शनिवार, जुलाई 31, 2010

गडचिरोली में ये क्या हो रहा है ...

रद्द हुआ आबा का गड़चिरोली दौरा!
संजय स्वदेश
नागपुर।
महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित जिला गड़चिरोली में इन दिनों काफी कुछ चल रहा है। यहां की गतिविधियों से राज्य सरकार पूरी तरह से भयभित है। पिछले दिनों नक्सली नेता आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद गड़चिरोली जिले में सक्रिय खूंखार नक्सलियों की घातक गतिविधियों को देखते हुए राज्य के गृह मंत्री आर.आर. पाटिल 'आबाÓ का गड़चिरोली दौरा रद्द हो गया। आबा 29 जुलाई को गड़चिरोली के दौरे पर आने वाले थे। उनकी अध्यक्षता में जिला नियोजन समिति की बैठक का आयोजन किया गया था। आर.आर. पाटिल गड़ïचिरोली के पालकमंत्री भी हैं।
खूंखार नक्सली नेता आजाद की आंध्र पुलिस के साथ मुठभेड़ में मौत के बाद से ही गड़चिरोली जबर्दस्त गुस्से में हैं। वे अपने बड़े नेता की मौत का बदला लेने का ऐलान भी कर चुके हैं। बड़े नेता के बदले में नक्सलियों के निशाने पर कोई बड़ा नेता ही होने की भनक लगने के बाद खुफिया एजेंसियों के अधिकारी सतर्क हो गए। आर.आर. पाटिल के गड़चिरोली जिला दौरे की घोषणा पहले ही हो गई थी और बताया जाता है कि नक्सलियों ने पाटिल के दौरे में बाधा पहुंचाने की तैयारी भी शुरू कर दी थी। इसकी भनक लगने के बाद ही सतर्क हुई खुफिया एजेंसियों ने फिलहाल पाटिल को गड़चिरोली का दौरा नहीं करने की सलाह दी। ज्ञात हो कि आजाद की मौत के बाद से आबा पिछले दिनों विदर्भ में आए थे, लेकिन गड़चिरोली न जाकर यवतमाल से ही वापस मुंबई चले गए थे। अब ताजा घटनाक्रम के तहत आबा का गड़चिरोली दौरा रद्द हो चुका है। आबा जब पिछली बार गड़चिरोली आए थे तब उनकी कार के सामने अचानक आए युवकों ने पुलिस भर्ती में हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते हुए 'नक्सलवाद जिंदाबादÓ के नारे लगाए थे। उस घटना को सरकार ने गंभीरता से लेकर जांच शुरू की थी। नक्सल सूत्रों के अनुसार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में सक्रिय नक्सली तब तक शांत नहीं बैठेंगे जब तक वे आजाद की मौत के बदले किसी बड़े नेता को निशाना नहीं बनाते। नक्सलियों की लिस्ट पर नक्सलग्रस्त राज्यों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गृहमंत्री होने की जानकारी मिली है। हाल ही में खबर आई थी कि नक्सलियों ने नागपुर का उपयोग उपचार-हब तथा आवागमन के लिए करना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से बड़े नेताओं के नागपुर दौरे के दौरान भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रखने के निर्देश खुफिया एजेंसियों ने पुलिस को दिए हैं।
माओवादियों ने फूंकी भाड़भिड़ी ग्रामपंचायत
नक्सलियों ने 28 जुलाई की रात चामोर्शी तहसील के भाड़भिड़ी स्थित ग्रामपंचायत कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। नक्सलियों के इस वर्ष के शहीद सप्ताह में यह पहली विध्वसंक घटना बताई जा रही है। पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 से 25 की संख्या में आये बंदूकधारी नक्सलियों ने भाड़भिड़ी गांव में प्रवेश किया तथा ग्रामपंचायत कार्यालय में जाकर सारे कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इस आगजनी की घटना में कार्यालय में रखा फर्निचर समेत सारे दस्तावेज जलकर खाक हो गये। घटना को अंजाम देने के बाद सभी नक्सली लाल सलाम के नारे लगाते हुए पर्चे फेंककर वहां से फरार हो गये। इस घटना से भाड़भिड़ी गांव के लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। पुलिस ने इस मामले में अज्ञात नक्सलियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया है। विशेष अभियान के दलों को नक्सल खोज मुहिम के लिये रवाना करने के आदेश दिये गये है। शहीद सप्ताह के दौरान जिले के लोगों में खासी दहशत होकर पुलिस विभाग ने लोगों से सहयोग करने की अपील की है।
अनेक स्थानों पर बनाये स्मारक

