http://dastak-ekpehel.blogspot.com/2011/02/blog-post_27.html
भारतीय परिवेश के तमाम क्षेत्रों के समान ही सिनेमा के क्षेत्र में भी दलितों की स्थिति निरीह एवं लाचार हैं. भारतीय सिनेमा का नजरिया भी दलितों के प्रति कुछ खास भिन्न नहीं है. दलितों के प्रति करूणा दिखाकर भारतीय फिल्म निर्माता एवं निर्देशक अछूत कन्या, आदमी, अछूत, सुजाता, बूटपालिश, अंकुर,सदगति, वेलकम तो सज्जनपुर, पीपली लाइव, आक्रोश, भीम गर्जना, और राजनीति जैसी फिल्मों का निर्माण तो किया हैं और इनमे से कुछ फिल्मो में दलितों को केंद्र में और कुछ में सहयोगी भूमिका में दलित के चरित्र को दर्शाया भी गया हैं परन्तु जिस गंभीरता और शिद्दत से दलित जाति के प्रश्न को उठाए जाने की जरूरत है, उस तरह से इन फिल्मो ने उसको नहीं उठाया गया हैं.
हिन्दी सिनेमा के कुछ ठोस यथार्थ हैं- नौकर का नाम दीनु या रामू ही होगा, बहुत होगा तो उसके नाम के साथ काका भी जोड़ दिया जाएगा. बेशक दलित यथार्थ हिन्दी सिनेमा में पर्याप्त जगह प्राप्त नहीं कर पाया है. भारत में प्रतिरोध का सिनेमा अनुपस्थित है, फिल्मों में असली भारत कम ही दिखता है, फिल्मों में काम करने वालों में भारत की विविधता नहीं दिखती.फिल्मों में दलित हमेशा लाचार ही होता है, जबकि पिछले तीन-चार दशक भारत के दलितों के लिए प्रतिरोध के दशक रहे हैं. दलित लगान में कचरा क्यों होता है, दलित दिल्ली-6 की जमादारिन क्यों हैं, जिससे दुधमुंहे बच्चे कहते हैं कि तुम सबको बड़ा बनाती हो, हमें भी बड़ा बना दो. यह मजाक किसी पुजारिन के साथ भी तो किया जा सकता था, लेकिन नहीं, यह नहीं हो सकता. इसके साथ ही हम सुजाता फिल्म की अछूत-दलित कन्या सुजाता की दयनीय चित्रण को कैसे भूल सकते हैं.फिल्म में सुजाता नाम की दलित कन्या चुप रहनेवाली, गुनी, सुशील और त्यागी ‘मैरिज-मैरिटल’ यानी सेविका बनी है जबकि उसी परिवार-परिवेश की असली बेटी एक प्रतिभावान मंचीय नर्तकी, आधुनिका, वाचाल और अपनी मर्जी की इज्जत करनेवाली शख्सियत बनती है. हमारी फिल्मे दलितों को सबल दिखाने में हमेशा ही परहेज करती आई हैं और उसका एक सशक्त उदाहरण प्रकाश झा की नयी फिल्म राजनीति में देखा जा सकता हैं. दलितों का नेता ‘सूरज’ (अजय देवगन), जो भरी सभा में सवर्णों और ऊंचे लोगों से लोहा लेता दिखाई देता है, आखिर वह भी उसी सवर्ण परिवार में जन्मा हुआ साबित होता है. अंततः फिल्म इसी परिपाटी पर लौट आती है कि दलितों का वह मसीहा इसी कारण से इतनी घाघ राजनीति कर सका क्यूंकि उसके अन्दर उसी राजनीतिक खानदान का खून था. फिल्म की कहानी का आधार कुछ भी रहा हो, लेकिन यह सत्य है कि फिल्म समाज की दलितों के प्रति इसी तस्वीर को पुष्ट करती है किसी दलित में स्वाभाविक रूप से वर्चस्ववादी लोगों का सामना करने का साहस ही नहीं है. हमारी फिल्मो में दलितों को सबल दिखाने से परहेज क्यों किया जाता हैं? भारतीय सवर्ण दलितों से जितनी नफरत करते हैं, उतनी नफरत अमेरिका में अश्वेतों से भी नहीं की जाती.
सवाल दलितों पर फ़िल्में बनाने का नहीं है, सवाल ये है की वे जब परदे पर उतारे जाते हैं तो किस तरह का चरित्र उनमें उभारा जाता है. ज़रा सोचिये कि आत्म-बोध, आत्म-सम्मान, मनुष्यगत-अस्मिता, स्वाभिमान जैसे गुण उसमें क्यूँ नहीं होते? वह अपने तिरस्कार पर ख़ुद क्यों चीत्कार करता नहीं दिखता? वह अपने प्रति हर ज़्यादती-अत्याचार को आत्मसात करनेवाला ही क्यों है? उसकी ये छवि उसके असल जीवन में अत्याचारों के विरुद्ध उठाए प्रतिकारों-चीत्कारों को ख़ारिज करती है. उसके आत्म-सम्मान के संघर्ष को नकारती है.
जातिगत दृष्टिकोण और अन्याय का प्रतिकार करने वाली अभी तक की सबसे सशक्त फिल्म बेंडिट क्वीन ही दिखाई देती हैं जो साधारण दलित स्त्री से दस्यु सुंदरी और फिर फिर सांसद बनी फूलन देवी पर आधारित थी. इसके अलावा शायद ही कोई ऐसी फिल्म हैं जिसने दलित प्रश्न को ठीक ढंग से छुआ तक हो.
खैर..सिनेमा में दलित की स्थिति का वर्णन करने के बाद बस इतना ही कहना चाहूंगी की सिनेमा में दलित बहस का मुद्दा ना होकर सामाजिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग हैं और इसके लिए किसी बहस की ज़रुरत नहीं बल्कि सही मायनों में इसके उत्थान, विकास और सशक्तिकरण के लिए कुछ करने की ज़रुरत हैं. वैश्वीकरण और आधुनिकता की इस बयार में हम सबको यही कोशिश करनी चाहिए की समाज में दलित समुदाय की पहचान की नयी चेतना जागृत कर सके और इनको हर क्षेत्र में सशक्त पहचान दिलाई जा सके.
( विभिन्न वेबसाइट्स पर मिली जानकारी से ये पोस्ट संभव हो पायी हैं.)
