2 निरपराध लोगों का गला काट डाला
गढ़चिरोली जिले की भामरागढ़ तहसील के मेड़पल्ली स्थित सीआरपीएफ के अस्थायी पुलिस कैम्प को नक्सलियों ने शुक्रवार की देर रात आग के हवाले कर दिया। कुछ दिनों पूर्व ही पुलिस दल ने इस कैम्प को छोड़ दिया था। जबकि भामरागढ़ तहसील के ही 2 निष्पाप ग्रामीणों की भी नक्सलियों ने गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी जिससे क्षेत्र के गांवों में दहशत का माहौल बना हुआ है।
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले में नक्सल खोज मुहिम के लिए सीआरपीएफ पुलिस की सहायता ली जा रहीं है। विभिन्न स्थानों पर सीआरपीएफ पुलिस के कैम्प बनाए गए है। पुलिस ने मेड़पल्ली गांव में भी एक कैम्प बनवाया था, लेकिन यह कैम्प कुछ ही दिनों पूर्व पुलिस ने छोड़ दिया था। बीती देर रात 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने मेड़पल्ली के पुलिस कैम्प में आकर पूरे कैम्प को आग के हवाले कर दिया। जिसमें पूरा पुलिस कैम्प जलकर ध्वस्त को गया है। वहीं दूसरी एक घटना में पुलिस को बम खोजने के कार्य में मदद करने वाले भामरागढ़ तहसील के ही दो ग्रामीणों की नक्सलियों ने गला रेतकर हत्या कर दी। समाचार के लिखे जाने तक मृत ग्रामीणों के नाम पता नहीं चल पाये है। जबकि क्षेत्र में पुलिस की चौकसी बढ़ा दी गई है।
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शनिवार, अगस्त 21, 2010
मंगलवार, अगस्त 10, 2010
अंधेरे में हो रहा रेती का उत्खनन
2 निरीक्षकों के भरोसे है 38 घाटों की निगरानी
संजय
नागपुर। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष नागपुर में निर्माण कार्य ज्यादा होने के कारण रेत की भारी मांग है। इस मांग की पूर्ति के लिए रेत माफिया अवैध तरीके से रेतघाटों से रेती का उत्खनन कर रहे हैं। इनके ये काले कारनामे किसी की नजर में न आए, इसके लिए वे रात के अंधेरे का सहारा ले नियमों की धज्जिया उड़ा रहे हैं। इससे उनकी कमाई भी मोटी हो रही है जबकि माइन्स एवं मिनरल एक्ट 1957 के अनुसार रात के समय रेत का उत्खनन नहीं किया जा सकता है, लेकिन अवैध उत्खनन के लिए रात्रिकाल ही बेहतर समय हो रहा है। रेत घाट के माफिये नियम व कानून को ताख पर रख कर यह कार्य कर रहे हैं। रेतमाफियाओं के इस अवैध कार्य में ट्रक वाले भी खूब कमा रहे हैं। जानकारों की मानें तो हर दिन, दिन में 150 से 200 ट्रक रेत का उत्खनन होता है। हर ट्रक ओवरलोड होता है। दिन में जहां रेत ढोने वाले ट्रकों का किराया 2500 से 3000 रुपया है, तो वहीं रात में अवैध उत्खनन के रेत को ढोने के लिए करीब 4000 रुपये किराया वसूला जाता है। अनुमान है कि रात के समय भी हर दिन कम से कम 100 ट्रक रेतों की ढुलाई होती है। ओवरलोडेड ट्रक का नकारात्मक असर सड़कों पर भी पड़ रहा है। रेतीघाट के पास से गुजरने वाली सड़क की जर्जर हालत को देखकर स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
हस्तांतरित हो गए निरीक्षक
प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी निष्क्रिय है। निष्क्रियता उसकी मजबूरी भी है। नागपुर की 8 तहसीलों में 38 रेती घाटों के उत्खनन कार्यों की निगरानी महज 2 निरीक्षकों के भरोसे है। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हमारी मजबूरी है। हम क्या करें, महज 2 निरीक्षक जिले के इतने घाटों पर सही तरीके से निगरानी नहीं रख सकते हैं। ज्ञात हो कि वर्ष 2008 तक विभाग में 10 निरीक्षक थे लेकिन धीरे-धीरे सभी निरीक्षकों का स्थानांतरण हो गया। सूत्रों का यकीन मानें तो निरीक्षकों के हस्तांतरण में रेत उत्खनन माफियाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
96 घाट हुए थे चिन्हित
ज्ञात हो कि खनन विभाग ने वर्ष 2009-10 के लिए रेत उत्खनन के 62 घाटों को मंजूरी दी है। इसमें से महज 22 घाटों की ही नीलामी हुई। इस वर्ष 1 अगस्त 2010 से जुलाई 2011 तक 38 घाटों की नीलामी होनी थी। सूत्रों की मानें तो खान विभाग ने इस वर्ष नागपुर की 8 तहसीलों में 96 घाटों को रेत उत्खनन के लिए चिन्हित किया था। इसका प्रस्ताव भूजल सर्वेक्षण एजेंसी (जीएसडीए) के पास भेजा गया लेकिन जीएसडीए ने महज 62 घाटों से ही रेत उत्खनन कार्य के लिए अनुमति दी। वहीं ग्राम सभा ने केवल 38 घाटों से ही उत्खनन पर अंतिम रूप से सहमति दी लेकिन जिले के दूरवर्ती क्षेत्रों में अवैध उत्खनन कार्य धड़ल्ले से जारी है।
ठेका लेना महंगा, अवैध काम सस्ता
जानकारों का कहना है कि गत वर्ष की तुलना में नागपुर में निर्माण कार्यों की संख्या तेजी से बढऩे से रेत की मांग बढ़ गई है। इस कारण भी रेत के अवैध उत्खनन को प्रोत्साहन मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर रेती घाटों की नीलामी के लिए आमंत्रित निविदाओं को भरने वालों की संख्या कम हो रही है। सूत्रों का कहना कि प्रभावशाली ठेकेदार निविदा में लाखों की बोली लगाने के बजाय विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों के साथ साठगांठ कर रेत उत्खनन करना बेहतर समझ रहे हैं। इससे रेतमाफियाओं को मोटा मुनाफा हो रहा है। वहीं दूसरी ओर जो ठेकेदार उत्खनन का ठेका ले रहे हैं, वह एक वैध ठेका की आड़ में दूसरे घाटों में अवैध उत्खनन कर रहे हैं।
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संजय
नागपुर। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष नागपुर में निर्माण कार्य ज्यादा होने के कारण रेत की भारी मांग है। इस मांग की पूर्ति के लिए रेत माफिया अवैध तरीके से रेतघाटों से रेती का उत्खनन कर रहे हैं। इनके ये काले कारनामे किसी की नजर में न आए, इसके लिए वे रात के अंधेरे का सहारा ले नियमों की धज्जिया उड़ा रहे हैं। इससे उनकी कमाई भी मोटी हो रही है जबकि माइन्स एवं मिनरल एक्ट 1957 के अनुसार रात के समय रेत का उत्खनन नहीं किया जा सकता है, लेकिन अवैध उत्खनन के लिए रात्रिकाल ही बेहतर समय हो रहा है। रेत घाट के माफिये नियम व कानून को ताख पर रख कर यह कार्य कर रहे हैं। रेतमाफियाओं के इस अवैध कार्य में ट्रक वाले भी खूब कमा रहे हैं। जानकारों की मानें तो हर दिन, दिन में 150 से 200 ट्रक रेत का उत्खनन होता है। हर ट्रक ओवरलोड होता है। दिन में जहां रेत ढोने वाले ट्रकों का किराया 2500 से 3000 रुपया है, तो वहीं रात में अवैध उत्खनन के रेत को ढोने के लिए करीब 4000 रुपये किराया वसूला जाता है। अनुमान है कि रात के समय भी हर दिन कम से कम 100 ट्रक रेतों की ढुलाई होती है। ओवरलोडेड ट्रक का नकारात्मक असर सड़कों पर भी पड़ रहा है। रेतीघाट के पास से गुजरने वाली सड़क की जर्जर हालत को देखकर स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
हस्तांतरित हो गए निरीक्षक
प्रशासन सब कुछ जानते हुए भी निष्क्रिय है। निष्क्रियता उसकी मजबूरी भी है। नागपुर की 8 तहसीलों में 38 रेती घाटों के उत्खनन कार्यों की निगरानी महज 2 निरीक्षकों के भरोसे है। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हमारी मजबूरी है। हम क्या करें, महज 2 निरीक्षक जिले के इतने घाटों पर सही तरीके से निगरानी नहीं रख सकते हैं। ज्ञात हो कि वर्ष 2008 तक विभाग में 10 निरीक्षक थे लेकिन धीरे-धीरे सभी निरीक्षकों का स्थानांतरण हो गया। सूत्रों का यकीन मानें तो निरीक्षकों के हस्तांतरण में रेत उत्खनन माफियाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
96 घाट हुए थे चिन्हित
ज्ञात हो कि खनन विभाग ने वर्ष 2009-10 के लिए रेत उत्खनन के 62 घाटों को मंजूरी दी है। इसमें से महज 22 घाटों की ही नीलामी हुई। इस वर्ष 1 अगस्त 2010 से जुलाई 2011 तक 38 घाटों की नीलामी होनी थी। सूत्रों की मानें तो खान विभाग ने इस वर्ष नागपुर की 8 तहसीलों में 96 घाटों को रेत उत्खनन के लिए चिन्हित किया था। इसका प्रस्ताव भूजल सर्वेक्षण एजेंसी (जीएसडीए) के पास भेजा गया लेकिन जीएसडीए ने महज 62 घाटों से ही रेत उत्खनन कार्य के लिए अनुमति दी। वहीं ग्राम सभा ने केवल 38 घाटों से ही उत्खनन पर अंतिम रूप से सहमति दी लेकिन जिले के दूरवर्ती क्षेत्रों में अवैध उत्खनन कार्य धड़ल्ले से जारी है।
ठेका लेना महंगा, अवैध काम सस्ता
जानकारों का कहना है कि गत वर्ष की तुलना में नागपुर में निर्माण कार्यों की संख्या तेजी से बढऩे से रेत की मांग बढ़ गई है। इस कारण भी रेत के अवैध उत्खनन को प्रोत्साहन मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर रेती घाटों की नीलामी के लिए आमंत्रित निविदाओं को भरने वालों की संख्या कम हो रही है। सूत्रों का कहना कि प्रभावशाली ठेकेदार निविदा में लाखों की बोली लगाने के बजाय विभाग के कर्मचारियों व अधिकारियों के साथ साठगांठ कर रेत उत्खनन करना बेहतर समझ रहे हैं। इससे रेतमाफियाओं को मोटा मुनाफा हो रहा है। वहीं दूसरी ओर जो ठेकेदार उत्खनन का ठेका ले रहे हैं, वह एक वैध ठेका की आड़ में दूसरे घाटों में अवैध उत्खनन कर रहे हैं।
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सेक्स क्षमता बढ़ाने की गलतफहमी से गधों पर संकट

'दो बैलों की कथाÓ प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी है। कहानी की शुरुआत में प्रेमचंद गधा पुराण से करते हुए बताते हैं कि कैसे गधा चुपचाप मेहनत करता है और मालिक की मार खाता है। सच कहें तो गधे जैसा मेहनती कोई अन्य पशु नहीं। लेकिन समाज में गधों को लेकर नकारात्मक लोकोक्ति का प्रसार हो गया। खैर बदले दौर में गदहों की उपयोगिता कम हो गई थी। लेकिन आधुनिक जमाने में गधों के प्रति फिर से एक नया समाजिक गलतफहली फैलने से इसकी उपयोगिता बढ़ गई है।
नागपुर। आप माने या न मानें, पर महाराष्ट्र के कुछ स्थानीय खबरों पर यकीन करें तो इन दिनों राज्य के गधों पर भारी संकट मंडरा रहा है। इनकी तस्करी होने लगी है। तस्करी से गधे महाराष्ट्र से पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि गधों के खून और मांस का उपयोग लैंगिक क्षमता बढ़ाने के लिए होने की गलतफहमी समूचे आंध्रप्रदेश में फैल गई है। इस कारण महाराष्ट्र के गधों पर संकट के बादल मंडरा रहा है। पिछले कुछ महीनों में करीब 50000 हजार गधों को महाराष्ट्र से आंध्रप्रदेश भेजे गए हैं। गधों की तस्करी के लिए कई एजेंट भी सक्रिय हो गए हैं। ये दूर-दराज के गांवों के गधों की चोरी भी करने लगे हैं। परभणी जिले के शहर गंगाखेड़ से पिछले 3 माह में ही करीब 350 गधों की चेारी होने की सूचना है। गंगाखेड़ पुलिस थाने में गधों के लगभग 29 मालिकों ने अपने गधों की चोरी की शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस की जांच में गधों की तस्करी का सनसनीखेज मामला उजागर हो चुका है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि गुंटूर जिले के बापटला क्षेत्र में गधों का बड़ा बाजार लगता है। आंध्र के लोगों में यह गलतफहमी फैल गई है कि गधों के खून तथा मांस से लैंगिक क्षमता में तेजी से वृद्धि होती है। इसी कारण गधों की मांग बाजार में अचानक बढ़ गई है। आंध्रप्रदेश के बाजारों में गधों का खून 200 रुपये प्रति लिटर तथा मांस 300 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। गधों के खून और मांस की मांग बढऩे के कारण आंध्र में गधों की कमी हो गई है, जिसके कारण अब महाराष्ट्र के गधों पर संकट आ गया है। परभणी जिले की तरह की विदर्भ के यवतमाल जिले से भी गधों की बड़े पैमाने पर आंध्रप्रदेश में तस्करी होने की जानकारी मिली है। यवतमाल के आदिवासी इलाकों के कई नागरिकों के गधे चोरी हो गए हैं। इसके अलावा विदर्भ के अमरावती, पांढरकवड़ा के आंध्रप्रदेश की सीमावर्ती गांवों से भी हालफिलहाल में अनेक गधे चोरी हुए हैं। इसी तरह की खबर परभणी, जालना, औरंगाबाद, किनवट से भी आ रही है। आंध्र में फैले इस समाजिक गलतफहमी से गधों के मालिक परेशान है। गधे चोरी होने से उनकी आर्थिक स्थिति डगमगा गई है।
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सोमवार, अगस्त 09, 2010
लाखों खर्च के बाद भी नहीं घटी आवारा कुत्तों की संख्या
नागपुर। शहर में आवारा कुत्तों की भरमार है। मनपा की मानें तो नागपुर में 54 हजार आवारा कुत्ते हैं। इनकी बढ़ती संख्या रोकने के लिए मनपा की ओर से चलाये जा रहे नसबंदी कार्यक्रम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नतीजा कुछ खास नहीं निकला है। नगर में इन दिनों आवारा कुत्तों की भरमार हो गई है। रात के समय दोपहिया वाहनचलाकों के लिए यह सबसे बड़े मुश्किल बने हुए हैं। जैसे ही कोई वाहन चालक गुजरता है इनका झुंड उनकी ओर तेजी से दौड़ता है।
कुत्तों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाने के लिए मनपा और मनपा की ओर से नियुक्त एनजीओ के दावों की पोल खुल चुकी है। बांबे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने वर्ष 2006 में मनपा को पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम चलाने का निर्देश दिया था। इसके बाद मनपा ने अवारा कुत्तों की नसबंदी पर लाखों खर्च कर उनकी संख्या कम होने का दावा किया है। लेकिन इसके बाद भी नगर के अनेक चौक-चौराहे और गली-मुहल्लों में सैकड़ों आवारा कुत्ते घूमते हुए दिखते हैं। इन अवारा कुत्तो पर नसबंदी होने के कोई निशान भी नहीं हंै। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस कार्य में कितना भ्रष्टाचार है।
