संजय स्वदेश
शिक्षण नगरी से प्रसिद्ध राजस्थान के कोटा में के आर.के.पुरम क्षेत्र में 15 फरवरी को एक निमार्णाधिन स्कूल में कार्यरत मजदूर की दो साल की बिटिया पर जेसीबी का पहिया चढ़ गया। काम करते वक्त मजदूर ने मासूम को एक किनारे पर सुलाया हुआ था। उस पर शॉल ओढ़ाया हुआ था। जेसीबी पीछे हो रही थी। ड्राइवर ने समझा यू ही शॉल रखा होगा। अनदेखी की। पहिया मासूम के ऊपर चढ़ा। एक करुण चिख निकली। बिटिया सदा के लिए मौत के आगोश में समा गई। इस दर्दनान खबर को सुनकर मन विचलित हो उठा।
अगले दिन इस समाचार को लेकर समाचार पत्रों का विश्लेषण किया। दो प्रमुख हिंदी दैनिक राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में यह समाचार प्रकाशित हुई। लेकिन इन खबरों के प्लेसमेंट पर दूसरी खबरे भारी थी। अजीब ट्रेजड़ी है। हालात की तरह मजदूरों की मौत भी मीडिया के लिए हल्की हो चली है। जबकि ये दोनों समाचारपत्र सप्ताह भर से रात में खुले में खड़ी कार के कांच फोड़ने वाले किसी कत्थित सिरफिरों की खबर बढ़ा-चढ़ा कर प्रकाशित कर रहे थे। जिस दिन यह समाचार प्रकाशित हुई, उस दिन भी कार की कांच फोड़ने की खबर मजदूर की बेटी की दर्दनाक मौत की खबर पर भारी थी।
इस पर एक मित्र से चर्चा की। उन्होंने बड़े ही बेवाकी से कहा कि यदि इस खबर को अखबार में अच्छे से जगह मिल जाती तो क्या होता मजदूर की बिटिया वापस तो नहीं आती। सही है। पर इस इस बहाने से मजदूरों के हित में एक शानदार मुद्दा को ठाया जा सकता था। आपकों याद हो तो बता दे कि समय-समय पर ऐसी खबरे आती है कि सरकार से कहा जाता है कि विदेशों की तरह अपने देश की सरकार भी उन जगहों पर के्रच या पालना घर की व्यवस्था करें, जहां कामकाजी महिलाएं नौकरी करती हैं। पर इस मांग मे कामकाजी महिलाओं के दायरे में मजदूर महिलाएं नहीं आती है। आए दिन इस पर फीचर आलेख आत हैं। पर भी मजदूर महिलाओं के कार्यस्थल पर इस तरह की अल्पकालीन सुरक्षित व्यवस्था चर्चा तक नहीं होती है।
मीडिया में मौत से जुड़ी खबरों को सनसनी बनाकर परोसना नई बात नहीं। किसी अपराधी की हत्या हो या मौत में अवैध यौन संबंध के ट्विीस्ट हो तो फिर क्या कहने। खबरों के खूब फालोअप आते हैं। पर एक बात यह है कि ऐसी खबरों में दोषियों को दंड देने तक ही फालोआप समाचार आते हैं। लेकिन मीडिया की ओर से ऐसे मामलों के तह में जाकर समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रशासन को निंद से जगाने के प्रयास बहुत ही कम दिखते हैं।
कार्यस्थल पर गरीब मजदूर की बिटिया की दर्दनाक मौत केवल राजस्थान के कोटा में नहीं होती है। जहां मजदूर महिलाएं काम करती हैं और उनके मासूम लाड़ले या लाड़ली वहीं खेलते हैं। जहां उन पर जान का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। यदा कदा कभी घटनाएं भी होती है तो प्रशासनिक महकमा छोटी-मोटी कार्रवाईयों की खानापूर्ति कर अपनी जिम्मेदारियों का बोझ हल्का कर लेता है। आम दिनों में मीडिया में मजदूरों के महकमें को लेकर कभी संवेदनशीलता दिखती ही नहीं है। अंतरराष्टÑीय महिला दिवस के मौके पर महिला सशक्तिकरण के नाम पर खूब पेज भरे जाते हैं। ऐसे मौके पर ही मिशन पत्रकारिता के नाम पर महिला मजदूरों के चित्र और उनसे बातचीत पर आधारित कोई खबर प्रकाशित होती है। फिर साल भर के लिए मीडिया इन मजदूर महिलाओं से मुंह मोड़ लेती है।
एक प्रिंस बोरवेल में गिरा, मीडिया ने हल्ला किया। युद्ध स्तर पर बचाव कार्य हुये। प्रिंस सैभाग्यशाली था। मीडिया ने उसकी जान बचा ली। उसके बाद भी कई प्रिंस गड्ढÞे में गिरे। पर पहले प्रिंस के समय की तरह मीडिया शोर नहीं मचाता। विशेष मौके पर प्रिंस की घटना में मीडिया की भूमिका की चर्चा कर वाहवाही ले ली जाती है। लेकिन मजदूरों के बच्चों को कार्यस्थल पर सुरक्षित वतावरण पहुंचाने को लेकर महिला हमेशा शांत ही रहा।
सवाल है कि कोई प्रिंस ऐसे गड्डे में फिर न गिरे, किसी मासूम पर जेसीबी चढ़ कर उसे दर्दनाक मौत के आगोश में न भेजे, इसकों लेकर स्थायी समाधान के लिए सरकार को जगाने की जिम्मेदारी किसकी है? मीडिया यह कह कर अपनी जिम्मेदारियों का पल्ला नहीं झाड़ सकती कि है कि उस पर बजार का दवाब है। यह सही है कि बाजार के दवाब में खबरो का चयन आज की मीडिया की मजबूरी हो गई है। लेकिन बाजार के भूखी खबरों के अलावा भी प्रर्याप्त जगह और समय है, जिसमें लाखों के हित की बात बेवाबी से उठाई जा सके। मजदूरों के हीत की बात करने न किसी मीडिया हाऊस के विज्ञापन बंद होंगे और न ही किसी का दामन दागदार होगा। मजदूरों के हीत के मुद्दे उलूल-जूलूल की खबरों से निश्चय ही गंभीर होंगे। बस इनके मुद्दों को गंभीरता से देखने-समझने की जरुरत भर है।
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गुरुवार, फ़रवरी 17, 2011
गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011
तो थोड़ा सुकून मिलेगा
खबर है कि मोबाइल पर बात करना महंगा हो सकता है....
