2 निरपराध लोगों का गला काट डाला
गढ़चिरोली जिले की भामरागढ़ तहसील के मेड़पल्ली स्थित सीआरपीएफ के अस्थायी पुलिस कैम्प को नक्सलियों ने शुक्रवार की देर रात आग के हवाले कर दिया। कुछ दिनों पूर्व ही पुलिस दल ने इस कैम्प को छोड़ दिया था। जबकि भामरागढ़ तहसील के ही 2 निष्पाप ग्रामीणों की भी नक्सलियों ने गला रेतकर निर्मम हत्या कर दी जिससे क्षेत्र के गांवों में दहशत का माहौल बना हुआ है।
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले में नक्सल खोज मुहिम के लिए सीआरपीएफ पुलिस की सहायता ली जा रहीं है। विभिन्न स्थानों पर सीआरपीएफ पुलिस के कैम्प बनाए गए है। पुलिस ने मेड़पल्ली गांव में भी एक कैम्प बनवाया था, लेकिन यह कैम्प कुछ ही दिनों पूर्व पुलिस ने छोड़ दिया था। बीती देर रात 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने मेड़पल्ली के पुलिस कैम्प में आकर पूरे कैम्प को आग के हवाले कर दिया। जिसमें पूरा पुलिस कैम्प जलकर ध्वस्त को गया है। वहीं दूसरी एक घटना में पुलिस को बम खोजने के कार्य में मदद करने वाले भामरागढ़ तहसील के ही दो ग्रामीणों की नक्सलियों ने गला रेतकर हत्या कर दी। समाचार के लिखे जाने तक मृत ग्रामीणों के नाम पता नहीं चल पाये है। जबकि क्षेत्र में पुलिस की चौकसी बढ़ा दी गई है।
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शनिवार, अगस्त 21, 2010
मंगलवार, अगस्त 10, 2010
सेक्स क्षमता बढ़ाने की गलतफहमी से गधों पर संकट

'दो बैलों की कथाÓ प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी है। कहानी की शुरुआत में प्रेमचंद गधा पुराण से करते हुए बताते हैं कि कैसे गधा चुपचाप मेहनत करता है और मालिक की मार खाता है। सच कहें तो गधे जैसा मेहनती कोई अन्य पशु नहीं। लेकिन समाज में गधों को लेकर नकारात्मक लोकोक्ति का प्रसार हो गया। खैर बदले दौर में गदहों की उपयोगिता कम हो गई थी। लेकिन आधुनिक जमाने में गधों के प्रति फिर से एक नया समाजिक गलतफहली फैलने से इसकी उपयोगिता बढ़ गई है।
नागपुर। आप माने या न मानें, पर महाराष्ट्र के कुछ स्थानीय खबरों पर यकीन करें तो इन दिनों राज्य के गधों पर भारी संकट मंडरा रहा है। इनकी तस्करी होने लगी है। तस्करी से गधे महाराष्ट्र से पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि गधों के खून और मांस का उपयोग लैंगिक क्षमता बढ़ाने के लिए होने की गलतफहमी समूचे आंध्रप्रदेश में फैल गई है। इस कारण महाराष्ट्र के गधों पर संकट के बादल मंडरा रहा है। पिछले कुछ महीनों में करीब 50000 हजार गधों को महाराष्ट्र से आंध्रप्रदेश भेजे गए हैं। गधों की तस्करी के लिए कई एजेंट भी सक्रिय हो गए हैं। ये दूर-दराज के गांवों के गधों की चोरी भी करने लगे हैं। परभणी जिले के शहर गंगाखेड़ से पिछले 3 माह में ही करीब 350 गधों की चेारी होने की सूचना है। गंगाखेड़ पुलिस थाने में गधों के लगभग 29 मालिकों ने अपने गधों की चोरी की शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस की जांच में गधों की तस्करी का सनसनीखेज मामला उजागर हो चुका है।
स्थानीय लोग कहते हैं कि गुंटूर जिले के बापटला क्षेत्र में गधों का बड़ा बाजार लगता है। आंध्र के लोगों में यह गलतफहमी फैल गई है कि गधों के खून तथा मांस से लैंगिक क्षमता में तेजी से वृद्धि होती है। इसी कारण गधों की मांग बाजार में अचानक बढ़ गई है। आंध्रप्रदेश के बाजारों में गधों का खून 200 रुपये प्रति लिटर तथा मांस 300 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। गधों के खून और मांस की मांग बढऩे के कारण आंध्र में गधों की कमी हो गई है, जिसके कारण अब महाराष्ट्र के गधों पर संकट आ गया है। परभणी जिले की तरह की विदर्भ के यवतमाल जिले से भी गधों की बड़े पैमाने पर आंध्रप्रदेश में तस्करी होने की जानकारी मिली है। यवतमाल के आदिवासी इलाकों के कई नागरिकों के गधे चोरी हो गए हैं। इसके अलावा विदर्भ के अमरावती, पांढरकवड़ा के आंध्रप्रदेश की सीमावर्ती गांवों से भी हालफिलहाल में अनेक गधे चोरी हुए हैं। इसी तरह की खबर परभणी, जालना, औरंगाबाद, किनवट से भी आ रही है। आंध्र में फैले इस समाजिक गलतफहमी से गधों के मालिक परेशान है। गधे चोरी होने से उनकी आर्थिक स्थिति डगमगा गई है।
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शनिवार, जुलाई 31, 2010
गडचिरोली में ये क्या हो रहा है ...
रद्द हुआ आबा का गड़चिरोली दौरा!
संजय स्वदेश
नागपुर। महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला गड़चिरोली में इन दिनों काफी कुछ चल रहा है। यहां की गतिविधियों से राज्य सरकार पूरी तरह से भयभित है। पिछले दिनों नक्सली नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद गड़चिरोली जिले में सक्रिय खूंखार नक्सलियों की घातक गतिविधियों को देखते हुए राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल 'आबाÓ का गड़चिरोली दौरा रद्द हो गया। आबा 29 जुलाई को गड़चिरोली के दौरे पर आने वाले थे। उनकी अध्यक्षता में जिला नियोजन समिति की बैठक का आयोजन किया गया था। आर.आर. पाटिल गड़ïचिरोली के पालकमंत्री भी हैं।
खूंखार नक्सली नेता आजाद की आंध्र पुलिस के साथ मुठभेड़ में मौत के बाद से ही गड़चिरोली जबर्दस्त गुस्से में हैं। वे अपने बड़े नेता की मौत का बदला लेने का ऐलान भी कर चुके हैं। बड़े नेता के बदले में नक्सलियों के निशाने पर कोई बड़ा नेता ही होने की भनक लगने के बाद खुफिया एजेंसियों के अधिकारी सतर्क हो गए। आर.आर. पाटिल के गड़चिरोली जिला दौरे की घोषणा पहले ही हो गई थी और बताया जाता है कि नक्सलियों ने पाटिल के दौरे में बाधा पहुंचाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी। इसकी भनक लगने के बाद ही सतर्क हुई खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल पाटिल को गड़चिरोली का दौरा नहीं करने की सलाह दी। ज्ञात हो कि आजाद की मौत के बाद से आबा पिछले दिनों विदर्भ में आए थे, लेकिन गड़चिरोली न जाकर यवतमाल से ही वापस मुंबई चले गए थे। अब ताजा घटनाक्रम के तहत आबा का गड़चिरोली दौरा रद्द हो चुका है। आबा जब पिछली बार गड़चिरोली आए थे तब उनकी कार के सामने अचानक आए युवकों ने पुलिस भर्ती में हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए 'नक्सलवाद जिंदाबादÓ के नारे लगाए थे। उस घटना को सरकार ने गंभीरता से लेकर जांच शुरू की थी। नक्सल सूत्रों के अनुसार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में सक्रिय नक्सली तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक वे आजाद की मौत के बदले किसी बड़े नेता को निशाना नहीं बनाते। नक्सलियों की लिस्ट पर नक्सलग्रस्त राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री होने की जानकारी मिली है। हाल ही में खबर आई थी कि नक्सलियों ने नागपुर का उपयोग उपचार-हब तथा आवागमन के लिए करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से बड़े नेताओं के नागपुर दौरे के दौरान भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रखने के निर्देश खुफिया एजेंसियों ने पुलिस को दिए हैं।
माओवादियों ने फूंकी भाड़भिड़ी ग्रामपंचायत
नक्सलियों ने 28 जुलाई की रात चामोर्शी तहसील के भाड़भिड़ी स्थित ग्रामपंचायत कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। नक्सलियों के इस वर्ष के शहीद सप्ताह में यह पहली विध्वसंक घटना बताई जा रही है। पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने भाड़भिड़ी गांव में प्रवेश किया तथा ग्रामपंचायत कार्यालय में जाकर सारे कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इस आगजनी की घटना में कार्यालय में रखा फर्निचर समेत सारे दस्तावेज जलकर खाक हो गये। घटना को अंजाम देने के बाद सभी नक्सली लाल सलाम के नारे लगाते हुए पर्चे फेंककर वहां से फरार हो गये। इस घटना से भाड़भिड़ी गांव के लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। पुलिस ने इस मामले में अज्ञात नक्सलियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया है। विशेष अभियान के दलों को नक्सल खोज मुहिम के लिये रवाना करने के आदेश दिये गये है। शहीद सप्ताह के दौरान जिले के लोगों में खासी दहशत होकर पुलिस विभाग ने लोगों से सहयोग करने की अपील की है।
अनेक स्थानों पर बनाये स्मारक

