शुक्रवार, अप्रैल 30, 2010
गुरुवार, अप्रैल 29, 2010
प्यासे कंठ सबक सिख रहे हंै नौनिहाल
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राज्य के गडचिरौली जैसे पिछड़े इलाके में विकास के लिए बिजली सड़क की सुविधा तो दूर यदि स्कूलों में पढऩे वाले नौनिहालों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं कराया जाए तो वे भला क्या करेंगे? प्यासे कंठ स्कूलों में मास्टर जी के बताये सबक भला वे कैसे आत्मसात करेंगे? ऐसे में यदि ये बच्चे बड़े होकर हाथ में बंदूक लेकर लोकतंत्र के खिलाफ लड़े तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुछ ऐसी ही स्थिति बनी हुई के नागपुर डिविजन के छह जिलों मेंं संचालित जिला परिषद के स्कूलों की। जहां 45 डिगी के भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए तरह रहे हैं नन्हे-मुन्ने। यह हम नहीं कह रहे हैं, यह राज्य सरकार के शिक्षा विभाग का सर्वे कह रहा है।नागपुर से संजय स्वदेश की रिपोर्ट
पानी के लिए तरस रहे हैं जिला परिषद के स्कूल
नागपुर। नगर में चारों ओर पेयजल के लिए हाहाकार मचा हुआ है। कच्ची कॉलोनियों और ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर है। इन्हीं सबके बीच राज्य शिक्षा विभाग का एक चौकाने वाला सर्वे आया है। शिक्षा का मंदिर माने जाने वाले जिला परिषद के 170 स्कूलों में पेयजल की उपलब्ध नहीं है। लिहाजा, अनुमान लगाया जा सकता है कि इन स्कूलों में पढऩे आने वाली नई पीढ़ी प्यासे रहकर मास्टर जी के बतायी हुई सबक सीख रही है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है कि जब सरकार ने बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया हो। प्यासे बच्चे भला क्या करें। घर से पानी-लाते-लाते उनका शैक्षणिक सत्र समाप्त होने का आया और अब छुट्टियां लगने की है।
आश्चर्य की बात यह है कि राज्य शिक्षा बोर्ड ने जिला परिषद के स्कूलों में यह सर्वे इस वर्ष के शुरूआत में नागपुर डिवीजन के छह जिलों में कराई थी, जब मौसम इतना गर्म नहीं था और पानी के लिए हाहाकार नहीं था। रिपोर्ट अब आई है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब जनवरी-फरवरी के मौसम में पेजयल की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, तब स्थिति इतनी गंभीर थी, तो अप्रैल माह में जब चारों ओर पानी कि किल्लत रही है, तब तो निश्चय ही इन स्कूलों में पढऩे आने वाले बच्चे बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे होंगे। सर्वे में शामिल जिलों में नागपुर के अलावा चंद्रपुर, गोंदिया, वर्धा, भंडारा और गडचिरौली के स्कूलों को शामिल किया गया था। सर्वे में सबसे ज्यादा स्कूल गड़चिरौली जिले के 83 स्कूल, गोंदिया के 56 स्कूलों को शामिल किया गया था। इस सर्वे में नागपुर के 17 और चंद्रपुर के 10 और सबसे कम भंडारा जिले के 4 स्कूलों को शामिल किया गया था। लेकिन कहीं पानी की उपलब्धता को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं मिली।
शिक्षा विभाग के अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह स्थिति और भी गंभीर है। गडचिरौली जैसे पिछड़े जिलों के बारे मे क्या कहना? सबसे ज्यादा गंभीर संकट इसी पिछड़े जिले में हैं। सर्वे में उन स्कूलों को जोड़ा गया, जहां पाइप लाइन की सुविधा नहीं है। उन स्कूलों को बच्चे दूर-दूर से पानी लेकर स्कूल आते हैं, जिससे कि पढ़ाई के दौरान उनका कंठ सूखे तो उसे तर कर सके। ज्ञात हो कि यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार स्कूलों में बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लाखों रुपये की निधि देती है। इसके बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों को स्कूलों पेयजल, शौचाय, कक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। यहां शिक्षा ग्रहण करने आने वाली पीढ़ी के इन सुविधाओं से महरूम रहने से यह स्पष्ट है कि लाखों की निधि यहां पहुंचती ही नहीं है। इन स्कूलों में मिड डे मील योजना के तहत अनाज भी दिया जाता है। अनुमान लगया जा सकता है कि जब यहां पानी जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो फिर इन अनाजों से भोजन कैसे तैयार किया जा सकता है। इस संबंध में बातचीत के लिए शिक्षा विभाग के उप निदेशक मुरलीधर पवार से संपर्क किया गया तो उनका फोन बंद मिला।
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सोमवार, अप्रैल 26, 2010
कुछ मित्रों को पत्र लिखा
डीयर ...