28 जुलाई से नक्सल संगठनों की ओर से शहीद सप्ताह मनाया जा रहा है। इस सप्ताह के दौरान नक्सलियों ने जिले के अनेक स्थानों पर शहीद स्मारक बनाये हैं। कोरची तहसील के मसेली, धानोरा तहसील के अतिदुर्गम गांवों से लेकर सिरोंचा तहसील के बामणी गांव में नक्सलियों ने यह स्मारक बनाये है। धानोरा के किसी सुदुर गांव में नक्सलियों ने पुलिस मुठभेड़ में मारा गया आजाद का पुतला भी बनाया है। जगह-जगह पर्चें व बैनर फेंककर नक्सलियों ने शहीद सप्ताह को मनाने व सरकार के ऑपरेशन ग्रीन हंट को तत्काल बंद करने की मांग की है। सिरोंचा तहसील के कंबालपेठा सड़क पर नक्सलियों ने पेड़ काटकर बिछाये है। यहां पर लोगों ने वायरों के बंडल को भी देखा है।
सैकड़ों गांवों में छाया सन्नाटा
नक्सली नेता चारू मुजूमदार की स्मृति में शुरू हुआ नक्सली शहीद सप्ताह इन दिनों पूरी तरह दहशत के साये में बीता। जिले के अतिदुर्गम क्षेत्र में बसे दर्जनों गांवों में सन्नाटा छाया रहा। धानोरा व कोरची तहसील मुख्यालयों में भी स्थानीय नागरिक खौफ में है। नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने नक्सल आंदोलन के नेता आजाद और चारु मजमूदार के नाम के स्मारक बनाकर उन्हें अपनी श्रध्दांजलि दे रहे हैं। कोरची के मसेली गांव में नक्सलियों ने लाल आतंक का झंडा लहराकर लोगों से यह सप्ताह मनाने का आह्वान किया। पुलिस विभाग ने इस बीच सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात किये थे। जिसके चलते अब तक कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई है। विशेष सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले की धानोरा व कोरची तहसील को इस वर्ष नक्सलियों ने अपना केंद्रबिन्दु बनाया है। शहीद सप्ताह की सर्वाधिक हरकतें इन्हीं तहसीलों में देखी जा रही हैं। धानोरा, कोरची, कसनसुर, मसेली समेत वनांचल के अनेक गांवों में बंद रखा गया है। अनेक सड़कों पर पेड़ काटकर बिछाने से यातायात बाधित किया गया है। शहीद सप्ताह शुरू होने के एक दिन पूर्व ही जिले की धानोरा तहसील के मुरूमगांव के पास गढ़चिरोली-राजनांदगांव महामार्ग पर पेड़ काटकर बिछाये हैं। आज भी यह पेड़ यथावत हंै। घटनास्थल पर लोगों ने वायर के बंडल भी देखे हंै। जिसके चलते लोगों में खासी दहशत है। इस महामार्ग का यातायात पूरी तरह ठप पड़ गया है। उल्लेखनीय है कि यह महामार्ग जिले का एकमात्र अंतर्राज्यीय महामार्ग है। गढ़चिरोली-मानपुर बस गुरुवार को सुबह धानोरा से ही लौट जाने की खबर मिली है। तहसील मुख्यालय में अनेक निजी वाहन बंद के चलते खड़े हैं।
वहीं जगह-जगह पर्चे व बैनर लगाने से लोगों में खासी दहशत बनी हुई है। इस बंद के चलते जिले के गढ़चिरोली व अहेरी बस डिपो की अनेक बस फेरियां बंद हैं। इसमें प्रमुख रूप से गढ़चिरोली-राजनांदगांव, गढ़चिरोली-मानपुर, मुरूमगांव, पेंढरी, भामरागढ़, एटापल्ली व अन्य अतिदुर्गम गांवों में जाने वाली बसों की फेरियां हैं। गुरुवार को धानोरा की सारी दुकाने शत प्रतिशत बंद होने के कारण स्थानीय लोगों को अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। सप्ताह के मद्देनजर पुलिस विभाग ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजामात कर रखे हंै। सीआरपीएफ के साथ सी-60 जवानों की तैनाती बढ़ा दी गई है। पर जनता पर सुरक्षा से ज्यादा नक्सलियों का खौफ भारी पड़ रहा है।
आरमोरी में निकली शांति रैली
शहीद सप्ताह के विरोध में आरमोरी पुलिस थाना की ओर से नक्सल विरोधी शांति रैली निकाली गई। थानेदार माने ने इस रैली को हरी झंडी दिखाकर रैली का शुभारंभ किया। यह रैली शहर की मुख्य सड़कों से होते हुए वापस पुलिस थाना पहुंची। इस समय अपने मार्गदर्शन में थानेदार माने ने कहा कि हर वर्ष की तरह इस बार भी नक्सलियों ने 28 जुलाई से 3 अगस्त की कालावधि में शहीद सप्ताह मनाने का आह्वान किया है। उन्होंने इस सप्ताह में लोगों से पुलिस को सहयोग करने की अपील की। शांति रैली में आरमोरी के महात्मा गांधी विद्यालय, महात्मा गांधी कन्या विद्यालय, डा. आंबेडकर विद्यालय, हितकारिणी विद्यालय, किसनराव खोब्रागडे महाविद्यालय, विवेकानंद विद्यालय आदि शालाओं के छात्र, प्रधानाचार्य, शिक्षक व शहर के नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
17 अगस्त को मशाल मोर्चा
जिले में बिजली का उपयोग कम होने के बाद भी विगत 9 वर्षों से यहां लोडशेडिंग शुरू है। यह लोडशेडिंग पूरी तरह बंद करने की मांग को लेकर गढ़चिरोली के महावितरण कंपनी के अधीक्षक अभियंता कार्यालय पर आगामी 17 अगस्त को मशाल मोर्चा निकाला जाएगा। जिला परिषद के पूर्व सदस्य सुरेंद्रसिंह चंदेल व अन्य पदाधिकारियों ने बताया कि जिले में शुरू लोडशेडिंग के कारण यहां की सर्वसाधारण जनता, छोटे उद्योजक व किसानों को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले की लोड़शेडिंग को बंद करने के लिये अनेक बार आंदोलन व मोर्चे निकाले गये। लेकिन मंत्रियों के आश्वासन केवल आश्वासन ही रहें। लोडशेडिंग शुरू होने के बावजूद घरेलु उपयोग की बिजली के अधिक बिल भेजे जा रहे हैं।
बदहाली में आदिवासी आश्रम
एकात्मिक आदिवासी विकास प्रकल्प गढ़चिरोली के अंतर्गत आने वाली सरकारी आश्रमशालाओं की हालत फिलहाल पूरी तरह खस्ता हो चली है। आश्रमशाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संगठन ने आमशालाओं का दर्जा बढ़ाने की मांग की है।
गत 26 जून से शैक्षणिक सत्र आरंभ हुआ। लेकिन प्रकल्प के तहत आने वाली अनेक आश्रमशालाओं में अब तक शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की गई है। यह पद भरने की मांग भी कई बार की है। लेकिन इस पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकारी छात्रावास का भोजन बंद होने के कारण छात्रावास अब तक आरंभ ही नहीं हुए है। जिसके चलते स्कूली छात्रों की संख्या कम हो रहीं है। आश्रमशालाओं को किराणा व अन्य खाद्यान्न की आपूर्ति करने के आदेश अब तक जारी नहीं करने से आश्रमशालाओं की अवस्था दयनीय हो गई है। शैक्षणिक सत्र को आरंभ हुए एक माह का कालावधि बीत चुका है, लेकिन शिक्षा आरंभ नहीं होने से आदिवासी छात्रों का बड़े पैमाने पर शैक्षणिक नुकसान हो रहा है।

शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

बार-बार शरीर संबंध बलात्कार नहीं

मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ का महत्वपूर्ण फैसलानागपुर। किसी महिला या युवती से बार-बार शरीर संबंध रखना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। यह महत्वपूर्ण फैसला मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के न्यायाधीश अंबादास जोशी ने दिया है। न्यायमूर्ति जोशी की खंडपीठ ने एक मेडिकल रिप्रजेटेटिव अनवर खान इकबाल खान मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी दृष्टिकोण से विचार किया गया तो भी गलतफहमी के विश्वास से ऐसा होना साबित नहीं होता। 2 वर्षों तक लगातार शरीर संबंध रखने की अनुमति देना बलात्कार साबित नहीं होता।
ज्ञात हो कि न्यायमूर्ति जोशी ने कुछ दिनों पूर्व ही ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के बाद फैसला दिया था कि शादी का लालच देकर तथा उस पर यकीन रखकर शरीर संबंध रखना बलात्कार नहीं होता। उसके बाद उनका यह दूसरा ऐसा फैसला है, जिससे आईपीसी की धारा 376 के मामले में फंसे अनेक लोगों को राहत की संभावना दिखने लगी है। ब्लात्कार के दर्ज सैकड़ों ऐसे मामले हैं जिसमें आपसी सहमती से शारीरीक संबंध बनाये गए थे और बाद में किसी बात को लेकर अनबन होने से कत्थित पीडि़ता ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया।