28 जुलाई से नक्सल संगठनों की ओर से शहीद सप्ताह मनाया जा रहा है। इस सप्ताह के दौरान नक्सलियों ने जिले के अनेक स्थानों पर शहीद स्मारक बनाये हैं। कोरची तहसील के मसेली, धानोरा तहसील के अतिदुर्गम गांवों से लेकर सिरोंचा तहसील के बामणी गांव में नक्सलियों ने यह स्मारक बनाये है। धानोरा के किसी सुदुर गांव में नक्सलियों ने पुलिस मुठभेड़ में मारा गया आजाद का पुतला भी बनाया है। जगह-जगह पर्चें व बैनर फेंककर नक्सलियों ने शहीद सप्ताह को मनाने व सरकार के ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल बंद करने की मांग की है। सिरोंचा तहसील के कंबालपेठा सड़क पर नक्सलियों ने पेड़ काटकर बिछाये है। यहां पर लोगों ने वायरों के बंडल को भी देखा है।
सैकड़ों गांवों में छाया सन्नाटा
नक्सली नेता चारू मुजूमदार की स्मृति में शुरू हुआ नक्सली शहीद सप्ताह इन दिनों पूरी तरह दहशत के साये में बीता। जिले के अतिदुर्गम क्षेत्र में बसे दर्जनों गांवों में सन्नाटा छाया रहा। धानोरा व कोरची तहसील मुख्यालयों में भी स्थानीय नागरिक खौफ में है। नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने नक्सल आंदोलन के नेता आजाद और चारु मजमूदार के नाम के स्मारक बनाकर उन्हें अपनी श्रध्दांजलि दे रहे हैं। कोरची के मसेली गांव में नक्सलियों ने लाल आतंक का झंडा लहराकर लोगों से यह सप्ताह मनाने का आह्वान किया। पुलिस विभाग ने इस बीच सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात किये थे। जिसके चलते अब तक कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई है। विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले की धानोरा व कोरची तहसील को इस वर्ष नक्सलियों ने अपना केंद्रबिन्दु बनाया है। शहीद सप्ताह की सर्वाधिक हरकतें इन्हीं तहसीलों में देखी जा रही हैं। धानोरा, कोरची, कसनसुर, मसेली समेत वनांचल के अनेक गांवों में बंद रखा गया है। अनेक सड़कों पर पेड़ काटकर बिछाने से यातायात बाधित किया गया है। शहीद सप्ताह शुरू होने के एक दिन पूर्व ही जिले की धानोरा तहसील के मुरूमगांव के पास गढ़चिरोली-राजनांदगांव महामार्ग पर पेड़ काटकर बिछाये हैं। आज भी यह पेड़ यथावत हंै। घटनास्थल पर लोगों ने वायर के बंडल भी देखे हंै। जिसके चलते लोगों में खासी दहशत है। इस महामार्ग का यातायात पूरी तरह ठप पड़ गया है। उल्लेखनीय है कि यह महामार्ग जिले का एकमात्र अंतर्राज्यीय महामार्ग है। गढ़चिरोली-मानपुर बस गुरुवार को सुबह धानोरा से ही लौट जाने की खबर मिली है। तहसील मुख्यालय में अनेक निजी वाहन बंद के चलते खड़े हैं।
वहीं जगह-जगह पर्चे व बैनर लगाने से लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। इस बंद के चलते जिले के गढ़चिरोली व अहेरी बस डिपो की अनेक बस फेरियां बंद हैं। इसमें प्रमुख रूप से गढ़चिरोली-राजनांदगांव, गढ़चिरोली-मानपुर, मुरूमगांव, पेंढरी, भामरागढ़, एटापल्ली व अन्य अतिदुर्गम गांवों में जाने वाली बसों की फेरियां हैं। गुरुवार को धानोरा की सारी दुकाने शत प्रतिशत बंद होने के कारण स्थानीय लोगों को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। सप्ताह के मद्देनजर पुलिस विभाग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात कर रखे हंै। सीआरपीएफ के साथ सी-60 जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। पर जनता पर सुरक्षा से ज्यादा नक्सलियों का खौफ भारी पड़ रहा है।
आरमोरी में निकली शांति रैली
शहीद सप्ताह के विरोध में आरमोरी पुलिस थाना की ओर से नक्सल विरोधी शांति रैली निकाली गई। थानेदार माने ने इस रैली को हरी झंडी दिखाकर रैली का शुभारंभ किया। यह रैली शहर की मुख्य सड़कों से होते हुए वापस पुलिस थाना पहुंची। इस समय अपने मार्गदर्शन में थानेदार माने ने कहा कि हर वर्ष की तरह इस बार भी नक्सलियों ने 28 जुलाई से 3 अगस्त की कालावधि में शहीद सप्ताह मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस सप्ताह में लोगों से पुलिस को सहयोग करने की अपील की। शांति रैली में आरमोरी के महात्मा गांधी विद्यालय, महात्मा गांधी कन्या विद्यालय, डा. आंबेडकर विद्यालय, हितकारिणी विद्यालय, किसनराव खोब्रागडे महाविद्यालय, विवेकानंद विद्यालय आदि शालाओं के छात्र, प्रधानाचार्य, शिक्षक व शहर के नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
17 अगस्त को मशाल मोर्चा
जिले में बिजली का उपयोग कम होने के बाद भी विगत 9 वर्षों से यहां लोडशेडिंग शुरू है। यह लोडशेडिंग पूरी तरह बंद करने की मांग को लेकर गढ़चिरोली के महावितरण कंपनी के अधीक्षक अभियंता कार्यालय पर आगामी 17 अगस्त को मशाल मोर्चा निकाला जाएगा। जिला परिषद के पूर्व सदस्य सुरेंद्रसिंह चंदेल व अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि जिले में शुरू लोडशेडिंग के कारण यहां की सर्वसाधारण जनता, छोटे उद्योजक व किसानों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले की लोड़शेडिंग को बंद करने के लिये अनेक बार आंदोलन व मोर्चे निकाले गये। लेकिन मंत्रियों के आश्वासन केवल आश्वासन ही रहें। लोडशेडिंग शुरू होने के बावजूद घरेलु उपयोग की बिजली के अधिक बिल भेजे जा रहे हैं।
बदहाली में आदिवासी आश्रम
एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प गढ़चिरोली के अंतर्गत आने वाली सरकारी आश्रमशालाओं की हालत फिलहाल पूरी तरह खस्ता हो चली है। आश्रमशाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संगठन ने आमशालाओं का दर्जा बढ़ाने की मांग की है।
गत 26 जून से शैक्षणिक सत्र आरंभ हुआ। लेकिन प्रकल्प के तहत आने वाली अनेक आश्रमशालाओं में अब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है। यह पद भरने की मांग भी कई बार की है। लेकिन इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकारी छात्रावास का भोजन बंद होने के कारण छात्रावास अब तक आरंभ ही नहीं हुए है। जिसके चलते स्कूली छात्रों की संख्या कम हो रहीं है। आश्रमशालाओं को किराणा व अन्य खाद्यान्न की आपूर्ति करने के आदेश अब तक जारी नहीं करने से आश्रमशालाओं की अवस्था दयनीय हो गई है। शैक्षणिक सत्र को आरंभ हुए एक माह का कालावधि बीत चुका है, लेकिन शिक्षा आरंभ नहीं होने से आदिवासी छात्रों का बड़े पैमाने पर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है।
संजय स्वदेश
नागपुर। महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला गड़चिरोली में इन दिनों काफी कुछ चल रहा है। यहां की गतिविधियों से राज्य सरकार पूरी तरह से भयभित है। पिछले दिनों नक्सली नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद गड़चिरोली जिले में सक्रिय खूंखार नक्सलियों की घातक गतिविधियों को देखते हुए राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल 'आबाÓ का गड़चिरोली दौरा रद्द हो गया। आबा 29 जुलाई को गड़चिरोली के दौरे पर आने वाले थे। उनकी अध्यक्षता में जिला नियोजन समिति की बैठक का आयोजन किया गया था। आर.आर. पाटिल गड़ïचिरोली के पालकमंत्री भी हैं।
खूंखार नक्सली नेता आजाद की आंध्र पुलिस के साथ मुठभेड़ में मौत के बाद से ही गड़चिरोली जबर्दस्त गुस्से में हैं। वे अपने बड़े नेता की मौत का बदला लेने का ऐलान भी कर चुके हैं। बड़े नेता के बदले में नक्सलियों के निशाने पर कोई बड़ा नेता ही होने की भनक लगने के बाद खुफिया एजेंसियों के अधिकारी सतर्क हो गए। आर.आर. पाटिल के गड़चिरोली जिला दौरे की घोषणा पहले ही हो गई थी और बताया जाता है कि नक्सलियों ने पाटिल के दौरे में बाधा पहुंचाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी। इसकी भनक लगने के बाद ही सतर्क हुई खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल पाटिल को गड़चिरोली का दौरा नहीं करने की सलाह दी। ज्ञात हो कि आजाद की मौत के बाद से आबा पिछले दिनों विदर्भ में आए थे, लेकिन गड़चिरोली न जाकर यवतमाल से ही वापस मुंबई चले गए थे। अब ताजा घटनाक्रम के तहत आबा का गड़चिरोली दौरा रद्द हो चुका है। आबा जब पिछली बार गड़चिरोली आए थे तब उनकी कार के सामने अचानक आए युवकों ने पुलिस भर्ती में हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए 'नक्सलवाद जिंदाबादÓ के नारे लगाए थे। उस घटना को सरकार ने गंभीरता से लेकर जांच शुरू की थी। नक्सल सूत्रों के अनुसार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में सक्रिय नक्सली तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक वे आजाद की मौत के बदले किसी बड़े नेता को निशाना नहीं बनाते। नक्सलियों की लिस्ट पर नक्सलग्रस्त राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री होने की जानकारी मिली है। हाल ही में खबर आई थी कि नक्सलियों ने नागपुर का उपयोग उपचार-हब तथा आवागमन के लिए करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से बड़े नेताओं के नागपुर दौरे के दौरान भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रखने के निर्देश खुफिया एजेंसियों ने पुलिस को दिए हैं।
