रविवार, नवंबर 22, 2009

बाल ठाकरे में अयोध्या जाने की हिम्मत नहीं : अशोक सिंघल


बहक गये हैं राज ठाकरे

संजय स्वदेश


नागपुर। अयोध्या में गिराये गए बाबरी ढांचे का श्रेय लेने वाले शिवसेना प्रमुख के दावे पर विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल ने राम बाण छोड़ते हुए कहा है कि ठाकरे में इतनी हिम्मत नहीं कि अयोध्या जाते। औपचारिकता के लिए केवल अपने एक प्रतिनिधि मनोहर जोशी को वहां भेजा। बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने के लिए लाखों रामभक्त अध्योध्या पहुंचे, लेकिन एक भी शिवसैनिक नहीं आया। इसके उलट बाल ठाकरे ने यह दावा किया था कि बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने में शिवसैनिकों को गर्व है। रविवार की सुबह एक प्रेस कान्फ्रेंस में विहिप नेता ने ठाकरे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मस्जिद के ढांचे को गिराने में केवल एक प्रतिनिधि को भेज कर ठाकरे का ढांचा गिराने का दावा गलत है। उस समय आयोध्या में पहुंचे चार लाख रामभक्तों में एक भी शिवसैनिक नहीं था। गुजरात के गोधरा दंगों पर प्रतिक्रिया में श्री सिंघल ने कहा कि मोदी में दंगे कराने का दम नहीं था। गोधरा कांड राम का कोप था। इसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया स्वरूप गुजरात में दंगे हुए। समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी के विधानसभा में शपथ लेने के दौरान मनसे विधायकों की धक्का-मुक्की और दुव्र्यवहार पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में सिंघल ने कहा कि राज ठाकरे अच्छे घराने से हैं। लेकिन इन दिनों बहक गये हैं। वे महाराष्ट्र से हिंदी भाषियों को निकाल नहीं सकते हैं। राज ठाकरे के ऐसे कार्यों को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए। भगवान उसे सद्बुद्धि दे। उन्होंने कहा कि देश में आतंक का वातावरण तैयार हो रहा है। वंदे मातरम फतवा के मामले में श्री सिंघल ने गृहमंत्री को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि अफसोस की बात है कि जिस मंच पर देश के गृहमंत्री थे, उसी मंच से वंदे मातरम के खिलाफ फतवा जारी हुआ। ज्ञात हो कि कुछ दिन पूर्व विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण तोगडिय़ा ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहा था- फतवा तब जारी हुआ था, जब चिदंबरम वहां से जा चुके थे। श्री सिंघल ने कहा कि इस देश में रहना है तो हर किसी को वंदे मातरम का सम्मान करना होगा। यह आजादी का महामंत्र था। उन्होंने कहा कि जन गण मन गीत का स्वर गाते हुए हजारों लोगों ने अपना बलिदान दिया। वंदे मातरम का विरोध केवल शत्रु ही कर सकते हैं। इसका विरोध करने वाले भारत में पाकिस्तान बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि 50 साल पूर्व तिब्बत एक स्वतंत्र राष्ट्र था। दलाई लामा तिब्बत के धार्मिक और राजकीय नेता हैं। इसके बाद भी चीन बार-बार भारत को घुड़की देता है। सरकार कहती है कि चीन से कोई झगड़ा नहीं है। सरकार चीन से डर रही है, जबकि हमारी सेना चीन से मुकाबला करने में सक्षम है। दूसरी ओर देश के अंदर 300 जिले नक्सलवाद के चपेट में हैं। पर सरकार की नीति स्पष्ट नहीं है। आज की जैसी स्थितियां बन रही है, उसमें हिंदुवादी संगठन फिर से संगठित हो रहे हैं। ०००००००००००००००००००००००००००००००००००००

गुरुवार, नवंबर 19, 2009

पत्नी सताए तो किसे बतायें


संजय स्वदेश

अभी तक ज्यादातर महिलाओं पर अत्याचार के मामले सामने आते रहे हैं। इसे रोकने के लिए सशक्त कानून भी बनाए गए हैं। समय बदल रहा है। महिला सशक्तिकरण के जमाने में अब पति पत्नी से पीडि़त हैं। चाहे वे पत्नी के लगाए गए दहेज प्रताडऩा और घरेलू हिंसा के झूठे आरोप हों या फिर घर में आपसी कलह। पत्नीपीडि़ता कहां जाए? न कोई हमदर्दी न कोई सरकारी मदद। 19 नंवबर। तंग पति अंतरराष्ट्रीय पति दिवस मना रहे हैं। पार्टी करके। बैठक करके। फिल्म देखकर। कुछ पीडि़तों का समूहीक पिकनिक मनाकर एक दिन खुशियों का जी रहे हैं। अपने लिए। शायद वैसा दिन पत्नी के साथ फिर कभी नहीं जी पाएंगे। हकीकत बदल रही है। यकीन मानिये जितनी हिंसा महिलाओं के साथ हो रही है, वैसी ही हिंसा पुरुषों के साथ हो रही है। दो वर्ग बन गए हैं। एक ओर जहां पति पत्नी को पीटता है, वहीं दूसरे वर्ग में पत्नी से पति पीडि़त होकर दिल में टिस लिए जिंदगी से हर आस छोड़ रहा है। पहली बार त्रिनाद और टूबंको में 1999 में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में मनाया गया। भारत में इसी शुरुआत 2007 से हुई। पत्नी से प्रताडि़त होने के मामले में देश का कोई शहर अछूता नहीं है। बस अंतर इतना है कि महिलाओं से जुड़ी हिंसा को मीडिया ज्यादा कवरेज देता है। पीडि़त पति शर्म संकोच से कहीं नही जाते हैं। करीब डेढ़ दशक पूर्व दिल्ली के विभिन्न इलाकों में कई जगह लिखा हुआ मिलता था - पत्नी सताएं तो हमे बताएं, मिले नहीं लिखें। अब वो तख्ती तो नहीं दिखती है, लेकिन पीडि़त बढ़ गए हैं।