हाईटेक जमाने के कई लाभ हैं। पर इस क्रांति से कई चीजे पीछे छुट गई।
पत्र लिखने का सिलसिला थम गया है। मोबाइल और ई-मेल से झटपट दो-चार शब्द टाईप कर दिये और संदेश चंद लम्हों पर पहुंच जाता है। इस हाईटेक चिट्ठी से जज्बात की कशिश गायब रहती है। कितना अच्छा अच्छा होता कि हाईटेक क्रांति का असर पत्र लिखने की संस्कृति पर नहीं पड़ती। तो आज भी लोग पत्र लिखते। बचपन से ही पत्र लिखने की आदत थी। इस लिए हाईटेक तकनीक का इस्तेमाल करने के बाद भी बार-बार दिल में यह पत्र लिखने की कशिश उफान मारती है। क्योंकि पत्रों के शब्दों में पिरोये गए शब्दों में जज्बातों के अहसास आज की भागमभाग भरी जिंदगी में कितना महत्व रखती है। कभी पत्र लिख कर देखो या किसी का आया पत्र पढ़ कर देखो। आज भी दिल में यह कशीश उठी। सहज ही अंगुलियां टापइ के लिए थिरकने लगी। एक ही सांस में इतना लिख दिया। इसलिए पंरपरागत पत्र की शुरूआती औपचारिकताओं को भूल गया। चलिए परंपरा पर आते हैं।
उम्मीद है आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा। जिंदगी भी अच्छी चल रही होगी। मुस्कुराते हुए इस पत्र को पढ़ रहे होगे। मुझे विश्वास है कि जरूर पत्रों की संस्कृति को मिस करेंगे। दो मिनट सोचेंगे और खुद को पत्र लिखने में बेवश पाएंगे।
फिलहाल अब तक निश्चय ही इस पत्र की मीठास आपके दिल में घुल गई होगी। क्योंकि कभी-कभार रोमन में ही दो-चार शब्दों में ई-मेल और एसएमएस भेजने वाले ने आज इतना बड़ा पत्र लिख डाला।
सोच रहा हूं कि काश, आज ईटरनेट से पत्र भेजन की सुविधा नहीं होती तो हाथों से शब्दों की बतकही रचता। कुछ मीठी यादों को शब्दों में पिरोता।
खैर- फिर मौके आएंगे। सफर है। जारी रहेगा। हमने तो कभी सोचा नहीं की पत्र लिखने की संस्कृति समाप्त हो जाएगी। मैंने यह व्रत लिया है कि जब भी मौके मिलेंगे मित्रों को हिंदी में पत्र ई-मेल से भेंजूंगा।
फिलहाल इस बार इतना ही।
शुभकामनाएं
संजय
नागपुर
हाईटेक जमाने के कई लाभ हैं। पर इस क्रांति से कई चीजे पीछे छुट गई।
पत्र लिखने का सिलसिला थम गया है। मोबाइल और ई-मेल से झटपट दो-चार शब्द टाईप कर दिये और संदेश चंद लम्हों पर पहुंच जाता है। इस हाईटेक चिट्ठी से जज्बात की कशिश गायब रहती है। कितना अच्छा अच्छा होता कि हाईटेक क्रांति का असर पत्र लिखने की संस्कृति पर नहीं पड़ती। तो आज भी लोग पत्र लिखते। बचपन से ही पत्र लिखने की आदत थी। इस लिए हाईटेक तकनीक का इस्तेमाल करने के बाद भी बार-बार दिल में यह पत्र लिखने की कशिश उफान मारती है। क्योंकि पत्रों के शब्दों में पिरोये गए शब्दों में जज्बातों के अहसास आज की भागमभाग भरी जिंदगी में कितना महत्व रखती है। कभी पत्र लिख कर देखो या किसी का आया पत्र पढ़ कर देखो। आज भी दिल में यह कशीश उठी। सहज ही अंगुलियां टापइ के लिए थिरकने लगी। एक ही सांस में इतना लिख दिया। इसलिए पंरपरागत पत्र की शुरूआती औपचारिकताओं को भूल गया। चलिए परंपरा पर आते हैं।
उम्मीद है आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा। जिंदगी भी अच्छी चल रही होगी। मुस्कुराते हुए इस पत्र को पढ़ रहे होगे। मुझे विश्वास है कि जरूर पत्रों की संस्कृति को मिस करेंगे। दो मिनट सोचेंगे और खुद को पत्र लिखने में बेवश पाएंगे।
फिलहाल अब तक निश्चय ही इस पत्र की मीठास आपके दिल में घुल गई होगी। क्योंकि कभी-कभार रोमन में ही दो-चार शब्दों में ई-मेल और एसएमएस भेजने वाले ने आज इतना बड़ा पत्र लिख डाला।
सोच रहा हूं कि काश, आज ईटरनेट से पत्र भेजन की सुविधा नहीं होती तो हाथों से शब्दों की बतकही रचता। कुछ मीठी यादों को शब्दों में पिरोता।