हालांकि मनपा ने कोर्ट में दिये अपने शपथपत्र में कहा था कि पहले शहर में 8300 आवारा कुत्ते थे। बाद में यह संख्या 33000 बताई गई। अब मनपा कह रही है कि वर्ष 2006 से 2008 के बीच इनकी संख्या बढ़कर 53000 के करीब हो चुकी है। ज्ञात हो कि शहर में आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए उनकी नसबंदी का ठेका पांच गैर सरकारी संगठन आईएसएडब्ल्यू, वाईएमसीए, एसपीसीए और रॉयल वेटनरी सोसाइटी को दिये गये थे। वर्ष 2008 के बाद एनएमसी ने वाईएमसीए और रॉयल वेटरनी सोसाइटी को ही यह ठेका वर्ष 2008 में मिला। आईएसएडब्लयू लक्ष्मीनगर, नेहरू नगर, हनुमान नगर, लकडग़ंज और संतरंजीपुरा जोन के आवारा कुत्तों के नसबंदी की जिम्मेदारी है। बाकी जोन की जिजमेदारी एसपीसीए को है, जिसमें धंतोली, धरमपेठ, मंगलवारी और आसीनगर जोन का समावेश है।
ज्ञात हो कि एक कुत्ते की नसबंदी के लिए मनपा 370 रुपये का टीका लगाती है, इन्हें पकडऩे के एवज में 75 रुपया खर्च किया जाता है। पकडऩे के लिए वाहन और उसमें लगने वाले डीजल भी मनपा की ओर से उपलब्ध कराया जाता है। मनपा के वर्तमान आंकड़े कहते हैं, नगर में 53,928 अवारा कुत्तों की नसबंदी हो चुकी है। इसमें ने से 28720 नर और 25208 मादा कुत्ते हैं। इनके नसबंदी के लिए अब तक करीब 19.95 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं। वाईएमसीए और रॉयल वेटरनी सोसाइटी के सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी हर दिन औसतन 10 से 12 आवारा कुत्तोंं के नसबंदी का कार्य जारी है।
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कुत्तों की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाने के लिए मनपा और मनपा की ओर से नियुक्त एनजीओ के दावों की पोल खुल चुकी है। बांबे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने वर्ष 2006 में मनपा को पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम चलाने का निर्देश दिया था। इसके बाद मनपा ने अवारा कुत्तों की नसबंदी पर लाखों खर्च कर उनकी संख्या कम होने का दावा किया है। लेकिन इसके बाद भी नगर के अनेक चौक-चौराहे और गली-मुहल्लों में सैकड़ों आवारा कुत्ते घूमते हुए दिखते हैं। इन अवारा कुत्तो पर नसबंदी होने के कोई निशान भी नहीं हंै। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस कार्य में कितना भ्रष्टाचार है।
हालांकि मनपा ने कोर्ट में दिये अपने शपथपत्र में कहा था कि पहले शहर में 8300 आवारा कुत्ते थे। बाद में यह संख्या 33000 बताई गई। अब मनपा कह रही है कि वर्ष 2006 से 2008 के बीच इनकी संख्या बढ़कर 53000 के करीब हो चुकी है। ज्ञात हो कि शहर में आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रण में रखने के लिए उनकी नसबंदी का ठेका पांच गैर सरकारी संगठन आईएसएडब्ल्यू, वाईएमसीए, एसपीसीए और रॉयल वेटनरी सोसाइटी को दिये गये थे। वर्ष 2008 के बाद एनएमसी ने वाईएमसीए और रॉयल वेटरनी सोसाइटी को ही यह ठेका वर्ष 2008 में मिला। आईएसएडब्लयू लक्ष्मीनगर, नेहरू नगर, हनुमान नगर, लकडग़ंज और संतरंजीपुरा जोन के आवारा कुत्तों के नसबंदी की जिम्मेदारी है। बाकी जोन की जिजमेदारी एसपीसीए को है, जिसमें धंतोली, धरमपेठ, मंगलवारी और आसीनगर जोन का समावेश है।
ज्ञात हो कि एक कुत्ते की नसबंदी के लिए मनपा 370 रुपये का टीका लगाती है, इन्हें पकडऩे के एवज में 75 रुपया खर्च किया जाता है। पकडऩे के लिए वाहन और उसमें लगने वाले डीजल भी मनपा की ओर से उपलब्ध कराया जाता है। मनपा के वर्तमान आंकड़े कहते हैं, नगर में 53,928 अवारा कुत्तों की नसबंदी हो चुकी है। इसमें ने से 28720 नर और 25208 मादा कुत्ते हैं। इनके नसबंदी के लिए अब तक करीब 19.95 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं। वाईएमसीए और रॉयल वेटरनी सोसाइटी के सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी हर दिन औसतन 10 से 12 आवारा कुत्तोंं के नसबंदी का कार्य जारी है।
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रविवार, अगस्त 08, 2010
आईएसआई को आतंकवादी संगठन घोषित करें : राजनाथ
घोटालों पर परदा डालना कांग्रेस की पुरानी नीति
कश्मीर समस्या के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार
नागपुर। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का आतंकवादी घटनाओं में हाथ होने की बात कई बार उजागर हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विश्वास में लेकर आईएसआई को आतंकवादी संगठन घोषित करने की मांग भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने की।
राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद के पीछे आईएसआई होने की बात विश्व समुदाय के ध्यान में भी आई है। कश्मीर समस्या कांग्रेस की ही देन है। वोट बैंक की राजनीति तथा रचनात्मक नीति नहीं बनाए जाने से कश्मीर समस्या अधिकाधिक उग्र हो रही है। इसका झटका आम आदमी को लग रहा है। इस पर सर्वमान्य हल निकालना जरूरी है लेकिन केंद्र सरकार इसमें असफल साबित हुई है। इन दिनों देशभर में चर्चित कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच करने की मांग करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि कॉमनवेल्थ को हमारा विरोध नहीं है। घोटाला साबित हो चुका है लेकिन जिस ढंग से यह घोटाला उजागर हो रहा है, वह उचित नहीं है। इस संबंध में प्राथमिक जांच कर संबंधित पर कार्रवाई की जानी चाहिए, फिर वह कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। कांग्रेस इस घोटाले पर परदा डालने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस की यह पुरानी नीति है। देश का सम्मान रखते हुए यह स्पर्धा होनी चाहिए, उसके लिए हमारा 100 प्रतिशत सहयोग रहेगा। राजनाथ ने कहा कि देश की एकात्मता व अखंडता कायम रखकर जातिनिहाय जनगणना हो। देशवासियों को डरा रही महंगाई की समस्या को भाजपा ने संसद के दोनों सदनों में उठाकर रखा। देश के गरीबों को न्याय देने के लिए कोई राजनीति न करते हुए चर्चा होनी चाहिए। इस पर अगर मतदान लिया होता तो सरकार की पराजय तय थी। 1970 के बाद पहली बार विपक्ष महंगाई को लेकर इतना आक्रामक था।
रामजन्मभूमि के मुद्दे पर राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रभु रामचंद्र इस देश की पहचान हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा भी प्रतिबद्ध है। भाजपा ने कभी भी इसका राजनीतिक लाभ नहीं उठाया। लेकिन कांग्रेस ने इसका लाभ अच्छी तरह उठाया। राम मंदिर का मुद्दा राजनीतिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय मुद्दा है। इसी कारण सभी धर्मियों ने इसकी ओर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए। स्वतंत्र विदर्भ राज्य के बारे में राजनाथ सिंह ने कहा कि भाजपा ने विदर्भ राज्य का समर्थन किया है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भी यह प्रस्ताव मंजूर किया है। इसका जवाब सत्तारूढ़ कांग्रेस से ही पूछा जाना चाहिए।
गडकरी की तारीफ
राजनाथ सिंह ने भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी की जी भरकर तारीफ करते हुए कहा कि जबर्दस्त कल्पनाशक्ति, निर्माणशीलता, कृतिशीलता तथा किसी समस्या का हल निकालने की कुशलता आदि तमाम गुण गडकरी में मौजूद हैं। उनके यह गुण मुझे तथा कई लोगों को बहुत कम समय में देखने मिले। राजनाथ ने विश्वास जताया कि 'बेस्ट परफार्मंसÓ वाले इस नेता के कारण भाजपा को जल्द ही अच्छे दिन देखने मिलेंगे।
कश्मीर समस्या के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार
नागपुर। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का आतंकवादी घटनाओं में हाथ होने की बात कई बार उजागर हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को विश्वास में लेकर आईएसआई को आतंकवादी संगठन घोषित करने की मांग भाजपा के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने की।
राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद के पीछे आईएसआई होने की बात विश्व समुदाय के ध्यान में भी आई है। कश्मीर समस्या कांग्रेस की ही देन है। वोट बैंक की राजनीति तथा रचनात्मक नीति नहीं बनाए जाने से कश्मीर समस्या अधिकाधिक उग्र हो रही है। इसका झटका आम आदमी को लग रहा है। इस पर सर्वमान्य हल निकालना जरूरी है लेकिन केंद्र सरकार इसमें असफल साबित हुई है। इन दिनों देशभर में चर्चित कॉमनवेल्थ घोटाले की जांच करने की मांग करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि कॉमनवेल्थ को हमारा विरोध नहीं है। घोटाला साबित हो चुका है लेकिन जिस ढंग से यह घोटाला उजागर हो रहा है, वह उचित नहीं है। इस संबंध में प्राथमिक जांच कर संबंधित पर कार्रवाई की जानी चाहिए, फिर वह कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। कांग्रेस इस घोटाले पर परदा डालने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस की यह पुरानी नीति है। देश का सम्मान रखते हुए यह स्पर्धा होनी चाहिए, उसके लिए हमारा 100 प्रतिशत सहयोग रहेगा। राजनाथ ने कहा कि देश की एकात्मता व अखंडता कायम रखकर जातिनिहाय जनगणना हो। देशवासियों को डरा रही महंगाई की समस्या को भाजपा ने संसद के दोनों सदनों में उठाकर रखा। देश के गरीबों को न्याय देने के लिए कोई राजनीति न करते हुए चर्चा होनी चाहिए। इस पर अगर मतदान लिया होता तो सरकार की पराजय तय थी। 1970 के बाद पहली बार विपक्ष महंगाई को लेकर इतना आक्रामक था।
रामजन्मभूमि के मुद्दे पर राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रभु रामचंद्र इस देश की पहचान हैं। राम मंदिर निर्माण के लिए भाजपा भी प्रतिबद्ध है। भाजपा ने कभी भी इसका राजनीतिक लाभ नहीं उठाया। लेकिन कांग्रेस ने इसका लाभ अच्छी तरह उठाया। राम मंदिर का मुद्दा राजनीतिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय मुद्दा है। इसी कारण सभी धर्मियों ने इसकी ओर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए। स्वतंत्र विदर्भ राज्य के बारे में राजनाथ सिंह ने कहा कि भाजपा ने विदर्भ राज्य का समर्थन किया है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भी यह प्रस्ताव मंजूर किया है। इसका जवाब सत्तारूढ़ कांग्रेस से ही पूछा जाना चाहिए।
गडकरी की तारीफ
राजनाथ सिंह ने भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी की जी भरकर तारीफ करते हुए कहा कि जबर्दस्त कल्पनाशक्ति, निर्माणशीलता, कृतिशीलता तथा किसी समस्या का हल निकालने की कुशलता आदि तमाम गुण गडकरी में मौजूद हैं। उनके यह गुण मुझे तथा कई लोगों को बहुत कम समय में देखने मिले। राजनाथ ने विश्वास जताया कि 'बेस्ट परफार्मंसÓ वाले इस नेता के कारण भाजपा को जल्द ही अच्छे दिन देखने मिलेंगे।
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गरीबी रेखा पर सरकार की राय स्पष्ट नहीं
'मीट द प्रेसÓ में नागपुर के पत्रकारों से अनौचारिक चर्चा में ए.बी.बर्धन ने कहा
संजय स्वदेश
नागपुर। गरीबी रेखा पर सरकार की राय स्पष्ट नहीं है। इस मामले में वह स्वयं भ्रम में हैं कि देश में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह कहना है कि भाकपा के वरिष्ठ नेता ए.बी.बद्र्धन का। वे रविवार की शाम धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में पत्रकारों से अनौपचारिकता चर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि योजना आयोग ने पहले कहा कि देश में कुल आबादी के 47 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, फिर बाद में कहा गया कि 27 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। इस आंकड़े को भी सरकार ने रिजेक्ट कर दिया। तेंदुलकर आयोग ने बताया कि देश में 37 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। एन.सी सक्सेना आयोग ने 57 प्रतिशत और कांग्रेस के वर्तमान सांसद अर्जुनसेन गुप्ता आयोग ने बताया कि 77 प्रतिशत लोग गरीब हैं। ये अनाज, तेल, दाल, खरीदने में असमर्थ हैं। ये अपने बच्चों को ठीक से शिक्षा नहीं दे सकते हैं। सभी आकड़ों को सरकार झुठला दिया है। लेकिन अब सरकार यह कोशिश कर रही है कि 37 प्रतिशत की संख्या को मान लिया जाए। महंगाई के खिलाफ वामदल आंदोलन चला रहे हैं। 5 जुलाई को भारत बंद सफल भी रहा। कुछ लोग नुकसान का आंकलन कर रहे हैं लेकिन भूख का आंकलन नहीं हो रहा है। बारिश के बाद महंगाई के विरोध में आंदोलन फिर शुरू होगा।
कहां बह रही है जीडीपी की गंगा?
बर्धन ने कहा कि एपीएल और बीपीएल सिस्टम हटा कर जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) लागू करना चाहिए। यही जनता की जरूरत है। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि देश का समग्र विकास हो रहा है। जीडीपी बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर सबसे ज्यादा एनीमिया से ग्रस्त माताएं भारत में हंै। बाल मृत्यु दर में भारत आगे है। फिर यह जीडीपी की ग्रोथ की गंगा कहां बहती है। उन्होंने कहा कि सभी मुद्दों की जननी महंगाई है। सरकार अन्न सुरक्षा कानून बनाने जा रही है। इसकी आजकल बड़ी चर्चा है। महंगाई और अन्न सुरक्षा एक दूसरे से जुड़े हैं। अन्न सुरक्षाकानून में 3 प्रमुख बातें होनी चाहिए। पहली, अन्न सुरक्षा मतलब देश के हर व्यक्ति को यथेष्ठ अन्य मिले। दूसरी, जो अन्न मिले वह पौष्टिक हो और तीसरी, यह सभी के पहुंच की कीमत के अंदर में उपलब्ध हो, जिससे कि हर कोई खरीद सके। यदि अन्न सुरक्षा कानून में इन तीनों चीजों का समावेश हो तभी यह कानून सफल होगा।
सभी तक अन्न पहुंचाने में सरकार को जो खर्च आएगा, वह जीडीपी का कुल 1.9 प्रतिशत होगा। इसका पूरा हिसाब हमने सरकार को दे दिया है। देश में 20 से 25 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो जनवितरण प्रणाली ठीक कर भी लिया जाए तो भी वे बाहर से खरीदी कर सकते हैं। 75 प्रतिशत लोगों तक जनवितरण प्रणाली पहुंचनी चाहिए।
कश्मीर का बाजार कहां है?