अनवर खान इकबाल खान को नागपुर सत्र न्यायालय ने एक युवती के साथ लगातार कुकर्म के मामले में 2 वर्ष पूर्व 7 वर्षों के सश्रम कारावास व 20 हजार रु. जुर्माने की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बदल दिया। अनवर खान ने 14 अप्रैल से 5 मई 2004 के दौरान शादी का लालच दिखाकर युवती के साथ शरीर सुख प्राप्त किया था।
अनवर खान तथा युवती एक ही कंपनी में कार्यरत थे। आरोपी ने नागपुर की एक होटल में स्थित अपने कमरे में युवती को बुलाया तथा उसके साथ कुकर्म किया। इस घटना से युवती रोने लगी। उसने आत्महत्या करने की धमकी दी। इसे देखकर अनवर खान ने उसे शादी का लालच दिखाकर शांत किया। बाद में अनवर ने युवती को अमरावती व यवतमाल की होटलों में बुलाया तथा वहां भी शादी का लालच देकर उसके साथ यौन संबंध बनाया। आरोपी द्वारा शादी से इन्कार करने तक यह मामला जारी था।
बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता युवती पागल हो चुकी थी तथा वह आरोपी के पीछे पड़ गई थी। यह सभी एक पक्ष से ही हो रहा था। हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने बताया कि शादी के आश्वासन पर भरोसा रखकर युवती ने शरीर संबंध रखने की अनुमति दी। इसे गलतफहमी से दी गई अनुमति नहीं कहा जा सकता।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद न्यायालय ने कहा कि युवती स्वयंनिर्बंध तथा आत्मज्ञान से अनभिज्ञ थी और इसी कारण शादी के आश्वासन पर यकीन रखकर वह लैंगिक सुख देती रही। वह सज्ञान है। खासकर उसकी इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि गर्भपात के बाद भी उसके साथ दो बार बलात्कार हुआ।
वर्ष 2009 के अंत में भी सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ ऐसा ही ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। जिसमें कोर्ट ने बलात्कार के मामले में दोषी ठहरा चुके सुनील कुमार नाम के एक युवक को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि कौमार्य भंग कराते वक्त लड़की ने इसका विरोध नहीं किया था, इसलिए वह बलात्कार की पीडि़ता नहीं है।

अन्य व औषधि प्रशासन विभाग की सुस्ती से मिलावटखोर बेखौफ

-एक साल में 100 से भी कम मामले दर्ज
संजय स्वदेश
नागपुर।
बढ़ती महंगाई के कारण कई व्यापारी मिलावट का धंधा कर रहे हैं। इसके अलावा बरसात के कारण बाजार में बिकने वाले कई खाद्य पदार्थ अंदर से खराब हो जाने के बाद भी धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जिसे जाने-अनाजने में खाकर लोग बीमार हो रहे हैं। वहीं दूसरी ओर मिलावटखोरी पर नियंत्रण करने वाला विभाग अन्न व औषधि प्रशासन सुस्त दिख रहा है। इसकी सुस्ती से मिलावटखोर बेखौफ होकर मिलावट का धंधा कर रहे हैं। विभाग के सह आयुक्त कार्यालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक नागपुर शहर और जिले में मिलावटखोरी पर नजर रखने के लिए 12 निरीक्षक, एक पर्यवेक्षक और एक सहायक आयुक्त हैं। लेकिन विभाग औसतन हर दिन एक भी नमूने नहीं ले पाता है। विभाग के पर्यावेक्षक सं.भा. नारागुडे से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2009-10 में विभाग ने 1178 नमूने जांच के लिए भेजे, इनमें से महज 146 ही अप्रमाणित मिले। उसमें से भी केवल आधे मामले ही दर्ज हुए। बीते वर्ष के इस आंकड़े से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि विभाग नगर में चल रहे खाद्य पदार्थों की मिलावट को लेकर कितना सक्रिय है। यदि 12 निरीक्षकों में हर निरीक्षक हर दिन दो नमूने भी लेते हैं, तो एक दिन में 24 नमूने विभिन्न इलाकों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों के लिए जा सकते हैं। इससे मिलावटखोरों में भय बैठेगा और वे मिलावटखोरी छोड़ सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि साल में विभाग जितने सैंपल लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजता उसमें से आधे से भी कम सौंपल की रिपोर्ट अप्रमाणित आती है। अधिकतर मामलों में कुछ ले-देकर मामला दबा देने का प्रयास किया जाता है। यदि विभाग में बात नहीं बनती है तो प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों से संपर्क साधकर मतलब का काम करा लिया जाता है।
विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कई बार वे स्वयं संज्ञान लेकर सैंपल लेने के लिए छापा मारते हैं, तो कुछ शिकायतों पर संज्ञान लेकर छापामारने की कार्रवाई चलती है। लेकिन जितनी भी शिकायतें आती हैं, उसनें से करीब 80 प्रतिशत शिकायतें पूर्वाग्रह से प्रेरित होती हैं। लोग किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए मिलाटवखोरी की झूठी शिकायत कर देते हैं।