जब से मोबाइल पर बातचीत की दर सस्ती हुई है। जिंदगी तेज हो गई है। लोगों को सुकून छिन गया है। अचानक मोबाइल की घंटी दो पल के सुकून में खलल डाल देती है। जब कॉल महत्वपूर्ण और अनावश्यक या सामान्य होता है, तो झुंझलाहट होती है।
क्या यह संभव है कि कॉल दर महंगा होने से आनावश्यक कॉल में कमी आएगी और लोगों को थोड़ा सुकून मिलेगा।
जब से मोबाइल पर बातचीत की दर सस्ती हुई है। जिंदगी तेज हो गई है। लोगों को सुकून छिन गया है। अचानक मोबाइल की घंटी दो पल के सुकून में खलल डाल देती है। जब कॉल महत्वपूर्ण और अनावश्यक या सामान्य होता है, तो झुंझलाहट होती है।
क्या यह संभव है कि कॉल दर महंगा होने से आनावश्यक कॉल में कमी आएगी और लोगों को थोड़ा सुकून मिलेगा।
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शुक्रवार, दिसंबर 10, 2010
लालबत्ती की माया
सांसारिक मोहमाया से दूर रहकर ईश्वर की भक्ति में मन लगाने का ज्ञान बांटने वाले, देश के हजारों लोगों के लिए प्रात: स्मरणीय परमपूज्य पाद संतश्री आसारामजीबापू लालबत्ती की माया से नहीं बच पाये। पहले तो प्रशासन ने गुजरात में अवैध कब्जे वाली जमीन से उनका आश्रम तोड़ा। तीन दिन पूर्व जयपुर क्षेत्र से पुलिस ने उनकी गाड़ी से लालबत्ती उतार लिया।
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लालबत्ती की माया
सांसारिक मोहमाया से दूर रहकर ईश्वर की भक्ति में मन लगाने का ज्ञान बांटने वाले, देश के हजारों लोगों के लिए प्रात: स्मरणीय परमपूज्य पाद संतश्री आसारामजीबापू लालबत्ती की माया से नहीं बच पाये। पहले तो प्रशासन ने गुजरात में अवैध कब्जे वाली जमीन से उनका आश्रम तोड़ा। तीन दिन पूर्व जयपुर क्षेत्र से पुलिस ने उनकी गाड़ी से लालबत्ती उतार लिया।
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शनिवार, दिसंबर 04, 2010
कवि के साथ न्याय, कविता का सम्मान
कविताओं पर आने वाले अधिकत्तर कॉमेंट अच्छी लगी, आज की यार्थात है...आदि होती है। लेकिन जिम्मेदार पाठक होने के नाते हमारा फर्ज बनता है कि हम लेखक को वही बताये जो कविता की हकीकत है। आश्चर्य की बात है कि जिस दर्द को जीते हुए कवि उसे शब्दों में पिरोता है, उसे अधिकतर पाठक सहजता से औपचारिक टिप्पणी कर देते हैं। मुझे लगता है न न तो कवि के साथ न्याया है और नहीं कविता का सही सम्मान।
बुधवार, दिसंबर 01, 2010
भ्रष्टाचार के खिलाफ जगना होगा... जगाना होगा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी ने किसी तरह से स्थानीय स्तर पर बिगुल तो फूंकना ही पड़ेगा। जगना होगा... जगाना होगा। व्यक्तिगत स्तर पर भी लड़ाई लड़ी जा सकती है। हां, जीत धीमी गति से मिलेगी। क्योंकि पिछली पीढ़ी ने भ्रष्टाचार को सह कर बहुत मजबूत कर दिया है। इस मजबूत स्थिति को एक दम से तोड़ना असान नहीं। पर व्यक्तिगत स्तर पर अनेक लोगों की छोटी-सी लड़ाई भी नई पीढ़ी को भ्रष्टमुक्त तंत्र की राह प्रशस्त कर सकती है।
सोमवार, नवंबर 29, 2010
सरोकारों की पत्रकारिता की गुंजाइश
वर्तमान पत्रकारिता जगत की स्थितियां चाहे जैसी भी हो। सरोकारों की पत्रकारिता करने की पूरी गुंजाइश है। प्रबंधन भले ही बाजार के दवाब में कुछ क्षेत्रों में अंकुश लगा दे। पर दूसरे क्षेत्र में अवसर का खुला मैदान भी होता है। बस, सरोकारों की पत्रकारिता करने का बेचैनी बना रहे। यह बेचैनी कही न कहीं आग जरूर लगा देगी।
शुक्रवार, नवंबर 26, 2010
नया अखबार
ऐसा हमेशा होता है जब कोई नया अखबार आता है तो किसी बड़े पत्रकार को बुला लिया जाता है। कोई भी नया अखबार तुरंत नहीं जमता। बाद में निवेश करने वाले और मालिक तुरंत उसका प्रभाव और लाभ चाहते हैं। तब उन्हें लगता है कि जो लोग उनके यहां कार्य कर रहे हैं, वे अच्छे नहीं हैं। जबकि नये अखबार से साथ जुड़े पत्रकार सबसे ज्यादा मेहनत करते हैं। मालिकों की उनकी मेहनत नजर नहीं आती है। जब मेहनत की फसल आती है तो काटने वाले कोई और चले आते हैं। नये पत्रकारों को सिखने के लिए अखबार के लॉचिंग के समय जरूर जुड़ना चाहिए। लेकिन पुराने पत्रकारों ऐसे मौके को मजबूरी में ही भुनाना चाहिए। भड़ास की खबर है। मधुकर उपाध्याय आज समाज के साथ नहीं रहे। श्री मधुकर उपाध्याय जैसे वरिष्ठ और बेहतरीन पत्रकार को आज समाज के साथ अपनी पारी की शुरूआत करनी ही नहीं चाहिए थी।
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मंगलवार, नवंबर 23, 2010
आवेश जरूरी पर यह बुरी चीज है
कभी-कभी आवेश जरूरी है। पर यह बुरी चीज है। आवेश में आकर लोग क्या नहीं कर देते? पर सूझबूझ के साथ आवेश जैसा जोश व्यक्ति को सफलता की राह आसान कर सकता है। आवेश में आकर ही लोग चांद पर थूकने की कोशिश करते हैं। पर तब उनके दिमाग में यह बात नहीं होती है कि बाद में वह थूक उनके ही चेहरे पर गिरेगा।
रविवार, नवंबर 21, 2010
अपरिपक्वों की संगत
सीखाई गई बुद्धि ढ़ाई घड़ी ही काम आती है। अनुभव से जो कुछ प्राप्त होता है, वह कालजयी होती है। नया अनुभय मिला। अपरिपक्वों को अपनी संगत में रखने से कोई लाभ नहीं। इनकी संगत वैसे ही जैसे नीम हकीम खतरा ए जान।
रविवार, नवंबर 07, 2010
मन में कोने में बचपन को जिंदा रखना जरूरी
यदि किसी व्यक्ति के अंदर से साहस खत्म हो जाए तो उसे क्या कहेंगे? गंभीरता से विचार करें। कई बार बच्चे कभी-कभी ऐसे गंभीर सवाल इतनी सहजा से पूछ लेते हैं, कि उसे पूछने का साहब किसी बड़े या उम्रदराज अनुभवी लोगों में नहीं होता है। इस दृष्टिकोण से मुझे लगता है कि हर किसी को अपने अंदर के बचपन को मरने नहीं देना चाहिए। जिसके अंदर बचपन की जिंदादिली है, वह साहसी है। नहीं तो उम्र के साथ अनुभव के बोझ के साथ जीवन में निरसता आ जाती है। बड़ी खुशियों में बड़े लोग मजह मुस्कान से काम चला लेते हैं। लेकिन बच्चे जी भर कर हंसते हुए खुशियों में गोता लगाते है। लिहाजा, बड़ी उम्र और अनुभव में साथ अपने अंदर के बचपने को मरने नहीं देना चाहिए। भले ही समाज किसी बात को लेकर यह क्यों न कहे कि अमुख व्यक्ति बचकना बाते करता हैं। कम से कम समाज के इस ताने से जीवन निरसता के बोझ से तो नहीं दबा रहेगा और खुशियों को निश्चछल भाव से जी भर मनाने में कोई कंजूसी भी नहीं होगी।