बर्धन ने कहा कि कश्मीर की समस्या कई मायनों में इन दिनों उलझ गई है। एक ओर कश्मीर घाटी में जहां गोलियां बरस रही हंै, वहीं दूसरी ओर लेह में पानी का कहर बरस रहा है। छोटे से शहर लेह में पानी के बहाव के कोई परंपरागत तरीके नहीं हैं। वहां अभी तक बर्फ ही बरसते रहे हैं। इस कहर में छोटे से शहर के चार से पांच सौ लोगों का गायब हो जाना गंभीर बात है। हम कहते हैं कि कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। शरीर के एक हिस्से में जब चोट लगती है, तो दूसरे हिस्से में दर्द होता है। लेकिन कश्मीर मामले में ऐसा नहीं है। हम संवदेनशून्य हो रहे हैं। यदि भारत कश्मीर का ही अंग है तो लोग कश्मीर के प्रति संवेदना प्रकट करें। सबसे पहले तो यह जरूरी है कि कश्मीर से सेना को हटायी जाए। सेना के कारण वहां के रास्ते और बाजार बंद हैं। कश्मीर में सबसे ज्यादा उत्पादन सेब का होता है। लेकिन वहां सेब का बाजार कहां है। कश्मीर के सामान्य आर्थिक जीवन को भी बंद कर दिया गया है। इसे खोलना जरूरी है।
कॉमन वेल्थ के लिए पैसा है, गोदाम बनाने के लिए नहीं
कॉमन वेल्थ गेम की तैयारियों में अनियमितताओं से पता चलता है कि भ्रष्टाचार के मामले अब ओलंपिक तक पहुंच गए हैं। इस गेम के माध्यम से भारत की प्रतिष्ठा दांव पर है। इसलिए यह कामयाब होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भ्रष्टाचारियों पर कोई रोक-टोक न हो। देश की इज्जत मिट्टी में मिलाने वाले भ्रष्टाचारियों को राजा, महाराजा के पद से हटा दिया जाना चाहिए। सरकार कह रही है कि अनाज का उत्पादन इतना है कि अनाज रखने के लिए गोदाम नहीं है। कॉमन वेल्थ गेम में करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये लेकिन सरकार के पास अनाज के गोदाम बनवाने के लिए पैसे नहीं है।
बॉक्स में
बिहार चुनाव वाम के साथ लड़ेंगे
बिहार चुनाव में वाम दल एकजुट होकर मैदान में उतरें, इसके लिए सहमति बन रही है। पूरी संभावना है कि चुनाव में वाम दल एक ही होंगे।
नक्सलबाद पर हो सार्थक बातचीत
सरकार समझती है कि नक्सलवाद को केवल हथियार से ही रोका जा सकता है। यह संभव भी नहीं है। एक ओर तो राज्य का आतंक है, वहीं दूसरी ओर नक्सलियों का आतंक। दोनों के बीच में मासूम मर रहे हैं। इसके लिए बातचीत का रास्ता सबसे ज्यादा बेहतर है।
गडकरी से मुलाकात हुई
नितिन गडकरी मुझझे मिलने आए। लेकिन किसी को इस बात का तनिक भी विश्वास नहीं होगा कि हमलोगों ने राजनीति की बातें नहीं की। वे मेरे पुराने मित्र हैं। मेरे पास आए तो केवल व्यक्तिगत बातें होती रहीं। विशेष रूप से उनके चीनी उद्योग पर चर्चा हुई।
किन नेताओं के पीछे है विदर्भ की जनता
पृथक विदर्भ के मुद्दे पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में बर्धन ने एक टूक में कहा कि -विदर्भ की जनता तथाकथित विदर्भवादी नेताओं के पीछे है।
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शुक्रवार, अगस्त 06, 2010
इस बार खूब चमकेगा 'सफेद सोनाÓ
-विशेषज्ञों ने लगाया 400 लाख क्विंटल कपास होने का अनुमान
-मानसून फेर सकता है उम्मीदों पर पानी
संजय स्वदेश
नागपुर। कपास फसल के भारी नुकसान के लिए प्रसिद्ध विदर्भ में कपास की खेती से किसानों को इस बार उम्मीद की नई किरण जगी है। विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि इस बार विदर्भ में करीब 400 लाख क्विंटल कपास का उत्पादन हो सकता है। यदि विशेषज्ञों का अनुमान सही निकला तो एक दशक में यह पहला ऐसा मौका होगा, जब कपास उत्पादन करने वाले किसानों के चहरे पर एक मुस्कान आएगी। अभी तक विदर्भ में सबसे ज्यादा कपास उत्पादक किसानों ने ही आत्महत्या की है। ज्ञात हो कि पूरे विदर्भ में करीब 3 लाख हेक्टेयर भूमि में में कपास की खेती होती है।
्रमहाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव कॉटन-ग्वार मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के चेयरमैन एन.पी. हिरानी ने बताया कि इस बार खरीफ की फसल की प्रारंभिक रिपोर्ट काफी सकारात्मक है। ऐसा लगता है कि इस बार पिछले वर्ष की तुलना में करीब 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा कपास की उपज होगी। हालांकि बीते वर्ष में भी कपास की उपज कम हुई थी। पिछले वर्ष जहां 325 लाख क्विंटल कपास की उपज हुई थी, वहीं इस वर्ष करीब 400 लाख क्विंटल कपास होने की संभावना दिख रही है। हिरानी ने राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ष कपास की उपज करीब 10 से 15 प्रतिशत तक बढऩे की संभावना जतायी है। देश भर में करीब 400 लाख हेक्टेयर में कपास की खेेती होती है, इसमें सबसे ज्यादा विदर्भ में उपज होती है। लेकिन प्रति हेक्टेयर कपास उत्पादन में फिलहाल गुजरात और पंजाब आगे है।
फेडरेशन सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक राज्य सरकार बाजार में कपास के मूल्य को संतुलित रखने के लिए निर्यात नहीं करने का निर्णय लिया है। हालांकि वायदा करोबार में कपास पहले से ही तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक रहा है। लिहाजा, इस बार के खारीफ के मौसम में कपास के उत्पादन से किसानों की आय बढऩे की संभावना बढ़ती दिख रही है। वहीं अंतरराष्ट्रीय संकेत भी सकारात्मक हैं। अगले माह चीन और यूएस के बाजार में कपास की बिक्री की शुरुआत होते ही स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी।
यदि दोनों बाजार में मूल्य अच्छे रहे तो भारतीय बाजार में भी कपास की मजबूती दिखेगी। लेकिन थोड़ी-सी परेशानी मानसून को लेकर है। फिलहाल अगस्त माह तक मानसून ठीक रहा है। अगले माह में भी मानसून के ठीक रहने की संभावना है। करीब 102 प्रतिशत वर्षा होने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि आगामी दिनों में मानसून उम्मीदों पर पानी फेरता है तो उपज पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा इस बार बीज और खाद के मूल्यों में भी बढ़ोतरी हुई है। इस कारण फेडरेशन ने इस बार कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से रखने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। बीते वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य 3000 रुपये प्रति क्विंटल था।
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-मानसून फेर सकता है उम्मीदों पर पानी
संजय स्वदेश
नागपुर। कपास फसल के भारी नुकसान के लिए प्रसिद्ध विदर्भ में कपास की खेती से किसानों को इस बार उम्मीद की नई किरण जगी है। विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि इस बार विदर्भ में करीब 400 लाख क्विंटल कपास का उत्पादन हो सकता है। यदि विशेषज्ञों का अनुमान सही निकला तो एक दशक में यह पहला ऐसा मौका होगा, जब कपास उत्पादन करने वाले किसानों के चहरे पर एक मुस्कान आएगी। अभी तक विदर्भ में सबसे ज्यादा कपास उत्पादक किसानों ने ही आत्महत्या की है। ज्ञात हो कि पूरे विदर्भ में करीब 3 लाख हेक्टेयर भूमि में में कपास की खेती होती है।
्रमहाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव कॉटन-ग्वार मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के चेयरमैन एन.पी. हिरानी ने बताया कि इस बार खरीफ की फसल की प्रारंभिक रिपोर्ट काफी सकारात्मक है। ऐसा लगता है कि इस बार पिछले वर्ष की तुलना में करीब 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा कपास की उपज होगी। हालांकि बीते वर्ष में भी कपास की उपज कम हुई थी। पिछले वर्ष जहां 325 लाख क्विंटल कपास की उपज हुई थी, वहीं इस वर्ष करीब 400 लाख क्विंटल कपास होने की संभावना दिख रही है। हिरानी ने राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ष कपास की उपज करीब 10 से 15 प्रतिशत तक बढऩे की संभावना जतायी है। देश भर में करीब 400 लाख हेक्टेयर में कपास की खेेती होती है, इसमें सबसे ज्यादा विदर्भ में उपज होती है। लेकिन प्रति हेक्टेयर कपास उत्पादन में फिलहाल गुजरात और पंजाब आगे है।
फेडरेशन सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक राज्य सरकार बाजार में कपास के मूल्य को संतुलित रखने के लिए निर्यात नहीं करने का निर्णय लिया है। हालांकि वायदा करोबार में कपास पहले से ही तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक रहा है। लिहाजा, इस बार के खारीफ के मौसम में कपास के उत्पादन से किसानों की आय बढऩे की संभावना बढ़ती दिख रही है। वहीं अंतरराष्ट्रीय संकेत भी सकारात्मक हैं। अगले माह चीन और यूएस के बाजार में कपास की बिक्री की शुरुआत होते ही स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी।
यदि दोनों बाजार में मूल्य अच्छे रहे तो भारतीय बाजार में भी कपास की मजबूती दिखेगी। लेकिन थोड़ी-सी परेशानी मानसून को लेकर है। फिलहाल अगस्त माह तक मानसून ठीक रहा है। अगले माह में भी मानसून के ठीक रहने की संभावना है। करीब 102 प्रतिशत वर्षा होने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि आगामी दिनों में मानसून उम्मीदों पर पानी फेरता है तो उपज पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा इस बार बीज और खाद के मूल्यों में भी बढ़ोतरी हुई है। इस कारण फेडरेशन ने इस बार कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से रखने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। बीते वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य 3000 रुपये प्रति क्विंटल था।
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नागपुर समाचार
मंगलवार, अगस्त 03, 2010
गुटबाजी का सामना करना पड़ेगा पर्यवेक्षक हुसैन को
बीआरओ की घोषणा नहीं हो पाई, कागजी चुनाव प्रक्रिया होने की संभावना
नगर संवाददाता
नागपुर। आगामी 4 अगस्त को नागपुर शहर में कांग्रेस पार्टी का संगठन चुनाव होने जा रहा है। चुनाव में जोरदार हंगामा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
यूं तो शहर में कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व जड़ से हिल चुका है। कार्यकर्ताओं की संख्या उंगलियों गिनने लायक है. कार्यकर्ताओं ने खुद को गुटों मेंं बांट लिया है। यह भी सत्य है कि इस बंटवारे में कट्टर कांग्रेसी शामिल होने की बजाय घर बैठे चुके हैं।
उक्त वस्तुस्थिति के मध्य कांग्रेस पार्टी ने संगठन चुनाव के लिए जनजागरण अभियान की शुरुआत की। इस अभियान को अब तक कागजों पर सफल दर्शाया जा चुका है। वहीं दूसरी ओर नागपुर शहर के कांग्रेसियों की गुटबाजी व झगड़े दिल्ली वालों को भी सुलझाने के लिए नाको चने चबाने पड़ते हैं। इसके बावजूद आज तक शहर मेें कांग्रेसियों को एक छत के नीचे लाने मेें पार्टी शत-प्रतिशत असफल रही है।
4 अगस्त को संगठन चुनाव करवाने की घोषणा की गई है लेकिन शहर के पर्यवेक्षक मुज्जफर हुसैन शहर के ब्लाक रिटर्निंग ऑफीसरों की घोषणा करने की समाचार लिखे जाने तक हिम्मत नहीं जुटा पाए। जब चुनाव करवाने वाले अधिकारी की घोषणा नहीं है तो मुमकिन नहीं कि चुनाव हो पाएगा। ऐसे में चुनाव की चाहत लिए महीनों से सक्रिय कांग्रेसी कार्यकर्ता व नेताओं द्वारा बनाई गई प्राथमिक सदस्यता सूची व मेहनत की मिट्टीपलीत होना तय है।
सूत्रों की मानें तो पर्यवेक्षक मुज्जफर हुसैन 4 अगस्त को सुबह नागपुर पहुंचेंगे और तय रणनीति के अनुसार संगठन चुनाव के नाम पर खानापूर्ति कर शाम को लौट जाएंगे,ऐसी ही योजना बनाई है।
उल्लेखनीय है कि शहर में कांग्रेसियों के मध्य इतनी शह-मात का खेल जारी है कि 18 ब्लाक अध्यक्ष, शहर प्रतिनिधि, प्रदेश प्रतिनिधि का चयन घमासान ही मचाएगा और यह पूरी प्रक्रिया पर्यवेक्षक मुज्जफर हुसैन को नागपुर के सीमित दौरे में कर पाना मुमकिन नहीं है। संगठन चुनाव के नाम पर खानापूर्ति की कार्रवाई मुंबई में ही पूरी होगी और नागपुर के कांग्रेसियों को सूचित कर नये-नये नेता थोपे जा सकते हैं। पुन: एक बार कांग्रेसी कार्यकर्ताओं व मेहनत कशों की फजीहत होने वाली है।
००० fraom daini1857
नगर संवाददाता
नागपुर। आगामी 4 अगस्त को नागपुर शहर में कांग्रेस पार्टी का संगठन चुनाव होने जा रहा है। चुनाव में जोरदार हंगामा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।
यूं तो शहर में कांग्रेस पार्टी का अस्तित्व जड़ से हिल चुका है। कार्यकर्ताओं की संख्या उंगलियों गिनने लायक है. कार्यकर्ताओं ने खुद को गुटों मेंं बांट लिया है। यह भी सत्य है कि इस बंटवारे में कट्टर कांग्रेसी शामिल होने की बजाय घर बैठे चुके हैं।
उक्त वस्तुस्थिति के मध्य कांग्रेस पार्टी ने संगठन चुनाव के लिए जनजागरण अभियान की शुरुआत की। इस अभियान को अब तक कागजों पर सफल दर्शाया जा चुका है। वहीं दूसरी ओर नागपुर शहर के कांग्रेसियों की गुटबाजी व झगड़े दिल्ली वालों को भी सुलझाने के लिए नाको चने चबाने पड़ते हैं। इसके बावजूद आज तक शहर मेें कांग्रेसियों को एक छत के नीचे लाने मेें पार्टी शत-प्रतिशत असफल रही है।
4 अगस्त को संगठन चुनाव करवाने की घोषणा की गई है लेकिन शहर के पर्यवेक्षक मुज्जफर हुसैन शहर के ब्लाक रिटर्निंग ऑफीसरों की घोषणा करने की समाचार लिखे जाने तक हिम्मत नहीं जुटा पाए। जब चुनाव करवाने वाले अधिकारी की घोषणा नहीं है तो मुमकिन नहीं कि चुनाव हो पाएगा। ऐसे में चुनाव की चाहत लिए महीनों से सक्रिय कांग्रेसी कार्यकर्ता व नेताओं द्वारा बनाई गई प्राथमिक सदस्यता सूची व मेहनत की मिट्टीपलीत होना तय है।