गुरुवार, जुलाई 29, 2010

कई टीवी चैनलों पर जारी है लूटखसोट

नहीं थम रहा लूटपाट का सिलसिला
विशेष प्रतिनिधि
नागपुर। यदि आप रात के समय बोर भी हो रहे हों तो टीवी मत देखिये। आपने रात के समय अपना लोकप्रिय चैनल शुरू कर लिया तो लालच के जाल में पड़कर आप सैकड़ों रुपयों से हाथ धो सकते हैं। इन दिनों रात 12 बजते ही अधिकांश टीवी चैनलों पर चेहरा पहचानो प्रतियोगिता शुरू हो जाती है। पहले केवल एक चेहरा ही दिया जाता था अब चेहरा दो लोगों का जोड़कर दिखाय जा रहा है। इंडिया टीवी, जी टीवी, इमैजिन टीवी आदि तमाम चैनलों पर यही गोरखधंधा चल रहा है।
जाने-पहचाने चेहरे होने के कारण लाखों लोगों के फोन लगाने पर भी सही जवाब नहीं मिलता है क्योंकि लूटखसोट वाले इस कार्यक्रम का संचालक केवल 'अपनेÓ ही लोगों के फोन उठाता है और इस बात की 200 प्रतिशत गारंटी होती है कि जिसने भी फोन किया वह गलत जवाब ही देगा। सबसे खास बात यह है कि अन्य लोगों के फोन घंटों रिसीव ही नहीं किए जाते और उनके फोन से प्रति मिनट 10 रुपये कटते रहते हैं। लालच में पड़कर लोग अपने नंबर का इंतजार करते रहते हैंï और उन्हें उस समय घोर निराशा हो जाती है जब 200-250 रुपये की चोट खाने के बाद फोन अपने आप डिस्कनेक्ट हो जाता है। लालची व्यक्ति बार-बार यही प्रयोग करता है और सैकड़ों रुपये लुटा बैठता है।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पिछले कई माह से टीवी चैनलों पर जारी इस अनोखे खेल में आयोजक करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। 5000 रु. के इनाम से शुरुआत कर इनामी राशि 80 हजार तक बढ़ती चली जाती है लेकिन भारतभर में पूरे 2 घंटे के इस खेल में कोई माई का लाल ऐसा नहीं है जो सही जवाब दे सके। देगा भी कैसे? जिन लोगों के मोबाइल से पैसे कटने होते हैं, उनका फोन रिसीव ही नहीं किया जाता! पूरी तरह लूटपाट वाले इस खेल पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की जा रही है। चैनल वाले एक पट्टïी चलाकर साफ-साफ कह देते हैं कि उनका इस खेल से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें 2 घंटों के लिए लाखों रुपये मिल जाते हैं। इस खेल में आयोजक, चैनल वाले तथा मोबाइल कंपनियां मालामाल हो रही हैं जबकि नागपुर ही क्या पूरे विदर्भ या महाराष्ट्र में ऐसा कोई बंदा नहीं है जिसने इस खेल में 10 रु. भी जीते हो। या तो सरकार इस पर पाबंदी लगाए या फिर दर्शक रात के समय चैनल देखना ही बंद कर दें।

बुधवार, जुलाई 28, 2010

हार्डवेयर में शोध की जरूरत : डा. जोशी


नागपुर। भारत सॉफ्टवेअर की दुनिया में आगे हैं। अब हार्डवेयर में संशोधन की जरूरत है। यह कहना है कि पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता डा. मुरली मनोहर जोशी का। वे नागपुर में रामदेव बाबा कमला नेहरू अभियंात्रिकी महाविद्यालय में आइटी कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन के मौके पर अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे। कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत, महापौर अर्चना डेहनकर, पूर्व विधायक तथा संस्था अध्यक्ष बनवारीलाल पुरोहित आदि उपस्थित थे।
डा. जोशी ने कहा कि हार्डवेयर के बिना आइटी का कोई महत्त्व नहीं। इन उपकरणों को आयात करना पड़ता है। इस लिए इस क्षेत्र में शोध कर देश में ही इनके उत्पाद बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रबंधन संस्थाएं देश के बड़े संस्थाओं के लिए एकाऊंटेंट, मार्केटिंग अधिकारी तैयार कर रही हैं। जल, बिजली, शिक्षा, यातायात तथा किसान को टेक्नालॉजी का कुछ फायदा नहीं मिल रहा है। इसके लिए पश्चिमी देशों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। 250 वर्ष पहले भारत अच्छा स्टिल भेजता था। आज लेजर ब्लेड भी बाहर से आयत करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि आप नकल करोगे तो कभी आगे नहीं बढ़ोगे। जो आएगा वह पश्चिम से आएगा यह बुनियादी बात हो गई हैं। उसे बदलना जरूरी है। हमें अपने मस्तिष्क को सतत चलाते रहना चाहिए। आज अपनी परंपरा, अपनी छाप, अपनी धरती ध्वस्त हो रही है।
शिक्षा में डोनेशन अच्छा नहीं : गडकरी
नितिन गडकरी ने कहा कि देश के विकास के लिए रिसर्च और टेक्रालॉजी की आवयश्कता है। कई जगह पर पानी के एक बुंद के लिए लोग तरस रहे हैं, तो कहीं बाढ़ से गांव के गांव उजड़ रहे हैं। अगर तकनीक का बेहतर उपयोग हो तो बहकर जाने वाले पानी का सही इस्तेमाला किया जा सकता है। इसलिए पानी, बिजली पर रिचर्स होना जरूरी है। उन्होंने बताया कि आज शिक्षा का व्यापारीकरण किया जा रहा है। उनके गुणवत्ता से कोई लेना देना नहीं। गरीब के प्रति भावना रखनी चाहिए। तांत्रिक दृष्टी से एक यशस्वी आदमी तो मिलेगा लेकिन एक अच्छा इंसान नहीं। शिक्षा के लिए डोनेशन अच्छी बात नहीं है। यह कदापि नहीं होना चाहिए। डोनेशन नहीं लेकर गुणवत्ता के आधार पर रामदेवबाबा कॉलेज में प्रवेश मिलने से ही यहां के विद्यार्थी गौरव प्राप्त कर रहे हैं।
केवल पढऩे-लिखने से काम नहीं : भागवत
डा. मोहन भागवत ने कहा कि केवल सुनने से कोई काम नहीं होता, उसके लिए करना पड़ता है। करने वाले का काम होता है, नाम होता है। कार्बेन को कुछ साल दबाया गया तो वह सिलोकॉन बन जाता है, यह प्राकृति का नियम है। परंतु भारत को कितना भी दबा कर रखा गया फिर की सिलोकॉन नहीं बनेगा। हम शुरू करेंगे, यह संकल्प लेना चाहिए। केवल पढ़ा - लिखा होकर कुछ उपयोग नहीं, लोगों को उसका फायदा होना चाहिए। समाज तथा राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहिए।
कार्यक्रम के शुभारंभ से पूर्व आईटी कॉप्लेक्स के आर्किटेक्ट डा. डोंगरे का भागवत तथा सिविल कॉन्ट्रेक्टर डी.आर.मालजी का डॉ. मुरली मनोहर जोशी के हाथों सत्कार किया गया। डा. जोशी, डा.भागवत, नितीन गडकरी, महापौर अर्चना डेहनकर का संस्था की ओर से शाल, श्रीफल व स्मृतिचिन्ह देकर सत्कार किया गया। प्रास्ताविक भाषण संस्था अध्यक्ष बनवारीलाल पुरोहित ने दिया। उन्होंने बताया कि उदयोन्मुख संस्थाओं महाराष्ट्र में पहली तथा देश में चौथे नंबर पर यह संस्था है। इस वर्ष संस्था ने 25 वर्ष पूरे किए है। संस्था में मेरिट के आधार पर प्रवेश दिया जाता है। प्रबंधन कोटा भी डोनेशन से नहीं, गुणवत्ता के आधार पर भरा जाता है। कार्यक्रम में पूर्व विधायक तथा वनराई के अध्यक्ष गिरीश गांधी, पूर्व सरसंघचालक के.सी. सुदर्शन, पूर्व महापौर माया इवनाते
संस्था के उपाध्यक्ष गंगाराम अग्रवाल, उपाध्यक्ष चंद्रकांत ठाकर, संस्था सचिव गोविंद अग्रवाल, प्राचार्य देशपांडे, दामोदर भूतडा तथा शहर के गणमान्य नागरिक, संस्था के कर्मचारी, शिक्षकगण तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रा. पाचपोर ने किया। विश्वास देशपांडे के आभार प्रदर्शन के बाद कार्यक्रम का सामपन हुआ।
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सोमवार, जुलाई 26, 2010