खैर- फिर मौके आएंगे। सफर है। जारी रहेगा। हमने तो कभी सोचा नहीं की पत्र लिखने की संस्कृति समाप्त हो जाएगी। मैंने यह व्रत लिया है कि जब भी मौके मिलेंगे मित्रों को हिंदी में पत्र ई-मेल से भेंजूंगा।
फिलहाल इस बार इतना ही।
शुभकामनाएं
संजय
नागपुर
लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर। विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर। विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
मंगलवार, अप्रैल 20, 2010
1500 करोड़ खर्च, फिर भी कंठ सूखा
नागपुर। भीषण गर्मी में अघोषित बिजली कटौती के साथ ही पेयजल की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है। गत दिनों नागपुर आए केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी से बताया कि नागपुर के आधारभूत ढांचा के विकास के लिए महानर पालिका को जवार लाल नेहरू नेशनाल अर्बन रिनीवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत 1500 करोड़ रूपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। रविवार को प्रकाशित इस खबर से संतरानगरी के लोग हैरत में हैं। उन्हें आश्चर्य इस बात की है किआधारभूत ढांचे के विकास में इतना खर्च होने के बाद भी पानी के लिए हाहाकार क्यों मचा हुआ है। जबकि जलापूर्ति से जुड़ी चार परियोजना समय से पहले ही पूरी हो चुकी है। जयपाल रेड्डी ने नागपुर जब कहा कि नागपुर में खर्च 1500 करोड़ रूपये के कार्यों का वे ब्यौरा लेंगे। इससे मनपा का जल प्रदाय विभाग में खलबली मची हुई है। क्योंकि जेएनएनयूआरएम का पूर्ण रूपये से क्रियान्वयन 2012 तक होना है, योजना को शुरू हुए चार साल हो चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि इस राशि के खर्च में भारी धांधली और अनियमितता बरती गई है। वहीं केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की सरकार और मनपा में भाजपा का शासन होने से समीक्षा को लेकर रेड्डी खासे गंभीर दिखे। पानी के बढ़े हुए बिलों को लेकर उन्होंने राज्य मुख्यमंत्री तक से बातचीत करने को भी कहा।
मनपा आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार से मिली इस राशि को पाइल लाईन से नष्ट होने वाले जल को रोकने और इसकी आपूर्ति व्यवस्था को और उन्नत करने के अलावा के अलावा फूटी हुई पाइप लाइन के मरम्मत आदि पर खर्च किया गया। पूर्व महापौर विकास ठाकरे इस फंड के दुरुपयोग और योजना में कत्थित भ्रष्टाचार का पहले ही आरोप लगा चुके हैं। मनपा कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार पाइप लाइनों से होने वाले रिसाव को दुरुस्ती किया जा चुका है। इस पर करीब 323 करोड़ का रूपये का खर्च आया। इसी तरह से जलापूर्ति के लिए पाइलाइनों का विस्तार और उनके नवीनीकरण का कार्य भी समाप्त हो चुका है। इसमें करीब 4349 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। महानगर पालिका की मानें तो जेएनएनयूआरएम के तहत मनपा ने आधारभूत ढांचे के विकास के लिए कुल 17 योजनाएं चलाई थी। महज चार योजनाएं ही अभी पूरी हुईं है। अधिकतर योजनाएं अभी चालू है या फिर वह शुरू होने की प्रक्रिया में है।
