कृषि/विदर्भ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कृषि/विदर्भ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, अगस्त 06, 2010

इस बार खूब चमकेगा 'सफेद सोनाÓ

-विशेषज्ञों ने लगाया 400 लाख क्विंटल कपास होने का अनुमान
-मानसून फेर सकता है उम्मीदों पर पानी
संजय स्वदेश
नागपुर।
कपास फसल के भारी नुकसान के लिए प्रसिद्ध विदर्भ में कपास की खेती से किसानों को इस बार उम्मीद की नई किरण जगी है। विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि इस बार विदर्भ में करीब 400 लाख क्विंटल कपास का उत्पादन हो सकता है। यदि विशेषज्ञों का अनुमान सही निकला तो एक दशक में यह पहला ऐसा मौका होगा, जब कपास उत्पादन करने वाले किसानों के चहरे पर एक मुस्कान आएगी। अभी तक विदर्भ में सबसे ज्यादा कपास उत्पादक किसानों ने ही आत्महत्या की है। ज्ञात हो कि पूरे विदर्भ में करीब 3 लाख हेक्टेयर भूमि में में कपास की खेती होती है।
्रमहाराष्ट्र राज्य को-ऑपरेटिव कॉटन-ग्वार मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के चेयरमैन एन.पी. हिरानी ने बताया कि इस बार खरीफ की फसल की प्रारंभिक रिपोर्ट काफी सकारात्मक है। ऐसा लगता है कि इस बार पिछले वर्ष की तुलना में करीब 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा कपास की उपज होगी। हालांकि बीते वर्ष में भी कपास की उपज कम हुई थी। पिछले वर्ष जहां 325 लाख क्विंटल कपास की उपज हुई थी, वहीं इस वर्ष करीब 400 लाख क्विंटल कपास होने की संभावना दिख रही है। हिरानी ने राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ष कपास की उपज करीब 10 से 15 प्रतिशत तक बढऩे की संभावना जतायी है। देश भर में करीब 400 लाख हेक्टेयर में कपास की खेेती होती है, इसमें सबसे ज्यादा विदर्भ में उपज होती है। लेकिन प्रति हेक्टेयर कपास उत्पादन में फिलहाल गुजरात और पंजाब आगे है।
फेडरेशन सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक राज्य सरकार बाजार में कपास के मूल्य को संतुलित रखने के लिए निर्यात नहीं करने का निर्णय लिया है। हालांकि वायदा करोबार में कपास पहले से ही तीन हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक रहा है। लिहाजा, इस बार के खारीफ के मौसम में कपास के उत्पादन से किसानों की आय बढऩे की संभावना बढ़ती दिख रही है। वहीं अंतरराष्ट्रीय संकेत भी सकारात्मक हैं। अगले माह चीन और यूएस के बाजार में कपास की बिक्री की शुरुआत होते ही स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी।
यदि दोनों बाजार में मूल्य अच्छे रहे तो भारतीय बाजार में भी कपास की मजबूती दिखेगी। लेकिन थोड़ी-सी परेशानी मानसून को लेकर है। फिलहाल अगस्त माह तक मानसून ठीक रहा है। अगले माह में भी मानसून के ठीक रहने की संभावना है। करीब 102 प्रतिशत वर्षा होने की उम्मीद जताई जा रही है। यदि आगामी दिनों में मानसून उम्मीदों पर पानी फेरता है तो उपज पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा इस बार बीज और खाद के मूल्यों में भी बढ़ोतरी हुई है। इस कारण फेडरेशन ने इस बार कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से रखने का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है। बीते वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य 3000 रुपये प्रति क्विंटल था।
००००

मंगलवार, जून 01, 2010

किसानों के राहत के 3750 करोड़ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा


दिल्ली जाएंगी विदर्भ की किसान विधवाएं

नागपुर। विदर्भ की विधवाएं अब अपना दुखड़ा सुनाने दिल्ली जाएंगी। प्रधानमंत्री कार्यालय के सामने जाकर वे प्रधानमंत्री को बताने की कोशिश करेंगी कि कैसे प्रधानमंत्री राहत पैकेज के नाम पर जो कुछ विदर्भवासियों को दिया गया, वह सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और उनके हालात बद से बदतर हो गये हैं।
विदर्भ की एक विधवा कलावती का नाम लेकर देशभर में विदर्भ की विधवाओं पर ध्यान खींचने वाले राहुल गांधी भी अब कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। चुनाव में कलावती को न खड़ा होने देने के लिए कांग्रेस ने भले ही एड़ी चोटी का जोर लगाकर उन्हें मैदान में उतरने से रोक दिया हो, लेकिन अब उसी कांग्रेस के शासनकाल में प्रधानमंत्री राहत पैकेज पर जमकर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। राज्य की पब्लिक एकाउण्ट्स कमेटी ने नवंबर 2009 में सदन पटल पर जो रिपोर्ट रखी थी उसमें बताया था कि प्रधानमंत्री राहत पैकेज के नाम पर जो 3750 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं।
विदर्भ जन आंदोलन समिति और विदर्भ शेतकारी विधवा संघटना की ओर से यवतमाल जिले के वांदाकोड़ा में 1 जून से शुरू हुए अनिश्चितकालीन धरने के बाद विदर्भ जन आंदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी ने कहा कि हम अपनी मांग लेकर दिल्ली जाएंगे क्योंकि राज्य सरकार एक बार फिर 7650 करोड़ के सिचाईं पैकेज की मांग कर रही हैं। हमारी मांग है कि यह पैसा भ्रष्टाचार की भेंट न चढ़े बल्कि विदर्भ के तीस लाख किसानों के हित में खर्च किया जाए। किशोर तिवारी कहते हैं कि विदर्भ में पैकेज के नाम पर लूटपाट का बोलबाला है और किसानों की हालत जस की तस बनी हुई है। वे मांग कर रहे हैं कि राहत पैकेज की सीबीआई जांच करवाई जाए ताकि राहत के नाम पर भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सके और विदर्भ की विधवाओं को उनका वाजिब हक मिल सके। किशोर तिवारी कहते हैं कि राहत पैकेज के नाम पर राज्य के नौकरशाह बहुराष्ट्रीय कंपनियों और कुछ नेताओं के साथ मिलकर पैसों की बंदरबाट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विदर्भ में किसान आत्महत्याएं बदस्तूर जारी हैं। ऐसे वक्त में भी अगर हमारे नौकरशाह इतने संवेदनहीन और व्यापारिक कंपनियां अपना मुनाफा देख रही हैं तो यह राष्ट्र और महाराष्ट्र की सरकार के लिए डूब मरने की बात है।
००००