आए दिन शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के मामले प्रकाश में आते हैं। पर इसके पीछे की सच्चाई से बहुत कम ही लोग ही रू-ब-रू हो पाते हैं। कई बार इन कानूनों का दुरुपयोग कर पत्नी पति को प्रताडि़त करती है। इससे तंग आकर अनेक लोगों ने आत्महत्या की राह चुनी है। वर्षों गुजर गए। पत्नी पीडि़तों समूह संगठित होकर सरकार से लगातार संघर्ष कर देहेज उत्पीडऩ के कानून 498-ए में बदलवा कर इस जमानती बनाने की मांग कर रहा है। बदलाव के लिए सरकार विचार कर रही है। संगठन अगल पुरुष कल्याण मंत्रालय की मांग कर रहे हैं। पुरुषों के पक्ष में दस्ताबेज जुगाड़ कर सरकार के पास ज्ञापन भेजकर लगातार दवाब बना रहे हैं। कई शहरों में पत्नी पीडि़तों का समूह कही चुपचाप तो कहीं खुलेआम बैठक करते हैं। एक-दूसरे की समस्या सुनते हैं और सहयोग करते हैं। जब नया पीडि़त आता है तो उनकी काउंसलिंग होती है जिससे कि वह आत्महत्या न कर सके। पत्नी पीडि़त राजेश बखारिया दहेज उत्पीडऩ कानून के चक्कर में वर्षों से कोर्ट के चक्कर काटते-काटते इस अपने जैसे दूसरे पीडि़तों का दु:ख दर्द बांटते हैं। सहयोग करते हैं। कहते हैं कि अब तो नई नवेली दुलहन भी छोटी-छोटी बात पर दहेज विरोधी काननू का हवाला देकर घर-परिवार में वर्चस्व जमाने की कोशिश करती हैं। खेद की बात है कि जैसे ही पत्नी आरोप लगाती है और बात थाने तक पहुंचती है और मामला दर्ज होता है तो पति को जेल जाना पड़ता है। वह घोर अवसाद का शिकार हो जाता है। पत्नी की हरकतों से बेटे-भाई की जिंदगी में पडऩे वाली खलल से कर्ई मां-बहनों का दिल टूटा है। युवा पति कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते-काटते अधेड़ हो रहे हैं। लिहाजा, इस चक्कर में पड़े अधिकतर लोग आत्महत्या को अंतिम विकल्प मान लेते हैं। क्योंकि जैसे ही पत्नी के अरोप पुलिस दर्ज करती है, नौकरी चाहे सरकारी हो या निजी चली जाती है। श्रम और रोजगार मंत्रालय के वर्ष 2001-05 के जारी आंकड़ों के मुताबिक निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से करीब 14 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। कई सर्वे व जांच में यह बात सामने आ चुकी है कि आईपीसी की धारा 498 ए का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। इसके तहत कई पतियों पर दहेज के लिए पत्नी को प्रताडि़त करने के झूठे अरोप लगे हैं। दो साल पूर्व लागू घरेलू हिंसा उन्नमूलन कानून 2005 से तो महिलाओं को और ताकत दे दी है। उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 में एक सिविल याचिका 583 में यह टिप्पणी की थी कि इस कानून को तैयार करते समय कई खामियां रह गई हैं। उन खामियों का फायदा उठा कर कई पत्नियां पति को धमका रही हैं। उन्होंने बताया कि आंकड़े देखें तो औसतन जहां हर 19 मिनट में देश में किसी व्यक्ति की हत्या होती है, वहीं हर 10 मिनट में एक विवाहित व्यक्ति आत्महत्या करता है। वर्ष 2005-07 के आंकड़ों के मुताबिक दहेज उत्पीडऩ मामले में कानून की धारा 498-ए, के तहत 1,39,058 मामले दर्ज हुए।पत्नी पीडि़तों की एक संस्था सेव इंडिया फैमिली फउंडेशन पत्नी पीडि़तों को काउंसलिंग से मामले सुलझाने की कोशिश करता है। फाउंडेशन सरकार पर लगातार स्वतंत्र रूप से पुरुष कल्याण मंत्रालय बनाने की मांग कर रहा है। श्री बखारिया का कहना है कि यदि पत्नी किसी भी कारण से आत्महत्या करती है तो पुलिस तुरंत केस दर्ज कर आरोपियों को हवालात में ले लेती है। घर घरेलू कलह से तंग आकर पति आत्महत्या करता है तो पत्नी से पूछताछ तक नहीं होती है। पत्नी के प्रताडि़त करने के अधिकतर मामले साल 2000 से तेजी से बढ़े हैं। इसका प्रमुख जिम्मेदार टीवी पर प्रसारित होने वाले कुछ धारावाहिक हैं जिनकी अनाप-शनाप कहानी में नकारात्मक छवि वाली महिला पात्रों ने समाज में गलत असर छोड़ा है। लड़कों वालों में वधु पक्ष के परिवार के अनावश्यक हस्तक्षेप बढ़ा है जिससे महिलाओं में अहम् आ जाता है। बॉक्स में देश में आत्महत्या के मामले वर्ष 2005-07विवाहित पुरुष विवाहित महिलाएं1,65,528 88,128आत्महत्या का अनुपात प्रतिशत विवाहित पुरुष विवाहित महिलाएं65.25 34.75०००००० ००००० ०००० ०००० ००संजय स्वदेश, मुख्य संवाददाता, दैनिक 1857, नागपुर

बुधवार, नवंबर 18, 2009

बढ़ता ही जा रहा है बसपा के बागियों का गुस्सा



भैंस के साथ बसपा कार्यकर्ताओं ने किया प्रदर्शन'वीर सिंह, सचान, साखरे हटाओ,


महाराष्ट्र बसपा बचाओÓ अभियान जारी


संजय स्वदेश


नागपुर। करीब एक दशक पूर्व महाराष्ट्र की राजनीति में मजबूत पांच जमा कर कांग्रेस को शिकस्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी राज्य में पूरी तरह से अंर्तकलह में फंस चुकी है। बीत विधानसभा चुनाव में बसपा के वोट प्रतिशत में भारी गिरावट उसकी ताकत का आईन दिखा चुके हैं। हर का ठिकरा किसके सिर फोटो जाए, इसको लेकर राज्य के कार्यकर्ता और पदाधिकारी आपस में भीड़े हुए हैं। महाराष्ट्र में बसपा के प्रभारी पदाधिकारियों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। गत एक नवंबर से शुरू हुआ बसपा पदाधिकारियों के खिलाफ बसपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा अभी तक शांत नहीं हुआ है। मंगलवार को पार्टी के कार्यकर्ताओं ने मेडिकल कॉलेज चौक पर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पार्टी के महाराष्ट्र प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ एक भैंस पर नारे लिख कर प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर बसपा सुप्रीमों बहनजी का दलाल होने आरोप लगाया है। ज्ञात हो कि विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद कार्यकर्ताओं में उपजा असंतोष और विवाद चुनाव परिणाम आने के बाद से ही बढ़ता जा रहा है। इस असंतोष को दबाने के लिए पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश साखरे ने सात समर्पित कार्यकताओं को निष्कासित कर दिया था। इससे मामला और भड़क गया। अगले दिन नारी रोड स्थित पार्टी के कार्यालय में पार्टी के अन्य दस पदाधिकारियों ने इस्तीफा देकर राज्य पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों को हटाने की मांग करते हुए धरने पर बैठ गए थे। उन्होंने कार्यालय पर ताला भी ठोक दिया था। पार्टी सेअसंतुष्ट कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी की डूबती नैया को बचाने के लिए शीर्ष पदाधिकारी वीर सिंह, के।के सचान, सुरेश साखरे को हटाना आवश्यक है। इसके लिए वे हर प्रदर्शन में 'वीर सिंह, सचान, साखरे हटाओ, महाराष्ट्र बसपा बचाओÓ के नारे लगा रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी पार्टी के बागी नेताओं के धरना आंदोलन को विदर्भ के कार्यकताओं का समर्थन है। बसपा पार्षद हबीबुर्रहमान अंसारी ने पिछले दिनों कहा था कि विधानसभा चुनाव में बसपा की करारी हार की जिम्मेदारी प्रभारी नेताओं की है। वे राज्य में पार्टी का बेड़ागर्क करना चाहते हैं, लेकिन हम उनके मंसूबों को कामयाब नहीं होने देंगे। ज्ञात हो कि एक दशक पूर्व तक विदर्भ में प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच तीसरी ताकत बन कर उभरी बहुजन समाज पार्टी का जमीन लगातार खिसकती जा रही है। हर बार प्रमुख दल विशेष कर कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाने वाला हाथी इतनी सुस्त पड़ गया कि कई सीटों पर जीत का अंतर बसपा उम्मीदवार को मिले कुल वोटों से भी ज्यादा नजर आया।पिछले दिनों पार्टी कार्यकर्ताओं को यह भनक लगी थी कि उत्तर प्रदेश में हो रहे उप चुनावों के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती पार्टी पदाधिकारियों से राज्य विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार की खोज खबर लेने वाली थी। इसे लेकर पार्टी पदाधिकारियों के पहले से ही हाथपांव फूले हुए थे। इसके बाद पार्टी का विद्रोह के तेवर तेज हो गए। पार्टी पार्टी की हार की समीक्षा के लिए आयोजित हर बैठक में शीर्ष पदाधिकारियों को विरोध का सामना करना पड़ा था।