माओवादियों ने फूंकी भाड़भिड़ी ग्रामपंचायत
नक्सलियों ने 28 जुलाई की रात चामोर्शी तहसील के भाड़भिड़ी स्थित ग्रामपंचायत कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। नक्सलियों के इस वर्ष के शहीद सप्ताह में यह पहली विध्वसंक घटना बताई जा रही है। पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने भाड़भिड़ी गांव में प्रवेश किया तथा ग्रामपंचायत कार्यालय में जाकर सारे कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इस आगजनी की घटना में कार्यालय में रखा फर्निचर समेत सारे दस्तावेज जलकर खाक हो गये। घटना को अंजाम देने के बाद सभी नक्सली लाल सलाम के नारे लगाते हुए पर्चे फेंककर वहां से फरार हो गये। इस घटना से भाड़भिड़ी गांव के लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। पुलिस ने इस मामले में अज्ञात नक्सलियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया है। विशेष अभियान के दलों को नक्सल खोज मुहिम के लिये रवाना करने के आदेश दिये गये है। शहीद सप्ताह के दौरान जिले के लोगों में खासी दहशत होकर पुलिस विभाग ने लोगों से सहयोग करने की अपील की है।
अनेक स्थानों पर बनाये स्मारक

28 जुलाई से नक्सल संगठनों की ओर से शहीद सप्ताह मनाया जा रहा है। इस सप्ताह के दौरान नक्सलियों ने जिले के अनेक स्थानों पर शहीद स्मारक बनाये हैं। कोरची तहसील के मसेली, धानोरा तहसील के अतिदुर्गम गांवों से लेकर सिरोंचा तहसील के बामणी गांव में नक्सलियों ने यह स्मारक बनाये है। धानोरा के किसी सुदुर गांव में नक्सलियों ने पुलिस मुठभेड़ में मारा गया आजाद का पुतला भी बनाया है। जगह-जगह पर्चें व बैनर फेंककर नक्सलियों ने शहीद सप्ताह को मनाने व सरकार के ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल बंद करने की मांग की है। सिरोंचा तहसील के कंबालपेठा सड़क पर नक्सलियों ने पेड़ काटकर बिछाये है। यहां पर लोगों ने वायरों के बंडल को भी देखा है।
सैकड़ों गांवों में छाया सन्नाटा
नक्सली नेता चारू मुजूमदार की स्मृति में शुरू हुआ नक्सली शहीद सप्ताह इन दिनों पूरी तरह दहशत के साये में बीता। जिले के अतिदुर्गम क्षेत्र में बसे दर्जनों गांवों में सन्नाटा छाया रहा। धानोरा व कोरची तहसील मुख्यालयों में भी स्थानीय नागरिक खौफ में है। नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने नक्सल आंदोलन के नेता आजाद और चारु मजमूदार के नाम के स्मारक बनाकर उन्हें अपनी श्रध्दांजलि दे रहे हैं। कोरची के मसेली गांव में नक्सलियों ने लाल आतंक का झंडा लहराकर लोगों से यह सप्ताह मनाने का आह्वान किया। पुलिस विभाग ने इस बीच सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात किये थे। जिसके चलते अब तक कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई है। विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले की धानोरा व कोरची तहसील को इस वर्ष नक्सलियों ने अपना केंद्रबिन्दु बनाया है। शहीद सप्ताह की सर्वाधिक हरकतें इन्हीं तहसीलों में देखी जा रही हैं। धानोरा, कोरची, कसनसुर, मसेली समेत वनांचल के अनेक गांवों में बंद रखा गया है। अनेक सड़कों पर पेड़ काटकर बिछाने से यातायात बाधित किया गया है। शहीद सप्ताह शुरू होने के एक दिन पूर्व ही जिले की धानोरा तहसील के मुरूमगांव के पास गढ़चिरोली-राजनांदगांव महामार्ग पर पेड़ काटकर बिछाये हैं। आज भी यह पेड़ यथावत हंै। घटनास्थल पर लोगों ने वायर के बंडल भी देखे हंै। जिसके चलते लोगों में खासी दहशत है। इस महामार्ग का यातायात पूरी तरह ठप पड़ गया है। उल्लेखनीय है कि यह महामार्ग जिले का एकमात्र अंतर्राज्यीय महामार्ग है। गढ़चिरोली-मानपुर बस गुरुवार को सुबह धानोरा से ही लौट जाने की खबर मिली है। तहसील मुख्यालय में अनेक निजी वाहन बंद के चलते खड़े हैं।
वहीं जगह-जगह पर्चे व बैनर लगाने से लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। इस बंद के चलते जिले के गढ़चिरोली व अहेरी बस डिपो की अनेक बस फेरियां बंद हैं। इसमें प्रमुख रूप से गढ़चिरोली-राजनांदगांव, गढ़चिरोली-मानपुर, मुरूमगांव, पेंढरी, भामरागढ़, एटापल्ली व अन्य अतिदुर्गम गांवों में जाने वाली बसों की फेरियां हैं। गुरुवार को धानोरा की सारी दुकाने शत प्रतिशत बंद होने के कारण स्थानीय लोगों को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। सप्ताह के मद्देनजर पुलिस विभाग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात कर रखे हंै। सीआरपीएफ के साथ सी-60 जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। पर जनता पर सुरक्षा से ज्यादा नक्सलियों का खौफ भारी पड़ रहा है।
आरमोरी में निकली शांति रैली
शहीद सप्ताह के विरोध में आरमोरी पुलिस थाना की ओर से नक्सल विरोधी शांति रैली निकाली गई। थानेदार माने ने इस रैली को हरी झंडी दिखाकर रैली का शुभारंभ किया। यह रैली शहर की मुख्य सड़कों से होते हुए वापस पुलिस थाना पहुंची। इस समय अपने मार्गदर्शन में थानेदार माने ने कहा कि हर वर्ष की तरह इस बार भी नक्सलियों ने 28 जुलाई से 3 अगस्त की कालावधि में शहीद सप्ताह मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस सप्ताह में लोगों से पुलिस को सहयोग करने की अपील की। शांति रैली में आरमोरी के महात्मा गांधी विद्यालय, महात्मा गांधी कन्या विद्यालय, डा. आंबेडकर विद्यालय, हितकारिणी विद्यालय, किसनराव खोब्रागडे महाविद्यालय, विवेकानंद विद्यालय आदि शालाओं के छात्र, प्रधानाचार्य, शिक्षक व शहर के नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
17 अगस्त को मशाल मोर्चा
जिले में बिजली का उपयोग कम होने के बाद भी विगत 9 वर्षों से यहां लोडशेडिंग शुरू है। यह लोडशेडिंग पूरी तरह बंद करने की मांग को लेकर गढ़चिरोली के महावितरण कंपनी के अधीक्षक अभियंता कार्यालय पर आगामी 17 अगस्त को मशाल मोर्चा निकाला जाएगा। जिला परिषद के पूर्व सदस्य सुरेंद्रसिंह चंदेल व अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि जिले में शुरू लोडशेडिंग के कारण यहां की सर्वसाधारण जनता, छोटे उद्योजक व किसानों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले की लोड़शेडिंग को बंद करने के लिये अनेक बार आंदोलन व मोर्चे निकाले गये। लेकिन मंत्रियों के आश्वासन केवल आश्वासन ही रहें। लोडशेडिंग शुरू होने के बावजूद घरेलु उपयोग की बिजली के अधिक बिल भेजे जा रहे हैं।
बदहाली में आदिवासी आश्रम
एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प गढ़चिरोली के अंतर्गत आने वाली सरकारी आश्रमशालाओं की हालत फिलहाल पूरी तरह खस्ता हो चली है। आश्रमशाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संगठन ने आमशालाओं का दर्जा बढ़ाने की मांग की है।
गत 26 जून से शैक्षणिक सत्र आरंभ हुआ। लेकिन प्रकल्प के तहत आने वाली अनेक आश्रमशालाओं में अब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है। यह पद भरने की मांग भी कई बार की है। लेकिन इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकारी छात्रावास का भोजन बंद होने के कारण छात्रावास अब तक आरंभ ही नहीं हुए है। जिसके चलते स्कूली छात्रों की संख्या कम हो रहीं है। आश्रमशालाओं को किराणा व अन्य खाद्यान्न की आपूर्ति करने के आदेश अब तक जारी नहीं करने से आश्रमशालाओं की अवस्था दयनीय हो गई है। शैक्षणिक सत्र को आरंभ हुए एक माह का कालावधि बीत चुका है, लेकिन शिक्षा आरंभ नहीं होने से आदिवासी छात्रों का बड़े पैमाने पर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है।
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गुरुवार, जून 03, 2010
आ रहा है मानसून, पर कहा जाएगा पानी?