मंगलवार, मई 11, 2010

संघ परिवार वाले इतने कपटी हो सकते हैं : सहाय


लोभियों के जाल में फंसा झारखंड, राज्यपाल शीघ्र दखल लें : सहाय


नागपुर। झारखंड आज लोभियों के जाल में बुरी तरह फंस चुका है। पिछले 20 दिनों से वहां सरकार नाम की कोई चीज नहीं है। अनिश्चित राजनीतिक स्थितियों के बीच राज्यपाल को दखल लेना जरूरी हो गया है। यह कहना है केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री सुबोधकांत सहाय का। वे सोमवार की शाम नागपुर में पत्रकारों से चचा्र कर रहे थे। सहाय ने कहा कि लोभियों के जाल में फंस चुके झारखंड राज्य का एक-एक अंग लोभ नोंच रहे हैं। भाजपा वहां जिस तरह का राजनीतिक खेल खेल रही है, उससे उसका लोभी चेहरा पहली बार उजागर हुआ है। भाजपा क्षेत्रीय पार्टियों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर रही है। यह पहली बार देखने में आया है कि संघ परिवारर वाले इतने कपटी हो सकते हैं।
सहाय ने कहा कि बिहार से अलग होने पर झारखंड राजस्व तथा विद्युत उत्पादन में सरप्लस था, लेकिन पिछले 10 में से 8 वर्षों तक झारखंड में भाजपा की सरकार ने झारखंड को काफी पीछे ले जाकर छोड़ दिया है। पहले झारखंड के 3 जिलों में ही नक्सलवाद था, आज वह 24 जिलों में फैल चुका है। आज भाजपा झारखंड के साथ घिनौना मजाक कर रही है। झारखंड के साथ ही बने छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड आज कहां से कहां पहुंच गए लेकिन झारखंड लगातार पीछे जा रहा है। भाजपा को इसका प्रायश्चित करना ही होगा। आज भाजपा इस प्रयास में है कि जो भी उसके स्वार्थ की पूर्ति करेगा, वही मुख्यमंत्री बनेगा। इसी कारण से झारखंड में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। भाजपा संसदीय बोर्ड कोई ठोस फैसला नहीं ले पा रहा है। यह समझ में नहीं आ रहा है कि यह संसदीय बोर्ड है या मदारियों का अड्डïा! झामुमो नेता शिबू सोरेन आज परिवारवालों के अलावा भाजपा के कारण भी निरीह, असहाय हो चुके हैं। झामुमो के विधायकों को हाईजैक करने का प्रयास भाजपा कर रही है जिससे स्थिति खराब हो चुकी है। राज्यपाल को तुरंत दखल लेना जरूरी हो गया है।

सामूहिक खेती करें किसान
सहाय ने विदर्भ के बदहाल किसानों को सामूहिक खेती करने का आह्ïवान करते हुए कहा कि इसमें उनका तो लाभ होगा ही, निवेशकों का भी लाभ होगा। अमरावती में सोमवार को आयोजित निवेशक सम्मेलन को बेहद सफल बताते हुए सहाय ने कहा कि इसमें कृषि व अन्य उद्योगों से जुड़े उद्योजक शामिल हुए थे। अमरावती में फुड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री जरूरी बताते हुए सहाय ने कहा कि इसके लिए सरकार पूरी मदद करेगी। उन्होंने किसानों व निवेशकों से मिलकर सामूहिक खेती करने की सलाह दी। निवेशक कृषि उद्योग में पैसा लगाएंगे और किसान मेहनत करेगा। नुकसान होने पर निवेशक सहेगा। फुड प्रोसेसिंग यूनिट को राज्य और केंद्र सरकार मिलकर 25 प्रतिशत या 50 लाख रुपये की मदद करेंगे। राज्य सरकार क्वालिटी कंट्रोल लैब के लिए 100 प्र.श. तथा निजी क्षेत्र की कंट्रोल लैब को 50 प्र.श. तक मदद केंद्र सरकार देगी। फुड प्रोसेसिंग डिप्लोमा-डिग्री कोर्स चलाने वाले कालेजों को भी उनका मंत्रालय हरसंभव मदद करेगा। सहाय ने कहा कि किसान बाजारोन्मुखी खेती करते हैं तो उन्हें काफी लाभ मिलेगा। देश में हरितक्रांति लाना हो तो सामूहिक खेती ही एकमात्र चारा है। खेती व्यापार आधारित होनी चाहिए। किसान इससे 10,000 रु. प्रतिमाह कमाएगा तो भी राजा बन जाएगा। खेती में निवेश करने वाले को राज्य सरकार ने भी प्रोत्साहित करना चाहिए। अगले एक-दो माह में केंद्र सरकार सामूहिक खेती के बारे में ठोस निर्णय लेगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में केंद्र सरकार विदर्भ के उद्योगों को प्राथमिकता देगी बशर्ते वे कृषि आधारित उद्योग हों। चर्चा के समय राज्य के पशु संवर्धन व दुग्ध विकास मंत्री नितिन राऊत भी उपस्थित थे।
0000