मंगलवार, नवंबर 10, 2009

बाप की गलती क्या सुधारेग अबू आजमी : डा. तोगडिय़ा


संजय स्वदेश
नागपुर। महाराष्ट्र विधानसभा में हिंदी में शपथ ग्रहण को लेकर सोमवार को हो हल्ला हो, रहा है। उसमें चारों ओर राज ठाकरे की बुराई हो रही है। लेकिन इसी बीच विश्व हिंदू परिष के अंतरराष्ट्रीय महासचिव डा। प्रवीण तोगडिय़ां ने यह कह कर अबू आजमी पर धावा बोल दिया है कि हिंदू को लेकर जो गलती अबू आजमी के बाप ने किया उसे सुधारने का काम अबू न करें। एक जमाने में अबू आजमी के बाप ने उत्तर प्रदेश में हिंदी का विरोध कर उर्दू का समर्थन किया था। कल तक जो हिंदी भाषा का विरोध कर उर्दू के समर्थन में लड़ रहा था, उसे हिंदी भाषा का समर्थन करने का कोई अधिकार नहीं।


नागपुर के तिलक पत्रकार भवन में आयोजित एक प्रेस कांन्फ्रेंस में डा. तोगडिय़ों ने कहा कि अबू आजमी मराठियों और हिंदुओं के बीच वैमनस्य फैला रहे हैं। किसी भी समुदाय को अबू आजमी के बहकावे में आने की जरूरत नहीं है। हम हिंदी-मराठी मसला आपस में हल कर लेंगे। मैं उर्दू भाषा का हिमायती नहीं हंू। बाकी सभी भाषाओं का मैं दिल से आदर करता हूॅँ। हिंदी भाषा को शस्त्र बनाकर राजनीति की रोटी सेंकने का काम अबू आजमी कर रहे हैं। राज ठाकरे सही हैं या गलत? इस पर डा. तोगडिय़ा ने कुछ भी कहने से इनकार किया। दलाई लामा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि तिब्बत को अलग राष्ट्र बना देना चाहिए ताकि चीन का सारा फोकस उधर चला जाए। चीन को सबक सिखाने के बारे में हम सरकार पर दबाव बनाएंगे।डा. तोगडिय़ा ने कहा कि राष्ट्रगान 'जन-गण-मनÓ तथा राष्ट्रगीत वंदे मातरम् दोनों का अपमान राष्ट्रद्रोह है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद देवबंद के उलेमाओं ने वंदे मातरम् पर फतवा जारी कर देशद्रोही होने का प्रमाण दिया है। देवबंद समुदाय इस तरह के फतवे से आतंकियों के हांैसले बुलंद कर रहा है। इसमें शामिल सभी उलेमाओं, मौलवियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। अगर सरकार इन पर कार्रवाई नहीं करती तो हम जनता से आह्वान करेंगे कि वे ऐसे लोगों को देश से खदेड़ दें। डा. तोगडिय़ा ने कहा कि भारत में मुगलों का विरोध शिवाजी भोसले ने किया। दारूल उल देवबंद के उलेमाओं ने पाकिस्तान के ५०० मदरसों में आतंकियों को प्रशिक्षित कर तालिबान को जन्म दिया। कंधार हाईजेक में शामिल अजहर मसूद भी देवबंद से संबंधित है। भारत की भूमि पर ऐसे लोगों को एक दिन भी रहने का अधिकार नहीं है। हम सरकार पर दवाब बनाकर उलेमाओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे। एक सवाल के जवाब में डा. तोगडिय़ा ने कहा कि मैं गृह मंत्री पी. चिदंबरम का पक्ष नहीं लूंगा। जिस समय फतवा जारी हुआ उस समय वे वहां मौजूद नहीं थे।

रविवार, नवंबर 08, 2009

आधी सदी का निर्वासित जीवन



संजय स्वदेश


ठंड के मौसम में तिब्बती शरणार्थियों के गर्म कपड़ों से कौन परिचित नहीं होगा। हर साल सर्दी शुरू होते ही देश के प्रमुख शहरों में कई तिब्बती सपरिवार आते हैं। उनके रंग-बिरंगे फैशनेबल गर्म कपड़े नागपुर के लोग खूब पसंद करते हैं। गर्म कपड़ों के खरीदार शायद ही उनके आंखों में झांकते दर्द को पढऩे की कोशिश करते होंगे। पचास साल हो गए। तिब्बती लोग देश के विभिन्न क्षेत्रों में निर्वासित जीवन जीने को अभिशप्त हैं। हालांकि सरकार ने उन्हें गुजारा करने के लिए खेती की जमीन भी दी है। खेती से इतनी आय नहीं होती कि वे साल भर गुजारा कर सकें । लिहाजा, सर्दी शुरू होते ही वे विभिन्न शहरों में गर्म कपड़े बेचने निकल पड़ते हैं। 50 साल से खानाबदोश जीवन से तंग तिब्बती परिवार, नई पीढ़ी को इस पेशे नहीं जोडऩा चाहते हैं।


संतरानगरी नागपुर के मध्य में स्थित यशवंत स्टेडियम के समीप पटवर्धन मैदान में तिब्बती शरणार्थियों ने गर्म कपड़े की दुकानें सजा दी हैं। ये वर्षों से संतरानगरी में आ रहे हैं। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि संतरानगरी के इन मेहमानों का जीवनयापन केवल गर्म कपड़ों के व्यवसाय से नहीं चलता है। यह उनका केवल तीन-से चार महीने का व्यवसाय है। बाकी समय तो वे खेती करते हैं। खेती में जी-तोड़ मोहनत के बाद भी उन्हें इतनी कमाई नहीं होती कि वे साल भर गुजारा कर सकें। मौसम ने बेरुखी दिखाई तो खेती से भारी नुकसान उठाना पड़ता है। तब इस नुकसान की भरपाई अक्सर सर्द मौसम में गर्म कपड़ों के व्यापार से होती है। मैसूर की डोलमा ने बताया कि वह 5 एकड़ जमीन में खेती करती हैं, पर खेती में लागत ज्यादा होने और मौसम की बेरुखी से जब अच्छी फसल नहीं होती तब आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। उन्हें इस पेशे में नहीं लाना है, क्योंकि यह बहुत तकलीफ वाला है। सर्द मौसम में सुबह जल्दी उठ कर घर का काम, फिर स्टॉल सजाओ, रात को घर वापस जाकर खाना बनाना-खाना। अपने लिए समय ही नहीं मिलता है। प्रेमा दसवीं की छात्रा है। उसके परिवार के लोग गोंदिया में चावल की खेती करते हैं। कहती है वह केवल दुकान में बैठती है। बारी-बारी से दुकान में बैठने से घर के दूसरे लोग आराम कर लेते हैं। हुबली की भी यही परेशानी है। कहती हंै कि जब खेती पर मौसम की मार पड़ती है, तो सर्दी में फैशनेबल गर्म कपड़ों का साथ मिलता है। नागपुर के लोग गर्म कपड़ों में भी फैशन और स्टाइल देखते हैं। इसलिए यहां फैशनेबल कपड़े ज्यादा लेकर आते हैं। तेंजिन कहती हैं कि गर्म कपड़ों का व्यवसाय कुछ महीने का है। कई सालों से इसी व्यवसाय से जुड़े हैं, इसलिए दूसरा बदलने की सोचते नहीं। तिब्बती शरणाथियों के संगठन के प्रमुख टी. नूरपुर ने बताया कि अल्पकालीन समय के लिए बने इस बाजार के लिए वे मनपा को चार लाख रुपये किराये के रूप में देते हैं। हर साल मनपा की ओर से ही इस बाजार की व्यवस्था की जाती है। यहां करीब 60 परिवारों के स्टॉल हैं। हर परिवार के नन्हे-मुन्ने इसी बाजार में खेलते हैं। श्री नूरपूर ने बताया कि उनके गर्म कपड़े दिल्ली और पंजाब से आते हैं। कई दुकानदार बैंक से ऋण लेकर स्टॉल सजाते हैं। विश्वसनीयता के आधार पर व्यापारी कपड़े भी उधार देते हैं। नवंबर से जनवरी तक नागपुर में रहते हैं। इस बीच व्यापारी अपनी उधार वसूली के लिए आते हैं। पिछले साल ठंड ज्यादा होने से कपड़े जल्दी बिक गये थे। फिलहाल अभी ठंड नहीं होने से बिक्री सामान्य है। कई दुकानदारों के पास ऋण चुकाने भर की पर्याप्त कमाई नहीं होती तो उनकी चिंता बढ़ जाती है। खेती में उपज और सर्दी कम होने से कई परिवार कर्ज के बोझ से दब जाते हैं।