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बुधवार, मार्च 02, 2011
सोमवार, अक्टूबर 18, 2010
साहित्य में टूटती शब्दों की मर्यादा
साहित्य को शर्मशार करते हंस और नया ज्ञानोदय
संजय स्वदेशनेट खंगालते-खंगालते, सहज ही मन में इच्छा हुई कि साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका हंस पढ़ी जाए। पत्रिका का अक्टूबर,2010 अंक डाउनलोड लिया। करीब एक दशक बाद हंस को पढ़ रहा था। पर यह क्या, एक दशक में काफी बदलावा दिखा। साहित्य की इस प्रतिष्ठित पत्रिका में पटना के रामधारी सिंह दिवाकर की एक कहानी रंडियां शीर्षक से छपी हैं। जिस संवदेना को कहानी का आधार बनाया गया है, उसका तानाबाना गजब का है। पर यथार्थ दिखाने के चक्कर में यह इस शब्द का प्रयोग शर्मशार करने वाला है।
कहानी के एक अंश है-
‘‘आज इस बड़का गांव में रंडिया ही रंडिया है. कहा है लाली यादव, पंडित बटैश झा, पुलकित राय, रघुनाथ भगत और बिसुनलाल तो चले गए दुनिया से, मगर उनके परिवारों से भी रंडियां पंचायत का चुनाव लड़ रही हैं. लाली यादव की परेनियां वाली बहू राधिका यादव, पंडित बटेश झा की बहू ममता झा, पुलिकित राय की पोती चंद्रकला राय... रंडियां ही रंडियां हैं. गांव में, हर उम्र की रंडिया.‘लेखक कहानी मेें जिस मुद्दे को उठाना चाहता है, उसमें सफल है। लेकिन शब्दों की ऐसी अर्मादित शैली उसकी स्तरीयता को निम्म कर देती है। सरस सलिस जैसी पत्रिकाएं ऐसे शब्दों को उपयोग कर जल्द ही लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं। लेकिन उनका स्तर साहित्यिक नहीं है। लोग खूब चटकारे लेकर पढ़ते हैं। पर एक उच्च कोटी की साहित्यिक पत्रिका में ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य की गरिमा निश्चय ही ठेस पहुंचाता है।
ज्ञात हो कि हंस के संस्थापक मुंशी प्रेमचंद थे। मुंशी प्रेमचंद ने अनेक मुद्दों को सरल और सहज शब्दों में बड़े ही प्रभावशाली तरीके से उठाया है। उनके लेखन में देशज शब्दों की भरमार है। इसके बाद भी वे शब्दों की शालीनता बनाये रखते हैं। आज वहीं हंस शब्दों की शालीनता की मार्यादा तोड़ रहा है। भले ही इस दिनों साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन अमर्यादित शब्दों का प्रयोग पाठकों के बीच लोकप्रियता पाने का सरल माध्यम बनता जा रहा है। यदि आज प्रेमचंद होते तो अपनी स्थापित इस पत्रिका को पढ़ कर निश्चय ही शर्मशार हो जाते।
पिछले दिनों नया ज्ञनोदय के अंक में भी ऐसा ही कुछ हुआ। महात्मा गांधी अंतरराष्टÑीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में प्रयुक्त एक शब्द को लेकर खूब तूल दिया गया। मजेदार बात यह रही है कि उस पर टीका-टिप्पणी करने वालों ने नया ज्ञानोदय का वह अंक पूरा पढ़ा ही नहीं। जबकि उस अंक में प्रकाशित अन्य कई रचनाओं में अनेक आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों के प्रयोग किये गए हैं। लेकिन बहस केवल विभूति नारायण के शब्दों पर छिड़ी रही। इससे सबसे ज्यादा लाभ नया ज्ञनोदय को हुआ। स्टॉल पर पत्रिका हाथो-हाथ बिक गई। इसके बाद जिस विषय को विशेषांक बनाया गया, हिंदी साहित्य में उसकी कोई विद्या या परंपरा नहीं रही है। एक साहित्यक पत्रिका को बेवफाई का सुपर विशेषांक निकालना उसी तरह लोकप्रिय होने का राह अपनाना है जैसे इंडिया टूटे, आऊटलुक पिछले कुछ वर्षों में सेक्स सर्वे पर कवर स्टोरी छाप कर क्षणिक लोकप्रियता पाई है।
बेवदुनिया ने कुछ भी लिखने पढ़ने की अजादी दी है। क्योंकि यहां अभी नियंत्रण नहीं है। लिहाजा, इंटरनेट की दुनिया में कई लेखकों की कुंठाएं साफ दिखती है। पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया अलग है। यहां यह संयम इस लिए जरूरी है, क्योंकि आज भी इसके पाठकों की दुनिया अगल है। महंगी साहित्यिक पत्रिकाएं खरीदने वाला पाठक इसलिए जेब ठीली नहीं करना चाहता है कि उसे एक यथार्थ मुद्दे को अमर्यादित शब्दों की चांसनी में परोसा मिलता है। ऐसी अपेक्षाएं तो छह रुपये में बिकने वाली सरस सलिल जैसी पत्रिकाओं से पूरी हो सकती है। यदि अश्लीलता ही पढ़ती है तो इससे अच्छा बाबा मस्तराम की किताबे सस्ती।
संजय स्वदेशनेट खंगालते-खंगालते, सहज ही मन में इच्छा हुई कि साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका हंस पढ़ी जाए। पत्रिका का अक्टूबर,2010 अंक डाउनलोड लिया। करीब एक दशक बाद हंस को पढ़ रहा था। पर यह क्या, एक दशक में काफी बदलावा दिखा। साहित्य की इस प्रतिष्ठित पत्रिका में पटना के रामधारी सिंह दिवाकर की एक कहानी रंडियां शीर्षक से छपी हैं। जिस संवदेना को कहानी का आधार बनाया गया है, उसका तानाबाना गजब का है। पर यथार्थ दिखाने के चक्कर में यह इस शब्द का प्रयोग शर्मशार करने वाला है।
कहानी के एक अंश है-
‘‘आज इस बड़का गांव में रंडिया ही रंडिया है. कहा है लाली यादव, पंडित बटैश झा, पुलकित राय, रघुनाथ भगत और बिसुनलाल तो चले गए दुनिया से, मगर उनके परिवारों से भी रंडियां पंचायत का चुनाव लड़ रही हैं. लाली यादव की परेनियां वाली बहू राधिका यादव, पंडित बटेश झा की बहू ममता झा, पुलिकित राय की पोती चंद्रकला राय... रंडियां ही रंडियां हैं. गांव में, हर उम्र की रंडिया.‘लेखक कहानी मेें जिस मुद्दे को उठाना चाहता है, उसमें सफल है। लेकिन शब्दों की ऐसी अर्मादित शैली उसकी स्तरीयता को निम्म कर देती है। सरस सलिस जैसी पत्रिकाएं ऐसे शब्दों को उपयोग कर जल्द ही लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं। लेकिन उनका स्तर साहित्यिक नहीं है। लोग खूब चटकारे लेकर पढ़ते हैं। पर एक उच्च कोटी की साहित्यिक पत्रिका में ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य की गरिमा निश्चय ही ठेस पहुंचाता है।
ज्ञात हो कि हंस के संस्थापक मुंशी प्रेमचंद थे। मुंशी प्रेमचंद ने अनेक मुद्दों को सरल और सहज शब्दों में बड़े ही प्रभावशाली तरीके से उठाया है। उनके लेखन में देशज शब्दों की भरमार है। इसके बाद भी वे शब्दों की शालीनता बनाये रखते हैं। आज वहीं हंस शब्दों की शालीनता की मार्यादा तोड़ रहा है। भले ही इस दिनों साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन अमर्यादित शब्दों का प्रयोग पाठकों के बीच लोकप्रियता पाने का सरल माध्यम बनता जा रहा है। यदि आज प्रेमचंद होते तो अपनी स्थापित इस पत्रिका को पढ़ कर निश्चय ही शर्मशार हो जाते।