सोमवार, अप्रैल 12, 2010

भीषण गर्मी से सूख रहे हैं विदर्भ के तालाब

नागपुर। बढ़ती गर्मी के साथ विदर्भ के जलाशयों का पानी सूखने लगा है। चार बड़े जलाशय सूख गए हैं। इससे जलसंकट गहराने की आशंका है। प्राप्त जानकारी के अनुसार गोंदिया जिले के पुजारीटोला, कालीसरार, गढ़चिरोली जिले के दिना, वर्धा जिले का निम्र वर्धा में अब पानी नहीं बचा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार तोतलाडोह में 2990 लाख घनमीटर पानी मौजूद है। पिछले सप्ताह यहां 3190 लाख घनमीटर पानी था। 200 लाख घनमीटर पानी कम हो गया। कामठी खैरी में अभी 650, रामटेक में 20, निम्र वना (नांद वडग़ांव) 60, इटियाडोह 730, सिरपुर 410, असोलमेंढा 20, बोर 440, धाम 180, पोथरा में 110 लाख घनमीटर पानी है। पिछले सप्ताह की तुलना में 17 प्रतिशत पानी कम हो गया है। नागपुर विभाग में मध्यम प्रकल्पों की संख्या 40 है। इसमें नागपुर जिले के 13 प्रकल्पों में 580 लाख घनमीटर पानी है। पिछले सप्ताह इन जलाशयों में 610 लाख घनमीटर पानी था। भंडारा के 4 जलाशयों में पानी नहीं लाख घनमीटर पानी है। इसी प्रकार चंद्रपुर जिले के 8 प्रकल्पों में 110, वर्धा जिले के 5 प्रकल्पों में 200 मिलाकर कुल 940 लाख घनमीटर पानी मौजूद है। पिछले सप्ताह इन जलाशयों में 990 लाख घनमीटर पानी था। नागपुर जिले के जलसंकट से निपटने के लिए 2 अप्रैल को पालकमंत्री शिवाजीराव मोघे ने समीक्षा बैठक की थी। इसमें उन्होंने जलसंकट से निपटने के उपाय करने के निर्देश दिए थे। जलाशयों की स्थिति के बारे में जिलाधिकारी प्रवीण दराड़े ने पूछने पर बताया कि जिले में जलसंकट की स्थिति नहीं है। क्योंकि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार अच्छी वर्षा हुई थी। जहां जलसंकट है, वहां कुओं को गहरा बनाना तथा बोरवेल बनाने जैसे काम शुरू किए गए है। जलसंकट से निपटने के लिए आठ करोड़ की लागत की योजना बनाई गई है।