गैर-सरकारी संगठन जनआक्रोश के अध्यक्ष डा. अनिल लद्धड ने बताया कि जेएनएनयूआरएम के तहत पेयजल की आपूर्ति के लिए बेहतर कार्य किया गया होता, तो नगर में कोई इलाका प्यास नहीं रहता। इस फंड की भारी भरकम राशि खर्च कर मनपा ने 22*7 की तर्ज पर जनगर में पेयजल आपूर्ति के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट सितंबर,2009 में बनी थी। इसकी शुरूआत मनपा के धरमपेठ जोन से हुई। तब यह कहा गया था कि इसके लिए नये मीटर लगेंगे। पर आज हकीकत यह है कि इस जोन के आधे से भी ज्यादा घरों में 22*7 तर्ज पर जलापूर्ति तो दूर की बात है, अभी तक पानी के मीटर तक नहीं बदले। यह स्थिति नगर के रिहायसी इलाके की है। इसलिए नगर के दूसरे विकसित इलाकों की हालत कैसी होगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अब इस योजना को असफल होते देख मनपा ने पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का शिगूफा छेड़ दिया। लेकिन इस योजना के लागू होते ही बार-बार पानी की दरों में बढ़ोतरी के बाद भी पेयजल की सुचारु आपूर्ति नहीं होने से जनता का आक्रोश बढ़ा हुआ है। जबकि जयपाल रेड्डी को भी इस योजना के बारे में जानकारी नहीं थी।
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मनपा आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार से मिली इस राशि को पाइल लाईन से नष्ट होने वाले जल को रोकने और इसकी आपूर्ति व्यवस्था को और उन्नत करने के अलावा के अलावा फूटी हुई पाइप लाइन के मरम्मत आदि पर खर्च किया गया। पूर्व महापौर विकास ठाकरे इस फंड के दुरुपयोग और योजना में कत्थित भ्रष्टाचार का पहले ही आरोप लगा चुके हैं। मनपा कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार पाइप लाइनों से होने वाले रिसाव को दुरुस्ती किया जा चुका है। इस पर करीब 323 करोड़ का रूपये का खर्च आया। इसी तरह से जलापूर्ति के लिए पाइलाइनों का विस्तार और उनके नवीनीकरण का कार्य भी समाप्त हो चुका है। इसमें करीब 4349 करोड़ रूपये खर्च हो चुके हैं। महानगर पालिका की मानें तो जेएनएनयूआरएम के तहत मनपा ने आधारभूत ढांचे के विकास के लिए कुल 17 योजनाएं चलाई थी। महज चार योजनाएं ही अभी पूरी हुईं है। अधिकतर योजनाएं अभी चालू है या फिर वह शुरू होने की प्रक्रिया में है।
गैर-सरकारी संगठन जनआक्रोश के अध्यक्ष डा. अनिल लद्धड ने बताया कि जेएनएनयूआरएम के तहत पेयजल की आपूर्ति के लिए बेहतर कार्य किया गया होता, तो नगर में कोई इलाका प्यास नहीं रहता। इस फंड की भारी भरकम राशि खर्च कर मनपा ने 22*7 की तर्ज पर जनगर में पेयजल आपूर्ति के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट सितंबर,2009 में बनी थी। इसकी शुरूआत मनपा के धरमपेठ जोन से हुई। तब यह कहा गया था कि इसके लिए नये मीटर लगेंगे। पर आज हकीकत यह है कि इस जोन के आधे से भी ज्यादा घरों में 22*7 तर्ज पर जलापूर्ति तो दूर की बात है, अभी तक पानी के मीटर तक नहीं बदले। यह स्थिति नगर के रिहायसी इलाके की है। इसलिए नगर के दूसरे विकसित इलाकों की हालत कैसी होगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अब इस योजना को असफल होते देख मनपा ने पीपीपी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का शिगूफा छेड़ दिया। लेकिन इस योजना के लागू होते ही बार-बार पानी की दरों में बढ़ोतरी के बाद भी पेयजल की सुचारु आपूर्ति नहीं होने से जनता का आक्रोश बढ़ा हुआ है। जबकि जयपाल रेड्डी को भी इस योजना के बारे में जानकारी नहीं थी।
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लाल बत्ती पर हाथ पसारते ये नन्हें हाथ
संजय स्वदेश