सूत्रों की मानें तो पर्यवेक्षक मुज्जफर हुसैन 4 अगस्त को सुबह नागपुर पहुंचेंगे और तय रणनीति के अनुसार संगठन चुनाव के नाम पर खानापूर्ति कर शाम को लौट जाएंगे,ऐसी ही योजना बनाई है।
उल्लेखनीय है कि शहर में कांग्रेसियों के मध्य इतनी शह-मात का खेल जारी है कि 18 ब्लाक अध्यक्ष, शहर प्रतिनिधि, प्रदेश प्रतिनिधि का चयन घमासान ही मचाएगा और यह पूरी प्रक्रिया पर्यवेक्षक मुज्जफर हुसैन को नागपुर के सीमित दौरे में कर पाना मुमकिन नहीं है। संगठन चुनाव के नाम पर खानापूर्ति की कार्रवाई मुंबई में ही पूरी होगी और नागपुर के कांग्रेसियों को सूचित कर नये-नये नेता थोपे जा सकते हैं। पुन: एक बार कांग्रेसी कार्यकर्ताओं व मेहनत कशों की फजीहत होने वाली है।
००० fraom daini1857
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नागपुर समाचार
सोमवार, अगस्त 02, 2010
गैस सिलेंडर वितरण में मनमानी वसूली
अधिकारी की मिलीभगत से हो रही लूट
नागपुर। रसोईगैस की किल्लत से सिलेंडर वितरकोंं ने नया कनेक्शन और एक सिलेंडरधारक ग्राहक को दूसरा सिलेंडर देना बंद कर दिया था। नया कनेक्शन और दूसरा सिलेंडर देने का सिलसिला कई महीने पहले से शुरू हो गया है। लेकिन नये कनेक्शन और दूसरे सिलेडर देने में गैस सिलेंडर वितरक ग्राहकों को जम कर लूट रहे हैं। वे ग्राहकों से निर्धारित रकम से करीब दोगुनी, तीनगुनी रकम लेकर नया कनेक्शन या दूसरा सिलेंडर दे रहे हैं।
सबसे ज्यादा परेशानी उन ग्राहकों को है, जिनके पास एक सिलेंडर है। जब सिलेंडर खत्म होने पर वे गैस के लिए नंबर लगाते हैं, तब उन्हें यह कहा जाता है कि आप खाली सिलेंडर लेकर आ जाओ और यहां से दूसरा ले जाओ। मजबूर उपभोक्ता ऐसा ही कर रहे हैं। जो खाली सिलेंडर लेकर गैस एजेंसी के यहां नहीं आते हैं, उनके यहां सात दिन तक भी भरे हुए गैस सिलेंडर की डिलिवरी नहीं होती है। वहीं खाद्य एवं आपूर्ति विभाग का कहना है कि एकल सिलेंडरधारकों को नंबर लगाने के तीन दिन के अंदर सिलेंडर देने का निर्देश है। पर इस निर्देश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सुबह गैस सिलेंडर के एजेंसी का दफ्तर खुलने से पहले ही वहां दर्जनों लोग खाली सिलेंडर लेकर खड़े दिखते हैं। जैसे ही गैस की गाड़ी आती है, लोग सिलेंडर बदल लेते हैं। इससे घर पर सिलेंडर का इंतजार कर रहे ग्राहक इंतजार में ही रह जाते हैं। बार-बार फोन करने के बाद उन्हें 7 से 15 दिन के बीच सिलेंडर की डिलिवरी होती है। तब तक बाहर का खाना-खाते खाते ऐसे परिवार वालों का बजट गड़बड़ा जाता है। कुछ लोग पड़ोसी से सिलेंडर उधार मांग कर काम चला लेते हैं। लेकिन हर बार इस तरह करने से लोगों को हिचक होती है।
धंतोली स्थित भारत गैस एजेंसी के यहां सुबह-सुबह सिलेंडर लेने आए अभिजीत ने बताया कि एक सिलेंडर होने से मजबूरी में यहां आना पड़ता है। एजेंसी के भरोसे रहें तो 7 दिन में भी सिलेंडर घर में नहीं पहुंचेगा। दूसरा सिलेंडर क्यों नहीं लेते-पूछने पर अभिजीत कहते हैं कि दूसरा सिलेंडर लेने के लिए एजेंसी वाले 2000 रुपये मांग रहे हैं, जबकि दूसरा सिलेंडर सरकारी रेट के अनुसार हजार रुपये तक में आ जाना चाहिए। पर इस सरकारी रेट के अनुसार एजेंसी वाले साफ इनकार करते हैं। शिकायत की बात करने पर एजेंसी वालों का कहना है कि ग्राहक चाहे तो शिकायत संबंधी अधिकारी का नंबर वे स्वयं उपलब्ध करा सकते हैं।
नागपुर। रसोईगैस की किल्लत से सिलेंडर वितरकोंं ने नया कनेक्शन और एक सिलेंडरधारक ग्राहक को दूसरा सिलेंडर देना बंद कर दिया था। नया कनेक्शन और दूसरा सिलेंडर देने का सिलसिला कई महीने पहले से शुरू हो गया है। लेकिन नये कनेक्शन और दूसरे सिलेडर देने में गैस सिलेंडर वितरक ग्राहकों को जम कर लूट रहे हैं। वे ग्राहकों से निर्धारित रकम से करीब दोगुनी, तीनगुनी रकम लेकर नया कनेक्शन या दूसरा सिलेंडर दे रहे हैं।
सबसे ज्यादा परेशानी उन ग्राहकों को है, जिनके पास एक सिलेंडर है। जब सिलेंडर खत्म होने पर वे गैस के लिए नंबर लगाते हैं, तब उन्हें यह कहा जाता है कि आप खाली सिलेंडर लेकर आ जाओ और यहां से दूसरा ले जाओ। मजबूर उपभोक्ता ऐसा ही कर रहे हैं। जो खाली सिलेंडर लेकर गैस एजेंसी के यहां नहीं आते हैं, उनके यहां सात दिन तक भी भरे हुए गैस सिलेंडर की डिलिवरी नहीं होती है। वहीं खाद्य एवं आपूर्ति विभाग का कहना है कि एकल सिलेंडरधारकों को नंबर लगाने के तीन दिन के अंदर सिलेंडर देने का निर्देश है। पर इस निर्देश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सुबह गैस सिलेंडर के एजेंसी का दफ्तर खुलने से पहले ही वहां दर्जनों लोग खाली सिलेंडर लेकर खड़े दिखते हैं। जैसे ही गैस की गाड़ी आती है, लोग सिलेंडर बदल लेते हैं। इससे घर पर सिलेंडर का इंतजार कर रहे ग्राहक इंतजार में ही रह जाते हैं। बार-बार फोन करने के बाद उन्हें 7 से 15 दिन के बीच सिलेंडर की डिलिवरी होती है। तब तक बाहर का खाना-खाते खाते ऐसे परिवार वालों का बजट गड़बड़ा जाता है। कुछ लोग पड़ोसी से सिलेंडर उधार मांग कर काम चला लेते हैं। लेकिन हर बार इस तरह करने से लोगों को हिचक होती है।
धंतोली स्थित भारत गैस एजेंसी के यहां सुबह-सुबह सिलेंडर लेने आए अभिजीत ने बताया कि एक सिलेंडर होने से मजबूरी में यहां आना पड़ता है। एजेंसी के भरोसे रहें तो 7 दिन में भी सिलेंडर घर में नहीं पहुंचेगा। दूसरा सिलेंडर क्यों नहीं लेते-पूछने पर अभिजीत कहते हैं कि दूसरा सिलेंडर लेने के लिए एजेंसी वाले 2000 रुपये मांग रहे हैं, जबकि दूसरा सिलेंडर सरकारी रेट के अनुसार हजार रुपये तक में आ जाना चाहिए। पर इस सरकारी रेट के अनुसार एजेंसी वाले साफ इनकार करते हैं। शिकायत की बात करने पर एजेंसी वालों का कहना है कि ग्राहक चाहे तो शिकायत संबंधी अधिकारी का नंबर वे स्वयं उपलब्ध करा सकते हैं।
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रविवार, अगस्त 01, 2010
सम दृष्टि से होगा समाज का विकास : डा. भागवत
सक्षम संस्था की ओर से दृष्टिवाधितों के लिए निर्मित उपकरण अब्रार का लोकार्पण
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवन ने कहा कि सम दृष्टि से समाज का विकास होता है और संवदेना के धागे से जुड़ा समाज समय के झंझावातों को झेलते हुए आगे बढ़ता है। वे रविवार को दक्षिण अंबाझरी रोड स्थित बी.आर.मुंडले सभागृह में सक्षम संस्था की ओर आयोजित दृष्टिबाधितों के लिए निर्मित उपकरण अब्रार के लोकापर्ण के बाद सभा को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि समाजिक जागृति और ईश्वर की भक्ति एक समान है। क्योंकि दोनों में निष्काम भाव की जरूरत होती है। डा. भागवत ने कहा कि दुनिया भर में पांच करोड़ दृष्टिबाधित लोग हैं, अगर समाज का सहयोग मिले तो इनके जीवन की दिशा बदल सकती है। कार्यक्रम में प्रमुख रूप से सक्षम संस्था के संरक्षक दामोदर बापट, राष्ट्रीय अध्यक्ष मिलिंद कसबेकर, महामंत्री अविनाश चंद्र अग्निहोत्री, दिलीप कानाडे, प्रमोद क्षीरसागर उपस्थित थे।
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हिरण के मांस के साथ 4 गिरफ्तार
नागपुर। वन विभाग ने दिघोरी नाके पर 4 लोगों को हिरण के मांस के साथ पकड़ा है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक वन विभाग के अधिकारियों को गुप्त सूचना मिली थी कि 4 लोग हिरण के मांस को लेकर दिघोरी नाके से गुजरने वाले हैं। विभाग के अधिकारी व कर्मचारियों की टीम पहले से यहां मुस्तैद थी। गिरफ्तार चारों आरोपियों के पास से पांच किलो हिरण का मांस बरामद हुआ। उन पर वन्य जीव संरक्षण कानून 1972 की धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। चारों आरोपी बुद्देश्वर नगर गंगाबाईघाट के रहने वाले हैं। इनमें दशरथ शेट्टीवार, सेलुराज शेट्टी, मुगम शेट्टीवार, सुब्रमन्यम शेट्टी का समोवश है। वन विभाग की इस कार्रवाई में आरएसओ टेकाड़े, डीएस टेकाड़े, डी.ज.े लुटे, मोहिते आदि ने भाग लिया।
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शनिवार, जुलाई 31, 2010
गडचिरोली में ये क्या हो रहा है ...
रद्द हुआ आबा का गड़चिरोली दौरा!
संजय स्वदेश
नागपुर। महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला गड़चिरोली में इन दिनों काफी कुछ चल रहा है। यहां की गतिविधियों से राज्य सरकार पूरी तरह से भयभित है। पिछले दिनों नक्सली नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद गड़चिरोली जिले में सक्रिय खूंखार नक्सलियों की घातक गतिविधियों को देखते हुए राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल 'आबाÓ का गड़चिरोली दौरा रद्द हो गया। आबा 29 जुलाई को गड़चिरोली के दौरे पर आने वाले थे। उनकी अध्यक्षता में जिला नियोजन समिति की बैठक का आयोजन किया गया था। आर.आर. पाटिल गड़ïचिरोली के पालकमंत्री भी हैं।
खूंखार नक्सली नेता आजाद की आंध्र पुलिस के साथ मुठभेड़ में मौत के बाद से ही गड़चिरोली जबर्दस्त गुस्से में हैं। वे अपने बड़े नेता की मौत का बदला लेने का ऐलान भी कर चुके हैं। बड़े नेता के बदले में नक्सलियों के निशाने पर कोई बड़ा नेता ही होने की भनक लगने के बाद खुफिया एजेंसियों के अधिकारी सतर्क हो गए। आर.आर. पाटिल के गड़चिरोली जिला दौरे की घोषणा पहले ही हो गई थी और बताया जाता है कि नक्सलियों ने पाटिल के दौरे में बाधा पहुंचाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी। इसकी भनक लगने के बाद ही सतर्क हुई खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल पाटिल को गड़चिरोली का दौरा नहीं करने की सलाह दी। ज्ञात हो कि आजाद की मौत के बाद से आबा पिछले दिनों विदर्भ में आए थे, लेकिन गड़चिरोली न जाकर यवतमाल से ही वापस मुंबई चले गए थे। अब ताजा घटनाक्रम के तहत आबा का गड़चिरोली दौरा रद्द हो चुका है। आबा जब पिछली बार गड़चिरोली आए थे तब उनकी कार के सामने अचानक आए युवकों ने पुलिस भर्ती में हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए 'नक्सलवाद जिंदाबादÓ के नारे लगाए थे। उस घटना को सरकार ने गंभीरता से लेकर जांच शुरू की थी। नक्सल सूत्रों के अनुसार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में सक्रिय नक्सली तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक वे आजाद की मौत के बदले किसी बड़े नेता को निशाना नहीं बनाते। नक्सलियों की लिस्ट पर नक्सलग्रस्त राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री होने की जानकारी मिली है। हाल ही में खबर आई थी कि नक्सलियों ने नागपुर का उपयोग उपचार-हब तथा आवागमन के लिए करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से बड़े नेताओं के नागपुर दौरे के दौरान भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रखने के निर्देश खुफिया एजेंसियों ने पुलिस को दिए हैं।
माओवादियों ने फूंकी भाड़भिड़ी ग्रामपंचायत
नक्सलियों ने 28 जुलाई की रात चामोर्शी तहसील के भाड़भिड़ी स्थित ग्रामपंचायत कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। नक्सलियों के इस वर्ष के शहीद सप्ताह में यह पहली विध्वसंक घटना बताई जा रही है। पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने भाड़भिड़ी गांव में प्रवेश किया तथा ग्रामपंचायत कार्यालय में जाकर सारे कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इस आगजनी की घटना में कार्यालय में रखा फर्निचर समेत सारे दस्तावेज जलकर खाक हो गये। घटना को अंजाम देने के बाद सभी नक्सली लाल सलाम के नारे लगाते हुए पर्चे फेंककर वहां से फरार हो गये। इस घटना से भाड़भिड़ी गांव के लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। पुलिस ने इस मामले में अज्ञात नक्सलियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया है। विशेष अभियान के दलों को नक्सल खोज मुहिम के लिये रवाना करने के आदेश दिये गये है। शहीद सप्ताह के दौरान जिले के लोगों में खासी दहशत होकर पुलिस विभाग ने लोगों से सहयोग करने की अपील की है।
अनेक स्थानों पर बनाये स्मारक

28 जुलाई से नक्सल संगठनों की ओर से शहीद सप्ताह मनाया जा रहा है। इस सप्ताह के दौरान नक्सलियों ने जिले के अनेक स्थानों पर शहीद स्मारक बनाये हैं। कोरची तहसील के मसेली, धानोरा तहसील के अतिदुर्गम गांवों से लेकर सिरोंचा तहसील के बामणी गांव में नक्सलियों ने यह स्मारक बनाये है। धानोरा के किसी सुदुर गांव में नक्सलियों ने पुलिस मुठभेड़ में मारा गया आजाद का पुतला भी बनाया है। जगह-जगह पर्चें व बैनर फेंककर नक्सलियों ने शहीद सप्ताह को मनाने व सरकार के ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल बंद करने की मांग की है। सिरोंचा तहसील के कंबालपेठा सड़क पर नक्सलियों ने पेड़ काटकर बिछाये है। यहां पर लोगों ने वायरों के बंडल को भी देखा है।
सैकड़ों गांवों में छाया सन्नाटा