sanjay swadesh
नागपुर। भीषण गर्मी में से परेशान नागपुरवासी मानसून आने की उल्टी गिनती गिन रहे हैं। अमूमन जून के मध्य में मानसून विदर्भ की धरती की प्यास बुझाता है। हर साल मानसून विदर्भ की जमीं पर करोड़ों लीटर पानी बरसा कर चला जाता है। फिर भी हर साल गर्मी में पानी की परेशानी होती है। किसान हो या सरकारी महकमा हर कोई किसी न किसी कारण मानसून के इंतजार में रहता है। इस मानसून से किसान खरीफ की फसल की बुआई शुरू करते हैं। लिहाजा बीज बाजार में किस्म-किस्म के बीज व खाद आ जाते हैं। महानगर पालिका सक्रिय होकर नदी नालों की साफ-सफाई करती है, जिससे पानी का बहाव सुचारु हो सके। भूजल संरक्षण बोर्ड इस पानी को संरक्षण के लिए विशेष योजनाएं बनाता है। इस वर्ष भी मानसून आने से पूर्व कुछ ऐसी ही स्थिति है। बरसात के शुद्ध जल संरक्षण के लिए सरकारी अभियान तो अनेक हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। विभिन्न सरकारी योजनाओं की पोल तब खुलती है जब गर्मी आती है और पीने के पानी की कमी पड़ जाती है।
राज्य सरकार के भूजल सर्वे व विकास विभाग का दावा है कि विदर्भ क्षेत्र के कुओं में बरसाती पानी जमा करने का उनका अभियान शुरू है। इस साल करोड़ों लीटर पानी इन कुओं में जमा करके यहां के भूजल स्तर को ऊपर उठाना है। वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार की एजेंसी केंद्रीय भूजल बोर्ड के नागपुर स्थित कार्यालय का कहना है कि पानी का मामला राज्य सरकार के खाते में आता है, उनकी जिम्मेदारी विभिन्न इलाकों में भूजल की स्थिति पर अध्ययन कर उसकी रिपोर्ट देने तक है। इसके अलावा जरूरत पडऩे पर तकनीकी परामर्श के साथ ही जागरुकता अभियान चलाना है। बोर्ड के एक वरिष्ठï वैज्ञानिक ने बताया कि जल संधारण आपले राष्टï्रीय अभियान यानी जल संरक्षण का अपना राष्टï्रीय अभियान विदर्भ क्षेत्र में जारी है।
जमीन से लिया जल वापस कौन करेगा?राज्य के भूजल सर्वेक्षण एवं विकास विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि विभाग बोरवेल, कुओं व खेतों में कुएं के लिए उचित जगह बताने के अलावा हर गांव में भूजल सर्वेक्षण आदि करता है। ग्रामिणों को यह बताया जाता है कि गर्मी और ठंड के मौसम में भूजल का स्तर में कितना अंतर रहता है। इसके अलावा भूजल की दृष्टिï से राज्य के हर गांव का अध्ययन किया गया है। साथ ही साथ पीने का पानी कहां किस तरह से उपलब्ध है, यह देखा जाता है। राज्य में 2 लाख 50 हजार बोरवेल हैं। लेकिन इसमें लोगों की सहभागिता नहीं रही। जब तक पानी उपलब्ध होता है, लोग पानी लेते रहे। जब घर में नल आया तो, इनका उपयोग बंद कर दिया। बोरबेल सूखते गए। किसानों ने खेती के लिए इनका दोहन तो किया, लेकिन इसमें वापस पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी अपनी नहीं समझी। दरअसल इनका दोहन बैंक की तरह है। बैंक में रुपये तभी बार-बार निकाले जा सकते हंै, जब निकालने लायक रुपये उसमें डाले गए हों। वैसे ही जमीन के अंदर से निकाले गए पानी के बदले पानी निकालने का काम भी जरूरी है। नीचे जाते भूजल को रोकने के लिए राज्य सरकार की जो योजनाएं हैं, उसके मुताबिक हर गांव में पानी संबंधी चार 4 योजनाएं लागू होती है। इन योजनााओं के तहत हर गांव में हैंडपंप, कुएं और सामुदायिक कुए होना आवश्यक है। इस हिसाब से राज्य के औसतन हर गांव में 3.9 योजनाएं लागू हैं। अफसोस की बात यह है कि इनका रख-रखाव सुचारु नहीं होने से गर्मी के दिनों में लोगों को पानी की समस्या से दो-चार होना पड़ता है। जनता समझती है कि इसकी जिम्मेदारी केवल सरकार की है। इसी कारण सरकार ने 193 में संविधान संशोधन कर ग्रामीण क्षेत्रों में जल की आपूर्ति में जन सहभागिता को अनिवार्य कर दिया। इससे करीब दो दशकों से जनता की थोड़ी-सी रुचि इसमें बढ़ी है। 2003 में राज्य के शिवकालीन पानी साठवालीन योजना चलाई गई। योजना को लागू करते समय हर गांव के पानी के विविन्न स्रोतों की गणना की गई।
कुओं में जाएगा करोड़ों लीटर पानी
राज्य के भूजल सर्वेक्षण एवं विकास विभाग से प्राप्त जानकारी के मुताबिक शिवकालीन योजना के तहत गांव के लोगों के हर वर्ग और जाति के प्रतिनिधियों की पानी समिति बनाई गई। तब से स्थिति में सुधार आ रहा है। गांव में बनाये कुयें में बरसात में बहते पानी को फिल्टर कर इसमे डाला जाता है। इससे भूजल स्तर बढ़ा है। लोगों ने बोरवेल बंद कर दिए हैं। हर साल इन कुओं मे करोड़ों लीटर बरसात का पानी डाला जाता है। इस साल भी मानसून से पूर्व विभाग मुस्तैद हो चुका है। बहते पानी को बचाना है और भूजल को उपर उठाना है। विभाग का कहना है कि पानी की कहीं भी कमी नहीं है। कमी है तो इसके नियोजन की। इसके अलावा वर्तमान में जितना पानी आवश्यक है, वह उपलब्ध है। यदि जनता पानी संचित भी करती है, तो उसका उपयोग कहां करेंगी? सरकार बहुत जल्दी ग्रामीणों के लिए पानी बजट की योजना ला रही है। इसमें ग्रामीण यह तय करेंगे कि उनके गांव में हर साल कितना पानी खेती, पीने, पशु व दूसरे कार्यों आदि में खर्च होता है। उनके पास कितना पानी उपलब्ध है। यदि पानी कम है तो अतिरिक्त जल की आपूर्ति कहां से होगी? इसका सब कुछ हिसाब जनता करेगी। भूजल विकास विकास केवल उनका मार्गदर्शन करेगा।
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केंद्रीय भूजल बोर्डकेंद्रीय भूजल बोर्ड का क्षेत्रीय मुख्यालय नागपुर में स्थित है। इस पर आसपास के 14 तालुकों का दायित्व है। बोर्ड का कहना है कि नागपुर का मौसम सूखी गर्मी वाला है। इसलिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान यहां अच्छी वर्षा होती है। विभाग ने सन् 1901 से 1999 तक के मानसून के अध्ययन के बाद जो रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक यहां हर साल 1000 से 1200 मि.मी. वर्षा होती है। नगर के पश्चिमी क्षेत्र विशेषकर काटोल क्षेत्र में यह औसतन 985.4 मि.मी. है।
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महाराष्टï्र में भूजल की स्थिति
क्षेत्र : 3,0,13 वर्ग किलोमीटर
वर्षा : 1433 मि.मी.
भूजल के स्रोत
वार्षिक स्रोत : 32.96 बीसीएम
वार्षिक उपलब्धता : 31.21 बीसीम
वार्षिक संरचना : 15.09 बीसीम
भूजल विकास का प्रतिशत : 48
कृत्रिम भूजल भराई क्षेत्र : 6526 वर्ग किलोमीटर
भूजल गुणवत्ता की समस्या : अमरावती और अकोला में भूजल में लवण की मात्रा ज्यादा है। इसके अलावा भंडारा, चंद्रपुर, नांदेड तथा औरंगाबाद के भूजल में फ्लोराइड नामक हानिकारक तत्व मिलता है।
31 मार्च, 200 तक राज्य में कुल 1 भूजल जनजागृति अभियान और 15 जल प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाये
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मंगलवार, जून 01, 2010
किसानों के राहत के 3750 करोड़ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा
दिल्ली जाएंगी विदर्भ की किसान विधवाएं
नागपुर। विदर्भ की विधवाएं अब अपना दुखड़ा सुनाने दिल्ली जाएंगी। प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने जाकर वे प्रधानमंत्री को बताने की कोशिश करेंगी कि कैसे प्रधानमंत्री राहत पैकेज के नाम पर जो कुछ विदर्भवासियों को दिया गया, वह सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और उनके हालात बद से बदतर हो गये हैं।
विदर्भ की एक विधवा कलावती का नाम लेकर देशभर में विदर्भ की विधवाओं पर ध्यान खींचने वाले राहुल गांधी भी अब कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। चुनाव में कलावती को न खड़ा होने देने के लिए कांग्रेस ने भले ही एड़ी चोटी का जोर लगाकर उन्हें मैदान में उतरने से रोक दिया हो, लेकिन अब उसी कांग्रेस के शासनकाल में प्रधानमंत्री राहत पैकेज पर जमकर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। राज्य की पब्लिक एकाउण्ट्स कमेटी ने नवंबर 2009 में सदन पटल पर जो रिपोर्ट रखी थी उसमें बताया था कि प्रधानमंत्री राहत पैकेज के नाम पर जो 3750 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं।
विदर्भ जन आंदोलन समिति और विदर्भ शेतकारी विधवा संघटना की ओर से यवतमाल जिले के वांदाकोड़ा में 1 जून से शुरू हुए अनिश्चितकालीन धरने के बाद विदर्भ जन आंदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी ने कहा कि हम अपनी मांग लेकर दिल्ली जाएंगे क्योंकि राज्य सरकार एक बार फिर 7650 करोड़ के सिचाईं पैकेज की मांग कर रही हैं। हमारी मांग है कि यह पैसा भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े बल्कि विदर्भ के तीस लाख किसानों के हित में खर्च किया जाए। किशोर तिवारी कहते हैं कि विदर्भ में पैकेज के नाम पर लूटपाट का बोलबाला है और किसानों की हालत जस की तस बनी हुई है। वे मांग कर रहे हैं कि राहत पैकेज की सीबीआई जांच करवाई जाए ताकि राहत के नाम पर भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सके और विदर्भ की विधवाओं को उनका वाजिब हक मिल सके। किशोर तिवारी कहते हैं कि राहत पैकेज के नाम पर राज्य के नौकरशाह बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कुछ नेताओं के साथ मिलकर पैसों की बंदरबाट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विदर्भ में किसान आत्महत्याएं बदस्तूर जारी हैं। ऐसे वक्त में भी अगर हमारे नौकरशाह इतने संवेदनहीन और व्यापारिक कंपनियां अपना मुनाफा देख रही हैं तो यह राष्ट्र और महाराष्ट्र की सरकार के लिए डूब मरने की बात है।