पढ़ाई पूरी करने के शर्त पर बच्चों को रोजगार



संजय स्वदेश


नागपुर के विभिन्न चौक-चौराहों पर गुजरते वक्त दीवारों पर कामगार मुले पाहिजे और उसके नीचे दो मोबइल नंबर लिखा नजर आता है। इस विज्ञापन को गौर से पढऩे वाले शायद सोचते हो कि बच्चे सस्ते मजदूर होते हैं, इसलिए उनके ही रोजगार के लिए यह विज्ञापन होगा। पर इस विज्ञापन को को पढ़कर इसके पीछे के सामाजिक उद्देश्य के बारे में कोई नहीं जानता है। आमतौर पर पढ़ कर लोग यही समझते हैं कि इस माध्यम से बच्चों को काम दिया जाता होगा। पर हकीकत कुछ और है। इश्तहार देने वाले सुजाता नगर के बुद्धरक्षित बन्सोड हैं।



श्री बन्सोड पढऩे-लिखने की उम्र में मजदूरी करने वाले बच्चों के लिए रोजगार के साथ-साथ शिक्षा की राह आसान करने का बीड़ा उठाये हुए हैं। गत एक वर्ष से वे अब तक दर्जनों बच्चों को शिक्षा की राह दिखा चुके हैं।श्री बन्सोड का कहना है कि हर दिन उनके पास पांच-छह बच्चों को फोन आता है। फोन करने वाले बच्चों को वे घर बुलाते हैं। उनकी हर स्थिति अच्छी तरह से समझते हैं। यदि बच्चो की उम्र 14 साल से ऊपर होती है, तो उसे इस शर्त पर कार आदि की साफ-सफाई का काम देते हैं कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करेगा। यदि लड़के की उम्र 14 साल से कम होती है, तो उसे समझाते हैं और उसे नगर के नि:शुल्क छात्रावास में दाखिला दिलाते हैं। इसके लिए कुछ आर्थिक सहयोग भी देते हैं। स्वयं ट्यूशन पढ़ाते हैं। यदि किसी कारणवश उस समय छात्रावास में दाखिले का समय निकल चुका होता है, तो उसके माता-पिता से मिल कर इस बात के लिए सहमत करते हैं कि बच्चों को पढ़ायें और निश्चित समय पर छात्रावास में दाखिला दिलायें, जहां उन्हें नि:शुल्क शिक्षा मिलेगी।स्टेशन पर भाग कर आए बच्चों की तलाश बुद्धरक्षित सुबह 4 बजे स्टेशन पर बाहर से भाग कर आने वाले बच्चों की तलाश में जाते हैं। यदि किसी दिन ऐसा लड़का मिल जाता है, तो उससे बातचीत कर दोस्ती करते हैं। उसे काम के साथ-साथ पढ़ाई कराने के लिए सहमत कर अपने घर लाते हैं। फिर उसके साथ घर जाकर बच्चों के माता-पिता से मिलते हैं और उन्हें काम कराने के बजाये पढ़ाने के लिए सहमत करते हैं।कहां से मिली प्रेरणा?बुद्धरक्षित 12 भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं। उम्र 32 साल की है। बचपन में ही गंदे नाले और गलियों में प्लास्टिक और हड्डियां चुनते थे। उसे बेचने से जो पैसा मिलता था, उससे पेट भरते। एक बार घर से भाग कर मुंबई गए तो वहां गलत लोगों के चंगुल में फंस गए। लेकिन मां की याद ने वापस नागपुर आने के लिए विवश कर दिया। नागपुर वापस आए तो बहुजय हिताय संस्था से संपर्क हुआ। यहां से मजदूरी के साथ-साथ पढ़ाई की प्रेरणा मिली। स्नातक पूरी करने के बाद समाज सेवा में स्नातकोत्तर किया। फिलहाल डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं।
जेल में बंद मासूमों को देनी है नई जिंदगीबुद्धरक्षित का कहना हैकि कानून की पढ़ाई करने का मकसद उन बच्चों को एक नई जिंदगी देना है जो बचपन में छोटे-मोटे अपराध के कारण जेल में हैं। भागे हुए बच्चों को पढ़ाने के उद्देश्य से कई लोग आर्थिक मदद देते हैं। 14 साल से अधिक उम्र के जो बच्चो हमारी टीम में होते हैं। वे पढ़ाई के साथ-साथ सप्ताह में एक या दो बार कार धोते हैं। इसके एवज में उन्हें 1000-1200 रुपया मासिक पारिश्रमिक मिल जाता है।क्या कहते हैं लोग?लीक से हटकर काम करने वाले दूसरे लोगों की तरह बुद्धरक्षित को भी लोग पागल समझते हैं। घर वालों के विरोध के चलते अलग से किराये के मकान में रहते हैं। कहते हैं कि जब वे गंदी बस्तियों में बच्चों के माता-पिता को पढ़ाने के लिए समझाने जाते हैं, तो लोग हंसते हैं। लेकिन बुद्धरक्षित को इन सबकी चिंता नहीं। उनका काम तो बस अपने काम में लगे रहना है। उन्होंने बताया कि अब उन्होंने इसके साथ नया काम और शुरू किया है। बस्ती में निर्धन और बेसहारा लोग जब बीमार पड़ते हैं तो उनके इलाज के लिए वे सरकारी अस्पताल ले जाते हैं और मदद करते हैं।

शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2009

अतीत भूलना बुरी बात है.



को आपना अतीत नही भुलाना चाहिए। इस पर काफी लम्बी चर्चा हो सकती है। पर अव नही। फिलहाल एश फोटो के देखिये। इसे आज ही मैंने आपने ईमेल के फोल्डर में देखा। तो पाया की मै कैसा था और कैसा हो गया। फोटो शायद २००४ या २००५ की है। तब और अब तक मेरे चहरे में काफी सफर किया। मेरे एक मित्र बोले थे की आपनी स्वाभाविकता कायम राखिय। पर आज मैं सोचता हूँ की क्या मेरी स्वाभाविकता आज व् पहले की तरह कायम हैं। मुझे लगता हैं हैं और नही भी। टाइम निकल कर एश्पर चिंतन मनन करूँगा की पहले की जो स्वाभाविकता थी और आज की स्थित में क्या जरुरी हैं। पर इतना तो तय है की अतीत को भूल कर व्यक्ति खुट को धोखा ही दे सकता हैं।