नक्सली नेता चारू मुजूमदार की स्मृति में शुरू हुआ नक्सली शहीद सप्ताह इन दिनों पूरी तरह दहशत के साये में बीता। जिले के अतिदुर्गम क्षेत्र में बसे दर्जनों गांवों में सन्नाटा छाया रहा। धानोरा व कोरची तहसील मुख्यालयों में भी स्थानीय नागरिक खौफ में है। नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने नक्सल आंदोलन के नेता आजाद और चारु मजमूदार के नाम के स्मारक बनाकर उन्हें अपनी श्रध्दांजलि दे रहे हैं। कोरची के मसेली गांव में नक्सलियों ने लाल आतंक का झंडा लहराकर लोगों से यह सप्ताह मनाने का आह्वान किया। पुलिस विभाग ने इस बीच सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात किये थे। जिसके चलते अब तक कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई है। विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले की धानोरा व कोरची तहसील को इस वर्ष नक्सलियों ने अपना केंद्रबिन्दु बनाया है। शहीद सप्ताह की सर्वाधिक हरकतें इन्हीं तहसीलों में देखी जा रही हैं। धानोरा, कोरची, कसनसुर, मसेली समेत वनांचल के अनेक गांवों में बंद रखा गया है। अनेक सड़कों पर पेड़ काटकर बिछाने से यातायात बाधित किया गया है। शहीद सप्ताह शुरू होने के एक दिन पूर्व ही जिले की धानोरा तहसील के मुरूमगांव के पास गढ़चिरोली-राजनांदगांव महामार्ग पर पेड़ काटकर बिछाये हैं। आज भी यह पेड़ यथावत हंै। घटनास्थल पर लोगों ने वायर के बंडल भी देखे हंै। जिसके चलते लोगों में खासी दहशत है। इस महामार्ग का यातायात पूरी तरह ठप पड़ गया है। उल्लेखनीय है कि यह महामार्ग जिले का एकमात्र अंतर्राज्यीय महामार्ग है। गढ़चिरोली-मानपुर बस गुरुवार को सुबह धानोरा से ही लौट जाने की खबर मिली है। तहसील मुख्यालय में अनेक निजी वाहन बंद के चलते खड़े हैं।
वहीं जगह-जगह पर्चे व बैनर लगाने से लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। इस बंद के चलते जिले के गढ़चिरोली व अहेरी बस डिपो की अनेक बस फेरियां बंद हैं। इसमें प्रमुख रूप से गढ़चिरोली-राजनांदगांव, गढ़चिरोली-मानपुर, मुरूमगांव, पेंढरी, भामरागढ़, एटापल्ली व अन्य अतिदुर्गम गांवों में जाने वाली बसों की फेरियां हैं। गुरुवार को धानोरा की सारी दुकाने शत प्रतिशत बंद होने के कारण स्थानीय लोगों को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। सप्ताह के मद्देनजर पुलिस विभाग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात कर रखे हंै। सीआरपीएफ के साथ सी-60 जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। पर जनता पर सुरक्षा से ज्यादा नक्सलियों का खौफ भारी पड़ रहा है।
आरमोरी में निकली शांति रैली
शहीद सप्ताह के विरोध में आरमोरी पुलिस थाना की ओर से नक्सल विरोधी शांति रैली निकाली गई। थानेदार माने ने इस रैली को हरी झंडी दिखाकर रैली का शुभारंभ किया। यह रैली शहर की मुख्य सड़कों से होते हुए वापस पुलिस थाना पहुंची। इस समय अपने मार्गदर्शन में थानेदार माने ने कहा कि हर वर्ष की तरह इस बार भी नक्सलियों ने 28 जुलाई से 3 अगस्त की कालावधि में शहीद सप्ताह मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस सप्ताह में लोगों से पुलिस को सहयोग करने की अपील की। शांति रैली में आरमोरी के महात्मा गांधी विद्यालय, महात्मा गांधी कन्या विद्यालय, डा. आंबेडकर विद्यालय, हितकारिणी विद्यालय, किसनराव खोब्रागडे महाविद्यालय, विवेकानंद विद्यालय आदि शालाओं के छात्र, प्रधानाचार्य, शिक्षक व शहर के नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
17 अगस्त को मशाल मोर्चा
जिले में बिजली का उपयोग कम होने के बाद भी विगत 9 वर्षों से यहां लोडशेडिंग शुरू है। यह लोडशेडिंग पूरी तरह बंद करने की मांग को लेकर गढ़चिरोली के महावितरण कंपनी के अधीक्षक अभियंता कार्यालय पर आगामी 17 अगस्त को मशाल मोर्चा निकाला जाएगा। जिला परिषद के पूर्व सदस्य सुरेंद्रसिंह चंदेल व अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि जिले में शुरू लोडशेडिंग के कारण यहां की सर्वसाधारण जनता, छोटे उद्योजक व किसानों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले की लोड़शेडिंग को बंद करने के लिये अनेक बार आंदोलन व मोर्चे निकाले गये। लेकिन मंत्रियों के आश्वासन केवल आश्वासन ही रहें। लोडशेडिंग शुरू होने के बावजूद घरेलु उपयोग की बिजली के अधिक बिल भेजे जा रहे हैं।
बदहाली में आदिवासी आश्रम
एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प गढ़चिरोली के अंतर्गत आने वाली सरकारी आश्रमशालाओं की हालत फिलहाल पूरी तरह खस्ता हो चली है। आश्रमशाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संगठन ने आमशालाओं का दर्जा बढ़ाने की मांग की है।
गत 26 जून से शैक्षणिक सत्र आरंभ हुआ। लेकिन प्रकल्प के तहत आने वाली अनेक आश्रमशालाओं में अब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है। यह पद भरने की मांग भी कई बार की है। लेकिन इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकारी छात्रावास का भोजन बंद होने के कारण छात्रावास अब तक आरंभ ही नहीं हुए है। जिसके चलते स्कूली छात्रों की संख्या कम हो रहीं है। आश्रमशालाओं को किराणा व अन्य खाद्यान्न की आपूर्ति करने के आदेश अब तक जारी नहीं करने से आश्रमशालाओं की अवस्था दयनीय हो गई है। शैक्षणिक सत्र को आरंभ हुए एक माह का कालावधि बीत चुका है, लेकिन शिक्षा आरंभ नहीं होने से आदिवासी छात्रों का बड़े पैमाने पर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है।
संजय स्वदेश
नागपुर। महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला गड़चिरोली में इन दिनों काफी कुछ चल रहा है। यहां की गतिविधियों से राज्य सरकार पूरी तरह से भयभित है। पिछले दिनों नक्सली नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद गड़चिरोली जिले में सक्रिय खूंखार नक्सलियों की घातक गतिविधियों को देखते हुए राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल 'आबाÓ का गड़चिरोली दौरा रद्द हो गया। आबा 29 जुलाई को गड़चिरोली के दौरे पर आने वाले थे। उनकी अध्यक्षता में जिला नियोजन समिति की बैठक का आयोजन किया गया था। आर.आर. पाटिल गड़ïचिरोली के पालकमंत्री भी हैं।
खूंखार नक्सली नेता आजाद की आंध्र पुलिस के साथ मुठभेड़ में मौत के बाद से ही गड़चिरोली जबर्दस्त गुस्से में हैं। वे अपने बड़े नेता की मौत का बदला लेने का ऐलान भी कर चुके हैं। बड़े नेता के बदले में नक्सलियों के निशाने पर कोई बड़ा नेता ही होने की भनक लगने के बाद खुफिया एजेंसियों के अधिकारी सतर्क हो गए। आर.आर. पाटिल के गड़चिरोली जिला दौरे की घोषणा पहले ही हो गई थी और बताया जाता है कि नक्सलियों ने पाटिल के दौरे में बाधा पहुंचाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी। इसकी भनक लगने के बाद ही सतर्क हुई खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल पाटिल को गड़चिरोली का दौरा नहीं करने की सलाह दी। ज्ञात हो कि आजाद की मौत के बाद से आबा पिछले दिनों विदर्भ में आए थे, लेकिन गड़चिरोली न जाकर यवतमाल से ही वापस मुंबई चले गए थे। अब ताजा घटनाक्रम के तहत आबा का गड़चिरोली दौरा रद्द हो चुका है। आबा जब पिछली बार गड़चिरोली आए थे तब उनकी कार के सामने अचानक आए युवकों ने पुलिस भर्ती में हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए 'नक्सलवाद जिंदाबादÓ के नारे लगाए थे। उस घटना को सरकार ने गंभीरता से लेकर जांच शुरू की थी। नक्सल सूत्रों के अनुसार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में सक्रिय नक्सली तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक वे आजाद की मौत के बदले किसी बड़े नेता को निशाना नहीं बनाते। नक्सलियों की लिस्ट पर नक्सलग्रस्त राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री होने की जानकारी मिली है। हाल ही में खबर आई थी कि नक्सलियों ने नागपुर का उपयोग उपचार-हब तथा आवागमन के लिए करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से बड़े नेताओं के नागपुर दौरे के दौरान भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रखने के निर्देश खुफिया एजेंसियों ने पुलिस को दिए हैं।
माओवादियों ने फूंकी भाड़भिड़ी ग्रामपंचायत
नक्सलियों ने 28 जुलाई की रात चामोर्शी तहसील के भाड़भिड़ी स्थित ग्रामपंचायत कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। नक्सलियों के इस वर्ष के शहीद सप्ताह में यह पहली विध्वसंक घटना बताई जा रही है। पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने भाड़भिड़ी गांव में प्रवेश किया तथा ग्रामपंचायत कार्यालय में जाकर सारे कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इस आगजनी की घटना में कार्यालय में रखा फर्निचर समेत सारे दस्तावेज जलकर खाक हो गये। घटना को अंजाम देने के बाद सभी नक्सली लाल सलाम के नारे लगाते हुए पर्चे फेंककर वहां से फरार हो गये। इस घटना से भाड़भिड़ी गांव के लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। पुलिस ने इस मामले में अज्ञात नक्सलियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया है। विशेष अभियान के दलों को नक्सल खोज मुहिम के लिये रवाना करने के आदेश दिये गये है। शहीद सप्ताह के दौरान जिले के लोगों में खासी दहशत होकर पुलिस विभाग ने लोगों से सहयोग करने की अपील की है।
अनेक स्थानों पर बनाये स्मारक

28 जुलाई से नक्सल संगठनों की ओर से शहीद सप्ताह मनाया जा रहा है। इस सप्ताह के दौरान नक्सलियों ने जिले के अनेक स्थानों पर शहीद स्मारक बनाये हैं। कोरची तहसील के मसेली, धानोरा तहसील के अतिदुर्गम गांवों से लेकर सिरोंचा तहसील के बामणी गांव में नक्सलियों ने यह स्मारक बनाये है। धानोरा के किसी सुदुर गांव में नक्सलियों ने पुलिस मुठभेड़ में मारा गया आजाद का पुतला भी बनाया है। जगह-जगह पर्चें व बैनर फेंककर नक्सलियों ने शहीद सप्ताह को मनाने व सरकार के ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल बंद करने की मांग की है। सिरोंचा तहसील के कंबालपेठा सड़क पर नक्सलियों ने पेड़ काटकर बिछाये है। यहां पर लोगों ने वायरों के बंडल को भी देखा है।
सैकड़ों गांवों में छाया सन्नाटा
नक्सली नेता चारू मुजूमदार की स्मृति में शुरू हुआ नक्सली शहीद सप्ताह इन दिनों पूरी तरह दहशत के साये में बीता। जिले के अतिदुर्गम क्षेत्र में बसे दर्जनों गांवों में सन्नाटा छाया रहा। धानोरा व कोरची तहसील मुख्यालयों में भी स्थानीय नागरिक खौफ में है। नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने नक्सल आंदोलन के नेता आजाद और चारु मजमूदार के नाम के स्मारक बनाकर उन्हें अपनी श्रध्दांजलि दे रहे हैं। कोरची के मसेली गांव में नक्सलियों ने लाल आतंक का झंडा लहराकर लोगों से यह सप्ताह मनाने का आह्वान किया। पुलिस विभाग ने इस बीच सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात किये थे। जिसके चलते अब तक कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई है। विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले की धानोरा व कोरची तहसील को इस वर्ष नक्सलियों ने अपना केंद्रबिन्दु बनाया है। शहीद सप्ताह की सर्वाधिक हरकतें इन्हीं तहसीलों में देखी जा रही हैं। धानोरा, कोरची, कसनसुर, मसेली समेत वनांचल के अनेक गांवों में बंद रखा गया है। अनेक सड़कों पर पेड़ काटकर बिछाने से यातायात बाधित किया गया है। शहीद सप्ताह शुरू होने के एक दिन पूर्व ही जिले की धानोरा तहसील के मुरूमगांव के पास गढ़चिरोली-राजनांदगांव महामार्ग पर पेड़ काटकर बिछाये हैं। आज भी यह पेड़ यथावत हंै। घटनास्थल पर लोगों ने वायर के बंडल भी देखे हंै। जिसके चलते लोगों में खासी दहशत है। इस महामार्ग का यातायात पूरी तरह ठप पड़ गया है। उल्लेखनीय है कि यह महामार्ग जिले का एकमात्र अंतर्राज्यीय महामार्ग है। गढ़चिरोली-मानपुर बस गुरुवार को सुबह धानोरा से ही लौट जाने की खबर मिली है। तहसील मुख्यालय में अनेक निजी वाहन बंद के चलते खड़े हैं।
वहीं जगह-जगह पर्चे व बैनर लगाने से लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। इस बंद के चलते जिले के गढ़चिरोली व अहेरी बस डिपो की अनेक बस फेरियां बंद हैं। इसमें प्रमुख रूप से गढ़चिरोली-राजनांदगांव, गढ़चिरोली-मानपुर, मुरूमगांव, पेंढरी, भामरागढ़, एटापल्ली व अन्य अतिदुर्गम गांवों में जाने वाली बसों की फेरियां हैं। गुरुवार को धानोरा की सारी दुकाने शत प्रतिशत बंद होने के कारण स्थानीय लोगों को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। सप्ताह के मद्देनजर पुलिस विभाग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात कर रखे हंै। सीआरपीएफ के साथ सी-60 जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। पर जनता पर सुरक्षा से ज्यादा नक्सलियों का खौफ भारी पड़ रहा है।
आरमोरी में निकली शांति रैली
शहीद सप्ताह के विरोध में आरमोरी पुलिस थाना की ओर से नक्सल विरोधी शांति रैली निकाली गई। थानेदार माने ने इस रैली को हरी झंडी दिखाकर रैली का शुभारंभ किया। यह रैली शहर की मुख्य सड़कों से होते हुए वापस पुलिस थाना पहुंची। इस समय अपने मार्गदर्शन में थानेदार माने ने कहा कि हर वर्ष की तरह इस बार भी नक्सलियों ने 28 जुलाई से 3 अगस्त की कालावधि में शहीद सप्ताह मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस सप्ताह में लोगों से पुलिस को सहयोग करने की अपील की। शांति रैली में आरमोरी के महात्मा गांधी विद्यालय, महात्मा गांधी कन्या विद्यालय, डा. आंबेडकर विद्यालय, हितकारिणी विद्यालय, किसनराव खोब्रागडे महाविद्यालय, विवेकानंद विद्यालय आदि शालाओं के छात्र, प्रधानाचार्य, शिक्षक व शहर के नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
17 अगस्त को मशाल मोर्चा