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शनिवार, मई 15, 2010
यूएलसी और सात-बारा को बीच अटकी किसानों की जमीन
खेती के लिए कर्ज देने से कतरा रहे हैं बैंक
फसल नष्ट होने पर नहीं मिल रहा है मुआवजा
संजय कुमार
नागपुर। राज्य सरकार की ओर से यूएलसी कानून समाप्त होने बाद भी जिले के करीब दो हजार किसान किसी ने किसी कारण अपनी ही जमीन का मनमानी उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। पहले से ही सात बारा में चढ़ी जमीनों को जब यूएलसी में शामिल किया गया तब तो किसानों को इस बात को लेकर बड़ी खुशी हुई थी, उनके जमीन को अच्छी कीमत मिलेगी। लेकिन धीरे-धीरे इस कानून का खामियाजा उभर का सामने आया। सूत्रों की मानें तो सात-बारा की जमीन यूएलीसी में आने से सैकड़ों किसानों की हजारों एकड़ खेतियां गैर-कृषि योग्य हो गईं। लेकिन कसानों के जमीनें उनकी उनकी मुहमांगी कीमतों में भी नहीं बिकीं। इसलिए इन खेतों पर कृषि कार्य जारी रहा। लेकिन अब इन जमीनों पर कृषि कार्य के लिए बैंकों ने किसानों को कर्ज देने से पल्ला झाड़ लिया है। बैंक यह कह कर किसानों को कर्ज नहीं दे रहे हैं कि उनकी जमीन यूएलसी में आने से वे गैर-कृषि जमीन हो चुकी हैं। इसके साथ ही इन जमीनों में पर हुई खेती में गत महीनों में हुए प्राकृतिक आपदाओं से नष्ट फसलों के मुआवजे के रूप में सरकार से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ। सरकारी अमले ने भी यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यूएलसी जमीन खेती के लिए नहीं है। इसलिए उस जमीन पर नष्ट हुई फसल की भरपाई सरकार नहीं कर सकती हैं। विदर्भ जन आंदोलन समिति के प्रमख किशोर तिवारी ने बताया कि दरअसल सरकार का यह कानून किसानों के लिए था ही नहीं। बिल्डरों ने पहले ही सैकड़ों एकड़ कृषि की जमीन खरीद ली थी। फिर बाद में सरकार पर दवाब डाल कर उसे यूएलसी में करवा लिया। जिन किसानों की जमीन शहरों से बहुत दूर थी, वे भी इस कानून के चंगुल में बुरी तरह से फंस चुके हैं। फार्म हाऊस के रूप में भी ये जमीने नहीं बिक रही हैं। वहीं शहर के समीप स्थित खेती के जमीनों को किसानों ने पहले की खरीद लिया था। कानून का लाभ उन्हें ही ज्यादा मिला है। पहले से ही किसान खेती की जमीन व्यवसायिक होने से उसकी कीमत बढ़ तो गई, लेकिन ग्राहक नहीं मिल रहे रहे हैं। जब तक जमीन बिक नहीं रही है, तब तक खेती कार्य जारी है और इस खेती पर सरकार और बैंकों का अपेक्षित सहायोग नहीं मिलपा रहा है।
जानकारों की मानें तो यूएलसी कानून समाप्त करने के कुछ ही दिन पहले सरकार ने पारशिवनी के लगभग 350 किसानों की भूमि के सात-बारा पर यूएलसी का नाम चढ़ा दिया था। नाम दर्ज होने के उन्हें बुआई के लिए कर्ज से वंचित होना पड़ रहा है। इसको लेकर स्थानीय विधायक आशीष जैसवाल ने एक आंदोलन भी शुरू किया था। तब सरकार ने सात-बारा से यूएलसी का नाम हटाने का आश्वासन दिया था। लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया।
ज्ञात हो कि वर्ष 1976 में राज्य सरकार ने यूएलसी कानून लागू किया था। इसके बाद राज्य में बड़े पैमाने पर यूएलसी कानून अंतर्गत जमीनों का अधिग्रहण किया गया था। पारशिवनी तहसील के खंडाला, मिरज, कांदरी, सिरोहा, कन्हान की लगभग 750 एकड़ भूमि यूएलसी कानून के तहत अधिग्रहीत की गई थी। अधिग्रहण के समय यह कहा गया था कि इसका उपयोग औद्योगिक कार्य के लिए होगा। लेकिन अब इन जमीनों पर औद्योगिकीकरण का विकास नहीं हो पाया तो इन्हें यूएलसी से मुक्त कर फिर से कृषि क्षेत्र घोषित कर दिया गया। लेकिन रिकार्ड में सात-बारा के साथ-साथ यूएलसी के नाम इन खेतियों के दर्ज होने से किसान परेशानियों में फंस गए हैं। नियमानुसार उनकी जमीन न औद्योगिक कार्य के लिए रही और न ही कृषि कार्य के लिए।
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गुरुवार, अप्रैल 29, 2010
प्यासे कंठ सबक सिख रहे हंै नौनिहाल
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राज्य के गडचिरौली जैसे पिछड़े इलाके में विकास के लिए बिजली सड़क की सुविधा तो दूर यदि स्कूलों में पढऩे वाले नौनिहालों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं कराया जाए तो वे भला क्या करेंगे? प्यासे कंठ स्कूलों में मास्टर जी के बताये सबक भला वे कैसे आत्मसात करेंगे? ऐसे में यदि ये बच्चे बड़े होकर हाथ में बंदूक लेकर लोकतंत्र के खिलाफ लड़े तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कुछ ऐसी ही स्थिति बनी हुई के नागपुर डिविजन के छह जिलों मेंं संचालित जिला परिषद के स्कूलों की। जहां 45 डिगी के भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए तरह रहे हैं नन्हे-मुन्ने। यह हम नहीं कह रहे हैं, यह राज्य सरकार के शिक्षा विभाग का सर्वे कह रहा है।नागपुर से संजय स्वदेश की रिपोर्ट
पानी के लिए तरस रहे हैं जिला परिषद के स्कूल
नागपुर। नगर में चारों ओर पेयजल के लिए हाहाकार मचा हुआ है। कच्ची कॉलोनियों और ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर है। इन्हीं सबके बीच राज्य शिक्षा विभाग का एक चौकाने वाला सर्वे आया है। शिक्षा का मंदिर माने जाने वाले जिला परिषद के 170 स्कूलों में पेयजल की उपलब्ध नहीं है। लिहाजा, अनुमान लगाया जा सकता है कि इन स्कूलों में पढऩे आने वाली नई पीढ़ी प्यासे रहकर मास्टर जी के बतायी हुई सबक सीख रही है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है कि जब सरकार ने बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार कानून बना दिया हो। प्यासे बच्चे भला क्या करें। घर से पानी-लाते-लाते उनका शैक्षणिक सत्र समाप्त होने का आया और अब छुट्टियां लगने की है।
आश्चर्य की बात यह है कि राज्य शिक्षा बोर्ड ने जिला परिषद के स्कूलों में यह सर्वे इस वर्ष के शुरूआत में नागपुर डिवीजन के छह जिलों में कराई थी, जब मौसम इतना गर्म नहीं था और पानी के लिए हाहाकार नहीं था। रिपोर्ट अब आई है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जब जनवरी-फरवरी के मौसम में पेजयल की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, तब स्थिति इतनी गंभीर थी, तो अप्रैल माह में जब चारों ओर पानी कि किल्लत रही है, तब तो निश्चय ही इन स्कूलों में पढऩे आने वाले बच्चे बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे होंगे। सर्वे में शामिल जिलों में नागपुर के अलावा चंद्रपुर, गोंदिया, वर्धा, भंडारा और गडचिरौली के स्कूलों को शामिल किया गया था। सर्वे में सबसे ज्यादा स्कूल गड़चिरौली जिले के 83 स्कूल, गोंदिया के 56 स्कूलों को शामिल किया गया था। इस सर्वे में नागपुर के 17 और चंद्रपुर के 10 और सबसे कम भंडारा जिले के 4 स्कूलों को शामिल किया गया था। लेकिन कहीं पानी की उपलब्धता को लेकर स्थिति संतोषजनक नहीं मिली।
शिक्षा विभाग के अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह स्थिति और भी गंभीर है। गडचिरौली जैसे पिछड़े जिलों के बारे मे क्या कहना? सबसे ज्यादा गंभीर संकट इसी पिछड़े जिले में हैं। सर्वे में उन स्कूलों को जोड़ा गया, जहां पाइप लाइन की सुविधा नहीं है। उन स्कूलों को बच्चे दूर-दूर से पानी लेकर स्कूल आते हैं, जिससे कि पढ़ाई के दौरान उनका कंठ सूखे तो उसे तर कर सके। ज्ञात हो कि यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार स्कूलों में बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लाखों रुपये की निधि देती है। इसके बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों को स्कूलों पेयजल, शौचाय, कक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। यहां शिक्षा ग्रहण करने आने वाली पीढ़ी के इन सुविधाओं से महरूम रहने से यह स्पष्ट है कि लाखों की निधि यहां पहुंचती ही नहीं है। इन स्कूलों में मिड डे मील योजना के तहत अनाज भी दिया जाता है। अनुमान लगया जा सकता है कि जब यहां पानी जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो फिर इन अनाजों से भोजन कैसे तैयार किया जा सकता है। इस संबंध में बातचीत के लिए शिक्षा विभाग के उप निदेशक मुरलीधर पवार से संपर्क किया गया तो उनका फोन बंद मिला।
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सोमवार, अप्रैल 26, 2010
लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
लोकतंत्र में नक्सलियों की अप्रत्यक्ष भागीदारी
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर। विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
गड़चिरोली के ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुने गए नक्सल समर्थित उम्मीदवार
संजय स्वेदश