सोमवार, अक्टूबर 26, 2009

पहाड़ तोड़ता बचपन


पहाड़ तोड़ता बचपन
26 December, 2008
संजय स्वदेश
समान काम के लिए समान मेहनताना, बालश्रम की मुक्ति और सर्व शिक्षा अभियान के तहत देश के कोने-कोने में शिक्षा को अलख जगाने के दावे झूठे हैं। इसे कोई हम नहीं झुठला रहे रहे रहैं। इसे झुठला रहे हैं महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों के खान क्षेत्र में पत्थर तोड़ने वाली महिला मजदूर, शिक्षक और मासूम बच्चे। इनका एक समूह दिंसबर माह में नागपुर में हो रहे विधानसभा की शीत सत्र में अपने हक को पाने के लिए नागपुर आया था। धरना एक गैर सरकारी संगठन के नेतृत्व में था। प्रतिबंध के बावजूद पत्थर क्षेत्रों में बाल मजदूरी जारी है। वहां सरकारी स्कूल हैं। पर इतनी दूर कि बच्चे नहीं जाना चाहते। स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग के पत्थर खानों के आसपास ही छोटे-छोटे स्कूल चलते हैं। मान्यता और अनुदान नहीं मिलने के कारण स्वयंसेवी शिक्षकों को आर्थिक संकट का सामान करना पड़ता है। महिला-पुरूष की मजदूरी के भुगतान राशि में भी अंतर है। असंगठित क्षेत्र की श्रेणी मे आने के कारण इन मजदूरों के पास न तो राशन कार्ड है और न ही मतदाता सूची में नाम। वोट कहां और किसलिए डालते हैं? कुछ पता नहीं है।


ये तो बस एक गैर- सरकारी संगठन के कहने पर नागपुर आए। खान क्षेत्र में खुले आसमान के नीचे यत्र-तत्र चल रहे स्कूलों की मान्यता के नारे लगाए और चले गए। पर धरना देने वाले शिक्षिकाओं, महिला मजदूर और बाल मजदूरों को जनप्रतिनिधियों के आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। शिक्षा की अलख जगाने को किसी तरह की पारिश्रमिक भी मिलेगी या नहीं पता नहीं? खान क्षेत्रों में पढ़ाने वाले शिक्षकों में अधिकतर महिलाएं हैं। धरने पर बैठी महिलाओं से मिलने लातूर जिले के अहमदपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक बब्रुवान खंदाड़े, गंगाखेड परभणी के विठुल गायकवाड, और चौसाला बीड के विधायक किशव राव आंधले, हेर लातूर के टी.पी. कांबले मिलने आए। आश्चर्य की बात है कि पूछने पर इन विधायकों ने बताया कि आज तक उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि खान क्षेत्रों में इस तरह से महिलाओं का शोषण हो रहा है। इस मामले में पहली बार ज्ञापन प्राप्त हुआ है।

2020 तक 7.5 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार की संभावना- वर्ष 1999-2000 में राज्य में प्राथमिक खनिजों के लिए 250 और गौण खनिजों के लिए 1772 लाइसेंस मिला था। इससे राज्य सरकार को 30 करोंड़ रूपये राजस्व प्राप्त हुआ था। 421041 लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ था। अनुमान है कि वर्ष राज्य के खनिज क्षेत्रों से 2020 तक 112320 लाख रूपये राजस्व में प्राप्त होगा। 7.5 लाख लोग रोजगार से जुड़ेगे। खनिज क्षेत्र से जुड़े मजदूरों में करीब आधी संख्या महिलाओं की हैं।संतुलन की सचिव पल्लवी रेगे कहती हैं कि खनिज कानून 1952 के अनुसार इस 18 साल के कम उम्र के लोगों का काम करना प्रतिबंधित है। प्रतिबंध के बाद भी राज्य के विभिन्न खान क्षेत्रों में 18 साल के कम उम्र के करीब दस लाख लड़के-लडिकियां कार्यरत हैं। अधिकतर मजदूर खान क्षेत्रों में रहते हैं। बच्चे भी पत्थर तोड़ने में लग जाते हैं। सरकारी स्कूल हैं, पर बहुत दूर। वहां वे पढ़ने नहीं जाना चाहते। थोड़े से पैसे के लालच में इनका बचपन पत्थर तोड़ने में गुजर जाता हैं। श्रीमती पल्लवी का कहना है कि सरकारी योजना होने के बाद भी मजदूरों के कल्याण के लिए कोई योजना नहीं चलती हैं। चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है। पत्थर खदान के मालिक, ठेकदार सामाजिक कार्यकर्ताओं को मजदूरों से मिलने नहीं देते हैं। खान क्षेत्र में ही मजदूरों के बच्चों को इस शर्त पर पड़ाने के लिए अनुमति देते हैं कि वे दूसरे कार्यों में किसी तरह की दखल नहीं देंगे। श्रम विभाग की टीम आने की सूचना इन्हें पहले ही मिल जाती है। तुरंत कुछ मजदूरों के लिए हेल्मेट, जूते आदि की व्यवस्था कर देते हैं। बाकी को छुट्टी दे देते हैं।

सुनीता निवल की उम्र करीब 13 साल है। आठवीं कक्षा में पढ़ती है। बड़ी होकर स्कूल खोलने का सपना है। सुनीता ने बताया कि कभी-कभी मम्मी-पापा के साथ खदानों में पत्थर तोड़ती है। कुछ महीने की बात है। पत्थर तोड़ने के दौरान उसके भाई का पांव टूट गया। ठेकेदार ने पैसे भी नहीं दिए। फिर भी उसके पास यह करने के अलावा कोई चारा नहीं है. पुणे के खान क्षेत्रों में पढ़ाने वाली शिक्षिका सरोजना कुटे का कहना है मजदूरों के बच्चों में पढ़ने की रूचि नहीं है। फिर दूर के स्कूलों में जाने की बात दूर की है। स्वयंसेवी संगठन की ओर इन बच्चों को पथरीले क्षेत्रों में ही किसी पेड़ के नीचे या पत्थर पर ही इकठ्ठा करके पढ़ाने की कोशिश चलती है। इस काम के लिए एजनीओ की ओर से कुछ वेतन भी मिलता था। अब वह भी बंद हो गया।

सतारा के कराड तालुक के सुरली गांव के खान क्षेत्र में पढ़ाने वाली भारती मोरे कहती हैं कि मजदूर सुबह छह बजे घर से निकल जाते हैं औश्र शाम छह बजे वापस आते हैं। इस बीच उनके बच्चे इधर-उधर खेलते रहते हैं। कई बार हम लोग घूम-घूम कर इन बच्चों को इकठ्ठा कर पढ़ाने की कोशिश करते हैं। कोल्हापुर की सुरखा माली भी कुछ ऐसी ही कहती है। उनका कहना है कि जिन क्षेत्रों में वे पढ़ाने जाती हैं, वहां खान मजदूरों के करीब 100 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल के नाम पर कोई भवन नहीं है। इधर-उधर बच्चों को बैठा कर पढ़ाते हैं। सर्व शिक्षा अभियान के तहत मिलने वाला पोषहणार अभी यहां तक नहीं आया है। कोल्हापुर की खान मजदूर सकू हरसुड़े का कहना है कि पत्थर तोड़ने की एक दिन की मजदूरी 40 रूपये है। पुरूषों को इसी काम के लिए 60 रूपये मिलते हैं। कभी-कभी ठेकेदार से ही एक ट्रॉली भरने का ठेका मिल जाता है। जिसमें परिवार के हर सदस्य मिल कर पूरा करते हैं। इसमें बच्चे भी शामिल होते हैं।