जिले में बिजली का उपयोग कम होने के बाद भी विगत 9 वर्षों से यहां लोडशेडिंग शुरू है। यह लोडशेडिंग पूरी तरह बंद करने की मांग को लेकर गढ़चिरोली के महावितरण कंपनी के अधीक्षक अभियंता कार्यालय पर आगामी 17 अगस्त को मशाल मोर्चा निकाला जाएगा। जिला परिषद के पूर्व सदस्य सुरेंद्रसिंह चंदेल व अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि जिले में शुरू लोडशेडिंग के कारण यहां की सर्वसाधारण जनता, छोटे उद्योजक व किसानों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले की लोड़शेडिंग को बंद करने के लिये अनेक बार आंदोलन व मोर्चे निकाले गये। लेकिन मंत्रियों के आश्वासन केवल आश्वासन ही रहें। लोडशेडिंग शुरू होने के बावजूद घरेलु उपयोग की बिजली के अधिक बिल भेजे जा रहे हैं।
बदहाली में आदिवासी आश्रम
एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प गढ़चिरोली के अंतर्गत आने वाली सरकारी आश्रमशालाओं की हालत फिलहाल पूरी तरह खस्ता हो चली है। आश्रमशाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संगठन ने आमशालाओं का दर्जा बढ़ाने की मांग की है।
गत 26 जून से शैक्षणिक सत्र आरंभ हुआ। लेकिन प्रकल्प के तहत आने वाली अनेक आश्रमशालाओं में अब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है। यह पद भरने की मांग भी कई बार की है। लेकिन इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकारी छात्रावास का भोजन बंद होने के कारण छात्रावास अब तक आरंभ ही नहीं हुए है। जिसके चलते स्कूली छात्रों की संख्या कम हो रहीं है। आश्रमशालाओं को किराणा व अन्य खाद्यान्न की आपूर्ति करने के आदेश अब तक जारी नहीं करने से आश्रमशालाओं की अवस्था दयनीय हो गई है। शैक्षणिक सत्र को आरंभ हुए एक माह का कालावधि बीत चुका है, लेकिन शिक्षा आरंभ नहीं होने से आदिवासी छात्रों का बड़े पैमाने पर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है।
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शुक्रवार, जुलाई 30, 2010
बार-बार शरीर संबंध बलात्कार नहीं
मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ का महत्वपूर्ण फैसलानागपुर। किसी महिला या युवती से बार-बार शरीर संबंध रखना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। यह महत्वपूर्ण फैसला मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के न्यायाधीश अंबादास जोशी ने दिया है। न्यायमूर्ति जोशी की खंडपीठ ने एक मेडिकल रिप्रजेटेटिव अनवर खान इकबाल खान मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया गया तो भी गलतफहमी के विश्वास से ऐसा होना साबित नहीं होता। 2 वर्षों तक लगातार शरीर संबंध रखने की अनुमति देना बलात्कार साबित नहीं होता।
ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति जोशी ने कुछ दिनों पूर्व ही ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया था कि शादी का लालच देकर तथा उस पर यकीन रखकर शरीर संबंध रखना बलात्कार नहीं होता। उसके बाद उनका यह दूसरा ऐसा फैसला है, जिससे आईपीसी की धारा 376 के मामले में फंसे अनेक लोगों को राहत की संभावना दिखने लगी है। ब्लात्कार के दर्ज सैकड़ों ऐसे मामले हैं जिसमें आपसी सहमती से शारीरीक संबंध बनाये गए थे और बाद में किसी बात को लेकर अनबन होने से कत्थित पीडि़ता ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया।

अनवर खान इकबाल खान को नागपुर सत्र न्यायालय ने एक युवती के साथ लगातार कुकर्म के मामले में 2 वर्ष पूर्व 7 वर्षों के सश्रम कारावास व 20 हजार रु. जुर्माने की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदल दिया। अनवर खान ने 14 अप्रैल से 5 मई 2004 के दौरान शादी का लालच दिखाकर युवती के साथ शरीर सुख प्राप्त किया था।
अनवर खान तथा युवती एक ही कंपनी में कार्यरत थे। आरोपी ने नागपुर की एक होटल में स्थित अपने कमरे में युवती को बुलाया तथा उसके साथ कुकर्म किया। इस घटना से युवती रोने लगी। उसने आत्महत्या करने की धमकी दी। इसे देखकर अनवर खान ने उसे शादी का लालच दिखाकर शांत किया। बाद में अनवर ने युवती को अमरावती व यवतमाल की होटलों में बुलाया तथा वहां भी शादी का लालच देकर उसके साथ यौन संबंध बनाया। आरोपी द्वारा शादी से इन्कार करने तक यह मामला जारी था।
बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता युवती पागल हो चुकी थी तथा वह आरोपी के पीछे पड़ गई थी। यह सभी एक पक्ष से ही हो रहा था। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने बताया कि शादी के आश्वासन पर भरोसा रखकर युवती ने शरीर संबंध रखने की अनुमति दी। इसे गलतफहमी से दी गई अनुमति नहीं कहा जा सकता।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि युवती स्वयंनिर्बंध तथा आत्मज्ञान से अनभिज्ञ थी और इसी कारण शादी के आश्वासन पर यकीन रखकर वह लैंगिक सुख देती रही। वह सज्ञान है। खासकर उसकी इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि गर्भपात के बाद भी उसके साथ दो बार बलात्कार हुआ।
वर्ष 2009 के अंत में भी सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जिसमें कोर्ट ने बलात्कार के मामले में दोषी ठहरा चुके सुनील कुमार नाम के एक युवक को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि कौमार्य भंग कराते वक्त लड़की ने इसका विरोध नहीं किया था, इसलिए वह बलात्कार की पीडि़ता नहीं है।
ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति जोशी ने कुछ दिनों पूर्व ही ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया था कि शादी का लालच देकर तथा उस पर यकीन रखकर शरीर संबंध रखना बलात्कार नहीं होता। उसके बाद उनका यह दूसरा ऐसा फैसला है, जिससे आईपीसी की धारा 376 के मामले में फंसे अनेक लोगों को राहत की संभावना दिखने लगी है। ब्लात्कार के दर्ज सैकड़ों ऐसे मामले हैं जिसमें आपसी सहमती से शारीरीक संबंध बनाये गए थे और बाद में किसी बात को लेकर अनबन होने से कत्थित पीडि़ता ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया।

अनवर खान इकबाल खान को नागपुर सत्र न्यायालय ने एक युवती के साथ लगातार कुकर्म के मामले में 2 वर्ष पूर्व 7 वर्षों के सश्रम कारावास व 20 हजार रु. जुर्माने की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदल दिया। अनवर खान ने 14 अप्रैल से 5 मई 2004 के दौरान शादी का लालच दिखाकर युवती के साथ शरीर सुख प्राप्त किया था।
अनवर खान तथा युवती एक ही कंपनी में कार्यरत थे। आरोपी ने नागपुर की एक होटल में स्थित अपने कमरे में युवती को बुलाया तथा उसके साथ कुकर्म किया। इस घटना से युवती रोने लगी। उसने आत्महत्या करने की धमकी दी। इसे देखकर अनवर खान ने उसे शादी का लालच दिखाकर शांत किया। बाद में अनवर ने युवती को अमरावती व यवतमाल की होटलों में बुलाया तथा वहां भी शादी का लालच देकर उसके साथ यौन संबंध बनाया। आरोपी द्वारा शादी से इन्कार करने तक यह मामला जारी था।
बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता युवती पागल हो चुकी थी तथा वह आरोपी के पीछे पड़ गई थी। यह सभी एक पक्ष से ही हो रहा था। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने बताया कि शादी के आश्वासन पर भरोसा रखकर युवती ने शरीर संबंध रखने की अनुमति दी। इसे गलतफहमी से दी गई अनुमति नहीं कहा जा सकता।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि युवती स्वयंनिर्बंध तथा आत्मज्ञान से अनभिज्ञ थी और इसी कारण शादी के आश्वासन पर यकीन रखकर वह लैंगिक सुख देती रही। वह सज्ञान है। खासकर उसकी इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि गर्भपात के बाद भी उसके साथ दो बार बलात्कार हुआ।
वर्ष 2009 के अंत में भी सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जिसमें कोर्ट ने बलात्कार के मामले में दोषी ठहरा चुके सुनील कुमार नाम के एक युवक को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि कौमार्य भंग कराते वक्त लड़की ने इसका विरोध नहीं किया था, इसलिए वह बलात्कार की पीडि़ता नहीं है।
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अन्य व औषधि प्रशासन विभाग की सुस्ती से मिलावटखोर बेखौफ
-एक साल में 100 से भी कम मामले दर्ज
संजय स्वदेश
नागपुर। बढ़ती महंगाई के कारण कई व्यापारी मिलावट का धंधा कर रहे हैं। इसके अलावा बरसात के कारण बाजार में बिकने वाले कई खाद्य पदार्थ अंदर से खराब हो जाने के बाद भी धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिसे जाने-अनाजने में खाकर लोग बीमार हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर मिलावटखोरी पर नियंत्रण करने वाला विभाग अन्न व औषधि प्रशासन सुस्त दिख रहा है। इसकी सुस्ती से मिलावटखोर बेखौफ होकर मिलावट का धंधा कर रहे हैं। विभाग के सह आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक नागपुर शहर और जिले में मिलावटखोरी पर नजर रखने के लिए 12 निरीक्षक, एक पर्यवेक्षक और एक सहायक आयुक्त हैं। लेकिन विभाग औसतन हर दिन एक भी नमूने नहीं ले पाता है। विभाग के पर्यावेक्षक सं.भा. नारागुडे से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2009-10 में विभाग ने 1178 नमूने जांच के लिए भेजे, इनमें से महज 146 ही अप्रमाणित मिले। उसमें से भी केवल आधे मामले ही दर्ज हुए। बीते वर्ष के इस आंकड़े से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विभाग नगर में चल रहे खाद्य पदार्थों की मिलावट को लेकर कितना सक्रिय है। यदि 12 निरीक्षकों में हर निरीक्षक हर दिन दो नमूने भी लेते हैं, तो एक दिन में 24 नमूने विभिन्न इलाकों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों के लिए जा सकते हैं। इससे मिलावटखोरों में भय बैठेगा और वे मिलावटखोरी छोड़ सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि साल में विभाग जितने सैंपल लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजता उसमें से आधे से भी कम सौंपल की रिपोर्ट अप्रमाणित आती है। अधिकतर मामलों में कुछ ले-देकर मामला दबा देने का प्रयास किया जाता है। यदि विभाग में बात नहीं बनती है तो प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों से संपर्क साधकर मतलब का काम करा लिया जाता है।
विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कई बार वे स्वयं संज्ञान लेकर सैंपल लेने के लिए छापा मारते हैं, तो कुछ शिकायतों पर संज्ञान लेकर छापामारने की कार्रवाई चलती है। लेकिन जितनी भी शिकायतें आती हैं, उसनें से करीब 80 प्रतिशत शिकायतें पूर्वाग्रह से प्रेरित होती हैं। लोग किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए मिलाटवखोरी की झूठी शिकायत कर देते हैं।
संजय स्वदेश
नागपुर। बढ़ती महंगाई के कारण कई व्यापारी मिलावट का धंधा कर रहे हैं। इसके अलावा बरसात के कारण बाजार में बिकने वाले कई खाद्य पदार्थ अंदर से खराब हो जाने के बाद भी धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिसे जाने-अनाजने में खाकर लोग बीमार हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर मिलावटखोरी पर नियंत्रण करने वाला विभाग अन्न व औषधि प्रशासन सुस्त दिख रहा है। इसकी सुस्ती से मिलावटखोर बेखौफ होकर मिलावट का धंधा कर रहे हैं। विभाग के सह आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक नागपुर शहर और जिले में मिलावटखोरी पर नजर रखने के लिए 12 निरीक्षक, एक पर्यवेक्षक और एक सहायक आयुक्त हैं। लेकिन विभाग औसतन हर दिन एक भी नमूने नहीं ले पाता है। विभाग के पर्यावेक्षक सं.भा. नारागुडे से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2009-10 में विभाग ने 1178 नमूने जांच के लिए भेजे, इनमें से महज 146 ही अप्रमाणित मिले। उसमें से भी केवल आधे मामले ही दर्ज हुए। बीते वर्ष के इस आंकड़े से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विभाग नगर में चल रहे खाद्य पदार्थों की मिलावट को लेकर कितना सक्रिय है। यदि 12 निरीक्षकों में हर निरीक्षक हर दिन दो नमूने भी लेते हैं, तो एक दिन में 24 नमूने विभिन्न इलाकों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों के लिए जा सकते हैं। इससे मिलावटखोरों में भय बैठेगा और वे मिलावटखोरी छोड़ सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि साल में विभाग जितने सैंपल लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजता उसमें से आधे से भी कम सौंपल की रिपोर्ट अप्रमाणित आती है। अधिकतर मामलों में कुछ ले-देकर मामला दबा देने का प्रयास किया जाता है। यदि विभाग में बात नहीं बनती है तो प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों से संपर्क साधकर मतलब का काम करा लिया जाता है। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कई बार वे स्वयं संज्ञान लेकर सैंपल लेने के लिए छापा मारते हैं, तो कुछ शिकायतों पर संज्ञान लेकर छापामारने की कार्रवाई चलती है। लेकिन जितनी भी शिकायतें आती हैं, उसनें से करीब 80 प्रतिशत शिकायतें पूर्वाग्रह से प्रेरित होती हैं। लोग किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए मिलाटवखोरी की झूठी शिकायत कर देते हैं।
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बुधवार, जुलाई 28, 2010
हार्डवेयर में शोध की जरूरत : डा. जोशी