नागपुर। नन्हीं आभा (बदला हुआ नाम) सीताबर्डी के मुख्य चौराहे पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पुतले के पास रूकने वाले वाहन चालको से भीख मांगती है। उसे नहीं पता भीख मांगना कितनी बुरी बात है? पूछने पर एक टूक में कहती है- स्कूल नहीं जाती। पंचशील चौक पर भी रिंकी (बदला हुआ नाम) भी यही काम करती है। इस तरह का एक और नजारा हर दिन एलआईसी चौक पर भी नजर आता है। यहां तो एक जोड़े भाई-बहन यह काम करते हैं। इस चौक पर नेहा (बदला हुआ नाम) भी रूकने वाले वाहनों के पीछे भागती है। तीनों की हालत कमोबेश एक-सी है। कोई उन्हें दुत्कार के आगे जाने के लिए कहता है तो कोई उन्हें एक-दो रुपये का सिक्का देते हुए स्कूल जाने की नसीहत देता है। पर इन्हें स्कूल जाने का रास्ता नहीं पता। इन सड़कों से कभी रिक्से में इन्हीं की उम्र के बच्चे स्कूल डे्रस में गुजरते हैं, तो उनकी आंखे उत्सुकता से जरूर ताकती है। शायद इनके मन में भी स्कूल जाने की कसक है। इनसे बातचीत करने पर ये दो-चार शब्दों के अलावा कुछ नहीं बोलती। आश्चर्य से कुछ पूछने वालों को चेहरा देखती हैं? इधर-उधर चली जाती हैं। जैसे उससे क्या पूछ लिया? नागपुर में बस ये तीन लाड़ली ही नहीं हैं, जो स्कूल जाने के रास्तों से अनजान व्यस्त राहों के चौक पर भीख मांगती हैं। नगर के अनेक चौक-चौराहे ऐसे हैं, जहां कोई न कोई नन्हीं बच्ची किसी वाहन चालक के आगे हाथ पसारते एक सिक्के की आस लगाए दिख जाएगी।
दुर्भाय की बात है कि नन्हीं हथेलियों से भीख मांगने वाली इन लाड़लियों पर अपने ही माता-पिता का कहर है। मां कहती है, भीख मांगकर लाने के लिए उन्हें प्रताडि़त करते हैं। दूसरे को देने जैसी धममियां देते हैं। यह बात उसे जरूर समझ में आती है। तभी तो मां से यह बात सुन कर वह मासूम सहम जाती है। कई चौक-चौराहों पर इनकी मां भी आसपास ही भीख मांगती रहती हैं। अधिकतर लड़कियों के पिता का पता नहीं। लेकिन नागपुर के 45 डिगी तापमान में आग बरसाते आसामन के नीचे हर लाल बत्ती पर रूकने वाले वाहनों के पीछे हांफते हुए भागती इन मासूमों के चेहरे मुरझाएं ही दिखते हैं। भीषण गर्मी की तपिस में इनके सूखे चेहरे से सूखते अरमानों को साफ पढ़ा जा सकता है। शाम 7 बजे जब गर्मी से राहत पाने के लिए कई लोग रिहाइसी धरमपेठ इलाके में हल्दीराम में आईसक्रीम का आनंद आते हैं। तो यहां भी एक लाड़की आईसक्रीम खाने वालों के सामने अपनी नन्हीं हाथ इस उम्मीद से पसार देती है कि शायद कोई कुछ दे दे। पर हर बार उम्मीद कहां पूरी होती है। कोई उन्हें दुत्कार देता है, तो कोई थोड़ी-सी आईसक्रीम बचाकर उनके हाथ में पकड़ा देता है। कई सज्जन इस मैली-कुचैली लिबाश वाली गुडिय़ों को अपने सामने आते देख मुंह फेर कर दूसरी ओर खड़े हो जाते हैं। दोपहर के समय यहीं अपने छह माह की बेटी को गोद में लेकर खड़ी लाली आईस्क्रीम खाने वाले एक टुकड़ा अपनी बेटी के लिए मांगता है। भीख मांगने की बजाय काम करने की सलाह देने पर कुछ नहीं कहती है बस, एक दो-दो रूपये देने की जिद करती है। काफी पूछने पर बताया कि उसका पति लंगड़ा है।
ऐसी महिलाओं और नन्हें-मुन्नों का चौक-चौराहो पर भीख मांगना इनकी आदत में शुमार हो गया है। दुकान के सामने खड़े होकर भीख मांगने पर वहां खड़े गार्ड की झिड़की भी सहनी पड़ती है। शासन प्रशासन इन सब बातों से बेखबर है। यदि उन्हें खबर होती तो इन नन्हें हाथों में कलम होती। ये हाथ नगर के चौक-चौराहों पर आने जाने वालों के आगे नहीं पसरते।
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सोमवार, अप्रैल 19, 2010
भाजपा का दामन थाम सकते हैं प्रकाश आंबेडकर

दलित वोटों के लिए छोटे आंबेडकर को अपने पक्ष में मिलाने के लिए भाजपा पहले से ही है तैयार