दोषियों की सजा बदलने से दलितों पर अत्याचार बढ़ा


खैरलांजी प्रकरण /भैयालाल भोतमांगे की जमीन हथियाने की कोशिश
आधा दर्जन संगठनों ने किया प्रदर्शन, सरकार को भेजा ज्ञापन


संजय स्वदेश
नागपुर।
खैरलांजी हत्याकांड में दोषियों की फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदलने का विरोध अभी भी जारी है। सोमवार को रिजर्व बैंक चौक पर आधे दर्जन से भी ज्यादा संगठनों ने इस निर्णय के विरोध में प्रदर्शन किया। दीक्षाभूमि महिला धम्म संयोजन समिति, राष्ट्रीय संबुद्ध महिला संगठन, ऑल इंडिया प्रोगे्रसिव वूमेेन्स ऑर्गनाइजेशन, संजीवनी सखी मंच, जरीपटका, दलित महिला संघ, गौतमी महिला मंडल, नालंदा महिला मंडल, रमाबाई आंबेडकर महिला संगठन कोराड़ी आदि संगठन के कार्यकर्ताओं ने चौक पर धरना देते हुए फैसले के विरोध में नारेबाजी की। उनका कहना था कि इस प्रकरण में फांसी की सजा बदलने के बाद दलितों पर अत्याचार के मामले बढ़ रहे हैं। उनकी मांग है कि दोषियों की फांसी की सजा कायम रहे। मुकदमे की सुनवाई के लिए एक स्वतंत्र न्यायालय का गठन किया जाए। सीबीआई इस मामले की फिर से जांच करे और मामले में विनयभंग और अॅट्रॉसिटी एक्ट भी दर्ज किया जाए। इन संगठनों ने अपनी मांगों की प्रति राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल और केंद्रीय न्यायमंत्री मुकुल वासनिक को भेजी है।
ज्ञापन में कहा गया है कि खैरलांजी प्रकरण से यह सिद्ध हो गया है कि देश की जातिवादी सामाजिक मानसिकता में पीडि़त दलित को न्याय नहीं मिल सकता है। इस प्रकरण में भोतमांगे परिवार के चार सदस्यों की निर्मम हत्या के दोषियों की फांसी की सजा में दलित और बौद्ध समाज में यह आस जगी थी कि उन्हें भी न्याय मिल सकता है। लेकिन उच्च न्यायालय के निर्णय से यह आस भी टूट गई है। एक तरह से यह दलित और बौद्ध समाज को अप्रत्यक्ष धमकी है। यदि सरकार चाहे तो न्यायालय के निर्णय को भी बदल सकती है। आश्चर्य की बात यह है कि खैरलांजी प्रकरण इतना गंभीर हुआ, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें गंभीरता नहीं दिखाई। दोषियों पर विनयभंग और अॅट्रॉसिटी एक्ट के मामले तक दर्ज नहीं किये गए।
ज्ञापन में कहा गया है कि खैरलांजी प्रकरण के इस निर्णय के बाद खैरलांजी गांव में दलितों पर अत्याचार बढ़ा है। भैयालाल भोतमांगे की जमीन कब्जा करने की कोशिश की गई। इसकी शिकायत जब भंडारा के पुलिस स्टेशन में की गई तो पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके अलावा जिस गांव में चार दतिलों की हत्या हुई, उस गांव को तंटामुक्त गांव का पुरस्कार दिया गया है। आरोपियों को फांसी की सजा बदलने से यह साबित हो गया है कि देश में दलितों पर हुए अत्याचार के मामले में न्याय नहीं मिल सकता है। संगठनों का कहना है कि यदि इस मामले में उन्हें उचित न्याय नहीं मिला तो वे सड़क पर उतर कर आंदोलन करेंगे।
प्रदर्शनकारियों में तक्षशील बाघमारे, छाया खोब्रागड़े, वंदना जीवने, सरोज आगलावे, प्रज्ञा बागड़े, डा. लता बाकोड़े, रेखा, खोब्रागड़े, अर्चना, शैला नांदेश्वर, शार्दुला महाजन, तोसी साखरकर, प्रतिमा, सरोज डांगे, कविता मेठे आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थीं।
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रविवार, जुलाई 25, 2010