मंगलवार, नवंबर 02, 2010
निश्चल बचपना की निर्भयता
बचपन में जिस निर्भयता से पटाखे फोड़ते थे, इस उम्र में वह निर्भयता नहीं रही। तो क्या यह मान लिया जाना चाहिए उम्र बढ़ने के साथ निर्भयता खत्म हो जाती है। मुझे लगता है निर्भयता खत्म नहीं होती है। निश्चल बचपन जा चुका होता है। जो लोग अपने अंदर निश्चल बचपन को बचाये रखते हैं वे ऐसे मौके पर ढेरों खुशियां बढ़ोर लेते हैं।
सोमवार, अक्टूबर 25, 2010
पेड न्यूज/हल्ला करने वालों के हाथ में कुछ नहीं, मालिक को पकड़ें
संजय स्वदेश
पेड न्यूज पर लगाम को लेकर चुनावी नियमों की ढील की बात से यह चर्चा फिर गर्म हुई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनावी माहौल में ही पेड न्यूज को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती रही है। पर अब समय के साथ पाठक भी होशियार हो चले हैं। उनके लिए खालिस न्यूज क्या है, इसकी समझ विकसित हो चुकी है। परिणाम सामने हैं। यदि पेड न्यूज का प्रभाव पाठकों पर व्यापकता से पड़ता है तो निश्चय ही कई नेताओं का कायाकल्प हो चुका होता। गत वर्ष महाराष्टÑ विधानसभा चुनाव हुये। निजी अनुभव है, जिन नेताओं ने जमकर पेड न्यूज का सहारा लिया, कुछ को लाभ तो मिला, लेकिन अधिकतर की लुटिया डूबी। हारते ही जनता के बीच के साथ पार्टी में भी किनारे पर आ गये। उससे पहले लोकसभा चुनाव में भी पेड न्यूज का खूब धंधा चला। पर पाठकों पर इसका जादू बहुत कम चला। बदलते पत्रकारिता के माहौल में पेड न्यूज को जनता जानने-पहचानने लगी है। इसलिए इसको लेकर चुनाव आयोग किसी नियम कायदे में ढील न भी दे तो चिंता की बात नहीं है। हां, मीडिया के बहाने ढील पर मीडिया जगत के लिए यह शर्म की बात जरूर है। यदि ऐसा होता है तो पेड न्यूज की मलाई खाने वाले को नुकसान तो होगा ही अखबार मालिकों के धंधे पर भी असर पड़ेगा। पर यह नियम कायदे जो भी बने, पेड न्यूज की वैसे ही चलती रहेगी, जिस तरह से सरकारी महकमे में भ्रष्टाचार रचबस चला है। सतर्कता आयोग के लाख प्रचार के बाद भी भ्रष्टाचार बढ़ते ही गया है। इसी तरह मीडिया में पेड न्यूज का भ्रटाचार भविष्य में और फलेगा-फूलेगा। पर भुगतान के आधार पर शब्दों के माध्यम से खबरों के काले धंधे को हमेशा ही अनैतिक माना जाएगा। महौल चाहे जैसे भी बदले, सैद्धांतिक पत्रकारिता का अस्तित्व कामय रहेगी। इसी अस्तित्व के सहारे पेड न्यूज का धंधा भी फलता-फूलता रहेगा। इसे रोकने की बात हमेशा होती रहेगी। इसमें भी स्टिंग हुए हैं और भी होंगे। कुछ की पोल खुलेगी, कुछ बचेंगे। जब धंधे में यह प्रवृत्ति रचबस कर एक हो गई है तो इसे अलग-थगल करना मुश्किल होगा। पेड न्यूज को केवल राजनैतिक खबरों से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है।
फिलहाल इसके लिए प्रबुद्ध लोग पेड न्यूज को रोकने की पहल कर रहे हैं। शपथ ले रहे हैं कि वे खबरों का कालाधांधा नहीं करेंगे। पर गौर करने वाली बात यह है कि जो पहल करने वाले हैं, उनके हाथ से यह मसला अब निकल चुका है। जब तक उनके हाथ में था कुछ धन बटोरे गए। जब अखबार मालिकों की आंख खुली तो उन्होंने इसे धंधे को सीधे अपने हाथ में ले लिया। पहले से पेड़ न्यूज की कमाई करने वाले पत्रकारों के हाथ में कुछ नहीं बचा तो वे अब एकजुट हुए हैं। शोर मच रहा हंै। पेड न्यूज का गुणा-गणित जान चुके अखबार मालिक नहीं चाहते हैं कि चुनाव के दौरान उनके नियुक्त पत्रकार उसका लाभ लें और वे केवल तमाशा देखें। कई समझदार मालिकों ने तो पेड न्यूज का धंधा करने के लिए चुनाव के पूर्व अखबार लाँच किये। नये संस्करण शुरू हुये। आश्चर्य की बात है कि पेड न्यूज को रोकने के लिए जितनी भी चर्चाएं और कार्यक्रम हो रहे हैं, उसमें पत्रकार ही हिस्सा ले रहे हैं। मान लें कि किसी समाचारपत्र का संपादक यह निर्णय लेता है कि वह पेड न्यूज को नकार देगा। वहीं उस पत्र का मालिक सीधे पेड न्यूज देने वालों से समझौता कर खबर प्रकाशित करने को कहे तो संपादक क्या करेंगे? दरअसल जो संगठन पेड न्यूज को लेकर चिंतित हैं और सेमिनार आदि का आयोजन करवा रहे हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसे सेमिनार, संगोष्ठियों का वक्ता समाचारपत्रों के मालिकों को बनाये, तो शायद मालिकों को पेड न्यूज पर कुछ मंथन करने का मन बनें।
पेड न्यूज पर लगाम को लेकर चुनावी नियमों की ढील की बात से यह चर्चा फिर गर्म हुई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनावी माहौल में ही पेड न्यूज को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती रही है। पर अब समय के साथ पाठक भी होशियार हो चले हैं। उनके लिए खालिस न्यूज क्या है, इसकी समझ विकसित हो चुकी है। परिणाम सामने हैं। यदि पेड न्यूज का प्रभाव पाठकों पर व्यापकता से पड़ता है तो निश्चय ही कई नेताओं का कायाकल्प हो चुका होता। गत वर्ष महाराष्टÑ विधानसभा चुनाव हुये। निजी अनुभव है, जिन नेताओं ने जमकर पेड न्यूज का सहारा लिया, कुछ को लाभ तो मिला, लेकिन अधिकतर की लुटिया डूबी। हारते ही जनता के बीच के साथ पार्टी में भी किनारे पर आ गये। उससे पहले लोकसभा चुनाव में भी पेड न्यूज का खूब धंधा चला। पर पाठकों पर इसका जादू बहुत कम चला। बदलते पत्रकारिता