नागपुर। विदर्भ के नक्सलग्रस्त जिले गड़चिरोली में ग्राम पंचायत चुनाव का आयोजन कर प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा रहा हो। लेकिहन हकीकत यह है कि कई उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। निर्विरोध चुने गए उम्मीद नक्सल समर्थक माने जा रहे हैं। लोकतंत्र का विरोध करने वाले नक्सली अब अपने समर्थक उम्मीदवरों को जनप्रतिनिधि बनाने के लिए रणनीति पर काम कर रहे हैं। गड़चिरोली जिले में रविवार को 266 ग्राम पंचायतों के लिए चुनाव हुआ। लेकिन इसके पहले ही पूरे 906 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं। इन 906 में से कई लोगों के नक्सलियों के प्रभाव से चुनाव जीतने की खबरें मिलने से प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। जो 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें से ही कई उम्मीदवार सरपंच या उपसरपंच बन जाएंगे क्योंकि नक्सलियों का ऐसा ही आदेश है। यह पहला मौका नहीं है जब नक्सली गड़चिरोली जिले में कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से करते हैं।
जानकार कहते हैं कि गड़चिरोली जिले में नक्सली कई ग्राम पंचायतों का संचालन अपने ढंग से वर्षों से करते आए हैं। सरकार से मिलने वाली निधि का उपयोग सरपंच के माध्यम अपने लिए करते आए हैं। हालांकि प्रशासन इस बात से इंकार करता आया है। लेकिन कई अधिकारी दबी जुबान से यह बात स्वीकार करते हैं। इस बार के ग्राम पंचायत चुनाव में भी नक्सलियों ने अपना प्रभाव दिखाया है। जो उम्मीदवार ग्राम पंचायत चुनाव में निर्विरोध चुनकर आए हैं उनमें अधिकतर उम्मीदवार उन इलाकों की ग्राम पंचायतों से हैं जहां नक्सलियों का ज्यादा प्रभाव है। रविवार को हुए ग्राम पंचायत चुनाव में भी कई नक्सल समर्थक उम्मीदवारों के ही चुनकर आने की संभावना है। पुलिस और प्रशासन निर्विरोध चुनकर आए उम्मीदवारों पर बारीकी से नजर रखे तो कई बातें उजागर हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रशासन ने गड़चिरोली जिले में 342 ग्रामपंचायतों में चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था लेकिन नक्सलग्रस्त इलाकों की अधिकांश ग्राम पंचायतों में 906 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए। 239 ग्राम पंचायतों के 516 प्रभागों से यह उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए हैं। इसी कारण रविवार को महज 266 ग्रा.पं. में ही चुनाव हुए। इसके लिए 736 मतदान केंद्र बनाए गए थे।
सोमवार, अप्रैल 19, 2010
भाजपा का दामन थाम सकते हैं प्रकाश आंबेडकर

दलित वोटों के लिए छोटे आंबेडकर को अपने पक्ष में मिलाने के लिए भाजपा पहले से ही है तैयार
नागपुर। दलित वोटों की राजनीतिक मारामारी में भाजपा भी खम ठोंककर मैदान में उतरने की पूरी तैयारी में है। इसके लिए एक रणनीतिबद्ध तरीके से भाजपा के प्रतिनिधि बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर को अपने साथ मिलाने के प्रयास में हैं। पूछने पर भले ही प्रकाश आंबेडकर इस बात से इनकार करें। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा और आंबेडकर दोनों की राजनीतिक मजबूरी है कि वे एक हो जाएं। सूत्रों का कहना है कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो जून में विदर्भ में दो जिलों में होने वाले परिषद के चुनाव में प्रकाश आंबेडकर के साथ भाजपा का गठबंधन हो सकता है। मतलब कांग्रेस को करारी शिकस्त देने के लिए भाजपा की भारिप बहुजन महासंघ साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतरेंगे। जानकारों की मानें तो यह दोनों की दलों की राजनीतिक मजबूरी है। भारिप बहुजन महासंघ अपने दम पर सत्ता में नहीं आ सकती। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी हार से सहमी हुई है। नये अध्यक्ष कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। वहीं दूसरी ओर रिपब्लिकन पार्टी के दूसरे घटक और प्रकाश आंबेडकर का भरोसा नहीं है। हालांकि रिपाई नेता रामदास आठ्वल्ले अभी भी प्रकाश आंबेडकर से उनके साथ मिलकर मजबूत होने का आह्वान करते हैं। लेकिन प्रकाश आंबेडकर कई मौके पर खुले आम कांग्रेस की अलोचना करने के साथ यह कह चुके हैं कि रिपाई के दूसरे घटक कभी भी कांग्रेस के साथ खड़े हो सकते हैं। इसलिए रिपाई घटकों के साथ उनका गठबंधन होने का कोई सवाल ही नहीं है।
हालांकि अभी भी प्रकाश आंबेडकर अभी भी भाजपा से दूरी बनाये दिख रहे हैं। लेकिन सूत्रों का कहना है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देशन में भाजपा के प्रतिनिधि प्रकाश आंबेडकर से संपर्क में है। नितिन गड़करी के साथ प्रकाश आंबेडकर के रिश्ते भी मधुर माने जाते हैं। यदि इस चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिलती तो राष्ट्रीय स्तर पर गडकरी की काफी किरकिरी हो सकती है। इसलिए दोनों जिला परिषद के चुनाव को जीतने के लिए भाजपा हर जोखिम लेने को तैयार है। वैसे भी भाजपा के पास अभी कोई कद्दवार दलित नेता नहीं है जिससे कि वह हिंदुत्व के वोट बैंक के साथ ही दलित वोट बैंकों पर कुछ सेंध लगा सके। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी की कमान संभालने के बाद यह साफ कह दिया था कि उनका लक्ष्य पार्टी के मौजूदा वोट प्रतिशत में दस प्रतिशत बढ़ाना है। इसके लिए भाजपा नए मित्रों व नए क्षेत्रों में पहुंच बनाने में परहेज नहीं करेगी। यदि प्रकाश आंबेडकर भाजपा के साथ आते हैं तो इससे भाजपा को न केवल विदर्भ में लाभ मिलेगा। बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा। अनेक घटनाक्रमों में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के प्रति दलित का विश्वास घटता जा रहा है। इस लिहाजा से भी प्रकाश आंबेडकर भाजपा के लिए काफी लाभकारी हो सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि एक सीमित क्षेत्र में केवल अपनी पार्टी के दम पर प्रकाश आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति से ओझल है। यदि वे भाजपा का दामन थामते हैं तो लोकसभा से पूर्व उनके राज्य सभा में जाने की राह भी असान हो सकती है। पिछले दिनों में प्रकाश आंबेडकर ने इस बात का संकेत दे दिया था कि कांग्रेस आलाकमान यदि पृथक विदर्भ आंदोलन को समर्थन नहीं देता है तो वे अपनी रणनीति बदलने से परहेज नहीं करेंगे। अभी तब वे भाजपा से दूर-दूर खड़े दिख रहे थे। लेकिन भविष्य में भी ऐसा होगा यह जरूरी नहीं।
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अब तेंदुए पर गड़ी शिकारियों की कातिल नजर
देशभर में पहली तिमाही में मारे गए 291 तेंदुए, विदर्भ में आधे दर्जन से ज्यादा
संजय स्वदेश
नागपुर। बाघ की खालों और अन्य सामग्री के अवैध व्यापार को रोकने के लिए देशभर में कड़ी सुरक्षा होने के बाद अब शिकारियों की खतरनाक नजर तेंदुए को लग गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल और हड्डियों की अच्छी खासी मांग है। पर्यावरण प्रेमी और वन्य अधिकारियों का अनुमान है कि हर साल देशभर में करीब 500 तेंदुओं का शिकार होता है। इसमें विदर्भ के जंगलों के तेंदुए भी शामिल हैं। वन विभाग के सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र के जंगल ही नहीं देशभर के जंगलों से तेंदुए उसी तरह से गायब हो रहे हैं, जिस तेजी से बाघ गायब हो रहे थे। लेकिन सरकार का पूरा ध्यान बाघों के संरक्षण पर है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि गत तीन वर्ष में देशभर में तेंदुओं की संख्या का आठवां हिस्सा शिकारियों का शिकार बन गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल की अपेक्षा उनकी हड्डियों की मांग ज्यादा है। खासकर चीन में यह मांग अधिक है। यहां इन हड्डियों का इस्तेमाल दवाएं बनाने में होता है। स्थानीय शिकारी तेंदुए की खाल के लिए करीब 20 से 35 हजार रुपये तक कीमत पाते हैं। बड़े शहरों में सौदा तय होने पर खाल की कीमत 50 हजार रुपये तक भी हो जाती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक लाख रुपये तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में करीब 8,000 तेंदुए हैं। देश में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा तेंदुओं की हड्डियों और खाल के अवैध व्यापार का मुख्य केंद्र माना जाता है।
वन विभाग सूत्रों का कहना है कि इस साल की पहली तिमाही में देश भर में करीब 291 तेंदुए मारे गए हैं। इसमें आधे दर्जन से भी ज्यादा संख्या के तेंदुए विदर्भ के जंगलों के हैं। वर्ष 2009 में 290 और 2008 में 157 तेंदुए मारे गए थे। गत पर जहां एक साल में 290 तेंदुए मारे गए थे, वहीं यह आंकड़ा इस वर्ष की पहली तिमाही में ही पूरी हो गई। मतलब साफ है कि हर दिन कम से कम तेंदुए शिकारियों के हाथ लग रहे हैं। यदि तेंदुए की शिकार की गति इसी तेजी से बढ़ती रही तो आने वाले पांच से सात वर्षों में भारत से तेंदुए की प्रजाति ही समाप्त हो सकती है। जानकारों का कहना है कि बाघों की गणना चलने से वन विभाग के अधिकारी खासे सक्रिय है। इसलिए शिकारियों ने तेंदुओं को शिकार बनाना शुरू कर दिया है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 के अुनसार वन क्षेत्र के किसी भी जीव का शिकार अपराध है। पर यह कानून संगठित वन्य जीवन अपराध को रोकने में नकाम साबित हो रहा है।
संजय स्वदेश