दोष सिद्ध करना मुश्किल
यहीं स्थित क्षेत्रिय श्रम आयुक्त (केंद्रीय) उमेश चंद कहते हैं कि इन क्षेत्रों में जब भी कोई जांच टीम जाती है। वाहन आते देख मजदूर इधर-उधर बिखर जाते हैं। कोई बच्चा मिलता है तो पूछताछ पर वे तरह-तरह के बहाने बनाते हैं। कोई कहता है मिलने आए थे, तो कहता है इन्हीं पत्थरों से खेल रहे थे। यदि कोई मामला दर्ज भी कर लिया जाता है तो कठिनाई उसे कोर्ट में सिद्व करने में होती है। सारे प्रमाण उन क्षेत्रों में तत्कालीन होते हैं। महिला-पुरूष असमान मजदूरी के बारे में हमेशा जांच पड़ताल होती है। इस मामले में इस साल सौ से भी अधिक मामले दर्ज हुए।

श्रम कल्याण कार्यालय के पास जिम्मेदारी नहीं
नागपुर में श्रम कल्याण विभाग का कार्यालय है। कार्यालय के गेट पर खान मजदूरों के कल्याण के लिए ढ़ेरों योजनाओं की सूची एक बोर्ड पर लिखी है। पूछने पर यहां के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं विभाग की कल्याणकारी योजनाएं लौह मैगनीज, क्रोम अयस्क, डोलोमाइट, चूना पत्थर और बीड़ी मजदूरों के लिए ही ही है। पत्थर खदानों में कार्यरत मजदूरों के कल्याणकारी योजनाएं उनके पास नहीं है।