पिछले दिनों नया ज्ञनोदय के अंक में भी ऐसा ही कुछ हुआ। महात्मा गांधी अंतरराष्टÑीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में प्रयुक्त एक शब्द को लेकर खूब तूल दिया गया। मजेदार बात यह रही है कि उस पर टीका-टिप्पणी करने वालों ने नया ज्ञानोदय का वह अंक पूरा पढ़ा ही नहीं। जबकि उस अंक में प्रकाशित अन्य कई रचनाओं में अनेक आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों के प्रयोग किये गए हैं। लेकिन बहस केवल विभूति नारायण के शब्दों पर छिड़ी रही। इससे सबसे ज्यादा लाभ नया ज्ञनोदय को हुआ। स्टॉल पर पत्रिका हाथो-हाथ बिक गई। इसके बाद जिस विषय को विशेषांक बनाया गया, हिंदी साहित्य में उसकी कोई विद्या या परंपरा नहीं रही है। एक साहित्यक पत्रिका को बेवफाई का सुपर विशेषांक निकालना उसी तरह लोकप्रिय होने का राह अपनाना है जैसे इंडिया टूटे, आऊटलुक पिछले कुछ वर्षों में सेक्स सर्वे पर कवर स्टोरी छाप कर क्षणिक लोकप्रियता पाई है।
बेवदुनिया ने कुछ भी लिखने पढ़ने की अजादी दी है। क्योंकि यहां अभी नियंत्रण नहीं है। लिहाजा, इंटरनेट की दुनिया में कई लेखकों की कुंठाएं साफ दिखती है। पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया अलग है। यहां यह संयम इस लिए जरूरी है, क्योंकि आज भी इसके पाठकों की दुनिया अगल है। महंगी साहित्यिक पत्रिकाएं खरीदने वाला पाठक इसलिए जेब ठीली नहीं करना चाहता है कि उसे एक यथार्थ मुद्दे को अमर्यादित शब्दों की चांसनी में परोसा मिलता है। ऐसी अपेक्षाएं तो छह रुपये में बिकने वाली सरस सलिल जैसी पत्रिकाओं से पूरी हो सकती है। यदि अश्लीलता ही पढ़ती है तो इससे अच्छा बाबा मस्तराम की किताबे सस्ती।
शुक्रवार, अगस्त 20, 2010
नक्सलियों ने आदिवासियों के कल्याण के लिए एजेंडा नहीं बनाया : राजकिशोर
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि में नक्सलवाद के औचित्य पर संगोष्ठी
नक्सल आंदोलन कभी आदिवासी आंदोलन नहीं रहा क्योंकि नक्सलियों ने कभी भी आदिवासियों के कल्याण के लिए कोई एजेंडा प्रस्तुत नहीं किया। यह कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार व राइटर इन रेजीडेंट राजकिशोर का। वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि परिसर के गांधी हिल पर आयोजित एक संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। राजकिशोर ने कहा कि नक्सलियों ने आदिवासियों को सरकार के खिलाफ भड़काना ही सहज एवं सुलभ समझा है। जबकि माओवादी कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, मद्रास आदि प्रमुख शहरों के मजदूरों को एकजुट नहीं कर पाये। क्योंकि शहरी मजदूरों को इकट्ठा करना उन्हें मुश्किल लगा। उन्होंने कहा कि जो लोग ऐसा मानते हैं कि जहां विकास नहीं हुआ है, वहां नक्सलवाद पनपता है, वे गलत हैं। क्योंकि उत्तराखंड के कई दुर्गम इलाके, अंडमान निकोबार दीप समूह और बिहार के कई अंचल तथा उड़ीसा के कई क्षेत्रों में विल्कुल भी विकास नहीं हुआ है। फिर भी वहां नक्सलवाद नहीं पनपा है।
लक्ष्य से भटके हैं कम्युनिष्ट
राजकिशोर ने कहा कि जहां अन्याय होगा, वहां हथियार उठेगा। नक्सलवाद कोई नई बात नहीं कह रहा है। इसका उद्गम तब हुआ, जब कम्युनिष्टों ने अपना लक्ष्य छोड़ दिया। 1947 में जब देश आजाद हुआ था, तब कम्युनिस्ट यह नारा लगाते थे- 'यह आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी हैÓ। इसी नारे के साथ कम्युनिस्ट इस आजादी को भ्रम माने बैठे रहे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि देश का आम आदमी इसी आजादी से खुश है और यही असली आजादी है, तो उन्होंने हिंसा की राह पकड़ ली। नक्सलियों ने सबसे पहले हिंसा की शुरुआत तेलंगाना से की। लेकिन तब की जवाहर लाल नेहरू सरकार ने इस हिंसा का दमन कर दिया। तब कम्युनिस्टों को लगा कि वे अब क्रांति के बिना नहीं रह सकते हैं। लेकिन नेहरू के दमन चक्र से ही कुछ कम्युनिस्ट लोकतांत्रिक रास्ता अपनाने लगे। तब तक सोवियत संघ और चीन के माक्र्सवादी किले की चूले हिलने लगी थीं। इसके बाद कम्युनिस्ट टूट गए।
हिंसा क्रांति की दासी
राजकिशोर ने कहा कि ङ्क्षहसा और प्रतिहिंसा स्वत: स्फूर्त है। इसीलिए कम्युनिष्टों के एक समूह ने चारु मजमूदार के नेतृत्व में हिंसा का रास्ता अपनाया। क्योंकि अतीत में जितनी भी सत्ता की लड़ाई लड़ी गई है, उनका माध्यम हिंसा ही रहा है। क्योंकि हिंसा सत्ता परिवर्तन का पर्याय रहा है। लेकिन इसके बाद भी माक्र्सवाद हिंसा का दर्शन नहीं है। उसका मानना है कि हिंसा क्रांति की दासी है। हिंसा उसका एक छोटा सा हिस्सा है।
बिगड़ चुका है नक्सलवाद का स्वरूप
संगोष्ठी की शुरुआत में प्रास्ताविक वक्तव्य में विवि के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल अंकित राय ने कहा कि सामाजिक मुद्दे ज्वलंत मुद्दे की तरह की समस्या हैं। इसके कारण पहचानने की जरूरत है। आजकल नक्सलवाद राजनीतिक एजेंडा बन गया है। यह समस्या अपने विविध रूप में है और आम व्यक्ति नक्सलवाद के खिलाफ चलाई जा रही सत्ता की गतिविधियों को और नक्सलवादी हिंसा आधारित गतिविधियों को ठीक नहीं मानता है। नक्सलवाद का स्वरूप जो शुरू में था, वह आज के समय में कही न कहीं बिगड़ चुका है। नक्सलवादी नेताओं ने भी इस बात को स्वीकारा है कि उनका नेतृत्व गलत हाथों में है। आदिवासी आदिवासी ही रह गए हैं, जबकि आज सन् 2010 चल रहा है। यह आधुनिकता का दौर है। आज भी आदिवासियों की स्थिति वैसी ही है, जैसे प्राचीन काल में थी। संगोष्ठी में मानव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पी.के वैष्णव, नाट्य कला विभाग के अध्यक्ष प्रो. रवि चतुर्वेदी, बौद्ध अध्यनन विभाग के सहायक प्रोफेसर सुरजीत कुमार सिंह और रवि शंकर सिंह, मानव विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर वीरेन्द्र यादव, निशिथ राय, विवि के जनसंपर्क अधिकारी बी.एस मिर्गे, अमित विश्वास समेत अन्य कई प्राध्यापक व विद्यार्थी उपस्थित थे।
नक्सल आंदोलन कभी आदिवासी आंदोलन नहीं रहा क्योंकि नक्सलियों ने कभी भी आदिवासियों के कल्याण के लिए कोई एजेंडा प्रस्तुत नहीं किया। यह कहना है कि वरिष्ठ पत्रकार व राइटर इन रेजीडेंट राजकिशोर का। वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि परिसर के गांधी हिल पर आयोजित एक संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। राजकिशोर ने कहा कि नक्सलियों ने आदिवासियों को सरकार के खिलाफ भड़काना ही सहज एवं सुलभ समझा है। जबकि माओवादी कोलकाता, अहमदाबाद, मुंबई, मद्रास आदि प्रमुख शहरों के मजदूरों को एकजुट नहीं कर पाये। क्योंकि शहरी मजदूरों को इकट्ठा करना उन्हें मुश्किल लगा। उन्होंने कहा कि जो लोग ऐसा मानते हैं कि जहां विकास नहीं हुआ है, वहां नक्सलवाद पनपता है, वे गलत हैं। क्योंकि उत्तराखंड के कई दुर्गम इलाके, अंडमान निकोबार दीप समूह और बिहार के कई अंचल तथा उड़ीसा के कई क्षेत्रों में विल्कुल भी विकास नहीं हुआ है। फिर भी वहां नक्सलवाद नहीं पनपा है।
