन सिद्धियों का इतिहास मिलता हो। ऐसा विश्वास किया जाता है कि सिद्धियों का धमाल नृत्य करीब 700 साल पुराना है, जिसे गुजरात में बसे इसी सिद्धि समुदाय ने संरक्षित किया है। अपने देश में इस नृत्य के बारे में भले ही जानने वाले कम हैं, लेकिन इसकी प्रसिद्धि बहुत विस्तृत है। धमाल की प्रस्तुति करने वाले सिद्धियों की एक टीम से संजय स्वदेश की बातचीत।
गुजरात के लोकनृत्य गरबा और दांडिया को जितनी लोकप्रियता और सम्मान मिला है, उतना राज्य के सिद्धि आदिवासियों के नृत्य धमाल को नहीं मिला, जबकि यह नृत्य किसी भी मामले में गरबा और दांडिया से कम नहीं है। यह कहना है कि अपनी टीम के साथ करीब 36 देशों में सिद्धी-धमाल का कमाल दिखाने वाले मुन्ना बादशाह का। बहुत ही कम लोग यह जानते होंगे कि नृत्य के कलाकार अफ्रीकि मूल की जनजाति समुदाय के हैं। रूप-रंग और कद काठी भी अफ्रीकी जनजातियों की तरह ही है। पोशाक साधारण और परंपरागत होती है। घुटने तक के स्कर्ट और कमर तथा माथे पर मोर पंख लपेटे हुए, गले कौडिय़ों की माला पहनते हैं। चेहरे पर सफेद, काला,हरा और लाल रंग की पट्टियां बनाते हैं। टीम के सभी सदस्य कम पढ़े-लिखे हैं। कुछ ड्राइविंग करते हैं। बादशाह ने तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई की है। उनका कहना है कि नई पीढ़ी के ब"ो ऊंचे दर्जे की पढ़ाई कर रहे हैं। मुन्ना कहते हैं जिंदगी में एक ही ख्वाब है- धमाल को ऊंचाई तक ले जाना है। उनका कहना है कि धमाल सिद्धियों की परंपरा में इस तरह से समाया है कि इसे अलग कर ही नहीं सकते हैं।
16वीं शताब्दी में गुजरात आए थे
सिद्धि गुजरात के तटीय क्षेत्रों पर निवास करने वाली जनजाति है। 16वीं शताब्दी के आस-पास सिद्धियों की एक टीम यहां अफ्रीका से आकर बसी। बादशाह का कहना है कि, ऐसा कहते हैं कि अफ्रीका की एक टीम व्यापार या बेशकीमती पत्थरों की तलाश में रतनपूर आई और यहीं की होकर रह गई। देश भर के सिद्धि अगस्त माह में रतनपुर के हजरत बाबा गौर के दरगाह में इबादत के लिए करीब दस दिन के लिए इक्कठे होते हैं। उस समय यह जगह अफ्रीका के एक गांव की तरह लगता है। अपनी मूल भाषा भूल चुके सिद्धियों ने देश-दुनिया के विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने के कारण हिंदी भाषा में बातचीत करना सीख लिया है। इनकी आबादी गुजरात के कच्छ,ताला गीर, जाजपीपला, अहमदाबाद, भारूच, रतनपुर, झगडिय़ा और सूरत के अलावा कर्नाटक और अंदमान निकोबार द्वीप समूह तक फैली है। श्री बादशाह के मुताबिक सिद्धियों की कुल आबादी करीब 50 हजार है।
सिर फूटा, उत्साह कम नहीं हुुआ
ये नृत्य के दौरान हवा में नारियाल उछालते हैं और जब वह नीचे गिरता है तो उसे सिर पर रोकते हुए इसे फोड़ते हैं। इस करतबबाजी में कई बार अनहोनी भी हो जाती है। कई बार हवा में उछाली नारियल का नुकिला हिस्सा उसने सिर में लग जाता है और वे खून से लथपथ हो जाते हैं। अपनी कई प्रस्तुतियों में ये नृत्य के दौरान अंगार पर भी चलते हैं, मुन्ना का कहना है कि ऐसी अनहोनी कभी-कभी ही होती है। पर उत्साह कम नहीं होता है।
राष्टï्रपति के अंगरक्षकों ने आतंकवादी समझा
मुन्ना बादशाह अपनी प्रस्तुतियों का संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि एक कार्यक्रम में राष्टï्रपति के.आर. नारायणन मुख्य अतिथि थे। धमाल के दौरान जब हवा में नारियल उछाला और वह सिर पर गिरने के बजाय सामने बैठे राष्टï्रपति महोदय के पांव पर गिरा। वे सुरक्षा घेरे में थे। उनके अंगरक्षकों ने समझा कि मैं कोई आतंकवादी हूं और राष्टï्रपति को नारियल से मारना चाहता हूं।
अगर मंच पर आएं महिलाएं
सिद्धी महिलाएं भी धमाल करती हैं, लेकिन वे कभी मंच प्रस्तुति नहीं देती हैं। श्री बादशाह का कहना है कि यदि महिलाएं मंच पर आती हैं तो उनका समुदाय और सशक्त होगा।