भारत के मसालों की विदेशों में भारी मांग

नागपुर। नाग विदर्भ चेंबर ऑफ कॉमर्स तथा स्पायसेस बोर्ड, कोचीन के संयुक्त तत्वावधान में होटल तुली इंटरनेशनल सदर में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। उपस्थित अतिथियों, निर्यातकों तथा व्यापारियोंं का स्वागत करते हुए चेंबर के अध्यक्ष, हेमंत खुंगर ने कार्यशाला आयोजन करने का मुख्य उद्देश्य बताते हुए कहा कि भारत से विदेशों में मसालों की अति आवश्यकता है क्योंकि यहां के बने हुए मसालों जैसे मिर्ची, हल्दी व अन्य मसाले उत्कृष्ट रूप से उत्पादित किए जाते हैं, क्योंकि इन मसालों के उत्पादन के लिए प्राकृतिक तथा सेंद्रिय खादों का इस्तेमाल होने से उसकी गुणवत्ता श्रेष्ठ होती है। इन वस्तुओं को अधिक से अधिक मात्रा में निर्यात करने के लिए विदर्भ तथा मध्य भारत के व्यापारी तथा निर्यातकों को आगे आना चाहिए। उन्होंने अनुरोध किया कि निर्यात अधिक होगा तो व्यापार भी बढ़ेगा। इस कार्यशाला में विशेषकर विदर्भ व मध्य भारत से मसालों का निर्यात विदेशों में कैसे करना, उसकी जानकारी कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि, विवेक ज्योति राय, उपसंचालक, स्पायसेस बोर्ड, भारत सरकार, कोचीन ने उपस्थित सदस्यों को दी।
बिबेक राय ने कहा कि हल्दी एक ऐसी वस्तु है जो खाद्य पदार्थ भी है, औषधि भी है तथा मसाले के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है। देश में 42 प्रकार की हल्दी का उत्पादन होता है। हल्दी व कस्तुरी, उनके सुगंध से पहचानी ताजी है। वर्तमान में, भारत में इसका उत्पादन 5,55,455 मे.टन होता है, जिसमें से, महाराष्ट्र में इसका उत्पादन 8,280 मे.टन होता है। उसी प्रकार भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया, म्यामार, चाइना, हैती, पेरु, सॉलिडोर, तायवान तथा जमायका में भी हल्दी का उत्पादन किया जाता है। पूरे विश्व स्तर पर केवल भारत में हल्दी का उत्पादन 70 प्रतिशत होता है। महाराष्ट्र में जिलों के अनुसार, नागपुर, वर्धा, चंद्रपुर, अमरावती, सातारा, सांगली, परभणी, नांदेड, कोल्हापुर व शोलापुर में हल्दी का उत्पादन किया जाता है।
मिर्ची के उत्पादन के बारे में उन्होंने कहा कि मिर्ची का उत्पादन भारत में आंध्र, कर्नाटक, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल में प्रमुख रूप से होता है। भारत से इसका निर्यात विशेषकर बंाग्लादेश, पाकिस्तान तथा अन्य देशों में किया जाता है। दूसरे सत्र में वंदना शिवशरण ईसीजीसी नागपुर शाखा प्रमुख ने निर्यातकों को ईसीजीसी के उद्देश्य की जानकारी दी।कार्यक्रम में हेमंत खुंगर, मयूर पंचमतिया, प्रकाश वाधवानी, जगदीश बी.बंग, अजय कुमार मदान, प्रभाकर देशमुख, विजय केवलरामानी, फारुक अकबानी, निखिलेश ठाकर, राजू माखीजा, राजू व्यास, निलेश सूचक, सचिन पुनियानी, सतीश बंग, हस्तीमल कटारिया, योगेंद्रकुमार अग्रवाल, मनोहर भोजवानी, प्रकाश वाघमारे, प्रकाश कटारिया, यश भोजवानी, मोहनलाल पटेल, रवि आत्राम, शिरीष आया, पांडुरंग होजुक, मनोज वानखेडे, उमेश तालेकर, धवल पंचमतिया, रशीद अली सैयद, नेताई के राय, अमित चौधरी, निखिल जुनेजा, नितिन सोमकुंवर, कु.मोहिनी बेरी, मनीषा जोशी, संजय पटेल, बिहारी पटेल, संजय देसाई, विराल कोठारी, दीपक पारवानी उपस्थित थे। संचालन चेंबर के उपाध्यक्ष जगदीश वी.बंग ने किया तथा मयूर पंचमतिया, ने आभार प्रदर्शन किया। उक्त जानकारी चेंबर के सहसचिव अजयकुमार अदान ने दी है।