के माहौल में पेड न्यूज को जनता जानने-पहचानने लगी है। इसलिए इसको लेकर चुनाव आयोग किसी नियम कायदे में ढील न भी दे तो चिंता की बात नहीं है। हां, मीडिया के बहाने ढील पर मीडिया जगत के लिए यह शर्म की बात जरूर है। यदि ऐसा होता है तो पेड न्यूज की मलाई खाने वाले को नुकसान तो होगा ही अखबार मालिकों के धंधे पर भी असर पड़ेगा। पर यह नियम कायदे जो भी बने, पेड न्यूज की वैसे ही चलती रहेगी, जिस तरह से सरकारी महकमे में भ्रष्टाचार रचबस चला है। सतर्कता आयोग के लाख प्रचार के बाद भी भ्रष्टाचार बढ़ते ही गया है। इसी तरह मीडिया में पेड न्यूज का भ्रटाचार भविष्य में और फलेगा-फूलेगा। पर भुगतान के आधार पर शब्दों के माध्यम से खबरों के काले धंधे को हमेशा ही अनैतिक माना जाएगा। महौल चाहे जैसे भी बदले, सैद्धांतिक पत्रकारिता का अस्तित्व कामय रहेगी। इसी अस्तित्व के सहारे पेड न्यूज का धंधा भी फलता-फूलता रहेगा। इसे रोकने की बात हमेशा होती रहेगी। इसमें भी स्टिंग हुए हैं और भी होंगे। कुछ की पोल खुलेगी, कुछ बचेंगे। जब धंधे में यह प्रवृत्ति रचबस कर एक हो गई है तो इसे अलग-थगल करना मुश्किल होगा। पेड न्यूज को केवल राजनैतिक खबरों से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं है।
फिलहाल इसके लिए प्रबुद्ध लोग पेड न्यूज को रोकने की पहल कर रहे हैं। शपथ ले रहे हैं कि वे खबरों का कालाधांधा नहीं करेंगे। पर गौर करने वाली बात यह है कि जो पहल करने वाले हैं, उनके हाथ से यह मसला अब निकल चुका है। जब तक उनके हाथ में था कुछ धन बटोरे गए। जब अखबार मालिकों की आंख खुली तो उन्होंने इसे धंधे को सीधे अपने हाथ में ले लिया। पहले से पेड़ न्यूज की कमाई करने वाले पत्रकारों के हाथ में कुछ नहीं बचा तो वे अब एकजुट हुए हैं। शोर मच रहा हंै। पेड न्यूज का गुणा-गणित जान चुके अखबार मालिक नहीं चाहते हैं कि चुनाव के दौरान उनके नियुक्त पत्रकार उसका लाभ लें और वे केवल तमाशा देखें। कई समझदार मालिकों ने तो पेड न्यूज का धंधा करने के लिए चुनाव के पूर्व अखबार लाँच किये। नये संस्करण शुरू हुये। आश्चर्य की बात है कि पेड न्यूज को रोकने के लिए जितनी भी चर्चाएं और कार्यक्रम हो रहे हैं, उसमें पत्रकार ही हिस्सा ले रहे हैं। मान लें कि किसी समाचारपत्र का संपादक यह निर्णय लेता है कि वह पेड न्यूज को नकार देगा। वहीं उस पत्र का मालिक सीधे पेड न्यूज देने वालों से समझौता कर खबर प्रकाशित करने को कहे तो संपादक क्या करेंगे? दरअसल जो संगठन पेड न्यूज को लेकर चिंतित हैं और सेमिनार आदि का आयोजन करवा रहे हैं, उन्हें चाहिए कि वे ऐसे सेमिनार, संगोष्ठियों का वक्ता समाचारपत्रों के मालिकों को बनाये, तो शायद मालिकों को पेड न्यूज पर कुछ मंथन करने का मन बनें।
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मन की बात
सोमवार, अक्टूबर 18, 2010
साहित्य में टूटती शब्दों की मर्यादा
साहित्य को शर्मशार करते हंस और नया ज्ञानोदय
संजय स्वदेशनेट खंगालते-खंगालते, सहज ही मन में इच्छा हुई कि साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका हंस पढ़ी जाए। पत्रिका का अक्टूबर,2010 अंक डाउनलोड लिया। करीब एक दशक बाद हंस को पढ़ रहा था। पर यह क्या, एक दशक में काफी बदलावा दिखा। साहित्य की इस प्रतिष्ठित पत्रिका में पटना के रामधारी सिंह दिवाकर की एक कहानी रंडियां शीर्षक से छपी हैं। जिस संवदेना को कहानी का आधार बनाया गया है, उसका तानाबाना गजब का है। पर यथार्थ दिखाने के चक्कर में यह इस शब्द का प्रयोग शर्मशार करने वाला है।
कहानी के एक अंश है-
‘‘आज इस बड़का गांव में रंडिया ही रंडिया है. कहा है लाली यादव, पंडित बटैश झा, पुलकित राय, रघुनाथ भगत और बिसुनलाल तो चले गए दुनिया से, मगर उनके परिवारों से भी रंडियां पंचायत का चुनाव लड़ रही हैं. लाली यादव की परेनियां वाली बहू राधिका यादव, पंडित बटेश झा की बहू ममता झा, पुलिकित राय की पोती चंद्रकला राय... रंडियां ही रंडियां हैं. गांव में, हर उम्र की रंडिया.‘लेखक कहानी मेें जिस मुद्दे को उठाना चाहता है, उसमें सफल है। लेकिन शब्दों की ऐसी अर्मादित शैली उसकी स्तरीयता को निम्म कर देती है। सरस सलिस जैसी पत्रिकाएं ऐसे शब्दों को उपयोग कर जल्द ही लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं। लेकिन उनका स्तर साहित्यिक नहीं है। लोग खूब चटकारे लेकर पढ़ते हैं। पर एक उच्च कोटी की साहित्यिक पत्रिका में ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य की गरिमा निश्चय ही ठेस पहुंचाता है।
ज्ञात हो कि हंस के संस्थापक मुंशी प्रेमचंद थे। मुंशी प्रेमचंद ने अनेक मुद्दों को सरल और सहज शब्दों में बड़े ही प्रभावशाली तरीके से उठाया है। उनके लेखन में देशज शब्दों की भरमार है। इसके बाद भी वे शब्दों की शालीनता बनाये रखते हैं। आज वहीं हंस शब्दों की शालीनता की मार्यादा तोड़ रहा है। भले ही इस दिनों साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन अमर्यादित शब्दों का प्रयोग पाठकों के बीच लोकप्रियता पाने का सरल माध्यम बनता जा रहा है। यदि आज प्रेमचंद होते तो अपनी स्थापित इस पत्रिका को पढ़ कर निश्चय ही शर्मशार हो जाते।
पिछले दिनों नया ज्ञनोदय के अंक में भी ऐसा ही कुछ हुआ। महात्मा गांधी अंतरराष्टÑीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में प्रयुक्त एक शब्द को लेकर खूब तूल दिया गया। मजेदार बात यह रही है कि उस पर टीका-टिप्पणी करने वालों ने नया ज्ञानोदय का वह अंक पूरा पढ़ा ही नहीं। जबकि उस अंक में प्रकाशित अन्य कई रचनाओं में अनेक आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों के प्रयोग किये गए हैं। लेकिन बहस केवल विभूति नारायण के शब्दों पर छिड़ी रही। इससे सबसे ज्यादा लाभ नया ज्ञनोदय को हुआ। स्टॉल पर पत्रिका हाथो-हाथ बिक गई। इसके बाद जिस विषय को विशेषांक बनाया गया, हिंदी साहित्य में उसकी कोई विद्या या परंपरा नहीं रही है। एक साहित्यक पत्रिका को बेवफाई का सुपर विशेषांक निकालना उसी तरह लोकप्रिय होने का राह अपनाना है जैसे इंडिया टूटे, आऊटलुक पिछले कुछ वर्षों में सेक्स सर्वे पर कवर स्टोरी छाप कर क्षणिक लोकप्रियता पाई है।