लक्ष्य से भटके हैं कम्युनिष्ट
राजकिशोर ने कहा कि जहां अन्याय होगा, वहां हथियार उठेगा। नक्सलवाद कोई नई बात नहीं कह रहा है। इसका उद्गम तब हुआ, जब कम्युनिष्टों ने अपना लक्ष्य छोड़ दिया। 1947 में जब देश आजाद हुआ था, तब कम्युनिस्ट यह नारा लगाते थे- 'यह आजादी झूठी है, देश की जनता भूखी हैÓ। इसी नारे के साथ कम्युनिस्ट इस आजादी को भ्रम माने बैठे रहे। लेकिन जब उन्होंने देखा कि देश का आम आदमी इसी आजादी से खुश है और यही असली आजादी है, तो उन्होंने हिंसा की राह पकड़ ली। नक्सलियों ने सबसे पहले हिंसा की शुरुआत तेलंगाना से की। लेकिन तब की जवाहर लाल नेहरू सरकार ने इस हिंसा का दमन कर दिया। तब कम्युनिस्टों को लगा कि वे अब क्रांति के बिना नहीं रह सकते हैं। लेकिन नेहरू के दमन चक्र से ही कुछ कम्युनिस्ट लोकतांत्रिक रास्ता अपनाने लगे। तब तक सोवियत संघ और चीन के माक्र्सवादी किले की चूले हिलने लगी थीं। इसके बाद कम्युनिस्ट टूट गए।
हिंसा क्रांति की दासी
राजकिशोर ने कहा कि ङ्क्षहसा और प्रतिहिंसा स्वत: स्फूर्त है। इसीलिए कम्युनिष्टों के एक समूह ने चारु मजमूदार के नेतृत्व में हिंसा का रास्ता अपनाया। क्योंकि अतीत में जितनी भी सत्ता की लड़ाई लड़ी गई है, उनका माध्यम हिंसा ही रहा है। क्योंकि हिंसा सत्ता परिवर्तन का पर्याय रहा है। लेकिन इसके बाद भी माक्र्सवाद हिंसा का दर्शन नहीं है। उसका मानना है कि हिंसा क्रांति की दासी है। हिंसा उसका एक छोटा सा हिस्सा है।
बिगड़ चुका है नक्सलवाद का स्वरूप
संगोष्ठी की शुरुआत में प्रास्ताविक वक्तव्य में विवि के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल अंकित राय ने कहा कि सामाजिक मुद्दे ज्वलंत मुद्दे की तरह की समस्या हैं। इसके कारण पहचानने की जरूरत है। आजकल नक्सलवाद राजनीतिक एजेंडा बन गया है। यह समस्या अपने विविध रूप में है और आम व्यक्ति नक्सलवाद के खिलाफ चलाई जा रही सत्ता की गतिविधियों को और नक्सलवादी हिंसा आधारित गतिविधियों को ठीक नहीं मानता है। नक्सलवाद का स्वरूप जो शुरू में था, वह आज के समय में कही न कहीं बिगड़ चुका है। नक्सलवादी नेताओं ने भी इस बात को स्वीकारा है कि उनका नेतृत्व गलत हाथों में है। आदिवासी आदिवासी ही रह गए हैं, जबकि आज सन् 2010 चल रहा है। यह आधुनिकता का दौर है। आज भी आदिवासियों की स्थिति वैसी ही है, जैसे प्राचीन काल में थी। संगोष्ठी में मानव विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. पी.के वैष्णव, नाट्य कला विभाग के अध्यक्ष प्रो. रवि चतुर्वेदी, बौद्ध अध्यनन विभाग के सहायक प्रोफेसर सुरजीत कुमार सिंह और रवि शंकर सिंह, मानव विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर वीरेन्द्र यादव, निशिथ राय, विवि के जनसंपर्क अधिकारी बी.एस मिर्गे, अमित विश्वास समेत अन्य कई प्राध्यापक व विद्यार्थी उपस्थित थे।
बुधवार, अगस्त 11, 2010
बाजार की गर्मी से शांत होगी कश्मीर की आग
कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग करने वाला पूरे भारत की ओर से कश्मीर को क्या मिला है। वहां कश्मीर घाटी की हिंसा में मरने स्थानीय लोगों की खबरों हमें नहीं झकझोरती हैं। देश ने केवल यह दावा किया की कश्मीर हमारा है। लेकिन इस दावे के बाद भी पूरा कश्मीर उपेक्षित हो गया। भूख तो पशु भी बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन उपेक्षा नहीं। फिर भला एक पूरी समुदाय उपेक्षित हो तो उसे अहिंसक होने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

संजय स्वदेश
कश्मीर में हिंसा की आग धधक पड़ी है। तरह-तरह की चर्चाओं का दौरा जारी है। कोई राजनीतिक असफलता की बात कह रहा है तो कोई पड़ोसी देश पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की प्रायोजित रणनीति। हालत जो भी हो, पर इस हिंसा से साबित हो गया है कि कश्मीर की वर्तमान लाकतांत्रित सरकार वहां की जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाई। अलगाववाद की स्थिति पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार भी विफल रही। इन तमाम चर्चाओं के बीच एक महत्वपूर्ण बात छूट रही है। आईएसआई की गतिविधियों से सभी वाकिफ है। सरकार ने सेना की तैनाती कर इस पर अंकुश लगाने का भी कार्य किया। दूसरी ओर गत एक दशक में कश्मीर की चिंगारी भड़कने की मुख्य वजह क्या थी। अभी तक काबुल से पत्थर फेंकने की घटनाएं आ रही थी। अब भारत में भी हो गई। कहने वाले कह रहे है कि पड़ोसी राज्यों ने जनता को पत्थरबाजी के लिए उकसाया। उसके लिए जनता को पैसे भी उपलब्ध कराये गए। पर इसमें संदेह है। पैसे के लालच में एक व्यक्ति जान जोखिम में डालने की सोच सकता है, लेकिन अमन की चाह रखने वाला पूरा समाज ऐसा नहीं कर सकता है। ईमानदारी से सोच और विचार करने की जरूरत है। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग करने वाला पूरे भारत की ओर से कश्मीर को क्या मिला है। वहां कश्मीर घाटी की हिंसा में मरने स्थानीय लोगों की खबरों हमें नहीं झकझोरती हैं।
गत दो दशक के समय पर विचार करें। उदारदवाद की हवा जहां-जहां गई, स्थिर समाज सचेत हुआ। सरकार ने इस दौरान ढेरों तरक्की के दावे किये। पर विचार करने वाली बात यह है कि उदारवाद की यह हवा कश्मीर की घाटी में विकास की संतोषजनक गर्माहट पैदा नहीं कर सकी। कश्मीर को केंद्र सरकार ने सेना के अलावा क्या दिया है? जिनती स्थिति सेना के माध्यम से कश्मीर को अपने नियंत्रण में लेने की रही, उतनी ही दृढ़ता वहां बाजार को पहुंचाने में नहीं रही। आप माने या न माने। आज हर समाज में बाजार जीने की बुनियादी जरूरत बन गई है। भले ही इस के रूप अलग-अलग क्यों न हो। लेकिन देश के पिछड़े इलाकों में जहां-जहां बाजार पहुंचा, वहां थोड़ी-बहुत समृद्धि जरूर आई है। विदर्भ में किसानों ने आत्महत्या की। खबरे राष्ट्रीय स्तर पर आईं। पर किसानों की उपज को अच्छा मूल्य देने वाला बाजार वहां भी नहीं पहुंच पाया। ठीक इसी तरह से कश्मीर के होने वाले उत्पादन को हाथों हाथ लेने के लिए बाजार बनाने में सरकार असफल दिख रही है। पर्यटन का व्यवसाय एक सीजन में चलता है। लेकिन इससे उन्हीं लोगों को ज्यादा लाभ है जो झील के आसपास हैं और उनकी अपनी नाव हैं या फिर पर्यटक स्थलों पर जिनकी दुकानें हैं।