गुरुवार, जुलाई 22, 2010

...और 'फलां बो विकास की पहरुआ बन गईं


बिहार का बेड़ा पार लगाती महिलाएं
- संजय स्वदेश

कहते हैं कि राजनीति की चाबी से हर ताले खुलते हैं, परन्तु बिहार के समाज में महिलाओं को यह चाबी वर्षों से नहीं मिली थी। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के जाते-जाते करिश्मा हुआ। वर्ष 2001 में लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई, ग्राम पंचायत में आरक्षण के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करा दी गई। वर्ष 2006 में राज्य में कुल 8471 पंचायतों में 4200 पंचायतों पर महिलाओं ने कब्जा किया। बिहार के सिकुड़े समाज ने अंगड़ाई ली और पैर पसार दिए। अति पिछड़े वर्ग के लिए जहां राजनीति से जुडऩा कभी संभव नहीं था, उसे 20 प्रतिशत आरक्षण के माध्यम से संभव बनाया गया। महिलाओं को भी लाभ मिला। अति पिछड़े, दलितों में अलग-थलग रहने वाली महिलाओं को भी ग्रासरूट स्तर पर मुख्य धारा की राजनीति से जुडऩे का मौका मिला।
बिहार में धन और बाहुबल के दम पर संपन्न होने वाले हर चुनाव में ऐसी-ऐसी महिलाएं चुन कर पंचायत में आईं जो समाज में वर्षों से उपेक्षित थीं। समस्याओं के आगे महिलाओं ने साहस दिखाया। बम-बारूद वाले चुनावी समर में महिलाएं बहादुरी दिखाने से पीछे नहीं हटीं। अपराधियों के हमलों और परिजनों की हत्या के बावजूद डटी रहीं। चुनाव जीतकर विरोधियों को धूल चटाया। 4200 आरक्षित पदों के लिए दो लाख से अधिक महिलाएं चुनावी समर में थीं। चुनावी समर में अपनी मांग और कोख को सूनी करके भी महिलाओं ने फतह हासिल की। अपराधी तत्वों के नापाक इरादों से विचलित नहीं हुईं। सर्वेक्षण से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जुमई जिले के ठसलाम नगर पंचायत के मुखिया पद की उम्मीदवार उमा देवी के तीन बेटों की चुनाव के दौरान सामूहिक हत्या कर दी गई थी। बच्चों को खोने का दुख किस मां को नहीं होगा? परन्तु यही दुख शायद उमा देवी को साहस दे गया। उमा देवी दिलेरी से चुनाव लड़ीं और जीतीं भी। आतंक के साये में उमा देवी की दिलेरी ने दूसरी महिलाओं को साहसी बनाया। पूर्वी चंपारण जिले में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। एक महिला उम्मीदवार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। चुनाव में महिलाओं के हौसले पस्त करने की हर संभव कोशिश की गई, फिर भी महिलाएं डटी रहीं। करीब हर क्षेत्र में महिला उम्मीदवारों पर हिंसक हमले चुनाव के साथ-साथ बढ़ते ही गए, लेकिन अपने अधिकारों के लिए कटिबद्ध महिलाओं ने हार नहीं मानी। एक भी महिला किसी भी हिंसक घटना के कारण मैदान से नहीं हटी। हटी तभी जब खुद उन्हें जान से मार दिया गया। पूॢणया जिले में मीनपुर पंचायत की मुखिया उम्मीदवार जानकी देवी की चाकू घोंपकर हत्या कर दी गई। यही नहीं, महिला मतदाताओं पर भी दबाव डालने की कोशिश नाकाम रही। पुरुष हमलावर खदेड़ दिए गए। महिलाओं का पंचायतों पर कब्जा हुआ। पुरुषों में चर्चा हुई- भले ही 'फलां बोÓ (किसी की पत्नी) चुनाव जीत गईं, लेकिन काम कैसे करेगी? बिहार के गांवों में सुबह और शाम की तस्वीरें राजनीतिक चर्चाओं का रंग लिए हुए थीं।
जहां पहले नुक्कड़ों और दुकानों पर सिर्फ आदमी ही पान चबाते, चाय-पीते और बहस करते हुए दिखाई देते थे, अब औरतें राजनीति पर चर्चा करने लगीं। देखते-देखते चार साल पूरे हो चुके हैं। पंचायत की महिलाएं पुरुषों के हर बिछाए जाल से निकल चुकी हैं। सूझ-बूझ से हर निर्णय ले रही हैं। देखते-देखते 'फलां बोÓ सरकार के विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की पहरुआ बन गईं। गोपालगंज जिले के हथुआ पंचायत की मुखिया प्रमिला देवी कहती हैं- जब चुन कर आई थीं तब शुरू-शुरू में पुरुष सदस्यों ने काफी भ्रम में डालने की कोशिश की। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के दुकानदार केरोसिन, राशन आदि के वितरण में जमकर धांधली करते थे। बस कुछ ही महीनों में पंचायत का हर कार्य समझ लिया। महिलाओं को एकजुट कर जिलाधिकारी से इस मामले में बात की। परिणाम अच्छा आया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तीन लाइसेंस स्थगित कर दिये गए। उसके बाद से हर किसी को नियमित केरोसिन, अनाज आदि का वितरण हो रहा है। प्रमिला देवी कहती हैं कि ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, तो क्या हुआ। हर बात तो समझ में आती ही है। अब डर नहीं लगता है कि कोई उल्टी-सीधी बातें कह कर पंचायत में गलत काम करा लेगा।
कुछ इसी तरह की बात मधुबनी जिले के देवधा पंचायत की सरपंच सीता देवी करती हैं। सीता देवी का कहना है आरक्षण के कारण महिलाओं को पंचायत में आने का मौका मिला। नहीं तो पुरुष को ही पंचायत का चुनाव लडऩे का अधिकार था। शुरू में पंचायती कामकाज में पति का मार्गदर्शन मिला। अब हर निर्णय खुद लेती हैं। सीता देवी कहती हैं कि एक महिला, महिला की बात अच्छी तरह समझ सकती है। पहले पुरुष प्रधान पंचायत में महिलाएं किसी मामले में अपने पक्ष की बात संकोचवश ठीक से नहीं रख पाती थीं। महिलाओं की भागीदारी बढऩे से झगड़े के आपसी विवाद की जड़ तक जाने और असलियत को समझने के लिए महिला होने के नाते बात करना आसान होता है। समस्याएं जल्दी सुलझ जाती हैं।
राज्य के सबसे पिछड़े जिले मधेपुरा के खुरहान पंचायत की स्नातक पूर्व उप मुखिया गायत्री सिंह कहती हैं कि पटना में पढ़ाई की। गांव में शादी हुई तो लगा जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन महिला आरक्षण से पंचायत में महिलाओं की सुनिश्चित भागीदारी की गई तो, लगा कुछ किया जा सकता है। पढ़ाई का उपयोग निर्धन महिलाओं के कल्याण में किया जा सकता है। सच में उप मुखिया का कार्यकाल बेहतरीन रहा। पुरुषों की तिकड़म समझ में आ चुकी है। अब कोई महिलाओं को पछाड़ नहीं सकता है।
अक्सर देखा गया है कि जिस घर में महिला मुखिया होती है, वहां बेटियों का हित ज्यादा सुरक्षित रहता है। उदाहरण के तौर पर पूर्वोत्तर के आदिवासी समुदाय को देख सकते हैं। इ स लिहाज से महिला आरक्षण बेटियों में एक खास तरह के स्वाभिमान को जगाने का काम करने लगा है।
फिलहाल सबकी नजरें राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में हैं। तैयारी शुरू है। महिलाएं भी सक्रिय हो चुकी हैं। उन्हें विधानसभा चुनाव के बाद अगले वर्ष स्वयं पंचायत चुनाव के मैदान में उतरना है। जिन्हें विधानसभा में उतरना है, वे भी पंचायत स्तर पर सक्रिय महिलाओं से संपर्क साधने लगे हैं। उन्हें मालूम है अब वे दिन गए जब केवल धन और बाहुबल से विधानसभा पहुंचा जाता था। पंचायत में सक्रिय भागीदारी दिखा रही महिलाओं ने सूझ-बूझ से कार्य कर साबित कर दिया है कि उन्हें नकार कर अब कोई विधानसभा नहीं पहुंच सकता है। महिलाएं बिहार की विकास की योजनाओं पर निगरानी रख रही हैं। ढेरों उदाहरण हैं जिनसे साबित हो चुका है कि महिलाएं हाथ पकड़कर भ्रष्टाचारियों को रोककर फैसले अपने हक में करवा सकती हैं।