बुधवार, जून 10, 2009

पुण्य प्रसून बाजपयी

हिन्दुत्व के जीरो ग्राउंड जीरो से बीजेपी को परखना

बीजेपी के ग्रांउड जीरो पर मोदी का कांग्रेसीकरण

पुण्य प्रसून वाजपेयी

जिस युवा राजनीति का सवाल कांग्रेस के भीतर उफान पर है, वह उफान हिन्दुत्व की
प्रयोगशाला के राज्य गुजरात में बीजेपी के गढ राजकोट में अर्से से है । राजकोट
में कम्पयूटर साइंस से लेकर बिजनेस मैनेजमेंट और मेडिकल से लेकर बीपीओ से जुडा
युवा तबका बीजेपी का झंडा उठाने से नही चुकता लेकिन लहराते झंडे में संघ की
वैचारिक समझ देखना चाहता है । आरएसएस की इस राजनीतिक ट्रेनिंग का असर कमोवेश
समूचे सौराष्ट्र में है । जिसका केन्द्र राजकोट है और वजह भी यही है कि बीजेपी
ने कभी राजकोट सीट को नहीं गंवायी लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी
राजकोट में कांग्रेस से हार गयी । लेकिन बीजेपी के युवा कार्यकर्त्ताओ की माने
तो बीजेपी काग्रेस से नहीं बीजेपी के कांग्रेसीकरण से हार गयी । और सौराष्ट्र
में बीजेपी का मतलब है नरेन्द्र मोदी । तो पहली बार गुजरात में संघ और बीजेपी
के भीतर यह सवाल जोर-शोर से कुलबुला रहा है कि नरेन्द्र मोदी का भी
कांग्रेसीकरण तो नहीं हो रहा है । कांग्रेसीकरण का सवाल चुनाव को लेकर बनायी
गयी रणनीति और चुनाव के बाद देश की राजनीति में मोदी की अपनी भूमिका के तौर
तरीको को अपनाने से है । सौराष्ट्र में बीजेपी और आरएसएस ही नहीं किसी भी तबके
के बीच बैठते-घूमते हुये कोई भी नरेन्द्र मोदी की गैर मौजूदगी में भी मोदी का
एहसास कर सकता है । द्रारका में द्वारकादीश मंदीर के बाहर मनीष की पान की दुकान
हो या पोरबंदर में गांधी के जन्मस्थल वाले मोहल्ले में दिनेश सर्राफा की दुकान
या फिर सोमनाथ में सोमेश का एसटीडी बूथ...हर जगह नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी
तस्वीर को दुकान में चस्पा कर दुकानदार गर्व भी महसूस करता है और सामाजिक अकड
भी दिखाता है । युवा तबका मोदी के साथ तस्वीर खिंचा कर अपने घेरे में अपनी अकड
दिखाने से नही चूकता तो बच्चे और महिलाये मोदी के हस्ताक्षर लेकर मोदी की नायक
छवि को बरकरार रखते है । नायक की यह छवि मोदी की किस्सागोई से भी जुड चुकी है ।
मसलन सडक से गुजरता मोदी का काफिला आम लोगो की आवाजाही नहीं रोकता । सडक पर कोई
दुर्घटना हो तो लोगो की आवाजाही चाहे जारी रहे लेकिन मोदी का काफिला रुक जाता
है और घायलो का कुशलक्षेम पूछ कर ही आगे बढता है । मोदी की लोकप्रियता का यह
अंदाज मोदी को आरएसएस की उस राजनीतिक ट्रेनिंग से अलग खडा करता है जिसमें
वैचारिक शुद्दता के साथ आदर्श समाज की परिकल्पना हो । जिसमें संगठन और
हिन्दुत्व समाज का भाव हो । ऐसा नहीं है कि अपनी लोकप्रियता को इस तर्ज पर
देखने के लिये मोदी ने कोई खास रणनीति अपनायी । असल में आरएसएस की राजनीतिक
ट्रेनिंग और बीजेपी की राजनीति ने जहा दम तोडा वहां नयी पीढी और आर्थिक सुधार
के बाद बनते नये सामाज की जरुरतो को मोदी ने थामा । इसलिये मोदी का संकट दोहरा
हो गया । एक तरफ मोदी की प्रयोगशाला में संघ ने भी खुद को झोका और रास्ता ना
पाकर बीजेपी भी नतमस्तक हुई। वही दूसरी तरफ इस प्रयोगशाला की हर कैमिकल थ्योरी
मोदी ही रहे तो मोदी को देखने का नजरिया भी हर तबके ने अपने अपने तरीके से
अपनाया । किसी के लिये मोदी हिन्दुत्व का झंडाबरदार रहे तो किसी के लिये विकास
का प्रतिक तो किसी के लिये बालीवुड के नायक सरीखा हो गये । इस अंदाज ने मोदी को
भी बरगलाया । जिन्हे टिकट दिया गया उनका वास्ता संघ से रहा नहीं और सामाजिक
पहचान बीजेपी के बीच की है नहीं । हां, बाजार और पूंजी से पहचान बनाने वाले
बीजेपी के उन समर्थको को मोदी ने ना सिर्फ टिकट दिया बल्कि गुजरात बीजेपी में
उनकी राजनीतिक हैसियत भी बढायी । राजकोट के उम्मीदवार किरण पाटिल इस सोच के
प्रतिक है । जो पैसे के बूते बीजेपी का टिकट तो पा गये लेकिन बीजेपी के भीतर ही
वोट ना मिलने से हार गया । असल में आरएसएस ने गुजरात में जो राजनीतिक ट्रेनिगं
दी उसमें हर जिले में ऐसे पैसे वालो की भरमार है जो संघ या बीजेपी की कार्यशाला
या बैठको को सफल बनाने के लिये हर तरीके से भोतिक इंतजाम करते रहे है । मोदी ने
पूंजी और राजनीति को मिलाकर उन्हे ही राजनीतिज्ञ बना दिया जो कल तक पार्टी के
इंतजाम का खर्चा उठाते - देखते थे । बीजेपी के इन नये कर्ताधर्ता के राजकरण के
तौर तरीके कांग्रेसी सरीखे है । जिसमें आरएसएस की सामाजिक सोच नहीं बल्कि सत्ता
बनाये रखने के तौर तरीके चलते है । यह तरीके बीजेपी के नेता और कार्यकर्ता के
बीच खायी लगातार चौडी भी करते जा रहे है । कार्यकर्ता की समझ या उसके सुझाव या
उसकी जरुरत लोकप्रिय मोदी स्टाइल के आगे कोई मायने नहीं रखते । क्योकि
कार्यकर्ता जहा के जो सवाल खडा करता है वहा से या तो मोदी सीधा संपर्क बनाने की
दिशा में हिरो की तरह जाते है यै अपने नये राजनीतिक करिन्दो के जरीये राजनीति
टटोलते है । यह स्टाइल मोदी को घेरे समूह में भी है । यानी मोदी जैसा ही उसे
घेरे लोग भी बनना-दिखना चाहते है । तो हर का वास्ता स्टाइल से होता है ना कि
मोदी से । कल तक जो घन्नसेठ फक्कड और मुफलिस संघी स्वसंसेवक या बीजेपी नेता को
अपने घर में ठहरा कर भोजन करा कर घन्य समझता था वही सेठ नेता बनने के लिये अब
जोड-तोड भी कर रहा है और वैचारिक तौर पर खुद को ज्यादा समझदार नेता भी मान रहा
है और फक्कड-मुफलिस संघी को बाहर से ही बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चुक रहा
। चुंकि मोदी ही सर्वोसर्वा है और उन तक सीधी पहुंच उस तहके की है तो वह भी
कार्यकर्ता-नेता को कुछ नहीं समझता । चूंकि दंगो से उपजी हिन्दुत्व प्रयोगशाला
का पाठ बीजेपी की राजनीति के लिये ज्यादा देर तक फायदेमंद हो नही सकता है है
इसलिये बीजेपी से पहले मोदी ने ही नये राजधर्म के नये-नये तौर तरीके अपनाये ।
जिससे 2002 की पहचान का तमगा ही छाती पर ना टंगा रहे । इसलिये 2009 तक आते आते
मोदी ने विकास का खांचा उस नयी अर्थव्यवस्था के ही इर्द-गिर्द ही रचा जिसके
खिलाफ स्वदेशी जागरण मंच काम करता रहा है । जिसमें वैक्लपिक आर्थिक खांचा खडा
कर स्वावलंबन का सवाल है । खेती और उघोगो के सामानांतर समाज के हर तबके को भी
एक साथ खडा करने का सवाल है । वही मोदी के अंदाज ने सौराष्ट्र के एनआरआई समेत
उस क्रिम तबके को पकडा जिसकी जरुरत विकास का इन्फ्रास्ट्रक्चर खडा करने की थी ।
जिसके लिये वह फंडिंग के लिये भी तैयार है । मोदी ने उघोगोपतियो को रिझाने के
लिये सौराष्ट्र की जमीन का एनओसी खुद ही बांटे । उघोगो के लिये
इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने का जिम्मा भी खुद उठाया । उघोगो तक बेहतरीन सडक
बनाने की रफ्तार भी अपने हाथ में रखी । भ्रष्ट्राचार या कमीशनखोरी के बंदरबांट
को सीधे सत्ता से जोडा । और सत्ता को भी इस तबके में हिस्सेदारी दे दी । इसका
बेहतरीन उदाहरण पोरबंदर में देखा जा सकता है जहां सबसे ज्यादा एनआरई है । तो
पोरबंदर जिला भी है और औघोगिक विकास की नगरी भी । बडे किसान भी है और
किसान-व्यापारी मोदी स्टाइल के प्रतिक भी है । असल में नरेन्द्र मोदी राजनीति
एक स्टाइल है जो गुजरात में पांच करोड गुजरातियो का नाम तो लेता है लेकिन
सामाजिक तौर पर महज पचास लाख गुजरातियो के जरीये बाकियो को इस स्टाइल को अपनाने
पर ही टिका देता है । ऐसे में सत्ता की कार्यप्रणाली भी संगठन से इतर इसी
स्टाइल पर आ टिकी है जो व्यक्तिविशेष को देखती है नाकि किसी विचारधारा या
सांगठनिक तौर-तरीको को । मोदी स्टाइल सत्ता बरकरार रखने का एक ऐसा तरीका है जो
पार्टी या विचारधारा से हटकर एक तबके को मुनाफे की थ्योरी समझाता है तो दूसरे
तबके को मुनाफे में हिस्सेदारी के लिये लालायित करता है । जो बच जाते है उन्हे
संभावना और आशंका के बीच तबतक झुलाता है जबतक उसपर कोई और राजनीति अपना मुलम्मा
ना चढा ले । राजनीतिक तौर पर बीजेपी के लिये यह शार्टकट का रास्ता हो सकता है
लेकिन पांच करोड गुजरातियो और सवा सौ भारतियो के अंतर को समझना होगा, जो ना तो
बीजेपी समझ पायी ना ही लाल कृष्ण आडवाणी समझ पा रहे है । सत्ता का रास्ता
बीजेपी के लिये तभी तक मान्य है जबतक वह कांग्रेस की बनायी लीक का विकल्प दे
सके । असल में बीजेपी सत्ता के लिये अपनी उस लकीर को ही मिटाना चाह रही है जो
कांग्रेस की राजनीति से अलग बन रही थी । कांग्रेस के एनजीओ स्टाइल के सामानांतर
संघ के करीब चालिस संगठन और को-ओपरेटिव व्यवस्था का जो खांचा बीजेपी को
राजनीतिक लाभ पहुचा सकता था उसे बीजेपी ने खुद ही तोडा । हिन्दुत्व की
प्रयोगशाला या मंदिर निर्माण कांग्रेस की राजनीति का विकल्प नहीं हो सकते बल्कि
सामाजिक तौर पर भावनात्मक उभान जरुर पैदा कर सकते है । लेकिन इस उभान का
राजनीतिक लाभ तभी मिल सकता है जब सामाजिक तौर पर वैकल्पिक राजनीति की जमीन हो ।
असल में भगवा कांग्रेसीकरण ने इसी जमीन को हडपा है । जिसमें गुजरात में मोदी हो
या दिल्ली में आडवाणी दोनो ने विकल्प का सारा ताना-बाना खुद के ही हर्द-गिर्द
बुनने की जबरन कोशिश की है । इस हकीकत को कोई समझ नही पा रहा है कि आरएसएस अगर
खुद को सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन कहता है तो उसका राजनीतिक पाठ समाजिक
शुद्दीकरण और सांगठनिक विचार को ही राजनीतिक सत्ता मानता है । जो कांग्रेस की
संसदीय राजनीति की थ्योरी से हटकर है । इसलिये संघ का वोट बैंक भगवा
कांग्रेसीकरण यानी बीजेपी का वोटबैंक नही हो सकता । इसलिये सवाल यह नहीं है कि
आडवाणी हार गये है और मोदी भी उसी राह पर है । बडा सवाल यह है कि एक तरफ
कांग्रेस है तो दूसरी तरफ संघ । वाजपेयी ने संघ की समझ को सूंड से पकड कर सत्ता
भोगी और आडवाणी संघ की समझ को पूंछ मान कर खुद को ही मजबूत नेता माना । राजकोट
की हार बताती है कि मोदी भी इसी राह पर है । लेकिन बीजेपी के जीरो ग्राउंड पर
खडे होकर महसूस किया जा सकता है कि भविष्य का सवाल बीजेपी की राजनीति या मोदी