बेहतरीन सेव उत्पादन के मामले में कश्मीर अव्वल रहा है। पर वहां के सेव को वहीं बेचने के लिए बाजार उपलब्ध नहीं है। बिचौलिये उनका मुनाफा खाते रहे हैं। कश्मीर के गर्म कपड़ों के क्या कहने, पर जब वे देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शनी के लिए जाते हैं, तो तिब्बती शरणार्थियों के गर्म कपड़े उन पर भारी पड़ जाते हैं। ऐसी बात नहीं है कि इन चीजों के उत्पादों को प्रोत्साहन के लिए कोई सरकारी पहल नहीं हुआ है। लेकिन जो पहल हुआ है, वह औपचारिक रूप से। उसकी गति बेहद सुस्त है। इसका लाभ भी एक खास वर्ग तक सीमित हो कर रह गया है।
करीब तीन-चार साल पूर्व पाकिस्तान और भारत के बीच साफ्टा नाम की एक संधि हुई। इस संधि के माध्यम से 773 ऐसी वस्तुओं को सूचीबद्ध किया गया है जिसे पाकिस्तान भारत से निर्यात करेगा। इसमें कई ऐसी चीजे शामिल थीं, जिनका उत्पादन कश्मीर में होता है और उसकी पाकिस्तान में बेहद मांग है। पर कश्मीर की आग में यह संधि जल गई। यह व्यापार दोनों देशों की आपसी राजनीति की ऊपर था। कारण चाहे जो भी हो, समाज की मांग के दवाब में कश्मीर में बाजार ने पांव पसारने की कोशिश भी की, तो सरकारी संरक्षण के कारण उसे प्रोत्साहन नहीं मिला।
गत एक दशक में कश्मीर में बेरोजगारों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई है। पारंपरागत बंदिशों से कश्मीरी समाज की बहुसंख्यक महिलाएं उच्च शिक्षित नहीं हो पाई। महिलाएं भी बेकार हैं। सरकार इनके हाथों में उनके हुनर लायक संतोषजनक काम देने में नाकाम रही। लेकिन इसके लिए केवल राज्य सरकार को ही दोष नहीं दिया जा सकता है। स्थिति की नाजुकता को देखते हुए कश्मीर की जनता में अपना विश्वास बहाल करने के लिए केंद्र सरकार को भी समय-समय पर ताक-झांक करते रहना चाहिए था। लेकिन
लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। लिहाजा, सत्ता की राजनीति को बनाये रखने में कश्मीर के युवा, युवति व महिलाएं आक्रोशित होकर हाथ में पत्थर नहीं उठाते तो क्या करते। दरअसल इस मामले को पूरी तरह से संवेदनशील होकर सोचने की जरूरत है। क्या हम अपने ही घर में पुलिस या सैन्य बलों के साये में रहना पसंद करेंगे? यदि हम ऐसा पंसद नहीं कर सकते हैं तो कश्मीरी भला कैसे करेंगे। यदि यह सुरक्षा साया जरूरी भी था तो जनता की की बदहाली दूर करने और उनमें विश्वास बहाल करने के लिए सैन्य बलों को संरक्षण में ही विकास और रोजगार के ढेरों कार्य हो सकते थे। पर ऐसा हुआ नहीं। सरकार चाहे राज्य की रही हो या केंद्र की। सभी ने केवल इसे भारत का अभिन्न अंग होने का दावा किया। देश के दूसरे राज्यों की जनता ने भी ऐसा ही दावा किया। लेकिन इस दावे के बाद भी पूरा कश्मीर उपेक्षित हो गया। भूख तो पशु भी बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन उपेक्षा नहीं। फिर भला एक पूरी समुदाय उपेक्षित हो तो उसे अहिंसक होने की अपेक्षा कैसे की जा सकती
रविवार, अगस्त 08, 2010
गरीबी रेखा पर सरकार की राय स्पष्ट नहीं
'मीट द प्रेसÓ में नागपुर के पत्रकारों से अनौचारिक चर्चा में ए.बी.बर्धन ने कहा
संजय स्वदेश
नागपुर। गरीबी रेखा पर सरकार की राय स्पष्ट नहीं है। इस मामले में वह स्वयं भ्रम में हैं कि देश में कितने प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। यह कहना है कि भाकपा के वरिष्ठ नेता ए.बी.बद्र्धन का। वे रविवार की शाम धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में पत्रकारों से अनौपचारिकता चर्चा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि योजना आयोग ने पहले कहा कि देश में कुल आबादी के 47 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं, फिर बाद में कहा गया कि 27 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं। इस आंकड़े को भी सरकार ने रिजेक्ट कर दिया। तेंदुलकर आयोग ने बताया कि देश में 37 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। एन.सी सक्सेना आयोग ने 57 प्रतिशत और कांग्रेस के वर्तमान सांसद अर्जुनसेन गुप्ता आयोग ने बताया कि 77 प्रतिशत लोग गरीब हैं। ये अनाज, तेल, दाल, खरीदने में असमर्थ हैं। ये अपने बच्चों को ठीक से शिक्षा नहीं दे सकते हैं। सभी आकड़ों को सरकार झुठला दिया है। लेकिन अब सरकार यह कोशिश कर रही है कि 37 प्रतिशत की संख्या को मान लिया जाए। महंगाई के खिलाफ वामदल आंदोलन चला रहे हैं। 5 जुलाई को भारत बंद सफल भी रहा। कुछ लोग नुकसान का आंकलन कर रहे हैं लेकिन भूख का आंकलन नहीं हो रहा है। बारिश के बाद महंगाई के विरोध में आंदोलन फिर शुरू होगा।
कहां बह रही है जीडीपी की गंगा?
बर्धन ने कहा कि एपीएल और बीपीएल सिस्टम हटा कर जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) लागू करना चाहिए। यही जनता की जरूरत है। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि देश का समग्र विकास हो रहा है। जीडीपी बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर सबसे ज्यादा एनीमिया से ग्रस्त माताएं भारत में हंै। बाल मृत्यु दर में भारत आगे है। फिर यह जीडीपी की ग्रोथ की गंगा कहां बहती है। उन्होंने कहा कि सभी मुद्दों की जननी महंगाई है। सरकार अन्न सुरक्षा कानून बनाने जा रही है। इसकी आजकल बड़ी चर्चा है। महंगाई और अन्न सुरक्षा एक दूसरे से जुड़े हैं। अन्न सुरक्षाकानून में 3 प्रमुख बातें होनी चाहिए। पहली, अन्न सुरक्षा मतलब देश के हर व्यक्ति को यथेष्ठ अन्य मिले। दूसरी, जो अन्न मिले वह पौष्टिक हो और तीसरी, यह सभी के पहुंच की कीमत के अंदर में उपलब्ध हो, जिससे कि हर कोई खरीद सके। यदि अन्न सुरक्षा कानून में इन तीनों चीजों का समावेश हो तभी यह कानून सफल होगा।
सभी तक अन्न पहुंचाने में सरकार को जो खर्च आएगा, वह जीडीपी का कुल 1.9 प्रतिशत होगा। इसका पूरा हिसाब हमने सरकार को दे दिया है। देश में 20 से 25 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो जनवितरण प्रणाली ठीक कर भी लिया जाए तो भी वे बाहर से खरीदी कर सकते हैं। 75 प्रतिशत लोगों तक जनवितरण प्रणाली पहुंचनी चाहिए।
कश्मीर का बाजार कहां है?