सोमवार, जुलाई 19, 2010

बैंकों ने तोड़ी आशियाने की आस

अधर में लटका राजीव गांधी आवास योजना-2
संजय स्वदेश
नागपुर।
ऐसा कई बार होता है जब सरकार देश की जनता के लिए कुछ ईमानदार पहल करती है, लेकिन बीच के बिचौलियों उस पहल का बेडागर्क कर देते हैं। महाराष्ट्र में हजारों गरीब परिवारों के लिए एक योजना चल रही है। योजना का नाम है राजीव गांधी आवास योजना-2। इस योजना के तहत 16 हजार से 90 हजार की वार्षिक आय वालों के लिए 90 हजार रुपये तक का कर्ज अपना आशियाना बनाने के लिए दिया जाता है। इस कर्ज का सारा ब्याज राज्य सरकार वहन करती है। कर्ज की मूल राशि लाभार्थी को जमा करनी पड़ती है। लेकिन विज्ञापन में दो से चार दिन में होम लोन देने के दावा करने वाले इस कर्ज को देने से कतराते हैं। महाराष्ट्र में इस योजना की हकीकत यह है कि विभिन्न सरकारी बैंक सरकार की ईमानदार मंशा पर पानी फेर रहे हैं। उनकी उदासिनता से यह योजना अधर में लटक गई है। नागपुर की स्थिति देखिये। सरकार ने इस योजना के तहत नागपुर में करीब 2900 लोगों के आवेदन मंजूर किये थे। लेकिन जब ये आवेदन बैंकों के पास गए तो उन्होंने किसी न किसी बहाने से इस योजना के तहत कर्ज देना टाल दिया। कई आवेदकों ने तो बैंक के चक्कर काटते-काटते अब इस योजना के लाभ पाने से निराश हो गये हैं। बैंकों ने इस योजना के तहत कर्ज देने के लिए आवेदकों पर ऐसी-ऐसी शर्त लगा दी कि लोगों को शर्त पूरा करना मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति केवल नागपुर की ही नहीं है। पूरे महाराष्ट्र में इस योजना को सरकारी बैंक ऐसे ही कुठराघात कर रहे हैं। इस योजना की घोषणा राज्य सरकार ने कुछ महीने पहले ही की थी। तब यह कहा गया था कि 3 वर्ष में 10 लाख गरीब लोगों को अपना आवास उपलब्ध कराने के लिए कर्ज दिया जाएगा। इस योजना का लाभ ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे इसके लिए बैंकों के विभिन्न शर्तों को हटाने के लिए सरकार ने बैंकों को निर्देश भी दिया था। इस संबंध में एक सकुर्लर भी जारी हुआ था। पर बैंकों ने इस पर अमल नहीं किया है।
योजना से जुड़े नागपुर के उपअभियंता विनायक मामुलकर ने बताया कि वर्ष 2008-09 और 2009 और 2009-10 में 2966 लोगों को आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिए बड़े पैमाने पर आवेदकों ने आवेदन दिया था। लक्ष्य के अनुसार 2966 लोगों को आवास उपलब्ध कराने के लिए उनके आवेदन मंजूर कर बैंकों को भेज दिये गए। लेकिन बैंकों की शर्त पूरी नहीं करने के कारण अधिकर लोगों को इसका लाभ नहीं मिला। वहीं कुछ आवेदकों ने बैंक के लोन विभाग के साठगांठ से अपना कर्ज पा लिया। लेकिन अधिकतर लेकिन अधिकर आवेदक बैंक के शर्तों में फंस कर इस लाभ से वंचित हो गये हैं। महाराष्ट्र बैंक के एक अधिकारी ने नाम खुलासा नहीं करने की शर्त पर बताया कि सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज देना बैंक के लिए घाटे का सौदा है। सबसे पहले तो बैंक से ब्याज पाने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। वहीं सीधे ग्रहकों से कर्ज की वसूली सीधे-सीधे हो जाती है। इसके अलावा बैंक भी कर्ज देने से पहले ऐसे आवेदकों की आर्थिक स्थिति अच्छी तरह से देखती है। बैंक को जब यह सुनिश्चित हो जाता है कि कर्ज लेने वाला इस योजना के तहत ब्याज माफ होने के बाद भी मूलधन चुकाने में सक्षम है, तब ही उनके कर्ज के आवेदन की मंजूरी दी जाती है। बैंक को इस योजना के तहत बहुत ज्यादा लाभ भी नहीं हो पता है। इसलिए सरकारी योजना के तहत कर्ज देने से हर बैंक हिचकते हैं।
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रविवार, जुलाई 18, 2010

महंगाई से जोर पकड़ा मिलावट का धंधा

तुअर दाल में जम कर हो रही है मिलावट
नागपुर।
बढ़ती महंगाई के कारण जहां आम आदमी की कमर टूट गई है, वहीं इससे मिलावटखोरों की चांदी ही चांदी है। वे अनेक वस्तुओं में मिलावट कर ग्राहकों से असली वस्तुओं के दाम वसूल कर मालामाल हो रहे हैं। आम लोग असली और नकली का फर्क नहीं समझ पा रहे हैं। आधुनिक तकनीक ने असली और नकली का भेद करना मुश्किल कर दिया है। इसी का लाभ मिलावटखोर उठा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो असली वस्तुओं का दाम देकर नकली वस्तुओं का सेवन करने वालों को न केवल धन की हानि हो रही है, बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी घातक असर पड़ रहा है। हालांकि इसका पता एकदम से नहीं चल पाता है, लेकिन नकली वस्तुओं के सेवन करने वाले विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त हो रहे हैं।
दुकानों में विशेषकर राशन की दुकानों में यह काम धड़ल्ले से किया जा रहा है। बाजार में तुअर की दाल में बटरी, दाल और खेसाड़ी दाल मिलाकर धड़ल्ले से बेची जा रही है। कई दुकानदार वस्तुओं में मिलावट इस औसत से कर रहे हैं कि वह पकड़ी न जाए। वे नकली वस्तुओं की मिलावट असली से कम रख रहे हैं। जैसे उनकी मिलावट 30 से 40 प्रतिशत तक ही रह रही है। अच्छी क्वालिटी की दाल, चावल, गेहंू में आसानी से मिलावटी वस्तुओं को मिलाया जा रहा है।
मिलावटखोरी के बारे में अन्य एवं औषधि अन्वेषण विभाग का कहना है कि जो क्षेत्र हमारे दायरे में आते हैं, उन पर हमारी कड़ी निगरानी है। नागपुर के अधिकतर क्षेत्र महानगर पालिका के दायरे में आते हैं। इसलिए मिलावट का सैंपल लेना और मिलावटखोरी पकडऩे के लिए अभियान चलाने की जिम्मेदारी मनपा को है।
शहर के चिकित्सकों का कहना है कि उनके पास आने वाले मरीजों के लक्षण से पता चलता है कि वे मिलावटी वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं। मानसून आने से 'फूड प्वाइजनिंगÓ की समस्या आम होती जा रही है।
पिछले दिनों एक समाजिक कार्यकर्ता ने राशन की दुकानों पर मिलने वाली तुअर दाल का नमूना प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजा था। परीक्षण रिपोर्ट के मुताबिक तुअर दाल के सैंपल में 8 प्रतिशत की नमी, 16 प्रतिशत बटरी दाल, 32 प्रतिशत लाखोड़ी दाल व एक से दो प्रतिशत अन्य दालों की मिलावट मिली। रिपोर्ट से साबित हुआ कि नगर की राशन दुकानों में खरीदी करने वाले लोगों को केवल 43 प्रतिशत ही शुद्ध तुअर दाल मिल रही है। हाल में तेजी से बढ़ी महंगाई के कारण मिलावट का धंधा और बढ़ गया है।
कई कंपनियों ने महंगाई में राहत देने के लिए ग्राहकों में भ्रम बनाया है। पहले जितने रुपये में जितने वजन में वस्तुओं का पैकेट मिलता था। कंपनियों ने महंगाई के कारण भाव बढ़ाने के बजाय उसमें से मात्रा कम कर दी है। छोटे अक्षरों में पैकेट पर भी कम वजन लिखा होता है। लेकिन ग्राहक इस ओर ध्यान नहीं देते हैं। वे पूर्व की कीमतों में ही वस्तुएं लेते हैं। लेकिन वे इस बात से अनजान रहते हैं कि उन्हें उतने रुपये में कम समान मिल रहा है।
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