नागपुर। बाघ की खालों और अन्य सामग्री के अवैध व्यापार को रोकने के लिए देशभर में कड़ी सुरक्षा होने के बाद अब शिकारियों की खतरनाक नजर तेंदुए को लग गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल और हड्डियों की अच्छी खासी मांग है। पर्यावरण प्रेमी और वन्य अधिकारियों का अनुमान है कि हर साल देशभर में करीब 500 तेंदुओं का शिकार होता है। इसमें विदर्भ के जंगलों के तेंदुए भी शामिल हैं। वन विभाग के सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र के जंगल ही नहीं देशभर के जंगलों से तेंदुए उसी तरह से गायब हो रहे हैं, जिस तेजी से बाघ गायब हो रहे थे। लेकिन सरकार का पूरा ध्यान बाघों के संरक्षण पर है। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि गत तीन वर्ष में देशभर में तेंदुओं की संख्या का आठवां हिस्सा शिकारियों का शिकार बन गया है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेंदुए की खाल की अपेक्षा उनकी हड्डियों की मांग ज्यादा है। खासकर चीन में यह मांग अधिक है। यहां इन हड्डियों का इस्तेमाल दवाएं बनाने में होता है। स्थानीय शिकारी तेंदुए की खाल के लिए करीब 20 से 35 हजार रुपये तक कीमत पाते हैं। बड़े शहरों में सौदा तय होने पर खाल की कीमत 50 हजार रुपये तक भी हो जाती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक लाख रुपये तक पहुंच जाती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि देश में करीब 8,000 तेंदुए हैं। देश में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा तेंदुओं की हड्डियों और खाल के अवैध व्यापार का मुख्य केंद्र माना जाता है।
वन विभाग सूत्रों का कहना है कि इस साल की पहली तिमाही में देश भर में करीब 291 तेंदुए मारे गए हैं। इसमें आधे दर्जन से भी ज्यादा संख्या के तेंदुए विदर्भ के जंगलों के हैं। वर्ष 2009 में 290 और 2008 में 157 तेंदुए मारे गए थे। गत पर जहां एक साल में 290 तेंदुए मारे गए थे, वहीं यह आंकड़ा इस वर्ष की पहली तिमाही में ही पूरी हो गई। मतलब साफ है कि हर दिन कम से कम तेंदुए शिकारियों के हाथ लग रहे हैं। यदि तेंदुए की शिकार की गति इसी तेजी से बढ़ती रही तो आने वाले पांच से सात वर्षों में भारत से तेंदुए की प्रजाति ही समाप्त हो सकती है। जानकारों का कहना है कि बाघों की गणना चलने से वन विभाग के अधिकारी खासे सक्रिय है। इसलिए शिकारियों ने तेंदुओं को शिकार बनाना शुरू कर दिया है। जबकि वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 के अुनसार वन क्षेत्र के किसी भी जीव का शिकार अपराध है। पर यह कानून संगठित वन्य जीवन अपराध को रोकने में नकाम साबित हो रहा है।
सोमवार, अप्रैल 12, 2010
अलग से हो ओबीसी की जनगणना
अलग से हो ओबीसी की जनगणना : छगन भुजबल
नागपुर। महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने कहा है अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण की व्यवस्था मजबूत करने के लिए जनगणना में ओबीसी अलग से निष्कर्ष निकलनी चाहिए। सिविल लाइन्स स्थित रवि भवन में पत्रकारों से बातचीत में भुजबल ने कहा कि जिस तरह से जनगणना में अनुसूचिज जाति, जन जाति के लिए अलग कॉलम रख कर उनकी संख्या और अन्य निष्कर्ष निकाला जाता है, उसी तरह से ओबीसी की संख्या के साथ अन्य मामलों पर डाटा जारी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे राज्य में ओबीसी के नेता विशेषकर लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव आदि को भी अपनी पार्टी की ओर से जनगणना में ओबीसी को शामिल करने का मुद्दा उठाना चाहिए, जिससे कि केंद्र सरकार पर इस बात का दावब पड़े और वह जनगणना में ओबीसी को शामिल कर सके।

शनिवार को पृथक विदर्भ के मुद्दे पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुधीर मुनगंटीवार के भाजपा-शिवसेना गठबंधन के मुद्दे पर पूछे गए सवाल में भुजबल ने कहा कि शिवसेवा अपने कार्यों के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है। विदर्भ मुद्दे पर गठबंधन की सरकार का जो निर्णय होगा, उसका हमारा समर्थन रहेगा। किसान आत्महत्या के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि पत्रकारों को किसानों की समस्या जोरदार तरीके से उठानी चाहिए।
आईपीएल में लगाए जाने वाले टैक्स के विषय में चर्चा करते हुए भुबजल ने कहा कि आईपीलएल काफी लोकप्रिय हो रहा है। यदि दूसरे राज्य अपने यहां होने वाले वाले आईपीएल मैच पर किसी तरह का कर लगाते हैं तो महाराष्ट्र सरकार भी इस पर विचार करेगी।
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रविवार, मार्च 28, 2010
24 घंटे में नौ किसानों ने की आत्महत्या
2010 में अब तक 194 मरें
संजय स्वदेश
विदर्भ में सूखे की मार से त्रस्त किसानों को राहत से किसी तरह से राहत नहीं मिलने के कारण वे खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। बीते 24 घंटे में विदर्भ के विभिन्न जिलों में कुल नौ किसानों ने मौत का गले लगा लिया है। इस तरह से बीते सप्ताह में कुल 19 किसानों ने बदहाली से तंग आकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली है। ज्ञात हो क विदर्भ ही नहीं महाराष्ट्र के 15 हजार गांवों को पहले ही सूखा घोषित किया जा चुका है। पर किसानों को सूखे से राहत दिलाने के लिए किसी तरह की ठोस उपया योजना का क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा है। इससे किसानों को न केवल भारी मात्रा में फसलों का नुकसान हो रहा है, बल्कि उनके सामने भूखे मरने की नौबत तक आ गई है। किसान आत्महत्या के मामले में विदर्भ पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है।
सूखे के कारण विदर्भ के किसानों के फसलों के हुए नुकसान से राहत दिलाने के लिए पिछले साल के फसल ऋण पर वित्तीय राहत और ब्याज छूट देने की सख्त जरूरत है। लेकिन गत दिनों राज्य सरकार ने अपने बजट में सूखे से बदहाल किसानों को किसी तरह की राहत नहीं प्रदान की है। खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य संकट और वित्तीय सहायता के लिए किसान ललचायी भरी नजरों से आस लगाए हुए हैं। कई किसान ऐसे हैं, जो गंभीर रूप से बीमारा है और उनके सामने घर के बेटियों की शादी की चिंता खाये जा रही है।
विदर्भ जनआंदोलन समिति के प्रमुख किशोर तिवारी कहते हैं कि किसान बदहाली में मदद के लिए अभी भी केंद्र सरकार की ओर टकटकी भरी नजरों से देख रहे हैं। किसानों की बदहाली का सबसे बड़ा करण है कि सरकार की वह नीति जिसमें किसानों को बी.टी.कपास उगाने को प्रोत्साहन दिया गया। इस फसल से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। दूसरी ओर सिंचाई के लिए पर्याप्त जल नहीं होने से स्थिति ओर गंभीर हो गई है।
nagpur se
संजय स्वदेश
विदर्भ में सूखे की मार से त्रस्त किसानों को राहत से किसी तरह से राहत नहीं मिलने के कारण वे खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। बीते 24 घंटे में विदर्भ के विभिन्न जिलों में कुल नौ किसानों ने मौत का गले लगा लिया है। इस तरह से बीते सप्ताह में कुल 19 किसानों ने बदहाली से तंग आकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली है। ज्ञात हो क विदर्भ ही नहीं महाराष्ट्र के 15 हजार गांवों को पहले ही सूखा घोषित किया जा चुका है। पर किसानों को सूखे से राहत दिलाने के लिए किसी तरह की ठोस उपया योजना का क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा है। इससे किसानों को न केवल भारी मात्रा में फसलों का नुकसान हो रहा है, बल्कि उनके सामने भूखे मरने की नौबत तक आ गई है। किसान आत्महत्या के मामले में विदर्भ पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है।
सूखे के कारण विदर्भ के किसानों के फसलों के हुए नुकसान से राहत दिलाने के लिए पिछले साल के फसल ऋण पर वित्तीय राहत और ब्याज छूट देने की सख्त जरूरत है। लेकिन गत दिनों राज्य सरकार ने अपने बजट में सूखे से बदहाल किसानों को किसी तरह की राहत नहीं प्रदान की है। खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य संकट और वित्तीय सहायता के लिए किसान ललचायी भरी नजरों से आस लगाए हुए हैं। कई किसान ऐसे हैं, जो गंभीर रूप से बीमारा है और उनके सामने घर के बेटियों की शादी की चिंता खाये जा रही है।
विदर्भ जनआंदोलन समिति के प्रमुख किशोर तिवारी कहते हैं कि किसान बदहाली में मदद के लिए अभी भी केंद्र सरकार की ओर टकटकी भरी नजरों से देख रहे हैं। किसानों की बदहाली का सबसे बड़ा करण है कि सरकार की वह नीति जिसमें किसानों को बी.टी.कपास उगाने को प्रोत्साहन दिया गया। इस फसल से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। दूसरी ओर सिंचाई के लिए पर्याप्त जल नहीं होने से स्थिति ओर गंभीर हो गई है।
nagpur se
रविवार, मार्च 14, 2010
पृथक विदर्भ के लिए गरजे गडकरी
संजय स्वदेश
नागपुर। पृथक विदर्भ के लिए निकाले गए विदर्भजन जागरण यात्रा का रविवार को नागपुर के यशवंत स्टेडियम में समापन हुआ। इस मौके पर आयोजित जनसभा को संबोधित करने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी उपस्थित हुए। उनके समर्थन देने के लिए लोकसभा में विपक्ष के उपनेता गोपीनाथ मुंडे, छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री डॉ. रमन सिंह, उत्तरांचल के मुख्यमंत्री रमेश पोखरिया, झारखंड के उपमुख्य मंत्री रघुवरदास, महाराष्ट्र राज्य विधान सभा में विपक्ष के नेता एकनाथ खड़से, सांसद हंसराज अहीर, पूर्व सांसद बनवारी लाल पुरोहित, किसान नेता भाऊसाहब फुंडकर समेत कई स्थानीय नेता मंच पर एकजुट हुए।