बर्धन ने कहा कि कश्मीर की समस्या कई मायनों में इन दिनों उलझ गई है। एक ओर कश्मीर घाटी में जहां गोलियां बरस रही हंै, वहीं दूसरी ओर लेह में पानी का कहर बरस रहा है। छोटे से शहर लेह में पानी के बहाव के कोई परंपरागत तरीके नहीं हैं। वहां अभी तक बर्फ ही बरसते रहे हैं। इस कहर में छोटे से शहर के चार से पांच सौ लोगों का गायब हो जाना गंभीर बात है। हम कहते हैं कि कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। शरीर के एक हिस्से में जब चोट लगती है, तो दूसरे हिस्से में दर्द होता है। लेकिन कश्मीर मामले में ऐसा नहीं है। हम संवदेनशून्य हो रहे हैं। यदि भारत कश्मीर का ही अंग है तो लोग कश्मीर के प्रति संवेदना प्रकट करें। सबसे पहले तो यह जरूरी है कि कश्मीर से सेना को हटायी जाए। सेना के कारण वहां के रास्ते और बाजार बंद हैं। कश्मीर में सबसे ज्यादा उत्पादन सेब का होता है। लेकिन वहां सेब का बाजार कहां है। कश्मीर के सामान्य आर्थिक जीवन को भी बंद कर दिया गया है। इसे खोलना जरूरी है।
कॉमन वेल्थ के लिए पैसा है, गोदाम बनाने के लिए नहीं
कॉमन वेल्थ गेम की तैयारियों में अनियमितताओं से पता चलता है कि भ्रष्टाचार के मामले अब ओलंपिक तक पहुंच गए हैं। इस गेम के माध्यम से भारत की प्रतिष्ठा दांव पर है। इसलिए यह कामयाब होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि भ्रष्टाचारियों पर कोई रोक-टोक न हो। देश की इज्जत मिट्टी में मिलाने वाले भ्रष्टाचारियों को राजा, महाराजा के पद से हटा दिया जाना चाहिए। सरकार कह रही है कि अनाज का उत्पादन इतना है कि अनाज रखने के लिए गोदाम नहीं है। कॉमन वेल्थ गेम में करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गये लेकिन सरकार के पास अनाज के गोदाम बनवाने के लिए पैसे नहीं है।
बॉक्स में
बिहार चुनाव वाम के साथ लड़ेंगे
बिहार चुनाव में वाम दल एकजुट होकर मैदान में उतरें, इसके लिए सहमति बन रही है। पूरी संभावना है कि चुनाव में वाम दल एक ही होंगे।
नक्सलबाद पर हो सार्थक बातचीत
सरकार समझती है कि नक्सलवाद को केवल हथियार से ही रोका जा सकता है। यह संभव भी नहीं है। एक ओर तो राज्य का आतंक है, वहीं दूसरी ओर नक्सलियों का आतंक। दोनों के बीच में मासूम मर रहे हैं। इसके लिए बातचीत का रास्ता सबसे ज्यादा बेहतर है।
गडकरी से मुलाकात हुई
नितिन गडकरी मुझझे मिलने आए। लेकिन किसी को इस बात का तनिक भी विश्वास नहीं होगा कि हमलोगों ने राजनीति की बातें नहीं की। वे मेरे पुराने मित्र हैं। मेरे पास आए तो केवल व्यक्तिगत बातें होती रहीं। विशेष रूप से उनके चीनी उद्योग पर चर्चा हुई।
किन नेताओं के पीछे है विदर्भ की जनता
पृथक विदर्भ के मुद्दे पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में बर्धन ने एक टूक में कहा कि -विदर्भ की जनता तथाकथित विदर्भवादी नेताओं के पीछे है।
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शनिवार, अगस्त 07, 2010
मीडिया जरूरत से ज्यादा अहंकार से ग्रस्त
जनसंवाद माध्यम स्वयं तैयार करे 'कोड ऑफ कंडक्टÓ : मृणाल पांडे
राजेंद्र माथुर स्मृति व्याख्यान आयोजित
संजय स्वदेश
नागपुर। वर्तमान दौर में बदलती स्थितियों में जनसंवाद माध्यम को स्वयं आगे आकर अपना 'कोड ऑफ कंडक्टÓ तैयार करना होगा। यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार व प्रसार भारती की अध्यक्ष सुश्री मृणाल पांडे का। वे धंतोली स्थित तिलक पत्रकार भवन में आयोजित राजेंद्र माथुर स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता बोल रही थीं। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा एवं दैनिक भास्कर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय राज, समाज और आज का मीडिया था। सुश्री पांडे ने कहा कि गत एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि देश में शिखर और तलहटी के बीच की खाई कम हुई है। इसके कई रोचक परिणाम आए हैं। इस दौरान यह पहली बार हुआ है कि चुनाव में जाति का मंथन हुआ। ऐसे जनप्रतिनिधि चुन कर आए, जिन्हें नेहरू के जमाने में चुना जाना संभव नहीं था। माथुर साहब मानते थे कि एक समय के बाद अलग-अलग राजनेता की आवश्यकता होती है। संवाद माध्यम अब पहले से ज्यादा शक्तिशाली भाषायी माध्यम है। पहले अंग्रेजी के पत्रकारों की पूछ थी, लेकिन जैसे-जैसे लोकतंत्र तलहटी तक गया, भाषायी अखबार महत्वपूर्ण हो गए। हिंदी अखबारों की प्रतिष्ठा बढ़ी है, लेकिन इसके साथ ही कुछ गलतफहमी भी हो रही है। मीडिया जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास और अहंकार की भावना से ग्रस्त है, इसे दूर करना आवश्यक है, नहीं तो सरकार नियामक बनाएगी। उन्होंने कहा कि आज जितनी तेजी से जितनी मात्रा में खबरें आती हैं, उस दृष्टि से सभी खबरों पर संपादक की गिद्ध दृष्टि रखना मुश्किल हो गया है।
सुश्री पांडे ने कहा कि अखबार के मार्केटिंग मैनेजर और यूनिट मैनेजर पर भी विज्ञापन की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उनका नाम भी प्रिंट लाइन में जाना चाहिए, जिससे पाठक भ्रमित विज्ञापनों के बारे में संपादक को दोष न दें। उन्होंने कहा कि हर अखबार में दो खेमे हैं। एक पाठक के हित की बात करने वाला तो दूसरा अखबार के शेयरधारकों का खेमा। दोनों में टकराव है। इसे अखबार को अपने स्तर पर ही निपटना होगा। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा त्वरित परिवर्तन अपने जीवन काल में नहीं देखा। इसलिए मीडिया में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है।
चैनलों की जल्दीबाजी के विषय पर चर्चा करते हुए सुश्री पांडे ने कहा कि भीड़ में दर्शक और पाठक यह खोज ही लेता है कि कौन का चैनल या अखबार उसके लिए है। उन्होंने कहा कि पाठक और दर्शकों का हित सर्वोपरि है। इसे कानूनी रूप से भी मान्य करना चाहिए। नियामक बनाकर पाठकों को यह बताना चाहिए कि अमुक अखबार किसी पार्टी विशेष का है। उन्होंने कहा कि माध्यम तो बहुत फलफूल रहा है, लेकिन हार्ड न्यूज की उपेक्षा हो रही है। इस न्यूज को लाने वाले की भी उपेक्षा हो रही है। इससे भारी नुकसान हो रहा है। खबरों का पीछा कर, उनकी श्रृंखला चलाने वाले कम हो गए हैं। बहुत ज्यादा सूचना का जखीरा होने से पत्रकारों में आलस आ गया है। नया माध्यम इंटरनेट तो अच्छा है,लेकिन इसकी स्थिति ऐसी है जैसे यह बंदर के हाथ लग गया हो। पहले हम लोग पढ़े थे कि पत्रकारिता हड़बड़ी में रखा गया साहित्य है। इसी तरह से ब्लॉग हड़बड़ी में रचा गया पत्रकारिता है।