पतरकार संघ की जरुरत


मीडिया हाउस के अंदर और बाहर के खटृटे-मीठे अनुभव से कौन बचा होगा, पत्रकार, वकील, चिकित्सक के साथ हिंसात्मक सूलक करने वालों को 5 साल की सजा संबंधित विधेयक का प्रस्ताव किसके हित के लिए है। कब से पड़ा है यह विधेयक। इस के पक्ष में तो संगठनों को अभियान मंजूरी तक एक अभियान चलाना चाहिए था। पर कहां है कोई अभियान। छोटी-मोटी घटनाएं ही नहीं बडी घटनाओं पर भी पत्रकार संगठन चुप रहे हैं। कभी पीडित पत्रकार संगठन का सदस्य नहीं रहा तो कभी वह विरोधी खेमे का निकला। दूसरी ओर दफतर की राजनीति। डेटलाइन से पहले बेहतरीन चटपटी टीआरपी बढाने वाली, पाठकों को आकर्षित करने वाली खबर देने का दबाव अलग। किसी घटना में प्रबंधन की सहानुभूति तो दूर अपने सहकर्मियों का साथ मिल जाए तो बहुत बडी बात होगी । हर हाउस में मंजे हुए खिलाडी हैं। एक दूसरे को नीतिपूर्ण तरीके से पछाड़ कर आगे निकल जाने की मानसिकता हर हाउस में है। अपनी ही बिरादरी में कोई अपना नहीं तो फिर साथ कौन दे। तटस्थ रहकर मौके पर लाभ लेने बाले बहुत है। आपस में किसी न किसी तरह से आगे निकल जाने के महौल में सबके लिए एकजुट होने की बात कैसे आ सकती है। प्रिंट मीडिया के कई संस्थानों में छठा तो दूर आज पांचवे वेतन आयोग के मुताबिक सैलरी नहीं मिल रही है। न्यूज चैनलों में मिल रही है तो डयूटी के घंटे देखिए। वहां के पत्रकारों के लिए अपने लिए समय नहीं है। मंदी के दौर में जब छंटनी की गाज गिरी तब भी पत्रकार संगठनों की कहीं से कोई आवाज नहीं आई। पत्रकारों पर जब-जब किसी तरह की गाज गिरी है तो अधिकतर संगठन चुप रहे है। वे कह कर मामला नहीं टाल सकते हैं कि उनके पास शिकायत नहीं पहुंचती। ऐसे मामलों में संगठन की स्वयं पहल होनी चाहिए थी, जो नहीं दिखती। यह समय है विचार करने का। पत्रकार संगठन का कोई औचित्य भी है या महज दिखावे के लिए है। आखिर किसके लिए हो रही है पत्रकारिता। यदि जनता को जगाना है तो जनता का साथ ने इस मौके पर साथ क्यों नहीं दिया। आखिर हर खबर का अंतिम लक्ष्य पाठक और दर्शक को हकीकत बताना ही तो हैं। यदि आगे निकलने के रफ़्तार में चैनल गिरफतार नहीं हुए होते तो शायद काले कानून के विरोध में डट कर सरकार को डराने की बजाये गिडगिडाने की नौबत नहीं आई होती।



कई घटनाएं ऐसी हुई जिससे सबसे पहले दिखाने की होड में मात खानी पड़ी। जनता का भरोसा तो उठना ही था। भरोसा तोडने की राह पर जब मीडिया जाने लगी थी, तभी संगठनों को सचेत होकर रणनीति तय करनी चाहिए थी। यहां यह तर्क देकर इस बात की अनेदेखी नहीं की जा सकती है कि मीडिया का नियंता पूंजी और बाजार हो गई है। पर इस बाजार ने कभी यह नहीं कहा कि जनता का भरोसा तोडा जाए। यदि भरोसा टूटता है तो निश्चित रूप से बाजार का ही नुकसान होगा। बहरहाल सारी स्थितियों को जानते रहते हुए केवल भड़ासी होने या कुढते रहने से कुछ नहीं होने वाला है। पत्रकार संगठनों की पिछली और वर्तमानी पीढी ने जो नहीं किया, वह अब होना चाहिए।

मीडिया हाउस के अंदर और बाहर के खटृटे-मीठे अनुभव से कौन बचा होगा, पत्रकार, वकील, चिकित्सक के साथ हिंसात्मक सूलक करने वालों को 5 साल की सजा संबंधित विधेयक का प्रस्ताव किसके हित के लिए है। कब से पड़ा है यह विधेयक। इस के पक्ष में तो संगठनों को अभियान मंजूरी तक एक अभियान चलाना चाहिए था। पर कहां है कोई अभियान। छोटी-मोटी घटनाएं ही नहीं बडी घटनाओं पर भी पत्रकार संगठन चुप रहे हैं। कभी पीडित पत्रकार संगठन का सदस्य नहीं रहा तो कभी वह विरोधी खेमे का निकला। दूसरी ओर दफतर की राजनीति। डेटलाइन से पहले बेहतरीन चटपटी टीआरपी बढाने वाली, पाठकों को आकर्षित करने वाली खबर देने का दबाव अलग। किसी घटना में प्रबंधन की सहानुभूति तो दूर अपने सहकर्मियों का साथ मिल जाए तो बहुत बडी बात होगी । हर हाउस में मंजे हुए खिलाडी हैं। एक दूसरे को नीतिपूर्ण तरीके से पछाड़ कर आगे निकल जाने की मानसिकता हर हाउस में है। अपनी ही बिरादरी में कोई अपना नहीं तो फिर साथ कौन दे। तटस्थ रहकर मौके पर लाभ लेने बाले बहुत है। आपस में किसी न किसी तरह से आगे निकल जाने के महौल में सबके लिए एकजुट होने की बात कैसे आ सकती है। प्रिंट मीडिया के कई संस्थानों में छठा तो दूर आज पांचवे वेतन आयोग के मुताबिक सैलरी नहीं मिल रही है। न्यूज चैनलों में मिल रही है तो डयूटी के घंटे देखिए। वहां के पत्रकारों के लिए अपने लिए समय नहीं है। मंदी के दौर में जब छंटनी की गाज गिरी तब भी पत्रकार संगठनों की कहीं से कोई आवाज नहीं आई। पत्रकारों पर जब-जब किसी तरह की गाज गिरी है तो अधिकतर संगठन चुप रहे है। वे कह कर मामला नहीं टाल सकते हैं कि उनके पास शिकायत नहीं पहुंचती। ऐसे मामलों में संगठन की स्वयं पहल होनी चाहिए थी, जो नहीं दिखती। यह समय है विचार करने का। पत्रकार संगठन का कोई औचित्य भी है या महज दिखावे के लिए है। आखिर किसके लिए हो रही है पत्रकारिता। यदि जनता को जगाना है तो जनता का साथ ने इस मौके पर साथ क्यों नहीं दिया। आखिर हर खबर का अंतिम लक्ष्य पाठक और दर्शक को हकीकत बताना ही तो हैं। यदि आगे निकलने के रफ़्तार में चैनल गिरफतार नहीं हुए होते तो शायद काले कानून के विरोध में डट कर सरकार को डराने की बजाये गिडगिडाने की नौबत नहीं आई होती।



कई घटनाएं ऐसी हुई जिससे सबसे पहले दिखाने की होड में मात खानी पड़ी। जनता का भरोसा तो उठना ही था। भरोसा तोडने की राह पर जब मीडिया जाने लगी थी, तभी संगठनों को सचेत होकर रणनीति तय करनी चाहिए थी। यहां यह तर्क देकर इस बात की अनेदेखी नहीं की जा सकती है कि मीडिया का नियंता पूंजी और बाजार हो गई है। पर इस बाजार ने कभी यह नहीं कहा कि जनता का भरोसा तोडा जाए। यदि भरोसा टूटता है तो निश्चित रूप से बाजार का ही नुकसान होगा। बहरहाल सारी स्थितियों को जानते रहते हुए केवल भड़ासी होने या कुढते रहने से कुछ नहीं होने वाला है। पत्रकार संगठनों की पिछली और वर्तमानी पीढी ने जो नहीं किया, वह अब होना चाहिए।