बेवदुनिया ने कुछ भी लिखने पढ़ने की अजादी दी है। क्योंकि यहां अभी नियंत्रण नहीं है। लिहाजा, इंटरनेट की दुनिया में कई लेखकों की कुंठाएं साफ दिखती है। पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया अलग है। यहां यह संयम इस लिए जरूरी है, क्योंकि आज भी इसके पाठकों की दुनिया अगल है। महंगी साहित्यिक पत्रिकाएं खरीदने वाला पाठक इसलिए जेब ठीली नहीं करना चाहता है कि उसे एक यथार्थ मुद्दे को अमर्यादित शब्दों की चांसनी में परोसा मिलता है। ऐसी अपेक्षाएं तो छह रुपये में बिकने वाली सरस सलिल जैसी पत्रिकाओं से पूरी हो सकती है। यदि अश्लीलता ही पढ़ती है तो इससे अच्छा बाबा मस्तराम की किताबे सस्ती।
संजय स्वदेशनेट खंगालते-खंगालते, सहज ही मन में इच्छा हुई कि साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका हंस पढ़ी जाए। पत्रिका का अक्टूबर,2010 अंक डाउनलोड लिया। करीब एक दशक बाद हंस को पढ़ रहा था। पर यह क्या, एक दशक में काफी बदलावा दिखा। साहित्य की इस प्रतिष्ठित पत्रिका में पटना के रामधारी सिंह दिवाकर की एक कहानी रंडियां शीर्षक से छपी हैं। जिस संवदेना को कहानी का आधार बनाया गया है, उसका तानाबाना गजब का है। पर यथार्थ दिखाने के चक्कर में यह इस शब्द का प्रयोग शर्मशार करने वाला है।
कहानी के एक अंश है-
‘‘आज इस बड़का गांव में रंडिया ही रंडिया है. कहा है लाली यादव, पंडित बटैश झा, पुलकित राय, रघुनाथ भगत और बिसुनलाल तो चले गए दुनिया से, मगर उनके परिवारों से भी रंडियां पंचायत का चुनाव लड़ रही हैं. लाली यादव की परेनियां वाली बहू राधिका यादव, पंडित बटेश झा की बहू ममता झा, पुलिकित राय की पोती चंद्रकला राय... रंडियां ही रंडियां हैं. गांव में, हर उम्र की रंडिया.‘लेखक कहानी मेें जिस मुद्दे को उठाना चाहता है, उसमें सफल है। लेकिन शब्दों की ऐसी अर्मादित शैली उसकी स्तरीयता को निम्म कर देती है। सरस सलिस जैसी पत्रिकाएं ऐसे शब्दों को उपयोग कर जल्द ही लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं। लेकिन उनका स्तर साहित्यिक नहीं है। लोग खूब चटकारे लेकर पढ़ते हैं। पर एक उच्च कोटी की साहित्यिक पत्रिका में ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य की गरिमा निश्चय ही ठेस पहुंचाता है।
ज्ञात हो कि हंस के संस्थापक मुंशी प्रेमचंद थे। मुंशी प्रेमचंद ने अनेक मुद्दों को सरल और सहज शब्दों में बड़े ही प्रभावशाली तरीके से उठाया है। उनके लेखन में देशज शब्दों की भरमार है। इसके बाद भी वे शब्दों की शालीनता बनाये रखते हैं। आज वहीं हंस शब्दों की शालीनता की मार्यादा तोड़ रहा है। भले ही इस दिनों साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन अमर्यादित शब्दों का प्रयोग पाठकों के बीच लोकप्रियता पाने का सरल माध्यम बनता जा रहा है। यदि आज प्रेमचंद होते तो अपनी स्थापित इस पत्रिका को पढ़ कर निश्चय ही शर्मशार हो जाते।
पिछले दिनों नया ज्ञनोदय के अंक में भी ऐसा ही कुछ हुआ। महात्मा गांधी अंतरराष्टÑीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय के साक्षात्कार में प्रयुक्त एक शब्द को लेकर खूब तूल दिया गया। मजेदार बात यह रही है कि उस पर टीका-टिप्पणी करने वालों ने नया ज्ञानोदय का वह अंक पूरा पढ़ा ही नहीं। जबकि उस अंक में प्रकाशित अन्य कई रचनाओं में अनेक आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दों के प्रयोग किये गए हैं। लेकिन बहस केवल विभूति नारायण के शब्दों पर छिड़ी रही। इससे सबसे ज्यादा लाभ नया ज्ञनोदय को हुआ। स्टॉल पर पत्रिका हाथो-हाथ बिक गई। इसके बाद जिस विषय को विशेषांक बनाया गया, हिंदी साहित्य में उसकी कोई विद्या या परंपरा नहीं रही है। एक साहित्यक पत्रिका को बेवफाई का सुपर विशेषांक निकालना उसी तरह लोकप्रिय होने का राह अपनाना है जैसे इंडिया टूटे, आऊटलुक पिछले कुछ वर्षों में सेक्स सर्वे पर कवर स्टोरी छाप कर क्षणिक लोकप्रियता पाई है।
बेवदुनिया ने कुछ भी लिखने पढ़ने की अजादी दी है। क्योंकि यहां अभी नियंत्रण नहीं है। लिहाजा, इंटरनेट की दुनिया में कई लेखकों की कुंठाएं साफ दिखती है। पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया अलग है। यहां यह संयम इस लिए जरूरी है, क्योंकि आज भी इसके पाठकों की दुनिया अगल है। महंगी साहित्यिक पत्रिकाएं खरीदने वाला पाठक इसलिए जेब ठीली नहीं करना चाहता है कि उसे एक यथार्थ मुद्दे को अमर्यादित शब्दों की चांसनी में परोसा मिलता है। ऐसी अपेक्षाएं तो छह रुपये में बिकने वाली सरस सलिल जैसी पत्रिकाओं से पूरी हो सकती है। यदि अश्लीलता ही पढ़ती है तो इससे अच्छा बाबा मस्तराम की किताबे सस्ती।
रविवार, अक्टूबर 17, 2010
...क्योंकि रावण अपना चरित्र जानता है
संजय स्वदेश