भाजपाध्यक्ष नितिन गडकरी ने पृथक विदर्भ राज्य का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि यह मांग 1956 से की जा रही है यदि विदर्भ का बैकलॉग नहीं बढ़ता, बिजली की समस्या नहीं होती, किसान आत्महत्या नहीं करते सिंचन व्यवस्था बैगलॉग नहीं बढ़ता, रोजगार की समस्या पर ध्यान दिया जाता तो आज पृथक विदर्भ की मांग नहीं उठती। लेकिन ऐसा हो न सका। उन्होंने कहा कि इसी यशवंत स्टेडियम में नागपुर की मिहान परियोजना संबंधित सभा हुई थी। हजारों की संख्या में लोग जमा हुए थे। यहां तक कि लोग स्टेडियम के बाहर खड़े थे, पर क्या हुआ उस मिहान का? आज राज्य के मुख्यमंत्री के पास मिहान के समय नहीं है। उन्होंने कहा है कि लोग विदर्भ का कुप्रचार कर रहे हैं कि विदर्भ आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हो सकता। वे जनता को बहकाने की काशिश कर रहे हैं। विदर्भ के साथ अन्याय बदस्तूर जारी है। यहां तक मंत्री मंडल में भी विदर्भ उपेक्षा की जा रही है। सारे महात्वपूर्ण विभाग मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के नेताओं के पास हैं विदर्भ के मंत्रियों के पास कोई महत्वपूर्ण विभाग नहीं है। राज्य बजट के मात्र दो प्रतिशत वाले विभाग विदर्भ के मंत्रियों के पास है। गड़करी ने कहा कि विदर्भ के दो सांसदों ने बताया कि वे विदर्भ का मुद्दा संसद में उठाएंगे। विदर्भ की मांग सिर्फ भाजपा की नहीं बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियों की है। विदर्भ के पास वनों की अपार संपदा है। गढ़चिरौली राज्य का सबसे श्रीमंत जिला है। चंद्रपुर गोंदिया, भंडारा, गढ़चिरोली में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। सरकार विदर्भ के साथ भेद-भाव करती आ रही है। 25-30 साल बीत जाने के बाद भी एक भी प्रकल्प सरकार पूरा नहीं कर सकी। जबकि पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाडा और मुंबई का विकास होता चला जा रहा है। उन्होंने इन क्षेत्रों के विकास का विरोध करते हुए कांगे्रस से विदर्भ विकास का आह्वान किया। गडकरी ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने तीन राज्य बनाए जो कि आज विकास की गाथा गा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस ने तेलंगाना का क्या हाल किया है यह सबको मालूम है। उन्होंने कहा कि चमत्कार के बिना कोई नमस्कार नहीं करता इस लिए अब विदर्भ की जनता को जात-पात, धर्म-जाती भूलकर एक आंदोलन करना होगा तथी विदर्भ राज्य की स्थापना होगी।
संसद में मुंडे उठाएंगे विदर्भ का मुद्दा
गोपीनाथ मुंडे ने कहा कि वे इसी हफ्ते संसद में विदर्भ का मुद्दा उठाएंगे। आज यहां पर तीन राज्य मुख्यमंत्री उपस्थित हैं यदि विदर्भ बनता है किसी तीसरे सम्मेलन में चार राज्य के मुख्यमंत्री छोटे राज्यों के समर्थन में एकत्रित होंगे। उन्होंने कहा कि वे विदर्भ ही नहीं तेलंगाना के भी पक्ष में हैं। मुंडे ने कहा विदर्भ पर सभी प्रकार के अन्याय के साथ राजनीतिक अन्याय भी हो रहा है। मुर्गीपालन, मछली पालन, जैसे मामूली विभाग विदर्भ के मंत्रियों के पास हैं, जबकि पश्चिम महाराष्ट्र मराठवाडा के पास सभी महत्वपूर्ण विभाग हैं। वन तो विदर्भ का है लेकिन वन मंत्री सांगली का है। उन्होंने विदर्भ पर किए गए खर्च की श्वेत पत्र प्रकाशित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि संसद में जब तेलंगाना का प्रस्ताव आएगा तो वे उसे सुधारिक कर विदर्भ के प्रस्ताव की भी मांग करेंगे। और महिला आरक्षण की तर्ज पर उसे पारित करेंगे। मुंडे ने कहा कि हिंदी राज्य के तुकड़ेे होने से हिंदी मुख्य मंत्रियों संख्या बढ़ी है। यदि विदर्भ बनता है तो दो मुख्यमंत्री मराठी भाषी होंगे।
रमेश पोखरिया ने कहा
उत्तरांचल के मुख्यमंत्री रमेश पोखरिया ने कहा 1952 से उत्तरांचल की जनता लगातार अलग राज्य की मांग कर रही थी। लेकिन आखिर अटलजी ने तीनों राज्य के निर्माण को हरी झंडी दिखाई और आज तीनों राज्य न सिर्फ सक्षम हैं बल्कि विकास की परिभाषा भी लिख रहे हैं। यदि विदर्भ से लोगों का पलायान रोकना है तो पृथक राज्य का निर्माण हर हाल मे करना ही होगा। विदर्भ के पास सारे संसाधन है। उन्होंने 'आज दो अभी दो अपना विदर्भ राज्य दोÓ का नारा दिया।
डॉ रमणसिंह ने कहा...
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमणसिंह ने कहा कि जो लोग ये कहते हैं कि छोटे राज्यों का विकास नहीं हो सकता, वे गलत है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र से पहले पलायन होता था, लेकिन अलग राज्य बनने से न सिर्फ पलायान रूका बल्कि प्रति व्यक्ति आय में वृध्दि हुई है। उन्होंने कहा कि यदि ईमानदारी से पहल की गई होती तो दस साल पहले ही विदर्भ बन जाता। उन्होंने कहा कि आज देश में विदर्भ को किसान आत्महत्या के रूप में जाना जाता है यह विदर्भ की दयनीय पहचान है। अब जनता जाग चुकी है। दुनिया की कोई ताकत अब विदर्भ निर्माण को रोक नहीं सकती।
घुवरदास ने कहा...
झारखंड के उप-मुख्यमंत्री रघुवरदास ने कहा कि वे मुख्यमंत्री शिबू-सोरेन और वहां की जनता की ओर से विदर्भ के लिए शुभकामनाएं लेकर आए हैं। भाजपा छोटे राज्यों की पक्षधर रही है। केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार ने आंदोलन को खरीदने का काम किया है। जनता जाग चुकी है अब विदर्भ को कोई रोक नहीं सकता।
स्थानीय नेता बोले...
राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता एकनाथ खडसे ने कहा कि विदर्भ की मांग बहुत पुरानी है। उन्होंने कहा कि सरकार कहती रही कि विदर्भ पर अन्याय नहीं होने देंगे विकास के लिए भरपूर निधि देेंगे, लेकिन आज दिख रहा है कि विदर्भ पर अन्याय हो रहा है। विदर्भ की जनता ने जिस गर्मजोशी से जनजागरण यात्रा का स्वागत किया वह यह साबित करता है कि अब विदर्भ दूर नहीं।
भाऊ साहब ने यशवंत राव चव्हाण से लेकर आज तक के कांगे्रस नेताओं के विदर्भ के लिए दोषी ठहराया और कहा कि यहां के रास्ते, बिजली सिंचाई सब कांग्रेसी नेता लेगए। भाजपा विदर्भ के आंदोलन को गांव-गांव पहुंचाएगी।
विधायक फडणवीस ने विदर्भ के साथ हुए अन्याय का सविस्तार वर्णन करते हुए कहा कि विदर्भ मेरा अधिकार है मैं उसे लेकर रहूंगा। विधायक सुधीर मुनगट्टीवार ने कहा कि विदर्भ की लड़ाई किसी पार्टी की नहीं बल्कि आम आदमी की लड़ाई है। युवाओं को आवहान करते हुए उन्होंने कहा कि जब युवा इस आंदोलन की जिम्मेदारी अपने कंधो पर लेंगे तब विदर्भ का निर्माण होगा। समारोह में विधायक देवेंद्र फडणवीस और सुधीर मुनगट्टीवार को हल देकर सम्मानित किया गया।
शनिवार, मार्च 13, 2010
2356 करोड़ की हुई 48 करोड़ की परियोजना
यह वर्ष 2008-09 के मंजूर शेडयुल दर पर आधारित हो सकती है। सन 1979-80 के बाजार दर की अपेक्षा सन 2008-09 के बाजार दर 10 गुना ज्यादा होंगे, अगर इससे भी ज्यादा मान लिया जाए तो 15 गुणा ज्यादा तक अनुमान लगाया जा सकता है। इसके आधार पर भी तृतीय प्रशासकीय मान्यता 750 करोड़ तक होनी चाहिए। लेकिन वास्तव में यह 2356.57 करोड़ की है, जो प्रशासकीय मान्यता का 40 गुना से भी ज्यादा है।
वर्धा (महाराष्ट्र)। सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की एक कर्मभूमि महाराष्ट्र का वर्धा जिला भी है। पर महात्मा गांधी के सत्य और ईमानदारी से आदर्श यहां के सरकारी महकम में कम ही देखने को मिलती है। यहां शराब पर पाबंदी है। पर दूसरे जिलों की अपेक्षा यहां शराब सबसे ज्यादा बिकती है। यहां स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में अनियमितता की खबरें आए दिन सुर्खियों में होती है। अब एक नई खबर आई है।
वर्धा जिले में निर्माणाधीन 48 करोड़ रूपए की लागत वाली निम्न वर्धा प्रकल्प 2356 करोड़ रूपये की हो गई है। प्रकल्प से संबंधित राशि की यह बढ़ोतरी संबंधित अधिकारियों के लेटलतीफी से हुई है। 1979-80 के शेडयूल दर पर आधारित यह प्रकल्प 48.08 करोड़ रूपये का था। प्रकल्प के कार्य जिले में धरण, वेस्ट वेअर तथा हेड रेग्युलेटर आदि का है। सन 1998 में नहर के कार्यो की शुरूआत हुई जो लगभग पूर्ण होने की स्थिति में है।
दोनों मुख्य शाखा नहर के कार्य 80 प्रतिशत एवं वितरण प्रणाली के कार्य 40 प्रतिशत पूरे हो चुके हैं। प्रकल्प की तृतीय सुधारित प्रशासकीय मान्यता के अनुसार प्रकल्प की कीमत 2356.57 करोड़ हो चुकी है। पहली प्रशासकीय मान्यता 48.08 करोड़ वर्ष 1979-80 के शेडयूल दर पर आधारित थी, मगर तृतीय प्रशासकीय मान्यता किस वर्ष के शेडयूल दर पर आधारित है यह जानकारी देने में प्रशासन आनाकानी करता है। सूत्रों का कहना है कि यह वर्ष 2008-09 के मंजूर शेडयुल दर पर आधारित हो सकती है। सन 1979-80 के बाजार दर की अपेक्षा सन 2008-09 के बाजार दर 10 गुना ज्यादा होंगे, अगर इससे भी ज्यादा मान लिया जाए तो 15 गुणा ज्यादा तक अनुमान लगाया जा सकता है। इसके आधार पर भी तृतीय प्रशासकीय मान्यता 750 करोड़ तक होनी चाहिए। लेकिन वास्तव में यह 2356.57 करोड़ की है, जो प्रशासकीय मान्यता का 40 गुना से भी ज्यादा है। पिछले अनेक वर्षाे से कछुए की गति से इस प्रकल्प का कार्य शुरू है। प्रशासन द्वारा दी हुई जानकारी के अनुसार, वितरण प्रणाली 40 प्रतिशत पूर्ण हो चुकी है, और मुख्य नहर का कार्य 80 प्रतिशत से ज्यादा हो चुका है। पुलगांव तक का पूर्ण होने के बावजूद, करोड़ो रूपए के इस प्रकल्प के द्वारा अब तक एक एकड़ जमीन को भी पानी का नहीं नसीब है।
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