तथाकथित 'ऑनर किलिंगÓ की चर्चा करते हुए सुश्री पांडे ने कहा कि यदि ऐसी हत्याओं पर गौर करें तो पाएंगे कि सबसे ज्यादा हत्याएं उस मामले में हुई हैं, जिसमें ऊंची जाति की लड़की ने अपने से छोटी जाति के लड़के के साथ प्रेम विवाह किया। ये घटनाएं साबित कर रही हैं कि इससे समाज बिचलित हो रहा है। इस विषय पर ब्लॉग जगत में खूब चर्चाएं हुईं। अधिकतर ब्लॉग लिखने वालों ने माना कि हत्याएं गलत थीं, लेकिन उनमें लड़की के विचलन पर रोष था। इस तरह के विचलन को सांस्कृति सहमति नहीं मिल रही है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि जो कुछ हो रहा है, उसका एक छोर लोकतांत्रिक राज्य से जुड़ा है। लोकतंत्र अपनी गति को मथ रहा है। लेकिन अनिवार्य चीजों को सहमति देने में देरी कर रहा है। उन्होंने दिल्ली का उदाहरण देते हुए कहा कि राजधानी के आसपास के चार गांव ऐसे हैं जिनमें चालीस मसर्डीज कारें हैं। गांव के जाट समुदाय के लोग अपनी संपत्ति बेच कर अमीर हो गए। लेकिन इससे गांाव के बुजुर्गों को लगा कि उनके साथ से सत्ता निकल गई। पैसे से वे अमीर हो गए, लेकिन उनके पास से वह गौरव निकल गया जिस गौरव का अनुभव जमीन का स्वामी होने से होता था। यह गौर पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है। उन्होंने फैशन और जीवनशौली पर खर्च किया, लेकिन पढ़ाई-लिखाई नहीं की। वहीं दूसरी ओर दलित और पिछड़ी जातियों में बदलाव आया है। इस समाज के युवा पढ़ लिख कर सरकारी नौकरियों ने लगे। इससे गांव में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी है। लड़कियां ऐसे ही लड़कों की ओर आकर्षित हो रही हैं। क्योंकि वे जानती हैं कि ये लड़के लंबे रेस के घोड़े हैं। खाप पंचायतों पर कोर्ट के निर्णय लागू नहीं हो पाते हैं। पर इनके निर्णय मान्य हो रहे हैं। दरअसल दंड विधान भी वहीं से निकलता है। स्वागत भाषण वनराई के विस्वस्त व पूर्व विधायक गिरीश गांधी ने दिया। संचालन डा. प्रमोद शर्मा ने किया। कार्यक्रम में नगर के हर वर्ग के गणमान्य लोग उपस्थित थे।
शुक्रवार, जुलाई 30, 2010
बार-बार शरीर संबंध बलात्कार नहीं
मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ का महत्वपूर्ण फैसलानागपुर। किसी महिला या युवती से बार-बार शरीर संबंध रखना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। यह महत्वपूर्ण फैसला मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के न्यायाधीश अंबादास जोशी ने दिया है। न्यायमूर्ति जोशी की खंडपीठ ने एक मेडिकल रिप्रजेटेटिव अनवर खान इकबाल खान मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया गया तो भी गलतफहमी के विश्वास से ऐसा होना साबित नहीं होता। 2 वर्षों तक लगातार शरीर संबंध रखने की अनुमति देना बलात्कार साबित नहीं होता।
ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति जोशी ने कुछ दिनों पूर्व ही ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया था कि शादी का लालच देकर तथा उस पर यकीन रखकर शरीर संबंध रखना बलात्कार नहीं होता। उसके बाद उनका यह दूसरा ऐसा फैसला है, जिससे आईपीसी की धारा 376 के मामले में फंसे अनेक लोगों को राहत की संभावना दिखने लगी है। ब्लात्कार के दर्ज सैकड़ों ऐसे मामले हैं जिसमें आपसी सहमती से शारीरीक संबंध बनाये गए थे और बाद में किसी बात को लेकर अनबन होने से कत्थित पीडि़ता ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया।

अनवर खान इकबाल खान को नागपुर सत्र न्यायालय ने एक युवती के साथ लगातार कुकर्म के मामले में 2 वर्ष पूर्व 7 वर्षों के सश्रम कारावास व 20 हजार रु. जुर्माने की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदल दिया। अनवर खान ने 14 अप्रैल से 5 मई 2004 के दौरान शादी का लालच दिखाकर युवती के साथ शरीर सुख प्राप्त किया था।
अनवर खान तथा युवती एक ही कंपनी में कार्यरत थे। आरोपी ने नागपुर की एक होटल में स्थित अपने कमरे में युवती को बुलाया तथा उसके साथ कुकर्म किया। इस घटना से युवती रोने लगी। उसने आत्महत्या करने की धमकी दी। इसे देखकर अनवर खान ने उसे शादी का लालच दिखाकर शांत किया। बाद में अनवर ने युवती को अमरावती व यवतमाल की होटलों में बुलाया तथा वहां भी शादी का लालच देकर उसके साथ यौन संबंध बनाया। आरोपी द्वारा शादी से इन्कार करने तक यह मामला जारी था।
बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता युवती पागल हो चुकी थी तथा वह आरोपी के पीछे पड़ गई थी। यह सभी एक पक्ष से ही हो रहा था। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने बताया कि शादी के आश्वासन पर भरोसा रखकर युवती ने शरीर संबंध रखने की अनुमति दी। इसे गलतफहमी से दी गई अनुमति नहीं कहा जा सकता।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि युवती स्वयंनिर्बंध तथा आत्मज्ञान से अनभिज्ञ थी और इसी कारण शादी के आश्वासन पर यकीन रखकर वह लैंगिक सुख देती रही। वह सज्ञान है। खासकर उसकी इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि गर्भपात के बाद भी उसके साथ दो बार बलात्कार हुआ।
वर्ष 2009 के अंत में भी सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जिसमें कोर्ट ने बलात्कार के मामले में दोषी ठहरा चुके सुनील कुमार नाम के एक युवक को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि कौमार्य भंग कराते वक्त लड़की ने इसका विरोध नहीं किया था, इसलिए वह बलात्कार की पीडि़ता नहीं है।
ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति जोशी ने कुछ दिनों पूर्व ही ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया था कि शादी का लालच देकर तथा उस पर यकीन रखकर शरीर संबंध रखना बलात्कार नहीं होता। उसके बाद उनका यह दूसरा ऐसा फैसला है, जिससे आईपीसी की धारा 376 के मामले में फंसे अनेक लोगों को राहत की संभावना दिखने लगी है। ब्लात्कार के दर्ज सैकड़ों ऐसे मामले हैं जिसमें आपसी सहमती से शारीरीक संबंध बनाये गए थे और बाद में किसी बात को लेकर अनबन होने से कत्थित पीडि़ता ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया।

अनवर खान इकबाल खान को नागपुर सत्र न्यायालय ने एक युवती के साथ लगातार कुकर्म के मामले में 2 वर्ष पूर्व 7 वर्षों के सश्रम कारावास व 20 हजार रु. जुर्माने की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदल दिया। अनवर खान ने 14 अप्रैल से 5 मई 2004 के दौरान शादी का लालच दिखाकर युवती के साथ शरीर सुख प्राप्त किया था।
अनवर खान तथा युवती एक ही कंपनी में कार्यरत थे। आरोपी ने नागपुर की एक होटल में स्थित अपने कमरे में युवती को बुलाया तथा उसके साथ कुकर्म किया। इस घटना से युवती रोने लगी। उसने आत्महत्या करने की धमकी दी। इसे देखकर अनवर खान ने उसे शादी का लालच दिखाकर शांत किया। बाद में अनवर ने युवती को अमरावती व यवतमाल की होटलों में बुलाया तथा वहां भी शादी का लालच देकर उसके साथ यौन संबंध बनाया। आरोपी द्वारा शादी से इन्कार करने तक यह मामला जारी था।
बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता युवती पागल हो चुकी थी तथा वह आरोपी के पीछे पड़ गई थी। यह सभी एक पक्ष से ही हो रहा था। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने बताया कि शादी के आश्वासन पर भरोसा रखकर युवती ने शरीर संबंध रखने की अनुमति दी। इसे गलतफहमी से दी गई अनुमति नहीं कहा जा सकता।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि युवती स्वयंनिर्बंध तथा आत्मज्ञान से अनभिज्ञ थी और इसी कारण शादी के आश्वासन पर यकीन रखकर वह लैंगिक सुख देती रही। वह सज्ञान है। खासकर उसकी इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि गर्भपात के बाद भी उसके साथ दो बार बलात्कार हुआ।