कथा का तानाबाना तुलसीबाबा ने कुछ ऐसा बुना की रावण रावण बन गया। मानस मध्ययुग की रचना है। हर युग के देशकाल का प्रभाव तत्कालीन समय की रचनाओं में सहज ही परीलक्षित होता है। रावण का पतन का मूल सीता हरण है। पर सीताहरण की मूल वजह क्या है? गंभीरता से विचार करें। कई लेखक, विचारक रावण का पक्ष का उठाते रहे हैं। बुरी पृवत्तियों वाले ढेरों रावण आज भी जिंदा हैं। कागज के रावण फूंकने से इन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर जिस पौराणिक पात्र वाले रावण की बात की जा रही है, उसे ईमानदार नजरिये से देखे। विचार करें। यदि कोई किसी के बहन का नाक काट दे तो भाई क्या करेगा। आज 21वीं सदी में ऐसी घटना किसी भी सच्चे भाई के साथ होगी, तो निश्चय ही प्रतिशोध की आग में धधक उठेगा। फिर मध्य युग में सुर्पनखा के नाम का बदला रामण क्यों नहीं लेता। संभवत्त मध्ययुग के अराजक समाज में तो यह और भी समान्य बात रही होगी।
अपहृत नारी पर अपहरणकर्ता का वश चलता है। रावण ने बलात्कार नहीं किया। सीता की गरीमा का ध्यान रखा। उसे मालूम था कि सीता वनवासी बन पति के साथ सास-श्वसुर के बचनों का पालन कर रही है। इसलिए वैभवशाली लंका में रावण ने सीता को रखने के लिए अशोक बाटिका में रखा। सीता को पटरानी बनाने का प्रस्ताव दिया। लेकिन इसके लिए जबरदस्ती नहीं की। दरअसल का मध्य युग पूरी तरह से सत्ता संघर्ष और नारी के भोगी प्रवृत्ति का युग है। इसी आलोक में तो राजेंद्र यादव हनुमान को पहला आतंकवादी की संज्ञा देते हैं। निश्चय ही कोई किसी के महल में रात में जाये और रात में सबसे खूबसूरत वाटिका को उजाड़े तो उसे क्यों नहीं दंडित किया जाए। रावण ने भी तो यहीं किया। सत्ता संघर्ष का पूरा जंजाल रामायण में दिखता है। ऋषि-मुनि दंडाकारण्य में तपत्या कर रहे थे या जासूसी। रघुकुल के प्रति निष्ठा दिखानेवाले तपस्वी दंडाकारण्य अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह क्यों करते थे। उनका कार्य तो तप का है। जैसे ही योद्धा राम यहां आते हैं, उन्हें अस्त्र-शस्त्रों की शक्ति प्रदान करते हैं। उन्हीं अस्त्र-शस्त्रों से राम आगे बढ़ते हैं। मध्ययुग में सत्ता का जो संघर्ष था, वह किसी न किसी रूप में आज भी है। सत्ताधारी और संघर्षी बदले हुए हैं। छल और प्रपंच किसी न किसी रूप में आज भी चल रहे हैं। सत्ता की हमेशा जय होती रही है। राम की सत्ता प्रभावी हुई, तो किसी किसी ने उनके खिलाफ मुंह नहीं खोला। लेकिन जनता के मन से राम के प्रति संदेह नहीं गया। तभी एक धोबी के लांछन पर सीता को महल से निकाल देते हैं। वह भी उस सीता को तो गर्भवती थी। यह विवाद पारिवारीक मसला था। आज भी ऐसा हो रहा है। आपसी रिश्ते के संदेह में आज भी कई महिलाओं को घर से बेघर कर दिया जाता है। फिर राम के इस प्रवृत्ति को रावण की तरह क्यों नहीं देखी जाती है। जबकि इस तरह घर से निकालने के लिए आधुनिक युग में घरेलू हिंसा कानून के तहत महिलाआें को सुरक्षा दे दी गई है। बहन की रक्षा, उनकी मर्यादा हनन करने वालों को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा, पराई नारी को हाथ नहीं लगाने का उज्ज्वल चरित्र तो रावण में दिखता है। लोग कहते भी है कि रावण प्रकांड पंडित था। फिर भी उसका गुणगणान नहीं होता। विभिषण सदाचारी थे। रामभक्त थे। पर उसे कोई सम्मान कहां देता है। सत्ता की लालच में रावण की मृत्यु का राज बताने की सजा मिली। सत्ता के प्रभाव से चाहे जैसा भी साहित्या रचा जाए, इतिहास लिखा जाए। हकीकत को जानने वाला जनमानस उसे कभी मान्यता नहीं देता है। तभी तो उज्ज्वल चरित्र वाले विभिषण आज भी समाज में प्रतिष्ठा के लिए तरसते रहे। सत्ता का प्रभाव था, राम महिमा मंडित हो गए। पिता की अज्ञा मानकर वनवास जाने तक राम के चरित्र पर संदेह नहीं। लेकिन इसके पीछे सत्ता विस्तार की नीति जनहीत में नहीं थी। राम राजा थे। मध्य युग में सत्ता का विस्तार राजा के लक्षण थे। पर प्रकांड पंडित रावण ने सत्ता का विस्तार का प्रयास नहीं किया। हालांकि दूसरे रामायण में देवताओं के साथ युद्ध की बात आती है। पर देवताओं के छल-पंपंच के किस्से कम नहीं हैं।
काश, कागज के रावण फूंकने वाले कम से कम उसके उदत्ता चरित्र से सबक लेते। बहन पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए हिम्मत दिखाते। उसकी रक्षा करते। परायी नारी के साथ जबरदस्ती नहीं करते। ऐसी सीख नहीं पीढ़ी को देते। समाज बदलता। मुझे लगता है कि राम चरित्र की असंतुलित शिक्षा का ही प्रभाव है कि 21वीं सदी में भी अनेक महिलाएं जिस पति को देवता मानती है, वहीं उन पर शक करता है, घर से निकालता है। संभवत: यहीं कारण है कि आज धुं-धुं कर जलता हुए रावण के मुंह से चीख निकलने के बजाय हंसी निकलती है। क्योंकि वह जनता है कि जिस लिए उसे जलाया जा रहा है, वह चरित्र उसका नहीं आज के मानव रूपी राम का है।
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सोमवार, अक्टूबर 04, 2010
राष्टÑमंडल खेल के समापन के बाद दिखेंगी विकृतियां
राष्टÑमंडल खेल शुरू हो गये। करीब 70 हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। पर यह तो रकम खर्च की है। इसके पीछे जो कुछ नष्ट हुआ है, उसकी कीमत लगाए, तो इससे कहीं ज्यादा होगा। इस खेल के बहाने से भले ही दिल्ली दुल्हन जैसी सजी-धजी हो। पर दुलहन की यह खूबसूरती महज कुछ खास इलाकों तक ही सीमित है। पूर्वी दिल्ली में में खेलगांव बना है। पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा हो आइएं, जमीनी हकीकत का अंदाज हो जाएगा। खेल के बहाने दिल्ली से गरीब हटा दिये गये। खबर आ रही है कि अब दिल्ली के घरों में नौकर-चाकर के टोटे पड़ गए हैं। सब्जी-भाजी बेचने वालों को दिल्ली से बाहर निकल गए। बड़े दुकानदारों की चांदी हो गई। किराया बढ़ने से मकान मालिकों की धौंस बढ़ गई। फिलहाल दिल्ली राष्ट्रमंडल खेले के जश्न में डूबी है। पर इसकी बुनियाद में जो अमानवीयता को दबाई गई है, उसके बदनूमा दाग इस खेले के बाद दिखेंगे। किसी जामाने से दिल्ली में एसिायाड़ गेम हुए थे। साऊथ एक्स चमक गया। पर साऊथ एक्स में आपसी भाईचारा गायब हो गया। अनेक तरह के असमाजिक घटाएं साऊथ एक्स से आती रही।