नागपुर। भारत सॉफ्टवेअर की दुनिया में आगे हैं। अब हार्डवेयर में संशोधन की जरूरत है। यह कहना है कि पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी का। वे नागपुर में रामदेव बाबा कमला नेहरू अभियंात्रिकी महाविद्यालय में आइटी कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन के मौके पर अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे। कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत, महापौर अर्चना डेहनकर, पूर्व विधायक तथा संस्था अध्यक्ष बनवारीलाल पुरोहित आदि उपस्थित थे।
डा. जोशी ने कहा कि हार्डवेयर के बिना आइटी का कोई महत्त्व नहीं। इन उपकरणों को आयात करना पड़ता है। इस लिए इस क्षेत्र में शोध कर देश में ही इनके उत्पाद बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रबंधन संस्थाएं देश के बड़े संस्थाओं के लिए एकाऊंटेंट, मार्केटिंग अधिकारी तैयार कर रही हैं। जल, बिजली, शिक्षा, यातायात तथा किसान को टेक्नालॉजी का कुछ फायदा नहीं मिल रहा है। इसके लिए पश्चिमी देशों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। 250 वर्ष पहले भारत अच्छा स्टिल भेजता था। आज लेजर ब्लेड भी बाहर से आयत करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि आप नकल करोगे तो कभी आगे नहीं बढ़ोगे। जो आएगा वह पश्चिम से आएगा यह बुनियादी बात हो गई हैं। उसे बदलना जरूरी है। हमें अपने मस्तिष्क को सतत चलाते रहना चाहिए। आज अपनी परंपरा, अपनी छाप, अपनी धरती ध्वस्त हो रही है।
शिक्षा में डोनेशन अच्छा नहीं : गडकरी
नितिन गडकरी ने कहा कि देश के विकास के लिए रिसर्च और टेक्रालॉजी की आवयश्कता है। कई जगह पर पानी के एक बुंद के लिए लोग तरस रहे हैं, तो कहीं बाढ़ से गांव के गांव उजड़ रहे हैं। अगर तकनीक का बेहतर उपयोग हो तो बहकर जाने वाले पानी का सही इस्तेमाला किया जा सकता है। इसलिए पानी, बिजली पर रिचर्स होना जरूरी है। उन्होंने बताया कि आज शिक्षा का व्यापारीकरण किया जा रहा है। उनके गुणवत्ता से कोई लेना देना नहीं। गरीब के प्रति भावना रखनी चाहिए। तांत्रिक दृष्टी से एक यशस्वी आदमी तो मिलेगा लेकिन एक अच्छा इंसान नहीं। शिक्षा के लिए डोनेशन अच्छी बात नहीं है। यह कदापि नहीं होना चाहिए। डोनेशन नहीं लेकर गुणवत्ता के आधार पर रामदेवबाबा कॉलेज में प्रवेश मिलने से ही यहां के विद्यार्थी गौरव प्राप्त कर रहे हैं।
केवल पढऩे-लिखने से काम नहीं : भागवत
डा. मोहन भागवत ने कहा कि केवल सुनने से कोई काम नहीं होता, उसके लिए करना पड़ता है। करने वाले का काम होता है, नाम होता है। कार्बेन को कुछ साल दबाया गया तो वह सिलोकॉन बन जाता है, यह प्राकृति का नियम है। परंतु भारत को कितना भी दबा कर रखा गया फिर की सिलोकॉन नहीं बनेगा। हम शुरू करेंगे, यह संकल्प लेना चाहिए। केवल पढ़ा - लिखा होकर कुछ उपयोग नहीं, लोगों को उसका फायदा होना चाहिए। समाज तथा राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहिए।
कार्यक्रम के शुभारंभ से पूर्व आईटी कॉप्लेक्स के आर्किटेक्ट डा. डोंगरे का भागवत तथा सिविल कॉन्ट्रेक्टर डी.आर.मालजी का डॉ. मुरली मनोहर जोशी के हाथों सत्कार किया गया। डा. जोशी, डा.भागवत, नितीन गडकरी, महापौर अर्चना डेहनकर का संस्था की ओर से शाल, श्रीफल व स्मृतिचिन्ह देकर सत्कार किया गया। प्रास्ताविक भाषण संस्था अध्यक्ष बनवारीलाल पुरोहित ने दिया। उन्होंने बताया कि उदयोन्मुख संस्थाओं महाराष्ट्र में पहली तथा देश में चौथे नंबर पर यह संस्था है। इस वर्ष संस्था ने 25 वर्ष पूरे किए है। संस्था में मेरिट के आधार पर प्रवेश दिया जाता है। प्रबंधन कोटा भी डोनेशन से नहीं, गुणवत्ता के आधार पर भरा जाता है। कार्यक्रम में पूर्व विधायक तथा वनराई के अध्यक्ष गिरीश गांधी, पूर्व सरसंघचालक के.सी. सुदर्शन, पूर्व महापौर माया इवनाते
संस्था के उपाध्यक्ष गंगाराम अग्रवाल, उपाध्यक्ष चंद्रकांत ठाकर, संस्था सचिव गोविंद अग्रवाल, प्राचार्य देशपांडे, दामोदर भूतडा तथा शहर के गणमान्य नागरिक, संस्था के कर्मचारी, शिक्षकगण तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रा. पाचपोर ने किया। विश्वास देशपांडे के आभार प्रदर्शन के बाद कार्यक्रम का सामपन हुआ।
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सोमवार, जुलाई 26, 2010
दोषियों की सजा बदलने से दलितों पर अत्याचार बढ़ा
खैरलांजी प्रकरण /भैयालाल भोतमांगे की जमीन हथियाने की कोशिश
आधा दर्जन संगठनों ने किया प्रदर्शन, सरकार को भेजा ज्ञापन
संजय स्वदेश
नागपुर। खैरलांजी हत्याकांड में दोषियों की फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदलने का विरोध अभी भी जारी है। सोमवार को रिजर्व बैंक चौक पर आधे दर्जन से भी ज्यादा संगठनों ने इस निर्णय के विरोध में प्रदर्शन किया। दीक्षाभूमि महिला धम्म संयोजन समिति, राष्ट्रीय संबुद्ध महिला संगठन, ऑल इंडिया प्रोगे्रसिव वूमेेन्स ऑर्गनाइजेशन, संजीवनी सखी मंच, जरीपटका, दलित महिला संघ, गौतमी महिला मंडल, नालंदा महिला मंडल, रमाबाई आंबेडकर महिला संगठन कोराड़ी आदि संगठन के कार्यकर्ताओं ने चौक पर धरना देते हुए फैसले के विरोध में नारेबाजी की। उनका कहना था कि इस प्रकरण में फांसी की सजा बदलने के बाद दलितों पर अत्याचार के मामले बढ़ रहे हैं। उनकी मांग है कि दोषियों की फांसी की सजा कायम रहे। मुकदमे की सुनवाई के लिए एक स्वतंत्र न्यायालय का गठन किया जाए। सीबीआई इस मामले की फिर से जांच करे और मामले में विनयभंग और अॅट्रॉसिटी एक्ट भी दर्ज किया जाए। इन संगठनों ने अपनी मांगों की प्रति राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल और केंद्रीय न्यायमंत्री मुकुल वासनिक को भेजी है।
ज्ञापन में कहा गया है कि खैरलांजी प्रकरण से यह सिद्ध हो गया है कि देश की जातिवादी सामाजिक मानसिकता में पीडि़त दलित को न्याय नहीं मिल सकता है। इस प्रकरण में भोतमांगे परिवार के चार सदस्यों की निर्मम हत्या के दोषियों की फांसी की सजा में दलित और बौद्ध समाज में यह आस जगी थी कि उन्हें भी न्याय मिल सकता है। लेकिन उच्च न्यायालय के निर्णय से यह आस भी टूट गई है। एक तरह से यह दलित और बौद्ध समाज को अप्रत्यक्ष धमकी है। यदि सरकार चाहे तो न्यायालय के निर्णय को भी बदल सकती है। आश्चर्य की बात यह है कि खैरलांजी प्रकरण इतना गंभीर हुआ, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें गंभीरता नहीं दिखाई। दोषियों पर विनयभंग और अॅट्रॉसिटी एक्ट के मामले तक दर्ज नहीं किये गए।
ज्ञापन में कहा गया है कि खैरलांजी प्रकरण के इस निर्णय के बाद खैरलांजी गांव में दलितों पर अत्याचार बढ़ा है। भैयालाल भोतमांगे की जमीन कब्जा करने की कोशिश की गई। इसकी शिकायत जब भंडारा के पुलिस स्टेशन में की गई तो पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके अलावा जिस गांव में चार दतिलों की हत्या हुई, उस गांव को तंटामुक्त गांव का पुरस्कार दिया गया है। आरोपियों को फांसी की सजा बदलने से यह साबित हो गया है कि देश में दलितों पर हुए अत्याचार के मामले में न्याय नहीं मिल सकता है। संगठनों का कहना है कि यदि इस मामले में उन्हें उचित न्याय नहीं मिला तो वे सड़क पर उतर कर आंदोलन करेंगे।
प्रदर्शनकारियों में तक्षशील बाघमारे, छाया खोब्रागड़े, वंदना जीवने, सरोज आगलावे, प्रज्ञा बागड़े, डा. लता बाकोड़े, रेखा, खोब्रागड़े, अर्चना, शैला नांदेश्वर, शार्दुला महाजन, तोसी साखरकर, प्रतिमा, सरोज डांगे, कविता मेठे आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थीं।
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रविवार, जुलाई 25, 2010
भारत के मसालों की विदेशों में भारी मांग
नागपुर। नाग विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स तथा स्पायसेस बोर्ड, कोचीन के संयुक्त तत्वावधान में होटल तुली इंटरनेशनल सदर में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। उपस्थित अतिथियों, निर्यातकों तथा व्यापारियोंं का स्वागत करते हुए चेंबर के अध्यक्ष, हेमंत खुंगर ने कार्यशाला आयोजन करने का मुख्य उद्देश्य बताते हुए कहा कि भारत से विदेशों में मसालों की अति आवश्यकता है क्योंकि यहां के बने हुए मसालों जैसे मिर्ची, हल्दी व अन्य मसाले उत्कृष्ट रूप से उत्पादित किए जाते हैं, क्योंकि इन मसालों के उत्पादन के लिए प्राकृतिक तथा सेंद्रिय खादों का इस्तेमाल होने से उसकी गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है। इन वस्तुओं को अधिक से अधिक मात्रा में निर्यात करने के लिए विदर्भ तथा मध्य भारत के व्यापारी तथा निर्यातकों को आगे आना चाहिए। उन्होंने अनुरोध किया कि निर्यात अधिक होगा तो व्यापार भी बढ़ेगा। इस कार्यशाला में विशेषकर विदर्भ व मध्य भारत से मसालों का निर्यात विदेशों में कैसे करना, उसकी जानकारी कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि, विवेक ज्योति राय, उपसंचालक, स्पायसेस बोर्ड, भारत सरकार, कोचीन ने उपस्थित सदस्यों को दी।
बिबेक राय ने कहा कि हल्दी एक ऐसी वस्तु है जो खाद्य पदार्थ भी है, औषधि भी है तथा मसाले के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है। देश में 42 प्रकार की हल्दी का उत्पादन होता है। हल्दी व कस्तुरी, उनके सुगंध से पहचानी ताजी है। वर्तमान में, भारत में इसका उत्पादन 5,55,455 मे.टन होता है, जिसमें से, महाराष्ट्र में इसका उत्पादन 8,280 मे.टन होता है। उसी प्रकार भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, म्यामार, चाइना, हैती, पेरु, सॉलिडोर, तायवान तथा जमायका में भी हल्दी का उत्पादन किया जाता है। पूरे विश्व स्तर पर केवल भारत में हल्दी का उत्पादन 70 प्रतिशत होता है। महाराष्ट्र में जिलों के अनुसार, नागपुर, वर्धा, चंद्रपुर, अमरावती, सातारा, सांगली, परभणी, नांदेड, कोल्हापुर व शोलापुर में हल्दी का उत्पादन किया जाता है।
मिर्ची के उत्पादन के बारे में उन्होंने कहा कि मिर्ची का उत्पादन भारत में आंध्र, कर्नाटक, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल में प्रमुख रूप से होता है। भारत से इसका निर्यात विशेषकर बंाग्लादेश, पाकिस्तान तथा अन्य देशों में किया जाता है। दूसरे सत्र में वंदना शिवशरण ईसीजीसी नागपुर शाखा प्रमुख ने निर्यातकों को ईसीजीसी के उद्देश्य की जानकारी दी।कार्यक्रम में हेमंत खुंगर, मयूर पंचमतिया, प्रकाश वाधवानी, जगदीश बी.बंग, अजय कुमार मदान, प्रभाकर देशमुख, विजय केवलरामानी, फारुक अकबानी, निखिलेश ठाकर, राजू माखीजा, राजू व्यास, निलेश सूचक, सचिन पुनियानी, सतीश बंग, हस्तीमल कटारिया, योगेंद्रकुमार अग्रवाल, मनोहर भोजवानी, प्रकाश वाघमारे, प्रकाश कटारिया, यश भोजवानी, मोहनलाल पटेल, रवि आत्राम, शिरीष आया, पांडुरंग होजुक, मनोज वानखेडे, उमेश तालेकर, धवल पंचमतिया, रशीद अली सैयद, नेताई के राय, अमित चौधरी, निखिल जुनेजा, नितिन सोमकुंवर, कु.मोहिनी बेरी, मनीषा जोशी, संजय पटेल, बिहारी पटेल, संजय देसाई, विराल कोठारी, दीपक पारवानी उपस्थित थे। संचालन चेंबर के उपाध्यक्ष जगदीश वी.बंग ने किया तथा मयूर पंचमतिया, ने आभार प्रदर्शन किया। उक्त जानकारी चेंबर के सहसचिव अजयकुमार अदान ने दी है।
बिबेक राय ने कहा कि हल्दी एक ऐसी वस्तु है जो खाद्य पदार्थ भी है, औषधि भी है तथा मसाले के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है। देश में 42 प्रकार की हल्दी का उत्पादन होता है। हल्दी व कस्तुरी, उनके सुगंध से पहचानी ताजी है। वर्तमान में, भारत में इसका उत्पादन 5,55,455 मे.टन होता है, जिसमें से, महाराष्ट्र में इसका उत्पादन 8,280 मे.टन होता है। उसी प्रकार भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, म्यामार, चाइना, हैती, पेरु, सॉलिडोर, तायवान तथा जमायका में भी हल्दी का उत्पादन किया जाता है। पूरे विश्व स्तर पर केवल भारत में हल्दी का उत्पादन 70 प्रतिशत होता है। महाराष्ट्र में जिलों के अनुसार, नागपुर, वर्धा, चंद्रपुर, अमरावती, सातारा, सांगली, परभणी, नांदेड, कोल्हापुर व शोलापुर में हल्दी का उत्पादन किया जाता है।
मिर्ची के उत्पादन के बारे में उन्होंने कहा कि मिर्ची का उत्पादन भारत में आंध्र, कर्नाटक, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल में प्रमुख रूप से होता है। भारत से इसका निर्यात विशेषकर बंाग्लादेश, पाकिस्तान तथा अन्य देशों में किया जाता है। दूसरे सत्र में वंदना शिवशरण ईसीजीसी नागपुर शाखा प्रमुख ने निर्यातकों को ईसीजीसी के उद्देश्य की जानकारी दी।कार्यक्रम में हेमंत खुंगर, मयूर पंचमतिया, प्रकाश वाधवानी, जगदीश बी.बंग, अजय कुमार मदान, प्रभाकर देशमुख, विजय केवलरामानी, फारुक अकबानी, निखिलेश ठाकर, राजू माखीजा, राजू व्यास, निलेश सूचक, सचिन पुनियानी, सतीश बंग, हस्तीमल कटारिया, योगेंद्रकुमार अग्रवाल, मनोहर भोजवानी, प्रकाश वाघमारे, प्रकाश कटारिया, यश भोजवानी, मोहनलाल पटेल, रवि आत्राम, शिरीष आया, पांडुरंग होजुक, मनोज वानखेडे, उमेश तालेकर, धवल पंचमतिया, रशीद अली सैयद, नेताई के राय, अमित चौधरी, निखिल जुनेजा, नितिन सोमकुंवर, कु.मोहिनी बेरी, मनीषा जोशी, संजय पटेल, बिहारी पटेल, संजय देसाई, विराल कोठारी, दीपक पारवानी उपस्थित थे। संचालन चेंबर के उपाध्यक्ष जगदीश वी.बंग ने किया तथा मयूर पंचमतिया, ने आभार प्रदर्शन किया। उक्त जानकारी चेंबर के सहसचिव अजयकुमार अदान ने दी है।
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सोमवार, जुलाई 19, 2010
बैंकों ने तोड़ी आशियाने की आस
अधर में लटका राजीव गांधी आवास योजना-2
संजय स्वदेश