नागपुर। दलित वोटों की राजनीतिक मारामारी में भाजपा भी खम ठोंककर मैदान में उतरने की पूरी तैयारी में है। इसके लिए एक रणनीतिबद्ध तरीके से भाजपा के प्रतिनिधि बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर को अपने साथ मिलाने के प्रयास में हैं। पूछने पर भले ही प्रकाश आंबेडकर इस बात से इनकार करें। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और आंबेडकर दोनों की राजनीतिक मजबूरी है कि वे एक हो जाएं। सूत्रों का कहना है कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो जून में विदर्भ में दो जिलों में होने वाले परिषद के चुनाव में प्रकाश आंबेडकर के साथ भाजपा का गठबंधन हो सकता है। मतलब कांग्रेस को करारी शिकस्त देने के लिए भाजपा की भारिप बहुजन महासंघ साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरेंगे। जानकारों की मानें तो यह दोनों की दलों की राजनीतिक मजबूरी है। भारिप बहुजन महासंघ अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकती। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी हार से सहमी हुई है। नये अध्यक्ष कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे घटक और प्रकाश आंबेडकर का भरोसा नहीं है। हालांकि रिपाई नेता रामदास आठ्वल्ले अभी भी प्रकाश आंबेडकर से उनके साथ मिलकर मजबूत होने का आह्वान करते हैं। लेकिन प्रकाश आंबेडकर कई मौके पर खुले आम कांग्रेस की अलोचना करने के साथ यह कह चुके हैं कि रिपाई के दूसरे घटक कभी भी कांग्रेस के साथ खड़े हो सकते हैं। इसलिए रिपाई घटकों के साथ उनका गठबंधन होने का कोई सवाल ही नहीं है।
हालांकि अभी भी प्रकाश आंबेडकर अभी भी भाजपा से दूरी बनाये दिख रहे हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देशन में भाजपा के प्रतिनिधि प्रकाश आंबेडकर से संपर्क में है। नितिन गड़करी के साथ प्रकाश आंबेडकर के रिश्ते भी मधुर माने जाते हैं। यदि इस चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिलती तो राष्ट्रीय स्तर पर गडकरी की काफी किरकिरी हो सकती है। इसलिए दोनों जिला परिषद के चुनाव को जीतने के लिए भाजपा हर जोखिम लेने को तैयार है। वैसे भी भाजपा के पास अभी कोई कद्दवार दलित नेता नहीं है जिससे कि वह हिंदुत्व के वोट बैंक के साथ ही दलित वोट बैंकों पर कुछ सेंध लगा सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी की कमान संभालने के बाद यह साफ कह दिया था कि उनका लक्ष्य पार्टी के मौजूदा वोट प्रतिशत में दस प्रतिशत बढ़ाना है। इसके लिए भाजपा नए मित्रों व नए क्षेत्रों में पहुंच बनाने में परहेज नहीं करेगी। यदि प्रकाश आंबेडकर भाजपा के साथ आते हैं तो इससे भाजपा को न केवल विदर्भ में लाभ मिलेगा। बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। अनेक घटनाक्रमों में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रति दलित का विश्वास घटता जा रहा है। इस लिहाजा से भी प्रकाश आंबेडकर भाजपा के लिए काफी लाभकारी हो सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि एक सीमित क्षेत्र में केवल अपनी पार्टी के दम पर प्रकाश आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति से ओझल है। यदि वे भाजपा का दामन थामते हैं तो लोकसभा से पूर्व उनके राज्य सभा में जाने की राह भी असान हो सकती है। पिछले दिनों में प्रकाश आंबेडकर ने इस बात का संकेत दे दिया था कि कांग्रेस आलाकमान यदि पृथक विदर्भ आंदोलन को समर्थन नहीं देता है तो वे अपनी रणनीति बदलने से परहेज नहीं करेंगे। अभी तब वे भाजपा से दूर-दूर खड़े दिख रहे थे। लेकिन भविष्य में भी ऐसा होगा यह जरूरी नहीं।
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