वर्ष 2009 के अंत में भी सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जिसमें कोर्ट ने बलात्कार के मामले में दोषी ठहरा चुके सुनील कुमार नाम के एक युवक को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि कौमार्य भंग कराते वक्त लड़की ने इसका विरोध नहीं किया था, इसलिए वह बलात्कार की पीडि़ता नहीं है।
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सोमवार, जून 07, 2010
कभी घुसपैठियों का सर्वे नहीं हुआ
संजय स्वदेश
कभी घुसपैठियों का सर्वे नहीं हुआ : ज्योतिप्रसाद
नागपुर। बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर असम में घुसपैठ हो रही है, इसमें अल्पसंख्यकों की संख्या ज्यादा होने के कारण स्थानीय अल्पसंख्याक बहुत ही कम हो गए हैं। यह कहना है असम के पूर्व मुख्य सचिव ज्योति प्रसाद राजखोवा का। वे नागपुर के रेशिमबाग में संघ शिक्षा वर्ग की तृतीय वर्ष समापन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। राजखोवा ने कहा कि घुसपैठियों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या ज्यादा है। परिवार नियोजन नहीं होने से उनकी संख्या दिनों दिन बढ़ते ही जा रही है। देश में कभी घुसपैठियों का सर्वे नहीं हुआ। इसकी मांग हमने बार-बार की है। जनगणना व मतदाता जैसी महत्वपूर्ण पहल से घुसपैठों को दूर रखना चाहिए। नहीं तो इन्हीं के सहारे ये घुसपैठिये राजनीति में अपनी पैठ बना लेंगे। नेपाल से प्रत्यक्ष कोई समस्या नहीं हैं। लेकिन नेपाल माओवादी का कट्टर पक्षधर है। बताया जाता है कि माओवादियों के पास उत्कृष्ट दर्जे के 20,000 से अधिक अत्याधुनिक हथियारें हैं।
राजखोवा ने कहा कि ब्रम्हपुत्र नदी पर चीन द्वारा निर्माण की जा रही विद्युत संयंत्र देश के लिए खतरे की घंटी है। इसकी जानकारी होने के बावजूद केंद्र सरकार को चुप्पी साधी हुई है। चीन सरकार ब्रम्हपुत्र नदी पर विद्युत संयंत्र बना कर भारत अनगिनत संकट पैंदा कर सकती है। देश में धर्म परिवर्तन के लिए कहीं दबाव तो कही लोभ-लालच का इस्तेमाल हो रहा है, यह देश के लिए चिंतन का विषय है। उन्होंने कहा कि असम में उग्रवाद व घुसपैठ रोकने के लिए केंद्र के पास कोई ठोस उपाय योजना नहीं है।
सरकार की नियम और नीति में फर्क : मोहन भागवत
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंचालक मोहन भागवत ने कहा कि स्वंयसेवक संघ जो बात वर्षों से कह रहा है, वह बात असम के अध्ययनशील ज्योतिप्रसाद द्वारा व्यक्त किया जाना, यह सिद्ध करता है कि स्वंयसेवक संघ ने तब असम के बारे में सही जानकारी हासिल कर उचित बयान जारी किया था। यह समस्या सिर्फ असम की नहीं बल्कि संपूर्ण भारत की है। केंद्र को सबकुछ मालूम होते हुए भी वर्तमान स्थिति को स्वीकार नहीं करना सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ है। हमारी सरकार व प्रशासन की नियत व नीति में काफी फर्क है। देश में जनगणना को दौर चल रहा है। इसमें नागरिकता जोड़ दी गई है। जबकि दोनों अलग-अलग मुद्दे ही नहीं, इनका अलग-अलग नियम है। देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रत्येक देशवासियों को है। सरकार व प्रशासन में बैठे लोग स्वार्थ के लिए स्वंय को भोलाभाला दर्शा रहे हैं। जनगणना के लिए विशेषज्ञों की राय लेकर शुरुआत करनी चाहिए थी। इस बार ओबीसी की गणना, जनगणना के साथ जरूर होगी। लेकिन उनका विकास मुमकिन नहीं है। कुल मिलाकर सत्ता में कबिजों को राष्ट्र की स्पष्ट कल्पना नहीं है, उन्हें सिर्फ मतों का स्वार्थ है।
कश्मीर की समस्या सर्वत्र चर्चित है। लेकिन समस्या जस के तस हैं। नक्सलवादियों के कदम दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं और केंद्र अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग बयान बाजी कर रहा है। मालूम हो कि आंध्र में राजनैतिक पार्टी व नक्सलवादियों के साथ चुनावी गंठबंधन हुई थी। इसीतरह छत्तीसगढ़ में भी सांठगांठ के लिए प्रेरित करने की मंशा नजर आ रही है। देश के शिक्षाविदों से विदेशी घबरा रहे है तो दूसरी ओर देश में विदेशी शिक्षा को प्रवेश देकर अपनी खिल्ली उड़ाई जा रही है। श्री भागवत के संबोधन के पश्चात कार्यक्रम का विधिवत समापन हुआ।
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मंगलवार, जून 01, 2010
एक्लव्य कुशल तिरंजादी कर क्षत्रिय नहीं बन सका
जो जाति सदियों से एक ही कर्म को करते आ रही है। तो उसकी पीढ़ी उस कार्य को कुशलता से कर सकती है। यह बात तो ठीक है, लेकिन पहले कर्म के आधार पर जाति को बदली जा सकती थी। महाभारत काल में एक्लव्य कुशल तिरंजादी कर क्षत्रिय नहीं बन सका। जाति आधारित कर्म बदलने को समाजिक मान्यता किसे मिली है? किसी शुद्र को कर्म के अनुसार जाति या वर्ण बदलने का इतिहास बताएं। विष्णु अवतार परशुराम वर्ण बदलते हैं, तो उन्हें मान्यता जरूर मिलती है, पर शुद्र को नहीं। उत्तर रामायण का पात्र शंबुक तेली था, पर साधना के ब्राह्मण कर्म पर श्रीराम चंद्र उसका सिर धड से अलग करते हैं। इसे समाज की कथा कर बात को टाली नहीं जा सकती है, क्योंकि हर कहानी अपने समाज और परिवेश से प्रभावित होती है।
कुलिन वर्ण के युवाओं ने जब भी किसी शुद्र की संस्कारी सुयोग्य कन्या से विवाह किया है, उसे सम्मान नहीं मिला है।
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग को आसानी से कलास मना लिया गया है। लेकिन जरा सोचिये, पिछड़ों का वर्ण क्या है?
पिछड़ा वर्ग वैश्य समुदाय में शामिल नहीं है। वह अनुसूचित कहलाना पसंद नहीं करेगा। हालत उसकी त्रिशंकु की तरह हो गई है। पिछड़ों का वर्ण अधर में लटक गया है। यदि शुद्रों को वर्ण में ही रखा और कर्म के आधार पर जाति बदलने की समाजिक मान्यता में तनिक भी लोच होता तो स्थिति गंभीर नहीं होती।
जब इस जनगणना में अनुसूचित जाति और जनजातियों की गणना के लिए कॉलम है तो पिछड़ों का कॉलम रखने में बुराई नहीं दिखती। मेरे विचार से तो इस जनगणना में ब्राöम, वैश्य और क्षत्रियों की भी जनगणना कर ली जाती तो अच्छा होता। कम से कम आरक्षण की मलाई खाने वालों को यह तो पता चलता कि गैर-आरक्षित जातियों की तुलना में उनकी संख्या कितनी है। बड़ी संख्या के बाद भी उनकी तरक्की कितनी हुई है?
कुलिन वर्ण के युवाओं ने जब भी किसी शुद्र की संस्कारी सुयोग्य कन्या से विवाह किया है, उसे सम्मान नहीं मिला है।
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग को आसानी से कलास मना लिया गया है। लेकिन जरा सोचिये, पिछड़ों का वर्ण क्या है?
पिछड़ा वर्ग वैश्य समुदाय में शामिल नहीं है। वह अनुसूचित कहलाना पसंद नहीं करेगा। हालत उसकी त्रिशंकु की तरह हो गई है। पिछड़ों का वर्ण अधर में लटक गया है। यदि शुद्रों को वर्ण में ही रखा और कर्म के आधार पर जाति बदलने की समाजिक मान्यता में तनिक भी लोच होता तो स्थिति गंभीर नहीं होती।
जब इस जनगणना में अनुसूचित जाति और जनजातियों की गणना के लिए कॉलम है तो पिछड़ों का कॉलम रखने में बुराई नहीं दिखती। मेरे विचार से तो इस जनगणना में ब्राöम, वैश्य और क्षत्रियों की भी जनगणना कर ली जाती तो अच्छा होता। कम से कम आरक्षण की मलाई खाने वालों को यह तो पता चलता कि गैर-आरक्षित जातियों की तुलना में उनकी संख्या कितनी है। बड़ी संख्या के बाद भी उनकी तरक्की कितनी हुई है?
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