नागपुर। ऐसा कई बार होता है जब सरकार देश की जनता के लिए कुछ ईमानदार पहल करती है, लेकिन बीच के बिचौलियों उस पहल का बेडागर्क कर देते हैं। महाराष्ट्र में हजारों गरीब परिवारों के लिए एक योजना चल रही है। योजना का नाम है राजीव गांधी आवास योजना-2। इस योजना के तहत 16 हजार से 90 हजार की वार्षिक आय वालों के लिए 90 हजार रुपये तक का कर्ज अपना आशियाना बनाने के लिए दिया जाता है। इस कर्ज का सारा ब्याज राज्य सरकार वहन करती है। कर्ज की मूल राशि लाभार्थी को जमा करनी पड़ती है। लेकिन विज्ञापन में दो से चार दिन में होम लोन देने के दावा करने वाले इस कर्ज को देने से कतराते हैं। महाराष्ट्र में इस योजना की हकीकत यह है कि विभिन्न सरकारी बैंक सरकार की ईमानदार मंशा पर पानी फेर रहे हैं। उनकी उदासिनता से यह योजना अधर में लटक गई है। नागपुर की स्थिति देखिये। सरकार ने इस योजना के तहत नागपुर में करीब 2900 लोगों के आवेदन मंजूर किये थे। लेकिन जब ये आवेदन बैंकों के पास गए तो उन्होंने किसी न किसी बहाने से इस योजना के तहत कर्ज देना टाल दिया। कई आवेदकों ने तो बैंक के चक्कर काटते-काटते अब इस योजना के लाभ पाने से निराश हो गये हैं। बैंकों ने इस योजना के तहत कर्ज देने के लिए आवेदकों पर ऐसी-ऐसी शर्त लगा दी कि लोगों को शर्त पूरा करना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति केवल नागपुर की ही नहीं है। पूरे महाराष्ट्र में इस योजना को सरकारी बैंक ऐसे ही कुठराघात कर रहे हैं। इस योजना की घोषणा राज्य सरकार ने कुछ महीने पहले ही की थी। तब यह कहा गया था कि 3 वर्ष में 10 लाख गरीब लोगों को अपना आवास उपलब्ध कराने के लिए कर्ज दिया जाएगा। इस योजना का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसके लिए बैंकों के विभिन्न शर्तों को हटाने के लिए सरकार ने बैंकों को निर्देश भी दिया था। इस संबंध में एक सकुर्लर भी जारी हुआ था। पर बैंकों ने इस पर अमल नहीं किया है।
योजना से जुड़े नागपुर के उपअभियंता विनायक मामुलकर ने बताया कि वर्ष 2008-09 और 2009 और 2009-10 में 2966 लोगों को आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए बड़े पैमाने पर आवेदकों ने आवेदन दिया था। लक्ष्य के अनुसार 2966 लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए उनके आवेदन मंजूर कर बैंकों को भेज दिये गए। लेकिन बैंकों की शर्त पूरी नहीं करने के कारण अधिकर लोगों को इसका लाभ नहीं मिला। वहीं कुछ आवेदकों ने बैंक के लोन विभाग के साठगांठ से अपना कर्ज पा लिया। लेकिन अधिकतर लेकिन अधिकर आवेदक बैंक के शर्तों में फंस कर इस लाभ से वंचित हो गये हैं। महाराष्ट्र बैंक के एक अधिकारी ने नाम खुलासा नहीं करने की शर्त पर बताया कि सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज देना बैंक के लिए घाटे का सौदा है। सबसे पहले तो बैंक से ब्याज पाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। वहीं सीधे ग्रहकों से कर्ज की वसूली सीधे-सीधे हो जाती है। इसके अलावा बैंक भी कर्ज देने से पहले ऐसे आवेदकों की आर्थिक स्थिति अच्छी तरह से देखती है। बैंक को जब यह सुनिश्चित हो जाता है कि कर्ज लेने वाला इस योजना के तहत ब्याज माफ होने के बाद भी मूलधन चुकाने में सक्षम है, तब ही उनके कर्ज के आवेदन की मंजूरी दी जाती है। बैंक को इस योजना के तहत बहुत ज्यादा लाभ भी नहीं हो पता है। इसलिए सरकारी योजना के तहत कर्ज देने से हर बैंक हिचकते हैं।
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संजय स्वदेश
नागपुर। ऐसा कई बार होता है जब सरकार देश की जनता के लिए कुछ ईमानदार पहल करती है, लेकिन बीच के बिचौलियों उस पहल का बेडागर्क कर देते हैं। महाराष्ट्र में हजारों गरीब परिवारों के लिए एक योजना चल रही है। योजना का नाम है राजीव गांधी आवास योजना-2। इस योजना के तहत 16 हजार से 90 हजार की वार्षिक आय वालों के लिए 90 हजार रुपये तक का कर्ज अपना आशियाना बनाने के लिए दिया जाता है। इस कर्ज का सारा ब्याज राज्य सरकार वहन करती है। कर्ज की मूल राशि लाभार्थी को जमा करनी पड़ती है। लेकिन विज्ञापन में दो से चार दिन में होम लोन देने के दावा करने वाले इस कर्ज को देने से कतराते हैं। महाराष्ट्र में इस योजना की हकीकत यह है कि विभिन्न सरकारी बैंक सरकार की ईमानदार मंशा पर पानी फेर रहे हैं। उनकी उदासिनता से यह योजना अधर में लटक गई है। नागपुर की स्थिति देखिये। सरकार ने इस योजना के तहत नागपुर में करीब 2900 लोगों के आवेदन मंजूर किये थे। लेकिन जब ये आवेदन बैंकों के पास गए तो उन्होंने किसी न किसी बहाने से इस योजना के तहत कर्ज देना टाल दिया। कई आवेदकों ने तो बैंक के चक्कर काटते-काटते अब इस योजना के लाभ पाने से निराश हो गये हैं। बैंकों ने इस योजना के तहत कर्ज देने के लिए आवेदकों पर ऐसी-ऐसी शर्त लगा दी कि लोगों को शर्त पूरा करना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति केवल नागपुर की ही नहीं है। पूरे महाराष्ट्र में इस योजना को सरकारी बैंक ऐसे ही कुठराघात कर रहे हैं। इस योजना की घोषणा राज्य सरकार ने कुछ महीने पहले ही की थी। तब यह कहा गया था कि 3 वर्ष में 10 लाख गरीब लोगों को अपना आवास उपलब्ध कराने के लिए कर्ज दिया जाएगा। इस योजना का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसके लिए बैंकों के विभिन्न शर्तों को हटाने के लिए सरकार ने बैंकों को निर्देश भी दिया था। इस संबंध में एक सकुर्लर भी जारी हुआ था। पर बैंकों ने इस पर अमल नहीं किया है।
योजना से जुड़े नागपुर के उपअभियंता विनायक मामुलकर ने बताया कि वर्ष 2008-09 और 2009 और 2009-10 में 2966 लोगों को आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए बड़े पैमाने पर आवेदकों ने आवेदन दिया था। लक्ष्य के अनुसार 2966 लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए उनके आवेदन मंजूर कर बैंकों को भेज दिये गए। लेकिन बैंकों की शर्त पूरी नहीं करने के कारण अधिकर लोगों को इसका लाभ नहीं मिला। वहीं कुछ आवेदकों ने बैंक के लोन विभाग के साठगांठ से अपना कर्ज पा लिया। लेकिन अधिकतर लेकिन अधिकर आवेदक बैंक के शर्तों में फंस कर इस लाभ से वंचित हो गये हैं। महाराष्ट्र बैंक के एक अधिकारी ने नाम खुलासा नहीं करने की शर्त पर बताया कि सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज देना बैंक के लिए घाटे का सौदा है। सबसे पहले तो बैंक से ब्याज पाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। वहीं सीधे ग्रहकों से कर्ज की वसूली सीधे-सीधे हो जाती है। इसके अलावा बैंक भी कर्ज देने से पहले ऐसे आवेदकों की आर्थिक स्थिति अच्छी तरह से देखती है। बैंक को जब यह सुनिश्चित हो जाता है कि कर्ज लेने वाला इस योजना के तहत ब्याज माफ होने के बाद भी मूलधन चुकाने में सक्षम है, तब ही उनके कर्ज के आवेदन की मंजूरी दी जाती है। बैंक को इस योजना के तहत बहुत ज्यादा लाभ भी नहीं हो पता है। इसलिए सरकारी योजना के तहत कर्ज देने से हर बैंक हिचकते हैं।
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रविवार, जुलाई 18, 2010
महंगाई से जोर पकड़ा मिलावट का धंधा
तुअर दाल में जम कर हो रही है मिलावट
नागपुर। बढ़ती महंगाई के कारण जहां आम आदमी की कमर टूट गई है, वहीं इससे मिलावटखोरों की चांदी ही चांदी है। वे अनेक वस्तुओं में मिलावट कर ग्राहकों से असली वस्तुओं के दाम वसूल कर मालामाल हो रहे हैं। आम लोग असली और नकली का फर्क नहीं समझ पा रहे हैं। आधुनिक तकनीक ने असली और नकली का भेद करना मुश्किल कर दिया है। इसी का लाभ मिलावटखोर उठा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो असली वस्तुओं का दाम देकर नकली वस्तुओं का सेवन करने वालों को न केवल धन की हानि हो रही है, बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी घातक असर पड़ रहा है। हालांकि इसका पता एकदम से नहीं चल पाता है, लेकिन नकली वस्तुओं के सेवन करने वाले विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं।
दुकानों में विशेषकर राशन की दुकानों में यह काम धड़ल्ले से किया जा रहा है। बाजार में तुअर की दाल में बटरी, दाल और खेसाड़ी दाल मिलाकर धड़ल्ले से बेची जा रही है। कई दुकानदार वस्तुओं में मिलावट इस औसत से कर रहे हैं कि वह पकड़ी न जाए। वे नकली वस्तुओं की मिलावट असली से कम रख रहे हैं। जैसे उनकी मिलावट 30 से 40 प्रतिशत तक ही रह रही है। अच्छी क्वालिटी की दाल, चावल, गेहंू में आसानी से मिलावटी वस्तुओं को मिलाया जा रहा है।
मिलावटखोरी के बारे में अन्य एवं औषधि अन्वेषण विभाग का कहना है कि जो क्षेत्र हमारे दायरे में आते हैं, उन पर हमारी कड़ी निगरानी है। नागपुर के अधिकतर क्षेत्र महानगर पालिका के दायरे में आते हैं। इसलिए मिलावट का सैंपल लेना और मिलावटखोरी पकडऩे के लिए अभियान चलाने की जिम्मेदारी मनपा को है।
शहर के चिकित्सकों का कहना है कि उनके पास आने वाले मरीजों के लक्षण से पता चलता है कि वे मिलावटी वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं। मानसून आने से 'फूड प्वाइजनिंगÓ की समस्या आम होती जा रही है।
पिछले दिनों एक समाजिक कार्यकर्ता ने राशन की दुकानों पर मिलने वाली तुअर दाल का नमूना प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजा था। परीक्षण रिपोर्ट के मुताबिक तुअर दाल के सैंपल में 8 प्रतिशत की नमी, 16 प्रतिशत बटरी दाल, 32 प्रतिशत लाखोड़ी दाल व एक से दो प्रतिशत अन्य दालों की मिलावट मिली। रिपोर्ट से साबित हुआ कि नगर की राशन दुकानों में खरीदी करने वाले लोगों को केवल 43 प्रतिशत ही शुद्ध तुअर दाल मिल रही है। हाल में तेजी से बढ़ी महंगाई के कारण मिलावट का धंधा और बढ़ गया है।
कई कंपनियों ने महंगाई में राहत देने के लिए ग्राहकों में भ्रम बनाया है। पहले जितने रुपये में जितने वजन में वस्तुओं का पैकेट मिलता था। कंपनियों ने महंगाई के कारण भाव बढ़ाने के बजाय उसमें से मात्रा कम कर दी है। छोटे अक्षरों में पैकेट पर भी कम वजन लिखा होता है। लेकिन ग्राहक इस ओर ध्यान नहीं देते हैं। वे पूर्व की कीमतों में ही वस्तुएं लेते हैं। लेकिन वे इस बात से अनजान रहते हैं कि उन्हें उतने रुपये में कम समान मिल रहा है।
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नागपुर। बढ़ती महंगाई के कारण जहां आम आदमी की कमर टूट गई है, वहीं इससे मिलावटखोरों की चांदी ही चांदी है। वे अनेक वस्तुओं में मिलावट कर ग्राहकों से असली वस्तुओं के दाम वसूल कर मालामाल हो रहे हैं। आम लोग असली और नकली का फर्क नहीं समझ पा रहे हैं। आधुनिक तकनीक ने असली और नकली का भेद करना मुश्किल कर दिया है। इसी का लाभ मिलावटखोर उठा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो असली वस्तुओं का दाम देकर नकली वस्तुओं का सेवन करने वालों को न केवल धन की हानि हो रही है, बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी घातक असर पड़ रहा है। हालांकि इसका पता एकदम से नहीं चल पाता है, लेकिन नकली वस्तुओं के सेवन करने वाले विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं।
दुकानों में विशेषकर राशन की दुकानों में यह काम धड़ल्ले से किया जा रहा है। बाजार में तुअर की दाल में बटरी, दाल और खेसाड़ी दाल मिलाकर धड़ल्ले से बेची जा रही है। कई दुकानदार वस्तुओं में मिलावट इस औसत से कर रहे हैं कि वह पकड़ी न जाए। वे नकली वस्तुओं की मिलावट असली से कम रख रहे हैं। जैसे उनकी मिलावट 30 से 40 प्रतिशत तक ही रह रही है। अच्छी क्वालिटी की दाल, चावल, गेहंू में आसानी से मिलावटी वस्तुओं को मिलाया जा रहा है।
मिलावटखोरी के बारे में अन्य एवं औषधि अन्वेषण विभाग का कहना है कि जो क्षेत्र हमारे दायरे में आते हैं, उन पर हमारी कड़ी निगरानी है। नागपुर के अधिकतर क्षेत्र महानगर पालिका के दायरे में आते हैं। इसलिए मिलावट का सैंपल लेना और मिलावटखोरी पकडऩे के लिए अभियान चलाने की जिम्मेदारी मनपा को है।
शहर के चिकित्सकों का कहना है कि उनके पास आने वाले मरीजों के लक्षण से पता चलता है कि वे मिलावटी वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं। मानसून आने से 'फूड प्वाइजनिंगÓ की समस्या आम होती जा रही है।
पिछले दिनों एक समाजिक कार्यकर्ता ने राशन की दुकानों पर मिलने वाली तुअर दाल का नमूना प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजा था। परीक्षण रिपोर्ट के मुताबिक तुअर दाल के सैंपल में 8 प्रतिशत की नमी, 16 प्रतिशत बटरी दाल, 32 प्रतिशत लाखोड़ी दाल व एक से दो प्रतिशत अन्य दालों की मिलावट मिली। रिपोर्ट से साबित हुआ कि नगर की राशन दुकानों में खरीदी करने वाले लोगों को केवल 43 प्रतिशत ही शुद्ध तुअर दाल मिल रही है। हाल में तेजी से बढ़ी महंगाई के कारण मिलावट का धंधा और बढ़ गया है।
कई कंपनियों ने महंगाई में राहत देने के लिए ग्राहकों में भ्रम बनाया है। पहले जितने रुपये में जितने वजन में वस्तुओं का पैकेट मिलता था। कंपनियों ने महंगाई के कारण भाव बढ़ाने के बजाय उसमें से मात्रा कम कर दी है। छोटे अक्षरों में पैकेट पर भी कम वजन लिखा होता है। लेकिन ग्राहक इस ओर ध्यान नहीं देते हैं। वे पूर्व की कीमतों में ही वस्तुएं लेते हैं। लेकिन वे इस बात से अनजान रहते हैं कि उन्हें उतने रुपये में कम समान मिल रहा है।
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नागपुर समाचार
शुक्रवार, जुलाई 16, 2010
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