इतिहास गवाह है जहां भी समृद्धि और प्रतिष्ठा के लिए गरीबों का गला घोंटा गया, वहां समृद्धि और प्रतिष्ठा तो आई, पर मानवीय संवेदनाओं को सहेजने वाला समाज खत्म हो गया। विकृत मानासिकता हावी हो गई। ऐसे समाज और संस्कृति में गुजर-बसर करने वाले संवेदनशील भीड़-भाड़ में भी तन्हा रहते हैं। कोसते हैं। राष्टÑमंडल खेल के आयोजन की विकृतियां इसके समापन के बाद दिखेगी।
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इतिहास गवाह है जहां भी समृद्धि और प्रतिष्ठा के लिए गरीबों का गला घोंटा गया, वहां समृद्धि और प्रतिष्ठा तो आई, पर मानवीय संवेदनाओं को सहेजने वाला समाज खत्म हो गया। विकृत मानासिकता हावी हो गई। ऐसे समाज और संस्कृति में गुजर-बसर करने वाले संवेदनशील भीड़-भाड़ में भी तन्हा रहते हैं। कोसते हैं। राष्टÑमंडल खेल के आयोजन की विकृतियां इसके समापन के बाद दिखेगी।
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शनिवार, अक्टूबर 02, 2010
शास्त्रीजी को भी नमन

संजय स्वदेश
बचपन में में हमारे चाचा ने चाचा नेहरू के बारे में बताया, कि वे बच्चों से बहुत प्रेम करते थे। इसलिए उनका नाम चाचा नेहरू पड़ा। स्कूली किताबों में भी चाचा नेहरू जी के बारे में पढ़ा। कैसे बच्चों के लिए एक गरीब के सारे गुब्बारे खरीद लेते हैं। चाचा ने गांधीजी के बारे में भी बताया। उन्होंने देश का अजाद कराया। अकेले। एक लंगोटी पर। बताया कि जब चंपारण आये थे तब एक महिला को आधे वस्त्र में देखा। मन इतना विचलित हुआ कि ताउम्र एक धोती में गुजार दिया। चाचा ने लाल बहादुर शास्त्रीजी के बारे में बताया। कैसे, नदी तैरकर पढऩे जाते थे।
तीनों महापुरुषों में सबसे ज्यादा प्रभावित चरित्र शास्त्री जी का लगा। बड़ा हुआ तो समझ में आया कि एक प्रधानमंत्री को इतना समय कैसे मिल सकता है कि वह दूसरे कार्यों को दरकिनाार कर बच्चों को प्यार करें। हां, किसी पार्टी, आयोजन या अन्य किसी समारोह में बच्चे हों और वहां उन्हें लाड़-दुलार कर लिया। प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले नेरूरीजी के ये कार्य इतिहास में दर्ज हो गया। जबकि उसके बाद कई नेता हुये जिन्होंने बच्चों को खूब प्यार किया पर उन्हें चचा का वह दर्जा नहीं प्राप्त हो पाया, जिस दरजे पर नेहरूजी है।
गांधी तो राष्टपित तो हो गया। पद से ज्यादा कद। बापू का कद ही इतना बड़ा है कि सब छोटे पड़ गये। पर बापू के दाम पर भी कई छिंटे लगाये गए। पर शास्त्रीजी की क्या गलती? 2 अक्टूबर को जितना लोग बापू को याद करते हैं, उससे तुलना में शास्त्री जी तो कुछ भी याद नहीं किया जाता है। राजघाट सजता-धजता है, भीड़ लगती है, लेकिन शास्त्रीजी की समाधी सूनी रहती है। भूले-बिसरे शास्त्री परिवार या कोई अन्य औपचारिकवश आ जाए तो बात दूसरी है।
दरअसल हमारी प्राथमिक पाठ्यकपुस्तों में शास्त्रीजी संक्षिप्त जीवन का शामिल करना उसी तरह जरूरी होना चाहिए जैसे चाचा नेहरू और गांधी के जीवन प्रसंग शामिल हैं। बाल मन पर ऐसे महापुरुषों के जीवन के प्रसंगों का गहरा असर पड़ता है। शास्त्री के सिर पर बचपनप में ही पिता का साया उठ गया। मां ने संघर्षों से पाला। खुद संघर्ष किया। अपनी योग्याता साबित की। इनके जीवन के प्रसंग बाल विषम परिस्थियों में की मजबूती के साथ डटे रहने का आत्मविश्वास भरते हैं। नेहरू परिवार के संपर्क में आने से कांग्रेस कमेटी काम का मौका मिला। उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख पद पर जाकर उन्होंने जो कुछ किया, उससे उनका कद और बढ़ गया। सरल-सहज और सच्चे व्यक्तित्व का मजबूत प्रभाव इतना था कि उनके प्रधानमंत्रीत्व काल में स्वयं इंदिरा भी भयभीत थी।

कमजोर भारत को जय-जवान और जय किसान के नारे से इतन मजबूत बना दिया कि दुश्मनसेना को मुंह की खानी पड़ी। ताश्कंद में रहस्यम मौत रहस्य ही रह गया। सरकार ने कभी भी शास्त्री जी के मौत के रहस्य को सुलझाने की कोशिश नहीं की। दिल का दौरा पडऩे की हुई मौत कह कर इनकी जीवन का इतिश्री कर दिया गया। जबकि जो व्यक्ति जीवन के विषम परिस्थितियों से जूझते हुए इतना आगे आए वह इतना कमजोर नहीं हो सकता है कि उसे दिल का दौरा आये और वह दुनिया से चल बसे।
ऐसे आदर्श और प्रेरणादायी व्यक्तित्व का उनके जन्मदिवस पर शत, शत नमन है।
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शुक्रवार, अक्टूबर 01, 2010
पंचायती फैसले की तरह है कोर्ट का निणर्य
संजय स्वदेशअयोध्या प्रकरण पर रामलला की जमीन में आधे आधे के बटवारे पर मुलायम सिंह का बयान है। फैसले में कानून पर आस्था भारी दिख रही है। भविष्य में इसके कई परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। निश्चय ही कानून के खिलाड़ी इस प्रकरण में फैसले का हवाला देकर उन मामलों में जीत हासिल करने की कोशिश करेंगे, जिसमें किसी दूसरे की जमीन का दबंगई से कब्जा जमाया गया है। कई मामले हैं, जिसमें आस्था के आगे कानून को नरमी दिखानी पड़ी है।
यदि इस मामले में कानून के अनुसार निर्णय दिया जाता तो फैसला पूरी तरह किसी एक समुदाय के पक्ष में जाता। जरा साचिये, फिर देश में क्या होता। उन्नामदी मसूमों के रक्त से खेलते। पर कोर्ट की सूझबूझ और जनता के संयम ने उन्नादियों के मंसबूों पर पानी फेर दिया है। पंचायती निर्णय को स्वीकारने की परंंपरा पुरानी रही है। कोर्ट का निर्णय पंचायती निणर्य की तरह की सबको खुश कर बीच का रास्ता निकालने वाला है।