शनिवार, मार्च 13, 2010

...तो किसानों के खून से कब लाल होगी काली मिट्टी

विदर्भ की याद आखिरकार आई। महिला आरक्षण विधेयक ने सारे मुद्दे गौण कर दिए थे। किसान आत्महत्या की घटनाओं को तो जैसे भूला ही दिया गया। लेकिन देर आए, दुरुस्त आए। विपक्ष ने शुक्रवार को राज्यसभा में महाराष्ट्र में किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने का मुद्दा उठाया और सरकार से इस संबंध में तुरंत ध्यान देने और प्रभावित क्षेत्र के लिए पैकेज देने की मांग की। इस दौरान एक बात अपने आप में काफी महत्वपूर्ण रही कि दलभगत भावना को मानवता चीरती हुई आगे बढ़ी। शिवसेना के मनोहर जोशी ने शून्यकाल के दौरान विदर्भ में किसानों की आत्महत्याएं जारी रहने का मुद्दा उठाया और कहा कि सरकार को इस ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने तो सवाल भी किया कि किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं या उन्हें क्या मदद दी जा रही है। एकदम जायज। उनकी बातें दो-टूक रहीं। उन्होंने इस मामले में केन्द्र एवं राज्य सरकार को प्रभावित किसानों को मदद देने के लिए तुरंत उपाय करने की भी सलाह दी। अब बारी भाजपा के प्रकाश जावडेकर की। उन्होंने भी इस समस्या को काफी ज्वलंत बताते हुए कहा कि पिछले कुछ महीनों में एक हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। प्रधानमंत्री के पैकेज के बावजूद आत्महत्या की घटनाओं पर रोक नहीं लग सकी है। प्रधानमंत्री का पैकेज विफल रहने का आरोप लगाते हुए उन्होंने मांग की कि वहां के किसानों को राहत देने के लिए एक और पैकेज की आवश्यकता है। जावडेकर ने तो बकायदा आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में किसान ऊंची ब्याज दर पर निजी क्षेत्र से ऋण लेते हैं। उन्हें किसानों की ऋणमाफी योजना का लाभ नहीं मिला और वे अब भी ऋण के जाल में फंसे हुए हैं। उन्होंने कहा कि जिन किसानों को ऋण माफी योजना का लाभ मिला है, उन्हें दोबारा ऋण नहीं मिल रहा है। इससे उन्हें भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। शिवसेना के भरत कुमार राउत ने यवतमाल जिले में एक महिला किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में हजारों किसानों ने वहां आत्महत्याएं की हैं। सरकार के आश्वासन के बावजूद वहां ऐसी घटनाएं रूकी नहीं हैं। राउत ने कहा कि वहां के कई क्षेत्र सूखे की चपेट में हैं और सरकार को इस संबंध में ध्यान देना चाहिए। उन्होंने किसानों की समस्याओं की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति बनाए जाने की मांग की। लोग भूले नहीं हैं। इससे पहेल भी राहत पैकेज से होने वाले राजनीतिक लाभ की फसल काटी जा चुकी है। इसके बावजूद आज भी विदर्भ में औसतन पहले जितनी ही आत्महत्याएं हो रही हैं। प्रधानमंत्री राहत पैकेज में भी तमाम तरह की गड़बडिय़ों और भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिले थे। पीडि़त परिवारों का फायदा विधायक और तमाम दूसरे नेता उठा ले गए। सीधे विदर्भ के लिए न सही पर वाम दलों ने आज राज्यसभा में खाद्यान्न सहित आवश्यकत वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के कारण आम लोगों को होने वाली भारी परेशानी का मुद्दा उठाकर दिल जीत लिया। कीमतों पर लगाम कसने के लिए तुरंत सुरक्षित खाद्यान्न भंडार से अनाज जारी कर अनाज के वायदा कारोबार पर रोक लगाने की उनकी मांगों पर अगर अमल किया गया तो सच में विदर्भ को भी काफी राहत मिलेगी। यहां कर्ज के कब्रगाह में हजारों किसान दफन हैं। काली मिट्टी तमाम मौतों के बाद भी लाल नहीं हुई। आंकड़ों के अनुसार, विदर्भ में किसानों की मौत मुख्य रूप से बैंकों और सूदखोरों से लिये गये कर्ज को न चुका पाने की असंभव स्थिति के चलते हो रही है। सूदखोरों के यंगुल में फंसे किसान तड़प रहे हैं और सरकार घोषणाओं से काम चला रही है। गरीब किसान अपनी छोटी-मोटी खेती छोड़ कोई नया धंधा शुरू करना चाहते हैं तो पुराने कर्ज जानलेवा साबित हो रहे हैं। आत्महत्या करने वाली महिलाओं की बड़ी संख्या जहां कुंए में कूदकर मरती है, वहीं तीस साल से कम के युवा आमतौर पर गले में फांसी लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर रहे हैं। मरने के लिए जहर खरीदना नहीं पड़ता बल्कि कपास और सोयाबीन के खेतों में डाला जाने वाला कीटनाशक, खरपतवार नाशक ही मौत का काम आसान कर देता है जो विदर्भ के हर किसान के घर में सहज उपलब्ध है। आत्महत्या रोकने के सरकारी प्रयासों में एक है सब्सिडी का प्रावधान। सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी के बावजूद किसानों को सरकारी खरीद महंगी पड़ रही है, जो कि सरकारी नीतियों की पोल खोलती है। अव्वल तो सारा ध्यान जिन्हें आना चाहिए था, उनका ध्यान पता नहीं किस और हैं। कृषि मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार द्वारा बनाई नई नीतियों के बाद भी यहां के किसानों के हालात नहीं बदले हैं। मानो यहां के किसानों की किस्मत में जिंदगी भर कर्ज में डूबे रहना ही लिखा है। अब जब बात निकल ही आई है तो अच्छा होगा इसे दूर तक ले जाया जाए , ताकि मांग हक में बदल जाए।