मुलायम की बात सही है। आस्था कानून पर भारी पड़ी है। पर यह बात को कानून की बुनियाद में भी है कि कई बार जहां काूनन की पेचिदगियां होती है, उसमें अदालत स्व विवेक से भी निर्णय देता है। लेकिन इस निर्णय में कोर्ट ने कई तत्थों को आधार बनाया है। और तीन जजों में फैसला बहुमत से लिया गया है। पर एक निर्णय से एक संकेत तो मिल ही गया है कि गलत मंसूबों के अदालत न्याय देगी और न ही जनता अब उसे प्रश्रय देगी। कम से कम अयोध्या मामले में पूरा देश तो एकमत है ही। निर्णय से पूर्व तनाव भरा जो महौल बना, उसके लिए मीडिया और सरकार कम दोषी नहीं रही है।
दबंग लोग सबक लें...इस फैसले से उन लोगों को भी सबक लेनी चाहिए जो अपने का समाज में प्रभावशाली और बाहुबली मानते हैं। दबे-कुचले की जमीन हथिया लेते हैं। बाबर ने जो गलती की, उसका नतीजा हमने 1992 में देख लिया। जो लोग दूसरे की जीमन हथियाएंगे, जरूरी नहीं कि उनकी आने वाली पीढिय़ां उनके जैसे दबंग रहेगी। कालचक्र में कमजोर, पीडि़त पक्ष की नश्ले भी मजबूत होकर उभरेंगी। वे अपने पूर्वजों पर हुए जुल्म की खोज-खबर लेगी। तब तक जुल्म ढाने वाले दंबंगों की अगली पुश्ते अपने पूर्वजों की गलती से अनजान रहेगी। वह भी मासूम रहेगी। तब क्या होगा। गलती पूर्वजों की सजा सजा पुश्तों को मिले। इसलिए अपने तत्कालीन सुख के लिए दूसरे का हक न मारे। भविष्य में उनकी पुश्ते उनकी लगतियों का बोझ उठाएगी।
यदि इस मामले में कानून के अनुसार निर्णय दिया जाता तो फैसला पूरी तरह किसी एक समुदाय के पक्ष में जाता। जरा साचिये, फिर देश में क्या होता। उन्नामदी मसूमों के रक्त से खेलते। पर कोर्ट की सूझबूझ और जनता के संयम ने उन्नादियों के मंसबूों पर पानी फेर दिया है। पंचायती निर्णय को स्वीकारने की परंंपरा पुरानी रही है। कोर्ट का निर्णय पंचायती निणर्य की तरह की सबको खुश कर बीच का रास्ता निकालने वाला है।
मुलायम की बात सही है। आस्था कानून पर भारी पड़ी है। पर यह बात को कानून की बुनियाद में भी है कि कई बार जहां काूनन की पेचिदगियां होती है, उसमें अदालत स्व विवेक से भी निर्णय देता है। लेकिन इस निर्णय में कोर्ट ने कई तत्थों को आधार बनाया है। और तीन जजों में फैसला बहुमत से लिया गया है। पर एक निर्णय से एक संकेत तो मिल ही गया है कि गलत मंसूबों के अदालत न्याय देगी और न ही जनता अब उसे प्रश्रय देगी। कम से कम अयोध्या मामले में पूरा देश तो एकमत है ही। निर्णय से पूर्व तनाव भरा जो महौल बना, उसके लिए मीडिया और सरकार कम दोषी नहीं रही है।
दबंग लोग सबक लें...इस फैसले से उन लोगों को भी सबक लेनी चाहिए जो अपने का समाज में प्रभावशाली और बाहुबली मानते हैं। दबे-कुचले की जमीन हथिया लेते हैं। बाबर ने जो गलती की, उसका नतीजा हमने 1992 में देख लिया। जो लोग दूसरे की जीमन हथियाएंगे, जरूरी नहीं कि उनकी आने वाली पीढिय़ां उनके जैसे दबंग रहेगी। कालचक्र में कमजोर, पीडि़त पक्ष की नश्ले भी मजबूत होकर उभरेंगी। वे अपने पूर्वजों पर हुए जुल्म की खोज-खबर लेगी। तब तक जुल्म ढाने वाले दंबंगों की अगली पुश्ते अपने पूर्वजों की गलती से अनजान रहेगी। वह भी मासूम रहेगी। तब क्या होगा। गलती पूर्वजों की सजा सजा पुश्तों को मिले। इसलिए अपने तत्कालीन सुख के लिए दूसरे का हक न मारे। भविष्य में उनकी पुश्ते उनकी लगतियों का बोझ उठाएगी।
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गुरुवार, सितंबर 30, 2010
न तूम हारे न हम जीते
आखिर वर्षों इंतजार के बाद अयोध्या प्रकरण में अदालत को निर्णय आ गया। यह कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह इसलिए कि इसमें हर पक्ष को खुश करने की कोशिश है। देश में उत्पन्न माहौल में सधा हुआ निणर्य है। कुल मिलाकर स्थिति न तुम हारे, न हम जीते जैसी है। रामचंद्र भले भले ही रामायण और रामचरित मानस के पात्र हो। लेकिन कोर्ट ने इस आस्था को प्रमाणित कर दिया कि रामचंद्र की पावन जन्मभूमि अयोध्या ही थी।
खैर, यदि कोई पक्ष इस निर्णय के खिलाफ अदालत में नहीं जाए तो फैसले को लगाू कराना अब बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। बेहतर होता कि सुन्न वक्फ बोर्ड या कोई अन्य संगठन अथवा कोई व्यक्ति विशेष इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की की शरण में जाने के बजाय, इस ऐतिहासिक अध्याय को यहीं विराम देकर नई पीढ़ी को शांति और अमन एक एक नया सौगात दे दे।
खैर, यदि कोई पक्ष इस निर्णय के खिलाफ अदालत में नहीं जाए तो फैसले को लगाू कराना अब बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। बेहतर होता कि सुन्न वक्फ बोर्ड या कोई अन्य संगठन अथवा कोई व्यक्ति विशेष इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय की की शरण में जाने के बजाय, इस ऐतिहासिक अध्याय को यहीं विराम देकर नई पीढ़ी को शांति और अमन एक एक नया सौगात दे दे।
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बुधवार, सितंबर 29, 2010
...फिर कहां कोई पूछेगा अयोध्या को
अयोध्या प्रकरण। इंंतजार खत्म होने को है। कुछ भी हो सकता है। संभवत देश एक नई करवट ले। इस करवट से शायद किसी समुदाय विशेष को चैन न मिले। पर एक बात तो तय-सी दिखती है, प्रकरण उच्चतम न्यायालय जाएगा जरूर। यदि किसी पक्ष को उच्चम न्यायालय की शरण में जाने से देश को 1992 जैसे हालात नहीं देखने को मिले तो अच्छा होगा।
जमाना गुजर चुका है, नई पीढ़ी को न मंदिर चाहिए और न ही मस्जिद। सुख-चैन से रोटी चाहिए। अच्छी पैकेज की नौकरी। एैस की जिंदगी। ऐसी पीढ़ी की एक पौध और आ जाए फिर कहां कोई पूछेगा अयोध्या को।
जमाना गुजर चुका है, नई पीढ़ी को न मंदिर चाहिए और न ही मस्जिद। सुख-चैन से रोटी चाहिए। अच्छी पैकेज की नौकरी। एैस की जिंदगी। ऐसी पीढ़ी की एक पौध और आ जाए फिर कहां कोई पूछेगा अयोध्या को।
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